निबही
निभी है, बीती है।
उ.- सुमिरन, ध्यान, कथा हरिजू की, यह एकौ न रही। लोभी, लंपट, बिषयिनि सौं हित, यौं तेरी निबही -१-३२४।
क्रि. अ.
[हिं. निबाहना]

निबही
निर्वाह किया, पालन किया, रक्षा की।
उ.- रही ठगी चेटक सौ लाग्यौ, परि गई प्रीति सही।¨¨¨¨¨। सूर स्याम पै ग्वालि सयानी सरबस दै निबही - १०-२८१।
क्रि. अ.
[हिं. निबाहना]

निबहैगी
निर्वाह हो जायगा।
उ.- हम जान्यौ ऐसेहिं निबहैगी उन कछु औरै ठानी - ३३५९।
क्रि. अ.
[हिं. निबहना]

निबहौं
पार पाऊँगा, मुक्ति या छुटकारा पाऊँगा।
उ.- माधौ जू, सो अपराधी हौं। जनम पाइ कछु- भलौ न कीन्हौ, कहौ सु क्यों निबहौं - १-१५१।
क्रि. अ.
[हिं. निबाहना, निबहना]

निबहौगे
पार पाओगे, बचोगे, छुट्टी पाओगे, छुटकारा मिलेगा।
उ.- लरिकनि कौं तुम सब दिन भुठवत मोसौं कहा कहौगे। मैया मैं माटी नहिं खाई, मुख देखौं, निबहौगे - १०-२५३।
क्रि. अ.
[हिं. निबहना]

निबह्यौ
निर्वाह किया, पूरा किया, पाला।
उ.- सूरदास धनि धनि वह प्रानी, जो हरि कौ ब्रत लै निबह्यौ - २-८।
क्रि. अ.
[हिं. निबाहना]

निबारयौ
रोका, दूर किया, हटाया।
उ.- दुर्बासा कौ साप निबारयौ, अंबरीषपति राखी - १-१०।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

निबाह
निबाहने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं. निर्वाह]

निबाह
संबंध, क्रम या परंपरा का निर्वाह।
उ.- कीन्हे नेह-निबाह जीव जड़ ते इत उत नहिं चाहत - १-२१०।
संज्ञा
[सं. निर्वाह]

निबाह
(वचन आदि का) पालन या पूर्ति।
संज्ञा
[सं. निर्वाह]

निसिमनि
चंद्रमा।
संज्ञा
[सं. निशामणि]

निसिमुख
संध्याकाल।
संज्ञा
[सं. निशामुख]

निसियर
चंद्रमा।
संज्ञा
[सं. निशाकर]

निसिवासर
रात दिन, आठो पहर,
क्रि. वि.
[सं. निशि + वासर]

निसिवासर
सदा, सर्वदा, नित्य।
क्रि. वि.
[सं. निशि + वासर]

निसिठा
सारहीन, थोथा।
वि.
[सं. निः + हिं. सीठा]

निसीथ
आधि रात।
संज्ञा
[सं. निशिथ]

निसुंभ
निशुंभ' नामक दैत्य।
संज्ञा
[सं. निशुंभ]

निसु
रात, रात्रि।
संज्ञा
[सं. निशि]

निसुका
निर्धन, गरीब।
वि.
[सं. निस्वक]

बसाई
वश, जोर या अधिकार चलता है।
उ.-चाहत बास कियो बृन्दाबन बिधि सौं कछु न बसाई-१० उ.-१०६।
क्रि. अ.
[सं. वश]

बसाए
बस जाने दिया, रहने दिया रहने को ठिकाना दिया।
उ.-नूपुर कलरव मनु हंसनि-सुत रचे नीड़, दै बाँह बसाए-१०-१०४।
क्रि. स.
[हिं. बसाना]

बसात
वश या जोर चलता है।
उ.-नाहिंन बसात लाल कछु तुमसौं सबै ग्वांल इक-ठैयाँ।
क्रि. अ.
[हिं. बस]

बसाना
रहने को स्थान देना।
क्रि. स.
[हिं. बसना]

बसाना
आबाद करना।
क्रि. स.
[हिं. बसना]

बसाना
घर बसाना- विवाह करके गृहस्थ बनना।
मु.

बसाना
टिकने देना, ठहराना, स्थित करना।
क्रि. स.
[हिं. बसना]

बसाना
मन में बसाना- (१) हर समय ध्यान बनाये रखना। (२) प्रेम करना।
मु.

बसाना
रहना, बसना, ठहरना।
क्रि. अ.

बसाना
बैठाना।
क्रि. स.
[सं. वेशन]

बसियाना
बासी हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. बसी]

बसिबे, बसिबो, बसिबौ
रहना, बास करना।
उ.- (क) नगर आहि नागर बिनु सूनो कौन काज बसिबे सौं-३३६५। (ख) वहाँ के बासी लोगन को क्यो ब्रज को बसिबो भावै री-१० उ.-८४। (ग) या ब्रज कौ बसिबौ हम छाँड़यौ-१०-३३७।
संज्ञा
[हिं. बसना]

बसिये
बसते या रहते हैं, वास है, रहना है।
उ.- बसिये एकहिं गाँउ कानि राखत हैं ताते-११२५।
क्रि. अ.
[हिं. बसना]

बसियै
बास कीजिए, रहिए।
उ.- सूर कहि कर तैं दूर बसियै सदा, जमुन कौ नाम लीजै जु छानैं-१-२२३।
क्रि. अ.
[हिं. बसना]

बसिष्ठ
वसिष्ठ मुनि जो राजा दशरथ के कुल-गुरू थे।
संज्ञा
[सं. वसिष्ठ]

बसिष्ठ
संदेशवाहक, दूत।
उ.- तुम सारिखे बसिष्ठ पठाए कहिए कहा बुद्धि उन केरी-३०१२।
संज्ञा
[हिं. बसीठ]

बसी
(प्रजा) सुख से रहने लगी।
उ.- सुबस बसी मथुरा ता दिन ते उग्रसेन बैठायौ-सारा. ५३३।
क्रि. अ.
[हिं. बसना]

बसीकर
वश में करनेवाला।
वि.
[सं. वशीकर]

बसीकरन
तंत्र के चार प्रकारों (मारण, मोहन, वशीकरण और उच्चाटन) में एक, मणि, मंत्र या औषध द्वारा किसी को वश में करने का प्रयोग।
उ.- मोहन, मुर्छन, बसीकरन पढ़ि अग मिति देह बढाऊँ-१०-४९।
संज्ञा
[सं. वशीकरण]

बसीठ
दूत, संदेशवाहक।
उ.- (क) अति सठ ढीठ बसीठ स्याम को हमैं सुनावत गीत। (ख) मैं कुल-कानि किये राखति हौं, ये हठि होत बसीठ-पृ. ३३४ (३६)।
संज्ञा
[सं. अवसृष्ट, प्र. अवसिट्ठ=भेजा हुआ]

बसीठि, बसीठी
दूत-कर्म, संदेश देने का कार्य।
उ.- (क) नैननि निरखि बसीठी कीन्हीं मनु मिलियो पद पानी-११९७। (ख) हारि जोहारि जो करत बसीठी प्रथमहिं प्रथम चिन्हारि-१००६।
संज्ञा
[हिं. बसीठ]

बसीना, बसीनो
रहना, बसना।
उ.- इनही ते ब्रजबास बसीनो-१००६।
संज्ञा
[हिं. बसना]

बसु
आठ वैदिक देवताओं का एक गण।
संज्ञा
[सं. वसु]

बसु
आठ की संख्या।
संज्ञा
[सं. वसु]

बसुदेव
श्रीकृष्ण के पिता।
संज्ञा
[सं. वसुदेव]

बसुधा, बसुधाऊ
वसुधा, पृथ्वी।
उ.- बामन रूप धरथौ बलि छलि कै, तीनि परग बसुधाऊ-१०-२२१।
संज्ञा
[सं. वसुधा]

निसाफ
न्याय।
संज्ञा
[अ. इंसाफ]

निसार
निछावर, उतारा।
संज्ञा
[अ.]

निसार
समूह।
संज्ञा
[सं.]

निसार
एक वृक्ष।
संज्ञा
[सं.]

निसार
तत्व या साररहित।
वि.
[सं. निस्सार]

निसारना
निकालना।
वि.
[सं. निःसरण]

निसास
ठंढी या लंबी साँस।
संज्ञा
[सं. निःश्वास]

निसास
अचेत, बेदम।
उ.-परनि परेवा प्रेम की, (रे) चित लै चढ़त अकास। तहँ चढ़ि तीय जो देखई, (रे) भू पर परत निसास-१-३२५।
वि.

निसासी
बेदम, अचेत।
वि.
[सं. निःश्वास]

निसि
रात।
उ.-राका निसि केते अंतर ससि निमिष चकोर न लावत-१-२१०।
संज्ञा
[सं. निशि]

निसिअर
चंद्रमा।
संज्ञा
[सं. निशाकर]

निसिचर
राक्षस।
उ.-जब देख्यौ दिव्यबान निसिचर कर तान्यौ। छाँड़थौ तब सूर हनू ब्रम्ह-तेज मान्यौ-९-९६।
संज्ञा
[सं. निशाकर]

निसिचरी
राक्षसी, निशाचरी।
उ.-तहँ इक अद्भुत देखि निसिचरी सुरसामुख-बिस्तार-९-७४।
संज्ञा
[सं. निशाचरी]

निसिचारी
राक्षस।
संज्ञा
[सं. निशाचारी]

निसिदिन
रात दिन, आठो पहर।
क्रि. वि.
[सं. निशिदिन]

निसिदिन
सदा-सर्वदा, नित्य।
क्रि. वि.
[सं. निशिदिन]

निसिनाथ, निसिनाह
चंद्र।
संज्ञा
[सं. निशानाथ]

निसि-निसि
आधी रात।
संज्ञा
[सं. निशि-निशि]

निसिपति
चंद्रमा।
बृष है लग्न, उच्च के निसिपति, तनहिं बहुत सुंख पैहैं-१०-८६।
संज्ञा
[सं. निशिपति]

निसिपाल
चंद्रमा।
संज्ञा
[सं. निशिपाल]

निसैनी
सीढ़ी, जीना।
संज्ञा
[सं. निसेनी]

निसोग
शोक-चिंता-रहित।
वि.
[सं. निःशोक]

निसोच
चिंतारहित, बेफिक्र।
वि.
[सं. निःशोच]

निसोत, निसोता
जिसमें किसी चीज का मेल न हो, विशुद्ध।
वि.
[सं. निसंयुक्त]

निसोत, निसोता
असली, सच्चा।
वि.
[सं. निसंयुक्त]

निसोध, निसोधु
खबर, संदेश।
संज्ञा
[हिं. सुध]

निस्चय
दृढ़ विचार, अटल संकल्प।
संज्ञा
[सं. निश्चय]

निस्चय
पूर्ण विश्वास।
उ.-तब लगि सेवा करि निस्वय सौं, जब लगि हरियर खेत-१-३२२।
संज्ञा
[सं. निश्चय]

निस्चय
निस्चय करि-अवश्य ही
उ.-ज्यौं-त्यौं कोउ हरि-नाम उच्चरै। निस्वय करि सो तरै पै तरै-६-४।
प्र.

निस्चै
पक्का विचार. दृढ़ संकल्प।
संज्ञा
[सं. निश्चय]

निस्चै
पूर्ण विश्वास, अटल विश्वास।
उ.-जो जो जन निस्चै करि सेवै, हरि निज बिरद सँभारै। सूरदास प्रभु अपने जन कौं, उर तैं नैंकु न टारै-१-२५७।
संज्ञा
[सं. निश्चय]

निस्तंतु
जिसके कोई संतान न हो।
वि.
[सं.]

निस्तंद्र
जिसमें आलस्य न हो।
वि.
[सं.]

निस्तत्व
तत्व या सार-रहित।
वि.
[सं.]

निस्तब्ध
जिसमें गति या हलचल न हो।
वि.
[सं.]

निस्तब्ध
जड़वत्।
वि.
[सं.]

निस्तब्ध
शांत।
वि.
[सं.]

निस्तब्धता
स्तब्ध होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

निस्तब्धता
सन्नाटा, पूर्ण शांति।
संज्ञा
[सं.]

निस्तरंग
जिसमें तरंग न हो, शांत।
वि.
[सं.]

निसूदक
हिंसा करनेवाला।
वि.
[सं.]

निसूदन
वध या हिंसा करना।
संज्ञा
[सं.]

निसृत
निकला हुआ।
वि.
[सं. निःसृत]

निसृष्ट
जो छोड़ दिया गया हो।
वि.
[सं.]

निसृष्ट
मध्यस्थ।
वि.
[सं.]

निसृष्ट
भेजा हुआ।
वि.
[सं.]

निसृष्ट
दिया हुआ।
वि.
[सं.]

निसेनी
सीढ़ी, जीना।
संज्ञा
[सं. निःश्रेणी]

निसेष
जिसमें कुछ शेष न हो।
वि.
[सं. निःशेष]

निसेस
चंद्रमा।
संज्ञा
[सं. निशेश]

निस्तर, निस्तरण
छुटकारा, उद्धार, मुक्ति।
संज्ञा
[सं.]

निस्तर, निस्तरण
पार जाने या होने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं.]

निस्तरतौ
निस्तार पाता, मुक्तहोता, छूट जाता।
उ.-मोतै कछू न उबरी हरि जू, आयौ चढ़त-उतरतौ। अजहूँ सूर पतित-पद तजतौ, जौ औरहु निस्तरतौ-१-२०३।
क्रि. अ.
[हिं. निस्तरना]

निस्तरना
छुटकारा पाना।
क्रि. अ.
[सं. निस्तार]

निस्तरिहैं
छुटकारा पायँगे, मुक्त होंगे, छूट जायेंगे।
उ.-जौ कहौ, कर्मयोग जब करिहैं। तब ये जीव सकल निस्तरिहैं-७-२।
क्रि. अ.
[हिं. निस्तरना]

निस्तरिहौं
पार जाऊँपा, मुक्त होऊँगा।
उ.-हौं तौ पतित सात पीढ़िन कौ, पतितै ह्वै निस्तरिहौं-१-१३४।
क्रि. अ.
[हिं. निस्तरना]

निस्तल
जिसका तल न हो।
वि.
[सं.]

निस्तल
जिसके तल की थाह न हो, अथाह, गहरा।
वि.
[सं.]

निस्तार
छुटकारा, बचाव, मोक्ष, उद्धार।
उ.-(क) बिन हरि भजन नाहिं निस्तार-४-१२। (ख) बिना कृपा निस्तार न होइ-७-२।
संज्ञा
[सं.]

निस्तारक
बचाने या छुड़ानेवाला।
संज्ञा
[सं.]

निस्तीर्ण
जिलका निस्तार हो चुका हो।
वि.
[सं.]

निस्तेज
तेजहीन, मलिन।
वि.
[सं. निस्तेजस्]

निस्नेह
जिसमें प्रेम न हो।
वि.
[सं.]

निस्पंद
जिसमें कंप या धड़कन न हो।
वि.
[सं.]

निस्पृह
लोभ या इच्छारहित।
वि.
[सं.]

निस्पृहता
कामनारहित होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

निस्पृही
लोभ-लालसारहित।
वि.
[सं. निस्पृह]

निस्राव
वह जो बहकर निकले।
संज्ञा
[सं.]

निस्वन, निस्वा न
शब्द, रव, नाद।
संज्ञा
[सं.]

निस्वास
नाक या मुँह से बाहर आनेवाली साँस।
संज्ञा
[सं. निःश्वास]

निस्तारण
बचाना, छुड़ाना, उद्धार करना।
संज्ञा
[सं.]

निस्तारण
पार करना।
संज्ञा
[सं.]

निस्तारण
(जीतना।
संज्ञा
[सं.]

निस्तारत
छुड़ाते हो, मुक्त करते हो, उद्धारते हो।
उ.-मोसौ कोउ पतित नहिं अनाथ-हीन-दीन। काहे न निस्तारत प्रभु, गुननि अंगनि-हीन-१-१८२।
क्रि. स.
[सं. निस्तर + ना (प्रत्य.)]

निस्तारन
निस्तार करने का भाव।
संज्ञा
[सं. निस्तारण]

निस्तारन
निस्तार करने या मुक्ति दिलाने वाला।
उ.-बरुन बिषाद नंद-निस्तारन-९८२।
संज्ञा
[सं. निस्तारण]

निस्तारना
मुक्त करना।
क्रि. स.
[हिं. निस्तरना]

निस्तारना
पार करना।
क्रि. स.
[हिं. निस्तरना]

निस्तारा
उद्धार किया, मुक्त किया।
उ.-अंध कूप ते काढ़ि बहुरि तेहि दरसन दै निस्तारा-१०उ.-८०।
क्रि. स.
[हिं. निस्तारना]

निस्तारो, निस्तरौ
उद्धार करो, मुक्ति प्रदान करो, छुड़ाओ।
उ.-कै प्रभु हार मानि कै बैठौ, कै अबहीं निस्तारौ-१-१३९।
क्रि. स.
[हिं. निस्तारना]

निहकरमा, निहकरमी, निहकर्मा, निहकर्मी
जो काम में लिप्त न हो।
वि.
[सं. निष्कर्मा]

निहकलंक
निर्दोष, निष्कलंक।
उ.-लै उछंग उपसंग हुतासन, निहकलंक रघुराई-९-१६२।
वि.
[सं. निष्कलंक]

निहकाम
जिसमें कामना न हो।
वि.
[सं. निष्कामी]

निहकाम
जो काम कामना से न किया जाय।
वि.
[सं. निष्कामी]

निहकामी
जिसमें कामना या आसक्ति न हो।
उ.-प्रभु हैं निरलोभी निहकामी-१००५।
वि.
[सं. निष्कामी]

निहचय
दृढ़ धारणा।
संज्ञा
[सं. निश्चय]

निहचल
स्थिर, अचल।
वि.
[सं. निश्चल]

निहचिंत
निश्चिंत, चिंतारहित, बेफिक्र।
जदुपति कह्यौ घेरि हौं आनौ, तुम जेंवहु निहचिंत भए-४३८।
वि.
[सं. निश्चिंत]

निहचीत
चिंतारहित, चिंता से मुक्त।
उ.-गोबिंद गाढ़े दिन के मीत। गज अरु ब्रज प्रहलाद द्रौपदी, सुमिरत ही निहचीत-१-३१।
वि.
[सं. निश्चिंत]

निहचै
दृढ़ विश्वास।
उ.-निहचै एक असल पै राखे, टरै न कबहूँ टारै-१-१४२।
संज्ञा
[सं. निश्चय]

नियंतव्य
नियंत्रित होने योग्य।
वि.
[सं.]

नियंता
नियामक, व्यवस्थापक।
संज्ञा
[सं. नियंतृ]

नियंता
कार्य-विधायक।
संज्ञा
[सं. नियंतृ]

नियंता
नियमानुसार चलानेवाला।
संज्ञा
[सं. नियंतृ]

नियंता
ईश्वर, परमात्मा।
संज्ञा
[सं. नियंतृ]

नियंत्रण
नियमित या व्यवस्थित करना।
संज्ञा
[सं.]

नियंत्रण
देख-रेख में कार्य चलाना।
संज्ञा
[सं.]

नियंत्रित
जिस पर नियंत्रण हो।
वि.
[सं.]

नियंत्रित
जो नियमानुकूल हो, व्यवस्थित।
वि.
[सं.]

नियत
नियमबद्ध।
वि.
[सं.]

निस्संकोच
लज्जा या संकोचरहित।
वि.
[सं.]

निस्संतान
जिसके संतान न हो।
वि.
[सं.]

निस्संदेह
अवश्य, बेशक।
क्रि. वि.
[सं.]

निस्संदेह
जिसमें शक-संदेह न हो।
वि.

निस्संबल
जिसके ठौर-ठिकाना न हो।
वि.
[सं.]

निस्सरण
निकलने का मार्ग।
संज्ञा
[सं.]

निस्सरण
निकलने का भाव या कार्य।
संज्ञा
[सं.]

निस्सहाय
असहाय, निरवलंब।
वि.
[सं.]

निस्सरै
निकलता है, बाहर आता है।
उ.-जा बन की नृप इच्छा करैं। ताही द्वार होइ निस्सरै-४-१२।
क्रि. अ.
[हिं. निसरना]

निस्सार
गूदा या साररहित।
वि.
[सं.]

निस्सार
तत्व या साररहित।
वि.
[सं.]

निस्सीम
बहुत अधिक, असीम।
वि.
[सं.]

निस्सृत
तलवार का एक हाथ।
संज्ञा
[सं.]

निस्वादु
जिसमें स्वाद न हो।
वि.
[सं.]

निस्वार्थ
जिसमें स्वार्थ का भाव न हो।
वि.
[सं.]

निहंग, निहंगम
साधु।
संज्ञा
[सं. निःसंग]

निहंग, निहंगम
अकेला, एकाकी रहने-विचरनेवाला।
वि.

निहंग-लाड़ला
जो दुलार के कारण बहुत ढीठ हो गया हो।
वि.
[हिं. निहंग + लाड़ला]

निहंता
मारनेवाला, विनाशक।
वि.
[सं. निहंतृ]

निहकरमा, निहकरमी, निहकर्मा, निहकर्मी
निकम्मा।
वि.
[सं. निष्कर्मा]

निहत
फेंका हुआ।
वि.
[सं.]

निहत
हत, नष्ट।
वि.
[सं.]

निहत्था
जिसके हाथ में अस्त्र-शस्त्र न हो।
वि.
[हिं. नि + हाथ]

निहत्था
जिसका हाथ खाली हो।
वि.
[हिं. नि + हाथ]

निहनना
मार डालना।
क्रि. स.
[हिं. हनना]

निहपाप
जो पापी न हो।
वि.
[सं. निप्पाप]

निहफल
व्यर्थ, निरर्थक।
वि.
[सं. निप्फल]

निहाई
लोहे का एक औजार जिस पर रखकर कोई धातु कूटी पीटी जाती है।
संज्ञा
[सं. निधाति]

निहाउ
लोहे का घन।
संज्ञा
[सं. निधाति]

निहायत
बहुत अधिक।
वि.
[अ.]

निहारिका
आकाश में कुहरे- सी फैली हुई प्रकाश-रेखा।
संज्ञा
[सं. निहारिका]

निहारी
देखा, निहारा, ताका।
उ.-अँधियारी आई तहँ भारी। दनुजसुता तिहिंतैं न निहारी-९-१७४।
क्रि. स.
[हिं. निहारना]

निहारे
ध्यानपूर्वक देखा, दृष्टि डाली।
उ.-आइ निकट श्रीनाथ निहारे, परी तिलक पर दीठि-१-२७४।
क्रि. स.
[हिं. निहारना]

निहारैं
देखते हैं, ताकते हैं।
उ.-दोऊ ताकी ओर निहारैं-६-४।
क्रि. स.
[हिं. निहारना]

निहारै
निहारता है, ताकता है।
उ.-षोड़स जुक्ति, जुवति चित षोडस, षोड़स बरस निहारै-१-६०।
क्रि. स.
[हिं. निहारना]

निहारौ
देखो, अवलोको।
उ.-याकौ सुंदरं रूप निहारौ-७-७-।
क्रि. स.
[हिं. निहारना]

निहारथौ
देखा।
उ.-तोरि कोदंड मारि सब जोधा तब बल-भुजा निहारथौ-२५८६।
क्रि. स.
[हिं. निहारना]

निहारथौ
देख-समझ सका।
उ.-घँसि कै गरल लगाय उरोज़न कपट न कोउ निहारथौ।
क्रि.स
[हिं. निहारना]

निहाल, निहाला
पूर्ण संतुष्ट और प्रसन्न।
उ.-(क) जैसैं रंक तलक धन पाए ताहि महा वह होत निहाल-१३२३। (ख) जन्म मरन तैं रहि गयौ वह कियौ निहाला-२५७७।
वि.
[फ़ा.]

निहाली
गद्दा, तोशक।
संज्ञा
[फ़ा.]

निहार
देखकर, अवलोक कर।
उ.-तबहूँ गयौ न क्रोध-बिकार। महादेव हू फिरे निहार-७-२।
क्रि. स.
[सं. निहारना]

निहार
बचाकर, सावधानी से बचकर।
भरत चलै पथ जीव निहार। चलै नहीं ज्यौं चलैं कहार-५-४।
क्रि. स.
[सं. निहारना]

निहार
पाला।
संज्ञा
[सं.]

निहार
ओस।
संज्ञा
[सं.]

निहार
हिम।
संज्ञा
[सं.]

निहारत
देखती है, ताकती है।
उ.-झूठौ मन, झूठी सब काया, झूठी आरभटी। अरु झूठनि के बदन निहारत मारग फिरत लटी-१-९८।
क्रि. स.
[हिं. निहारना]

निहारति
देखती-ताकती है।
उ.-नावसत साजि सिंगार बनी सुंदरि आतुर पंथ निहारति-२५६२।
क्रि. स.
[हिं. निहारना]

निहारना
देखना।
क्रि. स.
[सं. निभालन=देखना]

निहारनि
निहारने की क्रिया या भाव, चितवनि।
संज्ञा
[हिं. निहारना]

निहारि
देखकर, देखदेख, ताककर।
उ.-काकौ बदन निहारि द्रौपदी दीन दुखी संभरिहै ? -१-२९।
क्रि. स.
[हिं. निहारना]

निहोरी
प्रार्थना की, विनय की, खुशामद की।
उ.-मोहिं भयौ माखन पछितावौ रीती देखि कमोरी। जब गहि बाँह कुलाहल कीनी, तब गहि चरन निहोरी-१०-२८६।
संज्ञा
[हिं. निहोरना]

निहोरी
प्रशंसा, कृतज्ञता-प्रदर्शन।
उ.-दै मैया भौंरा चक डोरी।¨¨¨¨। मैया बिना और को राखै, बार-बार हरि करत निहोरी-१०-६६९।
संज्ञा

निहोरे
मनाने या बहलाने कै लिए कहे गयै वचन या किये गये कार्य।
उ.-बरा कौर मेलत मुख भीतर, मिरिच दसन टकटौरे।¨¨¨¨। सूर स्याम कौं मधुर कौर दै कीन्हें तात निहोरे-१०-२२४।
संज्ञा
[हिं. निहोरा]

निहोरो, निहारौ
अनुग्रह, कृतज्ञता, एहसान, उपकार।
उ.-(क) गीध, ब्याध, गज, गौतम की तिय, उनकौ कौन निहोरौ। गनिका तरी आपनी करनी, नाम भयौ प्रभु तोरौ-१-१३२। (ख) बिप्र सुदामा कियौ आजाची, प्रीति पुरातन जानि। सूरदास सौं कहा निहोरौ, नैननि हूँ की हानि-१०-१३५। (ग) कह दाता जो द्रवै न दीनहिं देंखि दुखित ततकाल। सूर स्याम कौ कहा निहोरौ तलत बेद की चाल-१-१५९।
संज्ञा
[हिं. निहोरा]

नींद
सोने की अवस्था, निद्रा।
उ.-गोबिंद गुन चित बिसारि, कौन नींद सोयौ-१-३३०।
संज्ञा
[सं. निद्रा]

नींद
नींद उचटना- फिर नींद न आना। नींद उचाटना- नींद न आने देना। नींद उचाट होना- नींद टूटने पर फिर न आना। नींद जाना- नींद न आना। नीद गई- नींद आती ही नहीं। उ.- कहा करौं चलत स्याम के पहिलेहि नींद गई दिन चार-२७९५। नींद पड़ना- नींद आना। नींद भरना- पूरी नींद सोना। नींद भर सोना- जी भरकर सोना। नींद लेना- सो जाना। नींद लीन्हीं- सोयी। उ.-जब तें प्रीति स्याम सों कीन्हीं। ता दिन ते मेरे इन नैननि नैंकहुँ नींद न लीन्हीं। नींद संचारना- नींद आना। नींद हराम करना - सोने न देना। नींद हराम होना- सो न सकना।
मु.

नींदड़ी
नींद, निद्रा।
संज्ञा
[हिं. नींद]

नींदति
निंदा करती है।
उ.-नींदति सैल उदधि पन्नग को श्रीपति कमठ कठोरहिं-२८६२।
क्रि. स.
[हिं. नींदना]

नींदना
नींद लेना, सोना।
क्रि. अ.
[हिं. नींद]

नींदना
निंदा करना।
क्रि. स.
[हिं. नींदना]

निहाव
लोहे का घन।
संज्ञा
[सं. निघाति]

निहिचय
दृढ़ धारणा।
संज्ञा
[सं. निश्चय]

निहिचिंत
चिंतारहित।
वि.
[सं. निश्चिंत]

निहित
रखा, पड़ा या छिपा हुआ।
वि.
[सं.]

निहितार्थ
वाक्य का अर्थ जो महत्वपूर्ण तो हो, पर जल्दी न खुले।
संज्ञा
[सं.]

निहुँकना
झुकना।
क्रि. अ.
[हिं. नि + झुकना]

निहुड़ना, निहुरना
झुकना।
क्रि. अ.
[हिं. नि + होड़न]

निहुड़ाना, निहुराना
झुकाना नवाना, नीचे या नम्र करना।
क्रि. स.
[हिं. निहुरना]

निहोर
अनुग्रह, कृतज्ञता।
संज्ञा
[हिं. निहोरा]

निहोर
विनती, प्रार्थना।
उ.- (क) प्रभु, मोहिं राखियै इहिं ठौर। केस गहते कलेस पाऊँ, करि दुसासन जोर। करन, भीषम, द्रोन मानत नाहिं कोउ निहोर-१-२५३। (ख) चितै पघुनाथ बदन की ओर। रघुपति सौं अब नेम हमारौ बिधि सौं करति निहोर-९-२३। (ग) लाइ उरहिं, बहाइ रिस जिय, तजहु प्रकृति कठोर। कछुक करुना करि जसोदा करतिं निपट निहोर-१०-३६४। (घ) माखन हेरि देतिं अपनैं कर, कछु कहि बिधि सौं करतिं निहोर-१०-३९८।
संज्ञा
[हिं. निहोरा]

निहोर
भरोसा, आसरा।
संज्ञा
[हिं. निहोरा]

निहोर
द्वारा, बदौलत।
क्रि. वि.

निहोर
वास्ते।
क्रि. वि.

निहोरना
विनय या प्रार्थना करना।
क्रि. स.
[हिं. मनुहार]

निहोरना
मनौती करना, मनाना।
क्रि. स.
[हिं. मनुहार]

निहोरना
कृतज्ञ होना।
क्रि. स.
[हिं. मनुहार]

निहोरा
कृतज्ञता, उपकार।
संज्ञा
[हिं. मनुहार]

निहोरा
विनती, प्रार्थना।
संज्ञा
[हिं. मनुहार]

निहोरा
भरोसा, आसरा।
संज्ञा
[हिं. मनुहार]

निहोरि
मनौती मानकर।
उ.-ग्वालिन चली जमुना बहोरि। वाहि सब मिलि कहत आवहु कछू कहति निहोरि।
क्रि. स.
[हिं. निहोरना]

नीकी
अच्छी, भली।
उ.-(क) होरी खेलन की बिधि नीकी। (ख) माखन खाइ, निदरि नीकी बिधि यह तेरे सुत की घात-१०-३०६।
वि.
[हिं. नीका]

नीके
ठीक, स्वस्थ, सुचित्त।
उ.-लोग सकल नीके जब भए। नृप कन्या दै, गृह कौं गए-९-२।
वि.
[हिं. नीक]

नीके
भले, अच्छे।
उ.-इतने काज किये हरि नीके-२६४३।
वि.
[हिं. नीक]

नीके
अच्छी तरह, भली भाँति।
उ.-हरि की भक्ति करो सुत नीके जो चाहो सुख पायो।
क्रि. वि.

नीकैं
अच्छी तरह, भली भाँति।
उ.-नीकैं गाइ गुपालहिं मन रे। जा गाए निर्भय पद पाए अपराधी अनगन रे-१-६६।
क्रि. वि.
[हिं. नीक]

नीकौ
भला, अच्छा, श्रेष्ठ।
उ.-(क) कोउ न समरथ अघ करिबे कौं, खैंचि कहत हौं लीकौ।मरियत लाज सूर पतननि मैं, मोहूँ तैं को नीकौ-१-१३८। (ख) हम तैं बिदुर कहा है नीकौ-१-२४३।
वि.
[हिं. नीका]

नीकौ
अनुकूल, उत्तम।
उ.-यक ऐसेहि झकझोरति मोको पायो नीको दाउँ-१६१३।
वि.
[हिं. नीका]

नीकौ
दोष देन कौं नीकौ- दोष देने को सदा तैयार, दूसरों के दोष निकालने में तेज। उ.-महा कठोर, सुन्न हिरदै कौ, दोष देन कौं नीको-१-१८६।
मु.

नीच
जाति, गुण, कर्म आदि में घट कर होना, क्षुद्र तुच्छ।
वि.
[सं.]

नीच
निम्न श्रेणी का, बुरा।
वि.
[सं.]

नीच
नीच मनुष्य, क्षुद्र व्यक्ति।
संज्ञा

नीचता
नीचपन।
संज्ञा
[सं.]

नीचता
ओछापन।
संज्ञा
[सं.]

नीचा
ऊँचे का उलटा। गहरा।
वि.
[सं. नीच]

नीचा
जो कम ऊँचा हो।
वि.
[सं. नीच]

नीचा
बहुत लटकता हुआ।
वि.
[सं. नीच]

नीचा
झुका हुआ, नत।
वि.
[सं. नीच]

नीचा
जो जोर का न हो, धीमा।
वि.
[सं. नीच]

नीचा
जो जाति, पद आदि में घटकर हो।
वि.
[सं. नीच]

नीचा
नीचा-ऊँचा- (१) भला-बुरा। (२) हानि-लाभ। (३) सुख-धुख। नीचा खाना- (१) अपमानित होना। (२) पराजित होना। (३) लज्जित होना। नीचा दिखाना- (१) अपमानित करना। (२) पराजित करना। (३) लज्जित करना। (४) घमंड चूर करना। नीचा देखना- (१) अपमानित होना। (२) लज्जित होना। (३) घमंड चूर होना। नीची दृष्टि करना- (लज्जा-संकोच से) सिर झुकाना। नीची द्दष्टि से देखना- तुच्छ या छोटा समझना।
मुु.

निमेषण
पलक गिरना, आँख मुँदना।
संज्ञा
[सं.]

निमेषै
पलक झपकना भी, पलक गिरना तक।
उ.- अब इहिं बिरह अगर जो करी हम बिसरी नैन निमेषै - ३१९०।
संज्ञा
[सं.]

निमोना
चने या मटर के पिसे हुए हरे दानों को हल्दी-मसाले के साथ घी में भूनकर बनाया हुआ रसदार व्यंजन।
उ.- बहुत मिरच दैं किए निमोना। बेसन के दस-बीसक दोना - १०-३९६।
संज्ञा
[सं. नवान्न]

निमौनी
वह दिन जब पहली बार ईख काटी जाती है।
संज्ञा
[सं. नवान्न]

निम्न
नीचा।
वि.
[सं.]

निम्न
तुच्छ।
वि.
[सं.]

निम्नगा
नदी।
संज्ञा
[सं.]

निम्नगा
नीचे की ओर जाने या बहनेवाली।
वि.

निम्लोचनी
वरूण की नगरी का नाम।
संज्ञा
[सं.]

निम्नोक्त
नीचे कहा हुआ।
वि.
[सं.]

नींदरी
निंद, नींद्रा।
संज्ञा
[हिं. नींद]

नींदौ
नींद भी।
उ.-ता दिन ते नींदौं पुनि नासी चौंकि परति अधिकारे-३०४५।
संवि.
[हिं. नींद]

नींब
नीम का पेड़।
उ.-(क) नींब लगाइ अंब क्यौं खावै-१०४२। (ख) ता ऊपर लिखि जोग पठावत खाहु नींब तजि दाख-३३२२।
संज्ञा
[सं. निंब]

नींव
मकान आदि की नीव।
संज्ञा
[हिं. निव]

नींव
कार्य का प्रारंभिक भाग।
वि.
[हिं. नीव]

नीक
ठीक, स्वस्थ।
उ.-घायल सबै नीक ह्वै गए-४-५।
वि.
[सं. निक्त=स्वच्छ, साफ; फा. नेक]

नीक
भला, सुंदर।
संज्ञा
[सं. निक्त=स्वच्छ, साफ; फा. नेक]

नीक
अच्छापन, उत्तमता।
संज्ञा

नीकन
नेत्र।
उ.-(क) सारँग सुत निकन ते बिछुरत सर्प बेलि रस जाई-सा. १६। (ख) नीकन अधिक दिपत हुत ताते अंतरिच्छ छवि भारी-सा. ५१।
संज्ञा

नीका
अच्छा, भला, उत्तम।
वि.
[हिं. नीक]

नीझर
झरना, सोता।
संज्ञा
[सं. निर्झर]

नीठ, नीटि
ज्यों-त्यों करके।
उ.-तेई कमल सूर नित चितवत नीठ निरंतर संग-सा. ३-४४।
क्रि. वि.
[हिं. निठि]

नीठ, नीटि
बड़ी कठिनता से।
क्रि. वि.
[हिं. निठि]

नीठि
अनिच्छा।
संज्ञा
[सं. अनिष्टि, प्रा. अनिट्ठि]

नीठि
जैसे-तैसे।
क्रि. वि.

नीठि
कठिनता से।
क्रि. वि.

नीठो
न सुहाने या भानेवाला।
उ.-छेक उक्त जहँ दुमिल समझ केका समुझावत नीटो। मिसिरी सूर न भावत घर की चोरी को गुड़ मीठो-सा० ९०।
वि.
[हिं. नीठि]

नीड़
बैठने या ठहरने का स्थान।
संज्ञा
[सं.]

नीड़
चिड़ियों के रहने का घोंसला।
उ.-नूपुर कलरव मनु हंसनि सुत रचे नीड़, दै बाहँ बसाए-१०-१०४।
संज्ञा
[सं.]

नीड़क, नीड़ज
पक्षी, चिड़िया।
संज्ञा
[सं.]

नीत
लाया या पहुँचाया हुआ।
वि.
[सं.]

नीत
स्थापित।
वि.
[सं.]

नीत
प्राप्त।
वि.
[सं.]

नीत
ग्रहण किया हुआ।
उ.-किधौं मंद गरजनि जलधर की पग नूपुर रव नीत।
वि.
[सं.]

नीतन
नेत्र, नयन।
उ.-लगे फरकन अंतरिछ अनूप नीतन रंग-सा. ७५।
संज्ञा
[हिं. नीति=नीत=नय + न=नयन]

नीति
व्यवहार की सामाजिक रीति।
उ.-गुरु-पितु-ग्रह बिनु बोलेहु जैऐ। है यह नीति नाहिं सकुचेऐ-४-५।
संज्ञा
[सं.]

नीति
ले जाने-चलने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं.]

नीति
व्यवहार की रीति।
संज्ञा
[सं.]

नीति
आचार-व्यवहार, सदाचार।
संज्ञा
[सं.]

नीति
राज रक्षा की विधि।
संज्ञा
[सं.]

नीचाशय
ओछे या क्षुद्र विचार का।
वि.
[सं.]

नीचि
नीचे की ओर।
उ.-समुझि निज अपराध करनी नारि नावति नीचि-३४७५।
क्रि. वि.
[हिं. नीचा]

नीचू
नीचे की ओर।
क्रि. वि.
[हिं. नीचा]

नीचे, नीचैं
नीचे की ओर।
उ.-(क) (कह्यौ) उहाँ अब गयौ न जाइ। बैठि गई सिर नीचैं नाइ-४-५। (ख) सुरपति-कर तब नीचैं आयौ-९-३। (ग) सुनि ऊधौ के बचन नीचे कै तारे-३४४३।
क्रि. वि.
[हिं. नीचा]

नीचे, नीचैं
नीचे-ऊपर- (१) एक पर एक, तले ऊपर। (२) उलट-पलट अस्त-व्यस्त। नीचे गिरना- (१) मान-मर्यादा खोना। (२) पतित होना। (२) कुश्ती में हारना। नीचे डालना - (१) फेंकना। (२) पराजित करना। नीचे लाना- कुश्ती में हराना। उपर ले नीचे तक- (१) सब भागों में। (२) सिर से पैर तक।
मु.

नीचे, नीचौं
घटकर, कम।
क्रि. वि.
[हिं. नीचा]

नीचे, नीचौं
अधीनता में, मातहत।
क्रि. वि.
[हिं. नीचा]

नीच्यो
नीचे की ओर।
उ.-सूर सीस नीच्यो क्यों नावत अब काहे नहिं बोलत-३१२१।
क्रि. वि.
[हिं. नीचा]

नीजन
निर्जन, जनशून्य।
वि.
[सं. निर्जन]

नीजन
वह स्थान जहाँ कोई न हो।
संज्ञा

नीति
युक्ति उपाय।
संज्ञा
[सं.]

नीतिज्ञ
नीति-कुशल, नीति-चतुर।
वि.
[सं.]

नीत्यो
नीति-व्यवहार-पद्धति।
उ.-द्वै नृप लरत जाइ इन्द्रीगत कहा सूर को नीत्यो - २८९८।
संज्ञा
[सं. नीति]

नीदना
निंदा करना।
क्रि. स.
[सं. निंदन]

नीधन, नीधना
दरिद्र, धनहीन।
वि.
[सं. निर्धन]

नीप
कदंब।
उ.-एक घरी धीरज धरौं, बैठौ सब तर नीप-५८९।
संज्ञा
[सं.]

नीप
अशोक।
संज्ञा
[सं.]

नीबर
दुर्बल, शक्तिहीन।
वि.
[सं. निर्बल]

नीबी
कटि-बंध, फुफुंदी, नारा।
उ.-नीबी ललित गही जदुराइ-६८२।
संज्ञा
[सं. नीवि]

नीबू
एक खट्टा फल।
संज्ञा
[सं. निंबुक]

नीम
एक प्रसिद्ध पेड़।
संज्ञा
[सं. निम्ब]

नीमन
नीरोग, स्वस्थ, भला चंगा।
उ.-जानि लेहु हारि इतने ही में कहा करै नामन को बैद।
वि.
[सं. निर्मल]

नीमन
अच्छा, सुंदर।
वि.
[सं. निर्मल]

नीमर
दुर्बल, शक्तिहीन।
वि.
[हिं. निर्मल]

नीमषार, नीमषारण्य, नीमषारन
अवध के सीतापुर जिले में स्थित एक प्राचीन वन जो हिंदुओं का एक तीर्थस्थान माना जाता है।
संज्ञा
[सं. नैमिषारण्य]

नीमा
जोमे के नीचे का एक पहनावा।
संज्ञा
[फ़ा.]

नीमावत
निबंकाचार्य का अनुयायी।
संज्ञा
[सं. निंब]

नीयत
भाव, आशय, मंशा।
संज्ञा
[अ.]

नीयत
नीयत डिगना- मन में दोष या स्वार्थ आ जाना। नीयत बद होना- मन में बुराई आना। नीयत बदल जाना- (१) इच्छा या विचार कुछ का कुछ हो जाना। (२) भले से बुरा विचार हो जाना। नीयत बाँधना- इरादा करना। नीयत बिगड़ना- (१) इच्छा या विचार कुछ का कुछ हो जाना। (२) भले से बुरा विचार हो जाना। नीयत भरना- इच्छा पूरी होना, जी भरना। नीयत में फर्क आना- भला विचार बुरे में बदल जाना। नीयत लगी रहना- जी ललचाता रहना।
मु.

नीर
पानी, जल।
संज्ञा
[सं.]

नीर
नीर ढलना- मरते समय आँसू बहना।
मु.

नीर
आत्माभिमान की भावना।
उ.-कहँ वह नीर, कहाँ वह सोभा कहँ रँग-रूप दिखैहै-१-८३।
संज्ञा
[सं.]

नीर
किसी का नीर ढल जाना- आत्माभिमान की भावना का न रह जाना, निर्लज्ज या बेहया हो जाना।
मु.

नीर
द्रव पदार्थ या रस।
संज्ञा
[सं.]

नीर
फोड़े-फफोलो का चेप।
संज्ञा
[सं.]

नीरज
जल में उत्पन्न वस्तु।
संज्ञा
[सं. नीर + ज]

नीरज
कमल।
संज्ञा
[सं. नीर + ज]

नीरज
मोती, मुक्ता।
संज्ञा
[सं. नीर + ज]

नीरद
जलदाता।
संज्ञा
[सं.]

नीरद
बादल।
संज्ञा
[सं.]

नीरस
आनंदरहित।
उ.-(क) पिउ पद-कमल कौ मकरंद। मलिन मति मन मधुप, परिहरि, बिषय नीरस मंद-९-१०। (ख) जीवै तो राजसुख भोग पावै जगत मुए निर्बान नीरस तुम्हारो-१० उ.-५७।
वि.
[सं.]

नीरस
जलरहित।
उ.-सूरदास क्यों नीर चुवत है नीरस बचन निचोयो-३४८२।
वि.
[सं.]

नीरांजन
आरती, दीपदान।
संज्ञा
[सं.]

नीरांजना
आरती करना।
क्रि. अ.
[सं. नीरांजन]

नीरांजनी
आरती।
संज्ञा
[सं.]

नीरा
पास, समीप।
क्रि. वि.
[हिं. नियर]

नीरा
ताड़ के वृक्ष का बहुत स्वादिष्ट, गुणकारी और मस्त कर देनेवाला रस।
संज्ञा
[सं. नीर]

नीराजन
देवता की आरती।
संज्ञा
[सं. नीरांजन]

नीराजना
आरती करना।
क्रि. अ.
[हिं. नीराजना]

नीरे
पास, समीप।
उ.-तुम इक कहत सकल घटै ब्यापक अरु सबही के नीरे-३१९८।
क्रि. वि.
[हिं. नियरे]

नीरद
जिसके दाँत न हों।
वि.
[सं. निः + रद]

नीरधर
बादल, मेघ।
संज्ञा
[सं.]

नीरधि
समुद्र।
उ.-पसुपति मंडल मध्य मनो मनि छीरधि नीरधि नीर के-२५९९।
संज्ञा
[सं.]

नीरना
बिखेरना, छिटकाना।
क्रि. स.
[देश.]

नीरनिधि
समुद्र।
संज्ञा
[सं.]

नीरपति
वरुण देवता।
संज्ञा
[सं.]

नीरव
जिसमें शब्द न हो, निःशब्द।
वि.
[सं.]

नीरव
जो बोलता न हो, चुप।
वि.
[सं.]

नीरस
रसहीन।
वि.
[सं.]

नीरस
शुष्क।
वि.
[सं.]

नीरोग
जो रोगी न हो, स्वस्थ।
वि.
[सं.]

नीलंगु
भौंरा।
संज्ञा
[सं.]

नीलंगु
फल।
संज्ञा
[सं.]

नील
नीले या गहरे आसमानी रंग का।
वि.
[सं.]

नील
नीला या गहरा आसमानी रंग।
संज्ञा

नील
एक पौधा जिससे यह रंग निकाला जाता है।
संज्ञा

नील
नील का टीका लगना- कलंक लगना। नील का टीका लगाना- कलंकी सिद्ध कर देना। नील कौ खेत- कलंक का स्थान। उ.-सेवा नहिं भगवंत चरन की, भवन नील कौ खेत-२-१५। नील की सलाई फिरवाना- आँखें फुड़वा देना। नील घोटना- किसी बात को लेकर बहुत देर तक उलझना। नील जलाना- पानी बरसाने के लिए नील जलाने का टोटका करना। नील बिगड़ना- (१) चरित्र बिगड़ना। (२) चेहरे की आकृति बिगड़ना। (३) कलंक की बात फैलना। (४) बुद्धि ठिकाने न रहना। (५) दुर्दशा होना। (६) दिवाला निकलना।
मु.

नील
शरीर पर पड़नेवाला चोट का नीला निशान।
संज्ञा

नील
नील डालना- इतना मारना कि शरीर पर मार के नीले-काले निशान बन जायें।
मु.

नील
कलंक, लांछन।
संज्ञा

नियत
स्थिर, निश्चित।
वि.
[सं.]

नियत
स्थापित, नियोजित।
वि.
[सं.]

नियत
भाव, उद्देश्य, इच्छा।
संज्ञा
[अ. नीयत]

नियतात्मा
संयमी, जितेन्द्रिय।
वि.
(सं. नियतात्मन्)

नियताप्ति
नाटक में सबको छोड़कर केवल एक ही उपाय से फल प्राप्ति का निश्चय।
संज्ञा
[सं.]

नियति
निश्चित या बद्ध होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

नियति
ठहराव, स्थिरता।
संज्ञा
[सं.]

नियति
भाग्य, अदृष्ट।
संज्ञा
[सं.]

नियति
अवश्य होनेवाली बात।
संज्ञा
[सं.]

नियतिवाद
एक सिद्धांत जिसके अनुसार विश्वास किया जाता है कि जो कुछ संसार में घटित होता है, वह पूर्व निश्चित और अटल है।
संज्ञा
[सं.]

नील
राम की सेना का एक बंदर।
उ.-सीय-सुधि सुनत रघुबीर धाए। चले तब लखन, सुग्रीव, अंगद, हनू, जामवँत, नील, नल, सबै आए-९-१०६।
संज्ञा

नील
नव निधियों में एक।
संज्ञा

नील
नीलम।
संज्ञा

नील
विष।
संज्ञा

नील
माहिष्मती का एक राजा।
संज्ञा

नील
एक संख्या जो दस हजार अरब की होती है।
उ.-सिर पर धरि न चलैगौ कोऊ, जो जतननि करि माया जोरी। राजपाट सिंहासन बैठो, नील पदुम हूँ सौं कहै थोरी-१-३०३।
संज्ञा

नीलकंठ
जिसका कंठ नीला हो।
वि.
[सं.]

नीलकंठ
मयूर, मोर।
संज्ञा

नीलकंठ
एक पक्षी।
संज्ञा

नीलकंठ
शिव जी।
संज्ञा

नीलकांत
विष्ण।
संज्ञा
[सं.]

नीलकांत
नीलम।
संज्ञा
[सं.]

नीलगाय
एक बड़ा हिरन।
संज्ञा
[हिं. नील + गाय]

नीलगिरि
दक्षिण का एक पर्वत।
संज्ञा
[सं.]

नीलग्रीव
शिव जी, महादेव।
संज्ञा
[सं.]

नीलम
नीले रंग का रत्न, नीलमणि, इंद्रनील नामक मणि।
संज्ञा
[फ़ा., सं. नीलमणि]

नीलमणि
नीलम, इंद्रनील।
संज्ञा
[सं.]

नीलवसन
नीला या काला वस्त्र।
संज्ञा
[सं.]

नीलवसन
नीला या काला वस्त्र धारण करनेवाला।
वि.

नीलवसन
शनि देव।
संज्ञा

नीलवसन
बलराम।
संज्ञा

नीलांबर
नीले रंग का (प्रायःरेश्मी) वस्त्र।
उ.- दाऊ जू, कहि स्याम पुकार्यौ। नीलांबर कर ऐंचि लियौ हरि, मनु बादर तैं चंद उजार्यौ-४०७।
संज्ञा
[सं. नील + अंबर=वस्त्र]

नीलांबर
नीले या काले वस्त्र धारण करनेवाला।
वि.

नीलांबर
बलराम।
संज्ञा

नीलांबर
शनि देव।
संज्ञा

नीलांबरी
एक रागिनी।
संज्ञा
[सं.]

नीलांबुज
नील कमल।
संज्ञा
[सं.]

नीला
नील के रंग का।
वि.
[सं. नील]

नीला
नीला करना- इतना मारना कि शरीर पर नीले दाग पड़ जायँ.। नीला-पीला होना- क्रोध दिखाना। नीले हाथ-पाँव हों- मर जाय। चेहरा नीला पड़ जाना- (१) लज्जा, संकोच या भय से चेहरे का रंग फीका पड़ना। (२) मृत्यु के पश्चात् आकृति बिगड़ जाना।
मु.

नीला
राधा की एक सखी का नाम।
उ.-अमला अबला कंजा मुकुता हीरा नीला प्यारि-१५८०।
संज्ञा

नीलाक्ष
नीली आँखवाला।
वि.
[सं.]

नीलाचल
नीलगिरि पर्वत।
संज्ञा
[सं.]

नीलाब्ज
नीला कमल।
संज्ञा
[सं.]

नीलाम
बोली बोलकर बेचना।
संज्ञा
[पुर्त. लीलाम.]

नीलावती
एक प्रकार का चावल।
उ.-नीलावती चावल दिव-दुर्लभ। भात परोस्यौ माता सुरलभ-३९६।
संज्ञा
[सं. नीलवती]

नीलिमा
नीलापन, श्यामता।
संज्ञा
[सं. नीलिमन्]

नीलिमा
स्याही, मसि।
संज्ञा
[सं. नीलिमन्]

नीली
नीले-काले रंग की।
वि.
[हिं. नीला]

नीलोत्पल
नील कमल।
संज्ञा
[सं.]

नीव
घर की दीवार उठाने के लिए गहरा किया हुआ स्थान।
संज्ञा
[सं. नेमि, प्रा. नेंइ]

नीव
नीव देना- घर उठाना प्रारंभ करना।
मु.

नीव
दिवार की जड़ या आधार।
संज्ञा
[सं. नेमि, प्री. नेंइ]

नीव
नींव का पत्थर- मकान बनाने के लिए रखा जाने वाला पहला पत्थर। नीव जमाना (डालना, देना)- दीवार की जड़ जमाना जमाना। नीव पड़ना- घर बनना आरंभ होना।
मु.

नीव
जड़, मूल, आधार।
संज्ञा
[सं. नेमि, प्री. नेंइ]

नीव
नीव देना- कार्यारंभ करना। नीव का पत्थर- कार्यारंभ का प्रथम चरण। नीव जमना- जड़ या स्थिति मजबूत कर लेना। नीव डालना- कार्यारंभ करना। नीव पड़ना- कार्यारंभ होना।
मु.

नीवि, नीवी
नारा, इजारबंद।
संज्ञा
[सं. नीवि]

नीसक
निर्बल, कमजोर।
वि.
[सं. निःशक्त]

नीसान
नगाड़ा, धौंसा।
उ.-(क) है हरि-भजन कौ परमान। नीच पावैं ऊँच-पदवी, बाजते नीसान-१-२३५। (ख) देवलोक नीसान बजाये बरषत सुमन सुधारे-पृ. ३४४ (३१)।
संज्ञा
[फ़ा. निशान]

नीहार
कुहरा।
संज्ञा
[सं.]

नीहार
पाला, तुषार।
संज्ञा
[सं.]

नीहारिका
आकाश में कुहरे- सा फैला प्रकाश-पुंज जो रात में एक धुँदली सफेद धारी-सा दिखायी पड़ता है।।
संज्ञा
[सं.]

नुकता
बिंदी।
संज्ञा
[अ. नुकतः]

नुकता
चुभती हुई उक्ति, फबती।
संज्ञा
[अ. नुकतः]

नुकता
ऐब, दोष।
संज्ञा
[अ. नुकतः]

नुकताचीनी
दोष निकालना।
संज्ञा
[फ़ा.]

नुकसान
कमी, घटी।
संज्ञा
[अ.]

नुकसान
हानि, घाटा।
संज्ञा
[अ.]

नुकसान
खराबी, दोष, अवगुण।
संज्ञा
[अ.]

नुकीला
नोकदार।
वि.
[हिं. नोक + ईला]

नुक्कड़
नोक।
संज्ञा
[हिं. नोक]

नुमाइश
तड़क-भड़क, सजधज।
संज्ञा
[फ़ा.]

नुमाइश
अद्भुत वस्तुओं का संग्रह-स्थान या प्रदर्शनी।
संज्ञा
[फ़ा.]

नुमाइशी
दिखाऊ, दिखौआ।
वि.
[हिं. नुमाइश]

नुमाइशी
ऊपरी तड़क-भड़कवाला, वास्तव में (निस्सार)
वि.
[हिं. नुमाइश]

नुसखा
औषधि-पत्र।
संज्ञा
[अ.]

नूत, नूतन
नया, नवीन।
उ.-(क) गौरि-कंत पूजत जहँ नूतन जल आनी-९-९६। (ख) अरुन नूत पल्लव धरे रँगभीजी ग्वालिनी।
वि.
[सं.]

नूत, नूतन
अनूठा अनोखा।
उ.-किसलै कुसुम नव नूत दसहु दिसि मधुकर मदन दोहाई-२७८४।
वि.
[सं.]

नूत, नूतन
ताजा।
वि.
[सं.]

नूतनता
नयापन, नवीवता।
संज्ञा
[सं.]

नूतनत्व
नयापन, नवीवता।
संज्ञा
[सं.]

नुक्कड़
सिरा, छोर, अंत।
संज्ञा
[हिं. नोक]

नुक्कड़
निकला हुआ कोना।
संज्ञा
[हिं. नोक]

नुक्स
दोष।
संज्ञा
[अ.]

नुक्स
त्रुटि, कसर।
संज्ञा
[अ.]

नुचना
झटके से या खिंचकर उखड़ना।
क्रि. अ.
[सं. लुंचन]

नुचना
नाखून आदि से छिलना या खरुचना।
क्रि. अ.
[सं. लुंचन]

नुचवाना
नोचने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. नोचना]

नुनाई
सलोनापन, सुंदरता।
संज्ञा
[हिं. लोनाई]

नुमाइंदा
प्रतिनिधि।
संज्ञा
[फ़ा.]

नुमाइश
दिखावट।
संज्ञा
[फ़ा.]

नून
नमक।
संज्ञा
[सं. लवण, हिं. लोन]

नून
कम, न्यून।
वि.
[सं. न्यून]

नूनताई
कमी, न्यूनता।
संज्ञा
[सं. न्यूनता]

नूना
कम।
वि.
[सं. न्यून]

नूना
घटकर।
वि.
[सं. न्यून]

नूपुर
पैर में पहनने का बच्चों और स्त्रियों का एक गहना, घूँघरू, पैंजनी।
उ.-रुनुक-झुनुक चलत पाइ नूपुर-धुनि बाजै-१०-१४६।
संज्ञा
[सं.]

नूर
ज्योति, प्रकाश।
संज्ञा
[अ.]

नूर
श्री, कांति, शोभा।
संज्ञा
[अ.]

नूर
ईश्वर का एक नाम (सूफी)।
संज्ञा
[अ.]

नूरा
नूरनाला, तेजस्वी।
वि.
[हिं. नूर]

नृत्तना
नृत्य करना, नाचना।
क्रि. अ.
[सं. नृत]

नृत्य
नाच, नर्त्तन।
उ.-जब अप्सरा नृत्य करि रही। तब राजा ब्रह्या सौं कही-९-४।
संज्ञा
[सं.]

नृत्यक
नाचनेवाला, नर्तक।
उ.-मानहु नृत्यक भाव दिखावत गति लिय नायक मैन-२३२४।
संज्ञा
[सं. नर्तक]

नृत्यकी
नाचनेवाली, नर्तकी।
संज्ञा
[हिं. नर्तकी]

नृत्यत
नृत्य करता है, नाचता है।
उ.-(क) नृत्यत मदन फूले, फूली रति अँग-अँग, मन के मनोज फूले हलधर वर के-१०-३४। (ख) कुंडल लोल तिलक मृगमद रचि गावत नृत्यत नटवर बेस-३२२५।
क्रि. अ.
[हिं. नृत्यना]

नृत्यना
नाचना, नृत्य करना।
क्रि. अ.
[सं. नृत्य]

नृत्यशाला
नाचघर।
संज्ञा
[सं.]

नृदेव
राजा।
संज्ञा
[सं.]

नृदेव
ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं.]

नृप
राजा, नरपति।
संज्ञा
[सं.]

नियम
प्रतिबंध, नियत्रण।
संज्ञा
[सं.]

नियम
दबाव, शासन।
संज्ञा
[सं.]

नियम
बँधा हुआ क्रम या विधान, परंपरा।
संज्ञा
[सं.]

नियम
निश्चित रीति या व्यवस्था।
संज्ञा
[सं.]

नियम
शर्त, प्रतिबंध।
संज्ञा
[सं.]

नियम
एक अर्थालंकार।
संज्ञा
[सं.]

नियम
योग के आठ नियमों में एक शौच, संतोष, तपस्या स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान - इनका निर्वाह या पालन ‘नियम’ कहा जाता है।
उ.- अनुसूया के गर्भ प्रगट ह्वै कियौ योग आराधि। यम अरू नियम प्रान प्रत्याहार धारन ध्यान समाधि - सारा० ६०।
संज्ञा
[सं.]

नियमतः
नियम के अनुसार।
क्रि. वि.
[सं.]

नियमन
क्रम, विधान या व्यवस्था बाँधना।
संज्ञा
[सं.]

नियमन
शासन, नियंत्रण।
संज्ञा
[सं.]

नृ
नर, मनुष्य।
संज्ञा
[सं.]

नृ-केशरी
नृसिंहावतार।
संज्ञा
[सं. नृकेशरिन्]

नृग
एक दानी राजा जिन्होंने अनजाने ही एक ब्राह्मण की गाय अपनी सहस्त्र गौओं के साथ दूसरे ब्राह्मण को दान मे दे दी। गाय हरण के पाप का फल भोगने के लिए राजा नृग को सहस्त्र वर्ष के लिए गिरगिट होकर कुएँ में रहना पड़ा। इस योनि से श्रीकृष्ण ने उनका उद्धार किया।
संज्ञा
[सं.]

नृध्न
नरघातक।
वि.
[सं.]

नृतक
नाचनेवाला।
संज्ञा
[सं. नर्तक]

नृतकारी
नृत्यकला, नृत्यकौशल।
उ.-इंद्रसभा थकित भई, लगी जब करारी। रंभा कौ मान मिट्यौ, भूली नृतकारी-६४९।
संज्ञा
[सं. नृत्य + हिं. कारी=कला]

नृतत
नृत्य करता है।
उ.-कटि पितंबर बेष नटवर नृतत फन प्रति डोल ५६३।
क्रि. अ.
[हिं. नृतना]

नृतना
नृत्य करना, नाचना।
क्रि. अ.
[सं. नृत्य]

नृति
नाच, नृत्य।
संज्ञा
[सं.]

नृत्त
सुसंस्कृत अभिनय।
संज्ञा
[सं.]

नृप-कुल
राजाओं का समूह।
उ.-जरासंध बंदी कटैं, नृप-कुल जस गावै-१-४।
संज्ञा
[सं. नृप + कुल]

नृपता
राजापन।
संज्ञा
[सं.]

नृपति
राजा, नरपति।
संज्ञा
[सं.]

नृप-रिषि
राजर्षि।
संज्ञा
[सं. नृप + ऋषि]

नृपराई, नृपराउ, नृपराय, नृपराव
सम्राट, राजाओं में श्रेष्ठ।
संज्ञा
[सं. नृपरांज]

नृपाल
राजा, नरपति।
संज्ञा
[सं.]

नृलोक
नरलोक, मर्त्यलोक।
संज्ञा
[सं.]

नृशंश
निर्दय।
वि.
[सं.]

नृशंश
अत्याचारी।
वि.
[सं.]

नृशंशता
निर्दयता, क्रूरता।
संज्ञा
[सं.]

नृसिंह
भगवान विष्णु का चौथा अवतार जिसका आधा शरीर मनुष्य का और आधा सिंह का था। हिसण्यकशिपु को मारने के लिए यह अवतार धारण किया गया था।
संज्ञा
[सं.]

नृसिंह चतुर्दशी
वैशाख शुक्ल चतुर्दशी जब नृसिंहावतार हुआ था।
संज्ञा
[सं.]

नृहरि
नृसिंह।
संज्ञा
[सं.]

ने
भूतकालिक सकर्मक क्रिया के कर्ता की विभक्ति।
प्रत्य.
[सं. प्रत्य टा-एण]

नेउछाउरि
निछावर।
संज्ञा
[हिं. न्योछावर]

नेउतना
न्योता देना।
क्रि. स.
[हिं. न्योतना]

नेउता
न्योता, निमंत्रण।
संज्ञा
[हिं. न्योता]

नेक
भला, अच्छा।
वि.
[फ़ा.]

नेक
सज्जन।
वि.
[फ़ा.]

नेक
थोड़ा, तनिक, कुछ, किंचित।
उ.-(क) नरक कूपनि जाइ जमपुर परथौ बार अनेक। थके किंकर-जूथ जमके, टरत टारैं न नेक-१-१०६। (ख) ढाकति कहा प्रेमहित सुंदरि सारँग नेक उघारि-२२२०।
क्रि. वि.
[हिं. न + एक]

नेक
थोड़ा, तनिक, कुछ भी, किंचित।
उ.-सात दिन भरि ब्रज पर गई नेक न झार-९७३।
वि.

नेकी
भलाई।
संज्ञा
[फ़ा.]

नेकी
सज्जनता।
संज्ञा
[फ़ा.]

नेकी
उपकार।
संज्ञा
[फ़ा.]

नेकी
नेकी और पूछ पूछ- किसी का उपकार करने में पूछने की जरूरत क्या है?
मु.

नेकु, नेको, नेकौ
जरा भी।
उ.-तुम बिनु नँदनंदन ब्रजभूषन होत न नेको चैन-सा. ८।
वि.
[हिं. नेक]

नेकु, नेको, नेकौ
तनिक, कुछ, थोड़ा।
क्रि. वि.

नेग
शुभ अथवा प्रस,न्नता के अवसरों पर संबंधियों, आश्रितों आदि को कुछ देने का नियम।
संज्ञा
[सं. नैयमिक, हिं. नेवग]

नेग
वह धन, वस्तु आदि जो शुभ अवसरों पर संबंधियों, आश्रितों आदि को दिया जाता है, बँधा हुआ पुरस्कार।
उ.-लाख टका अरु झूमका (देहु) सारी दाइ कौं नेग-१०-४०।
संज्ञा
[सं. नैयमिक, हिं. नेवग]

नेग
नेग लगना- (१) पुरस्कार आदि देना आवश्यक होना। (२) सार्थक या सफल होना।
मु.

नेगचार, नेगजोग
शुभ अवसर पर संबंधियों, आश्रितों आदि को भेंट, उपहार आदि देने की रीति।
संज्ञा
[हिं. नेग + आचार, जोग]

नेगचार, नेगजोग
वह वस्तु, उपहार या धन जो ऐसे अवसर पर दिया जाय।
संज्ञा
[हिं. नेग + आचार, जोग]

नेगटी
नेग की रीति या दस्तूर का निर्वाह करनेवाला।
संज्ञा
[हिं. नेग + टा [प्रत्य.]]

नेगी
नेग का अधिकारी।
संज्ञा
[हिं. नेग]

नेगीजोगी
नेग का हकदार।
संज्ञा
[हिं. नेगजोग]

नेछावर
निछावर।
संज्ञा
[हिं. निछावर]

नेजा
भाला, बरछा।
उ.-हँसनि दुज चमक करिवर निलैहेन झलक नखन छत घात नेजा सेंभारे-१७००।
संज्ञा
[फ़ा.]

नेजाबरदार
भाला लेकर चलनेवाला।
संज्ञा
[फ़ा.]

नेजाल
भाला, बरछा।
संज्ञा
[फ़ा. नेजा]

नेड़े
पास, निकट।
क्रि. वि.
[सं. निकट, प्रा. निअड़]

नेति
इति (अंत) नहीं है'। यह वाक्य ब्रह्म की अनंतता सूचित करने के लिए लिखा जाता है।
उ.-सोई जस सनकादिक गावत नेति नेति कहि मानि-२-३७।
वाक्य
[सं. न इति]

नेति
वह रस्सी जिसे मथानी में लपेट कर दूध-दही मथा जाता है।
उ.-कह्यौ भगवान अब बासुकी ल्याइयै, जाइ तिन बासुकी सौं सुनायौ। मानि भगवंत-आज्ञा सो आयौ तहाँ, नेति करि अचल कौं सिंधु नायौ-८-८।
संज्ञा
[सं. नेत्र]

नेती
मथानी की रस्सी।
संज्ञा
[सं. नेत्र, हिं. नेता]

नेती धोती
हठयोग की क्रिया जिसमें कपड़े की धज़्जी पेट मे पहुँचाकर आँते साफ करते हैं।
संज्ञा
[हिं. नेती + धोती]

नेतृत्व
नेता होने का भाव, कार्य या पद, सरदारी, नेतागीरी।
संज्ञा
[सं.]

नेत्र
आँख।
संज्ञा
[सं.]

नेत्र
मथानी की रस्सी।
संज्ञा
[सं.]

नेत्र
दो की संख्या सूचक शब्द।
संज्ञा
[सं.]

नेत्रकनीनिका
आँख का सारा।
संज्ञा
[सं.]

नेत्रज, नेत्रजल
आँसू।
संज्ञा
[सं.]

नेत
किसी बात की स्थिरता या ठहराव।
संज्ञा
[सं. नियति=ठहराव]

नेत
निश्चय, संकल्प।
उ.-आजु न जान देहुँ री ग्वालिनि बहुत दिननि को नेत-१०३५।
संज्ञा
[सं. नियति=ठहराव]

नेत
(३) प्रबंध, व्यवस्था।
संज्ञा
[सं. नियति=ठहराव]

नेत
मथानी की लस्सी।
उ.-को उठि प्रात होत लै माखन को कर नेत गहै-२७११।
संज्ञा
[सं. नेत्र]

नेत
एक गहना।
उ.-कहुँ कंकन कहुँ गिरी मुद्रिका कहुँ ताटंक कहूँ नेत-३४५६।
संज्ञा
[देश.]

नेतक
चूनर, चुँदरी।
संज्ञा
[देश.]

नेता
अगुआ, नायक।
संज्ञा
[सं. नेतृ]

नेता
प्रभु, स्वामी।
संज्ञा
[सं. नेतृ]

नेता
प्रवर्तक, निर्वाहक, संचालक।
संज्ञा
[सं. नेतृ]

नेता
मथानी की रस्सी।
संज्ञा
[सं. नेत्र]

नेत्रपिंड
आँख का ढेला।
संज्ञा
[सं.]

नेत्रबंध
आँखमिचौनी का खेल।
संज्ञा
[सं.]

नेत्ररंजन
काजल, कज्जल।
संज्ञा
[सं.]

नेत्ररोम
आँख की बरौनी।
संज्ञा
[सं. नेत्ररोमन्]

नेत्रस्तंभ
पलकों का स्थिर हो जाना।
संज्ञा
[सं.]

नेत्री
अनुगामिनी नारी।
संज्ञा
[सं.]

नेत्री
मार्ग-प्रदर्शिका।
संज्ञा
[सं.]

नेत्री
स्वामिनी।
संज्ञा
[सं.]

नेत्री
लक्ष्मी।
संज्ञा
[सं.]

नेनुआ, नेनुवा
एक तरकारी।
संज्ञा
[सं.]

नेम
नियम।
संज्ञा
[सं. नियम]

नेम
अटल या निश्चिंत बात।
संज्ञा
[सं. नियम]

नेम
रीति।
संज्ञा
[सं. नियम]

नेम
धर्म या पुण्य की दृष्टि से व्रत, उपवास आदि का पालन।
उ.-(क) नौमी-नेम भली बिधि करै-९-५। (ख) जा सुख कौ सिव-गौरि मनाई, तिय ब्रत-नेम अनेक करी-१०-८०। (ग) नेम-धर्म-तप-साधन कीजै।¨¨¨¨। बर्ष-दिवस कौ नेम लेइ सब-७९९।
संज्ञा
[सं. नियम]

नेम
नेम-धरम-पूजा-पाठ व्रत-उपवास आदि।
यौ.

नेमि
घेरा।
संज्ञा
[सं.]

नेमि
कुएँ की जगत।
संज्ञा
[सं.]

नेमी
नियमों का पालन करनेवाला।
वि.
[हिं. नेम]

नेमी
पूजा पाठ, व्रत-उपवास करनेवाला।
वि.
[हिं. नेम]

नेमी
नेमी-धरमी-पूजा-पाठ में लगा रहनेवाला।
यौ.

नेपथ्य
साज साज्जा, सजावट।
संज्ञा
[सं.]

नेपथ्य
नृत्य अभिनय या नाटक मे नर-नारी या अभिनेताओं के सजने का स्थान।
संज्ञा
[सं.]

नेपथ्य
नाच-रंग का स्थान।
संज्ञा
[सं.]

नेब
मंत्री, दीवान, हायक।
उ.-आए नँदनंदन के नेब। गोकुल माँझ जोग बिस्तारथौ भली तुम्हरी जोब।
संज्ञा
[फ़ा. नायब]

नेम
समय।
संज्ञा
[सं.]

नेम
खंड।
संज्ञा
[सं.]

नेम
दीवार।
संज्ञा
[सं.]

नेम
छल।
संज्ञा
[सं.]

नेम
आधार।
संज्ञा
[सं.]

नेम
गड्ढा।
संज्ञा
[सं.]

नियाई
न्याय करनेवाला।
वि.
[सं. न्यायी]

नियाज
इच्छा।
संज्ञा
[फ़ा.]

नियाज
दीनता।
संज्ञा
[फ़ा.]

नियाज
बड़ों का प्रसाद।
संज्ञा
[फ़ा.]

नियाज
बड़ों से भेंट।
संज्ञा
[फ़ा.]

नियान
अंत, परिणाम।
संज्ञा
[सं. निदान]

नियान
अंत में, आखिर।
अव्य.

नियाम
नियम।
संज्ञा
[सं.]

नियामक
नियम निश्चित करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

नियामक
विधान या व्यवस्था करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

नेरा
कुछ भी, जरा भी।
क्रि. वि.
[हिं. नियर]

नेरा
जो निकट हो, समीप का।
वि.

नेर, नेरे
निकट, पास, समीप।
उ.-(क) बिपति परी तब सब सँग छाँड़े, कोउ न आवै नेरे-१-७९। (ख) सूरस्याम बिन अंतकाल मैं कोउ न आवत नेरे-१-८५।
क्रि.वि
[हिं. नियर]

नेरै
निकट, पास।
उ.-तुम तौ दोष लगावन कौं सिर, बैठे देखत नेरैं-१-२०६।
क्रि.वि
[हिं. नियर, नेरे]

नेवछावर, नेवछावरि
निछावर।
उ.-हरकर पाट बंध नेवछावरि करत रतन पट सारी-२६३०।
संज्ञा
[हिं. निछावर]

नेवज
देवता को अर्पित करने की वस्तु, भोग।
उ.-(क) बरस दिवस को दिवस हमारो घर घर नेवज करौ चँड़ाई-९१०। (ख) बहुत भाँति सब करे पकवान। नेवज करि धरि साँझ बिहाने-१००८।
संज्ञा
[सं. नैवेद्य]

नेवत
न्योता, निमंत्रण।
संज्ञा
[हिं. न्योता]

नेवतना
नेवता भेजना।
क्रि. स.
निमंत्रण

नेवतहरी
निमंत्रित व्यक्ति।
संज्ञा
[हिं. न्योतहरी]

नेवता
निमंत्रण।
संज्ञा
[हिं. न्योता]

नेवति
निमंत्रण देकर, नेवता भेजकर।
उ.-सुर-गंधर्व जे नेवति बुलाए। ते सब बधुनि सहित तहँ आए-४-५।
क्रि. स.
[हिं. नेवतना]

नेवना
झुकना।
क्रि. अ.
[सं. नमन]

नेवर
पैर का एक गहना, नूपुर।
संज्ञा
[सं. नूपुर]

नेवर
बुरा, खराब।
वि.
[सं. न + वर=अच्छा]

नेवला
नकुल नामक जंतु।
संज्ञा
[सं. नकुल, प्रा. नाल]

नेवाज
कृपा करनेवाला।
वि.
[हिं. निवाज]

नेवाजना
कृपा करना।
क्रि. स.
[हिं. निवाजना]

नेवाजी
कृपा की।
उ.-कहियत कुबिजा कृष्न नेवाजी-३०९४।
क्रि. स.
[हिं. निवाजना]

नेवाना
झुकाना।
क्रि. स.
[सं. नमन]

नेवारी
जूही या चमेली की जाति का, सफेद फूलवाला एक पौधा।
संज्ञा
[सं. नेपाली]

नैंकु
थोड़ा, जरा, तनिक,।
उ.-कोपि कौरव गहे केस जब सभा मैं, पांडु की बधू जस नैंकु गायौ। लाज के साज मैं हुती ज्यौं द्रौपदी, बढ़थौ तन-चीर नहिं अंत पायौ-१-५।
क्रि. वि.

नैंकहु
जरा भी, थोड़ी भी।
उ.-हरि, हौं महापतित, अभिमानी। परमारथ सौं बिरत, बिषय-रत, भाव-भगति नहिं नैंकहु जानी-१-१४९।
क्रि. वि.
[हिं. न + एक + हु (प्रत्य.)]

नैंसुक
छोटी, जरा सी।
उ.-स्याम, तुम्हरी मदन-मुरलिका नैंसुक-सी जग मोहथौ-६५६।
वि.
[हिं. नेकु]

नैंसुक
तनक, थोड़ा।
वि.
[हिं. नेकु]

नैंसुक
थोड़ा, जरा, तनक।
क्रि. वि.

नै
नीति।
संज्ञा
[सं. नय]

नै
नदी, सरिता।
संज्ञा
[सं. नदी प्रा. णई]

नै
भूतकालिक सकर्मक क्रिया के कर्ता की विभक्ति।
उ.-दियौ सिरपाव नृपराव नै महर कौं आपु पहिरावने सब दिखाए-५८७।
प्रत्य.
[हिं. ने]

नैक, नैकु
थोड़ा, कुछ।
वि.
[हिं. न + एक]

नैकट्य
निकट होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

नेसुक
जरा सा, तनक, थोड़ा सा।
वि.
[हिं. नेकु]

नेसुक
थोड़ा, जरा, तनक, किंचित।
क्रि. वि.

नेस्त
जो न हो।
वि.
[फ़ा.]

नेस्त
नष्ट।
वि.
[फ़ा.]

नेस्ती
न होना।
संज्ञा
[फ़ा.]

नेस्ती
नाश।
संज्ञा
[फ़ा.]

नेह, नेहरा
स्नेह।
संज्ञा
[सं. स्नेह]

नेह, नेहरा
तेल, घी।
संज्ञा
[सं. स्नेह]

नेही
स्नेह करनेवाला, प्रेमी।
वि.
[हिं. नेह]

नैंकु
थोड़ा, तनिक, किंचित।
वि.
[हिं. न + एक=नेक]

नैको, नैकौ
जरा भी, थोड़ा, कुछ।
उ.-कहा मल्ल चाणूर कुबलिया अब जिय त्रास नहीं तिन नैको-२५५८।
वि.
[हिं. नैक]

नैतिक
नीति-संबंधी, नीतियुक्त।
वि.
[सं.]

नैतिक
आचरण-संबंधी, चारित्रिक।
वि.
[सं.]

नैत्यिक
नित्य का।
वि.
[सं.]

नैत्रिक
नेत्रों का, नेत्र-संबंधी।
वि.
[सं.]

नैन
नेत्र।
उ.-सबनि मूँदे नैन, ताहि चितये सैन, तृषा ज्यौं नीर दव अँचै लीन्हौ-५९७।
संज्ञा
[सं. नयन]

नैन
मतवाले नैन- मद भरे नैन। रस भरे या रसीले नैन- नैन जिनमें रसिकता का भाव हो।
यौ.

नैन
नैन उठाना- (१) निगाह सामने करना। (२) बुरा व्यवहार करना। नैन न उघारना- लज्जा या संकोच से आँख न खोलना। नैन न जात उघारे- लज्जा या संकोच के कारण आँख खोलकर सामने न कर पाना। उ.- दुरलभ भयौ दरस दसरथ कौ सो अपराध हमारे। सूरदास स्वामी करुनामय नैन न जात उघारे-९-५२। नैन चढ़ाना- झुँझलाहट, अनख या क्रोध से देखना। नैन चढ़ाए डोलत- अनख या क्रोध से देखती घूमती है। उ.- कापर नैन चढ़ाए डोलत ब्रज में तिनुका तोर-१०-३१०। नैन चलाना- (१) आँख मटकाकर संकेत करना। (२) अनख या क्रोध से देखना। नैन चलावै- आँख चमकाकर या मटकाकर संकेत करती है। उ.-सखियनि बीच भरथौ घट सिर पर तापर नैन चलावै-८७५। नैन चलावति- अनख या क्रोध से देखती हुई। उ.-कापर नैन चलावति आवति जाति न तिनका तोर-१०-३२०। नैन जुड़ाना- आँखें शीतल होना, तृप्ति होना। नैन जुड़ाने- नेत्रशीलत हुए, तृप्ति हुई। उ.-अँचवत तब नैन जुड़ाने-१०-१८३। नैन भर आना- आँख में आँसू आना। नैन भरि आए- नेत्रों में आँसू आ गये। उ.-देखत गमन नैन भरि आए गात गह्यौ ज्यौं केत-९-३९। नैन भरि जोवना- खूब अच्छी तरह तृप्त होकर देखना। नैन भरि जोवना- खूब अच्छी तरह देखले। उ.-चाहति नैंकु नैन भरि जोवै-१०-३। नैन लगाना- टकटकी बांधकर देखना। नैन रहे लगाइ- टकटकी बांधकर देखते रह गये। उ.-मथति ग्वालि हरि देखी जाइ। गए हुते माखन की चोरी, देखत छबि रहे नैन लगाइ-१०-२९८। नैन सिराना- नेत्रों को परम तृप्ति मिलना। नैन सिराए- आँखें ठंडी हुईं, बहुत सुख मिला। उ.-सिया-राम-लछिमन मुख निरखत सूरदास के नैन सिराए-९-१६८।
मु.

नैन
अनीति, अन्याय।
संज्ञा
[सं. नय + न]

नैन
माखन।
संज्ञा
[सं. नवनीत]

नैन-अमीन
नेत्र रूपी अदालती या राजकीय कर्मचारी।
उ.-नैन अमीन, अधर्मिनि कैं बस, जहँ कौं तहाँ छयौ-१-६४।
संज्ञा
[सं. नयन + अ. अमीन]

नैननि
नेत्रों में, आँखों में।
उ.-सुत कुबेर के मत्त-मगन भए बिषै-रस नैननि छाए (हो)-१-७।
संज्ञा
[सं. नयन + नि प्रत्य.)]

नैन-पटी
आँख पर बांधने की कपड़े की पट्टी।
उ.-अपनी रुचि जित ही जित ऐंचति इन्द्रिय-कर्म-गटी। हौं तित हीं उठि चलत कपट लगि, बाँधे नैन-पटी-१-९८।
संज्ञा
[सं. नयन + हिं. पट्टी]

नैनसुख
एक सूती कपड़ा।
संज्ञा
[हिं. नैन + सुख]

नैना
नेत्र, आंखें।
उ.-(क) सूरदास उमँगे दोउ नैना, सिंधु-प्रवाह बह्यौ-१-२४७। (ख) नैना तेरे जलज जीत हैं, खंजन तैं अति नाचैं -१०-७१८।
संज्ञा
[सं. नयन]

नैना
राधा की एक सखी का नाम।
उ.-दर्बा, रंभा, कृष्ना, ध्याना मैना नैना रूप-१५८०।
संज्ञा

नैना
झुकना।
क्रि. अ.
[हिं. नवना]

नैना
झुकाना।
क्रि. स.
[हिं. नवाना]

नैनी
नयनवाली।
उ.-जा जल-शुद्ध निरखि सन्मुख ह्वै, सुन्दर सरसिज नैनी-९-११।
वि.
[हिं. नैन]

नैनूँ, नैनू
मक्खन।
संज्ञा
[सं. नवनीत]

नैपुण्य
दक्षता, निपुणता।
संज्ञा
[सं.]

नैमित्तिक
जो निमित्तवश किया जाय।
वि.
[सं.]

नैमिष
नैमिषारण्य तीर्थ।
संज्ञा
[सं.]

नैमिषारण्य
सीतापुर का एक तीर्थ।
संज्ञा
[सं.]

नैया
नाव, नोका।
संज्ञा
[हिं. नाव]

नैर
नगर।
संज्ञा
[सं. नगर]

नैर
जनपद।
संज्ञा
[सं. नगर]

नैरी
नगरी, देश, जनपद।
उ.-जाके घर की हानि होति नित, सो नहिं आनि कहै री। जाति-पाँति के लोग न देखति, और बसैहै नैरी-१०-३२४।
संज्ञा
[सं. नगर, हिं. नैर]

नैराश्य
निराशा का भाव।
संज्ञा
[सं.]

नैऋर्त
नैऋति संबंधी।
वि.
[सं.]

नैऋर्त
पश्चिम-दक्षिण-कोण का स्वामी।
संज्ञा

नैऋर्ति
पश्चिम और दक्षिण दिशाओं के दीच का कोण।
संज्ञा
[सं.]

नैवेद्य
देव-अर्पित भोग।
उ.-धूप-दीप-नैवेद्य साजि कै मंगल करै बिचारी-२५८७।
संज्ञा
[सं.]

नैष्ठिक
निष्ठावान।
वि.
[सं.]

नैसर्गिक
प्राकृतिक, स्वाभाविक।
वि.
[सं.]

नैसा
बुरा, खराब।
वि.
[सं. अनिष्ट]

नैसिक, नैसुक
थोड़ा, जरा सा।
वि.
[हिं. नेक]

नैसे
अनैसा, बुरा, खराब।
उ.-(क) जो जिहिं भाव भजै, प्रभु तैसे। प्रेम बस्य दुष्टनि कौं नैसे-१०-३९१। (ख) कहु राधा हरि कैंसे हैं ? तेरे मन भाए की नाहीं, की सुंदर की नैंसे हैं-१३०७।
वि.
[सं. अनिष्ट]

नैहर
माता-पिता का घर, मायका, पीहर।
संज्ञा
[सं. ज्ञाति, प्रा. णाति णाई=पिता + घर]]

नैहौं
डालना, छोड़ना।
क्रि. स.
[हिं. नाना]

नोदन
प्रेरणा।
संज्ञा
[सं.]

नोदन
बैलों को हाँकने की छड़ी, औगी।
संज्ञा
[सं.]

नोदन
खंडन।
संज्ञा
[सं.]

नोन
नमक।
संज्ञा
[सं. लवण, हिं. लोन]

नोनचा
लोनी जमीन।
संज्ञा
[हिं. नोन + छार]

नोनहरामी
नमक हरामपन, कृतघ्नता।
संज्ञा
[हिं. लोन=नोन [फ़ा. नमक] + अ. हराम + ई (प्रत्य.)]

नोनहरामी
नमकहराम कृतघ्न।
उ.-जो तन-दियौ ताहि बिसरायौ ऎसौ नोनहरामी-१-१४८।
वि.

नोना, नोनो
लोना।
संज्ञा
[सं लवण, हिं. नोन]

नोना, नोनो
नमकीन, खारा।
वि.

नोना, नोनो
सलोना, सुंदर।
वि.

नोखा
अनुठा, विचित्र।
वि.
[हिं. अनोखा]

नोखी
अनुठी, विचित्र।
उ.-कैंसी बुद्धि रची है नोखी देखी सुनी न होइ-पृ. ३१३ (३०)।
वि.
[हिं. नेखी]

नोखे
अनोखे, अद्भुत, विचित्र।
उ.-तब बृषभानु-सुता हँसि बोली, हम पै नाहिं कन्हाइ। काहे कौं झकझोरत नोखे, चलहु न देउँ बताइ-६८२।
वि.
[हिं. अनोखा]

नोच
लूट, खसोट।
संज्ञा
[हिं. नोचना]

नोचना
उखाड़ना।
क्रि. स.
[सं. लुंचन]

नोचना
नाखून से खरोंचना।
क्रि. स.
[सं. लुंचन]

नोचना
तंग करके ले लेना।
क्रि. स.
[सं. लुंचन]

नोचै
नोचता-खरोंचता है।
उ.-सत्य जानि जिय, चित चेत आनि, तू अब नख क्यौं तन नोचै-१० उ.-१०२।
क्रि. स.
[हिं. नोचना]

नोचू
नोचने-खसोटनेवाला।
वि.
[हिं. नोचना]

नोचू
माँग माँग कर या लेकर तंग करनेवाला।
वि.
[हिं. नोचना]

नियमबद्ध
नियमों से बँधा हुआ।
वि.
[सं.]

नियमित
क्रम,विधान या नियम से बद्ध।
वि.
[सं.]

नियमित
नियम के अनुसार।
वि.
[सं.]

नियमी
नियम का निर्वाह करनेवाला।
वि.
[सं.]

नियर
पास, समीप।
अव्य.
[सं. निकट, प्रा. निअड]

नियराई
निकट पहुँची, पास आई।
उ.- (क) मरन-अवस्था जब नियराई - ४-१२। (ख) प्रगट भई तहँ आइ पूतना, प्रेरित काल-अवधि नियराई - १०-५०।
क्रि. अ.
[सं. नियरआना]

नियराना
निकट, पास या समीप आना-पहुँचना।
क्रि. अ.
[हिं. नियर + आना (प्रत्य.)]

नियरानी
निकट आ गयी, पास पहुँची।
उ.- अब तौ जरा निपट नियरानी, कर्यौ न कछुवै कान - १-५७।
क्रि. अ.
[हिं. नियराना]

नियरान्यो
निकट आ गया।
उ.- मधुबन ते चल्यो तबहिं गोकुल नियरान्यो - २९४९।
क्रि. अ.
[हिं. नियराना]

नियरे, नियरैं
समीप, पास।
उ.- (क) भक्ति पंथ मेरे अति नियरैं जब तब कीरति गाई - १-९३। (ख) भवसागर मैं पैरि न लीन्हौ।¨¨¨। अतिगंभीर, तीर नहिं नियरैं, किहिं बिधि उतर्यौ जात - १-१७५।
अव्य.
[हिं. नियर]

नैहौं
पहनाना।
उ.-और हार चौकी हमेल अब तेरे कंठ न नैहौं-१५५०।
क्रि. स.
[हिं. नाना]

नोआ
दुहते समय गाय के पिछले पैर बाँधने की रस्सी, बंधी।
संज्ञा
[हिं. नोवना]

नोइनी, नोई
दुहते समय गाय के पैर में बाँधने की रस्सी, बंधी।
संज्ञा
[हिं. नोवना]

नोक
बहुत पतला छोर।
संज्ञा
[फ़ा.]

नोक-झोंक
ठाट-बाट।
संज्ञा
[हिं. नोक + झोंक ]

नोक-झोंक
दर्प, आतंक।
संज्ञा
[हिं. नोक + झोंक ]

नोक-झोंक
व्यंग्य, ताना।
संज्ञा
[हिं. नोक + झोंक ]

नोक-झोंक
छेड़छाड़, झपट।
संज्ञा
[हिं. नोक + झोंक ]

नोकत
लुब्धते हैं।
उ.-रीझि रहे उत हरि इत राधा अरस परस दोउ नोकत हैं।
क्रि. स.
[हिं. नोकना]

नोकना
ललचना, गीधना, लुब्धना।
क्रि. स.

नौज
ईश्वर न करे, ऐसा न हो।
अव्य.
[सं. नवद्य, प्रा. नवज्ज]

नौज
न सही।
अव्य.
[सं. नवद्य, प्रा. नवज्ज]

नौजवान
नवयुवक।
वि.
[फ़ा.]

नौजवानी
युवावस्था।
संज्ञा
[फ़ा.]

नौजा
बादाम।
संज्ञा
[फ़ा. लौज़]

नौजा
चिलगोजा।
संज्ञा
[फ़ा. लौज़]

नौटंकी
नगाड़े के साथ चौबोले गाकर होनेवाला अभिनय।
संज्ञा
[देश.]

नौपन
नया, नवीन।
उ.-नए गोपाल नई कुबिजा बनी नौतन नेह ठयौ-३३४७।
वि.
[सं. नूतन]

नौतम
बिलकुल नया।
वि.
[सं. नवतम]

नौतम
ताजा।
वि.
[सं. नवतम]

नौ
जो दस से एक कम हो।
वि.
[सं. नव]

नौ
नौ दो ग्यारह होना- देखते-देखते भाग जाना। नौ तेरह बताना- टालटूल करना।
मु.

नौ
नया, नवीन।
उ.-जब लगि नहि बरषत ब्रज ऊपर नौ घन श्याम सरीर-२७७१।
वि.

नौआ
नाऊ, नाई, नापित।
उ.-रोवत देखि जननि अकुलानी दियौ तुरत नौआ कौं घुरकी-१०-१८०।
संज्ञा
[हिं. नाऊ]

नौकर
चाकर, दास, टहलुआ।
संज्ञा
[फ़ा.]

नौकर
वैतनिक कर्मचारी।
संज्ञा
[फ़ा.]

नौकरनी, नौकरानी
दासी।
संज्ञा
[हिं. नौकर]

नौकरी
चाकरी, सेवा।
संज्ञा
[हिं. नौकर]

नौका
नाव।
उ.-मेरी नौका जनि चढ़ौ त्रिभुवनपति राई-९-४२।
संज्ञा
[सं.]

नौग्रही
हाथ का एक गहना जिसमें नौ रत्म जड़े रहते हैं।
संज्ञा
[सं. नवग्रह]

नोनिया
नमक बनानेवाला।
वि.

नोनी
लोनी मिट्टी।
संज्ञा
[हिं. नीना]

नोनी
नमकीन, खारी।
वि.

नोनी
सलोनी।
वि.

नोर, नोल
नया, नवीन।
वि.
[सं. नवल]

नोवत
दुहते समय रस्सी से गाय का पैर बाँधते हैं।
उ.-बछरा छोरि खरिक कौं दीन्हौं, आपु कान्ह तल-सुधि बिसराई। नोवत बृषभ निकसि गैंयाँ गई, हँसतसखाकहदुहत कन्हाई-८२०।
क्रि. स.
[हिं. नोवना]

नोवना
दुहते समय रस्सी से गाय का पैर बाँधना।
क्रि. स.
[सं. नद्ध, हिं. नहना]

नोवै
दुहते समय रस्सी से गाय का पैर बाँधता है, नोवता है।
उ.-ग्वाल कहैं धनि जननि हमारी, सुकर सुरभि नित नोवे-३४७।
क्रि. स.
[हिं. नोवना]

नोहर, नोहरा
अनोखा, अद्भुत।
वि.
[हिं. मनोहर]

नौंधरई, नौंधराई. नौंधरी
बदनामी, निंदा, अपकीर्ति, बुराई।
संज्ञा
[हिं. नामधराई]

नौतम
विनय, नम्रता।
संज्ञा
[सं. नम्रता]

नौध
नया पौधा।
संज्ञा
[सं. नव + हिं. पौधा]

नौधा
नौ प्रकार की।
उ.-नौधा भक्ति दास रति मानै-३४४२।
वि.
[सं. नवधा]

नौनगा
बाहु का एक गहना जिसमें नौ तरह के नग जड़े होते हैं।
संज्ञा
[हिं. नौ + नग]

नौना
झुकना, नवना।
क्रि. अ.
[हिं. नवना]

नौबढ़, नौबढ़िया, नौबढ़वा
जिसमें हाल ही में उन्नति की हो।
वि.
[सं. नव + हिं. बढ़ना]

नौबत
बारी, पारी।
संज्ञा
[फ़ा.]

नौबत
गति, दशा।
संज्ञा
[फ़ा.]

नौबत
संयोग।
संज्ञा
[फ़ा.]

नौबत
वैभव, उत्सव या मंगल-सूचक वाद्य (शहनाई और नगाड़े ) जो पहर-पहर भर बजते हैं, समय-समय पर बजनेवाले बाजे।
संज्ञा
[फ़ा.]

नौबत
नौबत झड़ना (बजना)- (१) आंनदोत्सव होना। (२) प्रताप की घोषणा होना। नौबत बजावत- (१) खुशी मनाता है। उ.-निंदा जग उपहास करत, मग बंदीजन जस गावत। हठ, अन्याय अघर्म, सूर नित नौवत द्वार बजावत-१-१४१। (२) प्रताप या ऐश्वर्य की घोषणा करता है। नौबत बजाकर (की टकोर)- डंके की चोट पर, खुल्लमखुल्ला।
मु.

नौबती
नौबत बजानेवाला।
संज्ञा
[हिं. नौबत]

नौमासा
गर्भ का नवाँ महीना।
संज्ञा
[सं. नवमास]

नौमि
मैं नमस्कर करता हूँ।
पद.
[सं. नमामि]

नौमी
दोनों पक्षों की नवीं तिथि।
उ.-(क) नौमी-नेम भली बिधि करै-९-५। (ख) नौमी नवसत साजिकै हरि होरी है-२४११।
संज्ञा
[सं. नवमी]

नौरंग
(औरंगजेब) का रूपांतर।
संज्ञा
[हिं. औरंग]

नौरतन
नौनगा' नामक गहना।
संज्ञा
[सं. नवरत्न]

नौरतन
नौ मसालों की चटनी।
संज्ञा

नौरोज
पारसियों के नव वर्ष का नया दिन।
संज्ञा
[फ़ा.]

नौरोज
त्योहार या उत्सव का दिन।
संज्ञा
[फ़ा.]

नौल
नय, नूतन।
वि.
[सं. नवल]

नौलक्खा, नौलखा
नौलाख का।
वि.
[हिं. नौ + लाख]

नौलासी
कोपल, मुलायम।
वि.
[देश.]

नौशा
दूल्हा, बर।
संज्ञा
[फ़ा.]

नौशी
दुलहिन, नववधू।
संज्ञा
[फ़ा.]

नौसत
सोलह श्रृंगार।
उ.-नौसत साजे चली गोपिका गिरिवर बूजन हेत।
संज्ञा
[हिं. नौ + सात]

नौसर, नौसरा
नौलड़ा हार।
संज्ञा
[हिं. नौ + सर]

नौसिख, नौसिखिया, नौसिखुवा
जिसने नया-नया ही कोई काम सीखा हो।
वि.
[सं. नवशिक्षित]

नौहड़
नयी हाड़ी।
संज्ञा
[सं. नव + हिं हाँड़ी]

न्यवछावार, न्यवछावरि, न्यवछावरी
निछावर, वारा फेरा।
संज्ञा
[हिं. निछावर]

न्यवछावार, न्यवछावरि, न्यवछावरी
न्यवछावर करति- उत्सर्ग करती हैं, वारती हैं। उ.- सूरदास प्रभु की छबि ब्रज ललना निरखि थकित तन-मन न्यवछावरि करति आनंद बर ते -२३५३।
मु.

न्यवछावार, न्यवछावरि, न्यवछावरी
निछावर या वाराफेरा की वस्तु।
उ.-मुक्ति-भुक्ति न्यवछावरी पाई सूर सुजान- उ. १० उ.-८।
संज्ञा
[हिं. निछावर]

न्यवछावार, न्यवछावरि, न्यवछावरी
इनाम, नेग।
संज्ञा
[हिं. निछावर]

न्यस्त
रखा हुआ।
वि.
[सं.]

न्यस्त
छोड़ा-त्यागा हुआ।
वि.
[सं.]

न्यस्त
धरोहर या अमानत रूप में रखा हुआ।
संज्ञा

न्याइ, न्याउ
उचित या नियमानुकूल बात, नीति।
उ.- सूरदास वह न्याउ निवेरहु हम तुम दोऊ साहु-३३६८।
संज्ञा
[सं. न्याय]

न्याइ, न्याउ
दो पक्षों के बीच निर्णय, निष्पक्ष निश्चय।
उ.- कौन करनी घाटि मोसौं, सो करौं फिरि काँधि। न्याय कै नहिं खुनुस कीजै, चूक पल्लै बाँधि-१-१९९।
संज्ञा
[सं. न्याय]

न्याति
रीति, प्रणाली, ढंग।
उ.- बैठे नंद करत हरि पूजा, बिधिवत् औ बहु भाँति। सूर स्याम खेलत तैं आए, देखत पूजा न्याति-१०-२६०।
संज्ञा
[सं. ज्ञाति, प्रा. णाति]

न्याति
जाति।
उ.- मधुकर कहा कारे की न्याति। ज्यौं जलमीन कमल मधुपन कौ छिन नहिं प्रीति खटाति-३१६८।
संज्ञा
[सं. ज्ञाति, प्रा. णाति]

न्यान, न्याना
नासमझ।
वि.
[सं. अज्ञान]

न्याय
नीतियुक्त या उचित बात।
संज्ञा
[सं.]

न्याय
सत्-असत् का ज्ञान।
संज्ञा
[सं.]

न्याय
प्रमाण या तर्कयुक्त वाक्य।
संज्ञा
[सं.]

न्याय
न्यायी, नीतियुक्त व्यवहार करनेवाला।
उ.- तुम न्याय कहावत कमलनैन-१९७७।
वि.

न्यायकर्त्ता
न्याय करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

न्यायतः
न्यायानुसार।
क्रि. वि.
[सं.]

न्यायतः
ठीक-ठीक।
क्रि. वि.
[सं.]

न्याय-परता
न्यायी होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

न्यायसंगत
उचित, ठीक।
वि.
[सं.]

न्यायाधीश
प्रधान न्यायकर्त्ता।
संज्ञा
[सं.]

न्यायालय
अदालत, कचहरी।
संज्ञा
[सं.]

न्यायी
न्याय शील।
संज्ञा
[सं. न्यायिन्]

न्यायोचित
उचित, ठीक।
वि.
[सं.]

न्यार, न्यारा
अलग, पृथक, को साथ न हो।
उ.- ¨¨¨¨¨नाम स्रमिष्ठा तासु कुमारी। तासु देवयानी सौं प्यार। रहै न तासौं पल भर न्यार-९-१७४।
वि.
[सं. निर्निकट, प्रा. निन्निअड़, निन्नियर, पू. हिं. निन्यार, हिं. न्यारा]

न्यार, न्यारा
जो पास न हो।
वि.
[सं. निर्निकट, प्रा. निन्निअड़, निन्नियर, पू. हिं. निन्यार, हिं. न्यारा]

न्यार, न्यारा
भिन्न, अन्य।
वि.
[सं. निर्निकट, प्रा. निन्निअड़, निन्नियर, पू. हिं. निन्यार, हिं. न्यारा]

न्यार, न्यारा
निराला, अनोखा।
वि.
[सं. निर्निकट, प्रा. निन्निअड़, निन्नियर, पू. हिं. निन्यार, हिं. न्यारा]

न्यारी
निराली, विलक्षण, अनोखी।
उ.- परम रुचिर मनि-कंठ किरनि-गन, कुंडल-मुकुट प्रभा न्यारी-१-६९।
वि.
[हिं. न्यारा]

न्यारी
और ही, भिन्न, अन्य।
उ.- दूध बरा उत्तम दधिबाटी, गाल-मसूरी की रुचि न्यारी-१०-२२७।
वि.
[हिं. न्यारा]

नियामत
अलभ्य या दुर्लभ वस्तु।
संज्ञा
[अ. नेअमत]

नियामत
उत्तम भोजन।
संज्ञा
[अ. नेअमत]

नियामत
धन-संपत्ति।
संज्ञा
[अ.नेअमत]

नियामिका
नियम, विधान या व्यवस्था बाँधनेवाली।
वि.
[सं.]

नियारा
अलग, भिन्न।
वि.
[सं. निर्निकट, प्रा. निन्निअड़]

नियारिया
मिली-जुली वस्तुओं को अलग करनेवाला।
संज्ञा
[हिं. नियारा]

नियारिया
चतुर व्यक्ति।
संज्ञा
[हिं. नियारा]

नियारे
जो निकट या समीप न हो, दूर।
उ.- इन अँखियनि आगै तैं मोहन, एकौ पल जनि होहु नियारे - १०-२९६।
[हिं. न्यारा]

नियारे
अलग, पृथक, साथ न रहना।
उ.- पाँच-पचीस साथ अगवानी, सब मिलि काज बिगारे। सुनी तगीरो, बिसरि गई सुधि, मो तजि भए नियारे - १-१४३।
[हिं. न्यारा]

नियाव
न्याय।
संज्ञा
[सं. न्याय]

न्यारी
अलग, पृथक।
उ.- एक ही संग हम तुम सदा रहति, आजु ही चटकि त भई न्यारी -१२००।
वि.
[हिं. न्यारा]

न्यारे
दूर, अलग।
उ.- क्यौं दासी सुत कैं पग धारे ? ¨¨¨¨¨। सुनियत हीन, दीन, बृषली-सुत, जाति-पाँति तैं न्यारे-१-२४२।
क्रि. वि.
[हिं. न्यारा]

न्यारे
और ही, अलग-अलग, भिन्न-भिन्न।
उ.- (क) बहुत भाँति मेवा सब मेरे षटरस व्यंजन न्यारे-४९४। (ख) मथुरा के द्रुम देखियत न्यारे-२७८१।
क्रि. वि.
[हिं. न्यारा]

न्यारो, न्यारौ
दूर, पास नहीं।
उ.- न्यारो करि गयंद तू अजहूँ-२५८९।
क्रि. वि.
[हिं. न्यारा]

न्यारो, न्यारौ
अलग, पृथक।
उ.- पतित समूह सबै तुम तारे, हुतौ जु लोक भरथौ। हौं उनतैं न्यारौ करि डारथौ, इहिं दुख जात मरथौ-१-१५।
क्रि. वि.
[हिं. न्यारा]

न्यारो, न्यारौ
साथ में नहीं।
उ.- जाति-पाँति कुलहू तैं न्यारौ, है दासी कौ जायौ-२१-२४४।
क्रि. वि.
[हिं. न्यारा]

न्यारो, न्यारौ
निराला, अनोखा।
उ.- कमल नैन काँधे पर न्यारो पीत बसन फहरात-२५३९।
क्रि. वि.
[हिं. न्यारा]

न्याव
आचरण नीति।
उ.- ऊधो, ताको न्याव है जाहि न सूझे नैन।
संज्ञा
[सं. न्याय]

न्याव
उचित बात।
संज्ञा
[सं. न्याय]

न्याव
सत्-असत् बुद्धि।
संज्ञा
[सं. न्याय]

न्याव
विवाद का निर्णय।
संज्ञा
[सं. न्याय]

न्यास
रखना, स्थापना।
संज्ञा
[सं.]

न्यास
यथाक्रम लगाना, सजाना या प्रस्तुत करना।
संज्ञा
[सं.]

न्यास
धरोहर, थाती।
संज्ञा
[सं.]

न्यास
त्याग।
संज्ञा
[सं.]

न्यास
संन्यास।
संज्ञा
[सं.]

न्यास
देव-अंगों पर विशेष वर्णों का स्थापन।
उ.- मुद्रा न्यास अंग भूषन पति-ब्रत ते न टरों-३०२७।
संज्ञा
[सं.]

न्यास
रोग-बाधा-शान्ति के लिए अंगों पर हाथ रख कर मंत्र पढ़ना।
संज्ञा
[सं.]

न्यून
कम।
वि.
[सं.]

न्यून
घट कर।
वि.
[सं.]

न्यून
नीच।
वि.
[सं.]

न्यूनता
कमी।
संज्ञा
[सं.]

न्यूनता
हीनता।
संज्ञा
[सं.]

न्योछावर
निछावर।
संज्ञा
[हिं. निछावर]

न्योतना
निमन्त्रित करना।
क्रि. स.
[हिं. न्योता]

न्योतनी
खाना-पीना, दावत।
संज्ञा
[हिं. न्योतना]

न्योतहरी
निमंत्रित व्यक्ति।
संज्ञा
[हिं. न्योता]

न्योता
बुलावा।
संज्ञा
[सं. निमंत्रण]

न्योता
भोजन का निमंत्रण
संज्ञा
[सं. निमंत्रण]

न्योता
दावत।
संज्ञा
[सं. निमंत्रण]

न्योता
न्योते में दिया जाने वाला धन।
संज्ञा
[सं. निमंत्रण]

न्योली
पेट के नलों को पानी से साफ करने की हठयोगियों की क्रिया।
संज्ञा
[सं. नली]

न्यौछावर
निछावर, उत्सर्ग, वारा-फेरा, उतारा।
उ.- सूर कहा न्यौछावर करिंयै अपनैं लाल ललित लरखर पर-१०-९३।
संज्ञा
[हिं. निछावर]

न्यौति
निमंत्रण देकर, बुलाकर।
उ.- जग्य-पुरूष गए बैकुंठ धामहि जबै, न्यौति नृप प्रजा कौ तब हँकारयौ-४-११।
क्रि. स.
[हिं. न्योतना]

न्यौत्यौ
न्योता दिया, निमंत्रित किया।
उ.- इच्छा करि मैं ब्राम्हन न्यौत्यौ, ताकौं स्याम खिझावै-१०-२४९।
क्रि. स.
[हिं. न्योतना]

न्हवाइ
नहलाकर, स्नान करा कर।
उ.- जननी उबटि न्हवाइ (सिसु) क्रम सौं लीन्हें गोद-१०-४२।
क्रि. स.
[हिं. नहलाना]

न्हवायौ
नहलाया, स्नान कराया।
उ.- जज्ञ कराइ प्रयाग न्हयायौ-६-८।
क्रि. स.
[हिं. नहलाना]

न्हवावत
नहाते समय।
उ.-मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी।¨¨¨¨¨। काढ़त-गुहत न्हवावत जैहै नागिनि सी भुईं लोटी-१०-१७५।
क्रि. वि.
[हिं. नहाना]

न्हाइ
नहा कर, स्नान करके।
उ.- रिषि कह्यौ, आवंत हौं मैं न्हाइ-९-५।
क्रि. अ.
[हिं. नहाना]

न्हाउ
नहाओ, स्नान करो।
उ.- ग्रीषम कमल-बदन कुम्हिलैंहै, तजि सर निकट दूरि कित न्हाउ-९-३४।
क्रि. अ.
[हिं. नहाना]

न्हाऐं
नहाने से, स्नान करने से।
उ.- जो सुख होत गुपालहिं गाऐं। सो सुख होत न जप तप कीन्हैं, कोटिक तीरथ न्हाऐं -२-६।
क्रि. अ.
[हिं. नहाना]

न्हात
स्नान करते-करते, नहाते नहाते।
उ.- दुरबासा दुरजोधन पठयौ पांडव-अहित बीचारी। साकपत्र लै सबै अघाए, न्हात भजे कुस डारी-१-१२२।
क्रि. अ.
[हिं. नहाना]

न्हान
स्नान, नहान।
उ.- गौतम लख्यौ, प्रात है भयौ। न्हान काज सो सरिता गयौ-६-८।
संज्ञा
[हिं. नहाना]

न्हाना
स्नान, करना।
क्रि. अ.
[हिं. नहाना]

न्हावन
स्नान, नहाना।
उ.- एक बार ताके मन आई। न्हावन काज तढ़ाग सिधाई-९-१७४।
संज्ञा
[हिं. नहाना]

न्हावै
नहाता है।
उ.- मानसरो-वर छाँड़ि हंस तट काग-सरोवर न्हावै-२-१३।
क्रि. अ.
[हिं. नहाना]

न्हाहिं
नहाते हैं।
उ.- हंस उज्लज पंख निर्मल अंग मलि-मलि न्हाहिं-१-३३८।
क्रि. अ.
[हिं. न्हाना]

न्हैये
नहाइए।
उ.- चलौ सबै कुरुक्षेत्र तहाँ मिलि न्हैये जाई-१० उ.-१०५।
क्रि. अ.
[हिं. नहाना]

प वर्ग का पहला और हिंदी का इक्कीसवाँ व्यंजन; वह स्पर्श ओष्ठ्य वर्ण है।

पंक
कीच, कीचड़।
उ.- कुंभकरनतन पंक लगाई, लंक बिभीषन पाइ-९-८३।
संज्ञा
[सं.]

पंक
सुगंधित लेप।
उ.- स्याम अंग चंदन की आभा नागरि केसरि अंग। मलयज पंक कुमकुमा मिलि कै जल-जमुना इक रंग।
संज्ञा
[सं.]

पंकज
कमल।
संज्ञा
[सं.]

पंकज
कीचड़ से उत्पन्न होनेवाला।
वि.

पंकजराग
पद्मराग मणि।
संज्ञा
[सं.]

पंकजासन
ब्रह्मा।
संज्ञा
[सं.]

पंकजिनी
कमलिनी।
संज्ञा
[सं.]

पंकरुह,पंकेरुह
कमल।
उ.- मनो मुख मृदुल पानि पंकेरुह गुरुगति मनहुँ मराल बिहंगा-१९०५।
संज्ञा
[सं.]

पंकिल
जिसमें कीचड़ हो।
वि.
[सं.]

पंक्ति
पाँती, कतार।
संज्ञा
[सं.]

पंक्ति
भोज में साथ साथ खानेवालों की पाँती।
संज्ञा
[सं.]

पंक्तिच्युत
बिरादरी से निकाला हुआ।
वि.
[सं.]

पंख
पर, डैना, पक्ष।
उ.-हंस उज्जल पंख निर्मल अंग मलि मलि न्हाहिं-१-३३८।
संज्ञा
[सं. पक्ष, प्रा. पक्ख्र]

पंख
पंख जमना- (१) भाग जाने के लक्षण दीख पड़ना। (२) बुरे रास्ते पर जाने के रंग-ढंग दीख पड़ना। (३) अंत समय आया जान पड़ना। पंख लगना- बहुत वेगवान होना।
मु.

पंखड़ी
फूल का दल।
संज्ञा
[सं. पक्ष्म]

पंखा
बेना, बिजना।
संज्ञा
[सं. पंख]

पँखिया
फूल का दल, पंघुड़ी।
फूल का दल, पंखुड़ी।
संज्ञा
[हिं. पंख]

पंखि, पंखी
पक्षी, चिड़िया।
उ.- (क) हौं तौ मोहन के बिरह जरी रे तू कत जारत रे पापी, तू पंखि पपीहा पिउ पिउ पिउ अधराति पुकारत-२८४९। (ख) पंखी पति सकुचाने चातक अनँग भर्यो-२८४९।
संज्ञा
[सं. पक्षी, पा. पक्खी, हिं. पंखी]

पंखि, पंखी
पतिंगा।
संज्ञा
[सं. पक्षी, पा. पक्खी, हिं. पंखी]

पंखि, पंखी
पंखुड़ी।
संज्ञा
[सं. पक्षी, पा. पक्खी, हिं. पंखी]

पंखि, पंखी
छोटा पंखा।
संज्ञा
[हिं. पंखा]

पंखुड़ा
कंधे और बाँह का जोड़।
संज्ञा
[सं. पक्ष]

पँखुड़ी, पंखुड़ी
फूल का दल।
संज्ञा
[हिं. पंखा]

पंग
लँगड़ा।
उ.- (क) पंछी एक सुहृद जानत हौं, कर्यौ निसाचर भंग। तातैं बिरमि रहे रघुनंदन, करि मनसा-गति पंग-९-८३। (ख) छोभित सिंधु, सेष सिर कंपित पवन भयौ गति पंग-९-१५८। (ग) सूर हरि की निरखि सोभा भई मनसा पंग-६२७। (घ) भई गिरा-गति पंग-६४०।
वि.
[सं. पंगु]

पंग
स्तब्ध, बेकाम।
उ.- नखसिख रूप देखि हरि जू के होत नयन-गति पंग-३०७९।
वि.
[सं. पंगु]

पंगत, पंगति
श्रेणी, पाँती, पंक्ति, कतार।
उ.- (क) कनक मनि मेखला राजत, सुभग स्यामल अंग। मनौ हंस अकास-पंगति, नारि-बालक-संग-६३३। (ख) कोउ कहति अलि-बाल-पंगति जुरी एक सँजोग -६३६। (ग) मनौ इंद्रबधून पंगति सोभा लागति भारि-९ २१। (घ) चपला चमचमाति आयुध बग-पंगति ध्वजा अकार-२८२६।
संज्ञा
[सं. पंक्ति]

पंगत, पंगति
साथ भोजन करनेवालों की पंक्ति।
संज्ञा
[सं. पंक्ति]

पंगत, पंगति
भोज।
संज्ञा
[सं. पंक्ति]

पंगत, पंगति
सभा, समाज।
संज्ञा
[सं. पंक्ति]

पंगल, पँगला
लूला-लँगड़ा।
वि.
[हिं. पंग]

पंगा
लँगड़ा।
वि.
[हिं. पंग]

पंगा
बेकाम।
वि.
[हिं. पंग]

पंगु, पंगुल
जो पैर से चल न सकता हो, लँगड़ा।
उ.- जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै-१-१।
वि.
[सं.]

पंगु, पंगुल
शनिदेव।
संज्ञा
[सं.]

पंच
पाँच, चार और एक।
वि.
[सं.]

पंच
पाँच या अधिक व्यक्तियों का समाज जनता।
संज्ञा

पंच
पंच की भीख- सर्वसाधारण का आशीर्वाद, जनता की कृपा। उ.-(क) मैं- मेरी कबहूँ नहिं कीजै, कीजै पंच-सुहातौ-१-३०२। (ख) राज करैं वे धेनु तुम्हारी, नेतहिं कहति सुनाई। पंच की भीख सूर बलि मोहन कहति जसोदा माई-४५५। पंच की दुहाई- समाज से धर्म या न्याय करने की पुकार। पंच-परमेश्वर- समाज का मत ईश्वर का वाक्य है।
मु.

पंच
किसी बात का न्याय करने के लिए चुने गये पाँच या अधिक आदमी।
संज्ञा

पंचक
पाँच का समूह।
संज्ञा
[सं.]

पंचक
पाँच नक्षत्र जिनमें नये कार्य का करना मना है।
संज्ञा
[सं.]

पंचकन्या
पाँच नारियाँ जो विवाहादि होने पर भी कन्यावत् मान्य हैं-अहल्या, द्रौपदी, कुंती, तारा और मंदोदरी।
संज्ञा
[सं.]

पंचकवल
पाँच ग्रास जो भोजन के पूर्द निकाल दिये जाते हैं।
संज्ञा
[सं.]

पंचकाम
कामदेव के पाँच रूप-काम, मन्मथ, कंदर्प, मकरध्वज और मीनकेतु।
संज्ञा
[सं.]

पंचकोण
जिसमें पाँच कोने हों, पँचकोना।
वि.
[सं.]

पंचकोस, पंचकोश
काशी जो पाँच कोस लंबी-चौड़ी भूमि में बसी है।
संज्ञा
[सं.]

पंचकोसी
काशी की परिक्रमा।
संज्ञा
[हिं. पंचकोस]

पंचगव्य
दूध, दही, घी, गोबर, और गोमूत्र।
संज्ञा
[सं.]

पंचगीत
श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के पाँच प्रकरण-वेणगीत, गोपीगीत, युगलगीत, भ्रमरगीत और महिषी गीत।
संज्ञा
[सं.]

पंचजन
एक असुर जो श्रीकृष्ण के गुरु संदीपन का पुत्र चुरा ले गया था। श्रीकृष्ण ने इसे मारा था और इसी की हड्डियों से उनका 'पांचजन्य' शंख बना था।
संज्ञा
[सं.]

पंचतत्व
पाँच तत्व-पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश।
संज्ञा
[सं.]

पंचतत्व
मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन (वाम मार्ग)।
संज्ञा
[सं.]

नियुक्त
किसी काम में लगाया हुआ।
वि.
[सं.]

नियुक्त
तत्पर किया हुआ, प्रेरित।
वि.
[सं.]

नियुक्त
निश्चित या स्थिर किया हुआ।
वि.
[सं.]

नियुक्ति
नियुक्त होना, तैनाती।
संज्ञा
[सं.]

नियोक्ता
कार्य में लगाने या नियोजित करनेवाला।
संज्ञा
(सं. नियोक्त)

नियोक्ता
नियोग करनेवाला।
संज्ञा
(सं. नियोक्त)

नियोग
किसी काम में लगाना।
संज्ञा
[सं.]

नियोग
एक प्राचीन प्रथा जिसके अनुसार निसंतान स्त्री, देवर या पति के अन्य गोत्रज से संतान उत्पन्न करा लेती थी।
संज्ञा
[सं.]

नियोग
आज्ञा।
संज्ञा
[सं.]

नियोग
निश्चय।
संज्ञा
[सं.]

पंचतपा
पंचाग्नि तापनेवाला।
वि.
[सं. पंचतपस]

पंचतरु
मंदार, परिजात, संतान, कल्पवृक्ष और हरिचंदन।
संज्ञा
[सं.]

पंचता
मृत्यु।
संज्ञा
[सं.]

पँचतोलिया
एक तरह का बहुत महीन या झीना कपड़ा।
संज्ञा
[हिं. पाँच +तोला]

पंचत्व
पाँच का भाव।
संज्ञा
[सं.]

पंचत्व
मृत्यु।
संज्ञा
[सं.]

पंचत्व
पंचत्व (को) प्राप्त होना- मृत्यु होना।
मु.

पंचदश
दस और पँच पंद्रह।
वि.
[सं.]

पंचदेव
पाँच प्रधान देवता- आदित्य, रुद्र, विष्णु गणेश और देवी।
संज्ञा
[सं.]

पंचन
पंचों में।
उ.-साँची की झूठी करि डारैं पंचन मैं मर्यादा जाइ-१३१६।
संज्ञा
[सं. पंच + हिं. न, नि]

पंचनद
पंजाब की पाँच प्रधान नदियाँ-सतजल, व्यास, रावी, चनाब और झेलम।
संज्ञा
[सं.]

पंचनद
उक्त नदियों का प्रदेश।
संज्ञा
[सं.]

पंचनद
काशी का 'पंच गंगा' नामक तीर्थ।
संज्ञा
[सं.]

पंचनाथ
बदरीनाथ, द्वारकानाथ, जगन्नाथ, रंगनाथ और श्रीनाथ।
संज्ञा
[सं.]

पंचनामा
पंचों का निर्णय।
संज्ञा
[हिं. पंच + नाम]

पंचपात्र
पूजा का एक पात्र।
संज्ञा
[सं.]

पंचप्राण
पाँच प्राण या वायु-प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान।
संज्ञा
[सं.]

पंचबटी
दंडकारण्य का वह स्थान जहाँ सीता-हरण हुआ था।
संज्ञा
[सं. पंचवटी]

पंचाण, पंचबान
कामदेव के पाँच वाण।
संज्ञा
[सं. पंचवाण]

पंचभूत
आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी-ये पाँच प्रधान तत्व जिनसे सृष्टि की उत्पत्ति हुई है।
संज्ञा
[सं.]

पंचम
पाँचवाँ।
वि.
[सं.]

पंचम
सुदंर।
वि.
[सं.]

पंचम
निपुण।
वि.

पंचम
संगीत के सात स्वरों कें पाँचवाँ।
संज्ञा

पंचम
एक राग।
संज्ञा

पंचमकार
मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन (वाम-मार्ग)।
संज्ञा
[सं.]

पंचमी
किसी पक्ष की पाँचवीं तिथि।
संज्ञा
[सं.]

पंचमी
एक रागिनी।
संज्ञा
[सं.]

पंचमी
अपादान कारक।
संज्ञा
[सं.]

पंचमुख
शिव।
संज्ञा
[सं.]

पंचमुख
सिंह।
संज्ञा
[सं.]

पंचमुखी
पाँच मुखवाला।
वि.
[सं. पंचमुखिन्]

पँचमेल
पाँच या अधिक तरह की।
वि.
[हिं. पाँच + मेल]

पँचमेल
मिली-जुली।
वि.
[हिं. पाँच + मेल]

पँचमेल
साधारण।
वि.
[हिं. पाँच + मेल]

पँचरंग, पंचरंगा
पाँच रंग का।
उ.-(क) पँचरंग सारी मँगाइ, बधू जननि पैहराइ-१०-९५। (ख) पगनि जेहरि लाल लहँगा अंग पँचरंग सारि-पृ. ३४४ (२९)।
वि.
[हिं. पाँच + रंग]

पँचरंग, पंचरंगा
रंग-बिरंगा।
वि.
[हिं. पाँच + रंग]

पंच रत्न
पाँच रत्न-सोना, हीरा, नीलम, लाल और मोती।
संज्ञा
[सं.]

पंचलड़ा
पाँच लड़ों का।
वि.
[हिं. पाँच + लड़]

पंचलड़ी, पंचलरी
पाँच लड़ों की माला।
संज्ञा
[हिं. पाँच + लड़ी]

पंचांक्षर
एक शिव मंत्र-ऊँ नमः शिवाय।
संज्ञा

पंचाग्नि
एक तप जिसमें चारों ओर पाग जलाकर धूप में बैठा जाता है।
संज्ञा
[सं.]

पंचानन
जिसके पाँच मुख हों।
वि.
[सं.]

पंचानन
शिव जी।
संज्ञा

पंचानन
सिंह।
संज्ञा

पंचामृत
दूध, दही, घी, चीनी और मधु मिलाकर बनाया गया पेय जिससे देवता को स्नान कराया जाता है।
संज्ञा
[सं.]

पंचायत
पंचों की सभा।
संज्ञा
[सं. पंचायतन]

पंचायत
पंचों का वाद-विवाद।
संज्ञा
[सं. पंचायतन]

पंचायत
लोगों की बकवाद।
संज्ञा
[सं. पंचायतन]

पंचायतन
पाँच देव-मूर्तियों का समूह।
संज्ञा
[सं.]

पंचवटी
दंडकारण्य का वह स्थान जहाँ श्रीराम वनवास-काल में रहे थे और जहाँ से सीता-हरण हुआ था।
संज्ञा
[सं.]

पंचवाण
काम के पाँच वाण-द्रवण, शोषण, तापन, मोहन और उन्माद।
संज्ञा
[सं.]

पंचवाण
काम के पाँच पुष्पबाण-कमल, अशोक, आम्र, नवमल्लिका और नीलोत्पल।
संज्ञा
[सं.]

पंचवाण
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]

पंचशब्द
मंगलोत्सव में बजनेवाले पाँच बाजे-तंत्री, ताल, झाँझ नगारा और तुरही।
संज्ञा
[सं.]

पंचशब्द
पाँच प्रकार की ध्वनि-वेदध्वनि, बंदीध्वनी, जयध्वनि, शंखध्वनि और निशानध्वनि।
संज्ञा
[सं.]

पंचशर
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]

पंचांग
पाँच अंग।
संज्ञा
[सं.]

पंचांग
तिथिपत्र।
संज्ञा
[सं.]

पंचांक्षर
जिसमें पाँच अक्षर हों।
वि.
[सं.]

पंचायती
पंचायत का, पंचायत संबंधी।
वि.
[हिं. पंचायत]

पंचायती
साझे का।
वि.
[हिं. पंचायत]

पंचायती
सब लोगों का।
वि.
[हिं. पंचायत]

पंचाल
एक प्राचीन देश, द्रौपदी यहीं के राजा की पुत्री थी।
संज्ञा
[सं.]

पंचाली
पांचाली, द्रौपदी।
संज्ञा
[सं.]

पंचाशिका
पचास छंदवाला ग्रंथ।
संज्ञा
[सं.]

पंचौवर
पाँच तहवाला।
वि.
[हिं. पाँच + सं. आर्वत]

पंछाला
छाला, फफोला।
संज्ञा
[हिं. पानी + छाला]

पंछाला
छाले या फफोले का पानी।
संज्ञा
[हिं. पानी + छाला]

पंछी
पक्षी, चिड़िया, खग।
उ.-जा दिन मन-पंछी उड़ि जैहै। ता दिन तेरे तन-तरुवर के सबै पात झरि जैहैं-१-८६।
संज्ञा
[सं. पक्षी]

पंजा
पंजा फैलाना (बढ़ाना)- लेने का डौल लगाना। पंजा मारना- झपट्टा मारना। पंजे झाड़कर चिपटना या पीछे पड़ना- जी जाना से जुट जाना।
मु.

पंजा
हथेली का संहुट, चंगुल।
संज्ञा
[फ़ा.]

पंजा
जूते का अगला भाग।
संज्ञा
[फ़ा.]

पंजा
जूए का एक दांव।
संज्ञा
[फ़ा.]

पंजा
छक्का-पंजा- दाँव-पेच, चालाकी।
मु.

पंजीरी
भुने आँटे की मिठाई जो प्रसाद-रूप में बाँटी जाती है।
संज्ञा
[हिं. पाँच + जीरा]

पंडर, पंडल
पीला, पाँडु वर्ण का।
वि.
[सं. पांडुर]

पंडर, पंडल
पिंड, शरीर।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पंडा
तीर्थ या मंदिर का पुजारी।
संज्ञा
[सं. पंडित]

पंडा
घाटिया।
संज्ञा
[सं. पंडित]

पंज
पाँच।
वि.
[हिं. पाँच]

पंछिनिपति
पक्षियों का राजा, गरुड़।
उ.-सोई हरि काँधे कामरि, काछ किए नाँगे पाइनि गाइनि टहल करैं। त्रिभुवनपति दिसिपति नर-नारी-पति पंछिनिपति, रबि ससि जाहि डरैं-४५३।
संज्ञा
[सं. पक्षीपति]

पंजर
शरीर की हड़्डियों का ढाँचा, ठठरी, कंकाल।
संज्ञा
[सं.]

पंजर
शरीर।
संज्ञा
[सं.]

पंजर
पिंजड़ा।
संज्ञा
[सं.]

पंजर
घेरा।
उ.-जब सुत भयो कहेउ ब्राह्मन ते अर्जुन गये गृह ताइ। सर-रोप्यो चहुँ दिसि ते जहाँ पवन नहिं जाइ-सारा. ८५१।
संज्ञा
[सं.]

पँजरना
जलना-बलना।
क्रि. अ.
[हिं. पजरना]

पँजरी
अर्थी, टिकठी।
संज्ञा
[सं. पंजर]

पंजा
पाँच का समूह।
संज्ञा
[फ़ा.]

पंजा
हाथ की पाँचों उँगलियों का समूह।
संज्ञा
[फ़ा.]

पंडा
रोटी बनानेवाला।
संज्ञा
[सं. पंडित]

पंडाल
सभा-मंडप।
संज्ञा
[?]

पंडित
विद्वान।
वि.
[सं.]

पंडित
कुशल, चतुर।
वि.
[सं.]

पंडिता
विदुषी।
वि.
[सं.]

पंडिताइन
पंडितानी।
संज्ञा
[सं. पंडित]

पंडिताई
विद्वता, पांडित्य।
संज्ञा
[हिं. पंडित + आई]

पंडिताई
चालाकी, कुशलता (व्यंग्य)।
संज्ञा
[हिं. पंडित + आई]

पंडिताऊ
पंडितों के ढंग का।
वि.
[हिं. पंडित]

पंडितानी
पंडित की स्त्री।
संज्ञा
[हिं. पंडित]

नियोगी
नियोग करनेवाला।
वि.
[सं.]

नियोजक
काम में लगानेवाला।
वि.
[सं.]

नियोजन
काम में लगाना।
संज्ञा
[सं.]

नियोजित
नियुक्त किया हुआ।
वि.
[सं.]

निरंकार
ब्रह्म।
संज्ञा
[सं. निराकार]

निरंकार
आकाश।
संज्ञा
[सं. निराकार]

निरंकुशस निरंकुस
जिस पर किसी का अंकुश, प्रतिबंध या दबाव न हो, स्वेच्छाचारी।
उ.- माधौ जू, मन सबही बिधि पोच। अति उनमत्त, निरंकुस, मैगल, चिंतारहित, असोच - १-१०२।
वि.
[सं. निरंकुश]

निरंग
अंगरहित।
वि.
[सं.]

निरंग
खाली, निरा, केवल।
वि.
[सं.]

निरंग
रूपक अंलकार का भेद।
वि.
[सं.]

पंथकि, पंथकी, पंथि, पंथिक, पंथी
राही, पथिक।
उ.-बीर बटाऊ पंथी हो तुम कौन देश तें आए-२९८३।
संज्ञा
[सं. पथिक]

पंथान, पंथाना
मार्ग।
संज्ञा
[सं. पंथ]

पंथी
किसी मत का अनुयायी।
संज्ञा
[सं. पंथिन्]

पंद
सीख, उपदेश।
संज्ञा
[फ़ा.]

पँधलाना
बहलाना, फुसलाना।
क्रि. स.
[देश.]

पंपा
दक्षिण की एक नदी और उसका निकटवर्ती ताल।
संज्ञा
[सं.]

पंपासर
दक्षिण की पंपानदी का निकटवर्ती ताल।
संज्ञा
[सं.]

पँवर
खड़ाऊँ, पांवरी।
संज्ञा
[हिं. पाँव]

पँवरना
तैरना, पैरना।
क्रि. अ.
[सं. प्लव]

पँवरना
थाह लेना।
क्रि. अ.
[सं. प्लव]

पंडु
पीला।
वि.
[सं.]

पंडु
सफेद।
वि.
[सं.]

पंडुक
पिड़की, फाख्ता।
संज्ञा
[सं. पांडु]

पंडौ
पाँचों पांडव।
संज्ञा
[सं. पांडव]

पंथ
मार्ग, रास्ता, राह।
उ.-(क) मोंकौं पंथ बतायौ सोई नरक कि सरग लहौं-१-१५१। (ख) चलत पंथ कोउ था क्यो होई-३-१३।
संज्ञा
[सं. पथ]

पंथ
(२)आचार-व्यवहार की रीति।
उ.-नहिं रुचि पंथ पयादि डरनि छकि पंच एकादस ठानै-१-६०।
संज्ञा
[सं. पथ]

पंथ
पंथ गहना- (१) चलने के लिए राह पर होना। (२) विशेष, प्रकार का आचरण करना। पंथ गहौ- चलो, जाओ। उ. -बिछुरत प्रान पयान करेंगे, रहौ आजु पुनि पंथ गहौ-९-३३। पंथ दिखाना- (१) मार्ग बताना। (२) धर्माचरण की रीति बताना या तस्संबंधी उपदेश देना। पंथ देखना (निहारना)- बाँट जोहना, प्रतीक्षा करना। पंथ निहारौं- प्रतीक्षा करता हूँ, बाट जोहती हूँ। उ.-(क) तुमरो पंथ निहारौं स्वामी। कबहिं मिलौके अंतर्यामी। (ख) मैं बैठी तुम पंथ निहारौं। आवौ तुम पै मन वारौं। पंथ में (पर) पाँव देना- (१) चलना (2) विशेष आचरण करना। पंथ पर लगना- रास्ते पर होना, चाल चलना। किसी के पंथ लगना- (१) किसी का अनुयायी होना। (२) किसी को तंग करना। पंथ पर लाना (लगाना)- (१) ठीक मार्ग पर लाना। (२) अच्छी चाल सिखाना। (३) अनुयायी बनाना। पंथ सेना- बाट जोहना, आसरा देखना। एक पंथ द्वैकाज- एक कार्य करके अथवा एक रीति-नीति का निर्वाह करने से दोहरा लाभ होना। उ.- ज्ञान बुझाइ खबरि दै आवहु एक पंथ द्वैकाजु-- २९२५।
मु.

पंथ
धर्म-मार्ग, संप्रदाय।
संज्ञा
[सं. पथ]

पंथ
पंथ लेना- अनुयायी बनना। पंथ पर लाना (लगाना)- अनुयायी बनाना।
मु.

पंथ
रोगी का हल्का भोजन।
संज्ञा
[सं. पथ्य]

पँवरि
प्रवेशद्वार, ड्योढ़ी।
उ.-आतुर जाइ पँवरि भयो ठाढ़ो-२४६५।
संज्ञा
[हिं. पौरी]

पँवरिआ, पँवरिया
द्वारपाल, दरबान।
उ.-(क) आतुर जाइ पँवरि भयौ ठाढ़ो कहो पँवरिआ जाइ-२४६५। (ख) सकल खग गन पैक पायक पँवरिया प्रतिहार-२७५५।
संज्ञा
[हिं. पौरी]

पँवरिआ, पँवरिया
याचक।
संज्ञा
[हिं. पौरी]

पँवरी
द्वार, डयोढ़ी।
संज्ञा
[हिं. पौरी]

पँवरी
खड़ाऊँ, पांवरी।
संज्ञा
[हिं. पाँव]

पँवाड़ा
खूबबढ़ा-चढ़ाकर कही हुई कहानी। या बात।
संज्ञा
[सं. प्रवर]

पँवारना
हटाना, फेंकना।
क्रि. स.
[सं. पवारण]

पँवारे
हटाये, दूर किये।
उ.-(क) बिंब पँवारे लाजही दामिनि द्युति थोरी-१८२१। (ख) बिंब पँवारे लाजहीं हरषत बरसत फूल-२०६५।
क्रि. स.
[हिं. पँवारना]

पंसारी
मसाला बेचनेवाला।
संज्ञा
[सं. पण्यशाली]

पंसासार
पासे का खेल।
संज्ञा
[सं. पाशक + सारि]

पईठि
पैठकर।
हारेहू नहिं हरत अमित बल बदन पयोठि पईठि-पृ. ३३४ (३६)।
क्रि. अ.
[हिं. पैठना]

पउँरि, पउँरी
ड्योढ़ी, द्वार।
संज्ञा
[हिं. पौरी]

पकड़
धरने, पकड़ने या ग्रहण करने का काम।
संज्ञा
[सं. प्रकृष्ट, प्रा. पक्कड़]

पकड़
पकड़ने का ढंग।
संज्ञा
[सं. प्रकृष्ट, प्रा. पक्कड़]

पकड़
हाथापाई।
संज्ञा
[सं. प्रकृष्ट, प्रा. पक्कड़]

पकड़
दोष, भूल-आदि निकालने की क्रिया।
संज्ञा
[सं. प्रकृष्ट, प्रा. पक्कड़]

पकड़ना
किसी चीज की धरना, थामना या ग्रहण करना।
क्रि. स.
[हिं. पकड़]

पकड़ना
बंदी बनाना।
क्रि. स.
[हिं. पकड़]

पकड़ना
कुछ करने न देना।
क्रि. स.
[हिं. पकड़]

पकड़ना
पता लगाना।
क्रि. स.
[हिं. पकड़]

पइअत
पाता हैं।
उ.-जाको कहूँ थाह नहिं पइअत अगम अपार अगाधै-३२८४।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पइग
डग, कदम।
संज्ञा
[हिं. पग]

पइज
प्रतिज्ञा।
संज्ञा
[हिं. पैज]

पइज
हठ।
संज्ञा
[हिं. पैज]

पइठ
प्रदेश।
संज्ञा
[हिं. पैठ]

पइठ
गति, पहुँच।
संज्ञा
[हिं. पैठ]

पइठना
प्रदेश करना, घुसना।
क्रि. अ.
[हिं. पैठना]

पइयै
पाइए, प्राप्त कीजिए।
उ.-ऊधौ, चलौ बिदुर कैं जइयै। दुरजोधन कै कौन काज जहँ आदर-भाव न पइयै -१-२३९।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पइसना
प्रवेश करना, धुसना।
क्रि. अ.
[हिं. पैठना]

पइसार
प्रवेश, पैठ।
संज्ञा
[हिं. पइसना]

पकड़ना
टोंकना, रोकना।
क्रि. स.
[हिं. पकड़]

पकड़ना
आगे बढ़े हुए के बराबर हो जाना।
क्रि. स.
[हिं. पकड़]

पकड़ना
लगकर फैलना।
क्रि. स.
[हिं. पकड़]

पकड़ना
धारण करना।
क्रि. स.
[हिं. पकड़]

पकड़ना
घेरना, छोपना, ग्रसना।
क्रि. स.
[हिं. पकड़]

पकड़वाना
ग्रहण कराना।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकड़ाना
थमाना, ग्रहण कराना।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकना
कच्चा न रह जाना।
क्रि. अ.
[सं. पक्व, हिं. पक्का + ना]

पकना
आँच से सीझना या चरना।
क्रि. अ.
[सं. पक्व, हिं. पक्का + ना]

पकना
फोड़े-फुंसी का मवाद से भरना।
क्रि. अ.
[सं. पक्व, हिं. पक्का + ना]

पकरी
धारण की, अपनायी, पकड़ी।
उ.-अधम समूह-उधारन-कारन तुम जिय जक पकरी-१-१३०।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकरी
इस तरह पकड़ी कि छूट न सके।
उ.-(क) दुस्सासन अति दारुन रिस करि, केसनि करि पकरी-१-२५४। (ख) मन-क्रम बचन नंदनंदन उर यह द्दढ़ करि पकरी-३३६०।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकरै
पकड़ता है, (हाथ में ) लेता है, ग्रहण करता है।
उ.-जद्यपि मलय-बृक्ष जड़ काटै, कर कुठाक पकरै। तऊ सुभाव न सीतल छाँड़ै, रिपु-तन-ताप हरै-१-१-११७।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकरैगौ
पकड़ेगा, थामेगा, कहेगा।
उ.-जो हरि-ब्रत निज उर न धरैगौ। तो को अस माता जु अपुन करि करे कुठाँव पकरैगौ-१-७५।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकरयौ
पकड़ लिया, अधिकार में किया, बंदी बनाया।
उ.-रिस भरि गए परम किंकर तब, पकरयौ छूटि न सकौं-१-१५१।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकवान
घी में तलकर बनाये गये खाद्य पदार्थ जो कई दिन तक खाये जा सकते हैं।
संज्ञा
[सं. पक्कान्न]

पकवाना
पकानें का काम कराना, पकाने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. पकाना]

पकवान्ह
पकवान।
उ.-अन्नकूट बिधि करत लोग सब नेम सहित करि पकवान्ह-९१०।
संज्ञा
[हिं. पकवान]

पकाई
पकाने की क्रिया, भाव या वेतन।
संज्ञा
[हिं. पकाना]

पकाए
आँच से तपा कर पका दिये।
उ.-बिधि-कुलाल कीने काचे घट ते तुम आनि पकाए-३१९१।
क्रि. स.
[हिं. पकाना]

पकना
चौसर की गोटी का सब घर पार कर लेना।
क्रि. अ.
[सं. पक्व, हिं. पक्का + ना]

पकना
सौदा पटना।
क्रि. अ.
[सं. पक्व, हिं. पक्का + ना]

पकरन
पकड़ना, थामना, रोकना, छूना।
उ.-कबहूँ निरखि हरि आपु छाहँ कौं, कर सौं पकरन चाहत-१०-११०।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकरना
पकड़ना।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकराए
पकड़ने को प्रेरित किया, पकड़ाया।
उ.-मोहन प्यारी सैन दे हलधर पकराए-२४४६।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ाना]

पकरावै
पकड़वाता है, (दुसरे से) बंदी बनवाता है।
उ.-द्रुपद-सुताहिं दुष्ट दुरजोधन सभा माहिं पकरावै-१-१२२।
क्रि. स.
[हिं. पकड़वाना (प्रे.)]

पकरि
पकड़कर, थामकर, हाथ में लेकर।
उ.-मिथ्याबाद आप-जस सुनि-सुनि, मूछहिं पकरि अकरतौ-१-८०३।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकरिबे
पकड़ने (के लिए) गहने या ग्रहण करने (के उद्देश्य से)।
उ.-मुख प्रतिबिंब पकरिबे कारन हुलसि घुटुरुवनि धावत-१०-१०२।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकरिबैं
पकड़ने को।
उ.-मनिमय कनक नंद कैं आँगन बिंब पकरिबैं धावत-१०-११०।
क्रि. स.
[हिं. पकड़ना]

पकरिया
पाकर' नामक वृक्ष।
संज्ञा
[हिं. पाकर]

पक्का
पुष्ट, प्रौढ़।
वि.
[सं. पक्क]

पक्का
साफ और ठीक।
वि.
[सं. पक्क]

पक्का
कड़ा और मजबूत
वि.
[सं. पक्क]

पक्का
मँजा हुआ, अभ्यस्त।
वि.
[सं. पक्क]

पक्का
अनुभव प्राप्त, दक्ष।
वि.
[सं. पक्क]

पक्का
आँच पर पका हुआ।
वि.
[सं. पक्क]

पक्का
टिकाऊ, दृढ़।
वि.
[सं. पक्क]

पक्का
निश्चित, अटल।
वि.
[सं. पक्क]

पक्का
प्रमाणों , पुष्ट।
वि.
[सं. पक्क]

पक्का
टकसाली, प्रामाणिक मानवाला।
वि.
[सं. पक्क]

पक्खर
पक्का, पुखता।
वि.
[सं. पक्क]

पक्व
पका हुआ, पक्का।
वि.
[सं.]

पक्वान्न
पकवान।
संज्ञा
[सं.]

पक्ष
ओर, तरफ।
संज्ञा
[सं.]

पक्ष
भिन्न अंग, पहलू।
संज्ञा
[सं.]

पक्ष
भिन्न मत या विचार।
संज्ञा
[सं.]

पक्ष
अनकूल प्रवृत्ति या स्थिति।
संज्ञा
[सं.]

पक्ष
लगाव, संबंध।
संज्ञा
[सं.]

पक्ष
सेना, फौज।
संज्ञा
[सं.]

पक्ष
साथ का समूह।
संज्ञा
[सं.]

निबेड़ना, निबेरना
सुलझाना।
क्रि. स.
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)

निबेड़ना, निबेरना
निर्णय करना।
क्रि. स.
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)

निबेड़ना, निबेरना
दूर करना।
क्रि. स.
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)

निबेड़ना, निबेरना
पूरा करना।
क्रि. स.
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)

निबेरहु
निर्णय करो।
उ.- सूरदास वह न्याउ निबेरहु हम तुम दोऊ साहु - ३३६८।
क्रि. स.
[हिं. निबेरना]

निबेड़ा, निबेरा
मुक्ति, छुटकारा।
संज्ञा
[हिं. निबेड़ना]

निबेड़ा, निबेरा
बचाव, उद्धार।
संज्ञा
[हिं. निबेड़ना]

निबेड़ा, निबेरा
अलगाव।
संज्ञा
[हिं. निबेड़ना]

निबेड़ा, निबेरा
सुलझाव।
संज्ञा
[हिं. निबेड़ना]

निबेड़ा, निबेरा
भुगतान, समाप्ति।
संज्ञा
[हिं. निबेड़ना]

निरंग
बदरंग।
वि.
[हिं. नि + रंग]

निरंग
फीका।
वि.
[हिं. नि + रंग]

निरंजन
परमात्मा, ईश्वर।
उ.- (क) आदि निरंजन, निराकार, कोउ हुतौ न दूसर - २-३६। (ख) अलख निरंजन ही को लेखो - ३४०८।
संज्ञा
[सं.]

निरंजन
शिव जी।
संज्ञा
[सं.]

निरंजन
बिना अंजन या काजल का।
वि.

निरंजन
दोष या कल्मष रहित।
वि.

निरंजन
माया से निर्लिप्त।
वि.

निरंजनी
साधुओं का एक संप्रदाय।
संज्ञा
[सं.]

निरंजनी
आरती।
संज्ञा
[सं. नीरांजनी]

निरंतर
लगातार, सदा, बराबर।
क्रि. वि.
[सं.]

पकाना
कच्चे फल आदि को पुष्ट या तैयार करना।
क्रि. स.
[हिं. पकाना]

पकाना
आँच या गरमी से सिझाना या पक्का करना।
क्रि. स.
[हिं. पकाना]

पकाना
कलेजा पकाना- जी जलाना।
मु.

पकाना
फोड़े-फुंसी आदि को तैयार करना।
क्रि. स.
[हिं. पकाना]

पकाना
सौदा कराना।
क्रि. स.
[हिं. पकाना]

पकाव
पकने का भाव।
संज्ञा
[हिं. पकना]

पकौड़ा, पकौरा, पक्कौड़ा
घी या तेस में तली बेसन या पीठी की बड़ी।
उ.-मूँग पकौरा पनौ पतबरा। इक कोरे इक भिजे गुरबरा-३९६।
संज्ञा
[हिं. पकौड़ा=पका + बरी, बड़ी]

पकौड़ी, पकौरी, पक्कौरी
छोटा पकौड़ा।
उ.-दधि, दूध, बरा, दहिरौरी सो खात अमृत पक्कौरी-१०-१८३।
संज्ञा
[हिं. पुं. पकौड़ा]

पक्का
पका हुआ।
वि.
[सं. पक्क]

पक्का
पूरा, पूर्णता को प्राप्त।
वि.
[सं. पक्क]

पक्ष
सहायक, साथी।
संज्ञा
[सं.]

पक्ष
विवादियों का समूह।
संज्ञा
[सं.]

पक्ष
पक्षी का पंख।
संज्ञा
[सं.]

पक्ष
तीर में लगा पंख।
संज्ञा
[सं.]

पक्ष
चांद मास के दो अर्द्ध विभाग।
संज्ञा
[सं.]

पक्ष
घर, गृह।
संज्ञा
[सं.]

पक्षपात
तरफदारी।
संज्ञा
[सं.]

पक्षपाती
तरफदार।
संज्ञा
[सं.]

पक्षिराज
गरुड़।
संज्ञा
[सं.]

पक्षी
चिड़िया।
संज्ञा
[सं.]

पक्षी
तरफदार।
संज्ञा
[सं.]

पक्ष्म
बरौनी।
संज्ञा
[सं. पक्ष्मन्]

पखंड
आडंबर, ढकोसला।
संज्ञा
[सं. पाखंड]

पखंडी
आडंबर रचनेवाला।
वि.
[हिं. पखंड]

पख
व्यर्थ की बढ़ाई हुई बात।
संज्ञा
[सं. पक्ष, प्रा. पक्खु]

पख
बाधक शर्त या नियम।
संज्ञा
[सं. पक्ष, प्रा. पक्खु]

पख
झगड़ा-बखेड़ा।
संज्ञा
[सं. पक्ष, प्रा. पक्खु]

पख
दोष, त्रुटि।
संज्ञा
[सं. पक्ष, प्रा. पक्खु]

पखड़ी
फूलों की पंखुड़ी।
संज्ञा
[सं. पक्ष्म]

पखराइ
घुलवाकर।
उ.-चरन पखराइ कै सुभग आसन दियौ-२४९३।
क्रि. स.
[हिं. पखराना]

पखराना
घुलवाना।
क्रि. स.
[हिं. पखारना]

पखरायौ
धुलनाया।
उ.-उत्तम बिधि सौं मुख पखरायौ-६०९।
क्रि. स.
[हिं. पखराना]

पखरी
फूलों की पंखुड़ी।
संज्ञा
[हिं. पखुड़ी]

पखवाड़ा, पखवारा
चाँद-मास के दो विभागों में एक।
संज्ञा
[सं. पक्ष + वार, हिं. पखवारा]

पखवाड़ा, पखवारा
पंद्रह दिन का समय।
संज्ञा
[सं. पक्ष + वार, हिं. पखवारा]

पखा
पक्ष, पंख पर।
संज्ञा
[हिं. पंख]

पखाउज
पखावज नामक बाजा।
उ.-बीना झाँझ-पखाउज-आउज और राजसी भोग-९-७५।
संज्ञा
[हिं. पखावज]

पखान
पत्थर।
संज्ञा
[सं. पाषाण]

पखना, पखानो
कहावत, कहनाबत।
उ.-बालापन ते निकट रहत ही सुन्यौ न एक पखानो-३३९३।
संज्ञा
[सं. उपाख्यान]

पखारत
धोते हैं, (जल से) स्वच्छ करते हैं।
उ.-अपनौ मुख मसि-मलिन मंद मति, देखत दर्पन माहीं। ता कालिमा मेटिबे कारन, पचत पखारत छाहीं-२-२५।
क्रि. स.
[हिं. पखारना]

पखारना
धोना।
क्रि. स.
[सं. प्रक्षालन, प्रा. पक्खाड़न]

पखारि
जल से धोकर।
उ.-चरन पखारि लियो चरनोदक धनि-धान कहि दैत्यारी-२५८७।
क्रि. स.
[हिं. पखारना]

पखारी
जल से धोयी।
उ.-(क) अरु अँचयो जल बदन पखारी-१०-२४१। (ख) नई दोहनी पोंछि-पखारी-११७९।
क्रि. स.
[हिं. पखारना]

पखारे
जल से धोये।
उ.-स्यामहिं ल्याई महरि जसोदा तुरतहिं पाइँ पखारे-१०-२३७।
क्रि. स.
[हिं. पखारना]

पखावज
एक बाजा।
संज्ञा
[सं. पक्ष + वाद्य]

पखावजी
पखावज बजानेवाला।
संज्ञा
[हिं. पखावज]

पखिया
झगड़ालू, बखेड़िया।
वि.
[हिं. पख]

पखी, पखीरी
पक्षी।
उ.-की सृक सीपज की बग पंगति की मयूर की पीड पखीरी-१६२७।
संज्ञा
[सं. पक्षी]

पखुड़ी, पखुरी
फूल की पंखुड़ी।
संज्ञा
[हिं. पखड़ी]

पखेरुआ, पकेरुवा, पखेरू
पक्षी, चिड़िया।
उ.-ससा सियार अरु बन के पखेरू धृग धृग सबन करी-२७४१।
संज्ञा
[सं. पक्षालु, प्रा. पक्खाडु, हिं. पखेरू]

पगन
पैर।
उ.- नगन पगन ता पाछै गयौ-९-२।
संज्ञा
[हिं. पग]

पगना
रस या चासनी लिपटना या सनना।
क्रि. अ.
[सं. पाक]

पगना
किसी के प्रेम डूबना।
क्रि. अ.
[सं. पाक]

पगनियाँ
जूती।
संज्ञा
[हिं. पग]

पगरा
डग, कदम।
संज्ञा
[हिं. पग + रा]

पगरा
प्रभात, सबेरा।
संज्ञा
[फ़ा. पगाह=सबेरा]

पगरी
पाग, पगड़ी।
संज्ञा
[हिं. पगड़ी]

पगरो
पग, डग, कदम।
उ.- सूर सनेह ग्वारि मन अटक्यो छाँड़हु दिए परत नहिं पगरो-१०३१।
संज्ञा
[हिं. पगरा]

पगला
पागल।
वि.
[हिं. पगल]

पगहा
पघा, गिराँव।
संज्ञा
[सं. प्रगृह, पा. पग्गह]

पखौआ, पखौवा, पखौटा
पंख।
उ.-(क) मुख मुरली सिर मोर पखौआ बन-बन घेनु चराई-२६८४। (ख) मुख मुरली सिर मोर पखौआ गर घुँ घुचीन को हार-१० उ.-११९।
संज्ञा
[सं. पक्ष]

पखौड़ा, पखौरा
कंधे की हडडी।
संज्ञा
[सं. पक्ष]

पग
पैर, पाँव, डग।
संज्ञा
[सं. पदक, प्रा. पअक, पक]

पग
पग धारे- आये। उ.-(क) गरुड़ छाँड़ि प्रभु पाँय पियादे गज-कारन पग धारे-१-२५। (ख) ध्रुव निज पुर को पुनि पग धारे-४-९। (ग) सूर तुरत मधुवन पग धारे धरनी के हितकारी-२५३३। पग पग पर- जरा-जरा सी दूर पर, हर स्थान पर, जहाँ जाय वहीं। उ.-दीन जन क्यौं करि आवै सरनु ॽ ¨¨¨¨¨। पग पग परत कर्म-तम-कूपहिं, को करिकृपा बचावै-१-४८। फूँकि पग धारौ- बहुत समझ-बूझकर और सतर्कता से आओ। उ.-फूँकि फूँकि धरनी पग धारौ अब लागीं तुम करन अयोग-१४९७।
मु.

पगडंडी
मैदान में लोगों के चलने से बन जानेवाला पतला मार्ग।
संज्ञा
[हिं. पग + डंडी]

पगडोरी
पैर का बंधन।
उ.-जनु उड़ि चले बिहंगम को गन कटी कठिन पग डोरी-१० उ.-५२।
संज्ञा
[हिं. पग + डोरी]

पगड़ी
सिर में बाँधने की पाग, साफा।
संज्ञा
[सं. पटक, हिं. पग + ड़ी]

पगड़ी
पगड़ी अटकना- मुकाबला होना। पगड़ी उछलना- दुर्गति होना। पगड़ी उछालना- (१) दुर्गति बनाना। (२) हँसी उड़ाना। पगड़ी उतरना- अपमान होना। पगड़ी उतारना- अपमान करना। पगड़ी बँधना- (१) उत्तराधिकार मिलना। (२) अधिकार मिलना। (३) आदर मिलना। पगड़ी बदलना- मित्रता या नाता करना। (किसी की) पगड़ी रखना- इज्जत बचाना। (किसी के आगे या सामने) पगड़ी रखना- बहुत गिड़गिड़ाना।
मु.

पगतरी
जूता।
संज्ञा
[हिं. पग + तल]

पगदासी
जूता, खड़ाऊँ।
संज्ञा
[हिं. पग + दासी]

पगाह
प्रभात, तड़का।
संज्ञा
[फ़ा.]

पगि
अनुरक्त हुआ, प्रेम में डूबा, मग्न हुआ।
उ.- बिषय-भोग ही मैं पगि रह्यौ। जान्यौ मोहिं और कहुँ गयौ-४-१२।
क्रि. अ.
[हिं. पगना]

पगि
लीन हुए।
उ.- इहीं सोच सब पगि रहे, कहूँ नहीं निरबार-५८९।
क्रि. अ.
[हिं. पगना]

पगिया
पगड़ी।
उ.- (क) एते पर अँखियाँ रससानी अरू पगिया लपटानी-१६६७। (ख) सिर पगिया बीरा मुख सोहै सरस रसीले दोल-२४१४।
संज्ञा
[हिं. पगड़ी]

पगु
डग, कदम।
संज्ञा
[हिं. पग]

पगुराना
पागुर करना।
क्रि. अ.
[हिं. पागुर]

पगे
अनुरक्त हुए।
उ.- अंग अंग अवलोकन कीन्हों कौन अंग पर रहे पगे-१३१८।
क्रि. अ.
[हिं. पगना]

पघा
पशु बाँधने की रस्सी।
संज्ञा
[सं. प्रगृह]

पघिलना
पिघलना।
क्रि. अ.
[हिं. पिघलना]

पघिलाना
पिघलाना।
क्रि. स.
[हिं. पिघलना]

पघिलि
पिघलकर।
उ.- धोए छूटत नहीं यह कैसेहु मिलैं पघिलि ह्वै मैन- पृ. ३२३ (११)।
क्रि. अ.
[हिं. पघलना]

पचएँ
पाँचवें, पाँचवें स्थान पर।
उ.- पचएँ बुध कन्या कौ जौ है, पुत्रनि बहुत बढ़ै हैं-१०-८६।
वि.
[हिं. पाँचवाँ]

पचगुना
पाँच बार अधिक।
वि.
[सं. पंचगुण]

पचड़ा
झंझट, बखेड़ा, प्रपंच।
संज्ञा
[हिं. प्रपंच + ड़ा]

पचड़ा
एक तरह का गीत।
संज्ञा
[हिं. प्रपंच + ड़ा]

पचत
दुखी होता है, हैरान होता है।
उ.- अपनौ मुख मसि-मलिन मंदमति, देखत दर्पन माहीं। ता कालिमा मेटिबे कारन, पचत पखारत छाहीं-२-२५।
क्रि. अ.
[हिं. पचना]

पचतूरा
एक तरह का बाजा।
संज्ञा
[देश.]

पचतोलिया
पाँच तोले का।
वि.
[हिं. पाँच + तोला]

पचन
पकने या पकाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं.]

पचन
अग्नि।
संज्ञा
[सं.]

पगा
पटका, दुपट्टा।
उ.- झँगा, पगा अरू पाग पिछौरी दाढ़िन को पहिराए।
संज्ञा
[हिं. पाग]

पगा
चौपायों के बाँधने का रस्सा, मोटी रस्सी।
संज्ञा
[सं. प्रगृह, हिं. पघा]

पगा
अधीनता-सूचक बंधन।
उ.- तृन दसननि लै मिलु दसकंधर कंठहि मेलि पगा-९-११४।
संज्ञा
[सं. प्रगृह, हिं. पघा]

पगा
डग, कदम।
संज्ञा
[हिं. पगरा]

पगाना
पागने का काम कराना।
क्रि. स.
[सं. पक्व या हिं. पाक]

पगाना
प्रेम म मग्न कराना।
क्रि. स.
[सं. पक्व या हिं. पाक]

पगार, पगारु
गढ़, प्रासाद आदि के रक्षार्थ बनी चहारदीवारी।
संज्ञा
[सं. प्रकार]

पगार, पगारु
वस्तु जो पैरों से कुचली जाय।
संज्ञा
[हिं. पग + गारना]

पगार, पगारु
पैरों से कुचली मिट्टी या गारा।
संज्ञा
[हिं. पग + गरना]

पगार, पगारु
वह पानी या छिछली नदी जिसे पैदल ही चलकर पार किया जा सके।
संज्ञा
[हिं. पग + गरना]

निरंबु
बिना पानी का, निर्जल।
वि.
[सं.]

निरंबु
बिना पानी या जल पिये।
वि.
[सं.]

निरंभ
निर्जल।
वि.
[सं. निरंभस्]

निरंभ
जिस (व्रत, साधना) में बिना पानी पिये रहा जाय।
वि.
[सं. निरंभस्]

निरंश, निरंस
जिसे अपना प्राप्य भाग न मिला हो।
उ.- सेष सहसफन नाथिज्यों सुरपतिकरे निरंस १११२।
वि.
[सं.]

निरअंतर
लगातार, सदा।
उ.- उरझ्यौ बिबस कर्म निरअंतर, स्रमि सुख-सरनि चह्यौ - १-१६२।
क्रि. वि.
[सं. निरंतर]

निरउत्तर
जो उत्तर न दे सके। मौन, चुप।
उ.- निरउत्तर भई ग्वालि बहुरि कह कछू न आयो - १०७२।
वि.
[सं. निरुत्तर]

निरक्षर
अशिक्षित।
वि.
[सं.]

निरक्षर
मूर्ख।
वि.
[सं.]

निरखत
ताकते या देखते हैं।
उ.- (क) जद्यपि विद्यमान सब निरखत, दुःख सरीर भर्यौ - १-१००। (ख) दुष्ट-सभा पिसाच दुरजोधन, चाहत नगन करी। भीषम, द्रोन, करन, सब निरखत, इनतैं कछु न सरी - १-२५४।
क्रि. स.
(हिं. निरखना)

पचना
हजम होना।
क्रि. अ.
[सं. पचन]

पचना
नष्ट होना।
क्रि. अ.
[सं. पचन]

पचना
हैरान होना।
क्रि. अ.
[सं. पचन]

पचना
लीन होना।
क्रि. अ.
[सं. पचन]

पचपचाना
पचपच करना।
क्रि. अ.
[अनु. पच]

पचमेल
कई तरह के मेल का।
वि.
[हिं. पाँच + मेल]

पचरंग
चौक पूरने की सामग्री - अबीर, हल्दी, बुक्का आदि।
संज्ञा
[हिं. पाँच + रंग]

पचरंग, पचरंगा
कई रंगों का।
वि.
[हिं. पाँच + रंग]

पचरंग, पचरंगा
कई रंग के सूतों का।
वि.
[हिं. पाँच + रंग]

पचरंग, पचरंगा
कई रंगों से रँगा हुआ।
वि.
[हिं. पाँच + रंग]

पचलड़ी
पाँच लड़ियों की माला।
संज्ञा
[हिं. पाँच + लड़ी]

पचहरा
पँचगुना।
वि.
[हिं. पाँच + हरा]

पचहरा
पाँच तह का।
वि.
[हिं. पाँच + हरा]

पचाना
आँच पर गलाना।
क्रि. स.
[हिं. पचना]

पचाना
हजम करना।
क्रि. स.
[हिं. पचना]

पचाना
नष्ट करना।
क्रि. स.
[हिं. पचना]

पचाना
अवैध उपाय से ली वस्तु काम में लाना।
क्रि. स.
[हिं. पचना]

पचाना
एक चीज को दूसरी में खपाना।
क्रि. स.
[हिं. पचना]

पचारना
ललकारना।
क्रि. स.
[सं. प्रचारण]

पचास
चालीस और दस।
उ.- सहज पचास पुत्र उपजाएँ-९-८।
वि.
[सं. पंचाशत, प्रा. पंचासा]

पचासक
लगभग पचास, पचासों।
उ.- कोई कहे बात बनाई पचासक, उनकी बात जु एक-३४६४।
वि.
[हिं. पचास + एक]

पचासा
पचास का समूह।
संज्ञा
[हिं. पचास]

पचासों
कई पचास।
वि.
[हिं. पचास]

पचासों
पचास से ज्यादा।
वि.
[हिं. पचास]

पचि
हैरान होकर, दुख सहकर।
क्रि. अ.
[हिं. पचना]

पचि
रचि-पचि- बड़ी कठिनाई से, हैरान होकर। उ.- एक अधार साधु-संगति कौ, रचि पचि गति सचरी। याहू सौंज संचि नहिं राखी, अपनी धरनि धरी-१-१३०।
मु.

पचि
पाचन।
संज्ञा
[सं.]

पचि
अग्नि।
संज्ञा
[सं.]

पचित
जड़ा हुआ, पच्ची किया हुआ।
उ.- हीरा लाल प्रबाल पिरोजा पंगति बहु मणि पचित पचावनो-२२८०।
वि.
[सं.]

पचिबौ
सूखना या क्षीण होना, दुखी होना, हैरान होना।
उ.- रे मन छाँड़ि बिषय कौ रँचिबो। कत तू सुवा होत सेमर कौ, अंतहिं कपट न बचिबौ। अंतर गहत कनक-कामिनि कौं, हाथ रहैगौ पचिबौ-१-५९।
संज्ञा
[हिं. पचना]

पचिहौ
हैरान होगे, कष्ट सहोगे, परेशानी होगी।
उ.- मोकौं मुक्ति बिचारत हौ प्रभु, पचिहौ पहर-घरी। स्रम तैं तुम्हैं पसीना ऐहै, कत यह टेक करी ?-१-१३०।
क्रि. अ.
[हिं. पचना]

पची
हैरान हो गयी, दुखी हुई।
उ.- बाँधि पची डोरी नहिं पूरै। बार-बार खीझै, रिस झूरै-३९१।
क्रि. अ.
[हिं. पचना]

पची
जड़ाव, जमावट, पच्ची।
उ.- (क) बिद्रुम फटिक पची परदा छबि लाल रंध्र की रेख-२५६१। (ख) बिद्रुम स्फटिक पची कंचन खचि मनिमय मंदिर बने बनावत- १० उ.-५।
संज्ञा
[हिं. पच्ची]

पचीसी
पचीस का समूह।
संज्ञा
[हिं. पचीस]

पचीसी
चौसर का एक खेल।
संज्ञा
[हिं. पचीस]

पचीसी
चौसर की बिसात।
संज्ञा
[हिं. पचीस]

पचौनी
पाचक, पाचन।
संज्ञा
[सं. पाचन]

पचौर, पचौली
मुखिया, सरदार।
संज्ञा
[हिं. पंच]

पच्चड़, पच्चर
काठ का पेबँद।
संज्ञा
[हिं. पच्ची]

पच्चड़, पच्चर
पच्चर अड़ाना- बाधा डालना। पच्चर ठोंकना- खूब तंग करना। पच्चर मारना- बनती बात पर भाँजी मारना।
मु.

पच्यौ
मरत पच्यौ- हैरान होता है, जी तोड़ मेहनत करता है। उ.-जौ रीझत नहिं नाथ गुसाईं तौ कत जात जँच्यौ। इतनी कहौ, सूर पूरौ दै, काहैं मरत पच्यौ-१-१७४।
मु.

पछ
पंख।
उ.- सिखी वह नहिं, सिर मुकुट श्रीखंड पछ तड़ित नहिं पीत पट छबि रसाला-१६३१।
संज्ञा
[सं. पक्ष]

पछटी
तलवार।
संज्ञा
[देश.]

पछड़ना
पछाड़ा जाना, हार जाना।
क्रि. अ.
[हिं. पाछा]

पछड़ना
पिछड़ जाना, पीछे रह जाना।
क्रि. अ.
[हिं. पाछा]

पछताती
पछतावा करती।
उ.- जो तब साधि दीजतो कोऊ तो अब कत पछताती-३४१८।
क्रि. अ.
[हिं. पाछताना]

पछताना
पछतावा करना।
क्रि. अ.
[हिं. पाछताना]

पछतानि
पछतावा।
संज्ञा
[हिं. पाछताना]

पछताव
पछतावा।
संज्ञा
[हिं. पाछतावा]

पछतावना
पछतावा करना।
क्रि. अ.
[हिं. पाछताना]

पच्ची
ऐसी जड़ावट कि जड़ी गयी चीज तल से बिलकुल मिल जाय।
संज्ञा
[सं. पचित]

पच्ची
घातु के पदार्थ पर अन्य धातु के पत्तर की जड़ावट।
संज्ञा
[सं. पचित]

पच्ची
पच्ची हो जाना- लीन हो जाना।
मु.

पच्चीकारी
जड़ने या जमावट करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. पच्ची + फ़ा. कारी]

पच्छ
चिड़ियों या पक्षियों का डैना, पंख या पर।
उ.- (क) अद्भुत राम-नाम के अंक।¨¨¨। मुनि-मन-हंस-पच्छ-जुग, जाकैं बल डड़ि ऊरध जात-१-९०। (ख) मानौ पच्छ सुमेरहिं लागे उड़यौ अकासहिं जात-९-७४।
संज्ञा
[सं. पक्ष]

पच्छ
पक्ष, पखवारा।
उ.- (क) आठैं कृष्न पच्छ भादौं, महर के दधिकाँदौं-१०-३१। (ख) कृष्न पच्छ रोहिनी अर्द्धा निसि हर्षन जोग उदार-१०-८६।
संज्ञा
[सं. पक्ष]

पच्छता, पच्छताई
तरफदारी।
संज्ञा
[सं. पक्षपात]

पच्छि, पच्छी
चिड़िया, पक्षी।
उ.- मेरौ मन अनत कहाँ सुख पावै। जैसैं उड़ि जहाज कौ पच्छी फिरि जहाज पर आवै-१-१६८।
संज्ञा
[सं. पक्षी]

पच्छिराज
गरूड़।
संज्ञा
[सं. पक्षी + राजा]

पच्यौ
कष्ट सहा, हैरान हुआ।
उ.- मोसौं पतित न और गुसाई। अवगुन मोपैं अजहुँ न छूटत, बहुत पच्यौ अब ताई-१-१४७।
क्रि. अ.
[हिं. पचना]

पछतावा
कोई बुरा या अनुचित काम करने के बाद होनेवाला दुख, अनुताप।
संज्ञा
[सं. पश्चाताप, पा. पच्छाताव]

पछमन, पछमनौ
पीछे की ओर।
उ.- धरि न सकत पग पछमनौ, सर सनमुख उरलाग-१-३२५।
क्रि. वि.
[हिं. पीछे]

पछरिहौं
पछाड़ दूँगा, हराऊँगा।
उ.- केस गहे अरि कंस पछरिहौं-१०६१।
क्रि. स.
[हिं. पछाड़ना]

पछवाँ
पश्चिम का।
वि.
[सं. पश्चिम]

पछाँह
पश्छिम का देश।
संज्ञा
[सं. पश्चिम]

पछाड़, पछार
मूर्छित होकर गिरना।
संज्ञा
[हिं. पाछा, पछाड़]

पछाड़, पछार
परयौ खाइ पछार- अचानक गिर पड़ना, बेसुध होकर खड़े से गिरना। उ.- (क) अर्जुन स्त्रवत नैन जल धार। परयौ धरनि पर खाइ पछार-१-२८६। (ख) परति पछार खाइ छिन ही छिन अति आतुर ह्यौ दीन-३४२१।
मु.

पछाड़ना, पछारना
साफ करने के लिए कपड़े की पटकना।
क्रि. स.
[सं. प्रक्षालन, प्रा. पच्छाड़न]

पछाड़ना, पछारना
कुश्ती में पछाड़ना।
क्रि. स.
[हिं. पाछा]

पछारि
मूर्छित होकर गिरना।
संज्ञा
[हिं. पछाड़]

पछारि
परी खाइ पछारि- बेसुध होकर गिर पड़ना। उ.- दासी बालक मृत निहारि। परी धरनि पर खाइ पछारि-६-५।
मु.

पछारी
पटक-पटक कर।
उ.- सूरदास प्रभु सूर सुखदायक मारयौ नाग पछारी-२५९४।
क्रि. स.
[हिं. पछाड़ना]

पछारी
मार दिया, वध किया।
उ.- सूरस्याम पूतना पछारी, यह सुनि जिय डरप्यौ नृपराई-१०-५१।
क्रि. स.
[हिं. पछाड़ना]

पछारी
सूप आदि में रखकर और फटककर साफ की हुई, फटकी हुई।
उ.- मूँग, मसूर, उरद, चनदारी। कनक-फटक धरि फटकि पछारी-३९६।
वि.
[सं. प्रक्षालन, प्रा. पच्छाड़ना, हिं. पछोरना, पछोड़ना]

पछारै
मार दे, वध करे।
उ.- खड़ग धरे आवै तुव देखत, अपनैं कर छिन माँह पछारै-१०-१०।
क्रि. स.
[हिं. पछाड़ना]

पछारौं
मार डालूँ।
उ.- (क) कहौ तौ सचिव-सबंधु सकल अरि एकहिं एक पछारौं-९-१०८। (ख) रंगभूमि मैं कंस पछारौं, घीसि बहाऊँ बैरी-१०-१७६।
क्रि. स.
[हिं. पछाड़ना]

पछार्यौ
पटक दिया, गिराया।
उ.- हिरनाकुस प्रहलाद भक्त कौं बहुद सासना जारयौ। रहि न सके, नरसिंह रूप धरि, गहि कर असुर पछारयौ-१-१०९।
क्रि. स.
[हिं. पछाड़ना]

पछार्यौ
मारा, वध किया।
उ.- (क) जोधा सुभट सँहारि मल्ल कुबलया पछार्यो-२६२५। (ख) भ्रुम अरू केसी इहाँ पछार्यौ-३४०९।
क्रि. स.
[हिं. पछाड़ना]

पछावर, पछावरि
एक तरह का पकवान।
संज्ञा
[देश.]

पछावर, पछावरि
छाछ का बना एक पेय।
संज्ञा
[देश.]

पछाहीं
पश्चिम देश का।
वि.
[हिं. पछाह]

पछिआना
पीछा करना।
क्रि. स.
[हिं. पीछे + आना]

पछिताइ
पश्चाताप करके, पछता कर।
उ.- सूरदास भगवंत-भजन बिनु, चल्यौ पछि-ताइ, नयन जल ढारौ-१-८०।
क्रि. अ.
[हिं. पछातावा]

पछिताएँ
पछताने से, पश्चाताप करने से।
उ.- होत कहा अबके पछिताएँ, बहुत बेर बितई-१-२९९।
क्रि. अ.
[हिं. पछताना]

पछितात
पछताती है।
उ.- चलत न फेंट गही मोहन की अब ठाढी पछितात-२५४१।
क्रि. अ.
[हिं. पछताना]

पछितान
पछताना, पश्चाताप करना।
क्रि. अ.
[हिं. पछताना]

पछितान
लाग्यौ पछितान- (क) पछताने लगा, पश्चाताप करने लगा।
उ.-अब लाग्यौ पछितान पाइ दुख, दीन, दई को मारथौ-१-१०१। (ख) सुरपति अब लाग्यौ पछितान-६-५। लागीं पछितान-पछताने लगीं। उ.-रिस ही मोकौं दीन्हौ, अब लागीं पछितान-३५५।
प्र.

पछिताना
पछतावा करना।
क्रि. अ.
[हिं. पछताना]

पछितानी
पछतामे लगीं।
उ.- (क) रोहिनि चितै रही जसुमति तन, सिर धुनि धुनि पछतानी-३९५। (ख) मधुकर प्रीति किए पछतानी-३३५९।
क्रि. अ.
[हिं. पछिताना]

पछितानैं
पछताने से, पश्चाताप करने से।
उ.- सृंगी यह कीन्हौ बिनु जानैं। होत कहा अब के पछितानैं-१-२९०।
क्रि. अ.
[हिं. पछिताना]

पछितानौ, पछितान्यौ
पछताया, पश्चाताप किया।
उ.- (क) बिरध भऐं कफ कंठ बिरोध्यौ, सिर धुनि धुनि पछितान्यौ। १-३२९ (ख) मथुरापति जिय अतिहिं डरान्यौ। सभा माँझ असुरनि के आगैं, सिर धुनि धुनि पछितान्यौ-१०-६०।
क्रि. अ.
[हिं. पछिताना]

पछितायौ
पछताया, पश्चाताप किया।
उ.- रसमय जानि सुवा सेमर कौं चोंच घालि पछितायौ-१-५८।
क्रि. अ.
[हिं. पछिताना]

पछितायौ
पश्चाताप, पछतावा।
उ.- रह्यौ मन सुमिरन कौ पछितायौ-१-६७।
संज्ञा

पछिताव
पश्चाताप।
संज्ञा
[हिं. पछितावा]

पछितावहि
पछताती है।
उ.- पावति नहीं स्याम बलरामहिं, ब्याकुल ह्यै पछतावति-४५९।
क्रि. अ.
[हिं. पछिताना]

पछितावन
पछतावा।
संज्ञा
[हिं. पछितावा]

पछितावन
उ.-पिछली चूक समुझि उर अंतर अब लागी पछितावन-३१०१।
प्र.

पछितावा
पछतावा, पश्चाताप।
उ.- मोहिं भयौ माखन पछितावौ, रीती देखि कमोरि-१०-२८६।
संज्ञा
[हिं. पछितावा]

पछितैए
पश्चाताप कीजिए।
उ.- कीजै कहा कहत नहिं आवै सोचि हृदय पछितैए-३२९८।
क्रि अ.
[हिं. पछिताना]

पछितैया
पछताते हैं।
उ.- सूरदास प्रभु की यह लीला हम कत जिय पछितैया-४२८।
क्रि. अ.
[हिं. पछिताना]

निरंतर
अंतरहित।
वि.

निरंतर
निबिड़, घना।
वि.

निरंतर
अविचल, स्थायी।
वि.

निरंतर
प्रत्यक्ष, प्रकट, जो अंतर्धान न हो।
उ.- निकसि खंभ तैं नाथ निरंतर, निज जन राखि लियौ - १-३८।
वि.

निरंतर
ब्रह्म, ईश्वर।
संज्ञा

निरंतर
विष्णु।
संज्ञा

निरंध
बिलकुल अंधा।
उ.- करि निरंध निबहै दै माई आँखिनि रथ-पद धूरि- २६९३।
वि.
[सं.]

निरंध
महामूर्ख।
वि.
[सं.]

निरंध
घनघोर अंधकार।
वि.
[सं.]

निरंध
बिना अन्न का।
वि.
[सं. निरंधस्]

पछितैहौ
पछताओगे, पश्चाताप करोगे।
उ.- सूरदास अवसर के चूकैं, फिरि पछितैहौ देखि उघारी-१-२४८।
क्रि. अ.
[हिं. पछिताना]

पछियाव
पश्चिम से आनेवाली हवा, पछुआ हवा।
संज्ञा
[सं. पश्चिम + हिं, आना ]

पछिला
पीछे का, पिछला।
वि.
[हिं. पिछला]

पछिले
पिछले, पहले के, विगत, पूर्व के।
उ.- पछिले कर्म सम्हारत नाहीं, करत नहीं कछु आगे-१-६१।
वि.
[हिं. पिछला]

पछेलना
पीछे छोड़ देना।
क्रि. स.
[हिं. पीछे]

पछेला
हाथ का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. पाछ + एला]

पछेलिया, पछेली
हाथ का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. पुं. पछेला]

पछोड़ना, पछोरना
सूप आदि से फटककर अनाज इत्यादि साफ करना।
क्रि. स.
[सं. प्रक्षालन, प्रा. पन्छाड़न, हिं. पछोड़ना]

पछोड़ना, पछोरना
फटकना-पछोड़ना- अच्छी तरह परीक्षा करना।
मु.

पछोड़ी, पछोरी
सूप में रखकर और फटककर साफ की।
क्रि. स.
[हिं. पछोड़ना]

पजारना
दहकाना, सुलगाना।
क्रि. स.
[हिं. पजरना]

पजारे
जलाया, फूँक दिया।
उ.- बिन आज्ञा मैं भवन पजारे, अपजस करिहैं लोइ-९-९९।
क्रि. स.
[हिं. पजरना]

पटंबर
रेशमी वस्त्र।
उ.- किंकिन नूपुर पाट पटंबर, मनौ लिये फिरैं घर-बार-१-४१।
संज्ञा
[सं. पाटंबर]

पट
वस्त्र, कपड़ा।
उ.- (क) हम तन हेरि चितै अपनौ पट देखि पसारहिं लात- ३२८३। (ख) भरि भरि नैन ढारति है सजल करति अति कंचुकि के पट-३४६२।
संज्ञा
[सं.]

पट
परदा।
संज्ञा
[सं.]

पट
कागज, लकड़ी या धातु का टुकड़ा।।
संज्ञा
[सं.]

पट
द्वार का किवाड़।
संज्ञा
[सं. पट्ट]

पट
सिंहासन।
संज्ञा
[सं. पट्ट]

पट
टाँग।
संज्ञा
[देश.]

पट
चित का उल्टा, औंधा।
वि.

पछोड़ी, पछोरी
फटकि पछोरी- अच्छी तरह परीक्षा की। उ.- सूर जहाँ लौं स्याम गात हैं, देखे फटकि पछोरी।
मु.

पछोड़े, पछोरे
सूप में फटककर साफ किये।
उ.- कहौ कौन पै कढ़ै कनूका भुस की रास पछोरे।
क्रि. स.
[हिं. पछोड़ना]

पछोड़े, पछोरे
फटकि पछोरे- अच्छी तरह परीक्षा की। उ.- तुम मधुकर निर्गुन निज नीके देखे फटकि पछोरे-३१००।
मु.

पछयावर
एक तरह की शिखरन।
संज्ञा
[देश.]

पजर
चूने-टपकने की क्रिया।
संज्ञा
[सं. प्रक्षरण]

पजरत
जलता है, दहकता है, सुलगता है।
उ.- भयौ पलायमान दानवकुल, ब्याकुल, सायक-त्रास। पजरत धुजा, पताक, छत्र, रथ, मनिमय कनक-अवास-९-८३।
क्रि. अ.
[हिं. पजरना]

पजरना
दहकना, सुलगना।
क्रि. स.
[सं. प्रज्वलन]

पजरि
दहक या सुलग कर।
उ.-पजरि पजरि तनु अधिक दहत है सुनत तिहारे बैन।
क्रि. अ.
[हिं. पजरना]

पजरे
जले, दहके, सुलगे।
क्रि. अ.
[हिं. पजरना]

पजरे
जले हुए।
उ.- बचन दुसह लागत अति तेरे ज्यों पजरे पर लौन-३१२२।
वि.

पट
तुरंत, फौरन।
क्रि. वि.

पट
टप-टप की ध्वनि।
(अनु)

पटक
पटकने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. पटकना]

पटक
डंडी, छड़ी।
संज्ञा
[हिं. पटकना]

पटकत
‘पट’ शब्द के साथ चटकता है।
उ.- (क) पटकत बाँस, काँस, कुस ताल-५९४। (ख) पटकत बाँस, काँस कुस चटकत-६१५।
क्रि. अ.
[हिं. पटकना]

पटकत
पटकते ही।
पटकत सिला गई आकासहिं-१०-४।
क्रि. वि.

पटकन
पटकने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. पटकना]

पटकन
छड़ी।
संज्ञा
[हिं. पटकना]

पटकन
चपत, तमाचा।
संज्ञा
[हिं. पटकना]

पटकना
जोर से गिराना।
क्रि. स.
[सं. पतन + करण]

पटकना
दे मारना।
क्रि. स.
[सं. पतन + करण]

पटकना
सूजन कम होना।
क्रि. अ.

पटकना
गेहूँ, चने आदि का भीगने के बाद सूखकर सिकुड़ना।
क्रि. अ.

पटकना
‘पट’ शब्द के साथ फटना या दरकना।
क्रि. अ.

पटकनिया, पटकनी
पटकने या पटके जाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. पटकना]

पटकनिया, पटकनी
पछाड़।
संज्ञा
[हिं. पटकना]

पटका
दुपट्टा, कमरबंद।
संज्ञा
[सं. पट्टक]

पटकार
जुलाहा।
संज्ञा
[सं.]

पटकार
चित्रकार।
संज्ञा
[सं.]

पटकि
पटककर, जोर से गिराकर।
उ.- भई पैज अब हीन हमारी, जिय मैं कहै बिचारि। पटकि पूँछ, माथौ धुनि लोटै, लखी न राघव-नारि-९-७५।
क्रि. स.
[हिं. पटकना]

पटकि
झुकाकर।
उ.- ज्यों कुजुवारि रस बिंघि हारि गथु सोचतु पटकि चिती-१० -१०३।
क्रि. स.
[हिं. पटकना]

पटके
झटका देकर गिराये, पटक-पटक कर मारे।
उ.- कंस सौंह दै पूछिये जिन पटके सात-११३७।
क्रि. स.
[हिं. पटकना]

पटक्यो
दे मारा, जोर से गिराया।
उ.- पटक्यो भूमि फेरि नहिं मटक्यो लीन्हें दंत उपारी-२५९४।
क्रि. स.
[हिं. पटकना]

पटच्चर
पुराना वस्त्र या कपड़ा।
संज्ञा
[सं.]

पटड़ा
पटरा।
संज्ञा
[हिं. पटरा]

पटड़ी
पटरी।
संज्ञा
[हिं. पटरा]

पटतर
समता, तुलना, बराबरी, समानता।
उ.- केसर-तिलक-रेख अति सोहै। ताकी पटतर कौं जग को है-३-१३।
संज्ञा
[सं. पट्ट=पटरी + तल=पटरी के समान चौरस=बराबर]

पटतर
उपमा, सादृश्य।
उ.-ग्रीवकर परसि पग पीठि तापर दियो उर्बसी रूप पटतरहिं दीन्ही-२५८८।
संज्ञा
[सं. पट्ट=पटरी + तल=पटरी के समान चौरस=बराबर]

पटतर
तुल्य, सदृश, बराबर।
उ.- खंजन मीन मृगज चपलाई नहिं पटतर एक सैन-१३४९।
वि.

पटतर
चौरस, समतल।
वि.

पटतरना
उपमा देना।
क्रि. अ.
[हिं. पटतर]

पटतारना
वार करने के लिए भाले आदि को सँभालना।
क्रि. स.
[हिं. पटा + तारना]

पटतारना
जमीन चौरस करना।
क्रि. स.
[हिं. पटतर]

पटतारा
वार करने को हथियार सँभाला।
उ.- रथ तैं उतरि, केस गहि राजा, कियौ खड़ग पटतारा-१०-४।
क्रि. स.
[हिं. पटतारना]

पटताल
मृदंग का एक ताल।
संज्ञा
[सं. पट्ट + ताल]

पटधारी
जो कपड़ा पहने हो।
वि.
[सं.]

पटधारी
तोशाखाने का अधिकारी।
संज्ञा

पटना
गडढे आदि का भरना।
क्रि. अ.
[हिं. पट]

पटना
खूब भर जाना।
क्रि. अ.
[हिं. पट]

पटना
खुली जगह पर छत बनना।
क्रि. अ.
[हिं. पट]

पटना
विचार या मन मिलना।
क्रि. अ.
[हिं. पट]

पटना
सौदा तय हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. पट]

पटना
(ऋण) चुकता होना।
क्रि. अ.
[हिं. पट]

पटपट
‘पट’ शब्द होना।
संज्ञा
[अनु. पट]

पटपट
‘पट’ ध्वनि करता हुआ।
क्रि. वि.

पटपटात
पटपटाकर, ‘पटपट’ की ध्वनि करके।
उ.- जबहिं स्याम तन अति बिस्तार्यौ। पटपटात टूटत अँग जान्यौ, सरन-सरन सु पुकारयौ-५५६।
क्रि. अ.
[हिं. पटपटाना (अनु.)]

पटपटाना
बुरा हाल होना।
क्रि. अ.
[हिं. पटकना]

पटपटाना
‘पटपट’ ध्वनि होना।
क्रि. अ.
[हिं. पटकना]

पटपटाना
शोक करना।
क्रि. अ.
[हिं. पटकना]

पटपटाना
‘पटपट’ शब्द उत्पन्न करना।
क्रि. स.

पटपर
चौरस, समतल।
वि.
[हिं. पट + पर]

पटबीजना
जुगन्, खद्योत।
संज्ञा
[हिं. पट + बिजु]

पटरा
काठ का सलोतर तख्ता।
संज्ञा
[सं. पटल]

पटरा
पटरा कर देना- (१) मार-काटकर बिछा देना। (२) चौपट या तबाह कर देना। पटरा होना- नष्ट हो जाना।
मु.

पटरानि, पटरानी
मुख्य रानी जो सिंहासन पर बैठने की अधिकारिणी हो।
उ.- जा रानी कौं तू यह दैहै। ता रानी सैंती सुत ह्वैहे। पटरानी कौं सो नुप दियौ-६-५।
संज्ञा
[सं. पट्ट + रानी]

पटरी
काठ का छोटा सलोतर टुकड़ा।
संज्ञा
[हिं. पटरा]

पटरी
पटरी बैठना- मन मिलना, मित्रता होना।
मु.

पटरी
लिखने की पाटी।
संज्ञा
[हिं. पटरा]

पटरी
सुनहरे-रूपहले तारों का फीता।
संज्ञा
[हिं. पटरा]

पटरी
चौड़ी चूड़ी।
संज्ञा
[हिं. पटरा]

पटरी
चौकी, ताबीज।
संज्ञा
[हिं. पटरा]

पटल
छान, छप्पर।
संज्ञा
[सं.]

पटल
पर्दा।
संज्ञा
[सं.]

पटल
तह, परत।
संज्ञा
[सं.]

पटल
लकड़ी का चौरस टुकड़ा।
संज्ञा
[सं.]

पटल
टीका।
संज्ञा
[सं.]

पटल
समूह, ढेर।
संज्ञा
[सं.]

पटली
पटरी।
उ.- पटली बिन बिद्रुम लगे हीरा लाल खचावनो-२२८०।
संज्ञा
[हिं. पटरो]

पटका
रेशम या सूत के फुँदने आदि गूँथने वाला, पटहार।
संज्ञा
[सं. पाट]

पटवाद्य
एक तरह का बाजा।
संज्ञा
[सं.]

निरखना
देखना, ताकना।
क्रि. स.
[सं. निरीक्षण]

निरखनि
देखने की क्रिया या भाव।
उ.- सुंदर बदन तडाग रूपजल निरखनि पुट भरि पीवत- पृ. ३३५ (४६)।
संज्ञा
[हिं. निरखना]

निरखि
देखकर, देखदेख।
उ.- (क) इतनी सुनत कुंति उठि धाई, बरषत लोचन नीर।¨¨¨। त्यागति प्रान निरखि सायक धनु, गति-मति-बिकल-सरीर - १-२९। (ख) सुंदर बदन री सुख सदन स्याम के निरखि नैन-मन थाक्यो - २५४६।
क्रि. स.
[हिं. निरखना]

निरखो, निरखौ
देखो, निहारो।
उ.- बिछुरन भेंट देहु ठाढ़े ह्वै निरखो घोष जन्म को खेरो - २५३२।
क्रि. स.
[हिं. निरखना]

निरखो, निरखौ
सोचो, समझो, विचारो।
उ.- यह भावी कछु और काज है, को जो याकौ मेटनहारौ। याकौ कहा परेखौ-निरखौ, मधु-छीलर, सरितापति खारौ - ९-३६।
क्रि. स.
[हिं. निरखना]

निरग
राजा नृग।
संज्ञा
[सं. नृग]

निरगुन
सत्व, रज और तम-निश्चय रूप से जो इन तीनों गुणों से परे हो।
उ.- बेद-उपनिषद जासु कौं निरगुनहिं बतावै। सोइ सगुन ह्वै नंद की दाँवरी बँधावै - १-४।
वि.
[सं. निर्गुण]

निरगुनिया, निरगुनी
जिसमें गुण न हो, जो गुणी न हो, अनाड़ी।
वि.
[सं. निर्गुण]

निरघात
नाश।
संज्ञा
(सं. निर्घात)

निरघात
आघात।
संज्ञा
(सं. निर्घात)

पटवाना
पाटने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. पटना]

पटवाना
सिंचवाना।
क्रि. स.
[हिं. पटना]

पटवाना
चुकता करा देना।
क्रि. स.
[हिं. पटना]

पटवाना
पीड़ा या कष्ट मिटाना।
क्रि. स.

पटवारी
जमीन के लगान का हिसाब रखनेवाला कर्मचारी।
संज्ञा
[सं. पट्ट + हिं. वार]

पटवारी
कपड़े पहनानेवाली दासी।
संज्ञा
[सं. पट + वारी]

पटबास
तंबू, खेमा।
संज्ञा
[सं.]

पटबास
वस्त्र को सुगंधित करनेवाली वस्तु।
संज्ञा
[सं.]

पटबास
लहँगा।
संज्ञा
[सं.]

पटह
नगाड़ा।
उ.- डिमडिमी पटह ढोल डफ बीना मृदंग उपंग चंग तार-२४४६।
संज्ञा
[सं.]

पटाक्षेप
घटना की समाप्ति।
संज्ञा
[सं.]

पटाना
पाटने का काम कराना।
क्रि. स.
[हिं. पट]

पटाना
छत आदि बनवाना।
क्रि. स.
[हिं. पट]

पटाना
ऋण अदा करना।
क्रि. स.
[हिं. पट]

पटाना
मूल्य तय करना।
क्रि. स.
[हिं. पट]

पटाना
शांत होकर बैठ रहना।
क्रि. अ.

पटापट
‘पटपट’ ध्वनि के साथ।
क्रि. वि.
[अनु.]

पटापटी
चित्र-विचित्र वस्तु।
संज्ञा
[अनु.]

पटाव
पाटने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. पाटना]

पटाव
पटा हुआ स्थान।
संज्ञा
[हिं. पाटना]

पटह
बड़ा ढोल।
संज्ञा
[सं.]

पटा
लोहे की लंबी पट्टी जिससे तलवार के वार की काट सीखी जाती है।
संज्ञा
[सं. पट]

पटा
पीढ़ा, पटरा।
संज्ञा
[सं. पट्ट]

पटा
पटाफेर- विवाह की एक रीति जिसमें वर-वधू के आसन बदल दिये जाते हैं। पटा बँधाना- पटरानी बनाना। उ.- चौदह सहस तिया मैं तोकौं पटा बँधाऊँ आजु-९-७९।
मु.

पटा
सनद, अधिकारपत्र, पट्टा।
संज्ञा
[सं. पट्ट]

पटा
लेन-देन, सौदा।
संज्ञा
[हिं. पटना]

पटाक
छोटी चीज के गिरने का शब्द।
[अनु.]

पटाका, पटाखा
पट या पटाक शब्द।
संज्ञा
[हिं. पट]

पटाका, पटाखा
एक तरह की आतिशवाजी।
संज्ञा
[हिं. पट]

पटाक्षेप
नाटक में दृश्य की समाप्ति पर गिरनेवाला परदा।
संज्ञा
[सं.]

पटिआ, पटिया
चपटा और चौरस पत्थर।
संज्ञा
[सं. पटि्टका]

पटिआ, पटिया
खाट या पलँग की पाटी।
संज्ञा
[सं. पटि्टका]

पटिआ, पटिया
माँग-पट्टी।
उ.- (क) मुंडली पटिया पारि सँवारै कोढ़ी लावै केसरि-३०२६। (ख) वे मोरे सिर पटिया पारैं कंथा काहि उढ़ाऊँ-३४६६।
संज्ञा
[सं. पटि्टका]

पटिआ, पटिया
लिखने की पट्टी, तख्ती।
संज्ञा
[सं. पटि्टका]

पटी
पट्टी, कपड़े की धज्जी जो घाव या अन्य किसी स्थान पर बाँधी जाय।
उ.- अपनी रूचि जित ही जित ऐंचति इंद्रिय-कर्म-गटी। हौं तित ही उठि चलति कपटि लगि बाँधे नैनपटी-१-९८।
संज्ञा
[हिं. पट्टी]

पटी
पटका, कमरबंद।
संज्ञा
[हिं. पट्टी]

पटी
परदा।
संज्ञा
[हिं. पट्टी]

पटी
नाटक का परदा।
संज्ञा
[हिं. पट्टी]

पटी
लिखने की पट्टी, तख्ती।
उ.- यह चतुराई अधिकाई कहाँ पाई स्याम वाके प्रेम की गढ़ि पढ़े हौ पटी-२००८।
संज्ञा
[हिं. पट्टी]

पटीर
चंदन।
संज्ञा
[सं.]

पटीर
वटवृक्ष।
संज्ञा
[सं.]

पटीलना
समझा-बुझाकर अपने ढंग पर लाना।
क्रि. अ.
[हिं. पटाना]

पटीलना
प्राप्त करना।
क्रि. अ.
[हिं. पटाना]

पटीलना
ठगना।
क्रि. अ.
[हिं. पटाना]

पटीलना
मारना-पीटना।
क्रि. अ.
[हिं. पटाना]

पटीलना
नीचा दिखाना।
क्रि. अ.
[हिं. पटाना]

पटीलना
पूर्ण या समाप्त करना।
क्रि. अ.
[हिं. पटाना]

पटु
चतुर।
वि.
[सं.]

पटु
कुशल।
वि.
[सं.]

पटु
छली-फरेबी।
वि.
[सं.]

पटु
निष्ठुर।
वि.
[सं.]

पटु
सुंदर।
वि.
[सं.]

पटुआ
पटसन।
संज्ञा
[सं. पाट]

पटुआ
पटुहार।
संज्ञा
[सं. पाट]

पटुका
कमरबंद।
संज्ञा
[सं. पटिका]

पटुका
चादर।
संज्ञा
[सं. पटिका]

पटुता
दक्षता।
संज्ञा
[सं.]

पटुता
चालाकी।
संज्ञा
[सं.]

पटुली
झूला झूलने की पटरी।
उ.- पटुली लगे नग नाग बहुरंग बनी डांडी चारि-२२७८।
संज्ञा
[सं. पट्ट]

पटुली
चौकी।
संज्ञा
[सं. पट्ट]

पटौनी
पटने का भाव या कार्य।
संज्ञा
[हिं. पटना]

पट्ट
पटरा, पाटा।
संज्ञा
[सं.]

पट्ट
पट्टी। तख्ती।
संज्ञा
[सं.]

पट्ट
किसी वस्तु या धातु की चिपटी पट्टी।
संज्ञा
[सं.]

पट्ट
कपड़े की धज्जी।
संज्ञा
[सं.]

पट्ट
मुख्य, प्रधान।
वि.
[सं.]

पट्टदेवी
पटरानी।
संज्ञा
[सं.]

पट्टन
बड़ा नगर।
संज्ञा
[सं.]

पट्टमहिषी
पटरानी।
संज्ञा
[सं.]

पट्टराज्ञी
पटरानी।
संज्ञा
[सं.]

पट्टा
अधिकार पत्र।
संज्ञा
[सं.]

पट्टा
चमड़े की धज्जी या पट्टी
संज्ञा
[सं.]

पट्टा
हाथ का एक गहना।
संज्ञा
[सं.]

पट्टी
तख्ती, पटिया।
संज्ञा
[सं. पट्टिका]

पट्टी
उपदेश।
संज्ञा
[सं. पट्टिका]

पट्टी
भुलावा।
संज्ञा
[सं. पट्टिका]

पट्टी
धातु, कागज या कपड़े की धज्जी।
संज्ञा
[सं. पट्टिका]

पट्टी
एक मिठाई।
संज्ञा
[सं. पट्टिका]

पट्टी
पंक्ति, कतार।
संज्ञा
[सं. पट्टिका]

पट्टी
माँग के दोनों ओर की पटियाँ।
संज्ञा
[सं. पट्टिका]

पटूका
दुपट्टा, कमरबंद।
संज्ञा
[हिं. पटका]

पटेबाज
पटा खेलनेवाला।
संज्ञा
[हिं. पटा + फ़ा. बाज]

पटेल
चौधरी, मुखिया।
संज्ञा
[हिं.] पट्टा + वाला]

पटेलना
पटीलना।
क्रि. स.
[हिं. पटीलना]

पटोर
रेशमी वस्त्र।
संज्ञा
[सं. पटोल]

पटोरी
रेशमी साड़ी।
उ.- (क) अंग मरगजी पटोरी राजति छबि निरखत रीझत ठाढ़े हरि-१२३२। (ख) जाइ श्रीदामा लै आवत तब दै मानिनि बहु भाँति पटोरी-२४४५।
संज्ञा
[सं. पाट + ओरी (प्रत्य.)]

पटोल
रेशमी कपड़ा।
संज्ञा
[सं.]

पटोलक
सीपी, सुक्ति।
संज्ञा
[सं.]

पटोलै
रेशमी वस्त्र से।
उ.- जाकैं मीत नंदनंदन सें, ढकि लइ पीत पटोलै। सूरदास ताकौ डर काकौ, हरि गिरिधर के ओलै-१-२५६।
संज्ञा
[सं. पटोल]

पटौनी
मल्लाह, माँझी।
संज्ञा
[देश.]

पठाईं
भेजीं, भेज दीं।
उ.- मनु रघुपति भयभीत सिंधु पत्नी प्यौसार पठाई-९-१२४।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठाई
भेजीं, पहुँचा दीं।
उ.-बकी कपट करि मारन आई, सो हरि जू बैकुंठ पठाई-१-३।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठाए
भेजे।
उ.-सहस संकट भरि ब्याल पठाए-५८६।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठान
एक मुसलमान जाति।
संज्ञा
[पश्तो पुख्ताना ]

पठाना
भेजना।
क्रि. स.
[सं. प्रस्थान, प्रा.पट्ठान]

पठानिन, पठानी
पठान स्त्री।
संज्ञा
[हिं. पठान]

पठायौ
भेजा, प्रस्थान कराया।
उ.- सो छलि बाँधि पताल पठायौ, कौन कृपानिधि धर्मा-१-१०४।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठावत
भेजते हो।
उ.- काके पति-सुत-मोह कौन को घर है, कहाँ पउवत- पृ. ३४१ (७)।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठावन, पठावनो
दूत, संदेशवाहक।
उ.- मनौ सुरपुर तेहि सुरपति पठइ दियौ पठावनो-२२८०।
संज्ञा
[हिं. पठाना]

पठावनि, पठावनी
कोई वस्तु या संदेश भेजने का भाव।
संज्ञा
[हिं. पठाना]

निरचू
जिसे छुट्टी मिल गयी हो।
वि.
(सं. निश्चित)

निरच्छ
बिना आँख का, अंधा।
वि.
[सं. निरक्षि]

निरच्छर
अपढ़, मूर्ख।
वि.
[सं. निरक्षर]

निरजल
जिसमें जल न हो।
वि.
[सं. निर्जल]

निरजल
जिस (व्रत आदि) में जल न ग्रहण किया जाय।
वि.
[सं. निर्जल]

निरजीव
जीवरहित, मृतक, प्राणहीन।
उ.- (क) कंस, केसि, चानूर, महाबल करि निरजीव जमुन-जल बोयौ - १-५४। (ख) पटक्यो सिला खरिक के आगे छिन निरजीव करायो-सारा. ४२९।
वि.
[सं. निर्जीव]

निरजीव
अशक्त, उत्साहहीन।
वि.
[सं. निर्जीव]

निरझर
झरना।
संज्ञा
[सं. निर्झर]

निरझरनी
नदी।
संज्ञा
[सं. निर्झरिणी]

निरझरी
पहाड़ी नदी।
संज्ञा
[सं. निर्झरी]

पट्टी
भाग, हिस्सा।
संज्ञा
[सं. पट्टिका]

पट्टू
एक मोटा ऊनी कपड़ा।
संज्ञा
[हिं. पट्टी]

पट्ठमान
पढ़ने योग्य।
वि.
[सं. पठ्यमान]

पट्ठा
जवान, तरूण।
संज्ञा
[सं. पुष्ट, प्रा. पुट्ठ]

पट्ठा
सिखाया हुआ नया कुश्तीबाज।
संज्ञा
[सं. पुष्ट, प्रा. पुट्ठ]

पट्ठा
सुनहरा-रूपहला गोटा।
संज्ञा
[सं. पुष्ट, प्रा. पुट्ठ]

पठई
भेजी, पठाई।
उ.- (क) घर पठई प्यारी अंकम भरि-१२३२। (ख) अतिहिं निठुर पतियाँ नहिं पठई काहू हाथ सँदेस-२७५३।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठए
भेजे।
उ.- मेरी देह छुटत जम पठए जितक दूत घर मौं-१-१५१।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठक
पढ़नेवाला।
संज्ञा
[सं.]

पठन
पढ़ना, पढ़ने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

पठनीय
पढ़ने योग्य।
वि.
[सं.]

पठनेटा
पठान का बेटा।
संज्ञा
[हिं. पठान + एटा]

पठयौ
पठाया, भेजा।
उ.- (क) परतिज्ञा राखी मन-मोहन, फिरि तापैं पठयौ-१-३८। (ख) दुरबास दुरजोधन पठयौ पांडव-अहित बिचारी-१-१२२।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठवत
भेजते हैं।
उ.- काहे को लिखि पठवत कागर-२९८०।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठवन
भेजना, पठावा।
उ.- कहत पठवन बदरिका मोहिं, गूढ़ ज्ञान सिखाइ-३-३।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठवना
भेजना, पठाना।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठवहु
भेजो, प्रस्थान कराओ, पठाओ।
उ.- मेरी बेर क्यों रहे सोचि? काटि कै अघ-फाँस पठवहु, ज्यौं दियौ गज मोचि-१-१९९।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठबाना
भिजवाना।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठवै
भेजेगा, पठावेगा।
उ.- कंसहिं कमल पठाइहै, काली पठवै दीप-५८९।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठाइहै
भेजेगा, पठावेगा।
उ.- कंसहिं कमल पठाइहै, काली पठवै दीप-५८९।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पड़ना
गिरकर या उछलकर पहुँचना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
(घटना) घटित होना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
बिछाया या फैलाया जाना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
छोड़ा या डाला जाना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
बीच में दखल देना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
ठहरना, टिकना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
आराम करना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
बीमार होना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
प्राप्त होना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
आमदनी होना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
मार्ग म मिलना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
पैदा होना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
स्थित होना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
प्रसंग में आना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
जाँच में ठहरना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
बदल जाना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़ना
होना।
क्रि. अ.
[सं. पतन, प्रा. पडन]

पड़पड़
पड़' का शव्द होना।
संज्ञा
[अनु.]

पड़पड़ाना
पड़-पड़' होना।
क्रि. स.
[अनु.]

पड़वा
चाँद मास के प्रत्येक पक्ष की पहली तिथि।
संज्ञा
[सं. प्रतिपदा, प्रा. पड़िवआ]

पठावनि, पठावनी
वह वस्तु जो भेजी जाय।
संज्ञा
[हिं. पठाना]

पठित
पढ़ा हुआ (ग्रंथ)।
वि.
[सं.]

पठित
शिक्षित।
वि.
[सं.]

पठै
भेजकर।
उ.- कान्हहिं पठै, महरि कौं कहति है पाइनि परि-७५२।
क्रि. स.
[हिं. पठाना]

पठौनी
कोई वस्तु या संदेश भेजना।
संज्ञा
[हिं. पठाना]

पठौनी
किसी के भेजने से जाना।
संज्ञा
[हिं. पठाना]

पड़ता
लागत, कीमत।
संज्ञा
[हिं. पड़ना]

पड़ताल
देख-भाल, जाँच।
संज्ञा
[सं. परितोलन]

पड़तालना
छानबील करना।
क्रि. स.
[हिं. पड़ताल]

पड़ती
बिना जुती भूमि।
संज्ञा
[हिं. पड़ना]

पढ़ना
नया सबक लेना।
क्रि. स.
[सं. पठन]

पढ़वाना
बँचवाना।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ना]

पढ़वाना
शिक्षा दिलाना।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ना]

पढ़वैया
पढ़नेवाला, शिक्षार्थी।
वि.
[हिं. पढ़ना]

पढ़ाई
पठन, अध्ययन।
संज्ञा
[हिं. पढ़ना + आई]

पढ़ाई
पढ़ने का भाव।
संज्ञा
[हिं. पढ़ना + आई]

पढ़ाई
धन जो पढ़ने के बदले में दिया जाय।
संज्ञा
[हिं. पढ़ना + आई]

पढ़ाई
अध्यापन।
संज्ञा
[हिं. पढ़ाना + आई]

पढ़ाई
पढ़ने का भाव।
संज्ञा
[हिं. पढ़ाना + आई]

पढ़ाई
पढ़ान की रीति।
संज्ञा
[हिं. पढ़ाना + आई]

पड़ाना
गिराना, झुकाना।
क्रि. स.
[हिं. पड़ना]

पड़ाव
यात्री के ठहरने का भाव।
संज्ञा
[हिं. पड़ना + आव]

पड़ाव
वह स्थान जहाँ यात्री ठहरते हों, चट्टी टिकान।
संज्ञा
[हिं. पड़ना + आव]

पड़ोस
आसपास का घर या स्थान।
संज्ञा
[सं. प्रतिवेश या प्रतिवास, प्रा. पड़िबेस, पड़िवास]

पड़ोसी
जो पड़ोस में रहता हो।
संज्ञा
[हिं. पड़ोस]

पढ़ंत
पढ़ने का भाव।
संज्ञा
[हिं. पढ़ना]

पढ़ना
लिखा हुआ बाँचना।
क्रि. स.
[सं. पठन]

पढ़ना
उच्चारण करना।
क्रि. स.
[सं. पठन]

पढ़ना
रटना।
क्रि. स.
[सं. पठन]

पढ़ना
मंत्र फूँकना।
क्रि. स.
[सं. पठन]

पढ़ाई
धन जो पढ़ाने के बदले में दिया जाय।
संज्ञा
[हिं. पढ़ाना + आई]

पढ़ाऊँ
सिखाता हूँ, शिक्षा देता हूँ।
उ.-सूर सकल षट दरसन वै, हौं बारहखरी पढ़ाऊँ-३४६६।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ाना]

पढ़ाना
शिक्षा देना, अध्यापन करना।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ना]

पढ़ाना
कोई कला या गुन सिखाना।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ना]

पढ़ाना
पक्षियों को मनुष्य की भाषा सिखाना।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ना]

पढ़ाना
समझाना।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ना]

पढ़ायो, पढ़ायौ
गुन सिखाया।
उ.-(क) नंद धरनि सुत भलौ पढ़ायौ-१०-३४०। (ख) भलौ काम हैं सुतहिं पढ़ायौ-३९१। (ग) बारे ते जेहि यहै पढ़ायो बुधि-बल-कल बिधि चोरी।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ाना]

पढ़ावत
पढ़ाती है, पढ़ाती हुई
उ.-(क) कीर पढ़ावत गनिका तारी, ब्याध परम पद पायौ-१-६७। (ख) सुवा पढ़ावत, जीभ लड़ावति, ताहि बिमान पठौ-१-१८८। (ग) चातक मोर चकोर बदत पिक मनहुँ मदन चटसार पढ़ावत-१०-३०५।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ाना]

पढ़ावै
शिक्षा देती है, अध्यापन करती है।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ाना (प्रे.)]

पढ़ावै
पक्षियों को बोलना सिखाती हें।
(क) गनिका किए कौन ब्रत-संजम, सुकहित नाम पढ़ावै-१-१२२। (ख) आपन ही रँग रगी साँवरी सुक ज्यौं बैठि पढ़ावै-३०८८।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ाना (प्रे.)]

पढ़ौ
पढ़ो, रटो।
उ.-पढ़ौ भाई राम-मुकुंद-मुरारि-७-३।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ना]

पण
जूआ, द्यूत।
संज्ञा
[सं.]

पण
प्रतिज्ञा, शर्त।
संज्ञा
[सं.]

पण
मोल, कीमत।
संज्ञा
[सं.]

पण
शुल्क।
संज्ञा
[सं.]

पण
धन-संपत्ति।
संज्ञा
[सं.]

पण
व्यापार।
संज्ञा
[सं.]

पण
स्तुति, प्रशंसा।
संज्ञा
[सं.]

पणबंध
शर्त या बाजी लगाना।
संज्ञा
[सं.]

पणव
छोटा ढोल या नगाड़ा।
उ.-गर्जनि पणव निसान संख रव हय गय हींस चिकार-१० उ.-२।
संज्ञा
[सं.]

पढ़ि
सीख समझ कर।
उ.- मोहन-मुर्छन-बसीकरन पढ़ि अगमति देह बढ़ाऊँ-१०-४९।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ना]

पढ़ि
मंत्रादि उच्चारण करके या फूँककर।
उ.-जसुमति मन-मन यहै बिचारति। झझकि उठयौ सोवत हरि अबहीं कछु पढ़ि-पढ़ि तन-दोष निवारति-१०-२००।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ना]

पढ़ि
पढ़कर, शिक्षा प्रहण करके।
उ.-कुबिजा सों पढ़ि तुमहिं पठाए नागर नवल हरी-३३७०।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ना]

पढ़िवे
पढ़ना।
संज्ञा
[हिं. पढ़ना]

पढ़िवे
उच्चारण करने की क्रिया कहना।
उ.-जब तें रसना राम कह्यौ। मानौ धर्म साधि सब बैठयौ, पढ़िबे मैं धौं कहा रह्यौ-२-८।
संज्ञा
[हिं. पढ़ना]

पढ़ीं
उच्चारित कीं।
उ.-(द्विजनि अनेक ) हरषि असीस पढ़ीं-१०-१४।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ना]

पढ़ी
सीखी, समझी।
उ.-(क) जेहि गोपाल मेरे बस होते विद्या न पढ़ी-२७९४। (ख) तैं अलि कहा पढ़ी यह नीति-३२७०।
क्रि. स.
[हिं. पढ़ना]

पढ़ेलना
धकेलता, ठुकराना।
क्रि. स.
[हिं. धकेलना]

पढ़ैया
पढ़नेवाला पाठक।
वि.
[हिं. पढ़ना]

पढ़ैला, पढ़ैलौ
ठुकराया हुआ।
उ.-चुगुल, ज्वारि, निर्दय, अपराधी, झूटौ, खोटौ-खूटा। लोमी, लौंद, मुकरवा, झगरू, बड़ौ पढ़ैलौ, लूटा-१-१८५।
वि.
[हिं. पढ़ेलना]

निरत
किसी काम में लीन।
वि.
[सं.]

निरत
नाच, नृत्य।
संज्ञा
[सं. नृत्य]

निरतत
नाचता है, नृत्य करते हैं।
उ.- (क) कोउ निरतत कोउ उघटि तार दै, जुरी ब्रज-बालक-सेनु - ४४८। (ख) सूर स्याम काली पर निरतत, आवत हैं ब्रज ओक - ५६५।
क्रि. अ.
[सं. नर्त्तन]

निरतना
नाचना, नृत्य करना।
क्रि. स.
[सं. नर्त्तन]

निरति
बहुत अधिक प्रीति या रति।
संज्ञा
[सं.]

निरति
लीनता, लिप्तता।
संज्ञा
[सं.]

निरदइ, निरदई
दयाहीन, निष्ठुर।
उ.- (क) उलटे भुज बाँधि तिन्हैं लकुट लिए डाँटै। नैकहुँ न थकत पानि, निरदई अहीरी-३४८। (ख) है निरदई, दया कछु नाहीं-३६१। (ग) को निरदई रहै तेरैं घर-३६८।
वि.
[सं. निर्दय]

निरदय, निरदै
दयारहित, निष्ठुर।
उ.- (क) लघु अपराध देखि बहु सोचति, निरदय हृदय बज सम तोर-३५७। (ख) सब निरदैं सुर असुर सैंल सखि सायर सर्प समेत-२८५९।
वि.
[सं. निर्दय]

निरदोष, निरदोषी
जो दोषी न हो।
वि.
(सं. निर्दोष)

निरधन
धनहीन, दरिद्र।
उ.- सोइ निरधन, सोइ कृपन दीन हैं, जिन मम चरन बिसारे-१-२४२।
वि.
[सं. निर्धन]

पणी
क्रय-विक्रय करनेवाला।
संज्ञा
[सं. पणिन्]

पण्य
खरीदने-बेचने योग्य।
वि.
[सं.]

पण्य
सौदा।
संज्ञा

पण्य
व्यापार।
संज्ञा

पण्य
बाजार।
संज्ञा

पण्य
दूकान।
संज्ञा

पतंग
पक्षी।
संज्ञा
[सं.]

पतंग
शलभ।
उ.-दीपक पीर न जानई (रे) पावक परत पतंग -१-३२५।
संज्ञा
[सं.]

पतंग
सूर्य।
संज्ञा
[सं.]

पतंग
चिनगारी
संज्ञा
[सं.]

पतंग
चंद, गुड्डी।
संज्ञा
[सं.]

पतंगा
शलभ।
संज्ञा
[सं. पतंग]

पतंगा
चिनगारी
संज्ञा
[सं. पतंग]

पतंगेद्र
पक्षिराज गरुड़।
संज्ञा
[सं.]

पतंजलि
योगशास्त्र' के रचयिता एक ऋषि।
संज्ञा
[सं.]

पतंजलि
महाभाष्य' के रचयिता एक मुनि।
संज्ञा
[सं.]

पत
पति।
संज्ञा
[सं. पति]

पत
स्वामी।
संज्ञा
[सं. पति]

पत
लच्चा।
संज्ञा
[सं. प्रतिष्ठा]

पत
प्रतिष्ठा।
संज्ञा
[सं. प्रतिष्ठा]

पत
पत उतारना (लेना)- बेइज्जती करना। पत रखना- इज्जत बचाना।
मु.

पतखोवन
मान की रक्षा न कर सकने वाला।
वि.
[हिं. पत + खोना]

पतझड़, पतझर, पतझल, पतझाड़, पतझार
वह ऋतु जिसमें वृक्षों की पत्तियाँ झड़ जाती हैं।
संज्ञा
[हिं. पत = पत्ता + झड़ना]

पतझड़, पतझर, पतझल, पतझाड़, पतझार
अवनतिकाल।
संज्ञा
[हिं. पत = पत्ता + झड़ना]

पतझड़ना, पतझरना
वृक्षों के पत्ते झड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. पत्ता + झड़ना]

पतझरै
पत्ते गिरते हैं, पतझड़ होता है।
उ.-तरुवर फूलै, फरै, पतझरै, अपनें कालहिं पाइ-१-२६५।
क्रि. अ.
[हिं. पतझड़]

पतन
गिरने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

पतन
बैठना, डूवना।
संज्ञा
[सं.]

पतन
अवनति।
संज्ञा
[सं.]

पतन
नाश।
संज्ञा
[सं.]

पतन
पाप।
संज्ञा
[सं.]

पतना
गिरना।
क्रि. अ.
[सं. पतन]

पतनोन्मुख
जो पतन की ओर बढ़ पहा हो।
वि.
[सं.]

पतबरा
पतले-पतले 'बड़े' (एक व्यजन या खाद्य)।
उ.-मूँग-पकौरा, पनौ पतबरा। इक कोरे, इक भिजे गुरबरा-१०-३९६।
संज्ञा
[हिं. पतला + बड़ा]

पतर, पतरा
पत्ता।
वि.
[सं. पत्र]

पतर, पतरा
पत्तल।
वि.
[सं. पत्र]

पतर, पतरा, पतला
जो कम मोटा हो।
वि.
[हिं. पतला]

पतर, पतरा, पतला
दुबला, पतला, कृश।
वि.
[हिं. पतला]

पतर, पतरा, पतला
झीना।
वि.
[हिं. पतला]

पतर, पतरा, पतला
जो गाढ़ा न हो।
वि.
[हिं. पतला]

पतर, पतरा, पतला
निर्बल।
वि.
[हिं. पतला]

पतवर
पंक्तिक्रम से।
क्रि. वि.
[हिं. पाँती + वार]

पतवार, वतवारी, पतवाल
नाव का 'कर्ण' जिससे उसे मोड़ते और घुमाते हैं।
संज्ञा
[सं. पत्रबाल, पात्रपाल, प्रा. पात्रवाड़]

पता
स्थान परिचय।
संज्ञा
[सं. प्रत्यय, प्रा. पत्तय]

पता
खोज, सुराग, टोह।
संज्ञा
[सं. प्रत्यय, प्रा. पत्तय]

पता
जानकारी, खबर।
संज्ञा
[सं. प्रत्यय, प्रा. पत्तय]

पता
रहस्य, भेद।
संज्ञा
[सं. प्रत्यय, प्रा. पत्तय]

पताक, पताका
झंडा।
उ.-(क) पजरत, धुजा, पताक, छत्र, रथ, मानिमय कनक-अवास-९-८३। (ख) स्वेत छत्र फहरात सीस पर ध्वज पताक बहुबान -२३७७। (ग) पवन न पताका अंबर भई न रथ के अंग-२५४०।
संज्ञा
[सं. पताका]

पताक, पताका
डंडा जिसमें पताका पहनायी जाती है।
संज्ञा
[सं. पताका]

पताक, पताका
नाटक का वह स्थल जहाँ पात्र की चिंता आदि का समर्थन आगंतुक भाव से हो।
संज्ञा
[सं. पताका]

पति
मर्यादा प्रतिष्ठा, लज्जा, साख,
उ.-(क) रिपु कच गहत द्रुपद-तनया जब सरन-सरन कहि भाषी। बढ़ै दुकूल-कोट अंबर लौं, सभा-भाँझ पति राखी-१-२७। (ख) सभा-भाँझ द्रौपदि पति राख, पति पानिप कुल ताकौ-१-११३। (ग) हमहिं खिझाइ आपु पति खोवत यामैं कहा तुम पावहु-३२६६। (घ) ज्यों क्योंहूँ पति जात बड़े की मुख न देखावत लाजन-३९९।
संज्ञा
[सं.]

पतिआँ
चिटठी, पत्र।
उ.-जो पतिआँ हो तुम पठवत लिखि बीच समुझि सब पाउ-३४७२।
संज्ञा
[सं. पत्र]

पतिआइ
विश्वास करो, सत्यमानो।
उ.-सूरदास संपदा-आपदा जिनि कोऊ पतिआइ-१-२६५।
क्रि. स.
[हिं. पतियाना]

पतिआना
विश्वास करना।
क्रि. स.
[सं. प्रत्यय, प्रा. पत्तय + आना]

पतिआर, पतिआरो, पतिआरौ
विश्वास, साख।
उ.-कहा परदेसी को पतिआरो-२७३२।
संज्ञा
[हिं. पतिआना]

पतिघातिनी
पति की हत्या करनेवाली।
संज्ञा
[सं.]

पतिघातिनी
वैधव्य योगवाली स्त्री।
संज्ञा
[सं.]

पतित
समाज से वहिष्कृत, जातिच्युत।
उ.-जज्ञ-भाग नहिं लियौ हेत सौं रिषिपति पतित बिचारे-१-२५।
वि.
[सं.]

पतित
महापापी अतिपातकी।
उ.-(क) नंद-बरुन-बंधन-भय-मोचन सूर पतित सरनाई-१-२७। (ख) सूर पतित तुम पतित-उधारन, गहौ बिरद की लाज- १-१०२।
वि.
[सं.]

पतित
गिरा हुआ।
वि.
[सं.]

पताकिनी
सेना।
संज्ञा
[सं.]

पताकी
पताकाधारी।
संज्ञा
[सं. पताकन्]

पतार
पाताल।
संज्ञा
[सं. पताल]

पतार
जंगल।
संज्ञा
[सं. पताल]

पतारी
पाताल लीक।
उ.-सूरदास बलि सरबस दीन्हौ, पायौ राज पतारी-८-१४।
संज्ञा
[सं. पाताल]

पतारौ
पाताल लोक।
उ.-कहौ तौ सैना चारु रचौं कपि, धरनी-ब्योम पतारौ-९-१०८।
संज्ञा
[सं. पाताल]

पताल
पृथ्वी के नीचे के सात लोकों में से अंतिम जहाँ बलि को विष्णु ने भेजा था।
उ.-सो छलि बाँधि पताल पठायौ, कौन कृपाविधि, धर्मा-१-१०४।
संज्ञा
[सं. पाताल]

पतावर
सूखे हुए पते।
संज्ञा
[सं. पात्ता]

पति
किसी वस्तु का मालिक, स्वामी, अधिपति।
संज्ञा
[सं.]

पति
किसी स्त्री का विवाहित पुरुष, भर्ता, कांत।
उ.-देखहु हरि जसे पति आगम सजति सिंगार धनी। ३४६१।
संज्ञा
[सं.]

पतित
आचार या नीतिभ्रष्ट।
वि.
[सं.]

पतित
अधम, नीच।
वि.
[सं.]

पतित-उधारन
पतितों का उद्धार करनेवाला।
वि.
[सं. पतित + उधारना]

पतित-उधारन
ईश्वर।
संज्ञा

पतित-उधारन
ब्रह्म का अवतार।
संज्ञा

पतितता
पतित होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

पतितता
नीचता, अधमता।
संज्ञा
[सं.]

पतितता
अपवित्रता।
संज्ञा
[सं.]

पतितपावन
पतित को शुद्ध करनेवाला।
वि.
[सं.]

पतितपावन
ईश्वर।
संज्ञा

पतितपावन
ब्रह्म का अवतार।
संज्ञा

पतितेस
बड़ा पतित, पतितों में सबसे बढ़कर।
उ.-हरिहौं सब पतितनि-पतितेस-१-१४०।
वि.
[सं. पतित + ईश]

पतितै
पापी ही रहकर, पातकी ही रहकर।
उ.-हौं तौ पतित सात पीढ़िनि कौ, पतितै ह्वै निस्तरिहौं -१-१३४।
वि. सवि.
[सं. पतित]

पतिनी
विवाहिता स्त्री, पत्नी।
उ.-(क) गौतम की पतिनी तुम तारी, देव, दवानल कौं अँचयौ-१-२६। (ख) चरन-कमल परसत रिषि पतिनी, तजि पषान, पद पायौ- १-१८८।
संज्ञा
[सं. पत्नी ]

पतिबरत
पति में स्त्री की पूर्ण प्रीति और भक्ति।
उ.-सूर स्याम सों साँच पारिहौं यह पतिबरत सुनहु नँदनंदन-१२२०।
संज्ञा
[सं. पतिव्रत]

पतिया
चिटठी।
उ.-इतनी बिनती सुनहु हमारी बारक हूँ पतिया लिखि दीजै-२७२७।
संज्ञा
[हिं. पत्र]

पतियाई
विश्वास किया।
उ.-यह बानी बृषभानु-घरनि कही तब जसुमति पतियाई-७५६।
क्रि. स.
[हिं. पतियाना]

पतियाति
विश्वास करती है।
उ.-सूर मिली ढरि नंदनँदन को अनत नहीं पतियाति- पृ ३३७ (६५)।
क्रि. स.
[हिं. पतियाना]

पतियाना
विश्वास करना।
क्रि. स.
[सं. प्रत्यय + हिं. आना]

पतियानी
विश्वास किया।
उ.- कौन भाँति हरि को पतियानी-१० उ.-३७।
क्रि. स.
[हिं. पतियाना]

पतियार, पतियारा, पतियारो
विश्वास, यकीन।
उ.-(क) कहा परदेसी को पतियारो-२७३१। (ख) कुँवरि पतियारो तब कियो जब रथ देख्यो नैन-१०उ.-८।
संज्ञा
[हिं. पतियाना]

पतिव्रत
पति में अनन्य प्रीति।
संज्ञा
[सं.]

पतिव्रता
पति में अनन्य प्रीति रखनेवाली।
वि.
[सं.]

पती
पति।
संज्ञा
[सं. पति]

पती
स्वामी।
संज्ञा
[सं. पति]

पतीजत
विश्वास करता है।
उ.-ओढ़ियत है की डसिअत है कीधौं कहिअत कीधौं जु पतीजत-३३४१
क्रि. अ.
[हिं. पतीजना]

पतीजना
विश्वास करना, पतियाना।
क्रि. अ.
[हिं. प्रतीत + ना]

पतीजै
विश्वास करे, भरोसा करो।
उ.-(क) आवत देखि बान रघुपति के, तेरौ मन न पतीजै-९-१२६। (ख) तब देवकी दीन ह्वै भाष्यौ, नृप कौ नाहिं पतीजै। (ग) मनसा, बाचा, कहत कर्मना नृप कबहूँ न पतीजै-१०-९। (घ) तिनहिं न पतीजै री जे कृतहिं न मानैं-२६८९।
क्रि. अ.
[हिं. पतीजना]

पतीजौ
विश्वास करो, पतियाओ।
उ.-जसुमति कह्यौ अकेली हौं मैं तुमहुँ संग मोहिं दीजौ। सूर हँसतिं ब्रजनारि महरि सौं, ऐहैं साँच पतीजौ-८१३।
क्रि. अ.
[हिं. पतीजना]

पतीनना
विश्वास करना।
क्रि. स.
[हिं. प्रतीत + ना]

निरधातु
शक्तिहीन, निर्बल।
वि.
[सं. निर्धातु]

निरधार
निश्चय करने का कार्य।
संज्ञा
[सं. निर्धारण]

निरधार
निश्चित करने का भाव।
संज्ञा
[सं. निर्धारण]

निरधार
निश्चित, जो टल न सके।
उ.- सप्तम दिन मरिवौ निरधार-१-२९०।
वि.

निरधार
निश्चय ही।
उ.- कह्यौ, आइहैं हरि निरधार-१० उ.-३७।
वि.

निरधारना
निश्चय या स्थिर करना।
क्रि. स.
[सं. निर्धारण]

निरधारना
मन में समझना या धारण करना।
क्रि. स.
[सं. निर्धारण]

निरनउ
निर्णय।
संज्ञा
(सं. निर्णय)

निरनुनासिक
जिस वर्ण में अनुस्वार न हो।
वि.
[सं.]

निरनै
फैसला, निर्णय।
संज्ञा
(सं. निर्णय)

पत्ता
पत्ता खड़कना- (१) खटका या आहट होना। (२) आशंका होना। पत्ता तोड़कर भागना- तेजी से भागना। पत्ता न हिलना- जरा भी हवा न चलना। पत्ता हो जाना- तेजी से दौड़कर अदृश्य हो जाना।
मु.

पत्ता
कान का एक गहना।
संज्ञा
[सं. पत्र]

पत्ता
धातु का पत्तर।
संज्ञा
[सं. पत्र]

पत्ति
पैदल सिपाही।
संज्ञा
[सं.]

पत्ति
योद्धा।
संज्ञा
[सं.]

पत्ती
छोटा पत्ता।
संज्ञा
[हिं. पत्ता]

पत्ती
साझे का भाग।
संज्ञा
[हिं. पत्ता]

पत्ती
फूल की पंखुड़ी।
संज्ञा
[हिं. पत्ता]

पत्थर
पाषाण।
संज्ञा
[सं. प्रस्तर, प्रा. पत्थर]

पत्थर
पत्थर का कलेजा (दिल, हृदय)- जिसमें दया-ममता न हो। पत्थर की छाती- हिम्मती और मजबूत दिल वाला। पत्थर की लकीर- सदा बनी रहने बाजी चीज। पत्थर को (में) जोंक लगना- असंभव बात होना। पत्थर चटाना- पत्थर पर रगड़ कर तेज करना। पत्थर निचोड़ना- कंजूस से दान ले लेना। पत्थर पर दूब जमना- असंभव और अनहोनी बात होना। पत्थर पसीजना (पिघलना)- कठोर दिल वाले में दया-ममता आना। पत्थर सा खींच (फेंक) मारना- बहुत कड़ी बात कहना। पत्थर से सिर फोड़ना (मारना)- असंभव बात की सफलता का प्रयत्न करना।
मु.

पतीनी
विश्वास किया।
उ.-देवकी-गर्भ भई है कन्या, राइ न बात पतीनी-१०-४
क्रि. स.
[हिं. पतीनना]

पतीर
कतार, पाँती।
संज्ञा
[सं. पंक्ति]

पतीली
देगची।
संज्ञा
[सं. पातिली]

पतुकी
हाँड़ी।
संज्ञा
[सं. पातिली]

पतुरिया
वेश्या।
संज्ञा
[सं. पातिली]

पतुली
कलाई का एक गहना।
संज्ञा
[देश.]

पतैहै
विश्वास करेंगे।
उ.-दरसन ते धीरज जब रैहै तब हम तोहिं पतैहैं-१२७७।
क्रि. स.
[हिं. पतियाना]

पतूख, पतूखी पतोखी
पत्ते का दोना।
उ.-(क) बारक वह मुख आनि देखावहु दुहि पै पिवत पतूखी-३०२९। (ख) एक बेर बहुरौ ब्रज आवहु दूध पतूखी खाहु-३४३७।
संज्ञा
[हिं. पतोखा]

पतोखा
पत्ते का दोना।
संज्ञा
[हिं. पत्ता]

पतोह, पतोहू
बेटे की बहू, पुत्रवधू।
संज्ञा
[सं. पुत्रवधू, प्रा. पुत्रवहू]

पतौआ
पत्ता, पर्ण।
संज्ञा
[हिं. पत्ता]

पतौषी
पत्तों की दुनिया, छोटा दोना।
उ.-छीर समुद्र सयन संतत जिहिं, माँगत दूध पतौषी दै भरि-३९२।
संज्ञा
[हिं. पुं. पतोखा]

पत्त
पत्र, चिठठी।
उ.-अब हम लिखि पठयो चाहति हैं, उहाँ पत्र नहिं पैहैं-३४६०।
संज्ञा
[सं. पत्र]

पत्तन
नगर।
संज्ञा
[सं.]

पत्तन
मृजंग।
संज्ञा
[सं.]

पत्तर
धातु का चौरस टुकड़ा।
संज्ञा
[सं. पत्र]

पत्तल
पत्तों का बना पात्र जिसमें भोजन परसा जाता है।
संज्ञा
[हिं. पत्ता]

पत्तल
एक पत्तल के खानेवाले- (१) संबंधी। (२) धनिष्ठ मित्र। जिस पत्तल में खाना उसी में छेद करना- जिससे लाभ उठाना या जिसका अन्न खाना उसी को हानि पहुँचाना।
मु.

पत्तल
पत्तल में परसा हुआ भोजन।
संज्ञा
[हिं. पत्ता]

पत्ता
पत्र, पत्रक, पर्ण।
उ.-धरनि पत्ता गिरि परे तैं फिरि न लागै डार-१-८८।
संज्ञा
[सं. पत्र]

पत्थर
औला, इद्रोपल।
संज्ञा
[सं. प्रस्तर, प्रा. पत्थर]

पत्थर
पत्थर पड़ना- चौपट हो जाना। पत्थर पड़ जाय (पड़े)- चौपट हो जाय। पत्थर-पानी का समय- आंधी पानी का समय।
मु.

पत्थर
(हीरा, जवाहर आदि) रत्न।
संज्ञा
[सं. प्रस्तर, प्रा. पत्थर]

पत्थर
कुछ भी नहीं, व्यर्थ की चीज।
संज्ञा
[सं. प्रस्तर, प्रा. पत्थर]

पत्नी
विवाहिता स्त्री।
संज्ञा
[सं.]

पत्नीव्रत
पत्नी के प्रति पूर्ण प्रीति।
संज्ञा
[सं.]

पत्य
पति होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

पत्याउ
विश्वास करो, प्रतीति हो।
उ.-चारि भुज जिहिं चारि आयुध निरखि कै न पत्याउ-१०-५।
क्रि. स.
[हिं. पत्याना]

पत्याऊँ
विश्वास करूँ, सच मानूँ।
उ.-मोहिं अपनैं बाबा की सौहैं, कान्हहिं, अब न पत्याऊँ-३४५।
क्रि. स.
[हिं. पत्याना]

पत्याति
विश्वास करती हूँ।
उ.-(क) अब तुमको पिय मैं पत्याति हौं-१८७०। (ख) कहा कहत री मैं पत्याति नहिं-३००७।
क्रि. स.
[हिं. पत्याना]

पत्र
वृक्ष या बेल का पत्ता, पत्ती, दल, पर्ण।
उ.-(क) लाखागृह पांडवनि उबारे, साकपत्र मुख नाए-१-३१। (ख) साकपत्र लै सबै अघाए न्हात भजे कुस डारी-१-१२२। (ग) हरि कह्यौ, साग पत्र मोहिं अति प्रिय, अम्रित ता सम नाहीं-१-२४१।
संज्ञा
[सं.]

पत्र
वह वस्तु जिस पर कुछ लिखा जाय।
उ.-पुहुमि पत्र करि सिंधु मसानी गिरि मसि कौं लै डारैं-१-१८३।
संज्ञा
[सं.]

पत्र
वह कागज जिस पर दान प्रतिज्ञा आदि की बात लिखी हो।
संज्ञा
[सं.]

पत्र
वह लेख जिस पर किसी व्यवहार, घटना आदि का प्रामाणिक विवारण दिया हो
संज्ञा
[सं.]

पत्र
चिट्ठी, पत्र।
संज्ञा
[सं.]

पत्र
समाचारपत्र।
संज्ञा
[सं.]

पत्र
पृष्ठ सफा।
संज्ञा
[सं.]

पत्र
धातु का पत्तर।
संज्ञा
[सं.]

पत्र
तीर या पक्षा का पंख।
संज्ञा
[सं.]

पत्र-पुष्प
साधारण भेंट।
संज्ञा
[सं.]

पत्याना
विश्वास करना।
क्रि. स.
[हिं. पतियाना]

पत्यानी
विश्वास हुआ, प्रतीति की।
उ.-सूरस्याम संगति की महिमा काहू को नैंकहु न पत्यानी-१२८४।
क्रि. स.
[हिं. पत्याना]

पत्याने, पत्यान्यो, पत्यान्यौ
विश्वास किया।
उ.-(क) तुम देखत भोजन सब कीनो अब तुम मोहिं पत्याने-९१९। (ख) सूरदास प्रभु इनहिं पत्याने आखिर बड़े निकामी री -पृ. ३२३ (१९)। (ग) सूरदास तहाँ नैन बसाए और न कहूँ पत्यान्यो-१८५७।
क्रि. स.
[हिं. पत्याना]

पत्याहि
विश्वास करो।
उ.-जौन पत्याहि पूछि बलदाउहिं-५१०।
क्रि. स.
[हिं. पत्याना]

पत्याहु
विश्वास करो।
उ.-जौ न पत्याहु चलौ सँग जसुमति, देखौ नैन निहारि-१०-२९२।
क्रि. स.
[हिं. पत्याना]

पत्यारी
विश्वास, प्रतीति।
संज्ञा
[हिं. पतियारा]

पत्यारी
कतार, पाँती।
संज्ञा
[सं. पंक्ति]

पत्यैए
विश्वास कीजिए।
उ.-राँचेहु विरचे सुख नाहीं भूलि न कबहुँ पत्यैए-२२७५।
क्रि. स.
[हिं. पत्याना]

पत्यैहै
विश्वास करेगा।
उ.-सूरस्याम को कौन पत्यैहै कुटिल गात तनु कारे-३१६७।
क्रि. स.
[हिं. पत्याना]

पत्यैहौं
विश्वास करूँगी।
उ.-सुनि राधा, अब तोहिं न पत्यैहौं-१५५०।
क्रि. स.
[हिं. पत्याना]

पत्र-वाहक
पत्र ले जानेवाला।
संज्ञा
[सं.]

पत्रा
पचांग, जंत्री, तिथिपत्र।
संज्ञा
[सं. पत्र]

पत्रावलि, पत्रावली
पत्ते।
संज्ञा
[सं. पत्र + अवली]

पत्रावलि, पत्रावली
पत्तों की बनी पत्तल।
उ.-मिलि बेंठे सब जेंवन लागे, बहुत बने कहि पाक। अपनी पत्रावलि सब देखत, जहँ तहँ फेनि पिराक-४६४।
संज्ञा
[सं. पत्र + अवली]

पत्रावलि, पत्रावली
वे बेल-बूटें या रेखाएँ जो सजावट या शोभा-वृद्धि के लिए स्त्रियाँ माथे पर बना लेती हैं।
संज्ञा
[सं. पत्र + अवली]

पत्रिका
चिटठी, पत्र।
संज्ञा
[सं.]

पत्रिका
छोटा लेख।
संज्ञा
[सं.]

पत्रिका
सामयिक पत्र या पुस्तक।
संज्ञा
[सं.]

पत्री
चिटठी, पत्र।
उ.-स्याम कर पत्री लिखी बनाइ-२९२९।
संज्ञा
[सं.]

पत्री
जन्मपत्री।
संज्ञा
[सं.]

पथ
मार्ग रास्ता।
संज्ञा
[सं.]

पथ
रीति।
संज्ञा
[सं.]

पथगामी
पथिक।
संज्ञा
[सं. पथगामिन्]

पथचारी
पथिक।
संज्ञा
[सं. पथचारिन्]

पथदर्शक, पदप्रदर्शक
मार्ग बतानेवाला।
संज्ञा
[सं.]

पथरना
पत्थर पर रगड़कर तेज या पैना करना।
क्रि. स.
[हिं. पत्थर]

पथराना
पत्थर की तरह नीरस और कठीर होना।
क्रि. अ.
[हिं. पत्थर]

पथराना
स्तब्ध या जड़ हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. पत्थर]

पथरी
पत्थर का छोटा पात्र।
संज्ञा
[हिं. पत्थर]

पथरीला
जिसमें बहुत पत्थर हों।
वि.
[हिं. पत्थर]

पथरौटा
पत्थर का पात्र, कूँड़ी।
संज्ञा
[हिं. पत्थर]

पथिक
यात्री, राहगीर।
संज्ञा
[सं.]

पथी
यात्री, पथिक।
संज्ञा
[सं. पथिन्]

पथु
पथ, मार्ग।
संज्ञा
[सं.]

पथ्य
रोगी का हलका आहार।
संज्ञा
[सं.]

पद
काम।
संज्ञा
[सं.]

पद
स्थान, दर्जा।
उ.-ध्रवहिं अभै पद दियौ मुरारी-१-२८।
संज्ञा
[सं.]

पद
चिन्ह।
संज्ञा
[सं.]

पद
पैर।
संज्ञा
[सं.]

पद
शब्द।
संज्ञा
[सं.]

पदन्यास
पद-रचना।
संज्ञा
[सं.]

पदस
कमल।
संज्ञा
[सं. पद्म]

पदमनाभ
विष्णु।
संज्ञा
[सं. पद्मनाभ]

पदमाकर
तालाब।
संज्ञा
[सं. पद्माकर]

पदमासन
ब्रह्मा।
उ.-नाभि सरोज पगट पदमासन उतरि नाल पछितावै-१०-६५।
संज्ञा
[सं. पद्मासन]

पदमूल
पैर का तलवा।
संज्ञा
[सं.]

पदमैत्री
अनुप्रास, वर्ण-मैत्री।
संज्ञा
[सं.]

पदयोजना
पद बनाने को शब्द जोड़ना।
संज्ञा
[सं.]

पदरिपु
काँटा, कंटक।
उ.- पद-रिपु पद अटक्यौ न सम्हारति, उलट न पलट खरी-६५९।
संज्ञा
[सं. पद + रिपु]

पदवी
स्थान, पद, ओहदा, वर्जा।
उ.- (क) अंबरीष, प्रहलाद, नृपति बलि, महा ऊँच पदवी तिन पाई-१-२४। (ख) कहा भयो जु भए नँद-नंदन अब इह पदवी पाई-३२०८।
संज्ञा
[सं.]

निरपेक्षा
इच्छा न होना।
संज्ञा
[सं.]

निरपेक्षा
तटस्थता।
संज्ञा
[सं.]

निरपेक्षा
अवज्ञा।
संज्ञा
[सं.]

निरपेक्षा
निराशा।
संज्ञा
[सं.]

निरपेक्षित
जिसकी इच्छा न की जाय।
वि.
[सं.]

निरपेक्षित
जिससे संबंध न रखा जाय।
वि.
[सं.]

निरपेक्षी
इच्छा न रखनेवाला।
वि.
[सं. निरपेक्षिन्]

निरपेक्षी
लगाव या संबंध न रखनेवाला।
वि.
[सं. निरपेक्षिन्]

निरबंस
जिसके आगे वंश चलानेवाला कोई न हो।
उ.- मरौ वह कंस, निरबंस वाकौ होइ, कर्यौ यह गंस तोकौं पठायो- ५५१।
वि.
(सं. निर्वंश)

निरबंसी
जिसके संतान न हो।
वि.
(सं. निर्वंश)

पद
छंद का चतुर्थाश।
संज्ञा
[सं.]

पद
उपाधि।
संज्ञा
[सं.]

पद
मोक्ष।
संज्ञा
[सं.]

पद
गीत, भजन।
उ.-सूरदास सोई कहे पद भाषा करि गाइ-१-२२५।
संज्ञा
[सं.]

पदक
एक गहना।
संज्ञा
[सं.]

पदक
किसी धातु का गोल टुकड़ा डो विशेष कार्य करने पर पुरस्कार स्वरूप दिया जाता है।
संज्ञा
[सं.]

पदचर
पैदल, प्यादा।
संज्ञा
[सं.]

पदचारी
पैदल चलनेवाला।
वि.
[सं.]

पदचिन्ह
चरणचिन्ह।
संज्ञा
[सं.]

पदच्युत
पद से हटा या गिरा हुआ।
वि.
[सं.]

पदज
शूद्र।
संज्ञा
[सं.]

पदज
पैर की उँगली।
संज्ञा
[सं.]

पदज
जो पैर से उत्पन्न हो।
वि.

पदतल
पैर का तलवा।
संज्ञा
[सं.]

पदत्राण, पदत्रान
पैरों की रक्षा करनेवाला, जूता।
उ.-जहँ जहँ जात तहीं तहिं त्रासत, अस्म, लकुट, पदत्रान-१-१०३।
संज्ञा
[सं. पदत्राण]

पददलित
पैरों से कुचला हुआ।
वि.
[सं.]

पददलित
बहुत दबाया या सताया हुआ।
वि.
[सं.]

पदन्यास
चलना, पैर रखना।
उ.-मृदु पदन्यास मंद मलयानिल बिगलत सीस निचोल।
संज्ञा
[सं.]

पदन्यास
चलने की रीति।
संज्ञा
[सं.]

पदन्यास
चलन, रीति।
संज्ञा
[सं.]

पदार्पण
जाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं.]

पदानवत
नम्र विनीत।
वि.
[सं.]

पदावली
पद-संग्रह।
संज्ञा
[सं.]

पदिक
गले में पहननें का एक गहना जिस पर प्रायः किसी देवता का चरण अंकित रहता है।
उ.- (क) पहुँची करनि, पदिक उर हरिनख, कठुला कंठ मंजु गजमनियाँ-१०-१०६। (ख) उर पर पदिक कुसुम बनमाला, अंगद खरे बिराजैं-४५१।
संज्ञा
[सं. पदक]

पदिक
रत्न।
संज्ञा
[सं. पदक]

पदिक
पदक।
संज्ञा
[सं. पदक]

पदिक
पैदल सेना, पदाति।
संज्ञा

पदी
पैदल, प्यादा।
संज्ञा
[सं. पद]

पदु
चरण, पैर।
संज्ञा
[सं. पद]

पदुम
कमल।
उ.- उरग-इन्द्र उनमान सुभग भुज, पानि पदुम आयुध राजैं-१-६९।
संज्ञा
[सं. पद्म]

पदार
पैरों की धूल, पद-रज।
संज्ञा
[सं.]

पदारथ
धर्म,अर्थ, काम, मोक्ष।
उ.- अर्थ, धर्म अरू काम, मोक्ष फल, चारि पदारथ देत गनी-१-३९।
संज्ञा
[सं. पदार्थ]

पदारथ
मूल्यवान वस्तु।
उ.- जनम तौ ऐसेहिं बीति गयौ। जैसे रंक पदारथ पाए, लोभ बिसाहि लियौ-१-७८।
संज्ञा
[सं. पदार्थ]

पदार्घ्थ
जल जो पूज्य या अतिथि के चरण धोने को दिया जाय।
संज्ञा
[सं.]

पदार्थ
पद का अर्थ या विषय।
संज्ञा
[सं.]

पदार्थ
दर्शन का विषय-विशेष।
संज्ञा
[सं.]

पदार्थ
धर्म,अर्थ, काम, और मोक्ष।
संज्ञा
[सं.]

पदार्थ
चीज, वस्तु।
संज्ञा
[सं.]

पदार्थवाद
वह सिद्धांत जिसमें भौतिक पदार्थों का ही विशेष मान हो, आत्मा या ईश्वर का अस्तित्व तक न माना जाय।
संज्ञा
[सं.]

पदार्थवादी
पदार्थ वाद का समर्थक।
वि.
[सं.]

पदवी
पंथ।
संज्ञा
[सं.]

पदवी
परिपाटी।
संज्ञा
[सं.]

पदवी
उपाधि, खिताब।
संज्ञा
[सं.]

पदांक
चरण-चिह्न।
संज्ञा
[सं.]

पदात, पदाति, पदातिक
पैदल सिपाही।
संज्ञा
[सं. पदाति, पदातिक]

पदात, पदाति, पदातिक
प्यादा।
संज्ञा
[सं. पदाति, पदातिक]

पदात, पदाति, पदातिक
नौकर।
संज्ञा
[सं. पदाति, पदातिक]

पदादिका
पैदल सेना।
संज्ञा
[सं. पदातिक]

पदाधिकारी
ओहदेदार, अफसर।
संज्ञा
[सं.]

पदानुग
अनुयायी।
संज्ञा
[सं.]

पदुम
सौ नील की संख्या जो १ के बाद पंद्रह शून्य देकर लिखी जाती है।
उ.- राजपाट सिंहासन बैठो, नील पदुम हूँ सौं कहै थोरी-१-३०३।
संज्ञा
[सं. पद्म]

पदुमनी
कमलिनी।
संज्ञा
[सं. पद्मिनी]

पदोदक
चरणामृत।
संज्ञा
[सं.]

पद्धटिका
एक छंद।
संज्ञा
[सं.]

पद्धति
रीति, परिपारी, चाल।
उ.- सिव-पूजा जिहिं भाँति करी है, सोइ पद्धति पर- तच्छ दिखैहौं-९-१५७।
संज्ञा
[सं.]

पद्धति
कार्यप्रणाली, विधि-विधान।
उ.- यकटक रहैं पलक नाहिं लागैं पद्धति नई चलाऊँ-१४८५।
संज्ञा
[सं.]

पद्धति
पथ, मार्ग।
संज्ञा
[सं.]

पद्धति
पँक्ति, कतार।
संज्ञा
[सं.]

पद्धति
पुस्तक जिसमें कोई विधि लिखी हो।
संज्ञा
[सं.]

पद्धरि, पद्धरी
एक छंद।
संज्ञा
[सं. पद्धटिका]

पद्म
कमल।
संज्ञा
[सं.]

पद्म
विष्णु का यएक आयुध।
संज्ञा
[सं.]

पद्म
नौ निधियों में एक।
संज्ञा
[सं.]

पद्म
गले का एक गहना
संज्ञा
[सं.]

पद्म
सौ नील की संख्या जो१ के साथ १५ शून्य देकर लिखी जाती है।
संज्ञा
[सं.]

पद्मकोश
कमल का छत्ता या संपुट।
संज्ञा
[सं.]

पद्मनाभ, पद्मनाभि
विष्णु।
संज्ञा
[सं.]

पद्मनाल
कमल की कोमल नाल।
उ.- किहिं गयंद बाँध्यो, सुन मधुकर, पद्मनाल के काँचे सूते-३३०५।
संज्ञा
[सं.]

पद्मनिधि
नौ निधियों में एक।
संज्ञा
[सं.]

पद्मराग
‘माणिक’ वा ‘लाल’ रत्न।
संज्ञा
[सं.]

पद्मा
लक्ष्मी।
संज्ञा
[सं.]

पद्माकर
तालाब जिसमें कमल हों।
संज्ञा
[सं.]

पद्माकर
हिन्दी के रीतिकालीन एक प्रसिद्ध कवि।
संज्ञा
[सं.]

पद्माक्ष
कमलगट्टा।
संज्ञा
[सं.]

पद्माक्ष
विष्णु।
संज्ञा
[सं.]

पद्मालय
ब्रह्मा।
संज्ञा
[सं.]

पद्मासन
योग का एक आसन।
संज्ञा
[सं.]

पद्मासन
ब्रह्मा।
संज्ञा
[सं.]

पद्मिनी
कमलिनी।
संज्ञा
[सं.]

पद्मिनी
चित्तौर की एक रानी जो अपने जौहर के कारण अमर है।
संज्ञा
[सं.]

पद्य
छंदबद्ध कविता।
संज्ञा
[सं.]

पद्यात्मक
जो छंदबद्ध हो।
वि.
[सं.]

पधरना
मान्य व्यक्ति का आना।
क्रि. अ.
[हिं. पधारना]

पधराना
सम्मान से ले जाना या बैठाना।
क्रि.
[सं. प्र + धारण]

पधराना
प्रतिष्ठा या स्थापित करना।
क्रि.
[सं. प्र + धारण]

पधारना
जाना, गमन करना।
क्रि. अ.
[हिं. पग + धारना]

पधारना
आना आ पहुँचना।
क्रि. अ.
[हिं. पग + धारना]

पधारना
चलना।
क्रि. अ.
[हिं. पग + धारना]

पधारना
सम्मान से बैठाना, प्रतिष्ठित करना।
क्रि. स.

पधारे
चले गये, गमन किया।
उ.- गो कह्यौ, हरि बैकुंठ सिधारे। सम-दम उनहीं संग पधारे-१-२९०।
क्रि. अ.
[हिं. पधारना]

पनवारा
पत्तल।
संज्ञा
[हिं. पान + वार]

पनवारा
पत्तल भर भोजन।
संज्ञा
[हिं. पान + वार]

पनवारे
पत्तों की बनी हुई पत्तल।
उ.- महर गोप सबही मिलि बैठे, पनवारे परसाए-१०-८९।
संज्ञा
[हिं. पनवारा]

पनवारे
परसी या भोजन से सजी पत्तल।
उ.- (क) ग्वारनि के पनवारे चुनि चुनि उदर भरीजै सीथिनि-४९०। (ख) कर कौ कौर डारि पनवारे नागर सूर आपु चले अति चाँड़े-१५५७।
संज्ञा
[हिं. पनवारा]

पनवारौ
पत्तों की बनी पत्तल।
उ.- पहिले पनवारौ परसायौ-२३२१।
संज्ञा
[हिं. पनवारा]

पनवारौ
पत्तल भर भोजन।
उ.- तब तमोल रचि तुमहिं खवाबौं। सूरदास पनवारौं पावौं-१०-२११।
संज्ञा
[हिं. पनवारा]

पनसूर
एक तरह का बाजा।
संज्ञा
[देश.]

पनहा
दीवार आदि की चौड़ाई।
संज्ञा
[सं. परिणाह=चौड़ाई]

पनहा
गूढ़ाशय, तात्पर्य।
संज्ञा
[सं. परिणाह=चौड़ाई]

पनहा
चोरी का पता लगानेवाला।
संज्ञा

निरन्न
अन्नरहित।
वि.
[सं.]

निरन्न
निराहार।
वि.
[सं.]

निरन्ना
जो अन्न न खाये हो।
वि.
[सं. निरन्न]

निरपना
जो अपना न हो।
वि.
[हिं. निर + अपना]

निरपराध
जो अपराधी न हो।
वि.
[सं.]

निरपराध
बिना अपराध के।
क्रि. वि.

निरपवाद
जिसकी बुराई न हो।
वि.
[सं.]

निरपेक्ष
जिसे किसी बात की इच्छा न हो।
वि.
[सं.]

निरपेक्ष
जो किसी पर निर्भर न हो।
वि.
[सं.]

निरपेक्ष
तटस्थ।
वि.
[सं.]

पन
प्रतिज्ञा, संकल्प, निश्चय।
उ.- (क) धर्मपुत्र जब जज्ञ उपायौ द्विज मुख ह्वै पन लीन्हौं-२-२९। (ख) गाए सूर कौन नहिं उबरयौ, हरि परिपालन पन रे-१-६६।
संज्ञा
[हिं. प्रण]

पन
आयु के चार भागों (बाल्यावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था) में से एक।
उ.- (क) तीनौ पन ऐसैं हीं खाए, समय गए पर जाग्यौ। (ख) तीन्यौ पन मैं ओर निबाहे इहै स्वाँग कौं काछे-१-१३६। (ग) तीनौं पन ऐसैं ही खोए, केस भए सिर सेत-१-२८६। (घ) तीनौंपन ऐसै ही जाइ-७-२।
संज्ञा
[सं. पर्वन्=विशेष अवस्था]

पनघट
वह घाट जहाँ पानी भरा जाता हो।
संज्ञा
[हिं. पानी + घाट]

पनच
धनुष की डोरी।
उ.- उतरी पनच अब काम के कमान की-पृ. ३०० (९)।
संज्ञा
[सं. पतंचिका]

पनपना
पानी पाकर फिर हरा भरा हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. पर्णय=हरा होना]

पनपना
पुनः स्वस्थ और हृष्ठ-पुष्ट होना।
क्रि. अ.
[सं. पर्णय=हरा होना]

पनव
ऊँकार मंत्र।
संज्ञा
[सं. प्रणव]

पनवाँ
हमेल आदि में लगी पान के आकार की चौकी, टिकड़ा।
संज्ञा
[हिं. पान + वाँ]

पनवाड़ी, पनवारी
पान का खेत।
संज्ञा
[हिं. पान + वाड़ी]

पनवाड़ी, पनवारी
पान बेचनेवाला, तम्बोली।
संज्ञा
[हिं. पान + वार]

पनहा
ऐसे व्यक्ति को दिया जानेवाला पुरस्कार।
संज्ञा

पनहारा
पानी भरनेवाला।
संज्ञा
[हिं. पानी + हारा]

पनहियाँ, पनहिया
छोटा जूता, जूती, पनही।
उ.- खेलत फिरत कनकमय आँगन, पहिरे लाल पनहिंयाँ-९-१९।
संज्ञा
[हिं. पनही]

पनही
जूता।
संज्ञा
[सं. उपानह]

पना
आम आदि का पन्ना।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पनार, पनारा, पनासा
गंदे जल का प्रवाह, परनाला।
उ.- (क) जैसे अंधौ अंध कूप मैं गनत न खाला-पनार। तैसेहिं सूर बहुत उपदेसैं सुनि-सुनि गे कै बार-१-८४। (ख) तेरौ नीर सुची जो अब लौ, खार पनार कहावै-५६१।
संज्ञा
[हिं. परनाला]

पनारी, पनाली
गंदे जल की धारा, परनाली।
संज्ञा
[हिं. परनाली]

पनारी, पनाली
धार, धारा।
उ.- (क) रुदन जल नदी सभ बहि चल्यो उरज बीच मनोगिरी फोरि सरिता पनारी-पृ. ३४१ (५)। (ख) मानो दामिनि धरनि परी की सुधर पनारो-१८२३। (ग) तट बारू उपचार चूर जल परी प्रस्वेद पनारी-२७२८।
संज्ञा
[हिं. परनाली]

पनारे, पनाले
अनेक प्रवाह।
उ.- (क) कंचुकि पट सूखत नहिं कबहूँ उर बिच बहत पनारे-२७६३। (ख) चहुँ दिसि कान्ह कान्ह करि टेरत अँसुवनि बहत पनारे-३४४६
संज्ञा
[हिं. परनाले]

पनासना
पालना-पोसना।
क्रि. स.
[सं. पानाशन]

पनाह
त्राण, बचाव।
संज्ञा
[फ़ा.]

पनाह
पनाह माँगना- बचने की इच्छा करना।
मु.

पनाह
रक्षा का स्थान, शरण, आड़।
संज्ञा
[फ़ा.]

पनिघट
घाट जहाँ पानी भरा जाता हो।
उ.- जब ते पनिघट जाऊँ सखी री वा यमुना के तीर-२७९८।
संज्ञा
[हिं. पनघट]

पनियाँ, पनिया
पानी में रहनेवाला।
वि.
[हिं. पानी]

पनियाना
पानी बहना, पसीजना, प्रवाहित होना।
क्रि. अ.
[हिं. पानी + आना]

पनियाना
सींचना, तर करना।
क्रि. स.

पनियाना
तंग या परेशान करना।
क्रि. स.

पनिहा
पानी में रहनेवाला।
वि.
[हिं. पानी]

पनिहार, पनिहारा
पानी भरनेवाला।
संज्ञा
[हिं. पनहरा]

पनिहारी
पानी भरनेवाली।
उ.- हौं गोधन लै गयौ जमुन-तट, तहाँ हुती पनिहारी-६९३।
संज्ञा
[हिं. पुं. पनहार]

पनी
प्रण करनेवाला।
वि.
[सं. प्रण]

पनीर
छेना।
संज्ञा
[फ़ा.]

पनीला
पानी मिला हुआ।
वि.
[हिं. पानी + इला]

पनेथी
मोटी रोटी।
संज्ञा
[हिं. पानी + पोथी]

पनौ
इमली आदि के पने में भीगे हुए।
उ.- मूंग पकौरा पनौ पतबरा। इक कोरे इक भिजे गुरबरा-३९६।
वि.
[हिं. पन्ना]

पनौआ
एक पकवान।
संज्ञा
[हिं. पान + ओआ]

पनौटी
पान की डिबिया।
संज्ञा
[हिं. पान + ओटी]

पन्न
गिरा-पड़ा।
वि.
[सं.]

पन्न
नष्ट।
संज्ञा

पन्न
रेंग या सरककर चलने की क्रिया।
संज्ञा

पन्नई
पन्ने की तरह हलके हके रंग का।
वि.
[हिं. पन्ना]

पन्नग
साँप, सर्प।
उ.-पन्नग-रूप गिले सिसु गो-सुत, इहिं सब साथ उबारयौ-४३३।
संज्ञा
[सं.]

पन्नग
पन्ना, मरकत।
संज्ञा
[हिं. पन्ना]

पन्नगारि
गरुड़।
संज्ञा
[सं.]

पन्नगारि
मयूर।
संज्ञा
[सं.]

पन्नगिनि, पन्नगी
नागिनि, सर्पिणी।
उ.-(क) मनहुँ पन्नगिनि उतरि गगन ते दल पर फल परसावत- १३४५। (ख) मनो पन्नगी निकसि ता बिच रही हाटक गिरि लपटाई-पृ. ३१८ (७१)। (ग) खंजरीट मनो ग्रसित पन्नगी यह उपमा कछु आवै-२०९७।
संज्ञा
[सं. पन्नगी]

पन्ना
मरकत रत्न।
उ.-पन्ना पिरोजा लागो बिच-बिच १० उ.-२४।
संज्ञा
[सं. पर्ण ?]

पन्ना
पुस्तक का पृष्ठ।
संज्ञा
[हिं. पात्र]

पन्ना
आम, इमली आदि का पानी मिला पतला रस।
संज्ञा
[हिं. पना]

पपड़ी, पपरी
घाव की खुरंड, छोटा पापड़।
संज्ञा
[हिं. पपड़ा]

पपड़ी, पपरी
सोहन पपड़ी नामक मिठाई।
संज्ञा
[हिं. पपड़ा]

पपड़ी, पपरी
छोटा पापड़।
संज्ञा
[हिं. पपड़ा]

पपिहा, पपीहरा, पपीहा
चातक नामक पक्षी जो वसंत और वर्षा में बहुत सुरीली ध्वनि से बोलता है।
संज्ञा
[देश. पपीहा]

पपिहा, पपीहरा, पपीहा
सितार के छः तारों में एक जो लोहे का होता है।
संज्ञा
[देश. पपीहा]

पपीता
एक वृक्ष।
संज्ञा
[देश,]

पपीलि
चींटी।
संज्ञा
[सं. पिपीलिका]

पपोटा
पलक, दृगंचल।
संज्ञा
[सं. प्र + पट]

पपोरना
(बल के गर्व से ) बाहें ऐंठना।
क्रि. स.
[देश.]

पपोलना
पोपला मुँह चलाना।
क्रि. अ.
[हिं. पोपला]

पन्नी
रुपहला, सुनहरा, रंगीन या चमकदार कागज।
संज्ञा
[हिं. पन्ना=पृष्ठ]

पन्नी
एक भोज्य पदार्थ।
संज्ञा
[हिं. पना]

पन्नी
बारूद की एक तौल।
संज्ञा
[देश.]

पन्हाना
पहनाना।
क्रि. अ.
[हिं. पहनाना]

पन्हैयाँ, पन्हैया
जूता।
संज्ञा
[हिं. पनही]

पपड़ा, पपरा
लकड़ी, चूने-आदि का पतला छिलका, चिप्पड़।
संज्ञा
[सं. पर्पट]

पपड़ा, पपरा
रोटी का बक्कल।
संज्ञा
[सं. पर्पट]

पपड़िआना, पपरिआना
सूखकर सिकुड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. पपड़ी + आना]

पपड़िआना, पपरिआना
इतना सूखना कि पपड़ी पड़ जाय।
क्रि. अ.
[हिं. पपड़ी + आना]

पपड़ी, पपरी
सूखी और सिकुड़ी हुई या परत।
संज्ञा
[हिं. पपड़ा]

पबारना
फेंकना।
क्रि. स.
[हिं. फेंकना]

पबि
वज्र।
संज्ञा
[सं. पवि]

पब्बय
पहाड़, पर्वत।
संज्ञा
[सं. पर्वत]

पब्बि
वज्त्र।
संज्ञा
[सं.पवि]

पमाना
डींग हाँकना।
क्रि. अ.
[?]

पय
दूध।
उ.-जिनि पहले पलना पौढ़े पय पीवत पूतना घाली-२५६७।
संज्ञा
[सं. पयस्]

पय
जल, पानी।
संज्ञा
[सं. पयस्]

पय
अन्न।
संज्ञा
[सं. पयस्]

पयज
प्रण, प्रतिज्ञा।
संज्ञा
[सं. पैज़]

पयद
बादल, मेघ।
संज्ञा
[सं. पयोद]

पयोघन
ओला।
संज्ञा
[सं.]

पयोद
बादल, मेघ।
संज्ञा
[सं.]

पयोदन
दूध-भात।
संज्ञा
[सं. पयस् + ओदन]

पयोधर
थन।
उ.-मनौ धेनु तृन छाँड़ि बच्छ हित, प्रेम-द्रवित चित स्रवत पयोधर-१०-१२४।
संज्ञा
[सं.]

पयोधर
स्त्री कै स्तन।
उ.-पीन पयोधर सघन अति तापर रोमावली लसी री-२३८४।
संज्ञा
[सं.]

पयोधर
बादल।
संज्ञा
[सं.]

पयोधर
तालाब।
संज्ञा
[सं.]

पयोधि, पयोनिधि
समुद्र।
संज्ञा
[सं.]

पयोमुख
दुधमुहाँ वा दूधपीता।
वि.
[सं.]

पयोवाह
मेघ, बादल।
संज्ञा
[सं.]

पयधि
सागर, समुद्र।
संज्ञा
[सं. पयोधि]

पयनिधि
सागर, समुद्र।
उ.-(क) मनु पयनिधि सुर मथत फेन फटि, दयौ दिखाई चंद-१०-२०३। (ख) मानहुँ पयनिधि मथत, फेन फटि चंद उजारयौ-४३१।
संज्ञा
[सं. पयोनिधि]

पयस्वती
नदी, सरिता।
संज्ञा
[सं.]

पयखिनी
गाय।
संज्ञा
[सं.]

पयखिनी
नदी।
संज्ञा
[सं.]

पयहारी
सिर्फ दूध पीकर ही रहनेवाला।
वि.
[हिं. पय + आहारी]

पयादि
पैदल, प्यादा।
संज्ञा
[हिं. प्यादा]

पयान, पयानो
गमन, प्रस्थान, जाना, यात्रा।
उ.-(क) बिछुरत प्रान पयान करैगे, रहौ आजु पुनि पंथ गहौ (हो)-९-३३। (ख) आजु रघुनाथ पयानो देत। बिह्वल भए स्रवन सुनि पुरजन, पुत्र-पिता कौ हेतु-९-३९।
संज्ञा
[सं. प्रयाण]

पयार, पयाल
धान कोदों आदि के सूखे डंठल।
उ.-(क) धान को गाँव पयार ते जानौ ज्ञान बिषय रस भोरे। (ख) उनके गुन कैसे कहि आवै सूर पयारहिं झारत-पृ. ३२७ (६८)।
संज्ञा
[सं. पलाल, हिं. पयाल]

पयार, पयाल
पयार गहाना- व्यर्थ का श्रम करना। (क) फिरि-फिरि कहा पयारहिं गाह्वे। (ख) झारि झूरि मन तो तू लै गयो, बहुरि पयारहिं गाहत-३०६५।
मु.

निरबर्ती
त्यागी, विरागी।
वि.
[सं. निवृत्त]

निरबल
कमजोर, शक्तिहीन।
वि.
[सं. निर्बल]

निरबहना
निभ जाना।
क्रि. अ.
[हिं. निभना]

निरबहिऐ
निर्वाह कीजिए, निभाइए, बचाइए।
उ.- ऐसैं कहौं कहाँ लगि गुन-गन लिखत अंत नहिं लहिऐ। कृपासिंधु उनहीं के लेखैं मम लज्जा निरबहिऐ - १-११२।
क्रि. स.
[हिं. निबाहना]

निरबान
मोक्ष, मुक्ति।
संज्ञा
[सं. निर्वाण]

निरबाहत
निबाह करते हैं, निभा लेते हैं, रक्षा कर लेते हैं।
उ.- सूरदास हरि बोलि भक्त कौं, निरबाहत गहि बहियाँ - ९-१९।
क्रि. स.
[सं. निर्बहना, हिं निबाहना]

निरबाहु
पालन, निर्वाह।
उ.- (क) हौं पुनि मानि कर्म कृत रेखा, करिहौं तात-बचन निरबाहु - ९-३४। (ख) सूर सब दिन चोर को कहुँ होत है निरबाहु - १२८०।
संज्ञा
[सं. निर्वाह]

निरबिकार
दोष-रहित।
वि.
[सं. निर्विकार]

निरबेद
दुख।
संज्ञा
[सं. निर्वेद]

निरबेद
वैराग्य।
संज्ञा
[सं. निर्वेद]

पयोव्रत
एक व्रत जिसमें केवल जल पीकर रहा जाता है।
संज्ञा
[सं.]

पयोव्रत
श्रीकृष्ण का एक व्रत जिसमें बारह दिल तक केवल दूध पीकर उनका ध्यान किया जाता है।
संज्ञा
[सं.]

पयौ
दूध।
उ.-पसु-पंछी तृन-कन त्याग्यौ, अरु बालक पियौ न पयौ-९-४६।
संज्ञा
[हिं. पय]

पयौसार
स्त्री के पिता का घर, मायका, पीहर, नैहर।
उ.-परत पिराइ पयोनिधि भीतर, सरिता उलटि बहाइ। मनु रघुपति भयभीत सिंधु पत्नी प्यौसार पठाईं-९-१२४।
संज्ञा
[सं. पितृशाला]

परंच
और भी।
अव्य.
[सं.]

परंच
तो भी।
अव्य.
[सं.]

परंजय
शत्रु को जीतनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

परंतप
शत्रु को चैन न लेने देनेवाला।
वि.
[सं.]

परंतप
जितेंद्रिय।
वि.
[सं.]

परंतु
पर, तोभी, किन्तु।
अव्य.
[सं. परं + तु]

परंपरा
क्रम, पूर्वापर क्रम।
उ.-यह तो परंपरा चलि आई सुख लाभ अरु हानि-२६५८।
संज्ञा
[सं.]

परंपरा
वंश या संतति-क्रम।
संज्ञा
[सं.]

परंपरा
रीति।
संज्ञा
[सं.]

परंपरागत
परम्परा से होता आनेवाला।
वि.
[सं.]

पर
दूसरा, अन्य।
वि.
[सं.]

पर
पराया, दूसरे का।
वि.
[सं.]

पर
भिन्न, पृथक।
वि.
[सं.]

पर
बाद का।
वि.
[सं.]

पर
दूर, सीमा के बाहर।
वि.
[सं.]

पर
सबसे ऊपर, श्रेष्ठ।
वि.
[सं.]

पर
लीन।
वि.
[सं.]

पर
अधिकरण की विभक्ति।
उ.- (क) कर-नख पर गोबर्धन धारी-१-२२। (ख) ऐकै चीर हुतौ मेरे पर-१-२४७।
प्रत्य.
[सं. उपरि]

पर
शत्रु।
संज्ञा

पर
शिव।
संज्ञा

पर
मोक्ष।
संज्ञा

पर
पीछे, पश्चात्।
अव्य.
[सं. परम्]

पर
किन्तु, परन्तु।
अव्य.
[सं. परम्]

पर
पक्षी के पंख, पक्ष।
संज्ञा
[फ़ा.]

पर
पर कट जाना- बल या शक्ति का आधार न रह जाना। पर काट देना- बल या शक्ति का आधार नष्ट कर देना। पर जमाना- सीधे-सादे व्यक्ति में भी चालाकी या धूर्तता आना। पर न मारना (मार सकना)- पास न फटक सकना।
मु.

परई
पड़ता है, पतित होता है, गिरता है।
उ.- डोलै गगन सहित सुरपति अरू पुहुमि पलटि जग परई-९-७८।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परई
(नींद) पड़ती है।
उ.- बिधु बैरी सिर पर बसै निसि नींद न परई-२८६१।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परई
मिट्टी का बड़ा कटोरा।
संज्ञा
[सं. पार]

परक
परकने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. परकना]

परकट
उत्पन्न।
उ.- मक्ष के उदर ते बाल परकट भयो-१० उ.-२५।
वि.
[सं. प्रकट]

परकटा
जिसके पंख कटे हों।
[हिं. पर + कटना]

परकना
हिल-मिल जाना।
क्रि. अ.
[हिं. परचना]

परकना
धड़क खुलना, चस्का पड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. परचना]

परकसना
प्रकट या उत्पन्न होना।
क्रि. अ.
[हिं. परकासना]

परकसना
प्रकाशित होना, जगमगाना।
क्रि. अ.
[हिं. परकासना]

परकाजी
परोपकारी।
वि.
[हिं. पर + काज]

परकाश, परकास
प्रकाश।
संज्ञा
[सं. प्रकाश]

परकाशत, परकासत
प्रकट करता है, उच्चरित करता है।
उ.- गदगद मुख बानी परकासत देह दसा बिसरी-१४७८।
क्रि. स.
[हिं. प्रकाशना]

परकाशना, परकासना
प्रकाशित करना।
क्रि. स.
[सं. प्रकाशन]

परकाशना, परकासना
प्रकट करना।
क्रि. स.
[सं. प्रकाशन]

परकाशित, परकासित
चमकता हुआ, प्रकाशयुक्त, कांतियुक्त।
उ.- कोटि किरनि-मनि मुख प्रकासित, उड़पति कोटि लजावत-४७९।
वि.
[हिं. प्रकाशना]

परकाशी, परकासी
प्रकट की, उच्चरित की।
उ.- सिंधु भव्य बाणी परकाशी-२४५९।
क्रि. स.
[हिं. प्रकाशना]

परकिति
प्रकृति।
संज्ञा
[सं. प्रकृति]

परकीय
पराया, दूसरे का।
वि.
[सं.]

परकीया
उपपति से प्रेम करनेवाली।
संज्ञा
[सं.]

परकीरति
प्रकृति।
संज्ञा
[सं. प्रकृति]

परकाना
हिलाना-मिलाना।
क्रि. स.
[हिं. परकना]

परकाना
धड़क खोलना, चस्का डालना।
क्रि. स.
[हिं. परकना]

परकार
भेद, किस्म।
संज्ञा
[सं. प्रकार]

परकार
रीति, ढंग, प्रकार।
उ.- (क) भयौ भागवत जा परकार। कहौं, सुनौ सो अब चित धार-१-२३०। (ख) चारिहूँ जुग करी कृपा परकार जेहि सूरहू पर करौ तेहि सुभाई-८-९।
संज्ञा
[सं. प्रकार]

परकारी
रीति, ढंग।
उ.- बूझत हैं पूजा परकारी-१०२१।
संज्ञा
[सं. प्रकार]

परकाला
सीढ़ी।
संज्ञा
[फ़ा. परगाल]

परकाला
दहलीज।
संज्ञा
[फ़ा. परगाल]

परकाला
टुकड़ा।
संज्ञा
[फ़ा. परगाल]

परकाला
चिनगारी।
संज्ञा
[फ़ा. परगाल]

परकाला
आफत का परकाला- बहुत उपद्रवी।
मु.

परखाई
परखने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. परख]

परखाना
जँचवाना।
क्रि. स.
[हिं. परखना]

परखाना
सौंपाना।
क्रि. स.
[हिं. परखना]

परखि
परखकर, जाँच करके, गुण-दोष की परीक्षा करके।
उ.- ताहि कैं हाथ निरमोल नग दीजिए, जोइ नीकैं परखि ताहि जानै-१-२२३।
क्रि. स.
[हिं. परखना]

परखि
देख लिया, निगाह डाल ली।
उ.- परखि लिए पाछेन को तेऊ सब आए-२५७५।
क्रि. स.
[हिं. परखना]

परखी
जाँची, देखी-भाली।
क्रि. स.
[हिं. परखना]

परखी
परखनेवाला।
संज्ञा
[हिं. पारखी]

परखैया
परखनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

परग
डग, कदम।
उ.- बामन रूप धरयौ बलि छलि कै, तीनि परग बसुधाऊ-१०-२२१।
संज्ञा
[सं. पदक]

परगट
अंकित, चिन्हित।
उ.- अंकुस-कुलिस-बज्र ध्वज परगट तरुनी-मन भरमाए-६३१।
वि.
[सं. प्रकट]

परकृत
स्वभाव, प्रकृति।
उ.- परकृत एक नाम हैं दोऊ किधौं पुरुष, किधौं नारि-२२२०।
संज्ञा
[सं. प्रकृति]

परकृति
दूसरे की कृति या रचना।
संज्ञा
[सं.]

परकोटा
चहारदिवारी।
संज्ञा
[सं. परिकोट]

परकोटा
पानी आदि को रोकने का धुस या बाँध।
संज्ञा
[सं. परिकोट]

परख
जाँच, परीक्षा।
संज्ञा
[सं. परीक्षा, प्रा. परिक्ख]

परख
गुण-दोष-विवेचक वृत्ति।
संज्ञा
[सं. परीक्षा, प्रा. परिक्ख]

परखना
जाँच या परीक्षा करना।
क्रि. स.
[सं. परीक्षण, प्रा. परीक्खण]

परखना
भला-बुरा जाँचना।
क्रि. स.
[सं. परीक्षण, प्रा. परीक्खण]

परखना
प्रतीक्षा या इन्तजार करना।
क्रि. स.
[हिं. परेखना]

परखाइ
जाँचकर।
उ.- हम सौं लीजै दान के दाम सबै परखाइ-१०१७।
क्रि. स.
[हिं. परखना]

परगट
उत्पन्न।
वि.
[सं. प्रकट]

परगट
कियौ परगट-प्रकट किया, बताया।
उ.- सुपनौ परगट कियौ कन्हाई-५४४।
प्रा.

परगटना
प्रगट होना, खुलना।
क्रि. अ.
[हिं. प्रगट]

परगटना
प्रकट करना, खोलना।
क्रि. स.

परगन, परगना
भू-भाग जिसमें कई ग्राम हों।
उ.- ब्रज-परगन-सिकदार महर, तू ताकी करत नन्हाई-१०-३२९।
संज्ञा
[फ़ा. परगना]

परगसना
प्रकाशित होना।
क्रि. अ.
[सं. प्रकाशन]

परगाढ़
बहुत गाढ़ा, गहरा।
वि.
[सं. प्रगाढ़]

परगास
प्रकाश।
उ.- अबिनाशी बिनसै नहीं सहज ज्योति परगास-३४४३।
संज्ञा
[सं. प्रकाश]

परगास
प्रकट।
उ.- उदधि मथि नग प्रगट कीन्हो श्री सुधा परगास-१३५६।
वि.

परगासना
प्रकाशित होना।
क्रि. अ.
[सं. प्रकाशन]

परचा
परख।
संज्ञा
[सं. परिचय]

परचा
परिचय।
संज्ञा
[सं. परिचय]

परचाना
हिलाना-मिलाना।
क्रि. स.
[हिं. परचना]

परचाना
धड़क खोलना, चस्का डालना।
क्रि. स.
[हिं. परचना]

परचून
दाल-चादल आदि।
संज्ञा
[सं. पर + चूर्ण]

परचै
जान-पहचान।
संज्ञा
[सं. परिचय]

परचो, परचौ
परिचय, परख, परीक्षा।
उ.- काहू लियो प्रेम परचो, वह चतुर नारि है सोई-२२७५।
संज्ञा
[हिं. परचा]

परच्यौ
सीमा, अंत।
उ.- चंदन अंग सखनि कै चरच्यौ। जसुमति के सुख कौं नहिं परच्यौ-३९६।
संज्ञा
[हिं. परचो]

परछत्ती
हलका छाजन।
संज्ञा
[हिं. पर + छत]

परछन
विवाह की एक रीति।
संज्ञा
[सं. परि + अर्चन]

निबेड़ा, निबेरा
निर्णय।
संज्ञा
[हिं. निबेड़ना]

निबेरि
अलग करके, छाँटकर, चुनकर।
उ.- बड़ौ भयौ अब दुहत रहौंगो, अपनीं धेनु निबेरि - ४००।
क्रि. स.
[हिं. निबेरना]

निबेरी
मिली हुई वस्तुओं को अलग करना, छाँटना, चुनना।
क्रि. स.
[हिं. निबेरना]

निबेरी
सकै निबेरी-छाँट या अलग कर सकता है।
उ.-ग्वालिनि घर गए जानि साँझ की अँधेरी। मंदिर मैं गए समाइ, स्यामल तनु लखि न जाइ, देह गेह रूप, कहौ को सकै निबेरी - १०-२७५।
प्र.

निबेरे
मिली-जुली वस्तुओं को अलग करने या छाँटने से।
उ.- नैना भए पराये चेरे।¨¨¨। तउ मिलि गए दूध पानी ज्यों निबरत नाहिं निबेरे।
क्रि. स.
[हिं. निबेरना]

निबेरो, निबेरौ
छाँट कर अलग करो, चुन लो, बिलगा लो।
उ.- न्यारौ जूथ हाँकि लै अपनौ न्यारी गाई निबेरौ - १०-२१६।
क्रि. स.
[हिं. निबेरना]

निबेरे, निबेरै
छुटकारा, मुक्ति, उद्धार, बचाव।
उ.- ब्याकुल अति भवजाल बीच परि प्रभु के हाथ निबेरो।
संज्ञा

निबेरे, निबेरै
निर्णय, फैसला, निबटेरा।
उ.- जैसे बरत भवन तजि भजिए तैसहि गए फेरि नहिं हेरथौ। सूर स्याम रस रसे रसीले अब को करै निबेरो ?
संज्ञा

निबैहै
निबाह करेगा, छाँटेगा, चुनेगा।
उ.- गुननिधान तजि सूर साँवरे को गुनहीन निबैहै - ३१०५।
क्रि. स.
[हिं. निबाहना]

निबौरी, निबौली
नीम का फल या बीज।
उ.- दाख दाड़िम छाँड़ि कै कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै - ३१०५।
संज्ञा
[हिं. निबकौरी]

निरबेरा
मुक्ति।
संज्ञा
[सं. निर्वाह]

निरबेरा
उद्धार।
संज्ञा
[सं. निर्वाह]

निरभय
निर्भय, निडर।
उ.- बिविध आयुध धरे, सुभट सेवत खरे, छत्र की छाहँ निरभय जनायौ - ९-१२९।
वि.
[सं. निर्भय]

निरभर
अवलंबित, आश्रित।
वि.
[सं. निर्भर]

निरभिमान
अभिमान रहित।
वि.
[सं.]

निरभिलाष
अभिलाषा रहित।
वि.
[सं.]

निरभैं
निर्भय, निडर।
उ.- होउँ बेगि मैं सबल सबनि मैं, सदा रहौं निरभैंरी- १७६।
वि.
[सं. निर्भय]

निरभ्र
मेघशून्य, निर्मल।
वि.
[सं.]

निरमना
निर्माण करना।
क्रि. स.
[सं. निर्माण]

निरमर, निरमल
स्वच्छ, निर्मल।
उ.- पूँगीफल-जतु जल निरमल धरि, आनी भरि कुंडी जो कनक की-९-२५।
वि.
[सं. निर्मल]

परगासना
प्रकाशित करना।
क्रि. स.

परगासा
प्रकाशित।
उ.- बिनु पर-पानि करै परगाँसा-१०-३।
वि.
[सं. प्रकाश]

परगासा
प्रकट या उत्पन्न किया।
उ.- सूरज चंद्र धरनि परगासा-२६४३।
क्रि. स.

परघट
उत्पन्न, प्रकट।
वि.
[सं. प्रकट]

परचंड
भयंकर, प्रचंड।
वि.
[सं. प्रचंड]

परचत
जान-पहचान, जानकारी।
उ.- सुरति-सरित भ्रम भँवर तन मन परचत न लह्यौ।
संज्ञा
[सं. परिचित]

परचना
हिलना-मिलना।
क्रि. अ.
[सं. परिचयन]

परचना
धड़क खुलना, चस्का लगना।
संज्ञा
[सं. परिचयन]

परचा
कागज की चिट।
संज्ञा
[फ़ा.]

परचा
चिटठी।
संज्ञा
[फ़ा.]

परछना
विवाह में वर के आने पर आरती आदि करना।
क्रि. स.
[हिं. परछन]

परछा
भीड़ की कमी।
संज्ञा
[सं. परिच्छेद]

परछा
समाप्ति।
संज्ञा
[सं. परिच्छेद]

परछाईं
प्रतिबिंब।
संज्ञा
[सं. प्रतिच्छाया]

परछाईं
छायाकृति
संज्ञा
[सं. प्रतिच्छाया]

परछाया
परिछाईं, छाया।
उ.- मंदिर की परछाया बैठयौ, कर मीजै पछिताइ-९-७५।
संज्ञा
[सं. प्रतिच्छाया]

परछहिआँ, परछाँह
छाया, प्रतिबिम्ब।
उ.- (क) निरखि अपनो रूप आपुही बिबस भई सूर परछाँह को नैन जोरै-पृ. ३१६ (५८)। (ख) मनो मोर नाचत सँग डोलत मुकुट की परिछहिआँ-३४५।
संज्ञा
[हिं. परछाईं]

परजंत
तक, लौ।
अव्य.
[सं. पर्यंत]

परजन
सेवक, अनुचर।
संज्ञा
[सं. परिजन]

परजरना
जलना, सुलगना।
क्रि. अ.
[सं. प्रज्वलन]

परजरना
कुढ़ना, क्रुद्ध होना।
क्रि. अ.
[सं. प्रज्वलन]

परजरना
ईर्ष्या या डाह करना।
क्रि. अ.
[सं. प्रज्वलन]

परजन्य
बादल।
संज्ञा
[सं. पर्जन्य]

परजन्य
इंद्र।
संज्ञा
[सं. पर्जन्य]

परजरना, परजलना
सुलगना।
क्रि. अ.
[सं. प्रज्वलन]

परजर
जलता हुआ।
वि.
[सं. प्रज्वलित]

परजरयौ
क्रुद्ध हुआ, कुढ़ गया।
उ.- सुनि अरे अंध दसकंध, लै सीय मिलि, सेतु करि बंध रघुवीर आयौ। यह सुनत परजरयौ, बचन नहिं मन धरयौ, कहाँ तैं राम सौं मोहिं डरायौ-९-१२८।
क्रि. अ.
[हिं. परजरना]

परजा
राज्य-निवासी, प्रजा।
उ.- (क) परजा सकल धर्म-रत देखी-१-२९०। (ख) रिषभराज परजा सुख पायौ-५-२।
संज्ञा
[सं. प्रजा]

परजा
आश्रितजन।
संज्ञा
[सं. प्रजा]

परजारना, परजालना
जलाना।
क्रि. स.
[हिं. परजरना]

परण
प्रण, प्रतिज्ञा।
उ.- ताको पिता परण यह कीन्हो-१० उ.- २८।
संज्ञा
[सं. प्रण]

परणना
विवाह करना।
क्रि. स.
[सं. परिणयन्]

परणाम
प्रणाम, नमस्कार।
उ.- तब परिणाम कियौ अति रूचि सों अरू सबही क जोरे-२९७१।
संज्ञा
[सं. प्रणाम]

परतंचा
धनुष की डोरी।
संज्ञा
[हिं. प्रत्यंचा]

परतंत्र
परवश,पराधीन।
वि.
[सं.]

परतः
पीछे।
अव्य.
[सं. परतस्]

परतः
आगे।
अव्य.
[सं. परतस]

परत
पड़ता है, गिरता है, जाता है।
उ.- पग-पग परत कर्म-तम-कूपहिं, को करि कृपा बचावै-१-४८।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परत
स्थित है, उपस्थित होता है, स्थान पाता है।
उ.- सूरदास कौं यहै बड़ौ दुख, परत सबनि के पाछे-१-१३६।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परत
(युद्ध क्षेत्र) में मरकर गिरता हैं।
उ.- इत भगदत्त, द्रोन, भूरिश्रव, तुम सेनापति धीर। जे जे जात, परत ते भूतल, ज्यौं ज्वाला-गत चीर-१-२६९।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परत
तह, स्तर।
संज्ञा
[सं. प्रत्यक्ष]

परत
संज्ञा
[सं. प्रत्यक्ष]

परतक्ष, परतच्छ
प्रकट, प्रत्यक्ष।
उ.- (क) सिव-पूजा जिहिं भाँति करी है, सोइ पद्धति परतच्छ दिखैहौं-९-१५७। (ख) कनक तुम परतक्ष देखहु सजे नवसत अंग-११३२।
वि.
[सं. प्रत्यक्ष]

परतर
बाद या पीछे का।
वि.
[सं.]

परताप
पौरूष, वीरता।
उ.- यह अपनो परताप नंद जसुमतिहिं सुनैहौ-११४०।
संज्ञा
[सं. प्रताप]

परताप
तेंज।
संज्ञा
[सं. प्रताप]

परताप
महिमा, महत्व, प्रताप।
उ.- भजन कौ परताप ऐसौ जल तरै पाषान-१-२३५।
संज्ञा
[सं. प्रताप]

परताल
जाँच, खोज-खबर।
संज्ञा
[हिं. पड़ताल]

परतिंचा
धनुष की डोरी।
संज्ञा
[हिं. प्रत्यंचा]

परति
पड़ता है, गिरता है।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परदक्षिणा, परदच्छिना
परिक्रमा, प्रदक्षिणा।
उ.- बहुरि बलभद्र परनाम करि रिषिन्ह को पृथ्वी परदक्षिणा को सिधाये-१० उ. ५८।
संज्ञा
[सं. प्रदक्षिणा]

परदा
आड़ करने का कपड़ा।
संज्ञा
[सं.]

परदा
परदा खोलना- छिपी बात प्रकट करना। परदा डालना- बात छिपाना। आँख पर परदा पड़ना- दिखायी न देना। बुद्धि पर परदा पड़ा - समझ में न आना। परदा रखना- प्रतिष्ठा बनी रहने देना। राखत परदा तेरो- तेरी प्रतिष्ठा बनाये रखना चाहती हैं। उ.- मधुकर, जाहि कहौ सुनि मेरौ। पीत बसन तन स्याम जानि कै राखत परदा तेरौ-३२७१।
मु.

परदा
आड़ करने की चीज।
संज्ञा
[सं.]

परदा
आड़, ओट, ओझल।
संज्ञा
[सं.]

परदा
ओट, छिपाव।
संज्ञा
[सं.]

परदा
परदा रखना- (१) सामने न आना। (२) छिपाव रखना। परदा होना- दुराव-छिपाव होना। उ.- सुनहु सूर हमसौं कहा परदा हम कर दीन्हीं साट सई-१२६७।
मु.

परदा
स्त्रियों को ओट में रखना।
संज्ञा
[सं.]

परदा
तह, परत।
संज्ञा
[सं.]

परदा
चमड़े की झिल्ली।
संज्ञा
[सं.]

परति
मिलता है, प्राप्त होता है।
उ.- पलित केस, कफ कंठ बिरूंध्यौ, कल न परति दिन-राती-१-११८।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परति
फाँसती है, बाँधती है।
उ.- मैं मेरी करि जन्म गँवावत, जब लगि नाहिं परति जम डोरी-१-३०३।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परतिग्या, परतिज्ञा
प्रतिज्ञा, व्रत, संकल्प।
उ.- ऐसे जन परतिज्ञा राखत जुद्ध प्रगट करि जोरे-१-३१।
संज्ञा
[सं. प्रतिज्ञा]

परती
गिरती।
उ.- सुत सनेह समुझति सु सूर प्रभु फिरि फिरि जसुमति परती धरनी-३३३०।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परती
जमीन जो जोती-बोई न जाय।
संज्ञा

परतीत, परतीति
विश्वास।
उ.- (क) कत अपनी परतीति नसावत, मैं पायौ हरि हीरा-१-१३४। (ख) बिछुरे श्रीब्रजराज आजु तौ नैननि ते परतीति गई-२५३७।
संज्ञा
[सं. प्रतीति]

परतेजना
छोड़ना, त्यागना।
क्रि. स.
[सं. परित्यजन]

परतेजी
छोड़ा, त्यागा।
उ.- जैसे उन मोकों परतेजी कबहुँ फिरि न निहारत हैं।
क्रि. स.
[हिं. परतेजना]

परतौ
प्रसिद्ध होता, ख्यात, होता, (नाम) पड़ता या होता।
उ.- जौ तू राम-नाम-धन धरतौ¨¨¨¨¨। जम कौ त्रास सबै मिटि जातौ, भक्त नाम तेरौ परतौ-१-२९७।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परत्व
पहले या पूर्व होने भाव।
संज्ञा
[सं.]

परदेश, परदेस
दूसरा देश, विदेश।
उ.-तिनको कठिन करेजो सखी री, जिनको पिय परदेश-२७५३।
वि.
[सं. परदेश]

परदेशिनि, परदेसिनि
विदेश की रहनेवाली, अन्य देशवासिनी।
उ.-मैं परदेसिनि नारि अकेली-९-९४।
वि.
[सं. पुं. परदेशी]

परदेशी, परदेसी
विदेशी।
वि.
[सं. परदेशी]

परदेशी, परदेसी
विदेश में रहनेवाला व्यक्ति।
उ.-कहा परदेशी को पतियारो-२७३१।
संज्ञा

परदोष
संध्याकाल।
संज्ञा
[सं. प्रदोष]

परदोष
त्रयोदशी को शिवजी का व्रत।
संज्ञा
[सं. प्रदोष]

परधान
मुख्य, प्रधान।
वि.
[सं. प्रधान]

परधान
वस्त्र।
उ.-दान-मान-परधान पूरन काम किए।
संज्ञा
[सं. परिधान]

परधान्यौ
प्रधान समझा, सबसे आवश्यक माना।
उ.-यहै मंत्र सबहीं परधान्यौ, सेतु बंध प्रभु कीजै। सब दल उतरि होई पारंगत, ज्यौं न कोउ इक छीजै-९१२१।
क्रि. स.
[सं. प्रधान]

परधाम
परलोक।
संज्ञा
[सं.]

परधाम
ईश्वर।
संज्ञा
[सं.]

परन
टेक, प्रतिज्ञा।
संज्ञा
[सं. प्रण]

परन
बान, आदत।
उ.-राखौ हटकि उतै को धावै उनकी वैसिय परन परी री-१६६४।
संज्ञा
[हिं. पड़ना]

परन
पड़ना, पड़ जाना।
क्रि. अ.

परन
परन न दीनौ-पड़ने नहीं दिया।
उ.-सभा माँझ द्रौपदि-पति राखी, पति पानिप कुल ताकौ। बसन ओट करि कोट बिसंभर, परन न दीन्हौ झाँकौ-१-११३।
प्र.

परनकुटी
पत्तों से बनी कुटी, पर्णकुटी, पर्णशाला।
उ.-तीनि पैंड़ बसुधा हौं चाहौं, परकुटी कौं छावन-८-१३।
संज्ञा
[सं. पर्ण + कुटी]

परन-पुटी
पत्तों का दोना।
संज्ञा
[सं. पर्ण + पुट]

परना
पड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परनाम
नमस्कार, प्रणाम।
संज्ञा
[हिं. प्रणाम]

परनाला
पनाला, मोहरी।
संज्ञा
[सं. प्रणाली]

परनि
चढ़ाई, धावा।
संज्ञा
[हिं. पड़ना]

परनि
बान, आदत, देव, टेक, दूढ़ता।
उ.-(क) परनि परेवा प्रेम की, (रे) चित लै चढ़त अकास। तहँ चढ़ि तीय जो देखई, (रे) भू पर परत निसास-१-३२५। (ख) सूरदास तैसहि ये लोचन का धौं परनि परी। (ग) ऐसी परनि परी, री ! जाको लाज कहा ह्वैहै तिनको। (घ) राखौ हटकि उतै को धावै उनकी वैसिय परनि परी री-१६६४। (ङ) मनहुँ प्रेम की परनि परेवा याही से पढ़ि लीनी-२९०६।
संज्ञा
[हिं. पड़ना]

परनि
रट, रटना।
संज्ञा
[हिं. पड़ना]

परनौत
प्रणाम, नमस्कार।
उ.-ताते तुमको करैं दँडौत। अरु सब नरहूँ को परनौत-५-४।
संज्ञा
[हिं. पर + नवना]

परपंच
दुनिया का जंजाल।
संज्ञा
[सं. प्रपंच]

परपंच
झगड़ा-बखेड़ा।
संज्ञा
[सं. प्रपंच]

परपंच
ढोंग, आडंबर।
संज्ञा
[सं. प्रपंच]

परपंच
छल कपट।
उ.-सोई परपंच करै सखि, अबला ज्यों बरई-२८६१।
संज्ञा
[सं. प्रपंच]

परपंचक
बखेड़िया, झगड़ालू।
वि.
[सं. प्रपंचक]

परपंची
बखेड़िया, झगड़ालू।
वि.
[सं. प्रपंची]

निरमान
रचना, निर्माण।
उ.- नख, अँगुरी, पग, जानु, जंघ, कटि, रचि कीन्हौ निरमान-६४३।
संज्ञा
[सं. निर्माण]

निरमाना
निर्माण करना।
क्रि. स.
[सं. निर्माण]

निरमायल
देवार्पित वस्तु जो विसर्जन के पूर्व ‘नैवेद्य’ और पश्चात ‘निर्माल्य’ कहलाती है। शिव जी के अतिरिक्त सब देवताओं के निर्माल्य- पुष्प और मिष्ठान्न--ग्रहण किये जाते हैं।
उ.- (क) अब तौ सूर यहै बनि आई, हर कौ निज पद पाऊँ। ये दससीस ईस निरमायल, कैंसैं चरन छुवाऊँ-९-१३२। (ख) हरि के चलत भईं हम ऐसी मनहु कुसुम निरमायल दाम-२५३०।
संज्ञा
[सं. निर्माल्य]

निरमूल
जड़रहित, मूलरहित।
वि.
[सं. निर्मूल]

निरमूलना
जड़ से उखाड़ना।
क्रि. स.
[सं. निमूलन]

निरमूलना
नष्ट कर देना।
क्रि. स.
[सं. निमूलन]

निरमोल
अनमोल, अमूल्य।
वि.
[सं. उप. निस्, निर + हिं. मोल]

निरमोल
बहुत बढ़िया।
उ.- ताहि कैं हाथ निरमोल नग दीजियै, जोइ नीकैं परखि ताहि जानै-१-२२३।
वि.
[सं. उप. निस्, निर + हिं. मोल]]

निरमोलक
अमूल्य, अनमोल।
उ.- तुम्हरैं भजन सबहि सिंगार। जो कोउ प्रीति करै पद-अंबुज, उर मंडत निरमोलक हार-१-४१।
वि.
[हिं. निरमोल]

निरमोही
जिसमें मोह-ममता न हो, निर्दय, कठोर-हृदय।
उ.- ऐसी निरमोही माई महरि जसोदा भई बाँध्यौ है गोपाल लाल बाँहनि पसारि-३६२।
वि.
[हिं. निर्मोही]

परपंची
धूर्त, काँइयां।
उ.-सब दल होहु हुस्यार चलहु अब घेरहिं जाई। परपंची है कान्ह कछू मति करै ढिढाई-१० उ.-८।
वि.
[सं. प्रपंची]

परपराना
मिर्च आदि का तीक्ष्ण लगना।
क्रि. अ.
[देश.]

परपार
दूसरी ओर का तट।
संज्ञा
[हिं. पर + पार]

परपीड़क, परपीरक
दूसरे को कष्ट देनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

परपीड़क, परपीरक
दूसरे के कष्ट को समझने और उससे मुक्त करानेवाला।
उ.-मागध हति राजा सब छोरे ऐसे प्रभु पर-पीरक।
संज्ञा
[सं.]

परपूठा
पक्का।
वि.
[सं. परिपुष्ट, प्रा. परिपुट्ठ]

परफुल्ल, परफुल्लित
प्रफुल्लित, आनंदित।
उ.-धन्य पिता जापर परफुल्लित राघव-भूजा-अनूप। वा प्रतापि की मधुर बिलोकनि पर वारौं सब भूप-९-१३४।
वि.
[सं. प्रफुल्ल, हिं. प्रफुल्लित]

परबंध
व्यवस्था, प्रबंध।
संज्ञा
[सं. प्रबंध]

परब
त्योहार, उत्सव।
उ.-आजु परब हँसि खेलो हो मिलि सँग नंदकुमार-२४०२।
संज्ञा
[सं. पर्व]

परबत
पहाड़, पर्वत।
संज्ञा
[सं. पर्वत]

परबत
बड़ा ढेर।
उ.-अति आनंद नंद रस भीने। परबत सात रतन के दीने-१०-३२।
संज्ञा
[सं. पर्वत]

परबल
सशक्त, बली।
वि.
[सं. प्रबल]

परबस
जो स्वतंत्र न हो, पराधीन।
उ.-परबस भयौ प्रभू ज्यौं रजु-बस, भज्यौ न श्रीपति रानौ-१-४७।
वि.
[सं. पर=दुसरा + वश]

परबसता, परबसताई
पराधीनता, परतंत्रता।
संज्ञा
[सं. परवश्यता]

परबाल
मूँगा।
संज्ञा
[सं. प्रबाल]

परबाल
कोंपल।
संज्ञा
[सं. प्रबाल]

परबाह
धारा, प्रवाह।
उ.-उर-कलिंद तैं धँसि जल-धारा उदर-धरनि परबाइ-६३७।
संज्ञा
[सं. प्रवाह]

परबी
पर्व या उत्सव का दिन।
संज्ञा
[हिं. परब]

परबीन, परबीने, परबीनो
दक्ष, कुशल।
उ.-बिबिध बिलास-कला-रस की बिधि उभै अंग परबीनो-२२७५।
वि.
[सं. प्रवीण]

परबेश, परबेश
पैठ, प्रवेश।
उ.-धरत नलिनी बूँद ज्यों जल बचन नहिं परबेश-३४७९।
संज्ञा
[सं. प्रवेश]

परबो
पड़ने की क्रिया या भाव।
उ.-जामें बीती सोई जानै कठिन सुप्रेम पाश को परबो-२८६०।
संज्ञा
[हिं. पड़ना]

परबोध
बोध, ज्ञान।
उ.-होइ ज्यों परबोध उनको मेरी पति जिन जाइ-१६१४।
संज्ञा
[सं. प्रबोध]

परबोधत
समझता या दिलासा देता है।
उ.-पुनि यह कहा मोहिं परबोधत धरनि गिरी मुरझैया।
क्रि. स.
[हिं. परबोधना]

परबोधन
समझाने या दिलासा देने की क्रिया, भाव या उद्देश्य।
उ.-(क) गोपिनि को परबोधन कारन जैहै सुनत तुरंत-२९१३। (ख) हमको परबोधन हरि तौ नहिं पठए- ३२६७।
संज्ञा
[हिं. परबोधना]

परबोधना
जगाना।
क्रि. स.
[सं. प्रबोधना]

परबोधना
ज्ञान का उपदेश करना।
क्रि. स.
[सं. प्रबोधना]

परबोधना
सांत्वना देना, दिलासा देना।
क्रि. स.
[सं. प्रबोधना]

परबोधि
समुझा-बुझाकर, दिलासा देकर।
उ.-(क) रानिनि परबोधि स्याम महल द्वारे आए-२६१९। (ख) सूर नन्द परबोधि पठावत निठुर ठगोरी लाई-२६५४।
क्रि. स.
[हिं. परबोधना]

परबोधो, परबोधौ
ज्ञान का उपदेश दो।
उ.-जो तुम कोटि भाँति परबोधौ जोग-ज्ञान की रीति-३२११।
क्रि. स.
[हिं. परबोधना]

परब्रह्म
ब्रह्म जो जगत से परे है।
संज्ञा
[सं.]

परभव
दूसरा जन्म।
संज्ञा
[सं.]

परभा
प्रकाश, आभा, कांति।
संज्ञा
[सं. प्रभा]

परभाई, परभाउ, परभाऊ
फल, परिणाम, असर।
उ.-यह सब कलयुग कौ परभाउ। जो नृप कैं मन भयउ कुभाउ-१-२९०।
संज्ञा
[सं. प्रभाव]

परभात
प्रातःकाल, प्रभात, सबेरा।
उ.-(क) सुनि सीता, सपने की बात। रामचन्द्र लछिमन मैं देखे, ऐसी बिधि परभात-९-८२। (ख) रथ आरूढ़ होत परभात-९-८२। (ग) रथ-आरूढ़ होत बलि गई होइ आयो परभात-२५३१।
संज्ञा
[सं. प्रभात]

परभाती
प्रातःकालीन गीत।
संज्ञा
[सं. प्रभाती]

परम
सबसे बढ़ा-चढ़ा।
वि.
[सं.]

परम
उत्कृष्ट, श्रेष्ठ, महान्।
उ.-परम गंग कौं छाँड़ि महातम और देव कौं ध्यावैं-१-१५८।
वि.
[सं.]

परम
प्रधान।
वि.
[सं.]

परमगति
मोक्ष, मुक्ति।
संज्ञा
[सं.]

परमतत्व
मूल तत्व या सत्ता जिससे सारी सृष्टि का विकास माना जाता है।
संज्ञा
[सं.]

परमा
छवि, सुंदरता।
संज्ञा
[सं.]

परमाणु
अत्यंत सूक्ष्म अण।
संज्ञा
[सं.]

परमाणुवाद
परमाणुओं से सृष्टि की उत्पत्ति का सिद्धांत।
संज्ञा
[सं.]

परमाणुवादी
परमाणवाद का पोषक।
वि.
[सं.]

परमातम
परब्रह्म, ईश्वर।
उ.-तन स्थूल अरु दूबर होइ। परमातम कौं ये नहि दोइ-५-४।
संज्ञा
[हिं. परमात्मा]

परमातम
अत्यंत धनिष्ठ।
उ.-ता नृप कौ परमातम मित्र। इक छिन रहत न सो अन्यत्र-४-१२।
वि.

परमातमा, परमात्मा
परब्रह्म, ईश्वर।
संज्ञा
[सं.]

परमानंद
अत्यंत सुख।
संज्ञा
[सं.]

परमानंद
ब्रह्म के साक्षात् का सुख, ब्रह्मानंद।
संज्ञा
[सं.]

परमानंद
आनंदस्वरूप ब्रह्म।
संज्ञा
[सं.]

परमतत्व
ब्रह्म।
संज्ञा
[सं.]

परमधाम
बैकुंठ।
संज्ञा
[सं.]

परमपद
श्रेष्ठ पद।
संज्ञा
[सं.]

परमपद
मुक्ति।
संज्ञा
[सं.]

परमपिता, परमपुरुष
परमेश्वर।
संज्ञा
[सं.]

परमफल
श्रेष्ठ फल।
संज्ञा
[सं.]

परमफल
युक्ति।
संज्ञा
[सं.]

परम भट्टारक
एकछत्र राजा की उपाधि।
संज्ञा
[सं.]

परमहंस
ज्ञान की चरमावस्था को पहुँचा हुआ संन्यासी।
संज्ञा
[सं.]

परमहंस
परमात्मा।
उ.-परमहंस तब बचन उचारे-१०उ.-१०६।
संज्ञा
[सं.]

परमानंद
जो आनंदस्वरूप हो।
उ.-तुम अनादि, अविगत, अनंतगुन पूरन परमानंद-१-१६३।
वि.
[सं. परम + आनन्द]

परमान
प्रमाण, सबूत।
संज्ञा
[सं. प्रमाण]

परमान
सत्य बात।
संज्ञा
[सं. प्रमाण]

परमान
सीमा, फैलाव, हद।
उ.-द्वादश कोश रास परमान-१८१६।
संज्ञा
[सं. प्रमाण]

परमान
सत्य, प्रमाणित।
उ.-ऊधौ, बेद बचन परमान-३३९९।
वि.

परमान
पूर्ण
उ.-(क) रिषि कह्यौ ताहि दान-रति देहि। मैं बर देहुँ तोहिं सो लेहि। सत्यवती सराप भय मान। रिषि कौ बचन कियौ परमान-१-२२९। (ख) सिव कौ बचन कियौ परमान-४-५।
वि.

परमान
स्वीकार, मान्य।
उ.-कह्यौ, जो कहौ सो हमैं परमान है-८-८।
वि.

परमानना
सत्य या प्रमाण समझना।
क्रि. स.
[सं. प्रमाण]

परमानना
स्वीकारना, सकारना।
क्रि. स.
[सं. प्रमाण]

परमाने
प्रमाण।
उ.-अब तुम प्रगट भए बसुदेव सुन गर्ग बचन परमाने-२६५०।
संज्ञा
[सं. प्रमाण]

परमिति
मर्यादा।
उ.-(क) पाँचै परमिति परिहरै हरि होरी है-२४५५। (ख) जुरयौ सनेह नँदनंदन सों तजि परमिति कुलकानि-३२१४। (ग) परमिति गए लाज तुम्हीं को हंसिनि ब्याहि काग लै जाहि-१० उ.-१०।
संज्ञा
[सं. परिमिति]

परमिति
परिधि घेरा सीमा, विस्तार।
उ.-(क) कोश द्वादश राज परमिति रच्यो नंदकुमार-१८३७। (ख) उमँग्यौ प्रेम समुद्र दशहूँ दिशि परमिति कही न जाय-१० उ.- ११२।
संज्ञा
[सं. परिमिति]

परमुख
विमुख, विरु।
वि.
[सं. पराङ् मुख]

परमेश, परमेश्वर, परमेसर, परमेसुर, परमेस्वर
सगुण ब्रह्म।
संज्ञा
[सं.]

परमेश्वरी, परमेसरी
दुर्गा, देवी।
संज्ञा
[सं.]

परमोद
आनंद, प्रमोद।
संज्ञा
[सं. प्रमोद]

परमोदना
बहलाना, फुसलाना।
क्रि. स.
[सं. प्रमोद]

परमोधत
धीरज देता है, प्रबोधता है, ढाढ़स बँधाता है।
उ.-धीरज धरहु, नैंकु तुम देखहु, यह सुनि लेति बलैया। पुनि यह कहति मोहिं परमोधति, धरनि गिरी मुरझैया-५६०।
क्रि. स.
[हिं. प्रबोधना]

परमोधना
धीरज देना।
क्रि. स.
[हिं. प्रबोधना]

परमोधि
समझा-बुझाकर।
उ.-माता कौं परमोधि दुहुँनि धीरज धरवायौ-५८९।
क्रि. स.
[हिं. प्रबोधना]

परमान्न
खीर, पायस।
संज्ञा
[सं.]

परमारथ
सारवस्तु, वास्तव सत्ता, यथार्थ तत्व।
उ.-हरि, हौ महापतित अभिमानी। परमारथ सौं बिरत, बिषय रत, भाव-भगति नहिं नैकहुँ जानी-१-१४९।
संज्ञा
[सं. परमार्थ]

परमार्थ
श्रेष्ठ वस्तु।
संज्ञा
[सं.]

परमार्थ
यथार्थ तत्व या सत्ता।
संज्ञा
[सं.]

परमार्थ
मोक्ष।
संज्ञा
[सं.]

परमार्थ
पूर्ण सुख।
संज्ञा
[सं.]

परमार्थवादी
ज्ञानी।
वि.
[सं. परमार्थवादिन]

परमार्थी
यथार्थ तत्व का अन्वेषक या जिज्ञासु।
वि.
[सं. परमार्थिन्]

परमार्थी
मुक्ति चाहनेवाला, मुमुक्ष।
वि.
[सं. परमार्थिन्]

परमिति
नाप, तोल, सीमा।
उ.-सुनि परमिति पिय प्रेम की (रे) चातक चितवन पारि। घन-आसा सब दुख सहै, (पै) अनत न जाँचै बारि-१-३२५।
संज्ञा
[सं. परिमिति]

परयंक
पलँग।
संज्ञा
[सं. पर्यक]

परयौ
पड़ा हुआ हूँ, ठहरा हूँ, स्थित हूँ।
उ.-किए प्रन हौं परयौं द्वारैं, लाज प्रन की तोहिं-१-१०६।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परयौ
पड़ा, गया, पहुँचा, डाला गया।
उ.-नरक कूपन जाइ जमपुर परयौ बार अनेक- १-१०६।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परयौ
इच्छा हुई, (हठ) ठाना, धुन लगी।
उ.-माधौ जू, मन हठ कठिन परयौ। जद्यपि बिद्यमान सब निरखत, दुःख सरीर भरयौ-१-१००।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परयौ
मूर्छित होकर या मरकर गिरा, पतित हुआ।
उ.-भीषम सर-सज्या पर परयौ-१-२७६।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परलउ, परलय
सृष्टि का नाश।
उ.-(क) रात होइ तब परलय होइ।
संज्ञा
[सं. प्रलय]

परला
दूसरी ओर का।
वि.
[हिं. पर + ला]

परली
उस ओर की, दूसरी तरफ की।
उ.-तुव प्रताप परली दिसि पहुँच्यौं रौन बढ़ावै बात-९-१०४।
वि.
[हिं. परला]

परलै
प्रलय, सृष्टि-नाश।
उ.-चतुरमुख कहयौ, सँख असुर स्रुति लै गयौ, सत्यब्रत कहयौ, परलै दिखायौ- ८-१६।
संज्ञा
[सं. प्रलय]

परलोक
दूसरा लोक जैसे स्वर्ग, बैकुंठ।
उ.-राजा कौ परलोक सँवारौ, जुग-जुग यह चलि आयौ-९-५०।
संज्ञा
[सं.]

निरवारिहौं
मुक्त करूँगा। छुड़ाऊँगा।
उ.- कंस कौं मारिहौं, धरनि निरवारिहौं, अमर उद्धारिहौं, उरग-धरनी-५५१।
क्रि. स.
[हिं. निरवारना]

निरवारैं
गाँठ आदि छुड़ाते है, सुलझाते हैं।
उ.- चोली छोरैं हार उतारैं। कर सौं सिथिल केस निरवारैं-७९९।
क्रि. स.
[हिं. निरवारना]

निरवारौ
फैसला, निबटेरा, निर्णय।
उ.- कै हौं पतित रहौं पावन हैं, कै तुम बिरद छुड़ाऊँ। द्वै मैं एक करौं निरवारौ, पतितनिराव कहाऊँ-१-१७९।
संज्ञा
[हिं. निरवारना]

निरवाहु
निबाह, पालन।
संज्ञा
[सं. निर्वाह]

निरवाहना
निभाना।
क्रि. अ.
[सं. निर्वाह]

निरशन
लंघन, उपवास।
संज्ञा
[सं.]

निरशन
जिसने खाया न हो, जिसमें खाया न जाय।
वि.

निरसंक
भय, संकोच-रहित।
वि.
[सं. निःशंक]

निरस
जिसमें रस न हो।
वि.
[सं.]

निरस
जिसमें स्वाद न हो।
वि.
[सं.]

परलोक
मृत आत्मा की अन्य स्थिति-प्राप्ति।
संज्ञा
[सं.]

परवर
परवल (तरकारी)
उ.-पोई परवल फाँग फरी चुनि-२३२१।
संज्ञा
[सं. पटोल]

परवर
श्रेष्ठ, मुख्य, प्रधान।
वि.

परवरदिगार
पालक।
संज्ञा
[फ़ा.]

परवरदिगार
ईश्वर।
संज्ञा
[फ़ा.]

परवरिश
पालन-पोषण।
संज्ञा
[फ़ा.]

परवर्त
आरंभ, प्रचार।
उ.-विष्नु की भक्ति परवर्त जग मैं करी, प्रजा कौं सुख सकल भाँति दीन्हौ-४-११।
संज्ञा
[सं. प्रवर्त]

परवल
एक साग या तरकारी।
संज्ञा
[सं. पटोल]

परवश, परवश्य
पराधीन।
वि.
[सं.]

परवा, परवाई
मिटटी का कटोरे की तरह का एक पात्र।
संज्ञा
[हिं. पुर, पुरवा]

परवा, परवाई
प्रत्येक पक्ष की पहली तिथि, पड़वा, पड़िवा।
संज्ञा
[सं. प्रतिपदा, प्रा. पडिवा]

परवा, परवाई
चिंता, ख्याल।
संज्ञा
[फ़ा.]

परवा, परवाई
भरोसा।
संज्ञा
[फ़ा.]

परवान
प्रमाण।
संज्ञा
[सं. प्रमाण]

परवान
सत्य या यथार्थ बात।
उ.- ऐसे होहु जु रावरे हम जानति परवान-१०१६।
संज्ञा
[सं. प्रमाण]

परवान
सीमा, अवधि।
संज्ञा
[सं. प्रमाण]

परवान
परवान चढ़ना- सब सुख भोगना।
मु.

परवानगी
आज्ञा, अनुमति।
संज्ञा
[फ़ा.]

परवाना
आज्ञापत्र।
संज्ञा
[फ़ा.]

परवाना
पतिंगा।
संज्ञा
[फ़ा.]

परवाल
मूँगा।
संज्ञा
[सं. प्रवाल]

परवाल
कोंपल।
संज्ञा
[सं. प्रवाल]

परवास
प्रवास, यात्रा।
संज्ञा
[सं. प्रवास]

परवाह
चिंता, आशका।
संज्ञा
[फ़ा. परवा]

परवाह
ध्यान, ख्याल।
उ.- नहिं परवाह नंद के ढोंटहिं पूरत बेनु धरे-९६८। (ख) प्रिया मन परवाह नाहीं कोटि आवै जाहिं-२०२१।
संज्ञा
[फ़ा. परवा]

परवाह
आसरा, भरोसा।
संज्ञा
[फ़ा. परवा]

परवाह
बहने का भाव।
संज्ञा
[सं. प्रवाह]

परवीन
चतुर, कुशल।
उ.- (क) तुम परवीन सबै जानत हौ ताते इह कहि आईं-३०१९। (ख) हम जानी जु बिचार पठाए सखा अंग परवीन-३२१७।
वि.
[सं. प्रवीण]

परवेख
वर्षा में चंद्रमा के चारी ओर दिखायी पड़नेवाला घेरा, चंद्रमंडल।
संज्ञा
[सं. परिवेष]

परशंसा
बड़ाई।
उ.- सूर करत परशंसा अपनी हारेउ जीति कहावत-३००८।
संज्ञा
[सं. प्रशंसा]

परश
छूना, स्पर्श।
संज्ञा
[सं. स्पर्श]

परशु
अस्त्र जिसके सिरे पर लोहे का अर्द्धचंद्राकार मूल लगता है।
संज्ञा
[सं.]

परशुधर
परशुधारी, परशुराम।
संज्ञा
[सं.]

परशुराम
जमदग्नि के पुत्र जो ईश्वर के छठे अवतार माने जाते हैं। परशु इनका अस्त्र था।
संज्ञा
[सं.]

परसंग
बात, वार्ता, विषय।
उ.-तहाँ हुतौ इक सुक कौ अंग। तिहिं यह सुन्यौ सकल परसंग-१-२२६।
संज्ञा
[सं. प्रसंग]

परसंसा
बड़ाई।
संज्ञा
[सं. प्रसंसा]

परस
छूना, छूने की क्रिया या भाव, स्पर्श।
उ.- (क) झूठौ सुख अपनौ करि जान्यौ परस प्रिया कै भीनौ-१-६५। (ख) जे पद-पदुम-परस-जल-पावन-सुरसरि-दरस कटत अघ भारे-१-९४।
संज्ञा
[सं. स्पर्श]

परस
पारस पत्थर।
संज्ञा
[सं. परश]

परसत
स्पर्श करना, छूते ही, परसकर।
उ.- परसत चोंच तूल उघरत मुख, परत दुःख कैं कूप-१-१०२।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परसति
परोसती है।
उ.-जसुमति हरष भरी लै परसति। जेंवत हैं अपनी रुचि सौं अति-३९६।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परसन
स्पर्श करने का भाव।
संज्ञा
[हिं. स्पर्श]

परसन
मुँह परसन आना- लल्लो-चप्पो की बातें करने आना। उ.- (क) काहे को मुँह परसन आए जानति हौं चतुराई-१९५७। (ख) ह्याँ आए मुख परसन मेरो हृदय रहति नहि प्यारी-१९६८।
मु.

परसन
आनन्दित, खुश।
उ.-(क) गुरु प्रसन्न, हरि परसन होई-६-५। (ख) तबहिं अशीश दई परसन ह्वै सफल होउ तुम कामा-१० उ.- ६६।
वि.
[सं. प्रसन्न]

परसना
छूना।
क्रि. स.
[सं. स्पर्श]

परसना
छुआना।
क्रि. स.
[सं. स्पर्श]

परसना
(भोजन) परोसना।
क्रि. स.
[सं. परिवेषण]

परसन्न
हर्षित, आनन्दित।
वि.
[हिं. प्रसन्न]

परसन्नता
हर्ष, आनन्द।
संज्ञा
[हिं. प्रसन्नता]

परसपर
आपस में।
उ.- मार परसपर करत आपु मैं, अति आनन्द भए मन माहिं-५३३।
क्रि. वि.
[सं. परस्पर]

परसहु
भोजन परोसो।
उ.- परसहु वेगि, वेर कत लावति, भूखे सारँगपानी-३९५।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परसा
फरसा, परशु।
संज्ञा
[सं. परशु]

परसाइ
स्पर्श करके, स्पर्श करने से।
उ.- जो मम भक्त मग मैं जाइ। होइ पवित्र ताहि परसाइ-७-२।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परसाऊँगो
स्पर्श कराऊँगा।
उ.- तुव मिलिबे की साध भुजा भरि उर सों कुच परसाऊँ गो-१९४४।
क्रि. स.
[हिं. परसाना]

परसाऊ
स्पर्श कराया, छआया।
उ.- बामन रूप धरयौ बलि छलि कै, तीनि परग बसुधाऊ। स्रमजल ब्रह्म-कमंडल राख्यौ दरसि चरन परसाऊ-१०-२२१।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परसाए
(भोजन) परसवाया, (भोजन) सामने रखवाया।
उ.- (क) महर गोप सब ही मिलि बैठे, पनवारे परसाए-१०-८९। (ख) भाँति-भाँति ब्यंजन परसाए-९-२४।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परसाद
देवता का भोग, प्रसाद।
उ.- दियो तब परसाद सबको भयो सबन हुलास-पृ. ३४८ (५७)।
संज्ञा
[सं. प्रसाद]

परसादी
देवता का भोग।
संज्ञा
[सं. प्रसाद]

परसाना
स्पर्श कराना।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परसाना
भोजन सामने रखवाना।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परसायो
(भोजन) सामने रखवाया।
उ.- पहिले पनवारौ परसायौ-२३२१।
क्रि. स.
[हिं. परसाना]

परस्पर
आपस में, एक दूसरे के साथ।
उ.- मोहिं देखि सब हँसत परस्पर, दै दै तारी-१-१७५।
क्रि. वि.
[सं.]

परस्यो, परस्यौ
स्पर्श किया, छुआ।
उ.- दूरि देखि सुदामा आवत, धाइ परस्यौ चरन-१-२०२।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परस्यो, परस्यौ
(भीजन) सामने रखा।
उ.- नाना बिधि जेंवन करि परस्यौ-पृ. ३३९ (८५)।
क्रि. स.

परहस्त
एक राक्षस।
उ.- दुर्धर परहस्त-संग आइ सैन भारी। पवन-दूत दानव-दल ताड़े दिसिचारी-९-९६।
संज्ञा

परहार
आघात, वार, चाट, मार।
उ.-(क) हिरनकसिपु-परहार थक्यौ, प्रहलाद न न नैंकु डरै-१-३७। (ख) अस्त्र-सस्त्र-परहार न डरौं-७-२।
संज्ञा
[सं. प्रहार]

परहारि
मारो, आघात करो।
क्रि. अ.
[हिं. प्रहारना]

परहारि
मारने के लिए चलाओ, फेंको।
उ.- कह्यौ असुर, सुरपति संभारि। लै करि बज्र मोहिं परहारि-५-६।
क्रि. अ.
[हिं. प्रहारना]

परहेज
बचना, दूर रहना।
संज्ञा
[फ़ा.]

परहेलना
तिरस्कार करना।
क्रि. स.
[सं. प्रहेलना]

परा
चार प्रकार की वाणियों में पहली।
संज्ञा
[सं.]

परसावत
छुआता है।
उ.- नासा सों नासा लै जोरत नैन नैन परसावत-१८६३।
क्रि. स.
[हिं. परसाना]

परसावति
छुआती है।
उ.- (क) मनहु पन्नगिनि उतरि गगन ते दल पर फन परसावति-१३४५।
क्रि. स.
[हिं. परसाना]

परसावै
स्पर्श करावे।
उ.- सुरसरि जब भुव ऊपर आवै। उनकौं अपनौं जल परसावै-९-९।
क्रि. स.
[हिं. परसाना]

परसाल
पिछले साल।
अव्य.
[सं. पर + फ़ा. साल]

परसाल
अगले साल।
अव्य.
[सं. पर + फ़ा. साल]

परसि
स्पर्श करके, छूकर।
उ.- जे पद-पदुम परसि ब्रजभामिनि सरबस दै, सुतदसदन बिसारे-१-९४।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परसि
(शरीर में) मलकर या चुपड़कर।
उ.- धूरि झारि तातौ जल ल्याई, तेल परसि अन्हवाइ-१०-२२६।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परसि
(भोजन) परोसकर या सामने रखकर।
उ.- अरु खुरमा सरस सवारे। ते परसि धरे हैं न्यारे-१०-१८३।
क्रि. स.

परसिद्ध
विख्यात, प्रसिद्ध।
वि.
[सं. प्रसिद्ध]

परसु
फरसा, परशु।
संज्ञा
[सं. परशु]

परसुराम
जमदग्नि ऋषि के पुत्र जो ईश्वर के छठे अवतार माने जाते हैं। 'परशु' इनका मुख्य शस्त्र था।
संज्ञा
[सं. परशुराम]

परसैं
छूते है, स्पर्श करते हैं।
उ.- कपट-हेत परसैं बकी जननी-गति पावै-१-४।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परसै
स्पर्श करता है।
उ.- करत फन-घात बिष जात उतरात अति, नीर जरि जात, नहिं गात परसै-५५२।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परसों
बीते हुए 'कल' से एक दिन पहले।
अव्य.
[सं. परश्वः]

परसों
आनेवाले 'कल' से एक दिन बाद।
अव्य.
[सं. परश्वः]

परसोतम
श्रेष्ठ या उत्तम व्यक्ति।
संज्ञा
[सं. पुरुषोत्तम]

परसोतम
परमेश्वर।
संज्ञा
[सं. पुरुषोत्तम]

परसौ
छुओ, स्पर्श करो।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परसौ
निमग्न हो, स्नान करो।
उ.- सहस बार जौ बेनी परसौ, चंद्रायन कीजै सौ बार। सूरदास भगवंत भजन बिनु, जम के दूत खरे हैं द्वार-२-३।
क्रि. स.
[हिं. परसना]

परसौहाँ
छूनेवाला।
वि.
[सं. स्पर्श]

पराक्रम
बल पौरुष।
संज्ञा
[सं.]

पराक्रमी
बली, पुरुषार्थी।
वि.
[पराक्रमिन्]

पराग
फूलों के बीच लंबे केसरों पर जमी रज जिसके फूलों के बीच के गर्भ-कोशों में पड़ने से गर्भाधान होता है ; पुष्परज।
संज्ञा
[सं.]

पराग
एक सुगधित चूर्ण।
संज्ञा
[सं.]

पराग
चंदन।
संज्ञा
[सं.]

परागकेसर
फूलों के पतले सूत्र जिनकी नोक पर पराग लगा रहता है।
संज्ञा
[सं.]

परागना
अनुरक्त होना।
क्रि. अ.
[सं. उपराग]

परागी
अनुरक्त हुई।
उ.- प्रीति नदी महँ पाँव न बोरयौ द्दष्टि न रूप परागी-३३३५।
क्रि. अ.
[हिं. परागना]

पराङ मुख
विमुख, विरुद्ध।
वि.
[सं.]

पराजय
हार।
संज्ञा
[सं.]

निरवार
मुक्ति, छुटकारा, बचाव।
उ.- यही सोच सब पगि रहे कहूँ नहीं निरवार।
संज्ञा
[हिं. निरवारना]

निरवार
अलग करने, छुड़ाने या सुलझाने का काम।
संज्ञा
[हिं. निरवारना]

निरवार
निबटारा फैसला।
संज्ञा
[हिं. निरवारना]

निरवारना
अलग-अलग करते हैं।
उ.- ए दोउ नीर खीर निरवारत इनहिं बधायौ कंस-३०४९।
संज्ञा
[हिं. निवारण]

निरवारना
उलझी चीज को सुलझाते हैं।
उ.- कबहूँ कान्ह आपने कर सों केस-पास निरवारत।
संज्ञा
[हिं. निवारण]

निरवारना
टालना, रोकना।
संज्ञा
[हिं. निवारण]

निरवारना
बंधन से मुक्त करना।
संज्ञा
[हिं. निवारण]

निरवारना
त्यागना।
संज्ञा
[हिं. निवारण]

निरवारना
निर्णय या फैसला करना।
संज्ञा
[हिं. निवारण]

निरवारि
बंधन खोलना, छुड़ाना, मुक्त करना।
उ.- कोउ कहति मैं बाँधि राखौं, को सकैं निरवारि-१०-२७३।
क्रि. स.
[हिं. निरवारना]

परा
ब्रह्मविध्या।
संज्ञा
[सं.]

परा
श्रेष्ठ।
वि.

परा
जो सबसे परे हो।
वि.

परा
पंक्ति, कतार।
संज्ञा
[?]

पराइ
भागना।
उ.- कोउ कहति मोहिं देखि द्वारै, उतहिं गए पराइ-१०-२७३।
क्रि. अ.
[हिं. पराना]

पराई
दूसरे की, अन्य व्यक्ति की।
उ.- (क) तुम बिनु और न कोउ कृपानिधि पावै पीर पराई-१-१९५। (ख) सोवत मुदित भयौ सपने मैं, पाई निधि जो पराई-१-१४७।
वि.
[हिं. पुं. पराया]

पराई
भाग गये।
उ.- (क) सुरनि की जीत, असुर मारे बहुत, जहाँ तहँ गए सबहीं पराई-८-८। (ख) सकुच न आवत धोष बसत की तजि ब्रज गए पराई-३२०८।
क्रि. अ.
[हिं. पराना]

पराए
भागे।
उ.- अंबरीष-हित साप निवारे, व्याकुल चले पराए- १-३१।
क्रि. अ.
[हिं. पराना]

पराकाष्ठा
चरम सीमा, हद।
संज्ञा
[सं.]

पराकृत
सहज सामान्य (रूप)।
उ.-सूरदास प्रभु होहु पराकृत अस कहि भुज के चिह्न दुरावति-१०-७।
वि.
[सं. प्रकृत]

पराजित
हारा हुआ, परास्त।
वि.
[सं.]

परात
ऊँचे किनारे या कंडल की काफी बड़ी थाली।
संज्ञा
[सं. पात्र]

परात
भागता है।
उ.- बेग-बिरुद्ध होत कुंदनपुर हंस को अंश काग लै परात-१० उ.- ११।
क्रि. अ.
[हिं. पराना]

पराधीन
परवश, दूसरे के अधीन।
उ.- पराधीन पर-बदन निहारत मानत मूढ़ बड़ाई-१-१९५।
वि.
[सं. पर + आधीन]

पराधीनता
दूसरे की अधीनता।
संज्ञा
[सं.]

परान
प्राण।
उ.-(क) भीषम धरि हरि कौ उर ध्यानं। हरि के देखत तजे परान-१-२८०। (ख) कै वह भाजि सिंधु मैं डूबी, कै उहिं तज्यौ परान-९-७५।
संज्ञा
[सं. प्राण]

पराना
भागना।
क्रि. अ.
[सं. पलायन]

परानी
भागी, गयी, लुप्त हुई।
उ.-चिरई चुह-चुहानी चंद की ज्यौति परानी रजनी बिहानी प्राची पियरी प्रवान की -१६०९।
क्रि. अ.
[हिं. पराना]

परानी
जाति परानी-भागी जाती हूँ।
उ.-करत कहा पिय अति उताइली मैं कहुँ जात परानी-१६०१।
प्र.

पराने
भाग गये।
उ.-(क) हरि सब भाजन फोरि पराने-१०-३२८। (ख) कोउ डर डर दिसि-बिदिसि पराने-१० उ.-३१।
क्रि. अ.
[हिं. पराना]

परालब्ध
प्रारबध, भाग्य।
उ.-अरु जो परालब्ध सौं आवै। ताही कौ सुख सौं बरतावै-३-१३।
संज्ञा
[सं. प्रारब्ध]

पराव
भागने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. पराना]

पराव
दुराव-छिपाव।
संज्ञा
[हिं. पराया]

परावन
भगदड़, भागड़।
उ.-ग्वाल गए जे धेनु चरावन। तिन्हैं परयौ बन माँझ परावन-१०५०।
संज्ञा
[हिं. पराना]

परावर्तन
लौटना, पलटना।
संज्ञा
[सं.]

परावा
दूसरे का, पराया।
वि.
[हिं. पराया]

पराशर, परासर
मुनिवर वशिष्ठ और शक्ति के पुत्र। सत्यवती पर मुग्ध होकर इन्होंने उसका कुमारीत्व भंग किया जिससे व्यास कृष्ण द्वैपायन का जन्म हुआ।
संज्ञा
[सं. पराशर]

पराश्रय
दूसरे का सहारा, भरोसा या अवलंब।
संज्ञा
[सं.]

पराश्रय
परवशता।
संज्ञा
[सं.]

पराश्रित
दूसरे के सहारे या भरोसे पर।
वि.
[सं.]

परामर्श
स्मृति।
संज्ञा
[सं.]

परामर्श
सलाह, मंत्रणा।
संज्ञा
[सं.]

परायण, परायन
निरत, प्रवृत्त, लीन, तत्पर।
उ.-बहुतक जन्म पुरीष-परायन, सूकर स्वान भयौ-१-७८।
वि.
[सं. परायण]

परायण, परायन
गया हुआ।
वि.
[सं. परायण]

परायण, परायन
शरण का स्थान, आश्रय।
संज्ञा

परायत्त
परवश, पराधीन।
वि.
[सं.]

पराया, परार, परारा
दूसरे का बिराना।
वि.
[हिं. पर]

परारी
परायी, दूसरे की।
उ.-सूरदास धृग धृग तिनको है जिनके नहिं पीर परारी- पृ. ३३२ (१०)।
वि.
[हिं. परार]

परार्थ
जो दूसरे के लिए हो।
वि.
[सं.]

परार्थ
दूसरे का काम या लाभ।
संज्ञा

परान्न
दूसरे का दिया भोजन।
संज्ञा
[सं.]

परान्यौ
भागा, भाग गया।
उ.-कागासुर आवत नहिं जान्यौ। सुनि कहत ज्यौ लेइ परान्यौ-३९१।
क्रि. अ.
[हिं. पराना]

पराभव
हार, पराजय।
संज्ञा
[सं.]

पराभव
तिरस्कार।
संज्ञा
[सं.]

पराभव
नाश, विनाश।
संज्ञा
[सं.]

पराभूत
पराजित।
वि.
[सं.]

पराभूत
नष्ट।
वि.
[सं.]

परामर्श
खींचना।
संज्ञा
[सं.]

परामर्श
विवेचन।
संज्ञा
[सं.]

परामर्श
निर्णय।
संज्ञा
[सं.]

पराश्रित
दूसरे के वश में या अधीन।
वि.
[सं.]

परास
ढाक, टेसू।
संज्ञा
[सं. पलाश]

परासी
एक रागिनी।
संज्ञा
[सं.]

परास्त
पराजित।
वि.
[सं.]

परास्त
दबा हुआ।
वि.
[सं.]

पराहिं
भाग जाते हैं, भागते हैं।
उ.-नाम सुनत त्यौं पाप पराहिं। पापी हू बैकुंठ सिधाहिं-६-४।
क्रि. अ.
[हिं.] पलाना]

पराह्न
दोपहर के बाद का समय।
वि.
[सं.]

परि
छाकर, आच्छादित करके।
उ.-अति बिपरीत तृनावर्त आयौ। बात-चक्र मिस ब्रज ऊपर परि, नंद पौरि कै भीतर धायौ-१०-७७।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परि
गिरकर, लेटकर।
उ.-(क) मारग रोकि रह्यौ द्वारैं परि पतित-सिरोमनि सूर-४८७।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परि
निश्चिंत होकर।
उ.-सूर अधम की कहौ कौन गति, उदर भरे, परि सोए-१-५२।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परि
परि आई- पड़ गई है, आदत हो गई है।
उ.-ज्यौ दिनकरहिं उलूक न मानत, परि आई यह टेव-१-१००।
प्र.

परि
चारो-ओर', 'अतिशय', म', 'पूर्णता' आदि अर्थों की वृद्धि करनेवाला एक उपसर्ग।
उप.

परिकर
पलँग।
संज्ञा
[सं.]

परिकर
परिवार।
संज्ञा
[सं.]

परिकर
समूह।
संज्ञा
[सं.]

परिकर
कमरबंद।
संज्ञा
[सं.]

परिकर
एक अर्थालंकार।
संज्ञा
[सं.]

परिकरमा
प्रदक्षिणा।
संज्ञा
[सं. परिक्रमा]

परिकरांकुर
एक अर्थालंकार।
संज्ञा
[सं.]

परिकीर्ण
विस्तृत।
वि.
[सं.]

परिकीर्ण
सर्मापित।
वि.
[सं.]

परिक्रमा
मंदिर की फेरी।
संज्ञा
[सं. परिक्रम]

परिखना
जाँचना-परखना।
क्रि. स.
[हिं. परखना]

परिखना
बाट जोहना, राह देखना।
क्रि. स.
[हिं. प्रतीक्षा]

परिगणन
भली भाँति गणना करना।
संज्ञा
[सं.]

परिगणित
जो गिना जा चुका हो।
वि.
[सं.]

परिगह
कुटुम्बी, बाल-बच्चे।
संज्ञा
[सं. परिग्रह]

परिग्रह
ग्रहण।
संज्ञा
[सं.]

परिग्रह
संग्रह।
संज्ञा
[सं.]

परिग्रह
स्वीकार।
संज्ञा
[सं.]

परिग्रह
विवाह।
संज्ञा
[सं.]

परिग्रह
परिवार।
संज्ञा
[सं.]

परिग्रह
अनुग्रह।
संज्ञा
[सं.]

परिचय
जानकारी, ज्ञान।
संज्ञा
[सं.]

परिचय
लक्षण।
संज्ञा
[सं.]

परिचय
व्यक्ति सम्बन्धी जानकारी।
संज्ञा
[सं.]

परिचय
जान-पहचान।
संज्ञा
[सं.]

परिचर
सेवक।
संज्ञा
[सं.]

परिचर
सेनापति।
संज्ञा
[सं.]

परिचरजा, परिचर्जा, परिचर्या
सेवा-शुश्रूषा।
संज्ञा
[सं. परिचर्या]

परिचरजा, परिचर्जा, परिचर्या
रोगी की सेवा-टहल।
संज्ञा
[सं. परिचर्या]

परिचायक
परिचय देनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

परिचार
सेवा-शुश्रूषा, टहल।
संज्ञा
[सं.]

परिचारक
सेवक, नौकर।
संज्ञा
[सं.]

परिचारना
सेवा करना।
क्रि. स.
[सं. परिचारण]

परिचारक
सेवक, टहलुआ।
संज्ञा
[सं.]

परिचारिका
सेविका, टहलनी।
संज्ञा
[सं.]

परिचारी
सेवक, चाकर।
वि.
[सं. परिचारिन्]

परिचालक
चलाने या गति देनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

परिचालक
संचालक।
संज्ञा
[सं.]

निरर्थ, निरर्थक
अर्थहीन।
वि.
[सं.]

निरर्थ, निरर्थक
व्यर्थ।
वि.
[सं.]

निरर्थ, निरर्थक
निष्फल।
वि.
[सं.]

निरलज्ज
लज्जाहीन, बेशर्म।
उ.- तृष्ना बहिनि, दीनता सहचरि, अधिक प्रीतिबिस्तारी। अति निसंक, निरलज्ज, अभागिनि, घर घर फिरत न हारी-१-१७३।
वि.
(सं. निर्लज्ज)

निरवद्य
जिसे कोई बुरा न कहे।
वि.
[सं.]

निरवधि
असीम।
वि.
[सं.]

निरवधि
निरंतर।
वि.
[सं.]

निरवयव
अंगरहित, निराकार।
वि.
[सं.]

निरावलंब
आधार या आश्रय-रहित।
वि.
[सं.]

निरवाना
निराने को प्रेरित करना।
क्रि. स.
[हिं. निराना]

परिचालन
संचालन।
संज्ञा
[सं.]

परिचालन
कार्यनिर्वाह।
संज्ञा
[सं.]

परिचालित
संचालित।
वि.
[सं.]

परिचित
ज्ञात, जाना-बूझा।
वि.
[सं.]

परिचित
जिसको जानकारी हो, अभिज्ञ।
वि.
[सं.]

परिचित
मुलाकाती।
वि.
[सं.]

परिचो
ज्ञान, परिचय।
संज्ञा
[सं. परिचय]

परिच्छद
खोल, गिलाफ आदि ढकनेवाली वस्तु।
संज्ञा
[सं.]

परिच्छद
वस्त्र, पोशाक।
संज्ञा
[सं.]

परिच्छद
राजचिन्ह।
संज्ञा
[सं.]

परिच्छन्न
ढका हुआ।
वि.
[सं.]

परिच्छन्न
वस्त्र-सज्जित।
वि.
[सं.]

परिच्छा
परीक्षा।
संज्ञा
[सं. परीक्षा]

परिच्छिन्न
मर्यादित।
वि.
[सं.]

परिच्छिन्न
विभाजित।
वि.
[सं.]

परिच्छेद
ग्रंथ का एक स्वतंत्र भाग।
संज्ञा
[सं.]

परिच्छेद
सीमा, हद।
संज्ञा
[सं.]

परिच्छेद
विभाग।
संज्ञा
[सं.]

परिच्छेद
निश्चय।
संज्ञा
[सं.]

परिछन
विवाह की एक रीति जिसमें वर के द्वार पर आते ही आरती करते हैं।
संज्ञा
[हिं. परछन]

परिणत
रूपांतरित, परिवर्तित।
वि.
[सं.]

परिणत
पत्रा हुआ।
वि.
[सं.]

परिणत
प्रौढ़, पुष्ट।
वि.
[सं.]

परिणति
झुकाव।
संज्ञा
[सं.]

परिणति
रूपांतर होना।
संज्ञा
[सं.]

परिणति
परिपाक।
संज्ञा
[सं.]

परिणति
प्रौढ़ता।
संज्ञा
[सं.]

परिणति
अंत।
संज्ञा
[सं.]

परिणय
विवाह।
संज्ञा
[सं.]

परिणाम
रूपांतर, विकृति।
संज्ञा
[सं.]

परिछाहीं
छाया, परछाई।
संज्ञा
[हिं. परछाईं]

परिजंक
पलँग।
संज्ञा
[सं. पर्यंक]

परिजटन
टहलना, घूमना।
संज्ञा
[सं. पर्यटन]

परिजन
परिवार, भरण-पोषण के लिए आश्रित व्यक्ति।
संज्ञा
[सं.]

परिजन
सेवक, अनुचर।
संज्ञा
[सं.]

परिजात
उत्पन्न, जन्मा हुआ।
वि.
[सं.]

परिज्ञा
संशयरहित बुद्धि।
संज्ञा
[सं.]

परिज्ञात
निश्चित रूप से ज्ञात।
वि.
[सं.]

परिज्ञान
पुर्ण निश्चयात्मक ज्ञान।
संज्ञा
[सं.]

परिणत
नम्र, नत।
वि.
[सं.]

परिणाम
विकास।
संज्ञा
[सं.]

परिणाम
अवसान, अंत।
संज्ञा
[सं.]

परिणाम
फल, नतीजा।
संज्ञा
[सं.]

परिणामदर्शी
दूरदर्शी, सूक्ष्मदर्शी।
वि.
[सं.]

परिणीत
विवाहित।
वि.
[सं.]

परिणीत
समाप्त।
वि.
[सं.]

परिणेता
पति, स्वामी।
संज्ञा
[सं. पाणेतृ]

परितच्छ
जिसको स्पष्ट देखा जा सके।
वि.
[सं. प्रत्यक्ष]

परितप्त
तपा हुआ।
वि.
[सं.]

परितप्त
दुखित।
वि.
[सं.]

परितोष
संतोष।
उ.-सूरदास अब क्यों बिसरत है, मधु-रिपु को परितोष-पृ. ३३२ (१८)।
संज्ञा
[सं.]

परितोष
हर्ष।
संज्ञा
[सं.]

परितोषक
पारितोष देनेवाला।
वि.
[सं.]

परितोषण, परितोषन
संतोष।
उ.-मानापमान परम परितोषन सुस्थल थिति मन राख्यो-३०१४।
संज्ञा
[सं. परितोषिण]

परितोषी
संतोषी।
वि.
[सं. परितोषिन्]

परितोस
संतोष।
संज्ञा
[सं. परितोष]

परित्यक्त
त्यागा हुआ।
वि.
[सं.]

परित्यक्ता
त्यागी हुई।
वि.
[सं. परित्यक्त]

परित्यजन
त्यागने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

परित्याग
त्यागने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

परिताप
आँच, ताव।
संज्ञा
[सं.]

परिताप
दुख, क्लेश।
संज्ञा
[सं.]

परिताप
पछतावा।
संज्ञा
[सं.]

परिताप
भय।
संज्ञा
[सं.]

परिताप
कँपकपी।
संज्ञा
[सं.]

परितापी
दुखी।
वि.
[सं.]

परितापी
सतानेवाला।
वि.
[सं.]

परितुष्ट
बहुत संतुष्ट और प्रसन्न।
वि.
[सं.]

परितुष्टि
संतोष।
संज्ञा
[सं.]

परितुष्टि
प्रसन्नता।
संज्ञा
[सं.]

परिनिर्वाण
पूर्ण मोक्ष।
संज्ञा
[सं.]

परिनौत
प्रणति, प्रणाम, नमकार।
उ.-तातैँ तुमकौं करत दँडौत। अरु सब नरहूँ कौ परिनौत-५-४।
संज्ञा
[हिं. परनवना]

परिपक्व
खूब पका हुआ।
वि.
[सं.]

परिपक्व
अच्छी तरह पचा हुआ।
वि.
[सं.]

परिपक्व
पूर्ण विकसित, प्रौढ़।
वि.
[सं.]

परिपक्व
पूर्ण अनुभवी।
वि.
[सं.]

परिपक्व
निपुण, प्रवीण।
वि.
[सं.]

परिपाक
पकने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

परिपाक
पचने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

परिपाक
प्रौढ़ाता, पूर्णता।
संज्ञा
[सं.]

परित्राण
बचाव, रक्षा।
संज्ञा
[सं.]

परित्राता
रक्षक।
संज्ञा
[सं. परित्रातृ]

परिधन, परिधान
धोती आदि नीचे पहनने का वस्त्र।
संज्ञा
[सं. परिधान]

परिधन, परिधान
वस्त्र।
उ.-(क) खान पान परिधान राज सुख जो कोउ कोटि लड़ावै-२७१०। (ख) खान-पान-परिधान मैं (रे) जोबन गयौ सब बीति-१-३२५।
संज्ञा
[सं. परिधान]

परिधि
घेरा।
संज्ञा
[सं.]

परिधि
दायरे की रेखा।
संज्ञा
[सं.]

परिधि
मंडल, परिवेश।
संज्ञा
[सं.]

परिधि
कक्षा।
संज्ञा
[सं.]

परिधि
वस्त्र।
संज्ञा
[सं.]

परिनय
विवाह।
संज्ञा
[सं. परिणय]

परिपाक
अनुभव।
संज्ञा
[सं.]

परिपाक
निपुणता, प्रवीणता।
संज्ञा
[सं.]

परिपाक
परिणाम, फल।
संज्ञा
[सं.]

परिपाटि, परिपाटी
क्रम, सिलसिला।
संज्ञा
[सं. परिपाटी]

परिपाटि, परिपाटी
प्रणाली, रीति, चाल, ढंग, नियम।
उ.-(क) बदन उधारि दिखायौ अपनौ नाटक की परिपाटी-१०-२५४। (ख) पहिली परिपाटी चलौ-१०१९। (ग) वै सुफलकसुत ए सखी ऊधौ मिली एक परिपाटी-३०५६।
संज्ञा
[सं. परिपाटी]

परिपालन
रक्षा करना, बचाना।
उ.-गाए सूर कौन लहिं उबरयौ, हरि परिपालन पन रं-१-६६।
संज्ञा
[सं.]

परिपालन
रक्षा, बचाव।
संज्ञा
[सं.]

परिपुष्ट
बहुत हष्ट पुष्ट।
वि.
[सं.]

परिपूरक
लबालब भर देनेवाला।
वि.
[सं.]

परिपूरक
धन-धान्य से पूर्ण करनेवाला।
वि.
[सं.]

निरस्त
रद या अस्वीकार किया हुआ।
वि.
[सं.]

निरस्त
अस्पष्ट रूप से उच्चरित।
वि.
[सं.]

निरस्त्र
अस्त्रहीन, निहत्था।
वि.
[सं.]

निरहार
आहार रहित, जिसने भोजन न किया हो।
उ.- एकादसी करैं निरहार-९-४।
वि.
[सं. निराहार]

निरा
खालिस, शुद्ध।
वि.
[सं. निरालय, पू. हिं. निराल]

निरा
केवल, एकमात्र।
वि.
[सं. निरालय, पू. हिं. निराल]

निरा
निपट, बिलकुल।
वि.
[सं. निरालय, पू. हिं. निराल]

निराई
निराने का काम या दाम।
संज्ञा
[हिं. निराना]

निराकरण
छाँटकर अलग करना।
संज्ञा
[सं.]

निराकरण
हटाकर दूर करना।
संज्ञा
[सं.]

परिभाषा
स्पष्ट कथन या भाषण।
संज्ञा
[सं.]

परिभाषा
वस्तु या पदार्थ की व्याख्या-विशेषता-युक्त कथन।
संज्ञा
[सं.]

परिभाषा
निर्दिष्ट अर्थ सूचक विशिष्ट शब्द।
संज्ञा
[सं.]

परिभाषा
कथन जो पारिभाषिफ शब्दों में हो।
संज्ञा
[सं.]

परिभाषा
निंदा।
संज्ञा
[सं.]

परिभाषी
भाषणकर्ता।
संज्ञा
[सं. परिभाषिन्]

परिभुक्त
जो काम में आ चुका हो।
वि.
[सं.]

परिभ्रमण
घेरा।
संज्ञा
[सं.]

परिभ्रमण
घूमना-फिरना।
संज्ञा
[सं.]

परिमल
सुवास, सुगंध।
उ.-(क) बीना झाँझ पखाउज-आउज, और राजसी भोग। पुहुप-प्रजंक परी नवजोबनि, सुख-परिमल-संजोग-९-७५। (ख) चोदा चंदन अगर कुमकुमा परिमल अंग चढ़ायो-१० उ.-६५।
संज्ञा
[सं.]

परिपूरक
संपुर्ण।
वि.
[सं.]

परिपूरण, परिपूरन, परिपूर्ण
परिपूर्ण, खूब भरा हुआ, लबालब।
उ.-(क) ऐसे प्रभु अनाथ के स्वामी। दीन-दयाल, प्रेम-परिपूरन, सब घट अंतरजामी-१-१९०। (ख) अहि के गुन इनमें परिपूरण यामें कछू न पावत-३००९।
वि.
[सं. परिपूर्ण]

परिपूरण, परिपूरन, परिपूर्ण
पूर्ण तृप्त।
वि.
[सं. परिपूर्ण]

परिपूरण, परिपूरन, परिपूर्ण
समाप्त या संपूर्ण किया हुआ।
वि.
[सं. परिपूर्ण]

परिभव, परिभाव
अनादर, अपमान।
संज्ञा
[सं.]

परिभाषक
निंदा करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

परिभाषण
निंदापूर्ण उपालंभ।
संज्ञा
[सं.]

परिभाषण
फटकार।
संज्ञा
[सं.]

परिभाषण
भाषण, बातचीत।
संज्ञा
[सं.]

परिभाषण
नियम।
संज्ञा
[सं.]

परिमाण, परिमान
मान, विस्तार।
संज्ञा
[सं. पारमाण]

परिमाण, परिमान
घेरा।
संज्ञा
[सं. पारमाण]

परिमार्जन
अच्छी तरह धोना, माँजना।
संज्ञा
[सं.]

परिमार्जित
माँजा हुआ।
वि.
[सं.]

परिमार्जित
परिष्कृत।
वि.
[सं.]

परिमित
नपा तुला हुआ।
वि.
[सं.]

परिमित
उचित मात्रा या परिमाण में।
वि.
[सं.]

परिमित
कम, थोड़ा, सीमित।
वि.
[सं.]

परिमिति
नाप, तोल, सीमा।
संज्ञा
[सं.]

परिमिति
मान-मर्यादा, इज्जत।
उ.-परिमिति गए लाज तुमही को हंसिनि ब्याहि काग लै जाइ-१० उ.-६५।
संज्ञा
[सं.]

परिमुक्त
पूर्ण स्वाधीन।
वि.
[सं.]

परियंक
पलँग।
संज्ञा
[सं. पर्यंक]

परियंत
लौ, तक।
अव्य.
[सं. पर्यंत]

परिरंभ, परिरंभण, परिरंभन
गले या छाती से लगाना, आलिंगन।
उ.-(क) फूले फिरत अजोध्यावासी, गनत न त्यागत चीर। परिरंभन हँसि देत परस्पर, आनन्द-नैननि नीर-९-१६। (ख) अनुनय करत बिबस बोलत हैं दै परिरंभण दान-२०३१।
संज्ञा
[सं. परिरंभण]

परिरंभना
आलिंगन करना।
क्रि. स.
[सं. परिरंभ + ना]

परिलेखना
समझना, मानना, ख्याल करना।
क्रि. स.
[सं. परिलेख + ना]

परिवर्त
घुमाव, फेरा।
संज्ञा
[सं.]

परिवर्त
विनिमय।
संज्ञा
[सं.]

परिवर्तक
घूमने-फिरनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

परिवर्तक
घुमाने-फिरानेवाला।
संज्ञा
[सं.]

परिवर्तक
विनिमय करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

परिवर्तन
घुमाव, फेरा।
संज्ञा
[सं.]

परिवर्तन
विनिमय।
संज्ञा
[सं.]

परिवर्तन
बदलने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं.]

परिवर्तन
काल या युग की समाप्ति।
संज्ञा
[सं.]

परिवर्तनीय
जो परिवर्तन-योग्य हो।
वि.
[सं.]

परिवर्तित
बदला हुआ, रूपांतरित।
वि.
[सं.]

परिवर्ती
परिवर्तनशील।
वि.
[सं. परिवर्तिनी]

परिवर्ती
विनिमय करनेवाला।
वि.
[सं. परिवर्तिनी]

परिवर्ती
घूमने-फिरने के स्वभाव वाला।
वि.
[सं. परिवर्तिनी]

परिवर्द्धन
बहुत वृद्धि।
संज्ञा
[सं.]

परिवा
पक्ष की पहली तिथि।
उ.-परिवा सिमिटि सकल ब्रजवासी चले जमुन जलन्हान-२४४५।
संज्ञा
[सं. प्रतिपदा, प्रा. पड़िवआ]

परिवाद
आवरण।
संज्ञा
[सं.]

परिवाद
तलवार की म्यान।
संज्ञा
[सं.]

परिवाद
कूटुंब, परिवार।
संज्ञा
[सं.]

परिवाद
समान वस्तुओं का समूह।
संज्ञा
[सं.]

परिवार, परिवारा
कूटुंब, परिवार।
उ.-और बहुत ताकौ परिवारा। हरि-हलघर मिलि सबकौं मारा-४९९।
संज्ञा
[सं. परिवार]

परिवेश, परिवेष
घेरा, परिधि।
संज्ञा
[सं.]

परिवेश, परिवेष
वर्षा में चंद्र या सूर्य के चारों ओर बननेवाला मंडल।
संज्ञा
[सं.]

परिवेश, परिवेष
परकोटा।
संज्ञा
[सं.]

परिव्राज, परिव्राजक
सन्यासी।
संज्ञा
[सं.]

परिव्राज, परिव्राजक
सदा भ्रमण करनेवाला साधु।
संज्ञा
[सं.]

परिशिष्ट
बचा या छूटा हुआ।
वि.
[सं.]

परिशिष्ट
पुस्तक का वह भाग जो विषय से संबद्ध होता हुआ भी, मुख्य भाग में न दिया जाकर, अंत में दिया जाय।
संज्ञा

परिशीलन
मननपूर्वक अध्ययन।
संज्ञा
[सं.]

परिश्रम
श्रम, उद्यम।
संज्ञा
[सं.]

परिश्रम
थकावट।
संज्ञा
[सं.]

परिश्रमी
जो बहुत श्रम करे।
वि.
[हिं. परिश्रम]

परिश्रांत
श्रमित, थका हुआ।
वि.
[सं.]

परिषत्, परिषद्
सभा, समाज।
संज्ञा
[सं.]

परिस्तान
परियों का लोक।
संज्ञा
[फ़ा.]

परिस्तान
सुन्दर स्त्रियों का समाज या जमघटा।
संज्ञा
[फ़ा.]

परिस्थिति
स्थिति, अवस्था।
संज्ञा
[सं.]

परिहँस
ईर्ष्या।
संज्ञा
[सं. परिहास]

परिहँस
उपहास।
संज्ञा
[सं. परिहास]

परिहरण
छीनना।
संज्ञा
[सं.]

परिहरण
त्याग।
संज्ञा
[सं.]

परिहरना
त्यागना, छोड़ना।
क्रि. स.
[सं. परिहरण]

परिहरि
त्यागकर, छोड़कर, तजकर।
उ.-सूर पतित-पावन पद-अंबुज, सो क्यों परिहरि जाउँ-१-१२८।
क्रि. स.
[हिं. परिहरना]

परिहरै
छोड़ता है, त्यागता है।
उ.-(क) भक्ति-पंथ कौं जो अनुसरै। सुत-कलत्र सौं हित परिहरै-२-२०। (ख) काम-क्रोध-लोभहिं परिहरै-३-१३।
क्रि. स.
[हिं. परिहरना]

परिषद
सदस्य, सभासद।
संज्ञा
[सं.]

परिषेचन
सींचना।
संज्ञा
[सं.]

परिष्कार
संस्कार।
संज्ञा
[सं.]

परिष्कार
स्वच्छता।
संज्ञा
[सं.]

परिष्कार
आभूषण।
संज्ञा
[सं.]

परिष्कार
शोभा।
संज्ञा
[सं.]

परिष्कार
सजावट।
संज्ञा
[सं.]

परिष्कृत
संस्कृत।
वि.
[सं.]

परिष्कृत
सजाया हुआ।
वि.
[सं.]

परिसंख्य
एक अर्थालंकार।
संज्ञा
[सं.]

परिहरौ
त्याग दो, छोड़ो, तंजो।
उ.-तब हरि कह्यौ, टेक परिहरौ ¨¨¨¨¨¨।अहंकार चित तैं परिहरौ-१-२६१।
क्रि. स.
[हिं. परिहरना]

परिहस
दुख, खेद।
उ.-(क) परिहस सूल प्रबल निसि-बासर, तातैं यह कहि आवत। सूरदास गोपाल सरनगत भऐं न को गति पावत-१-१८१। (ख) कंठ बचन न बोलि आवै, हृदय परिहस भीन-३४५१।
संज्ञा
[सं. परिहास]

परिहस
हँसी, दिल्लगी।
उ.-रावन से गहि कोटिक मारौं। जो तुम आज्ञा देहु कृपानिधि तौ यह परिहस सारौं-९-१०८।
संज्ञा
[सं. परिहास]

परिहस
खिलवाड़।
संज्ञा
[सं. परिहास]

परिहार
दोष, अनिष्ट आदि का निवारण।
संज्ञा
[सं.]

परिहार
उपचार।
संज्ञा
[सं.]

परिहार
त्याग।
संज्ञा
[सं.]

परिहार
अनुचित कर्म का प्रायश्चित (नाटक)।
संज्ञा
[सं.]

परिहार
तिरस्कार।
संज्ञा
[सं.]

परिहार
आघात, प्रहार।
उ.-चक्र परिहार हरि कियौ-१० उ.-३५।
संज्ञा
[सं. प्रहार]

निराकरण
मिटाना, रद करना।
संज्ञा
[सं.]

निराकरण
दोष का शमन या निवारण
संज्ञा
[सं.]

निराकरण
युक्ति या तर्क का खंडन।
संज्ञा
[सं.]

निराकांक्ष, निराकांक्षी
जिसे आकांक्षा न हो।
वि.
[सं.]

निराकांक्षा
इच्छा का अभाव।
संज्ञा
[सं.]

निराकार
ब्रह्म या ईश्वर जो आकार-रहित है।
उ.-आदि निरंजन, निराकार, कोउ हुतौ दूसर- २-३६।
संज्ञा
[सं.]

निराकार
जिसका कोई आकार न हो।
वि.

निराकुल
जो आकुल या घबराया हुआ न हो।
वि.
[सं.]

निराकुल
बहुत आकुल या घबराया हुआ।
वि.
[सं.]

निराकृति
आकृति रहित।
संज्ञा
[सं.]

परिहारक
परिहार करनेवाला।
वि.
[सं.]

परिहारा
नाश, वध, आघात।
उ.-याकी कोख औतैरे जो सुत करै प्रान-परिहारा-१०-४।
संज्ञा
[सं. प्रहार]

परिहारी
छीनने या त्यागनेवाला।
वि.
[सं.]

परिहार्य
जो परिहार-योग्य हो।
वि.
[सं.]

परिहास
हँसी-दिल्लगी।
संज्ञा
[सं.]

परिहास
खेल।
संज्ञा
[सं.]

परिहै
पड़ेगा।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परिहै
फँग परिहै- मेरे हाथ आयेगा, मेरे चंगुल या फंदे में फँसेगा। उ.-दूरि करौं लँगराई वाकी मेरे फँग जो परिहै-१२६४। शिर परिहै- सिर पर पड़ेगी या बीतेगी। उ.- सूर क्रोध भयो नृपति काके शिर परिहै-२४७४।
मु.

परी
गिरीं।
उ.-(क) रोवति धरनि परीं अकुलाइ-५४७। (ख) पाइ परीं जुवती सब-७९८।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परी
मोहि परीं-मोहित हो गयीं।
उ.-संग की सखी स्याम सन्मुख भईं, मोहि परीं पसु-पाल सों-८०४।
प्र.

परी
कल्पित सुन्दर स्त्री जो पंखों के सहारे उड़ती मानी गयी है।
संज्ञा
[फ़ा.]

परी
परम सुन्दरी।
संज्ञा
[फ़ा.]

परी
उपस्थित हुई, (दुखद घटना या अवस्था) घटित हुई, पड़ी।
उ.-(क) जो जन सरन भजे बनवारी। ते ते राखि लिए जग-जीवन, जहँ जहँ बिपति परी तहँ टारी-१-२२। (ख) सूर परी जहँ बिपति दीन पर, तहाँ बिदन तुम टारे-१-२५।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

परी
समुझी न परी-समझ में नहीं आई।
उ.-अपनैं जान मैं बहुत करी। कौन भाँति हरि-कृपा तुम्हारी, सो स्वामी, समुझी न परी-१-११५।
प्र.

परी
गरे परी अनचाही, अनिच्छित।
उ.-सूरदास गाहक नहिं कोऊ दिखियत गरे परी-३१०४।
प्र.

परीक्षक
परीक्षा करने या लेनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

परीक्षण
देख-भाल, जाँच-पड़ताल।
संज्ञा
[सं.]

परीक्षा
देखना-भालना, समीक्षा।
संज्ञा
[सं.]

परीक्षा
योग्यता आदि का इम्तहान।
संज्ञा
[सं.]

परीक्षा
अनुभव के लिए प्रयोग।
संज्ञा
[सं.]

परीक्षा
प्रमाण द्वारा निर्णय।
संज्ञा
[सं.]

परीक्षित
जिसकी जाँच या परीक्षा हुई हो।
वि.
[सं.]

परीक्षित
अर्जुन का पौत्र ओर अभिमन्यु का पुत्र। इन्हीं के राज्य काल में द्वापर का अंत और कलियुग का आरंभ माना जाता है। तक्षक के डसने से परीक्षित की मृत्यु हुई थी। जनमेजय सी का पुत्र था।
संज्ञा
[सं.]

परीख
परख, जाँच।
संज्ञा
[हिं. परख]

परीखना
जाँचना परखना।
क्रि. स.
[सं. परीक्षण]

परीच्छित, परीछित
अभिमन्यु का पुत्र जिसकी रक्षा श्रीकृष्ण ने गर्भ में ही की थी।
संज्ञा
[सं. परीक्षित]

परीछम
पैर का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. परी + छ्म]

परीछा
परीक्षा।
संज्ञा
[सं. परीक्षा]

परीजाद
बहुत सुन्दर।
वि.
[फ़ा.]

परीजो
पड़ना, गिरना।
उ.-सूरदास प्रभु हमरे कोते नँदनंदन के पॉँइ परीजो-१० उ.-९५।
क्रि. अ.
[हिं. पड़ना]

पहिरि
पहनकर (कपड़ा, गहना आदि) शरीर पर धारण करके।
उ.-अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल। काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल-१-१५३।
क्रि. स.
[हिं. पहनना]

पहिरे
पहने हैं, धारण किये हैं।
उ.-पहिरे राती चूनरी, सेत उपरना सोहै (हो)-१-४४।
क्रि. स.
[हिं. पहनना]

पहिरै
पहने, धरण करे।
उ.-कच खुबि आँधरि काजर कानी नकटी पहिरै बेसरि-३०२६।
क्रि. स.
[हिं. पहनना]

पहिरौ
पहनो, धारण करो।
उ.-मेरे कहैं, आइ पहिरौ पट-७८७।
क्रि. स.
[हिं. पहनना]

पहिरौ
पहरा।
संज्ञा
[हिं. पहरा]

पहिल
प्रथम, पहला।
वि.
[हिं. पहला]

पहिल
आरंभ में, पहले।
क्रि. वि.
[हिं. पहले]

पहिला
प्रथम।
वि.
[हिं. पहला]

पहिला
पहली बार ब्याई हुई।
वि.
[हिं. पहला]

पहिले, पहिलैं
आरंभ में, सर्व प्रथम, शुरू में।
उ.-मन ममता रुचि सौं रखवारी, पहिलैं लेहु निबेरि-१-५१।
क्रि. वि.
[हिं. पहला]

परुख, परुष
कठोर, सख्त।
वि.
[सं. परुष]

परुख, परुष
अप्रिय, कटु।
वि.
[सं. परुष]

परुख, परुष
निष्ठुर, निर्दय।
वि.
[सं. परुष]

परुखाई, परुषाई
कड़ापन।
संज्ञा
[हिं. परुष]

परुषत
कठोरता, कड़ापन।
संज्ञा
[सं.]

परुषत
अप्रियता, कर्कशता, कटुता।
संज्ञा
[सं.]

परुषत
निर्दयता।
संज्ञा
[सं.]

परुषत्व
कठोरपन।
संज्ञा
[सं.]

परुषत्व
निर्दयपन।
उ.-(ख) देन उरहनो तुमकौं आई। नीकी पहिरिवनि हम पाई-७९९। (ग) रंग रंग पहिरावनि दई, अति बने कन्हाई-२४४१। (घ) पहिरावन जो पाइहैं सो तुमहूँ दैहैं-२५७५।
संज्ञा
[सं.]

पहिरावौ
पहनाओ, धारण कराओ।
उ.-मेरे कहै बिप्रनि बुलाइ, एक सुभ घरी धराइ, बागे चीरे बनाइ, भूषन पहिरावौ-९-९५।
क्रि. स.
[हिं. पहनाना]

पहिलो
प्रथम, पहला।
वि.
[हिं. पहला]

पहीति
पकी हुई दाल।
संज्ञा
[हिं. पहिती]

पहीलि, पहीली
पहली, प्रथम।
वि.
[हिं. पहला]

पहुँच
किसी स्थान तक जा पाने की शक्ति या क्रिया।
संज्ञा
[हिं. प्रभूत, प्रा. पहूच]

पहुँच
फैलाव, विस्तार।
संज्ञा
[हिं. प्रभूत, प्रा. पहूच]

पहुँच
पैठ, प्रवेश, रसाई।
संज्ञा
[हिं. प्रभूत, प्रा. पहूच]

पहुँच
प्राप्ति-सूचना।
संज्ञा
[हिं. प्रभूत, प्रा. पहूच]

पहुँच
समझने की शक्ति या योग्यता।
संज्ञा
[हिं. प्रभूत, प्रा. पहूच]

पहुँच
जानकारी या अभिज्ञता।
संज्ञा
[हिं. प्रभूत, प्रा. पहूच]

पहुँचना
किसी स्थान में जाना या जा पाना।
क्रि. अ.
[हिं. पहुँच]

पहुँचाइ
पहुँचा कर।
क्रि. स.
[हिं. पहुँचाना]

पहुँचाइ
गयौ पहुँचाइ-पहुँचा गया हैं।
उ.-काली आपु गयौ पहुँचाइ-५८२।
प्र.

पहुँचाना
एक स्थान से दूसरे को ले जाना।
क्रि. स.
[हिं. पहुँचाना]

पहुँचाना
किसी के साथ जाना।
क्रि. स.
[हिं. पहुँचाना]

पहुँचाना
विशेष स्थिति या अवस्था तक ले जाना।
क्रि. स.
[हिं. पहुँचाना]

पहुँचाना
घुसाना, पैठाना।
क्रि. स.
[हिं. पहुँचाना]

पहुँचाना
प्राप्त कराना।
क्रि. स.
[हिं. पहुँचाना]

पहुँचाना
अनुभव कराना।
क्रि. स.
[हिं. पहुँचाना]

पहुँचाना
समान या समकक्ष कर देना।
क्रि. स.
[हिं. पहुँचाना]

पहुँचायो
पहुँचा दिया है।
उ.-कर गहि खड़ग कह्यौ देवकि सौं बालक कहँ पहुँचायौ-सारा.३७९।
क्रि. स.
[हिं. पहुँचाया]

पहुँचना
पहुँचा हुआ- (१) सिद्ध। (२) बड़ा जानकार। (३) बहुत चतुर और काँइयाँ।
मु.

पहुँचना
फैलना, विस्तृत होना।
क्रि. अ.
[हिं. पहुँच]

पहुँचना
परिवर्तित स्थिति या दशा को प्राप्त होना।
क्रि. अ.
[हिं. पहुँच]

पहुँचना
घुसना, पैठना, समाना।
क्रि. अ.
[हिं. पहुँच]

पहुँचना
जानना, समझना।
क्रि. अ.
[हिं. पहुँच]

पहुँचना
जानकारी रखना।
क्रि. अ.
[हिं. पहुँच]

पहुँचना
मिलना, प्राप्त होना।
क्रि. अ.
[हिं. पहुँच]

पहुँचना
अनुभव में आना।
क्रि. अ.
[हिं. पहुँच]

पहुँचना
समकक्ष या तुल्य होना।
क्रि. अ.
[हिं. पहुँच]

पहुँचा
कुहनी से नीचे की बाहु, कलाई।
उ.-पहुँचा कर सों गहि रहे जिय संकट मेल्यो-२५७७।
संज्ञा
[हिं. पहुँचना अथवा सं. प्रकोष्ठ]

पहुँचावै
दूसरे स्थान को ले जाय या पहुँचा दे।
उ.-(क) सूरदास की बीनती कोउ लै पहुँचावै-१-४। (ख) सूर आप गुजरान मुसाहिब, लै जवाब पहुँचावै -१-१४२।
क्रि. स.
[हिं. पहुँचाना]

पहुँचिया, पहुँची
कलाई में पहनने का एक गहना जिसमें दाने गुँथे रहते हैं।
उ.-(क) पंकज पानि पहुँचिया राजै-१०-११७। (ख) पहुँची करनि, पदिक उर हरि-नख, कठुला कंठ मंजु गजमनियाँ-१०-१०६।
संज्ञा
[हिं. पुं. पहुँचा, स्त्री. पहुँची]

पहुँचै
पहुँचे में।
उ.-चित्रित बाँह पहुँचिया पहुँचै, हाथ मुरलिया छाजै-४५१।
संज्ञा
[हिं. पहुँचा]

पहुँचै
आकर उपस्थित हो।
क्रि. अ.
[हिं. पहुँचना]

पहुँच्यौ
पहुँचा, उपस्थित हुआ, गया।
उ.-उड़त उड़त सुक पहुँच्यौ तहाँ। नारि ब्यास की बैठी जहाँ-१-२२६।
क्रि. अ.
[हिं. पहुँचना]

पहुनई
पाहुन होकर आने का भाव।
उ.-चारिहु दिवस आनि सुख दीजै सूर पहुनई सूतर-२७०८।
संज्ञा
[हिं. पहुनाई]

पहुनई
अतिथि-सत्कार।
संज्ञा
[हिं. पहुनाई]

पहुना
अतिथि, पाहुन।
संज्ञा
[हिं. पाहुन]

पहुनाई
आगत व्यक्ति का भोजन-पान से सत्कार, अतिथि-सत्कार।
उ.-(क) हम करिहैं उनकी पहुनाई-१०४७। (ख) बहुतै आदर करति सबै मिलि पहुने की करिये पहिसाई-१२८६।
संज्ञा
[हिं. पहुना + ई प्रत्य.]

पहुनाई
करौं पहुनाई- खबर लूँगी, अच्छी तरह पीटूँगी। उ.-साँटिनि मारि करौं पहुनाई, चितवत कान्ह डरायौ-१०-३३०।
मु.

पहुनाई
अतिथि के आनेजाने का भाव।
संज्ञा
[हिं. पहुना + ई प्रत्य.]

पहुनाय
अतिथि-सत्कार।
उ.-करत सबै रुचि की पहुनाय-२४०९।
संज्ञा
[हिं. पहुनाई]

पहुनी
अतिथि-सत्कार।
संज्ञा
[हिं. पहुनाई]

पहुने
अतिथि।
उ.-बहुतै आदर करत सबै मिलि पहुने की करिये पहुनाई-१२८५।
संज्ञा
[हिं. पाहुन]

पहुप
फूल।
संज्ञा
[सं. पुष्प]

पहुम, पहुमि, पहुमी
पृथ्वी।
संज्ञा
[हिं. पुहुमी]

पहुला
एक तरह का फूल।
संज्ञा
[सं. प्रफुल्ल]

पहूँचै
(आ) पहुँचे, (आ) जाय, (आकर) उपास्थित हो।
उ.-तौ लगि बेगि हरौ किन पीर ? जौ लगि आन न आनि पहुँचे, फेरि परैगी भीर-१-१९१।
क्रि. अ.
[हिं. पहुँचना]

पहूँच्यो, पहूँच्यौ
पहुँचा, आया।
क्रि. अ.
[हिं. पहुँचना]

पहूँच्यो, पहूँच्यौ
आइ पहूँच्यौ-आ पहुँचा।
उ.-दनुज एक तहँ आइ पहूँच्यौ-४१०।
प्र.

निरस
सारहीन।
वि.
[सं.]

निरस
जिसमें आनंद न हो, शुष्क।
स.- ऊधौ प्रेमरहित जोग निरस काहे को गायो-३०५७।
वि.
[सं.]

निरस
दया-ममता-स्नेह-रहित।
उ.- संकित नंद निरस बानी सुनि बिलम करत कहा क्यों न चलैं-२६४७।
वि.
[सं.]

निरस
रूखा-सूखा, जिसमें जल या तरी न हो।
वि.
[सं.]

निरस
विरक्त।
वि.
[सं.]

निरसन
दूर करना, हटाना।
संज्ञा
[सं.]

निरसन
रद या अस्वीकार कर देना।
संज्ञा
[सं.]

निरसन
निराकरण।
संज्ञा
[सं.]

निरस्त
फेंका या छोड़ा हुआ (तीर आदि)।
वि.
[सं.]

निरस्त
त्यागा या अलग किया हुआ।
वि.
[सं.]

पहेटना
कठिन परिश्रम से काम पूरा करना।
क्रि. स.
[अनु.]

पहेटना
खूब डटकर खाना।
क्रि. स.
[अनु]

पहेरी, पहेली
बुझौवल, प्रहेलिका।
संज्ञा
[सं. प्रहेलिकी, हिं. पहेली]

पहेरी, पहेली
वह बात जिसका अर्थ न खुलता हो।
संज्ञा
[सं. प्रहेलिकी, हिं. पहेली]

पाँइ
पैर, पाँव।
उ.-अपनी गरज को तुम एक पाँइ नाचे-१४०३।
संज्ञा
[पाँव]

पाँइता
पलँग का पैंताना।
संज्ञा
[हिं. पाँयता]

पाँइनि
पैर, पाँव।
संज्ञा
[हिं. पाँव]

पाँइनि
पाइनी परि- पैर पर गिरकर, बड़ी नम्रता और विलय से। उ.-जेइ जेइ पथिक जात मधुबन तन तिनहूँ सों ब्यथा कहति पाँइनि परि-२८००।
मु.

पाँउ
पैर, पाँव।
संज्ञा
[हिं. पाँव]

पाँउ
पाँव पसार सोना- बिलकुल निश्चिंत होकर सोना।
मु.

पाँक, पाँका
कीचड़।
संज्ञा
[सं. पंक]

पाँख, पाँखड़ा
पंख, डैना।
उ.-कीड़ी तनु ज्यों पाँख उपाई-१०४१।
संज्ञा
[सं. पक्ष]

पाँखड़ी
फूल की पंखुड़ी, पुष्पदल।
संज्ञा
[हिं. पंखुड़ी]

पाँखनि
अनेक पंख।
उ.-जिन पाँखनि कै मुकुट बनायौ, सिर धरि नंदकिसोर-४७७।
संज्ञा
[हिं. पंख]

पाँखि, पाँखी
पंख, पर, डैना।
उ.-सूरदास सोने के पानी, मढ़ौं चौंच अरु पाँखि-९-१६४।
संज्ञा
[सं. पक्ष]

पाँखि, पाँखी
पंखदार पतिंगा।
संज्ञा
[सं. पक्षी]

पाँखि, पाँखी
पक्षी।
संज्ञा
[सं. पक्षी]

पाँखुड़ी
फूल की पंखुड़ी, पुष्पदल।
संज्ञा
[हिं. पंखुड़ी]

पाँखें
पंख, डैने।
उ.-मुरली अधर मोर के पाँखे जिन इह मूरति देखि-३२१७।
संज्ञा
[हिं. पंख]

पाँगुर, पाँगुरी
लूली, पंगु।
उ.-सूर सो मनसा भई पाँगुरी निरखि डगमगे गोड़-१३५७।
वि.
[हिं. पंगु]

पाँच
चार से एक अधिक।
वि.
[सं. पंच]

पाँच
पाँच-सात न आना- बहुत सीधे और सरल स्वभाव का होना। उ.-चकृत भए नारि-नर ठाढ़े पाँच न आवै सात-२४९४। पाँच-सात भूलना- चालाकी भूल जाना। उ.-सूरदास प्रभु के वै बचन सुनहु मधुर मधुर अब मोहिं भूली पाँच और सात-पृ ३१५ (४५)। पाँच की सात लगाना- अनेक बातें गढ़कर दोषी बताना। उ.-पाँच की सात लगायो झूँठी-झूँठी कै बनायौ साँची चो तनक होइ तौलौ सब सहिए-१२७२।
मु.

पाँच
पाँच की संख्या।
संज्ञा

पाँच
कई लोग।
संज्ञा

पाँच
मुखिया लोग, पंच।
संज्ञा

पाँचक
लगभग पाँच, पाँच-सात।
उ.-दीपमालिका के दिन पाँचक गोपनि कहौ बुलाइ-८१२।
वि.
[हिं. पाँच + एक]

पाँचक
पाँच नक्षत्र जिनमें नया कार्य करना मना है।
संज्ञा
[सं. पंचक]

पाँचक
पाँच का समूह।
संज्ञा
[सं. पंचक]

पाँचक
शकुन शास्त्र।
संज्ञा
[सं. पंचक]

पाँचजना
श्रीकृष्ण का शंख जो पंचजन नामक दैत्य से उन्हें मिला था।
संज्ञा
[सं.]

पाँचजना
विष्णु का शंख।
संज्ञा
[सं.]

पाँचवाँ
पाँच के स्थानवाला।
वि.
[हिं.] पाँच]

पांचाल
पंचाल' नामक देश।
संज्ञा
[सं.]

पांचाल
पंचाल देशवाला।
वि.

पांचाल
पंचाल-संबंधी।
वि.

पांचाली
वाक्य-रचना की वह रीति जिसमें बड़े बड़े समासों में कोमल कांत पदावली हो।
संज्ञा
[सं.]

पांचाली
द्रोपदी जो पंचाल देश की राजकुमारी थी।
संज्ञा
[सं.]

पाँचै
किसी पक्ष की पाँचवीं तिथि।
उ.-पाँचै परिमति परिहरै हरि होरी है-२४५५।
संज्ञा
[हिं. पंचमी]

पाँचौ
कुल पाँच।
उ.-करि हरि सौं स्नेह साँचौ। निपट कपट की छाँड़ि अटपटी, इन्द्रिय बस राखहि किन पाँचौ-१-८३।
संज्ञा
[हिं. पाँच]

पाँजना
धातु के टुकड़ों या टूटे पात्रों में टाँका लगाना।
क्रि. स.
[सं. प्रणद्ध, प्रा. पणज्झ, पँज्झ]

पाँजर
पसली।
संज्ञा
[सं. पंजर]

पाँजर
पार्श्व, बगल।
संज्ञा
[सं. पंजर]

पाँजी, पाँझ
नदी के पानी का इतना सूख जाना कि पैदल ही उसे पार किया जा सके।
संज्ञा
[देश.]

पाँडव
कुन्ती और माद्री के गर्भ से उत्पन्न राजा पांडु के पाँच पुत्र-युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव।
संज्ञा
[सं.]

पांडित्य
विद्वत्ता, पंडिताई।
संज्ञा
[सं.]

पांडु
पांडव वंश के आदि पुरुष। ये विचित्रवीर्य की विधवा स्त्री अंबालिका के, व्यासदेव से उत्पन्न पुत्र थे। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव इन्हीं के पुत्र थे।
संज्ञा
[सं.]

पांडु
एक रोग जिसमें शरीर पीला पड़ जाता है।
संज्ञा
[सं.]

पांडु
सफेद रंग।
संज्ञा
[सं.]

पांडुता
पीलापन।
संज्ञा
[सं.]

पांडु-बधू
पांडु की पतोहू।
संज्ञा
[सं.]

पांडु-बधू
द्रौपदी।
उ.- कोपि कौरव गहे केस जब सभा मैं, पांडु की बधू जस नैंकु गायौ-१-५।
संज्ञा
[सं.]

पांडुर
पीला।
वि.
[सं.]

पांडुर
सफेद।
वि.
[सं.]

पांडुलिपि
लेख की मूल प्रति।
संज्ञा
[सं.]

पाँडे, पाँड़ेय
ब्राह्मणों की एक शाखा।
संज्ञा
[सं. पंडित]

पाँडे, पाँड़ेय
पंडित।
संज्ञा
[सं. पंडित]

पाँडे, पाँड़ेय
अध्यापक।
उ.- जब पाँड़े इत-उत कहुँ गए। बालक सब इकठौरे भए-७-२।
संज्ञा
[सं. पंडित]

पाँडे, पाँड़ेय
रसोइया।
संज्ञा
[सं. पंडित]

पाँडे, पाँड़ेय
वह ब्राह्मण जो श्रीकृष्ण का जन्म सुनकर महराने में आया था।
उ.- महराने तैं पाँड़े आयो। ब्रज घर घर बूझत नँद-राउर पुत्र भयौ, सुनि कै उठि धायौ-१०-२४८।
संज्ञा
[सं. पंडित]

पाँति
कतार, पंक्ति।
उ.- अब वै लाज मरति मोहिं देखत बैठी मिलि हरि पाँति -पृ. ३३७ (६५)।
संज्ञा
[सं. पंक्ति]

पाँति
अवली, समूह।
उ.- मानो निकसि बगपौति दाँत उर अवधि सरोवर फोरे-२८१३।
संज्ञा
[सं. पंक्ति]

पाँति
बिरादरी, परिवार-समूह।
उ.- जाति-पाँति कोउ पूछत नाहीं, श्रीपति कैं दरबार-१-२३१।
संज्ञा
[सं. पंक्ति]

पाँती
समूह, समाज।
उ.- कुसुमित धर्म-कर्म कौ मारग जउ कोउ करत बनाई। तदपि बिमुख पाँती सो गनियत, भक्ति हृदय नहिं आई-१-९३।
संज्ञा
[सं. पंक्ति]

पाँथ
मार्ग।
संज्ञा
[सं. पंथ]

पाँथ
पथिक।
वि.
[सं.]

पाँथ
वियोगी।
वि.
[सं.]

पाँयँ, पाँय
पैर, चरण।
संज्ञा
[सं. पाद]

पाँयता
पैंताना।
संज्ञा
[हिं. पाँय + तल]

पाँयन
पैरों में।
उ.- सुनत सुवन घटियार घोर ध्वनि पाँयन नूपुर बाजत-२५६१।
संज्ञा
[हिं. पाँव]

पाँव
पैर पग।
संज्ञा
[सं. पद]

पाँवड़ो,पाँवड़े
वस्त्र जो मार्ग में आदर के लिए बिछाया जाता है, पायंदाज।
उ.- (क) बरन बरन पट परत पाँवड़े, बीथिनि सकल सुगन्ध सिंचाई-९-१६९। (ख) पाटंबर पाँवड़े डसाये-२६४३।
संज्ञा
[हिं. पाँव + ड़ा (प्रत्य.)]

पाँवड़ी
खड़ाऊँ।
संज्ञा
[हिं. पाँव]

पाँवड़ी
जूता।
संज्ञा
[हिं. पाँव]

पाँवर
पापी, नीच।
वि.
[सं. पामर]

पाँवर
ओछा, क्षुद्र।
उ.- थोरी कृपा बहुत करि मानी पाँवर बुधि ब्रजबाल-१८३०।
वि.
[सं. पामर]

पाँवरि, पाँवरी
जूता, पनही।
उ.- सूर स्वामि की पाँवरि सिर धरि, भरत चले बिलखाई-९-५३। (ख) सूरदास प्रभु पाँवरि मम सिर इहिं बल भरत कहाऊँ-९-१५५।
संज्ञा
[हिं. पाँवरी]

पाँवरि, पाँवरी
सीढ़ी।
संज्ञा
[हिं. पाँवरी]

पाँवरि, पाँवरी
पैर रखने का स्थान।
संज्ञा
[हिं. पाँवरी]

पाँवरि, पाँवरी
ड्योढ़ी।
संज्ञा
[हिं. पौरि, पौरी]

पाँवरि, पाँवरी
दालान।
संज्ञा
[हिं. पौरि, पौरी]

पाइक
दूत।
संज्ञा
[सं. पायक]

पाइक
सेवक।
संज्ञा
[सं. पायक]

पाइतरी
पलँग का पैर की ओर का भाग, पैताना।
उ.- कमलनैन पौढ़े सुख-सज्या, बैठे पारथ पाइतरी-१-२६८।
संज्ञा
[सं. पादस्थली]

पाइयत
पाता है।
उ.- प्रानन के बदले न पाइयत सेंति बिकाय सुजस की ढेरी-२८५२।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पाइल
पैर का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. पायल]

पाई
मंडल में नाचना।
संज्ञा
[हिं. पाँय]

पाई
एक सिक्का।
संज्ञा
[हिं. पाँय]

पाई
दीर्घता-सूचक मात्रा।
संज्ञा
[हिं. पाँय]

पाई
खड़ा विराम-चिह्न।
संज्ञा
[हिं. पाँय]

पाई
प्राप्त की, उपलब्ध की, लाभ करना।
उ.- (क) यह गति काहू देव न पाई-१-५। (ख) अंबरीष, प्रहलाद, नृपति बलि, महाँ ऊँच पदवी तिन पाई-१-२४।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पांशु
धूल, रज।
संज्ञा
[सं.]

पांशु
बालू।
संज्ञा
[सं.]

पाँस
खाद।
[सं. पांशु]

पाँसना
खेत में खाद देना।
क्रि. स.
[हिं. पाँस]

पाँसा
चौसर खेलने की गोट।
उ.- कौरव पाँसा कपट बनाये।
संज्ञा
[सं. पाशक]

पाँसा
पाँसा उलटना (पलटना)- प्रयत्न या योजना का फल आशा के प्रतिकूल होना।
मु.

पाँसुरी
पसली।
संज्ञा
[हिं. पसली]

पाँसे
चोसर खेलने के छोटे टुकड़े जो संख्या में ३ होते हैं। ये प्रायः हाथी दाँत या किसी हड्डी के बनते हैं।
उ.- चौपरि जगत मड़े जुग बीते। गुन पाँसे, क्रम अंक, चारि गति सारि, न कबहूँ जीते-१-६०।
संज्ञा
[हिं. पाँसा]

पाँही
पास, निकट, समीप।
क्रि. वि.
[हिं. पँह]

पा, पाइँ, पाइ
पैर, चरण।
उ.- (क) हा हा हो पिय पा लागति हौं जाइ सुनौ बन बेनु रसालहिं-८९८।
संज्ञा
[सं. पाद]

निरामिष
जिसमें मांस न मिला हो।
वि.
[सं.]

निरामिष
जो मांस न खाय।
वि.
[सं.]

निरार, निरारा
निराला।
वि.
[हिं. निराला]

निरालंब
बिना किसी आधार के निराधार।
वि.
[सं.]

निरालंब
बिना ठौर-ठिकाने के, निराश्रय।
वि.
[सं.]

निरालस, निरालस्य
फुर्तीला।
वि.
[हिं. नि + आलस्य]

निरालस, निरालस्य
आलस्य का अभाव।
संज्ञा

निराला
एकांत या निर्जन स्थान।
संज्ञा
[सं. निरालय]

निराला
निर्जन।
वि.

निराला
अद्भुत।
वि.

पाई
समझी, जानी-बूझी।
उ.-उनकी महिमा है नहिं पाई-४-५।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पाउक
आग, अग्नि।
संज्ञा
[सं. पावक]

पाउँ
पैर।
उ.- भवन जाहु आपनै अपनैं सब, लागति हौं मैं पाउँ-३४५।
संज्ञा
[हिं. पाँव]

पाऊँगो
प्राप्त करूँगा।
उ.- मात-पिता जिय त्रास धरत हौं तऊ आइ सुख पाऊँ गो-१९४४।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पाऐं
पाने से, पाने पर भी, पाकर भी।
उ.- अति प्रचंड पौरूष बल पाऐं केहरि भूख मरै-१-२०५।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पाक
पकाने की क्रिया, रसोई बनाना।
उ.- पाक पावक करै, बारि सुरपति भरे, पौन पावन करै द्वार मेरे-९-१२९।
संज्ञा
[सं.]

पाक
रसोई, तैयार भोजन।
उ.- देखौ आइ जसोदा सुत-कृति। सिद्ध पाक इहिं आइ जुठायौ-१०-२४८।
संज्ञा
[सं.]

पाक
पकवान।
उ.- मिलि बैठे सब जेंवन लागे, बहुत बने कहि पाक-४६४।
संज्ञा
[सं.]

पाक
चाशनी में बनी औषध।
संज्ञा
[सं.]

पाक
पवित्र।
वि.
[फ़ा.]

पाखंड
आडंबर, ढोंग, ढकोंसला।
उ.- दूर कियौ पाखंड वाद, हरि भक्तिनि को अनुकूल-। सारा. ३१९।
संज्ञा
[सं. पाखंड]

पाखंड
छल-कपट।
संज्ञा
[सं. पाखंड]

पाखंड
पाखंड करनेवाला, ढोंगी, पाखंडी।
वि.

पाखंडी
वैदिक आचार का खंडन या निदा करनेवाला।
वि.
[हिं. पाखंड]

पाखंडी
कपटाचारी, ढोंगी।
वि.
[हिं. पाखंड]

पाखंडी
छली-कपटी।
वि.
[हिं. पाखंड]

पाख, पाखा
पक्ष, पखवाड़ा, पंद्रह दिन।
उ.- एक पाख त्रय मास कौ, मेरो भयौ कन्हाई-१०-६८।
संज्ञा
[सं. पक्ष]

पाख, पाखा
कोना, छोर।
संज्ञा
[सं. पक्ष]

पाखान
पत्थर।
संज्ञा
[सं. पाषाण]

पाखाननि
पत्थरों से।
उ.- तब लौं तुरत एक तौ बाँधौ, द्रुम-पाखाननि छाई-९-११०।
संज्ञा
[सं. पाषाण]

पाक
निर्दोष।
वि.
[फ़ा.]

पाक
समाप्त।
वि.
[फ़ा.]

पाकर
एक वृक्ष।
उ.- फूल करील कली पाकर नम-२३२१।
संज्ञा
[सं. पर्कटी, प्रा. पक्कड़ी]

पाकशाला, पाकसाला
रसोई-घर।
उ.- तब उन कह्यौ पाकसाला में अबहीं यह पहुँचाओ- सारा. ६९४।
संज्ञा
[सं. पाकशाला]

पाकशासन, पाकसासन
इंद्र।
संज्ञा
[सं. पाकशासन]

पाकस्थली
पक्काशय।
संज्ञा
[सं.]

पाक्षिक
पक्ष या पखवाड़े का।
वि.
[सं.]

पाक्षिक
जो प्रतिपक्षी हो।
वि.
[सं.]

पाक्षिक
तरफदार।
वि.
[सं.]

पाखंड
वेद-विरूद्ध आचरण।
संज्ञा
[सं. पाखंड]

पाखर
हाथी-घोड़े पर, युद्ध के अवसर पर, डाली जानेवाली लोहे की झूल।
संज्ञा
[सं. प्रखर]

पाग
पगड़ी।
उ.- (क) टेढ़ी चाल, पाग सिर टेढ़ी, टेढ़ैं-टेढ़ैं धायौ-१-३०१। (ख) रोकि रहत गहि गली साँकरी टेढ़ी बाँधत पाग-१०-३२८। (ग) दधि-ओदन दोना भरि दैहौं अरू अंचल की पाग-२९४८।
संज्ञा
[हिं. पग=पैर]

पाग
रसोई।
संज्ञा
[सं. पाक]

पाग
चाशनी में पगी मिठाई।
संज्ञा
[सं. पाक]

पागना
चाशनी में पकाना।
क्रि. स.
[सं. पाक]

पागल
बावला, सनकी, विक्षिप्त।
वि.
[देश.]

पागल
क्रोध, शोक आदि के कारण आपे से बाहर।
वि.
[देश.]

पागल
नासमझ, मूर्ख।
वि.
[देश.]

पागलपन
सनक।
संज्ञा
[हिं. पागल]

पागलपन
मूर्खता।
संज्ञा
[हिं. पागल]

पागलपन
उन्मत्तता।
संज्ञा
[हिं. पागल]

पागी
रस या चाशनी में पगी हुई।
उ.- (क) भव-चिंता हिरदै नहिं एकौ स्याम रंग-रस पागी-१४८६। (ख) सूरदास अबला हम भोरी गुर चैंटी ज्यौं पागी-३३३५।
वि.
[हिं. पगना]

पागे
अनुरक्त हुए, मग्न हुए, प्रेम में डूब गये।
उ.- नवल गुपाल, नवेली राघा नये प्रेम-रस पागे-६८६।
क्रि. अ.
[हिं. पगना]

पागे
ओतप्रोत हुए, मग्न हुए, भरे गये।
उ.- (क) तब बसुदेव देवकी निरखत परम प्रेम रस पागे-१०-४। (ख) सोभित सिथिल बसन मन मोहन, सुखवत स्रम के पागे¨¨। नहिं छूटति रति रूचिर भामिनी, वा रस मैं दोउ पागे-६८६।
क्रि. अ.
[हिं. पगना]

पाग्यौ
बहुत अधिक लिप्त हुआ, ओतप्रोत हो गया।
उ.-जनम सिरानौई सौ लाग्यौ। रोम रोम, नख-सिख लौं मेरै, महा अघनि बपु पाग्यौ-१-८३।
क्रि. अ.
[हिं. पगना]

पाचक
पचाने या पकानेवाला।
वि.
[सं.]

पाचन
पचाने या पकाने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

पाचन
अन्न-पचाने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

पाचन
प्रायश्चित।
संज्ञा
[सं.]

पाचना
अच्छी तरह पकाना।
क्रि. स.
[सं. पाचन]

पाचै
परिपक्व करती है।
उ.-निसि दिन स्याम सुमिरि जस गावै कलपन मेटि प्रेम रस पाचै।
क्रि. स.
[हिं. पाचना]

पाछ
पिछला भाग।
संज्ञा
[सं. पश्चात, प्रा. पच्छा]

पाछ
पीछे।
क्रि. वि.
[हिं. पीछा]

पाछना
चीर-फाड़ देना।
क्रि. स.
[हिं. पंछा]

पाछल, पाछलु
पीछे का, पिछला।
वि.
[हिं. पिछला]

पाछिल, पाछिलो
पीछला पीछे का।
वि.
[हिं. पिछला]

पाछिल, पाछिलो
पूर्व जन्म का।
उ.-धन्य सुकृत पाछिलो-११८१।
वि.
[हिं. पिछला]

पाछिली
पीछे की, पूर्व की।
वि.
[हिं. पिछला]

पाछिले
पूर्व या पहले की, पिछली।
उ.-उन तौ करी पाछिले की गति, गुन तोरयौ बिच धार-१-१७५।
वि.
[हिं. पीछा, पिछला]

पाछी
पीछे की ओर।
क्रि. वि.
[हिं. पाछ]

पाछू, पाछे, पाछैं
भूतकाल में, पूर्व समय में, पहले।
उ.-तीनौं पन भरि ओर निबाहयौ, तऊ न आयौ बाज। पाछै भयौ न आगैं ह्वैहै, सब पतितनि सिरताज-१-९६।
क्रि. वि.
[हिं. पीछा, पीछे]

पाछू, पाछे, पाछैं
पीठ की ओर, पीछे की तरफ।
उ.-पुनि पाछैं अघ-सिंधु बढ़त है सूर खाल किन पाटत-१-१०७।
क्रि. वि.
[हिं. पीछा, पीछे]

पाछेन
पीछे आनेवाले।
उ.-पदखि लिए पाछेन को तेऊ सब आए-२५७५।
वि.
[हिं. पीछा]

पाज
पाँजर।
उ.-निरखि छबि फूलत हैं ब्रजराज। उत जसुदा इत आपु परस्पर आड़े रहे कर पाज।
संज्ञा
[हिं. पाँजर]

पाजस्य
छाती और पेट की बगल का भाग, पाशर्व, पाँजर।
संज्ञा
[सं.]

पाजी
पैदल सिपाही।
संज्ञा
[सं. पदाति]

पाजी
रक्षक।
संज्ञा
[सं. पदाति]

पाजी
दुष्ट, नीच, कमीना।
वि.
[सं. पाठ्य]

पाजीपन
दुष्टता, नीचता।
संज्ञा
[हिं. पाजी + पन]

पाजेब
पैर का गहना, नूपुर, मंजीर।
संज्ञा
[फ़ा.]

पाटंबर
रेश्मी वस्त्र।
उ.-हय गय हेम धेनु पाटंबर दीन्है दान उदार- सारा. ३०७।
संज्ञा
[सं.]

पाट
रेशम।
उ.-किंकिनि नूपुर पाट पाटंबर, मानौं लिये फिरै घरबार-१-४१।
संज्ञा
[सं. पट्ट, पाट]

पाट
राजासिंहासन।
उ.-मोदी लोभ, खवास मोह के, द्वारपाल अहँकार। पाट बिरध ममता है मेरैं माया कौ अधिकार-१-१४१।
संज्ञा
[सं. पट्ट, पाट]

पाट
फैलाव, चौड़ाई।
संज्ञा
[सं. पट्ट, पाट]

पाट
पीढ़ा, पटरा।
संज्ञा
[सं. पट्ट, पाट]

पाट
धोबी का पाटा।
संज्ञा
[सं. पट्ट, पाट]

पाट
चक्की का एक भाग।
संज्ञा
[सं. पट्ट, पाट]

पाट
द्वार, कपाट।
संज्ञा
[सं. पट्ट, पाट]

पाटत
किसी गहरी जगह को भर देना, गढ़ा-जैसी जगह पाट देना।
उ.-पुनि पाछैं अध-सिंधु बढ़त है, सूर खाल किन पाटत-१-१०७।
क्रि. स.
[हिं. पाट, पाटना]

पाटन
पटाव, छत।
संज्ञा
[हिं. पाटना]

पाटन
साँप का विष उतारने का एक मंत्र।
संज्ञा
[हिं. पाटना]

पाटना
निचले स्थान को भरकर समतल करना।
क्रि. स.
[हिं. पाट]

पाटना
ढेर लगाना।
क्रि. स.
[हिं. पाट]

पाटना
पटाव या छत बनाना।
क्रि. स.
[हिं. पाट]

पाटना
तृप्त करना।
क्रि. स.
[हिं. पाट]

पाटमहिषी
पटरानी।
संज्ञा
[सं. पट्ट + महिषी]

पाटरानी
प्रधान रानी जो राजा के साथ सिंहासन पर बैठे।
उ.-अब कहावत पाटरानी बड़े राजा स्याम-२६८१।
संज्ञा
[सं. पट्ट + रानी]

पाटल
पाढर नामक पेड़।
उ.-मिलत सम्मुख पाटल पटल भरत मान जुही-२३८१।
संज्ञा
[सं.]

पाटल
गुलाब।
संज्ञा
[सं.]

पाटल
गुलाब-संबंधी।
वि.

पाटल
गुलाबी।
वि.

पाटव
कौशल।
संज्ञा
[सं.]

पाटव
पक्कापन।
संज्ञा
[सं.]

पाटवी
पटरानी से उत्पन्न।
वि.
[हिं. पाट]

पाटवी
रेश्मी।
वि.
[हिं. पाट]

पाटा
पीढ़ा, पटरा, तख्ता।
संज्ञा
[हिं. पाट]

पाटी
पटिया, पटटी, माँग के दोनों ओर के बैठे हुए बाल।
उ.-मुँड़ली पाटी पारन चाहै, नकटी पहिरे बेसरि।
संज्ञा
[सं. पाट]

पाटी
पटरा, पीढ़ा।
संज्ञा
[सं. पाट]

पाटी
सिंहासन।
उ.-नव ग्रह परे पाटी-तर, कूपहिं काल उसारौ-९-१५९।
संज्ञा
[सं. पाट]

पाटी
शिला, चट्टान।
संज्ञा
[सं. पाट]

निराक्रंद
जो रक्षा या सहायता न करे।
वि.
[सं.]

निराखर
बिना अक्षर का।
वि.
[सं. निरक्षर]

निराखर
मौन।
वि.
[सं. निरक्षर]

निराखर
अपढ़, अशिक्षित।
वि.
[सं. निरक्षर]

निराट
अकेला, एकमात्र।
वि.
[हिं. निरा]

निरातंक
निर्भय।
वि.
[सं.]

निरातंक
नीरोग।
वि.
[सं.]

निरातपा
रात, रात्रि।
संज्ञा
[सं.]

निरादर
अपमान, बेइज्जती।
उ.-यहै कहत ब्रज कौन उबारै सुरपति किए निरादर-९४९।
संज्ञा
[सं.]

निराधार
आश्रय या आधार-रहित।
वि.
[सं.]

पाटी
पलँग की एक लकड़ी।
उ.-घुनो बॉस बुन्यौ खटोला काहू को पलँग कनक पाटी-१० उ.-७१।
संज्ञा
[सं. पाट]

पाटी
परिपाटी।
संज्ञा
[सं.]

पाटी
श्रोणी।
संज्ञा
[सं.]

पाटी
गणना-क्रम।
संज्ञा
[सं.]

पाटौं
पाट दूँ, दबाकर गाड़ दूँ।
उ.-कहौ तौ मृत्युहिं मारि डारि कै, खोदि पता, लहिं पाटौं-९-१४८।
क्रि. स.
[हिं. पाटना]

पाटौं
लबालब भर दूँ, डुबा दूँ।
उ.-छिन में बरषि प्रलय जल पाटौं खोजु रहै नहिं चीनो-९४५।
क्रि. स.
[हिं. पाटना]

पाटौ
पट्टा, अधिकार- पत्र, सनद।
उ.-जौ प्रभु अजामील कौं दीन्हौ, सो पाटौ लिखि पाऊँ। तौ बिस्वास होइ मन मेरैं, औरौ पतित बुलाऊँ-१-१४६।
संज्ञा
[सं. पट्टा]

पाठ
पढ़ाई, अध्ययन।
उ.-संदीपन सुत तुम प्रभु दीने, विद्या-पाठ करयौ-१-१३३।
संज्ञा
[सं.]

पाठ
नियम से पढ़ने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं.]

पाठ
पढ़ने का विषय।
संज्ञा
[सं.]

पाठ
सबक।
संज्ञा
[सं.]

पाठ
पुस्तक का एक अंश।
संज्ञा
[सं.]

पाठ
वाक्य का शब्द-क्रम या शब्द-वर्तनी।
संज्ञा
[सं.]

पाठक
पढ़नेवाला।
संज्ञा
[सं.]

पाठक
पढ़ानेवाला।
संज्ञा
[सं.]

पाठन
पढ़ने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं.]

पाठ-भेद
पाठ का अंतर।
संज्ञा
[सं.]

पाठशाला
विद्यालय, चटसाल।
संज्ञा
[सं.]

पाठांतर
पाठ में अंतर।
संज्ञा
[सं.]

पाठी
पढ़नेवाला, पढ़ैया।
वि.
[सं. पाठिन्]

पाठ्य
पठनीय।
वि.
[सं.]

पाठ्य
जो पढ़ाया जाय।
वि.
[सं.]

पाड़, पाढ़
धोती-साड़ी का किनारा।
संज्ञा
[हिं. पाट]

पाड़, पाढ़
बाँध, पुश्ता।
संज्ञा
[हिं. पाट]

पाड़इ, पाढ़इ
पाटल' वृक्ष।
उ.-जहाँ निवारी सेवती मिलि झूमक हो। बहु पाड़इ बिपुल गँभीर मिलि झूमक हो-२४४५।
संज्ञा
[सं. पाटल]

पाड़ा
टोला, मुहल्ला, पुरवा।
संज्ञा
[सं. पहन]

पाढ़त
जादू-टोना, मंत्र।
संज्ञा
[हिं. पढ़ना]

पाण
व्यापार।
संज्ञा
[सं.]

पाण
हाथ, कर।
संज्ञा
[सं.]

पाणि
हाथ, कर।
संज्ञा
[सं.]

पाणिक
सौदा।
संज्ञा
[सं.]

पाणिक
हाथ।
संज्ञा
[सं.]

पाणिगृहीता
विवाहिता (पत्नी)।
वि.
[सं.]

पाणिग्रह, पाणिग्रहण
विवाह।
संज्ञा
[सं.]

पाणिनि
संस्कृत भाषा के 'अष्टाध्यायी' नामक प्रसिद्ध व्याकरण के रचयिता।
संज्ञा
[सं.]

पाणिपल्लव
उँगलियाँ।
संज्ञा
[सं.]

पाणिमूल
कलाई।
संज्ञा
[सं.]

पातंजलि
प्रसिद्ध प्रचीन विद्वान पतंजलि।
उ.-पातंजलि से मुनि पद सेवत करत सदा अज ध्यान सारा. ६२।
संज्ञा
[सं. पतंजलि]

पात
पत्ता, पत्र।
उ.-जा दिन मन पंछी उड़ि जैहै। ता दिन तेरे तन-तरुवर के सबैं पात झरि जैहैं-१-८६।
संज्ञा
[सं. पत्र]

पात
कान का एक गहना, पत्ता।
संज्ञा
[सं. पत्र]

पात
पतन।
संज्ञा
[सं.]

पात
गिरना।
संज्ञा
[सं.]

पात
टूट कर गिरना।
संज्ञा
[सं.]

पात
नाश।
संज्ञा
[सं.]

पात
पड़ना।
संज्ञा
[सं.]

पातक
पाप, अघ, अधर्म।
संज्ञा
[सं.]

पातकी
पापी, अधर्मी।
वि.
[सं. पातक]

पातन
गिराने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

पातन
पत्तों के।
उ.-मूरी के पातन के बदले को मुक्ताहल दैहै-३१०५।
संज्ञा
[हिं. पात=पत्ता]

पातर, पातरा
दुबला, पतला, क्षीण।
उ.-मचला, अकलै-मूल, पातर खाउँ खाउँ करै भूखा-१-१८६।
वि.
[हिं. पतला]

पातर, पातरा
क्षीण, बारीक।
वि.
[हिं. पतला]

पातर, पातरा
जो जरा भी गाढ़ा न हो।
वि.
[हिं. पतला]

पातर, पातरा
पत्तल, पनवारा।
संज्ञा
[सं. पत्र]

पातर, पातरा
वेश्या।
संज्ञा
[सं. पातली]

पातरि, पातरी
दुबली-पतली।
वि.
[हिं. पतला]

पातरि, पातरी
वेश्या।
संज्ञा
[सं. पातली]

पातशाह
बादशाह।
संज्ञा
[हिं. पादशाह]

पातशाही
बादशाही।
संज्ञा
[हिं. पातशाह]

पाता
पत्ता, पत्र।
उ.-सरबस प्रभु रीझि देत तुलसी कैं पाता-१-१२३
संज्ञा
[सं. पत्र, हिं. पत्ता]

पाता
रक्षक।
वि.
[सं. पातृ]

पाता
पीनेवाला।
वि.
[सं. पातृ]

पातार, पाताल
पृथ्वी के नीचे के सात लोकों में से सातवाँ।
संज्ञा
[सं.]

पातार, पाताल
पृथ्वी के नीचे का लोक।
उ.-ग्रस्यौ गज ग्राह कौं लै चल्यौ पाताल कौं काल कैं त्रास मुख नाम आयौ-१-५।
संज्ञा
[सं.]

पातार, पाताल
गुफा।
संज्ञा
[सं.]

पातालकेतु
पातालवासी एक दैत्य।
संज्ञा
[सं.]

पाताखत
पत्र-अक्षत, पूजा या भेंट की सामान्य वस्तु।
संज्ञा
[हिं. पात + आखत]

पाति
पत्ती।
संज्ञा
[सं. पत्र]

पाति
चिट्ठी।
संज्ञा
[सं. पत्र]

पातिब्रता, पातिव्रत
पतिव्रता होना।
उ.-पातिब्रतहिं धर्म जब जान्यौ बहुरौ रुद्र बिहाई-सारा-५०।
संज्ञा
[सं. पातिव्रत्य]

पातिसाह
बादशाह।
संज्ञा
[हिं. पादशाह]

पाती
चिट्ठी, पत्र।
उ.-(क) पाती बाँचत नंद डराने-५२६। (ख) लोचन जल कागद मसि मिलि करि ह्वै गइ स्याम स्याम जू की पाती-२९७७।
संज्ञा
[सं. पत्री, प्रा. पत्ती]

पाती
वृक्ष-लता की पत्ती।
संज्ञा
[सं. पत्री, प्रा. पत्ती]

पाती
लज्जा, प्रतिष्ठा।
उ.-सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिनु सब पाती उधरी-३३४६।
संज्ञा
[हिं. पति]

पातुर, पातुरी
वेश्या।
संज्ञा
[सं. पातली]

पाते, पातै
वृक्ष का पत्ता।
उ.-(क) मलिन बसन हरि हित अंतर्गति तनु पीरो जनु पाते-३४६१। (ख) मारे कंस सुरन सुख दीनो असुर जरे पिर पाते-३३३८।
संज्ञा
[हिं. पत्ता]

पात्त
पापियों का उद्धारक।
संज्ञा
[सं.]

पात्र
वह व्यक्ति जो किसी वस्तु अथवा विषय का अधिकारी हो।
उ.-हरि जू हौं यातैं दुख-पात्र-१-२१६।
संज्ञा
[सं.]

पात्र
आधार, बरतन, भाजन।
उ.-(क) हृदय कुचील काम-भू-तृष्ना-जल कलम है पात्र-१-२१६। (ख) पात्र-स्थान हाथ हरि दीन्हें-२-२०।
संज्ञा
[सं.]

पात्र
नदी का पाट।
संज्ञा
[सं.]

पात्र
नाटक के नायक-नायिका आदि।
संज्ञा
[सं.]

पात्र
नाटक के अभिनेता।
संज्ञा
[सं.]

पात्र
पत्ता।
संज्ञा
[सं.]

पात्रता
योग्यता, अधिकार।
संज्ञा
[सं.]

पात्री
छोटा बरतन।
संज्ञा
[सं. पात्र]

पात्री
नाटक के स्त्री-पात्र।
संज्ञा
[सं. पात्र]

पात्री
अभिनय करनेवाली स्त्री।
संज्ञा
[सं. पात्र]

पाथ
जल।
संज्ञा
[सं. पाथस]

पाथ
वायु।
संज्ञा
[सं. पाथस]

पाथ
पंथ, मार्ग, राह।
उ.-स्रमितभयौ जैसैं मृग चितवत, देखि देखि भ्रम-पाथ-१-२०८।
संज्ञा
[सं. पथ]

पाथना
ठोंक-पीट कर गढ़ना-बनाना।
क्रि. स.
[हिं. थापना का आद्यन्त विपर्यय]

पाथना
थोप-थाप करना।
क्रि. स.
[हिं. थापना का आद्यन्त विपर्यय]

पाथना
मारना।
क्रि. स.
[हिं. थापना का आद्यन्त विपर्यय]

पाथनाथ
समुद्र।
संज्ञा
[सं.]

पाथनिधि
समुद्र।
संज्ञा
[सं. पाथोनिधि]

पाथर
पत्थर।
उ.-उकठे तरु भये पात, पाथर पर कमल जात, आरज पथ तज्यै। नात, व्याकुल नर-नारी।
संज्ञा
[हिं. पत्थर]

पाथा
जल।
संज्ञा
[सं. पाथस्]

पाथा
आकाश।
संज्ञा
[सं. पाथस]

पाथेय
यात्री के लिए मार्ग का भोजन।
संज्ञा
[सं.]

पाथेय
पथिक का राह-खर्च, संबल।
संज्ञा
[सं.]

पाथोज
कमल।
संज्ञा
[सं.]

निभ
प्रभा, प्रकाश।
संज्ञा
[सं.]

निभ
तुल्य, समान।
वि.

निभना
बच निकलना, छुटकारा पाना।
क्रि. अ.
[हिं. निबहना]

निभना
निर्वाह होना।
क्रि. अ.
[हिं. निबहना]

निभना
गुजारा या निर्वाह होना।
क्रि. अ.
[हिं. निबहना]

निभना
चलना या पूरा होना।
क्रि. अ.
[हिं. निबहना]

निभना
क्रम, संबंध या परंपरा का पालन होना।
क्रि. अ.
[हिं. निबहना]

निभरम
भ्रम या शंकारहित।
वि.
[सं. निर्भ्रम]

निभरम
निःशंक, बेधड़क, बेखटके।
क्रि. वि.

निभरमा
जिसकी मर्यादा या लज्जा न रह गयी हो, अविश्वस्त।
वि.
[सं. निर्भ्रम]

निराधार
बेजड़-बुनियाद का।
वि.
[सं.]

निराधार
बिना अन्न-जल के।
वि.
[सं.]

निरानंद
आनंदरहित।
वि.
[सं.]

निरानंद
आनंद का अभाव।
संज्ञा

निरानंद
दुख।
संज्ञा

निराना
खेत से घास-फूस खोदकर दूर करना या निकालना।
क्रि. स.
[सं. निराकरण]

निरापद
हानि या आपदा से सुरक्षित।
वि.
[सं.]

निरापद
जहाँ हानि या विपत्ति का भय न हो, सुरक्षित।
वि.
[सं.]

निरापन
पराया, बेगाना।
वि.
[हीं. नि + अपना]

निरामय
जिसे कोई रोग न हो, नीरोग।
वि.
[सं.]

पाथोर
मेघ, बादल।
संज्ञा
[सं.]

पाथोधार
मेघ, बादल।
संज्ञा
[सं.]

पाथोधि
सागर, समुद्र।
संज्ञा
[सं.]

पाथोनिधि
सागर, समुद्र।
संज्ञा
[सं.]

पाद
पैर, चरण।
संज्ञा
[सं.]

पाद
छंद का एक चरण।
संज्ञा
[सं.]

पाद
चौथाई भाग।
संज्ञा
[सं.]

पाद
पुस्तक का विशेष भाग।
संज्ञा
[सं.]

पाद
निचला भाग, तल।
संज्ञा
[सं.]

पादत्र, पादत्राण, पादत्रान
जो नर-नारी के पैर की रक्षा करे।
वि.
[सं.]

पादत्र, पादत्राण, पादत्रान
(१) खड़ाऊँ।
संज्ञा
[सं.]

पादत्र, पादत्राण, पादत्रान
जूता, पनही।
संज्ञा
[सं.]

पादप
वृक्ष, पेड़।
संज्ञा
[सं.]

पादपा
जूता।
संज्ञा
[सं.]

पादपा
खड़ाऊँ।
संज्ञा
[सं.]

पादपूरक
कविता में पद पूर्ति के लिए प्रयुक्त होनेवाला शब्द।
वि.
[सं.]

पादपूरण
कविता में अधूरे पर को पूरा करना।
संज्ञा
[सं.]

पादपूरण
पद- पूर्ति के लिए भरती के शब्द रखना।
संज्ञा
[सं.]

पादशाह
बादशाह।
संज्ञा
[फ़ा.]

पादाकुल, पादाकुरक
चौपाई (छंद)।
संज्ञा
[सं.]

पादाक्रांत
पैर से कुचला हुआ।
वि.
[सं.]

पादारघ
हाथ-पैर धुलाने का जल।
संज्ञा
[सं. पाद्यार्घ]

पादारघ
पूजन-सामग्री।
संज्ञा
[सं. पाद्यार्घ]

पादारघ
भेंट, उपहार।
संज्ञा
[सं. पाद्यार्घ]

पादुका
खड़ाऊँ।
संज्ञा
[सं.]

पादुका
जूता।
संज्ञा
[सं.]

पादोदक
वह जल जिसमें पैर धोया गया हो।
संज्ञा
[सं. पाद + उदक=जल]

पादोदक
चरणामृत।
उ.-गंग तरंग बिलोकत नैन। अतिहि पुनीत बिष्नु-पादोदक महिमा निगम पढ़त गुनि चैन-९-१२।
संज्ञा
[सं. पाद + उदक=जल]

पाद्य
चरण धोने का जल।
उ.-चमर अंचल, कुच कलश मनो पाद्य पानि चढ़ाइ-३४८३।
संज्ञा
[सं.]

पद्यार्घ
हाथ-पैर धोने का जल।
संज्ञा
[सं.]

पान
आब, कांति।
संज्ञा
[सं.]

पान
पीने का पात्र।
संज्ञा
[सं.]

पान
प्याऊ।
संज्ञा
[सं.]

पान
प्राण।
उ.-पान अपान ब्याेन उदान और कहियत प्राण समान।
संज्ञा
[सं. प्राण]

पान
एक प्रसिद्ध लता जिसके पत्तों का बीड़ा बनाकर खाया जाता है, ताम्बूली।
उ.-दिन राती पोषच रह्यौ जैसे चोली पान-१-३२५।
संज्ञा
[सं. पर्ण, प्र. पण्ण]

पान
पान का बीड़ा।
उ.- (क) आदर सहित पान कर दीन्हों-१०४७। (ख) पान लै चल्यौ नृप-आन कीन्हौ-१०-६२।
संज्ञा
[सं. पर्ण, प्र. पण्ण]

पान
पान उठाना- किसी काम के करने का जिम्मा लेना। पान खिलानो - सगाई-संबंध पक्का कराना। पान चीरना- व्यर्थ का काम करना। पान देना- कोई काम करने का जिम्मा देना। दै पान- काम करने का जिम्मा देकर। उ.- असुर कंस दै पान पठाई-१०-५०। पान-पत्ता या पान-फूल- साधारण या तुच्छ भेंट। पान लेना -किसी काम को करने का जिम्मा लेना। लै पान - काम करने का जिम्मा लेकर। उ.- नृपति के लै पान मन कियौ अभिमान करत अनुमान चँद्र पास धाऊँ।
मु.

पान
पान के आकार की ताबीज।
संज्ञा
[सं. पर्ण, प्र. पण्ण]

पान
हाथ।
संज्ञा
[सं. पाणि]

पानक
पना, पन्ना।
संज्ञा
[सं.]

पद्यार्घ
पूजा या भेंट की सामग्री।
संज्ञा
[सं.]

पाधा, पाधे
आचार्य।
संज्ञा
[सं. उपाध्याय]

पाधा, पाधे
पंडित।
उ.-गिरिधरलाल छबीले को यह कहा पठायौ पाधे-३२८४।
संज्ञा
[सं.]

पान
(किसी द्रव पदार्थ को) धूँटना पीना।
संज्ञा
[सं.]

पान
शराब पीना।
संज्ञा
[सं.]

पान
पान करि-पीकर
उ.-रुधिर करि, आतमाल धरि, जयजय शब्द उचारी।
प्र.

पान
करती पान-पीती।
उ.-रास रसिक गुपाल मिलि मधु अधर करती पान-३०३२।
प्र.

पान
पेय पदार्थ, पेय द्रव।
उ.-चरनोदक कौं छाँड़ि सुधा-रस, सुरापान अँचयौ-१-६४।
संज्ञा
[सं.]

पान
मद्य, शराब।
संज्ञा
[सं.]

पान
पानी।
संज्ञा
[सं.]

पानय
शराबी, मद्यप।
संज्ञा
[सं.]

पानरा
परनाला।
संज्ञा
[हिं. पनारा]

पानही
जूता।
संज्ञा
[सं. उपानह, हिं. पनही]

पाना
प्राप्त करना।
क्रि. स.
[सं. प्रायण, प्र. पावण]

पाना
फल या परिणाम भुगतना।
क्रि. स.
[सं. प्रायण, प्र. पावण]

पाना
खोई हुई चीज फिर पाना।
क्रि. स.
[सं. प्रायण, प्र. पावण]

पाना
पता, भेद या खोज पाना।
क्रि. स.
[सं. प्रायण, प्र. पावण]

पाना
कुछ सुन या जान लेना।
क्रि. स.
[सं. प्रायण, प्र. पावण]

पाना
देखना-जानना।
क्रि. स.
[सं. प्रायण, प्र. पावण]

पाना
भोगना।
क्रि. स.
[सं. प्रायण, प्र. पावण]

पाना
समर्थ हो सकना।
क्रि. स.
[सं. प्रायण, प्र. पावण]

पाना
समीप जा सकना।
क्रि. स.
[सं. प्रायण, प्र. पावण]

पाना
समान या बराबर होना।
क्रि. स.
[सं. प्रायण, प्र. पावण]

पाना
भोजन करना।
क्रि. स.
[सं. प्रायण, प्र. पावण]

पाना
समझ सकना।
क्रि. स.
[सं. प्रायण, प्र. पावण]

पाना
जिसे पाने का हक हो।
वि.

पानि
हाथ।
उ.- (क) सक्र कौ दान-बलि-मान ग्वारनि लियौ, गह्यौ गिरि पानि, जस जगत छायौ-१-५। (ख) -उरग-इंद्र उनमान सुभग भुज, पानि पदुम आयुध राजैं-१-६९।
संज्ञा
[सं. पाणि]

पानि
पानी, जल।
उ.- पवन पानि घनसारि सुमन दै दधिसुत किरनि भानु भै भुंजैं-२७२१।
संज्ञा
[हिं. पानी]

पानिग्रहण, पानिग्रहन
विवाह।
संज्ञा
[सं. पाणि + ग्रहण]

पानिप
ओप, द्युति, कांत।
संज्ञा
[हिं. पानी + प (प्रत्य.)]

पानिप
पानी।
संज्ञा
[हिं. पानी + प [प्रत्य.]]

पानिप
मर्यादायुक्त, इज्जतदार, सम्मानित, प्रतिष्ठित।
उ.- सभा माँझ द्रौपति-पति राखी, पति पानिप कुल ताकौ। बसन-ओट करि कोट बिसंभर, परन न दीन्हो झाँकौ-१-११३।
वि.

पानी
जल, अबु, नीर।
उ.- जिनकैं क्रोध पुहुमि-नभ पलटै, सूखै कल सिंधु कर पानो-९-११५।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
पानी उतरना- पानी घटना। (काम) पानी करना- सरल या सहज कर डालना। पानी का बतासा (बुलबुला)- क्षणभंगुर चीज। पानी की तरह बहाना- खूब लुटाना या अँधाधुंध खर्च करना। पानी के मोल- बहुत सस्ता। पानी चढ़ना- (१) पानी का ऊँचाई की ओर जाना। (२) पानी बढ़ना। पानी चलाना- नष्ट या चौपट करना। पानी टूटना- बहुत ही कम पानी रह जाना। पानी दिखाना- (पशु को) पानी पिलाना। पानी देना- (१) सींचना, तर करना। (२) पितरों के नाम तर्पण करना। पितर दै पानी- पितरों के नाम तर्पण कर। उ.- ढोटा एक भयौ कैसैहुँ करि कौन कौन करबर बिधि भानी। क्रम क्रम अब लौं उबर्यौ है, ताकौं मारि पितर दै पानी -३६८। पानी भी न माँगना- चटपट दम निकल जाना। पानी पर नींव डालना (देना)- ऐसा काम करना जो टिकाऊ न हो। पानी पढ़ना- मंत्र पढ़ कर पानी फूँकना। पानी पानी करना- बहुत लज्जित करना। पानी पानी होना- बहुत लज्जित होना। पानी पी पीकर- हर समय, लगातार। पानी फिर जाना (फेरना)- नष्ट हो जाना। पानी फूँकना- मंत्र पढ़कर पानी फूँकना। (किसी के सामने) पानी भरना- तुलना में अत्यंत तुच्छ होना। पानी भरी खाल- क्षणभंगुर शरीर। पानी मरना- किसी स्थान पर पानी जमा होकर सूखना। (किसी के सिर) पानी मारना- किसी का दोषी साबित होना। पानी मै आग लगाना- (१) असंभव को संभव कर देना। (२) शांतिप्रिय लोगों में झगड़ा करा देना। पानी में फेंकना- (बहाना) नष्ट करना। पानी लगना- वातावरण और संगति के प्रभाव से बुरी बातें सीख जाना। सूखे में पानी में डूबना- धोखा खा जाना। भारी पानी- पानी जिसमें खनिज पदार्थ अधिक मिले हों। हलका पानी- पानी जिसमें खनिज पदार्थ कम हों। (मुँह में) पानी भरना (भर जाना)- सुन्दर या स्वादिष्ट वस्तु को देखकर उसे पाने या उसका स्वाद लेने का लोभ होना। दूध का दूध, पानी का पानी उघरना- सच्चाई और वास्तविकता प्रकट हो जाना। उ.-हम जातहिं वह उधरि परैगी दूध दूध पानी को पानी-१८६२।
मु.

पानी
शरीर के अंगों से निकलने वाला पसीना आदि (पानी-सा पदार्थ)।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
वर्षा, मेंह।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
पानी आना- वर्षा होना। पानी उठना- घटा घिरना। पानी टूटना- मेंह बंद होना। पानी निकलना- वर्षा बंद होना। पानी पड़ना- मेह बरसना।
मु.

पानी
पानी जैसा पतला द्रव पदार्थ जो चिकना न हो।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
निचोड़ने से निकलनेवाला रस, अर्क आदि।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
चमक, आब, कांति, छबि, सुन्दरता।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
धारदार हथियारों की आब, जौहर।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
मान।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
पानी उतारना- अपमानित करना। पानी जाना- अपमान होना। पानी बचाना (रखना)- मान की रक्षा करना। पानी (हर) लेना- प्रतिष्ठा नष्ट करना। उ.- सुंदर नैननि हरि लियो कमलनि कौ पानी-४७५। बे पानी करना- प्रतिष्ठा नष्ट करना।
मु.

पानी
वर्ष, साल।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
मुलम्मा।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
जीवट, स्वभिमान।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
पशु की वंशगत विशिष्टता।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
पानी-सी ठंढी चीज।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
पानी करना (कर देना)- गुस्सा ठंढा कर देना। (किसी का) पानी होना (हो जाना)- (१) गुस्सा ठंढा हो जाना। (२) तेजी न रह जाना।
मु.

पानी
बहुत मुलायम चीज।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानीदार
प्रतिष्ठित, सम्मानित।
वि.
[हिं. पानी + फ़ा. दार]

पानीदार
आत्माभिमानी।
वि.
[हिं. पानी + फ़ा. दार]

पानी देवा
तर्पण या पिंडदान करनेवाला।
वि.
[हिं. पानी + देना]

पानी देवा
पुत्र।
वि.
[हिं. पानी + देना]

पानी देवा
अपने गोत्र या वंश का।
वि.
[हिं. पानी + देना]

पानीय
जल, पानी।
संज्ञा
[सं.]

पानीय
पीने योग्य।
वि.

पानीय
रक्षा करने योग्य।
वि.

पानैं
पाणि, हाथ, कर।
उ.- अजहूँ सिय सौंपि नतरु बीस भुजा भानै रघुपति यह पैज करी, भूतल धरि पानैं-९-९७।
संज्ञा
[सं. पाणि]

पानैं
पानी, जल।
उ.- चातक सदा स्वाति को सेवक दुखित होत बिन पानै-३४०४।
संज्ञा
[सं. पानीय]

निराला
अनोखा।
वि.

निरावलंब
बिना आश्रय या आधार का।
वि.
[सं.]

निराश
जिसे आशा न हो।
वि.
[हिं. नि + आशा]

निराशा
आशा का अभाव।
संज्ञा
[सं.]

निराशी
जिसे आशा न हो।
वि.
[सं. निराशा]

निराशी
विरह, उदासीन।
वि.
[सं. निराशा]

निराश्रय
आश्रय या आधार-रहित।
वि.
[सं.]

निराश्रय
जिसे ठौर-ठिकाना न हो, अशरण।
वि.
[सं.]

निरास
खंडन।
संज्ञा
[सं.]

निरास
दूर करना।
संज्ञा
[सं.]

पानी
फीकी चीज।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
कुश्ती, द्वंद्वयुद्ध।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
बार, दफा।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
शराब।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
अवसर, मौका।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
जलवायु।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
पानी लगना- किसी स्थान की जलवायु स्वास्थ्य के अनुकूल न होने से रोगी हो जाना।
मु.

पानी
चाल-ढाल, रंग-ढंग, वातावरण।
संज्ञा
[सं. पानीय]

पानी
हाथ।
उ.- सोइ दसरथ कुलचंद अमित बल आए सारँग पानी-९-११५।
संज्ञा
[सं. पाणि]

पानीदार
चमक या आबदार।
वि.
[हिं. पानी + फ़ा. दार]

पाप
बुरी नीयत, बुराई।
उ.- मथुरापति कै जिय कछु तुम पर उपज्यौ पाप-५८९।
संज्ञा
[सं.]

पाप
अशुभ ग्रह।
संज्ञा
[सं.]

पाप
झंझट बखेड़ा।
संज्ञा
[सं.]

पाप
पाप कटना- बाधा दूर होना। पाप काटना- बाधा दूर करना, झंझट मिटाना। पाप मोल लेना- जान-बूझकर झंझट में पड़ना। पाप गले (पीछे) लगना- झंझट में फँस जाना।
मु.

पाप
कठिनाई, संकट मुसीबत।
उ.- छींक सुनत कुसगुन कह्यौ, कहा भयौ यह पाप-५८९।
संज्ञा
[सं.]

पाप
पाप पड़ना- कठिन या सामर्थ्य से बाहर होना।
मु.

पाप
पापी।
वि.

पाप
नीच।
वि.

पाप
अशुभ।
वि.

पापकर्मा
पापी।
वि.
[सं. पापकर्मन्]

पानो, पानौ
पीना।
संज्ञा
[हिं. पानी]

पानो, पानौ
भोजन-पानो-खाना पीना।
उ.- सूर आसा पुजै या मन की तब भावै भोजन पानो -८९२।
यौ.

पानौरा
पान के पत्ते की पकौड़ी, पतौड़, पतौर।
उ.- पानौरा रायता पकौरी -१-२३२१।
संज्ञा
[हिं. पान + बड़ा]

पान्यौ
पानी।
उ.- (क) अब क्यों जाति निबेरि सखी री मिलो एक पय पान्यौ-१२०२। (ख) सूर सु ऊधो मिलत भए सुख ज्यों खग पायो पान्यौ-२९७१।
संज्ञा
[हिं. पानी]

पान्यौ
मेघ।
उ.-मानो दव द्रुम जरत अस भयो उनयो अंबर पान्यौ-२२७५।
संज्ञा
[हिं. पानी]

पाप
अधर्म, बुरा काम, अध।
संज्ञा
[सं.]

पाप
पाप उदय होना- पिछले पापों का बुरा फल भुगतना। पाप कटना- पिछले पापों का बुरा फल-भोग चुकना और सुख की आशा होना। पाप कमाना (बटोरना)- बराबर पाप करना। पाप काटना- पाप का कुफल भुगता देना। पाप की गठरी (मोट)- अनेक पापों का संग्रह। पाप पड़ना (लगना)- दोष होना।
मु.

पाप
अपराध, कसूर।
संज्ञा
[सं.]

पाप
पाप लगाना- दोष लगाना, दोषी ठहराना। लावत पाप-दोष लगाता है। उ.- हारिजीति कछु नेंकु न समझत, लरिकनि लावत पाप-१०-२१४।
मु.

पाप
हत्या।
संज्ञा
[सं.]

पापक्षय
तीर्थ जहाँ पाप नष्ट हो जायँ।
संज्ञा
[सं.]

पापग्रह
अशुभ ग्रह।
संज्ञा
[सं.]

पापचारी
पापी।
संज्ञा
[सं. पापचारिन्]

पापचेता
जिसके चित्त में पाप रहता हो।
वि.
[सं.]

पापड़
उर्द, मूँग या आलू की बहुत पतली चपाती जो प्रायः सूखने पर तली जाती है।
संज्ञा
[सं. पर्पट, प्रा. पप्पड़]

पापड़
पापड़ बेलना- (१) कठिन परिश्रम करना। (२) कठिनाई से दिन काटना। (३) बहुत भटकना।
मु.

पापड़
बहुत पतला।
वि.

पापड़
सूखा, शुष्क।
वि.

पापदर्शी
बुरी नीयत से देखनेवाला।
वि.
[सं.]

पापद्दष्टि
बुरी नीयत से देखनेवाला।
वि.
[सं.]

पापी
कठोर, निर्दय।
उ.- जगत के प्रभु बिनु कल न परै छिनु ऐसे पापी पिय तोहिं पीर न पराई है-२८२७।
वि.
[सं. पापिन्]

पाबंद
बँधा हुआ।
वि.
[फ़ा.]

पाबंद
नियमबद्धता।
वि.
[फ़ा.]

पाबंदी
विवशता।
संज्ञा
[फ़ा.]

पाबंदी
नियमबद्धता।
संज्ञा
[फ़ा.]

पाम
लड़, रस्सी, डोरी।
संज्ञा
[देश.]

पाम
फुंसियाँ।
संज्ञा
[सं. पामन]

पाम
खाज।
संज्ञा
[सं. पामन]

पाम
खाज आदि रोगों से युक्त।
वि.

पामड़ा
पायंदाज।
संज्ञा
[हिं. पावँड़ा]

पापलोक
नरक।
संज्ञा
[सं.]

पापहर
पाप का नाश करनेवाला।
वि.
[सं.]

पापाचार
दुकाचार, पापकर्म।
संज्ञा
[सं.]

पापात्मा
पापी, दुष्टात्मा।
वि.
[सं. पापात्मन्]

पापाह
सूतककाल।
संज्ञा
[सं.]

पापाह
अशुभ काल।
संज्ञा
[सं.]

पापिनी
पाप करनेवाली, जिस स्त्री ने पाप किया हो।
उ.- यह आसा पापिनी दहै-१-५३।
वि.
[हिं. पुं. पापी]

पापिष्ठ
बहुत बड़ा पापी।
वि.
[सं. पापिन्]

पापी
पापयुक्त, अधी, पातकी।
वि.
[सं. पापिन्]

पापी
अनरीति करनेवाला, जो अनुचित व्यवहार करे।
उ.- पिता-बचन खंडै सो पापी, सोई प्रहलादहिं कीन्हौ-१-१०४।
वि.
[सं. पापिन्]

पापद्दष्टि
अशुभ या अमंगलकारिणी दृष्टि।
वि.
[सं.]

पापनामा
बुरे नामवाला।
वि.
[सं.]

पापनाशन
पाप का नाश करने वाला।
संज्ञा
[सं.]

पापनाशन
प्रायश्चित।
संज्ञा
[सं.]

पापनाशन
विष्णु।
संज्ञा
[सं.]

पापनाशन
शिव।
संज्ञा
[सं.]

पापमति
जिसकी मति सदा पाप में रहे।
वि.
[सं.]

पापमय
पाप युक्त, पाप स पूर्ण।
वि.
[सं.]

पापयोनि
निकृष्ट योनि।
संज्ञा
[सं.]

पापर
पापड़।
उ.- पापर बरी मिथैरि फुलौरी। कूर बरी काचरी पिठौरी-३९६।
संज्ञा
[हिं. पापड़]

पामर
दुष्ट, पापी।
वि.
[सं.]

पामर
नीच कुल वाला, नीच कुल में उत्पन्न।
वि.
[सं.]

पामरी
दुपट्टा, उपरना।
उ.- ओढ़े पीरी पामरी पहिरे लाल निचोल-१४६३।
संज्ञा
[सं. प्रावार]

पामरी
खड़ाऊँ।
संज्ञा
[हिं. पावँड़ी]

पामरी
जूता।
संज्ञा
[हिं. पावँड़ी]

पामरी
दुष्टा, पापिनी।
वि.
[हिं. पामर]

पायँ
पैर।
संज्ञा
[हिं. पावँ]

पायँजेहरि
पायजेब।
संज्ञा
[हिं. पावँ + जेहरी]

पायँत, पायँती
पैताना।
संज्ञा
[हिं. पायँता]

पायँता
पैताना।
संज्ञा
[हिं. पायँ + थान]

पायमाली
नाश।
संज्ञा
[फ़ा.]

पायल
नूपुर, पाजेब।
संज्ञा
[हिं. पायँ + ल]

पायस
खीर।
संज्ञा
[सं.]

पायसा
पास- पड़ोस।
संज्ञा
[हिं. पास]

पाया
पलँग, कुर्सी आदि का पावा।
संज्ञा
[हिं. पायँ]

पाया
खंभा, स्तम्भ।
संज्ञा
[हिं. पायँ]

पाया
पद, ओहदा।
संज्ञा
[हिं. पायँ]

पाया
सीढ़ी, जीना।
संज्ञा
[हिं. पायँ]

पायिक
दूत।
संज्ञा
[सं.]

पायिक
पैदल सिपाही।
संज्ञा
[सं.]

पायंदाज
पैर-पुछना।
संज्ञा
[फ़ा.]

पाय
पावँ, पैर।
उ.- होड़ाहोड़ी मनहिं भावते किए पाप भरि पेट। ते सब पतित पाय तर डारौं, यहै हमारी भेंट-१-१४६।
संज्ञा
[हिं. पावँ]

पायक
धावन, दूत, हरकारा।
उ.- अंजनि-कुँवर राम कौ पायक ताकैं बल गर्जत-९-८३।
संज्ञा
[सं. पादातिक, पायिक]

पायक
दास, सेवक, अनुचर।
उ.- उमड़त चले इंद्र के पायक सूर गगन रहे छाइ-९४५।
संज्ञा
[सं. पादातिक, पायिक]

पायक
पैदल सिपाही।
उ.- पायक मन, बानैत अधीरज, सदा दुष्ट मति दूत-१-१४१।
संज्ञा
[सं. पादातिक, पायिक]

पायदार
दृढ़, टिकाऊ, मजबूत।
वि.
[फ़ा.]

पायदारी
दृढ़ता, मजबूती।
संज्ञा
[फ़ा.]

पायमाल
पददलित।
वि.
[फ़ा.]

पायमाल
नष्ट-ध्वस्त।
वि.
[फ़ा.]

पायमाली
दुर्गति।
संज्ञा
[फ़ा.]

निरास
निराश।
उ.- (क) ताकत नहीं तरनिजा के तट तरुवर महा निरास-सा.२६। (ख) तिपीपी पल माँझ कीनो निपट जीव निरास-सा.३८। (ग) सात दिवस जल बरषि सिराने ताते भए निरास-९७४।
वि.
[हिं. निराश]

निरासन
आसनरहित।
वि.
[सं.]

निरासन
दूर करना, निराकरण।
संज्ञा

निरासन
खंडन।
संज्ञा

निरासा
नाउम्मेदी, निराशा।
संज्ञा
[सं. निराशा]

निरासी
हताश, नाउम्मेद।
वि.
[सं. निराशा]

निरासी
उदासीन, विरक्त।
उ.-आप काज कौन हमको तजि तब ते भए निरासी-पृ. ३२५ (४२)।
वि.
[सं. निराशा]

निरासी
जहाँ या जिसमे चित्त को आनंद न मिले, वेरौनक।
उ.-सूर स्याम बिनु यह बन सूने ससि बिनु रौनि निरासी-३४२२।
वि.
[सं. निराशा]

निराहार
जो बिना भोजन किये हो।
वि.
[सं.]

निराहार
जिस (व्रत आदि) में भोजन किया ही न जाय।
वि.
[सं.]

पायी
पीनेवाला।
वि.
[सं. पायिन्]

पायौ
पाया, प्राप्त किया।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पारंगत
नदी अथवा जलाशय के पार पहुँचा हुआ, जो पार जा चुका हो।
उ.- यहै मंत्र सबहीं परधान्यौ सेतु बंध प्रभु कीजै। सब दल उतरि होइ पारंगत, ज्यौं न कोउ इक छीजै-९-१२१।
वि.
[सं.]

पारंगत
पार पहुँचा हुआ।
वि.
[सं.]

पारंगत
पूरा जानकार, पूर्ण पंडित।
वि.
[सं.]

पार
नदी, झील आदि के दूसरी ओर का किनारा।
उ.- भव-समुद्र हरि-पद नौका बिनु कोउ न उतारै पार-१-६८।
संज्ञा
[सं.]

पार
पार उतरना- (१) पाट या फैलाव पार करके दूसरे किनारे पहुँचना। (२) काम से छट्टी पा जाना। (३) सफलता प्राप्त करना। पार उतारना- (१) दूसरे किनारे पर पहुँचाना। (२) समाप्त कर देना। (३) सफलता प्राप्त करना। (४) उद्धार करना। पार तरना- (१) नदी, समूद्र आदि पार करना। (२) दुख, कष्ट आदि से, छुटकारा पाना। पार तरै- उद्धार हो जाता है, दुख-कष्ट से मुक्ति या छुटकारा मिल जाता है। उ.- सूरजदास स्याम सेए तैं दुस्तर पार तरै-१-८२। (किसी का ) पार लगाना- निर्वाह करना। लड़की पार होना- कन्या का विवाह होना।
मु.

पार
आरपार-इस किनारे से उस किनारे तक। वार पार-यह और वह किनारा।
उ.- सूर स्याम द्वै अँखियन देखति, जाको वार न पार-१३११।
यौ.

पार
दूसरी ओर या तरफ।
संज्ञा
[सं.]

पार
आर पार- एक ओर से होकर दूसरी ओर निकलना।
यौ.

पारगत
जानकार।
वि.
[सं.]

पारचा
टुकड़ा।
संज्ञा
[फ़ा.]

पारचा
पोशाक।
संज्ञा
[फ़ा.]

पारण
व्रत के दूसरे दिन का प्रथम भोजन तथा तत्संबंधी कृत्य।
संज्ञा
[सं.]

पारण
तृप्त करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं.]

पारण
मेघ, बादल।
संज्ञा
[सं.]

पारत
झपकाता, मिलाता या गिराता है।
उ.- निदरे बिरह समूह स्याम अँग पेखि पलक नहिं पारत-पृ ३३५ (४७)।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारथ
अर्जुन।
उ.- प्रभु-पारथ द्वै नाहीं।
संज्ञा
[सं. पार्थ]

पारथिव
पृथिवी-संबंधी।
वि.
[सं. पार्थिव]

पारथिव
पृथ्वी या मिट्टी से बना हुआ।
वि.
[सं. पार्थिव]

पार
पार करना- (१) एक ओर से करके दूसरी ओर पहुँचा देना। (२) उद्धार करना। पार होना- एक ओर से जाकर दूसरी ओर निकलना।
मु.

पार
ओर, तरफ।
संज्ञा
[सं.]

पार
छोर, अंत।
उ.- प्रभु तव माया अगम अमोघ है लहि न सकत कोउ पार-३४९४।
संज्ञा
[सं.]

पार
पार पाना- (१) अंत तक पहुँचना। (२) सफलता पाना।
मु.

पार
परे, आगे, दूर।
अव्य.

पारख
जाँच, परीक्षा।
संज्ञा
[हिं. परख]

पारख
परख या जाँच करनेवाला।
संज्ञा
[हिं. पारखी]

पारखद
सेवक, पार्षद।
संज्ञा
[सं. पार्षद]

पारखि, पारखी
परखने-जाँचनेवाला।
उ.- सूरदास गथ खोटो काहे पारखि दोष धरे- पृ. ३३१ (५)।
संज्ञा
[हिं. परख]

पारगत
पार जानेवाला।
वि.
[सं.]

पारथिव
राजसी।
वि.
[सं. पार्थिव]

पारद
पारा।
संज्ञा
[सं.]

पारदर्शक
जिससे आरपार दिखायी दे।
वि.
[सं.]

पारदर्शी
उस पार तक देखनेवाला।
वि.
[सं.]

पारदर्शी
दूर तक देखनेवाला, दूरदर्शी।
वि.
[सं.]

पारदर्शी
जिसने खूब देखा-सुना हो।
वि.
[सं.]

पारधि, पारधी
शिकारी।
उ.- हौं अनाथ बैठयौ द्रुमडरिया, पारधि साधि साधे बान।¨¨¨¨¨¨। सुमिरत ही अहि डस्यौ पारधी, कर छूटयौ संधान-१-९७।
संज्ञा
[सं. परिधान=आच्छादन, हिं. पारधी]

पारधि, पारधी
बहेलिया।
संज्ञा
[सं. परिधान=आच्छादन, हिं. पारधी]

पारधि, पारधी
बधिक
संज्ञा
[सं. परिधान=आच्छादन, हिं. पारधी]

पारधि, पारधी
ओट, आड़।
संज्ञा

पारन
व्रत के दूसरे दिन का प्रथम भोजन तथा तत्संबंधी कृत्य।
उ.- पारन की विधि करौ सबारै-१००१।
संज्ञा
[सं. पारण]

पारना
डालना, गिराना।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारना
जमीन पर डालना।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारना
लिटाना।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारना
कुश्ती में गिराना।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारना
एक वस्तु को दूसरी में डालना या रखना।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारना
रखना।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारना
शामिल करना।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारना
पहनाना।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारना
उत्पात मचाना।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारना
साँचे में डालकर तैयार करना।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारना
समर्थ होना।
क्रि. अ.
[हिं. पार]

पारना
पालन-पोषण करना।
क्रि. स.
[हिं. पालना]

पारबती
हिमालय की कन्या, शिवजी की अर्द्धागिनी।
संज्ञा
[सं. पार्वती]

पारमार्थिक
परमार्थ-संबंधी।
वि.
[सं.]

पारलौकिक
परलोक संबंधी।
वि.
[सं.]

पारषद
पार्षद, सेवक।
उ.- जय अरु बिजय पारषद दोई। बिप्र-सराप असुर भए सोई-९-१५।
संज्ञा
[सं. पार्षद]

पारस
एक पत्थर जिससे छुते ही लोहा सोना हो जाता है।
संज्ञा
[सं. स्पर्श, हिं. परस]

पारस
अत्यंत उपयोगी वस्तु।
संज्ञा
[सं. स्पर्श, हिं. परस]

पारस
स्वच्छ, उत्तम।
वि.

पारस
स्वस्थ।
वि.

पारस
परसा भोजन।
संज्ञा
[हिं. परसना]

पारस
पास, निकट, समीप।
उ.- (क) भृकुटी कुटिल निकट नैनन के चपल होत यहि भाँति। मनहुँ तामरस पारस खेलत बाल भृंग की पाँति-१३५७। (ख) उत स्यामा इत सखा मंडली, इत हरि उत ब्रज नारि। मनो तामरस पारस खेलत मिलि मधुकर गुंजारि।
संज्ञा
[सं. पार्श्व]

पारस
एक प्रसिद्ध देश।
संज्ञा
[सं. पारस्य]

पारसी
पारस देश का।
वि.
[फ़ा. पारस]

पारसी
पारस देश का निवासी।
संज्ञा

पारसीक
पारस देश।
संज्ञा
[सं.]

पारसीक
पारस का वासी।
संज्ञा
[सं.]

पारस्परिक
परस्पर होनेवाला, आपस का।
वि.
[सं.]

पारा
दूसरा तट, दूसरी ओर।
उ.- गयौ कूदि हनुमंत जब सिंधु पारा-९-७६।
संज्ञा
[सं. पार]

पारा
छोर, अंत। पावहिं नहिं पारा- अंत या छोर नहीं पाते।
उ.- सुर-सारद से करत बिचारा। नारद-से नहिं पावहिं पारा-१०-३।
संज्ञा
[सं. पार]

पारा
एक चमकीली धातु, पारद।
संज्ञा
[सं. पारद]

पारा
मिटटी का बड़ा प्याला।
संज्ञा
[सं. पारि]

पारायण
पूरा करने का कार्य।
संज्ञा
[सं.]

पारायण
नियत समय तक ग्रंथ का आद्योपांत पाठ।
संज्ञा
[सं.]

पारावत
पंडुक।
संज्ञा
[सं.]

पारावत
कबूतर।
संज्ञा
[सं.]

पारावत
बन उपवन फल-फूल सुभग सर सुख सारिका हंस पारावत-१०उ.- ५।
ब.

पारावत
बंदर।
संज्ञा
[सं.]

पारावत
पर्वत।
संज्ञा
[सं.]

पारावार
आरपार, तट।
संज्ञा
[सं.]

पारावार
सीमा, अंत।
उ.- तिन कीन्ह्यौ सब जग विस्तार। जाकौ नाहीं पारावार-४-९।
संज्ञा
[सं.]

पारावार
समुद्र, सागार।
संज्ञा
[सं.]

पारि
हद, सीमा।
उ.- मानो बंदि इंदु मंडल में रूप सुधा की पारि-१६८४।
संज्ञा
[हिं. पार]

पारि
ओर, दिशा।
संज्ञा
[हिं. पार]

पारि
जलाशय का तट।
संज्ञा
[हिं. पार]

पारि
(उत्पात या शोर) करके।
उ.- सोर पारि हरि सुबलहिं धाए, गह्यौ श्रीदामा जाहि-१०-२४०।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारि
(माँग, चोटी) सँवारकर।
उ.- (क) माँग पारि बेनी जु सँवारति गूँथी सुँदर भाति-७०४। (ख) मुँडली पटिया पारि सँवारै कोढ़ी लावै केसरि-३०२६।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारि
बंधन में डालकर, बाँधकर।
उ.- तिनकी यह करि गए पलक में पारि बिरह दुख बेरी-२७१९।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारिख
जाँच, परीक्षा।
संज्ञा
[हिं. परख]

पारिजात, पारिजातक
देव-वृक्ष जो समुद्र-मंथन से निकला था और अब नंदनकानन में है।
संज्ञा
[सं.]

पारिजात, पारिजातक
हरसिंगार।
संज्ञा
[सं.]

पारिजात, पारिजातक
कचनार, कोविदार।
संज्ञा
[सं.]

पारित
जिसका पारण हो चुका हो।
वि.
[सं.]

पारित
जो परीक्षा में उत्तीर्ण हो चुका हो।
वि.
[सं.]

पारितोषिक
प्रीति या आनंदकर।
वि.
[सं.]

पारितोषिक
पुरस्कार, इनाम।
संज्ञा

पारिभाषिक
विशिष्ट अर्थ में प्रयुक्त।
वि.
[सं.]

पारिश्रमिक
परिश्रम के बदले (लेखक या कार्यकर्ता को) दिया जानेवाला धन।
संज्ञा
[सं.]

पारिषद
सभासद।
संज्ञा
[सं.]

निरिच्छ
जिसे कोई इच्छा न हो।
वि.
[सं.]

निरिच्छना
देखना।
क्रि. स.
[सं. [सं. निरीक्षण]]

निरी
विशुद्ध।
वि.
[हिं. निरा]

निरी
केवल।
वि.
[हिं. निरा]

निरीक्षक
देखरेख करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

निरीक्षण
देखरेख, निगरानी।
संज्ञा
[सं.]

निरीक्षण
देखने की मुद्रा या रीति, चितवन।
संज्ञा
[सं.]

निरीक्षित
निरीक्षण किया हुआ।
वि.
[सं.]

निरीश
अनाथ।
वि.
[सं.]

निरीश
नास्तिक।
वि.
[सं.]

पारयौ
(शब्द) निकाला, (शोर) किया।
उ.- मरत असुर चिकार पारयौ-४२७।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पार्थ
पृथ्वीपति।
संज्ञा
[सं.]

पार्थ
अर्जुन।
संज्ञा
[सं.]

पार्थक्य
पृथकता, भेद। वियोग।
संज्ञा
[सं.]

पार्थव
स्थूलता, भारीपन।
संज्ञा
[सं.]

पार्थिव
पृथ्वी-संबंधी।
संज्ञा
[सं.]

पार्थिव
पृथ्वी या मिट्टी से उत्पन्न।
संज्ञा
[सं.]

पार्थिव
राजसी।
संज्ञा
[सं.]

पार्वती
हिमालय-पुत्री जो शिव की अर्द्धगिनी देवी है, गौरी, शिवा, भवानी।
संज्ञा
[सं.]

पार्श्व
बगल।
संज्ञा
[सं.]

पारिषद
गण।
संज्ञा
[सं.]

पारी
पालन की, पूरी की, निभा दी।
उ.- जन प्रहलाद प्रतिज्ञा पारी। हिरनकसिपु की देह बिंदारी-१-२८।
क्रि. स.
[हिं. पालना]

पारी
(माँग) सँवारी या निकाली, (बाल काढ़कर माँग) बनाई।
उ.- बूझति जननि कहाँ हुती प्यारी। किन तेरे भाल तिलक रचि कीनौ, किहिं कच गूँदि माँग सिर पारी-७०८।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारी
बारी, ओसरी।
संज्ञा
[हिं. बारी]

पारे
सजाये या काढ़े हुए।
उ.- वे मोरे सिर पटिया पारैं कंथा काहि उढ़ाऊँ-३४६६।
वि.
[हिं. पारना]

पारे
उठाये, मिलाये, गिराये।
उ.- मानहु रति रस भए रँगमगे करत केलि पिय पलक न पारे-३१३२।
क्रि. स.

पारेउ
गिराया, खोया।
उ.- बिकल मान खोयौ कौरव पति, पारेउ सिर कौ ताज-१-२५५।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारौं
गिराऊँ, गिरने को प्रवृत करूँ, डालूँ।
उ.- कहौ तौ ताकौं तृन गहाइ कैं, जीवित पाइनि पारौं-९-१०८।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पारौं
पूरी करूँ, पालन करूँ, निभाऊँ।
उ.- रघुपति, जौ न इंद्रजित मारौं। तौ न होउँ चरननि कौ चेरौ, जौ न प्रतिज्ञा पारौं-९-१३७।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पार्यौ
गिराया. नष्ट किया।
उ.- द्रुपद-सुता की राखी लाज। कौरवपति कौ पारयौ ताज-१-२४५।
क्रि. स.
[हिं. पारना]

पार्श्व
पसली।
संज्ञा
[सं.]

पार्श्व
अगल-बगल की जगह।
संज्ञा
[सं.]

पार्श्व
कुटिल उपाय।
संज्ञा
[सं.]

पार्श्वनाथ
जैनियों के तेइसवें तीर्थकर।
संज्ञा
[सं.]

पार्षद
सेवक, अनुचर।
उ.- अजामिल द्विज सौं अपराधी, अंतकाल बिडरै। सुतसुमिरत नारायन-बानी, पार्षद धाइ परैं-१-८२।
संज्ञा
[सं.]

पार्षद
मंत्री।
संज्ञा
[सं.]

पाल
पालनकर्ता, पालक।
उ.- मन बिहँसत गोपाल, भक्त-पाल, दुष्ट-साल, जानै को सूरदास चरित कान्ह केरौ-१०-२७६।
संज्ञा
[सं.]

पाल
फलों को पकाने के लिए भूसे-पत्ते आदि में रखना।
संज्ञा
[हिं. पालना]

पाल
मस्तूल से लगा लंबा चौड़ा परदा जिसमें हवा भरने से नाव चलती है।
संज्ञा
[सं. पट या पाट]

पाल
तंबू, चँदोवा।
संज्ञा
[सं. पट या पाट]

पाल
गाड़ी, पालकी आदि का ओहार।
संज्ञा
[सं. पट या पाट]

पाल
बाँध, मेड़।
संज्ञा
[सं. पालि]

पाल
ऊँचा किनारा।
संज्ञा
[सं. पालि]

पालउ
पल्लव, कोंपल।
संज्ञा
[सं. पल्लव]

पालक
पालनकर्त्ता।
संज्ञा
[सं.]

पालक
निर्वाह करने वाला।
उ.- तुम हो बड़े योग के पालक संग लिए कुबिजा सी-३१३३।
संज्ञा
[सं.]

पालक
एक तरह का साग।
उ.- सरसों, मेथी, सोवा, पालक-३९६।
संज्ञा

पालकी
बढ़िया 'डोली' की सवारी।
संज्ञा
[सं. पल्यंक]

पालत
पालता है, पालन-पोषण करता है।
उ.- पालत, सृजत, सँहारत, सैतत, अंड अनेक अवधि पल आधे-९-५८।
क्रि. स.
[हिं. पालना]

पालतू
पाला-पोसा हुआ।
वि.
[हिं. पालना]

पालथी
बैठने की एक रीति।
संज्ञा
[सं. पर्य्यात]

पालन
भरण-पोषण।
संज्ञा
[सं.]

पालन
निर्वाह।
संज्ञा
[सं.]

पालनहारैं
पालनेवाले।
उ.- सूर स्याम के पालनहारैं, आवतिं हौं नित गारि-१-१५०।
वि.
[सं. पालन + हारैं (प्रत्य.)]

पालना
भरण-पोषण करना।
क्रि. स.
[सं. पालन]

पालना
पशु पक्षी को खिलाना-पिलाना और हिलाना।
क्रि. स.
[सं. पालन]

पालना
भंग न करना, न टालना।
क्रि. स.
[सं. पालन]

पालना
बच्चों का झूला, हिंडोला।
संज्ञा
[सं. पल्यक]

पालनैं
हिंडोले में।
उ.- जसोदा हरि पालनै झुलावै-१०-४२।
संज्ञा
[हिं. पालना]

पालीं
जिन्हें पाला हो, पाली हुईं।
उ.- आई बेगि सूर के प्रभु पै, ते क्यौं भजैं जे पालीं-६१३।
वि.
[हिं. पालना]

पाली
पालन की, निर्वाह की निभायी।
उ.- जन प्रहलाद प्रतिज्ञा पाली, कियौ बिभीषन राजा भारी-१-३४।
क्रि. स.
[हिं. पालना]

पाली
बरतन का ढक्कन।
संज्ञा
[सं. पालि]

पाली
एक प्रसिद्ध प्राचीन भाषा।
संज्ञा

पालू
पाला हुआ, पालतू।
वि.
[हिं. पालना]

पालै
पालन करे।
उ.- दया धर्म पालै जो कोइ- पृ ६०० (२)।
क्रि. स.
[हिं. पालना]

पालो, पालौ
पत्ता, कोंपल।
संज्ञा
[सं. पल्लव]

पावँ
संज्ञा
[सं. पाद, प्रा, पाय, पाव हिं.. पाँव]

पावँ
पावँ अड़ाना- व्यर्थ ही बीच में पड़ना या दखल देना। पावँ उखड़ (उठ) जाना- सामने रुकने, ठहरने या लड़ने का साहस न रहना। पावँ काँपना- (१) भय, निर्बलता आदि से पैर काँपना। (२) ठहरने या आगे बढ़ने का साहस न रहना। पावँ की जूती- अत्यंत तुच्छ। पावँ की जूती सिर को लगाना- छोटे आदमी को बहुत महत्व दे देना। पावँ की बेड़ी- झंझट, जंजाल। पावँ की मेंहदी न बिसना (छूटना)- कहीं जाने में ज्यादा कष्ट या परेशानी नहीं होगी। पावँ खींचना- घूमना फिरना छोड़ देना। पावँ गाड़ना- (१) डटकर खड़े रहना या सामना करना। (२) दृढ़ रहना। (३) रहने-बसने का मजबूत प्रबंध कर लेना। पावँ टिकाना- (१) खड़ा होना। (२) विश्राम करना। पावँ ठहरना- (१) पैर जमना। (२) स्थिरता होना। पावँ डगमगाना- (१) पैर स्थिर न रहना। (२) विचलित हो जाना। पावँ डालना- काम करने को तैयार होना। पावँ तले की चीटी- अत्यंत दीन-हीन प्राणी। पावँ तले की धरती सरकना- ऐसा दुख होना कि पृथ्वी भी काँप जाय। पाँव तले की मिट्टी निकल जाना- ऐसी अनहोनी या भयंकर बात की सुनकर सन्नाटे में आ जाना। पावँ तोड़ना- बहुत चलकर पैर थकाना। पावँ तोड़कर बैठना- (१) अचल या स्थिर होना। (२) थक-हारकर बैठ जाना। पावँ थरथराना- (१) भय, आशंका आदि से पैर काँपना। (२) आगे बढ़ने का साहस न होना। पावँ दबाना (दाबना) - (१) थकावट दूर करने को पैर दबाना। (२) सेवा करना। पावँ धरना - कहीं जाना। काम में पावँ धरना - काम में लगना। (किसी का) पावँ धरना - (१) पैर छूकर प्रणाम करना। (२) दीनता दिखाना। (३) तेजी दिखाना, तर्क से निरूत्तर करना। बुरे पथ पर पाँव धरना - बुरे कामों में रूचि लेना। पावँ धोकर पीना- बड़ा आदर-भाव दिखाना। पाँव निकलना - (१) आजादी से घूमना-फिरना। (२) दुराचार के कारण बदनामी होना। पावँ निकालना - (१) इतराकर चलना, हैसियत से बाहर काम करना। (२) स्वेच्छाचारी होना। (३) दुराचरण करना। (४) चालाकी दिखाना। (काम से) पावँ निकाला- काम के झगड़े से अलग हो जाना। पावँ पकड़ना- (१) जाने से रूकने की प्रार्थना करना। (२) बड़ी दीनता दिखाना। (३) बड़े भक्ति-भाव से नमस्कार करना। पावँ पकरना- विनयपूर्वक यात्रा से रोकना। पावँ पकरि- बड़ी विनय या नम्रता दिखाकर। उ.- जानति जो न स्याम ऐहैं पुनि पावँ पकरि घर राखती। पावँ पकरति- बड़ी दीनता या विनयपूर्वक प्रार्थना करती हूँ। उ,- अब यह बात कहौ जनि ऊधो, पकरति पावँ तिहारे। पावँ पखारना- पैर धोना। पावँ पड़ना - (पैर पर गिरना) (१) भक्ति-भाव से प्रणाम करना। (२) दीनता दिखाना। (३) जाने से रूकने को नम्रतापूर्वक कहना। पाँव पर पावँ रखकर बैठना (सेना) - (१) काम-धंधा छोड़ बैठना। (२) बेफिक्र या गाफिल रहना। (किसी के) पावँ पर पावँ रखना- किसी का अनुकरण करना। (किसी के) पावँ पर सिर रखना - (१) भक्ति-भाव से प्रणाम करना। (२) दीनता दिखाना (३) जाने से रूकने को नम्रतापूर्वक कहना। पावँ पलोटना- सेवा करना। पाँव पसारना- (१) आराम से सोना। (२) मरना। (३) ठाट-बाट करना। पावँ-पावँ (चलना)- पैदल चलना। पावँ पीटना- (१) तड़पना, छटपटाना। (२) रोग या मृत्यु का कष्ट भोगना। (३) परेशान या हैरान होना। पावँ पूजना- (१) बड़ा आदर-सत्कार करना। (२) कन्यादान में योग देना। (३) खुशामद से पनाह माँगना। पावँ फिसलना- कुसंगत में पड़ना। पावँ फूँक-फूँककर रखना- बहुत बचा-बचाकर या सावधानी से चलना। पावँ फूलना- (१) पैर आगे न उठना। (२) थकावट से पैर दुखना। पावँ फेरने जाना- (१) विवाह के पश्चात् वधू का पहले पहल ससुराल जाना। (२) बच्चा होने के पश्चात् वधू का अपने माता-पिता या बड़े संबंधियों के यहाँ जाना। पावँ फैलाना- (१) अधिक की प्राप्ति के लिए लोभ दिखाना। (२) बच्चों की तरह मचलना। पावँ बढ़ाना- (१) जल्दी जल्दी चलना। (२) अधिकार बढ़ाना। पावँ बाहर निकलना- बदनामी फैलना। पावँ बाह निकालना- (१) इतराकर चलना। (२) स्वेच्छाचारी होना। पावँ विचलना- (१) पैर रपट जाना। (२) स्थिर या दृढ़ न रहना। (३) नीयत डोल जाना। (४) कुसंगति में पड़ जाना। पावँ भर जाना- चलने की बहुत थकावट होना। पावँ भारी होना- गर्भ रहना। (किसी से) पावँ भी न धुलवाना (दबवाना)- (किसी को) बहुत ही तुच्छ समझना। पावँ में क्या मेंहदी लगी है- कहीं आने-जाने का आलस्य दिखाना (व्यंग्य)। पावँ में बेड़ी पड़ना- (गृहस्थी के) बंधन या जंजाल में पड़ना। पावँ में सिर देना- (१) प्रणाम करना। (२) दीनता दिखाना। (३) पनाह माँगना। पावँ रगड़ना- (१) छटपटाना। (२) दौड़-धूप करना। पावँ रह जाना - (१) चलने या दौड़ने-धूपने से पैरों में बहुत ही थकावट होना। (२) पैर अशक्त हो जाना। पावँ रोपना- प्रतिज्ञा करना। पावँ लगना- (१) पैर छूकर प्रणाम करना। (२) आदर करना। (३) विनती करना। पावँ लगा होना - खूब घूमा-फिरा और परिचित (स्थान) होना। पावँ समेटना सिकोड़ना, सुकेड़ना- (१) पैर ज्यादा न फैलाना। (२) लगाव या संबंध न रखना। (३) इधर-उधर न घूमना। पावँ से पावँ बाँधकर रखना- (१) बराबर अपने पास रखना। (२) पूरी चौकसी या निगरानी रखना। पावँ न होना- दृढ़ता या साहस न होना। धरती पर पावँ न रखना (रहना)- (१) बहुत घमंड होना। (२) अत्यानंद से फूले अंग न समाना।
मु.

पावँड़ा
पैरपुछना, पायंदाज।
संज्ञा
[हिं. पावँ + ड़ा]

पावँड़ी
खड़ाऊँ।
संज्ञा
[हिं. पावँ + ड़ी]

पावँड़ी
जूता।
संज्ञा
[हिं. पावँ + ड़ी]

पावँर
दुष्ट, नीच।
वि.
[सं. पामर]

पावँर
मूर्ख।
उ.- पाखण्ड धर्म करत हैं पावँर।
वि.
[सं. पामर]

पावँर
पायंदाज।
संज्ञा
[हिं. पावँड़ा]

पावँर
खड़ाऊँ।
संज्ञा
[हिं. पावँड़ी]

पावँर
जूता।
संज्ञा
[हिं. पावँड़ी]

पावँरी
खड़ाऊँ।
संज्ञा
[हिं. पावँड़ी]

पावँरी
जूता।
संज्ञा
[हिं. पावँड़ी]

पावँ
चौथाई भाग।
संज्ञा
[सं. पाद]

पावँ
एक सेर का चौथाई भाग।
संज्ञा
[सं. पाद]

पावँ
पाते हैं।
उ.- जाकौ सिवबिरंचि सनकादिक मुनिजन ध्यान न पाव-१०-७५।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पावक
अग्नि।
संज्ञा
[सं.]

पावक
सदाचार।
संज्ञा
[सं.]

पावक
पवित्र करनेवाला।
वि.

पावत
पाते हैं।
उ.- जन्मथान जिय जानि कै ताते सुख पावत -२५६०।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पावति
पाती है।
उ.- ढ़ँढ़त फिरति ग्वारिनी हरि कौं, कितहूँ भेद न पावति-४-५९।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पावती
पाती, पा सकती।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पावती
छबि पावती-शोभा देखती।
उ.-स्यामा छबीली भावती, गौर स्याम छबि पावती-२०६५।
प्र.

पावती
जान पावती -जा सकती।
उ.-जौ हौं कैसेहु जान पावती तौं कत आवत छोड़ी-२७०१।
प्र.

पावती
समझ पाती।
प्र.

पावन
शुद्ध या पवित्र करनेवाला।
उ.-जौ तुम पतितनि के पावन हौ, हौं हूँ पतित न छोटौ-१-१७९।
वि.
[सं.]

पावन
शुद्ध; पवित्र।
वि.
[सं.]

पावन
अग्नि, आग।
संज्ञा
[सं.]

पावन
शुद्धि, प्रायश्चित।
संज्ञा

पावन
जल।
संज्ञा

पावन
गोबर।
संज्ञा

पावन
चंदन।
संज्ञा

पावन
विष्णु।
संज्ञा

पावनता, पावनताई
पवित्रता।
संज्ञा
[सं. पावनता]

पावनध्वनि
शंख।
संज्ञा
[सं.]

पावना
पाना, प्राप्त करना।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पावना
जानना-समझना, अनुभव करना।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पावना
भोजन करना।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पावनी
पवित्र करनेवाली।
वि.
[सं.]

पावनी
तुलसी।
संज्ञा

पावनी
गाय।
संज्ञा

पावनी
गंगा।
संज्ञा

पावनी
पानेवाला।
वि.
[हिं. पावना]

पावनी
पाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा

पावस
वर्षकाल, बरसात, सावन-भादों के महीने।
उ.-चतुरानन बल सँझार मेघनाद आयौ। मानौ घन पावस मैं नगपति है छायौ-९-९६।
संज्ञा
[सं. प्रावष, प्रा. पाउस]

निरीश्वरवाद
वह सिद्धांत जिसमें ईश्वर का अस्तित्व न माना जाय।
संज्ञा
[सं.]

निरीश्वरवादी
ईश्वर का अस्तित्व न माननेवाला, नास्तिक।
संज्ञा
[सं.]

निरीह
जो इच्छा या चेष्टा न करे,
वि.
[सं.]

निरीह
विरल।
वि.
[सं.]

निरीह
तटस्थ।
वि.
[सं.]

निरीह
शांतिप्रिय।
वि.
[सं.]

निरुआर
निर्णय, फैसला।
उ.-साँच-झूठ होइ है निरुवार-१० उ.-४४।
संज्ञा
[हिं. निरुवार]

निरुआरना
निर्णय करना।
क्रि. स.
[हिं. निरुवारना]

निरुआरना
सुलझाना,
क्रि. स.
[हिं. निरुवारना]

निरुआरना
मुक्त करना, छुड़ाना।
क्रि. स.
[हिं. निरुवारना]

पावहिगे
पायँगे, प्राप्त करेगे।
उ.-निरखि-निरखि वह मदन मनोहर नेन बहुत सुख पावहिंगे-२८८९।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पावा
पलँग आदि का पाया।
संज्ञा
[हिं. पावँ]

पावै
प्राप्त करता है।
क्रि. स.
[हिं. पावना]

पावै
फल भोगता है।
क्रि. स.
[हिं. पावना]

पावै
अनुभव करता है।
उ.-मन बानी कौं अगम अगोचर सो जानै जो पावै-१-२।
क्रि. स.
[हिं. पावना]

पावै
जान या समझ सकता है।
उ.-तुम बिनु और न कोउ कृपा निधि पावै पीर पराई-१-१९५।
क्रि. स.
[हिं. पावना]

पावै
जानना, समझना।
क्रि. स.
[हिं. पावना]

पाश
फंदा, फाँस।
संज्ञा
[सं.]

पाश
पशु-पक्षी को फँसाने का जाल।
संज्ञा
[सं.]

पाश
बंधन।
संज्ञा
[सं.]

पाश्चात्य
पश्चिम का।
वि.
[सं.]

पाषंड
वेद-विरुद्ध आचरण करने वाला।
संज्ञा
[सं.]

पाषंड
आडंबर, ढोंग।
संज्ञा
[सं.]

पाषंड
ढोंगी या कपटी मनुष्य।
संज्ञा
[सं.]

पाषंड
संप्रदाय।
संज्ञा
[सं.]

पाषंडी
ढोंगी, धूर्त, ठग, आडम्बरी।
वि.
[सं. पाषडिन्]

पाषाण
पत्थर, प्रस्तर।
संज्ञा
[सं.]

पाषाणी
कठोर हृदयवाली।
वि.
[सं.]

पासंग
तराजू के पलड़े बराबर करने के लिए रखी जानेवाली बस्तु, पसंघा।
संज्ञा
[फ़ा.]

पासंग
पासंग (बराबर) भी न होना- तुलना या मुकाबले में जरा भी न ठहरना, बहुत ही कम होना।
मु.

पाशक
जुए का एक खेल।
संज्ञा
[सं.]

पाशधर
वरुण जिनका अस्त्र पाश है।
संज्ञा
[सं.]

पाशव, पाशविक
पशु-संबंधी।
वि.
[सं.]

पाशव, पाशविक
पशु-जैसा।
वि.
[सं.]

पाशव, पाशविक
अत्यंत निर्दय और कठोर।
वि.
[सं.]

पाशिक
जाल में फँसानेवाला।
वि.
[सं.]

पाशित
जाल में फँसा हुआ, पाशबद्ध।
वि.
[सं.]

पाशी
पाश धारण करनेवाला।
वि.
[सं.]

पाशुपतास्त्र
शिव का शूलास्त्र जिससे अर्जुन ने जयद्रथ को मारा था।
संज्ञा
[सं.]

पाश्चात्य
पिछला।
वि.
[सं.]

पासंग
तराजू की डंडी का किसी ओर झुकना।
संज्ञा
[फ़ा.]

पासंगहु
पसंघा भी, पसंघे के बराबर भी।
संज्ञा
[फ़ा. पासंग + हिं. हु (प्रत्य.)]

पासंगहु
पासंगहु नाहीं- बहुत ही तुच्छ हैं, कुछ भी नहीं हैं, नगण्य हैं। उ.-पतितनि मै बिख्यात पतित हौं पावन नाम तुम्हारौ। बड़े पतित पासंगहु नाही, अजमिल कौन बिचारौ-१-१३१।
मु.

पास
बगल, ओर, तरफ।
संज्ञा
[सं. पार्श्व]

पास
सामीप्य, निकटता।
संज्ञा
[सं. पार्श्व]

पास
पास-परोसनैं-पास-पड़ोस में रहनेवाली स्त्रियाँ।
उ.-हरषीं पास-परोसिनैं (हो), हरष नगर के लोग-१०-४०।
यौ.

पास
अधिकार, रक्षा, पल्ला।
संज्ञा
[सं. पार्श्व]

पास
बगल में, निकट, समीप।
उ.-हम अज न कत डरत हैं, कान्ह हमारैं पास-४३१।
अव्य.

पास
निकट जाकर, संबोधन करके, किसी के प्रति।
उ.-माँगत है प्रभु पास दास यह बार बार कर जोरी।
अव्य.

पास
अधिकार में, रक्षा में, पल्ले।
उ.-ज्यों मृगा कस्तूरि बूलै, सुतौ ताके पास-१-७०।
अव्य.

पास
पाश, फंदा।
उ.-बरुन-पास तैं ब्रजपतिहिं छन माहिं छुड़ावै-१-४।
संज्ञा
[सं. पाश]

पासना
थन में दूध उतरना।
क्रि. अ.
[हिं. पय]

पासनी
अन्नप्राशन, बच्चे को पहले पहल अनाज चटाने की रीति।
उ.-कान्ह कुँवर की करहु पासनी कछु दिन घटि षट मास गए-१०-८८।
संज्ञा
[सं. प्राशन]

पासमान
पास ही में बना रहनेवाला, निकट रहनेवाला।
संज्ञा
[हिं. पास + मान]

पासमान
मंत्री।
संज्ञा
[हिं. पास + मान]

पासमान
सखा।
संज्ञा
[हिं. पास + मान]

पासा
चौसर खेलने के टुकड़े जिन्हें खिलाड़ी बारी-बारी फेंकते हैं।
उ.-छल कियौ पांडवने कौख कपट पासा ढरन-१-२०२।
संज्ञा
[सं. पाशक, प्रा. पाश]

पासा
पासा पड़ना- (१) जीत का दाँव पड़ना। (२) भाग्य अनुकूल होना। पासा पलटना- (१) खेल में हारना। (२) भाग्य प्रतिकूल होना। (३) प्रयत्न करने पर भी उलटा फल होना। पासा फेंकना- भाग्य की परीक्षा करना।
मु.

पासा
पासे का खेल, चौसर।
संज्ञा
[सं. पाशक, प्रा. पाश]

पासा
चौकोर टुकड़े।
उ.-महल-महल लागे मनि पासा-२६४३।
संज्ञा
[सं. पाशक, प्रा. पाश]

पासा
निकट, समीप।
उ.-(क) अतिहिं ए बाल हैं, भोजन नवनीति के जानि तिन्हें लीन्हें जात दनुज पासा-२५५२। (ख) आतुर गयो कुबलिया पासा-२६४३।
अव्य.

पासा
अधिकार या कब्जे में।
उ.-कोटि दनुज मो सरि मो पासा-२४५९।
अव्य.

पासासार, पासासारि
पासे का खेल।
संज्ञा
[हिं. पासा + सारि=गोटी]

पासासार, पासासारि
पासे की गोटी।
संज्ञा
[हिं. पासा + सारि=गोटी]

पासिक
फंदा, जाल, बंधन।
संज्ञा
[सं. पाश]

पासि, पासिका
फंदा, जाल, बंधन।
उ.-(क) मोहन के मन बाँधिबे को मनो पूरी पासि मनोज-२०६४।
संज्ञा
[सं. पाश]

पासी
फंदा डालकर फैसाने वाला।
संज्ञा
[सं. पाशी]

पासी
एक नीची जाति।
संज्ञा
[सं. पाशी]

पासी
फंदा, बंधन।
उ.-सूरदास प्रङु द्दढ़ करि बाँधे प्रेम-पुंजिका पासी-३०८९।
संज्ञा
[सं. पाश]

पासुरी
पसली।
संज्ञा
[हिं. पसली]

पाहँ
निकट, समीप, पास।
अव्य.
[सं. पार्श्व, प्रा. पास, पाह]

पाहँ
किसी के प्रति, किसी को संबोधन करके।
अव्य.
[सं. पार्श्व, प्रा. पास, पाह]

पाहन
पत्थर, प्रस्तर।
उ.-पाहन बीच कमल बिकसावै, जल मैं अगिनि जरै-१-१०५।
संज्ञा
[सं. पाषाण, प्रा. पाहाण]

पाहरू
पहरा देनेवाला।
संज्ञा
[हिं. पहरा]

पाहा
खेत की मेड़।
संज्ञा
[सं. पथ]

पाहाँ, पाहि
निकट, समीप।
अव्य.
[सं. पार्श्व, प्रा. पास, पाह]

पाहाँ, पाहि
किसी के प्रति, किसी को संबोधन करके।
अव्य.
[सं. पार्श्व, प्रा. पास, पाह]

पाहाँ, पाहि
(किस) से।
उ.-हमहिं छाप देखावहु दान चहत केहि पाहिं-११०९।
अव्य.
[सं. पार्श्व, प्रा. पास, पाह]

पाहि
बचाओ, रक्षा करो।
पद.
[सं.]

पाहीं
समीप।
अव्य.
[हिं. पाहिं]

पाहीं
किसी के प्रति।
अव्य.
[हिं. पाहिं]

पाहुँच
पैठ, प्रवेश, पहुँच।
संज्ञा
[हिं. पहुँच]

पाहुन, पाहुना
अतिथि।
संज्ञा
[सं. प्रधूर्ण]

पाहुनी
स्त्री अतिथि, अभ्यागत स्त्री।
उ.-पाहुनी, करि दै तनक मह्यौ। हौं लागी गृह-काज-रसोई, जसुमति बिनय कह्यौ-१०-१८२।
संज्ञा
[हिं. पुं. पाहुना]

पाहुने
अतिथि, मेहमान, अभयागत।
उ.-(क) जा दिन संत पाहुने आवत-२-१७। (ख) सुदंर स्याप पाहुने के मिसि मिल न जाहु दिनचार-२७६९।
संज्ञा
[हिं. पाहुना]

पाहुर
भेंट, सौगात।
संज्ञा
[सं. प्राभृत, प्रा. पाहुड़=भेंट]

पाहैं
पास, निकट।
अव्य.
[हिं. पाहँ]

पाहैं
किसके प्रति।
उ.-सूरदास प्रभू दूरि सिधारे दुख कहिए केहि पाहैं-२८०१।
अव्य.
[हिं. पाहँ]

पिंग, पिंगल
पीला।
वि.
[सं.]

पिंग, पिंगल
भूरापन लिये लाल।
वि.
[सं.]

पिंग, पिंगल
भूरापन लिये पीला।
वि.
[सं.]

पिंगल
एक प्राचीन आचार्य जिन्होंने छंद-शास्त्र रचा था।
संज्ञा
[सं.]

पिंगल
उक्त आचार्य का बनाया छंदशास्त्र।
संज्ञा
[सं.]

पिंगल
छंदशास्त्र।
संज्ञा
[सं.]

पिंगला
हठ्योग की तीन प्रधान नाड़ियों में एक।
उ.-इंगला, पिंगलास सुषमना नारी-३३०८।
संज्ञा
[सं.]

पिंगला
एक वेश्या जिसे वियोग में तड़पते तड़पते ज्ञान हुआ कि निकट के कांत को छोड़कर दूर के कांत के लिए भटकना अज्ञान है।
उ.-सुरदास बरु भली पिंगला आशा तजि परतीति-२७३०।
संज्ञा
[सं.]

पिंजड़ा, पिंजर, पिंजरा
लोहे, बाँस आदि की तीलियों से बना झाबा जिसमें पक्षियों को रखा जाता है।
उ.-कंस के प्रान भयभीत पिंजरा जैसे नव बिहंगम तैसे मरत फरफराने-२५९६।
संज्ञा
[सं. पंजर]

पिंजर
पिंजड़ा।
संज्ञा
[सं. पंजर]

पिंजर
शरीर की हडिडयों की ठठरी।
संज्ञा
[सं. पंजर]

पिंजरन
पिजड़ों में।
उ.-ज्यों उड़ि मैलि बधिक खग छिन में पलक पिंजरन तोरि- पृ ३३३ (२०)।
संज्ञा
[हिं. पिंजर]

पिंजरापोल
गोशाला।
संज्ञा
[हिं. पिंजर + पोल]

पिंजरी
छोटा पिंजड़ा।
उ.-बज्र पिंजरी रूँधि मानों राखे निकसन को अकुलात-२७०३।
संज्ञा
[हिं. पिंजड़ा]

पिंजरैं
पिंजड़े में।
उ.-कीर पिंजरैं गहत अँगुरी, ललन लेत भँजाइ-४९८।
संज्ञा
[हिं. पिंजरा, पिंजड़ा]

पिंड
गोल-मटोल टुकड़ा, पिंडा, ढेर।
उ.-दुहूँ करनि असुर हयौ, भयो मांस पिंड-९-९६।
संज्ञा
[सं.]

पिंड
लोंदा, लुगदा।
उ.-माखन पिंड बिभागि दुहूँकर, मेलत मुख मुसुकाइ-१०-१८९।
संज्ञा
[सं.]

पिंड
खीर का लोंदा जो श्राद्ध में पितरों की अर्पित किय जाता है।
संज्ञा
[सं.]

पिंड
भोजन, आहार।
संज्ञा
[सं.]

पिंड
शरीर, देह।
उ.-अपनौ पिंड पोषिबे कारन, कोटि सहस जिय मारे-१-३३४।
संज्ञा
[सं.]

पिंड
पिंड छोड़ना- तंग न करना। पिंड पड़ना- तंग करना।
मु.

पिंडखजूर
खजूर।
संज्ञा
[सं. पिंडखर्जुर]

निरुक्त
व्याख्या किया हुआ।
वि.
[सं.]

निरुक्त
नियुक्त, स्थापित, प्रतिष्ठित।
वि.
[सं.]

निरुक्त
छह वेदांगों में चौथा अंग।
संज्ञा

निरुक्त
एक काव्यालंकार।
उ.-यह निरुक्त की अवध बाम तू भइ ‘सूर’ हत सखी नवीन-सा. ९६।
संज्ञा
(सं. निरुक्ति

निरुक्ति
शब्द की व्युत्पत्ति।
संज्ञा
[सं.]

निरुच्छवास
सँकरा, संकीर्ण (स्थान)।
वि.
[सं.]

निरुज
नीरोग।
वि.
[हिं. नीरुज]

निरुत्तर
जिसका कुछ उत्तर न दिया जा सके, लाजवाब।
वि.
[सं.]

निरुत्तर
जो उत्तर न दे सके।
वि.
[सं.]

निरुत्साह
जिसमें उत्साह न हो।
वि.
[सं.]

पिंडज
वह जीव जो गर्भ से बने-बनाये शरीर के रूप में जन्मे।
संज्ञा
[सं.]

पिंडदान
पितरों को पिंड देना।
संज्ञा
[सं.]

पिंडली, पिंडरी
घुटने के कुछ नीचे का पिछला मांसल भाग।
संज्ञा
[सं. पिंड, हिं. पिंडली]

पिंडवाही
एक तरह का कपड़ा।
संज्ञा
[देश.]

पिंडा
गोल-मटोल टुकड़ा, ढेर।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पिंडा
लोंदा, लुगदा।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पिंडा
खीर का लोंदा जो श्राद्ध में पितरों की अर्पित किय जाता है।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पिंडा
शरीर, देह।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पिंडारू, पिंडालू
एक प्रकार का मीठा सकरकंद।
उ.-बनकौरा पिंडीक चिचिंडी। सीप पिंडारू कोमल भिंडी-३९६।
संज्ञा
[हिं. पिंड + हिं. आलू]

पिंडिया, पिंडी
छोटा लंबा पिंड।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पिअराई
पीलापन।
संज्ञा
[सं. पीत]

पिअरिया, पिअरी
पीली।
वि.
[हिं. पीला]

पिअरिया, पिअरी
हल्दीके रंग में रँगी पीली धोती
संज्ञा

पिआना
पान कराना।
क्रि. स.
[हिं. पिलाना]

पिआर
प्रेम, प्रीति।
संज्ञा
[हिं. प्यार]

पिआर
चुंबन।
संज्ञा
[हिं. प्यार]

पिआरा
प्रिय।
वि.
[हिं. प्यारा]

पिआवत
पान कराते हैं।
उ.-आपुन पीवत सुधा रस सजनी बिरहिनि बोलि पिआवत -२८४५।
क्रि. स.
[हिं. पिलाना]

पिआवै
पान करावे।
उ.-जेहि मुख अमृत पिउ रसना भरि तेहि क्यों बिषहिं पिआवै-३०९८।
क्रि. स.
[हिं. पिलाना]

पिआस
पीने की इच्छा, प्यास।
संज्ञा
[हिं. प्यास]

पिंडीक
इमली, श्वेतांलिका।
संज्ञा
[सं. पिंडिका]

पिंडीशूर
डींग हाँकने वाला।
संज्ञा
[सं.]

पिंडुरी, पिंडुरिया, पिंडुली
पिंडली।
उ.-पीन पिंडुरिया साँवल सीरी चरणांबुज नख लाल री-पृ. ४२०।
संज्ञा
[हिं. पिंडली]

पिअ
प्यारा, प्रिय।
वि.
[सं. प्रिय]

पिअ
प्रेमी।
संज्ञा

पिअ
प्रियतम, पति।
संज्ञा

पिअर, पिअरवा
पीला।
वि.
[हिं. पिला]

पिअरवा
प्यारा, प्रिय।
वि.
[हिं. प्रिय]

पिअरवा
प्यारा।
संज्ञा

पिअरवा
प्रियतम, पति।
संज्ञा

पिआसा
जिसे पीने की इच्छा हो, प्यासा।
वि.
[हिं. प्यासा]

पिउ
प्रेमी।
संज्ञा
[सं. प्रिय]

पिउ
पति।
संज्ञा
[सं. प्रिय]

पिएउ
पी थी, पान किया था।
उ.-आई छाक अबार भई है, नैंसुक घैया पिएउ सबेरे-४६३।
क्रि. स.
[हिं. पीना]

पिक
कोयल।
संज्ञा
[सं.]

पिकानंद
वसंत ऋतु।
संज्ञा
[सं.]

पिकी
कोयल।
संज्ञा
[सं.]

पिघलना
घन पदार्थ का गर्मी से द्रवित होना।
क्रि. स.
[सं. प्र + गलन]

पिघलना
दया उपजना।
क्रि. स.
[सं. प्र + गलन]

पिघलाना
घन पदार्थ को गर्मी से द्रवित करना।
क्रि. स.
[हिं. पिघलना]

पिघलाना
दया उपजना।
क्रि. स.
[हिं. पिघलना]

पिचक
पिचकारी।
संज्ञा
[हिं. पिचकारी]

पिचकना
फूली-उभरी चीज का दबना।
क्रि. स.
[सं. पिच्च]

पिचकाना
फूली-उभरी चीज को दबवाना।
क्रि. स.
[हिं. पिचकना]

पिचकारी, पिचकी
होली जैसे अवसरों पर पानी य रंग चलाने का यंत्र।
उ.-रबावा साखि जवाए कुमकुमा छिरकत भरि केसरि पिचकारी-२३९१।
संज्ञा
[हिं. पिचकना]

पिचकारी, पिचकी
पिचकारी छूटना (निकलना)- तरल पदार्थ का वेग से निकलना। पिचकारी छोड़ना- तरल पदार्थ को वेग से निकालना।
मु.

पिछड़ना
पीछे रह जाना, साथ या बराबर न रह पाना।
क्रि. अ.
[हिं. पिछाड़ी + ना]

पिछताना
पश्चाताप करना।
क्रि. अ.
[हिं. पछताना]

पिछताने
पश्चाताप करने (से)।
मंद हीन अति भयो नंद अति होत कहा पिछताने छिन छिन -२६७०।
क्रि. अ.
[हिं. पछताना]

पिछलगा, पिछलगू, पिछलग्गू
जो सदा साथ लगा रहे।
वि.
[हिं. पीछे + लगना]

पिछलगा, पिछलगू, पिछलग्गू
जो स्वतंत्र विचार न रखता हो।
वि.
[हिं. पीछे + लगना]

पिछलगा, पिछलगू, पिछलग्गू
आश्रित।
वि.
[हिं. पीछे + लगना]

पिछलगा, पिछलगू, पिछलग्गू
शिष्य।
वि.
[हिं. पीछे + लगना]

पिछलगा, पिछलगू, पिछलग्गू
सेवक।
वि.
[हिं. पीछे + लगना]

पिछलना
पीछे हटना या मुड़ना।
क्रि. स.
[हिं. पीछा]

पिछला
पीछे की ओर का।
वि.
[हिं. पीछा]

पिछला
बाद वाला, बाद का।
वि.
[हिं. पीछा]

पिछला
अंत की ओर का।
वि.
[हिं. पीछा]

पिछला
बीता हुआ, पुराना।
वि.
[हिं. पीछा]

पिछला
भूतकालीन।
वि.
[हिं. पीछा]

पिछवाड़ा, पिछवारा
पीछे की ओर का स्थान।
संज्ञा
[हिं. पीछा + वाड़ा [प्रत्य.]

पिछवार
पीछे की ओर, मकान आदि के पीछे की दिशा में।
उ.- देखि फिरे हरि ग्वाल दुवारैं। तब इक बुद्धि रची अपनैं मन, गए नाँघि पिछवारैं-१०-२७७।
संज्ञा
[हिं. पिछवाड़ा]

पिछाड़ी
पिछला भाग।
संज्ञा
[हिं. पीछा]

पिछाड़ी
पिछले पैर।
संज्ञा
[हिं. पीछा]

पिछान
जान-पहचान।
संज्ञा
[हिं. पहचान]

पिछानना
पहचान करना।
क्रि. स.
[हिं. पहचानना]

पिछानि
पहचान। लै पिछानि- पहचान ले, जाँच ले, चीन्ह ले।
उ.- जसुमति धौं देखि आनि आगैं ह्वै लै पिछानि, बहियाँ गहि ल्याई, कुँवर और कौ कि तेरौ-१०-२७६।
संज्ञा
[हिं. पहचान, पहचानना]

पिछोरि, पिछोरी
बच्चों की चादर।
उ.- मनमथ कोटि-कोटि गाहि वारौं ओढ़े पीत पिछोरी-८८३।
संज्ञा
[हिं. पिछौरा]

पिछोर्यो
फटक कर साफ की।
क्रि. स.
[हिं. पछोड़ना]

पिछोर्यो
फटकि पछोर्यो- फटक छानकर खो दी। उ.- नाच कछयौ अब घूँघट छोरयौ, लोक-लाज सब फटकि पछोरयौ-१२०१।
मु.

पिटना
बजना।
क्रि. अ.
[हिं. पीटना]

पिट पिट
पिट' 'पिट' शब्द।
संज्ञा
[अनु.]

पिटरिया, पिटरी
छोटा पिटारा, झाँपी।
उ.- परतिय-रति अभिलाष निसादिन, मन पटरी लै भरतौ-१-२०३।
संज्ञा
[हिं. पिटारा]

पिटवाना
मार खिलवाना।
क्रि. स.
[हिं. पिटना]

पिटवाना
बजवाना।
क्रि. स.
[हिं. पिटना]

पिटवाना
पीटने या बजवाने का काम कराना।
क्रि. स.
[हिं. पिटना]

पिटाई
पीटने का काम, भाव या वेतन।
संज्ञा
[हिं. पिटना]

पिटाई
मार, चोट।
संज्ञा
[हिं. पिटना]

पिटारा
बेंत आदि का झाबा।
संज्ञा
[सं. पिटक]

पिटारी
छोटा पिटारा।
संज्ञा
[हिं. पिटारा]

पिछौंड़
जिसका मुँह पीछे हो।
वि.
[हिं. पीछे]

पिछौंड़ा, पिछौता
पीछे की ओर।
क्रि. वि.
[हिं. पीछे]

पिछौहै
पीछे की ओर से।
क्रि. वि.
[हिं. पीछा]

पिछौरा
पुरूषों की चादर या दुपट्टा।
संज्ञा
[सं. पक्षपट, प्रा. पच्छवड़, हिं. पछेवड़ा]

पिछौरी
स्त्रियों के ओढ़ने की चादर, ओढ़नी।
संज्ञा
[हिं. पुं. पिछौरा]

पिछौरी
बच्चों के ओढ़ने की छोटी चादर या छोटा दुपटटा।
उ.- कटि-तट पीत पिछौरी बाँधे, काकपच्छ धरे सीस-९-२०।
संज्ञा
[हिं. पुं. पिछौरा]

पिटंत
पीटने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. पीटना + अंत]

पिटक
पिटास।
संज्ञा
[सं.]

पिटक
ग्रंथ का भाग।
संज्ञा
[सं.]

पिटना
मार खाना।
क्रि. अ.
[हिं. पीटना]

पिटारे
पिटारे में।
उ.- भवन भुजंग पिटारे पाल्यौ ज्यों जननी जिय तात-३१७१।
संज्ञा
[हिं. पिटारा]

पिट्टस
छाती पीट कर रोना।
संज्ञा
[हिं. पिटना]

पिट्टस
पिट्टस पड़ना (मचना)- छाती पीट कर रोना।
मु.

पिट्ठी
पिसी हुई भीगी दाल।
संज्ञा
[हिं. पीठी]

पिट्ठू
पीछे लगा रहने वाला।
संज्ञा
[हिं. पठ्ठा]

पिट्ठू
हिमायती।
संज्ञा
[हिं. पठ्ठा]

पिठौरी
पीठी की बनी हुई खाने की चीज, जैसे बरी, मुँगौरी।
उ.- पापर बरी मिथौरि फुलौरी। कूर बरी काचरी पिठैरी-३९६।
संज्ञा
[हिं. पिट्ठी + औरी (प्रत्य.)]

पितंबर
पीताम्बर।
उ.- कटि पितंबर बेष नटवर, नूतत फन प्रति डोल-५६३।
संज्ञा
[सं. पीतांबर]

पितज्वर
पित्त बिगड़ने से होनेवाला ज्वर।
उ.- सूर सो औषध हमहिं बतावत ज्यों पितज्वर पर गुर सी-३१९८।
संज्ञा
[हिं. पित्त + ज्वर]

पितर
पितृ, पुरखे, मृत पूर्व पुरुष।
उ.- तिहिं घर देव पितर काहे कौं जा घर कान्हर आयौ-१०-३४६।
संज्ञा
[सं. पितृ]

निरुत्सुक
जो उत्सुक न हो।
वि.
[सं.]

निरुद्ध
रुका या बँधा हुआ।
वि.
[सं.]

निरुद्ध
योग की पाँच मनोवृत्तियों क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध-में एक जिसमें चित्त अपनी प्रकृति में ही स्थिर हो जाता है।
संज्ञा
[सं.]

निरुद्देश्य
उद्देश्यहीन।
वि.
[सं.]

निरुद्देश्य
बिना किसी उद्देश्य के।
क्रि. वि.

निरुद्यम
जिसके पास काम न हो।
वि.
[सं.]

निरुद्यमी
जो काम न करता हो।
वि.
[हिं. निरुद्यम]

निरुद्योग
जिसके पास उद्योग न हो।
वि.
[सं.]

निरुद्योगी
जो उद्योग न करे।
वि.
[हिं. निरुद्योग]

निरुपम
अनुपम, बेजोड़।
वि.
[सं.]

पिता
बाप, जनक।
संज्ञा
[सं. पितृ]

पितामह
दादा, बाबा।
संज्ञा
[सं.]

पितामह
भीष्म।
संज्ञा
[सं.]

पितु
पिता, जनक।
संज्ञा
[सं. पिता]

पितृ
पिता।
संज्ञा
[सं.]

पितृ
मृतक पिता, दादा आदि।
संज्ञा
[सं.]

पितृऋण
तीन ऋणों में एक मुक्ति, जो पुत्र उत्पन्न करने पर ही होती है।
संज्ञा
[सं.]

पितृकर्म
श्राद्ध, तर्पण आदि कर्म।
संज्ञा
[सं.]

पितृकुल
पिता के वंश के लोग।
संज्ञा
[सं.]

पितृतिथि
अमावस्या।
संज्ञा
[सं.]

पितृत्व
पिता होनेका भाव।
संज्ञा
[सं.]

पितृदाय
पिता से प्राप्त धन-धाम।
संज्ञा
[सं.]

पितृपक्ष
कुआर का कृष्णपक्ष।
संज्ञा
[सं.]

पितृ लोक
चंद्रमा के ऊपर का एक लोक जहाँ पितरगण रहते हैं।
संज्ञा
[सं.]

पितृव्य
पिता के भ्राता, चाचा।
संज्ञा
[सं.]

पित्त
शरीर के भीतर यकृत में बननेवाला एक तरल पदार्थ।
संज्ञा
[सं.]

पित्ता
पित्ताशय।
संज्ञा
[सं. पित्त]

पित्ता
पित्ता उबलना (खौलना)- बहुत क्रोध आना। पित्ता (पानी) मारना- बहुत परिश्रम करना। पित्ता मरना- गुस्सा न रहना। पित्ता मारना- (१) बिना ऊबे कठिन काम करना। (२) क्रोध दबाना। पित्तामार (पित्तोमारी का) काम- अरुचिकर और कठिन काम।
मु.

पित्ता
साहस, हिम्मत्त, हौसला।
संज्ञा
[सं. पित्त]

पित्ताशय
पित्त की थैली।
संज्ञा
[सं.]

पित्र्य
जिसका श्राद्ध हो सके।
वि.
[सं.]

पिधान
गिलाफ, आवरण।
संज्ञा
[सं.]

पिधान
ढकना।
संज्ञा
[सं.]

पिधान
तलवार की म्यान।
संज्ञा
[सं.]

पिधान
किवाड़।
संज्ञा
[सं.]

पिधानक
म्यान, कोष।
संज्ञा
[सं.]

पिनकना
नशे में ऊँघना।
क्रि. अ.
[हिं. पीनक]

पिनाक
शिवजी का धनुष जिसे श्रीरामचन्द्र जी ने तोड़ा था।
संज्ञा
[सं.]

पिनाक
कोई धनुष।
संज्ञा
[सं.]

पिनाक
पिनाक होना- काम का बहुत कठिन होना।
मु.

पिनाकी
शिव, महादेव।
संज्ञा
[सं. पिनाकिन्]

पिन्नी
एक तरहे की मिठाई।
संज्ञा
[देश.]

पिपासा
प्यास।
संज्ञा
[सं.]

पिपासा
लोभ।
संज्ञा
[सं.]

पिपासित
प्यासा, तृषित।
वि.
[सं.]

पिपासु
प्यासा।
वि.
[सं.]

पिपासु
लालची।
वि.
[सं.]

पिपीलक
चींटा।
संज्ञा
[सं.]

पिपीलिका
चींटी।
संज्ञा
[सं.]

पिय
पति, स्वामी।
संज्ञा
[सं. प्रिय]

पिय
पपीहे का 'पिउ' शब्द।
उ.- सावन मास पपीहा बोलत पिय पिय करि जो पुकारै-२८१०।
संज्ञा
[सं. प्रिय]

पियतौ
पीता, पान करता।
उ.- काहे कौं जसोदा मैया, त्रात्यौ तैं बारौ कन्हेया, मोहन हमारौ भैया केतो दधि पियतौ-३७३।
क्रि. स.
[हिं. पीना]

पियर
पीला।
वि.
[हिं. पीला]

पियरई
पीलापन।
संज्ञा
[हिं. पीला]

पियरवा
प्रिय, पति।
संज्ञा
[हिं. प्यारा]

पियरवा
प्रिय, प्यारा।
वि.

पियरवा
जो पीला हो।
वि.
[हिं. पोला]

पियराई
पीला।
संज्ञा
[हिं. पियर]

पियराना
पीला पड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. पियर + आना]

पियरी
पीली।
उ.- पियरी पिछौरी झीनी-१०-१५१।
वि.
[हिं. पियर]

पियरी
पीली रँगी धोती।
संज्ञा

पियरी
पीलापन।
संज्ञा

पियरी
पीले रंग की गाय।
उ.- पियरी, मौरी, गोरी, गैनी, खेरी, कजरी, जेती-४४५।
संज्ञा

पियरो, पियरौ
पीला, पीले रंग का।
उ.- सेत, हरौ, रातौ अरु पियरौ रंग लेत है धोई-१-६३।
वि.
[हिं. पीला]

पियल्ला
दूधपीता बच्चा।
संज्ञा
[हिं. पीना]

पिया
प्रिय, प्रियतम।
संज्ञा
[सं. प्रिय]

पियाई
पिलाया।
क्रि. स.
[हिं. पियाना, पिलाना]

दिन्ह्यौ पियाई
पिला दिया, पान करा दिया।
उ.- असुर-दिसि चितै, मुसुक्याइ मोहे सकल, सुरनि कौं अमृत दीन्ह्यौ पियाई-८-८।
प्र.

पियादा
जो पैदल चलता हो।
उ.- गरुड़ छाँड़ि प्रभु पायँ पियादे गज-कारन पग धारे-१-२५।
वि.
[फा. प्यादा

पियादा
जो नंगे पैर हो।
वि.
[फा. प्यादा

पियारो, पियायौ
पिलाया, पान कराया।
उ.- नृपति-कुँवर कौं जहर पियायौ-६-५।
क्रि. स.
[हिं. पिलाना]

पियारौ
प्रिय, प्रीतिपात्र, प्रेमपात्र।
उ.- (क) बिदुर हमारौ प्रान-पियारौ, तू बिषया अधिकारी-१-२४४। (ख) असुर होइ, भावै सुर होइ। जो हरि भजै पियारौ सोइ-७-२।
वि.
[हिं. प्यारा]

पियावत
पान कराता है।
उ.- आपुन पियत पियावत दुहि दुहि इन धेनुन के क्षीर-२६८६।
क्रि. स.
[हिं. पिलाना]

पियावति
पिलाती है, पान कराती है।
उ.- अचरा तर लै ढाँकि, सूर प्रभु कौं दूध पियावति -१०-११०।
क्रि. स.
[हिं. पिलाना]

पियावै
पिलावै, पीने को प्रेरित करे।
उ.- अति सुकुमार डोलत रस-भीनौ, सो रस जाहि पियावै (हो)-२-१०।
क्रि. स.
[हिं. पिलाना]

पियास
तृष्प्पा, प्यास।
संज्ञा
[हिं. प्यास]

पियासा, पियासौ
जिसे प्यास लगी हो, तृषित, पिपासा युक्त।
उ.- परम गंग कौं छाँड़ि पियासौ दुरमति कूप खनावै-१-१६८।
वि.
[हिं. प्यासा]

पियूख, पियूष
पीयूष।
संज्ञा
[सं. पियूष]

पियैए
पिलाइए, पान कराइए।
उ.- सूरदास प्रभु तृषां बढ़ी अति दरसन सुधा पियैए-३२००।
क्रि. स.
[हिं. पिलाना]

पियौ
पी लिया, पान किया।
उ.- मृतक भए सब सखा जिवाए, बिष-जल जलइ पियौ-१-३८।
क्रि. स.
[हिं. पीना]

पियादे
बिना जूता पहने, नंगे पैर।
उ.- (क) गरुड़ छाँड़ि प्रभु पाय पियादे गज-कारन पग धारे-१-२५। (ख) वह घर-द्वार छाँड़ि कै सुन्दरि चली पियादे पाउँ-९-४४।
वि.
[फा. प्यादा

पियाना
पान कराना।
क्रि. स.
[हिं. पिलाना]

पियार
चुंबन।
संज्ञा
[हिं. प्यार]

पियार
प्रेम।
संज्ञा
[हिं. प्यार]

पियार
प्रिय, प्यारा।
वि.

पियारा
प्रिय प्यारा।
वि.
[हिं. प्यारा]

पियारी
प्रिय, रुचिकर।
उ.- लुचुई, लपसी, सद्य जलेबी, सोइ जेवहु जो लमै पियारी-१०-२२७।
वि.
[हिं. प्यारा]

पियारी
प्यारी सगनेवाली।
वि.
[हिं. प्यारा]

पियारी
प्रिय, प्रेयसी।
संज्ञा

पियारे
प्रिय, प्यारा, प्रेमपात्र।
उ.- बंदौं चरन-सरोज तिहारे। सुंदर-स्याम कमल-दल लोचन, ललित त्रिभंगी प्रान पियारे-१-९४।
वि.
[हिं. प्यारा]

पिरानो, पिरानौ
दुखने लगे।
उ.- मारत मारत सात के दोऊ हाथ पिराने- पृ ४६५।
क्रि. अ.
[हिं. पिराना]

पिरायौ
दुख दिया, दर्द करदिया।
उ.- तुमहीं मिलि रसबाद बढ़ायौ। उरहन दै दै मूँड़ पिरायौ-३९१।
क्रि. अ.
[हिं. पिराना]

पिरारा
एक साग।
संज्ञा
[हिं. पिंडारा]

पिरीतम
पति, प्रियतम।
संज्ञा
[सं.प्रियतम]

पिरीता, पिरीते
प्रिय, प्यारा।
वि.
[सं. प्रिय]

पिरीती
प्रेम, प्रीति।
संज्ञा
[सं. प्रिति]

पिरोइ
गूँथकर, पिरोकर, पोहकर।
उ.- नील पाट पिरोइ मनिगन फनिग धाखे जाँइ-१०-१७०।
क्रि. स.
[हिं. पिरोना]

पिरोजन
करछेदन।
संज्ञा
[हिं. पिरोना]

पिरोजा
हरापन लिए हुए एक नीला पत्थर।
उ.- रेसम बनाइ नव रतन पालनौ, लटकन बहुत पिरोजा-लाल-१०-८४।
संज्ञा
[फ़ा. फीरोजा

पिरोना, पिरोहना
गूँथना, पोहना।
क्रि. स.
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोंअ + ना, हिं. पिरोना]

पिरथी
पृथ्वी।
संज्ञा
[सं. पृथ्वी]

पिराइँ
दुखाते हैं।
उ.- सिगरे ग्वाल धिरावत मेसौं, मेरे पाइ पिराइँ-५१०।
क्रि. स.
[हिं. पिराना]

पिराइ
पीड़ित होती हे, दुखती है।
उ.- धरयौ गिरिवर, दोहनी कर धरत बाहँ पिराइ-४९८।
क्रि. अ.
[हिं. पिराना]

पिराई
पीलापन।
संज्ञा
[हिं. पियराई]

पिराक
एक पकवान, गोझा, गोझिया।
उ.- रचि पिराक लाड़ू दधि आनौं-१०-२११।
संज्ञा
[सं. पिष्टक, प्रा. पिट्टक, पिड़क]

पिराति
दुखती हे, पीड़ित होती हैं।
उ.- अधिक पिराति सिराति न कबहूँ अनेक जतन करि हारी-३०३९।
क्रि. अ.
[हिं. पिराना]

पिराना
दुखना, दर्द करना।
क्रि. अ.
[सं. पीडन]

पिराना
(दूसरे का) दुख-दर्द समझना।
क्रि. अ.
[सं. पीडन]

पिरानी
दुखीं, दर्द करने लगीं।
उ.- स्याम कह्यौ नहि भुजा पिरानी ग्वालनी कियौ सहैया-१०७१।
क्रि. अ.
[हिं. पिराना]

पिराने
दुखने लगे, दर्द करने लगे।
उ.- धरनी धरत बनै नाहीं पग अतिहिं पिराने- पृ ३५३ (८९)।
क्रि. अ.
[हिं. पिराना]

निरुपयोगी
जो उपयोग में न आ सके।
वि.
[सं.]

निरुपाधि
बाधारहित।
वि.
[सं.]

निरुपाधि
मायारहित।
वि.
[सं.]

निरुपाधि
ब्रह्म, ईश्वर।
संज्ञा

निरुपाय
जिसका कोई उपाय न हो।
वि.
[सं.]

निरुपाय
जो उपाय कर ही न सके।
वि.
[सं.]

निरुवरना
बाधा दूर होना।
क्रि. अ.
[सं. निवारण]

निरुवार
छुड़ाना या मुक्त करना।
संज्ञा
[सं. निवारण]

निरुवार
बचाव, छुटकारा।
संज्ञा
[सं. निवारण]

निरुवार
बाधा या झंझट दूर करना।
संज्ञा
[सं. निवारण]

पिरोना, पिरोहना
सूत-आदि छेद के आर पार निकालना।
क्रि. स.
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोंअ + ना, हिं. पिरोना]

पिरोयो
गूँथा, पोहा, पिरो लिया।
उ.- सूरदास कंचन अरुँ काँचहि, एकहिं धगा पिरोयौ-१-४३।
क्रि. स.
[हिं. पिरोना]

पिलकना
गिराना, ढकेलना।
क्रि. स.
[सं. पिल]

पिलना
झुक या धँस पड़ना।
क्रि. स.
[सं. पिल]

पिलना
एक बारगी जुट जाना।
क्रि. स.
[सं. पिल]

पिलना
तेल निकालने के लिए पेरा जाना।
क्रि. स.
[सं. पिल]

पिलपिला
बहुत मुलायम या नरम।
वि.
[अनु]

पिलपिलाना
बहुत मुलायम या नरम हो जाना।
क्रि. स.
[हिं. पिलपिला]

पिलाना
पान कराना।
क्रि. स.
[हिं. पीना]

पिलाना
पीने को देना।
क्रि. स.
[हिं. पीना]

पिलाना
भीतर भरना या ढालना।
क्रि. स.
[हिं. पीना]

पिल्ला
कुत्ते का बच्चा।
संज्ञा
[देश.]

पिव
प्रियतम, पति।
संज्ञा
[सं. प्रिय]

पिवन
पीने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. पीना]

पिवन
पिलाने की क्रिया या भाव।
उ.- देवकि उर-अवतार लेन कहयौ, दूध पिवन तुम माँगि लियौ-१०-८५।
संज्ञा
[हिं. पीना]

पिवाना
पान कराना।
क्रि. अ.
[हिं. पिलाना]

पिवायो, पिवायौ
पान कराया।
क्रि. अ.
[हिं. पिलाना]

पिवावन
पिलाने के लिए।
उ.- बकी पिवावन इनहीं आई-२३६५।
संज्ञा
[हिं. पिलाना]

पिशाच
एक हीन देवयोनि।
संज्ञा
[सं.]

पिशाचिनी, पिशाची
पिशाच स्त्री।
संज्ञा
[सं. पिशाच]

पिशाचिनी, पिशाची
निर्दयी स्त्री।
संज्ञा
[सं. पिशाच]

पिशुन, पिसुन
चुगलखोर, दुष्ट, दुर्जन।
उ.- सूरदास प्रभु बेगि मिलह अब पिशुन करत अब हाँसी-३४८६।
संज्ञा
[सं. पिशुन]

पिशुन, पिसुन
निंदक।
संज्ञा
[सं. पिशुन]

पिशुन, पिसुन
नारद।
संज्ञा
[सं. पिशुन]

पिशुन, पिसुन
कौआ।
संज्ञा
[सं. पिशुन]

पिशुना, पिसुना
चुगलखोरी।
संज्ञा
[सं. पिशुना]

पिष्ट
पिसा या चूर्ण किया हुआ।
वि.
[सं.]

पिष्टपेषण
पिसे हुए को फिर पीसना।
संज्ञा
[सं.]

पिष्टपेषण
कही बात को फिर कहना या लिखना।
संज्ञा
[सं.]

पिसना
बहुत महीन चूर्ण होना।
क्रि. अ.
[हिं. पीसना]

पिसना
दब या कुचल जाना।
क्रि. अ.
[हिं. पीसना]

पिसना
घोर कष्ट या दुख उठाना।
क्रि. अ.
[हिं. पीसना]

पिसना
थकावट से चूर हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. पीसना]

पिसवाना
पीसने का काम कराना।
क्रि. स.
[हिं. पीसना]

पिसाई
पीसने की क्रिया, भाव, धंधा या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. पीसना]

पिसाई
कड़ी मेहनत।
संज्ञा
[हिं. पीसना]

पिसाच
एक हीन देवयोनि, भूत।
संज्ञा
[सं. पिशाच]

पिसाच
वह व्यक्ति जो क्रूर और नीच प्रकृति का हो।
उ.- दुष्ट सभा पिसाच दुरजोधन, चाहत नगन करी-१-२५४।
संज्ञा
[सं. पिशाच]

पिसाचिनी, पिसाची
पिशाच की स्त्री।
संज्ञा
[सं. पिशाच]

पिसाचिनी, पिसाची
क्रूर प्रकृति की दुष्टा स्त्री।
संज्ञा
[सं. पिशाच]

पींजना
धुनना, रूई धुनना।
क्रि. स.
[सं. पिंजन]

पींजर
ठठरी, कंकाल।
संज्ञा
[सं. पंजर]

पींजर, पींजरा
लोहे या बाँस की तिलियों का झाबा जिसमें पक्षी पाले जाते हैं।
उ.- मन सुवा तन पींजरा, तिहिं माँहिं राखै चेत-१-३११।
संज्ञा
[हिं. पिंजड़ा]

पींड
शरीर, देह।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पींड
वृक्ष का तना, पेड़ी।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पींड
गोला, पिंडी।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पींड
सिर या बालों का एक आभूषण।
उ.- (क) शिखा की भाँति सिर पींड डोलत सुभग, चाप ते अधिक नव माल सोभा। (ख) पींड श्रीखंड सिर भेष नटवर कसे अंग इक छटा मैं ही भुलाई।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पींड
पिंड खजूर नामक फल।
उ.- पींड बदाम लेत बनवारी।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पी
पीकर, पान किया।
उ- मनौ कमल कौ पी पराग, अलि-सावक सोइ न जाग्यौ री-१०-१३९।
क्रि. स.
[हिं. पीना]

पी
प्रियतम, पति।
उ.- सूरदास ए जाइ लुभाने मृदु मुसकनि हरि पी की- पृ. ३३२ (९)
संज्ञा
[सं. प्रिय]

पिसान
आटा।
संज्ञा
[हिं. पिसा + अन्न]

पिसुन
चुगलखोर।
संज्ञा
[सं. पिशुन]

पिसुनता, पिसनाई
चुगलखोरी।
संज्ञा
[सं. पिशुन]

पिसौनी
पीसने का काम या धंधा।
संज्ञा
[हिं. पीसना]

पिसौनी
कठिन परिश्रम।
संज्ञा
[हिं. पीसना]

पिस्ता
एक छोटा फल जिसकी गिनती अच्छे मेवों में है।
उ.- पिस्ता दाख बदाम छुहारा खुरमा खाझा गूँझा मठरी-८१०।
संज्ञा
[फ़ा. पिस्तः]

पिहकना
पक्षियों का कलरव करना।
क्रि. अ.
[अनु.]

पिहान
ढाँकने की वस्तु।
संज्ञा
[सं. पिधान]

पिहित
छिपा हुआ।
वि.
[सं.]

पिहित
एक अर्थालंकार।
संज्ञा

पी
पपीहे की बोली।
संज्ञा
[अनु.]

पीक
चबाये हुए पान के बीड़े का रस।
उ.- कबहुँक बेठि अंस भुज धरिकै, पीक कपोलनि पागे-६८६।
संज्ञा
[सं. पिच्च]

पीकना
पपीहे या कोयल का मधुर कंठ से बोलना, पिहिकना।
क्रि. अ.
[अनु. पी + करना]

पीका
कोंपल, नया पत्ता।
संज्ञा
[देश.]

पीका
पीका फुटना- कोंपल निकलना, पनपना।
मु.

पीछा
किसी व्यक्ति या वस्तु का पिछला या पीठ की ओर का भाग।
संज्ञा
[सं. पश्चात्, प्रा. पच्छा]

पीछा
पीछा दिखाना- (१) हारकर या डर कर भागना। (२) भरोसा देकर फिर हट जाना।
मु.

पीछा
बाद का समय।
संज्ञा
[सं. पश्चात्, प्रा. पच्छा]

पीछा
पीछ चलने का भाव।
संज्ञा
[सं. पश्चात्, प्रा. पच्छा]

पीछा
पीछा करना- (१) चुपचाप पीछे पीछे जाना। (२) तंग करना। पीछा छुड़ाना- तंग करनेवाले व्यक्ति, वस्तु या कार्य से बचना। पीछा छुटना- अप्रिय व्यक्ति, वस्तु या कार्य से छुटकारा मिलना। पीछा छोड़ना- (१) सहारा छोड़ना। (२) तंग करना बंद करना। पीछा पकड़ना- सहारा या आश्रय बनाना।
मु.

पीछू, पीछे
पीठ को तरफ।
अव्य.
[हिं. पीछा]

पीछू, पीछे
पीछे चलना- अनुकरण या नकल करना। पीछे छूटना- चुपचाप किसी के साथ लगाया जाना। (धन आदि) पीछे डालना- भविष्य के लिए धन संचय करना। (काम के) पीछे पड़ना- काम कर डालने को जुटना। (व्यक्ति के पीछे पड़ना)- (१) बार-बार घेर का तंग करना। (२) हानि पहुँचाने की अवसर ताकना। (वस्तु के) पीछे पीछे पड़ना- (१) हर समय उसी की प्राप्ति की चिंता में लगे रहना। पीछे लगना- (१) साथ साथ घूमना। (२) रोगादि का घेर लेना। पीछे लगाना - (१) आश्रय या आसरा देना। (२) अप्रिय वस्तु से सम्बन्ध कर लेना।
मु.

पीछू, पीछे
पीठ की ओर की दिशा में कुछ दूर पर। पीछे छूटना (पड़ना, होना) - गुण, योग्यता आदि में कम हो जाना, पिछड़ जाना। (किसी को) पीछे छोड़ना - किसी से गुण, योग्यता आदि में बढ़ जाना।
अव्य.
[हिं. पीछा]

पीछू, पीछे
पश्चात्, उपरांत।
अव्य.
[हिं. पीछा]

पीछू, पीछे
अंत में।
अव्य.
[हिं. पीछा]

पीछू, पीछे
अनुपस्थिति में।
अव्य.
[हिं. पीछा]

पीछू, पीछे
मर जाने पर।
अव्य.
[हिं. पीछा]

पीछू, पीछे
वास्ते, लिए, कारण।
अव्य.
[हिं. पीछा]

पीछू, पीछे
बदौलत।
अव्य.
[हिं. पीछा]

पीछौ
किसी प्राणी के पीछे चलने का भाव।
संज्ञा
[हिं. पीछा]

पीछौ
पीछौ लियौ- कोई काम निकलने की आशा से हर समय साथ लगे रहना। उ.- प्रभु, मैं पीछौ लियौ तुम्हारौ। तुम तौ दीनदयाल कहावत, सकल प्रापदा टारौ-१-२१८।
मु.

पीजै
पीजिए, पान कीजिए।
उ.- लीला-गुन अमृत-रस स्रवननि पुट पीजै -१-७२।
क्रि. स.
[हिं. पीना]

पीटना
चोट मारना।
क्रि. स.
[सं. पीडन]

पीटना
चोट मारकर चौड़ा-चिपटा करना।
क्रि. स.
[सं. पीडन]

पीटना
प्रहार या आघात करना।
क्रि. स.
[सं. पीडन]

पीटना
किसी न किसी तरह समाप्त कर देना।
क्रि. स.
[सं. पीडन]

पीटना
किसी न किसी तरह प्राप्त कर लेना।
क्रि. स.
[सं. पीडन]

पीटना
मातम, मृत्यु-शोक।
संज्ञा

पीटना
मुसीबत।
संज्ञा

पीठ
आसन, चौकी, पीढ़ा।
संज्ञा
[सं.]

पीठ
मूर्ति का आधार।
संज्ञा
[सं.]

पीठ
किसी वस्तु आदि के होने-बसने का स्थान।
संज्ञा
[सं.]

पीठ
सिंहासन।
उ.- टहल करती महल महलनि, अब संग बैठी पीठ -२६८०।
संज्ञा
[सं.]

पीठ
वेदी।
संज्ञा
[सं.]

पीठ
वह पवित्र स्थान जहाँ शिव-पत्नी सती का कोई गिरा अंग अथवा आभूषण विष्णु के चक्र से कटकर था।
संज्ञा
[सं.]

पीठ
प्रदेश, प्रांत।
संज्ञा
[सं.]

पीठ
पेट के दूसरी ओर का भाग।
संज्ञा
[सं. पृष्ठ]

पीठ
पीठ का- सहोदर के जन्म के बाद का। पीठ का कच्चा (घोड़ा)- अच्छी चाल न चल सकनेवाला। पीठ का सच्चा (घोड़ा)- बढ़िया चाल वाला। पीठ की- सहोदरा के जन्म के बाद की। पीठ चारपाई से लग जाना- बीमारी में बहुत दुबला हो जाना। पीठ खाली होना- की सहायक न होना। पीठ ठोंकना- (१) शाबाशी देना। (२) उत्साहित करना। पीठ तोड़ना- (१) मारना-पीटना। (२) हताश करना। पीठ दिखाना- लड़ाई से डरकर या हारकर भागना। पीठ दिखाकर जाना- स्नेह या ममता तोड़ना। देति न पीठ- सामने ही डटी रहती है। उ.- तदपि निदरि पट जात पलक छिदि जूझत देति पीठ - पृ. ३३४। पीठ देना- (१) विदा होना (२) विमुख होना। (३) भाग जाना। (४) साथ न देना (५) लेटकर आराम करना। (किसी की ओर) पीठ देना- (१) मुँह फेर लेना। (२) उपेक्षा दिखाना। पीठ पर- जन्म के अनंतर। पीठ पर का- सहोदरा या सहोदर के बाद जन्मा पुत्र। पीठ पर की- सहोदर या सहोदरा के बाद जन्मी पुत्री। पीठ पर हाथ फेरना- (१) शाबाशी देना। (२) उत्साह बढ़ाना। पीठ पर होना- (१) सहायक होना। (२) जन्म ग्रहण करना। पीठ पीछे- अनुपस्थिति में। पीठ फेरना- (१) बिदा होना। (२) भाग जाना। (३) मुँह फेर लेना। (४) उपेक्षा दिखाना।
मु.

पीठमर्द
नायक के चार सखाओं में एक जो नायिका के मान-मोचन में समर्थ हो।
संज्ञा
[सं.]

पीठमर्द
मानमोचन में समर्थ नायक।
संज्ञा
[सं.]

निरूढ़ा
अविवाहिता, कुँआरी।
वि.
[सं.]

निरूढ़ि
ख्याति, प्रसिद्ध, कीर्ति।
संज्ञा
[सं.]

निरूप
रूप।
उ.- मोहन माँग्यो अपनो रूप। यहि ब्रज बसत अँचै तुम बैठी ता बिन उहाँ निरूप-३१८२।
वि.
[हिं. नि + रुप]

निरूप
कुरूप।
वि.
[हिं. नि + रुप]

निरूप
वायु।
संज्ञा
[सं.]

निरूप
आकाश।
संज्ञा
[सं.]

निरूपक
विषय की विवेचना करनेवाला।
वि.
[सं.]

निरूपण
आकाश।
संज्ञा
[सं.]

निरूपण
विवेचन।
संज्ञा
[सं.]

निरूपना
निश्चित करना।
क्रि. अ.
[सं. निरूपण]

पीठा
आसन, चौकी, पीढ़ा।
उ.- आवत पीठा बैठन दीन्हौ कुशल बूझि अति निकट बुलाई।
संज्ञा
[हिं. पीढ़ा]

पीठि
पेट के पीछे का भाग, पीठ।
संज्ञा
[हिं. पीठ]

पीठि
पीठि-ओढ़िए- पीठ किजिए या दिजिए, (स्थिति के अनुकूल) व्यवहार कीजिए। उ.- सूरदास के पिय प्यारी आपुहीं जाइ मनाय लीजै। जैसी बयारि बहै तेसी ओढ़िए जू पीठि -२०५। पीठि दई- भाग गया, पीठ दिखा दी। उ.- पाछैं भयौ न आगैं ह्वैहै, सब पतितनि सिरताज। नरकौ भज्यौ नाम सुनि मेरौ, पीठि दई जमराज -१-९९। पीठि दिखाऊँ- (१) पीठ फेरूँ, रण से हार कर या डरकर विमुख हो जाऊँ। (२) मुँह मोड़ूँ, विरत होऊँ। उ.- सूरदास रनभूमि बिजय बिनु, जियत न पीठि दिखाऊँ -१-२७०। पीठि दीजै- मुँह सामने न कीजिए, मुँह मोड़ लीजिए, सामने तक न देखिए। उ.- राखहु बैर हिए गहि मोसौं बैरिहिं पीठि न दीजै -२२७५। पीठि दीन्ही- (१) मुँह मोड़ लिया, विमुख हो गये। उ.- सीतल भई चक्र की ज्वाला, हरि हँसि दीन्ही पीटि -१-२७४।(२) विरत हो बैठे, त्याग दिया। उ.- जे तप-ब्रत किए तरनि-सुता-तट, पन गहि पीठि न दीन्हीं -६५६। पीठि दै - (१) सहारा या टिकासरा देकर। उ.- ऊखल ऊपर-आनि, पीठि दै, तापर सखा चढ़ायौ -१०-२९२। (२) मुँह मोड़ कर। उ.- (क) चली पीठि दै दृष्टि फिरावति, अंग-अंग-आनंद रली -७३९। (ख) काँपति रिसनि, पीठि दैं बैठी, मनि-माला तन हेरयो -२२७५।
मु.

पीड़
सिर या बालों का एक आभूषण।
उ.- कर धर कै धरमैर सखी री। कै सृक सीपज की बगपंगति, कै मयूर की पीड़ पखी री-१६२७।
संज्ञा
[सं. आपीड़]

पीड़
दुख-दर्द।
संज्ञा
[हिं. पीड़ा]

पीड़क
दुखदायी।
वि.
[सं.]

पीड़क
अत्याचारी।
वि.
[सं.]

पीड़न
दबाना।
संज्ञा
[सं.]

पीड़न
पेलना, पेरना।
संज्ञा
[सं.]

पीड़न
दुख देना।
संज्ञा
[सं.]

पीढ़ी
काल-विशेष का समाज।
संज्ञा
[सं. पीठिका]

पीढ़ी
छोटा पीढ़ा।
संज्ञा
[हिं. पीढ़ा]

पीत
पीला, पीत वर्ण का।
वि.
[सं.]

पीतता
पीलापन।
संज्ञा
[सं.]

पीतधातु
रामरज, गोपीचंदन।
उ.- पीतै पीत बसन भूषन सजि पीतधातु अँग लावै-२०३२।
संज्ञा
[सं. पीत + धातु]

पीतनि
पीता, पान करता।
उ.-निसि दिन निरखि जसोदा-नंदन अरु जमुनाजल पीतनि-४९०।
क्रि. स.
[हिं. पीना]

पीतपराग
कमल का केसर।
संज्ञा
[सं.]

पीतम
जो सबसे प्रिय हो।
वि.
[सं. प्रियतम]

पीतम
प्राणप्यारा पति।
संज्ञा

पीतमणि, पीतरत्न
पुखराज।
संज्ञा
[सं.]

पीड़न
अत्याचार करना।
संज्ञा
[सं.]

पीड़न
दबोचना।
संज्ञा
[सं.]

पीड़ा
व्यथा, वेदना।
संज्ञा
[सं.]

पीड़ा
रोग।
संज्ञा
[सं.]

पीड़ित
दुखी।
वि.
[सं.]

पीड़ित
रोगी।
वि.
[सं.]

पीढ़ा
पाटा, पीठ, पटरा।
उ.- प्रगट भई तहँ आइ पूतना, प्रेरित काल-अवधि नियराई। आवत पीढ़ा बैठन दीनौं, कुसल बूझि अति निकट बुलाई-१०-५०।
संज्ञा
[सं. पीठ अथवा पीठक]

पीढ़िनि
पीढ़ियाँ, पुश्तें।
उ.- हौं तौ पतित सात पीढ़िनि कौ, पतितै ह्वै निस्तरिहौं-१-१३४।
संज्ञा
[हिं. पीढ़ी]

पीढ़ी
कुल-परंपरा, पुश्त।
संज्ञा
[सं. पीठिका]

पीढ़ी
कुलके सभी प्राणी।
संज्ञा
[सं. पीठिका]

पीतर, पीतरि, पीतल
‘पीतल’ नामक धातु।
उ.- कोटि बार पीतरि ज्यौं डाहौ कोटि बार जो कहा कसै-२६७८।
संज्ञा
[सं. पित्तल, हिं. पीतल]

पीतवर्ण
पीला, पीले रंग का।
वि.
[सं.]

पीतांबर
पीला वस्त्र।
संज्ञा
[सं.]

पीतांबर
पुरूषों की रेशमी धोती।
संज्ञा
[सं.]

पीतांबर
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[सं.]

पीताम्बरधर
पीतांबर धारण करने वाले या पीतांबर प्रिय है जिनको वे श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[सं.]

पीताब्धि
समुद्र पीनेवाला, अगस्त्य।
संज्ञा
[सं.]

पीताभ
जिसमें पीली आभा हो।
वि.
[सं.]

पीतै
पीला ही।
उ.- पीतै पीत बसन भूषन सजि पीतधातु अँग लावै-२०३२।
वि. सवि.
[सं. पीत + ही]

पीन
स्थूल, मोटा।
वि.
[सं.]

पीना
मनोविकार का अनुभव ही न करना।
क्रि. स.
[सं. पान]

पीना
धूम्रपान करना।
क्रि. स.
[सं. पान]

पीना
सोख लेना।
क्रि. स.
[सं. पान]

पीपर, पीपरि, पीपल
एक प्रसिद्ध वृक्ष।
संज्ञा
[सं. पिप्पल]

पीपर, पीपरि, पीपल
एक लता जिसकी कलियाँ प्रसिद्ध औषधि हैं।
उ.- हींग, मिरच पीपरि अजवाइनि ये सब बनिज कहावै-११०८।
संज्ञा
[सं. पिप्पली]

पीब
मवाद।
संज्ञा
[सं. पूय]

पीबे
पीने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. पीना]

पीबे
खबे-पीबे को-खाने-पीने को।
उ.- बृद्ध बयस, पूरे पुन्यनि तैं, तैं बहुतैं निधि पाई। ताहू के खैबे-पीबे कौं, कहा करति चतुराई-१०-३२५।
यौ०

पीय, पीया
पति, प्रियतम।
उ.- ऐसे पापी पीय तोहिं पीर न पराई है-२८२७।
संज्ञा
[सं. प्रिय]

पीयर
पीत वर्ण का, पीला।
वि.
[हिं. पीला]

पीन
पुष्ट, परिवर्धित।
उ.- पीन उरोज मुख नैन चखावति इह बिष मोदक जा तन झारि-११६४।
वि.
[सं.]

पीन
भरा-पुरा, संपन्न।
वि.
[सं.]

पीनक
नशे में ऊँघना।
संज्ञा
[हिं. पिन ना]

पीनता
मोटाई, स्थूलता।
संज्ञा
[सं.]

पीनस
नाक का एक रोग।
संज्ञा
[सं.]

पीनस
पालकी।
संज्ञा
[फ़ा. फ़ीनस

पीना
पान करना, घूँटना।
क्रि. स.
[सं. पान]

पीना
(किसी बात या रहस्य को) दबा देना।
क्रि. स.
[सं. पान]

पीना
(गाली, अपमान आदि) सह जाना।
क्रि. स.
[सं. पान]

पीना
मनोभाव को दबा जाना।
क्रि. स.
[सं. पान]

पीयूख, पीयूष
अमृत।
संज्ञा
[सं.]

पीयूख, पीयूष
दूध।
संज्ञा
[सं.]

पीयौ
पान किया, पिया।
उ.- भोजन बीच नीर लै पीयौ-३९६।
क्रि. स.
[हिं. पीना]

पीर
पीड़ा, दुख, कष्ट।
उ.- (क) मेटी पीर परम पुरूषोत्तम, दुख मेटयौ दुहु-घाँ कौ-१-११३। (ख) काज सरे दुख कहा कहौ धौं, का बायस की पीर-३१००।
संज्ञा
[सं. पीड़ा]

पीर
दया, सहानुभूति।
संज्ञा
[सं. पीड़ा]

पीर
प्रसव-पीड़ा।
संज्ञा
[सं. पीड़ा]

पीर
बुजुर्ग।
वि.
[फा.]

पीर
महात्मा, सिद्ध।
वि.
[फा.]

पीर
धर्मगुरू।
संज्ञा

पीर
मुसलमानों के धर्म गुरू।
संज्ञा

पीर
सोमवार का दिन।
संज्ञा
[फ़ा. पीर]

पीरक
दुख दूर करनेवाले, दुख मिटानेवाले, दुखी के प्रति सहानुभूति रखनेवाले।
उ.- राजरवनि गाईं व्याकुल ह्वै, दै दै तिनकौ धीरक। मागध हति राजा सब छोरे, ऐसे प्रभु पर-पीरक -१-११२।
वि.
[सं. पीड़ा, हिं. पीर + क (प्रत्य.)]

पीरा
पीले रंग का।
वि.
[हिं. पीला]

पीरी
बुढ़ापा।
संज्ञा
[फ़ा.]

पीरी
चालाकी, धूर्तता।
संज्ञा
[फ़ा.]

पीरी
ठेका, हुकूमत।
संज्ञा
[फ़ा.]

पीरी
चमत्कार।
संज्ञा
[फ़ा.]

पीरी
पीले रंग की।
उ.- ओढ़ी पीरी पामरी पहिरे लाल निचोल-१४३६।
वि.
[हिं. पीला]

पीरी
पीरी-काली होना- तेज होना, नाराज होना। उ,- बहियाँ गहत सतराति कौन पर मग धरी उँगरी कौन पै होत पीरी-कारी-२०४७।
मु.

पीरे
पीले रंग के।
उ.- (क) पीरे पान-बिरी मुख नावति -५१४। (ख) लै गागरि सिर मारग डगरी इन पहिरे पीरे पट-८९०।
वि.
[हिं. पीला]

पीरो
पीले रंग का।
उ.- मलिन बसन हरि हित अंतर्गति तनु पीरो जनु पाते-३४६१।
वि.
[हिं. पीला]

पील
हाथी।
संज्ञा
[फ़ा.]

पील
शतरंज का एक मोहरा।
संज्ञा
[फ़ा.]

पीलपाल
महावत।
संज्ञा
[हिं. पील + पालक]

पीलपाँव
एक प्रसिद्ध रोग।
संज्ञा
[फ़ा. पीलपा]

पीलवान
महावत।
संज्ञा
[फ़ा. पीलवान]

पीला
जिसका रंग पीला हो।
वि.
[सं. पीत]

पीला
कांतिहीन, धुंधला सफेद।
वि.
[सं. पीत]

पीला
पीला पड़ना (होना)- (१) रक्त के अभाव से तेज न रह जाना। (२) भय से चेहरा फीका पड़ जाना।
मु.

पीला
हल्दी या सोने का सा रंग।
संज्ञा

पीला
पीली फटना- तड़का होना।
मु.

पीलापन
पीतता।
संज्ञा
[हिं. पीला + पन]

पीले
पीत वर्ण के।
वि.
[हिं. पीला]

पीले
पीले मुख - निस्तेज, कांतिहीन। उ.- लाली लै लालन गए आए मुख पीले -१९६४।
मु.

पीव
पपीहे का ‘पी’ शब्द।
उ.- रसना तारू सों नहिं लावत, पीवै पीव पुकारत-पृ. ३३० (९८)।
संज्ञा
[अनु.]

पीवन
पीना, पीने की क्रिया।
उ.-गर्भवती हिरनी तहँ आई। पानी सो पीवन नहिं पाई-५-३।
संज्ञा
[हिं. पीना]

पीवर
मोटा।
वि.
[सं.]

पीवर
भारी, गुरू।
वि.
[सं.]

पीवा
जल, पानी।
संज्ञा
[सं.]

पीवा
स्थूल, पुष्ट।
वि.
[सं. पीवर]

निरुवार
निबटाना।
संज्ञा
[सं. निवारण]

निरुवार
निर्णय।
संज्ञा
[सं. निवारण]

निरुवारत
सुलझाकर अलग करना या हटाना।
उ.- दीरघ लता अपने कर निरूवारत-२०६८।
क्रि. स.
[हिं. निरुवारना]

निरुवारना
बंधन आदि से मुक्त करना।
क्रि. स.
[हिं. निरुवार]

निरुवारना
फँसी या उलझी वस्तुओं को सुलझाना।
क्रि. स.
[हिं. निरुवार]

निरुवारना
निबटाना, निर्णय करना।
क्रि. स.
[हिं. निरुवार]

निरुवारति
सुलझाती है, (फँसी या उलझी लटों को) अलग करती है।
उ.- जसुमति राधा कुंवर सँवारति। बड़े बार सीमंत सीस के, प्रेम सहित निरूवारति-७०४।
क्रि. स.
[हिं. निरुवारना]

निरूढ़
उत्पन्न।
वि.
[सं.]

निरूढ़
प्रसिद्ध, विख्यात।
वि.
[सं.]

निरूढ़
कुँआरा, अविवाहित।
वि.
[सं.]

पीहर
(स्त्री के) माता-पिता का घर, मायका, नैहर।
संज्ञा
[सं. पितृ + गृह]

पुंगफल
सुपारी।
संज्ञा
[सं. पूगफल]

पुंगव
बैल, वृष।
संज्ञा
[सं.]

पुंगव
श्रेष्ठ, उत्तम।
वि.

पुंगवकेतु
वृषभध्वज, शिवजी।
संज्ञा
[सं.]

पुंगीफल
सुपारी।
संज्ञा
[सं. पूगफल]

पुंछार
मोर, मयूर।
संज्ञा
[हिं. पूँछ + आर]

पुंजैं
समूह, ढेर।
उ.- (क) तड़ित-बसन घन-स्याम सद्दस तन, तेज-पुंज तम कौं त्रासै-१-६९। (ख) अजिर पद-प्रतिबिंब राजत, चलत उपमा-पुंज-१०-२१८। (ग) सूर-स्याम मुख देखि अलप हँसि आनँद-पुंज बढ़ावो-१२२६।
संज्ञा
[सं.]

पुंजा
गुच्छा, समूह, गट्ठा।
संज्ञा
[सं. पुंज]

पुंज
समूह, राशि।
उ.- जे वैं लता लगत तनु सीतल अब भईं बिषम अनल की पुंजैं-२७२१।
संज्ञा
[सं. पुंज]

पीवै
पीता है, पान करता है।
क्रि. स.
[हिं. पीना]

पीवै
‘चातक की ‘पी’ ध्वनि ही।
उ.- रसना तारू सों नहिं लावत पीवै पीव पुकारत-पृ ३३० (९८)।
संज्ञा
[अनु. पीव + ही]

पीवौ
पियो, पान करो।
उ.- पीवौ छाँछ अघाइ कै, कब के रयवारे-१-२३८।
क्रि. स.
[हिं. पीना]

पीसना
बहुत महीन चूरा करना।
क्रि. स.
[सं. पेषण]

पीसना
कुचलना, दबाना।
क्रि. स.
[सं. पेषण]

पीसना
किसी को पीसना- बहुत हानि पहुँचाना।
मु.

पीसना
कड़ी मेहनत करना, खूब जान लड़ाना।
क्रि. स.
[सं. पेषण]

पीसना
पीसी जानेवाली वस्तु।
संज्ञा

पीसि
पीसकर।
क्रि. स.
[हिं. पीसना]

पीसि
दाँत-पीसि - दाँत किटकिटाकर, बहुत क्रोध करके। उ.- सूर केस नहिं टारि सकै कोउ, दाँत पीसि जौ जग मरै-१-२३४।
मु.

पुंड्र
तिलक, टीका।
संज्ञा
[सं.]

पुंडरीक
श्वेत कमल।
संज्ञा
[सं.]

पुंडरीक
रेशम का कीड़ा।
संज्ञा
[सं.]

पुंडरीक
कमंडल।
संज्ञा
[सं.]

पुंडरीक
तिलक।
संज्ञा
[सं.]

पुंडरीक
काशी का एक राजा।
उ.- पुंडरीक काशी को राइ - उ.-४४।
संज्ञा
[सं.]

पुंडरीकाक्ष
कमल के समान नेत्रवाला।
वि.
[सं.]

पुंडरीकाक्ष
विष्णु, नारायण।
संज्ञा

पुंड्र
तिलक, टीका।
संज्ञा
[सं.]

पुंलिंग
पुरूष का चिन्ह।
संज्ञा
[सं.]

पुंलिंग
(२) (व्याकरण में) पुरूषवाचक शब्द।
संज्ञा
[सं.]

पुंश्चली
व्यभिचारिणी।
वि.
[सं.]

पुंस
पुरूष।
संज्ञा
[सं.]

पुंसवन
दूध।
संज्ञा
[सं.]

पुंसवन
एक संस्कार जो गर्भाधान से तीसरे महीने पुत्र-जन्म की कामना से किया जाता है।
संज्ञा
[सं.]

पुंसवन
वैष्णवों का एक व्रत।
संज्ञा
[सं.]

पुंसवन
पुत्र को उत्पन्न करनेवला
वि.

पुंसवान
जो पुत्रवाला हो।
वि.
[सं. पुंश्चवत्]

पुंस्चली
व्यभिचारिणी, कुलटा।
उ.- पतिब्रता जालंधर-जुवती, सो पति-ब्रत तैं टारी। दुष्ट पुंस्चली अधम सो गनिक सुबा पढ़ावत तारी-१-१०४।
वि.
[सं. पुंश्चली]

पुंस्त्व
पुरूषत्व।
संज्ञा
[सं.]

पुंस्त्व
वीर्य, शुक्र।
संज्ञा
[सं.]

पुआ
मीठी रोटी या पूरी।
संज्ञा
[सं. पूय]

पुआल
सूखे डंठल, पयाल।
संज्ञा
[हिं. पयाल]

पुकार
रक्षा या सहायता के लिए की गयी चिल्लाहट, दुहाई।
उ.- (क) तुम हरि साँकरे के साथी। सुनत पुकार, परम आतुर ह्वै, दौरि छुड़ायौ हाथी-१-११२। (ख) असुर महा उत्पात कियौ तब देवन करी पुकार।
संज्ञा
[हिं. पुकारना]

पुकार
किसी को पुकारने की क्रिया या भाव, हाँक, टेर
संज्ञा
[हिं. पुकारना]

पुकार
मालिश, फरियाद।
संज्ञा
[हिं. पुकारना]

पुकार
माँग की चिल्लाहट।
संज्ञा
[हिं. पुकारना]

पुकार
पुकारकर।
क्रि. स.

पुकार
जोर देकर।
उ.- तुम्हरौ नहीं तहाँ अधिकार। मैं तुमसौं यह कहौं पुकार-६-४।
क्रि. स.

पुकारत
हाँक देता हूँ, टेरता हूँ, आवाज लगाता हूँ।
क्रि. स.
[हिं. पुकारना]

पुकारत
रक्षा के लिए चिल्लाता हूँ, गोहार लगाता हूँ, छटकारे के लिए चिल्लाता हूँ।
उ.-बालापन खेलत ही खोयौ, जुवा विशय-रस मात। वृद्ध भए सुधि प्रगटी मोकौं, दुखित पुकारत तातैं-१-११८।
क्रि. स.
[हिं. पुकारना]

पुकारत
घोषणा करते हैं, बताते हैं।
उ.-दीनदयाल देवकी नंदन बेद पुकारत चारो-१०उ.-७७।
क्रि. स.
[हिं. पुकारना]

पुकारना
टेरना, आवाज देना।
क्रि. स.
[सं. प्रकुश=पुकारना]

पुकारना
रटना, धुन लगाना।
क्रि. स.
[सं. प्रकुश=पुकारना]

पुकारना
चिल्लाकर कहना।
क्रि. स.
[सं. प्रकुश=पुकारना]

पुकारना
माँगना।
क्रि. स.
[सं. प्रकुश=पुकारना]

पुकारना
रक्षा के लिए जिल्लाना।
क्रि. स.
[सं. प्रकुश=पुकारना]

पुकारना
फरियाद करना।
क्रि. स.
[सं. प्रकुश=पुकारना]

पुकारना
नामकरण करना।
क्रि. स.
[सं. प्रकुश=पुकारना]

पुकारि
जोर देकर, घोषित करके, चिल्लाकर।
उ.-सुनि मन, कहौं पुकारि तोसौं हौं, भजि गोपालहिं मेरें-१-८५।
क्रि. स.
[हिं. पुकारना]

पुचारना
झूठी प्रशंसा करके चंग पर चढ़ाना।
क्रि. स.
[हिं. पुचारा]

पुचारा
भीगे कपड़े से पोंछना।
संज्ञा
[अनु. पुचपुच या पुतारा]

पुचारा
पतली पुताई करना।
संज्ञा
[अनु. पुचपुच या पुतारा]

पुचारा
हलका लेप।
संज्ञा
[अनु. पुचपुच या पुतारा]

पुचारा
पोतने का कपड़ा।
संज्ञा
[अनु. पुचपुच या पुतारा]

पुचारा
मीठ और सुहाते वचन।
संज्ञा
[अनु. पुचपुच या पुतारा]

पुचारा
चापलूसी।
संज्ञा
[अनु. पुचपुच या पुतारा]

पुचारा
बढ़ावा।
संज्ञा
[अनु. पुचपुच या पुतारा]

पुच्छ
दुम, पूँछ।
उ.-स्वान, कुब्ज, कुपंगु, कानौ, स्रवन-पुच्छ-बिहीन-१-३२१।
संज्ञा
[सं.]

पुच्छ
पिछला भाग।
संज्ञा
[सं.]

पुकारी
पुकारा, हाँक दी, टेरा, संबोधित किया।
उ.-(क) द्रुपद-सुता जब प्रगट पुकारी। गहत चीर हरि-नाम उबारी-१-२८। (ख) राखी लाज समाज माहिं जब, नाथ नाथ द्रौपदी पुकारी- १-३०।
क्रि. स.
[हिं. पुकारना]

पुकारौं
रक्षा के लिए चिल्लाया, किया, गोहार लगाता पहा, छुटकारे के लिए आवाज देता रहा।
उ.-हाय-हाय मैं परयौ पुकारौं, राम-नाम न कहौं- १-१५१।
क्रि. स.
[हिं. पुकारना]

पुकार्यौ
हाँक लगाई, टेरा पुकारा, आवाज दी।
उ.-जब गज-चरन ग्राह गहि राख्यौ, तबहीं नाथ पुकारयौ-१-१०९।
क्रि. स.
[हिं. पुकारना]

पुकार्यौ
रक्षा के लेए चिल्लाया या गोहार मचायी।
उ.-पाँव पयादे धाय गए गज जबै पुकारयौ।
क्रि. स.
[हिं. पुकारना]

पुखराज
एक रत्न।
संज्ञा
[सं. पुष्पराग]

पुगाना
पूरा करना, पुजाना।
क्रि. स.
[हिं. पुजाना]

पुचकार
चूमने की सी ध्वनि।
संज्ञा
[हिं. पुचकारना]

पुचकारना
चुमकारना।
क्रि. स.
[अनु. पुच + करना

पुचकारी
चूमने की सी ध्वनि।
संज्ञा
[हिं. पुचकारना]

पुचारना
चापलूसी करना।
क्रि. स.
[हिं. पुचारा]

पुच्छल
दुमदार।
वि.
[हिं. पुच्छ]

पुछल्ला
लंबी पूँछ या दुम।
संज्ञा
[हिं. पूँछ + ला]

पुछल्ला
पूँछ की तरह जुड़ी लंबी चीज।
संज्ञा
[हिं. पूँछ + ला]

पुछल्ला
साथ लगा रहनेवाला।
संज्ञा
[हिं. पूँछ + ला]

पुछल्ला
चापलूस।
संज्ञा
[हिं. पूँछ + ला]

पुछातौ
पूछता है, जिज्ञासा करता है।
क्रि. स.
[हिं. पूछना]

पुछातौ
न बात पुछातौ- बात तक नहीं पूछता है, जरा भी ध्यान नहीं देता है। उ.-जग मैं जीवत ही कौ नातौ। मन बिछुरैं तन छार होइगौ, कोउ न बात पुछातौ-१-३०२।
मु.

पुछार, पुछैया
खोज-खबर लेनेवाला।
वि.
[हिं. पूछना]

पुजना
पूजा जाना, पुजा होना।
क्रि. अ.
[हिं. पूजना]

पुजना
आदर या सम्मान होना।
क्रि. अ.
[हिं. पूजना]

पुजाना
अपनी पूजा-सेवा या आदर-सत्कार कराना।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पुजाना
धन वसूलना।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पुजाना
(खाली जगह) भरना।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पुजाना
कमी दूर करना।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पुजाना
सफल करना।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पुजापा
पूजा की सामग्री, चढ़ावा।
संज्ञा
[सं. पूजा + पात्र]

पुजापा
चढ़ावा या पूजन-सामग्री रखने का पात्र।
संज्ञा
[सं. पूजा + पात्र]

पुजायो, पुजायौ
पूरा किया, पूर्ण किया।
उ.-(क) दीन्हौ दान बहुत नाना बिधि, इहि बिधि कर्म पुजायौ-९०-५०। (ख) तासु मनोरथ सकल पुजायौ-१०उ.-२८।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पुजारी
पूजा करनेवाला।
संज्ञा
[हिं. पूजा + कारी]

पुजावहु
परिपूर्ण करो, सफल करो, पूरा करो।
उ.-तुम काहूँ धन दै लै आवहु, मेरे मन की आस पुजावहु-५-३।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

निभरोस
हताश, निराश।
वि.
[हिं. नि + भरोसा]

निभरोसी
हताश, निराश।
वि.
[हिं. नि + भरोसा]

निभरोसी
निराश्रित, निराधार।
वि.
[हिं. नि + भरोसा]

निभाउँ
भावहीन, भावनाहीन।
उ.- काकैं द्वार जाइ होउँ ठाढ़ौ, देखत काहि सुहाउँ। असरन-सरन नाम तुम्हरौ, हौं कामी, कुटिल,निभाउँ - १-१२८।
वि.
(सं. निः + भाव)

निभागा
अभागा।
वि.
[हिं. नि + भाग्य]

निभाना
संबंध,परंपरा या क्रम बनाये रखना।
क्रि. स.
[हिं. निबाहना]

निभाना
(काम या प्रयत्न) करते चलना।
क्रि. स.
[हिं. निबाहना]

निभाना
बात या वचन का पालन करना।
क्रि. स.
[हिं. निबाहना]

निभाव
निर्वाह, निबाह।
संज्ञा
[सं. निर्वाह]

निभूत
बीता हुआ, व्यतीत।
वि.
[सं.]

निरूपम
अनुपम, बेजोड़।
वि.
[सं. निरुपम]

निरूपि
निर्णय करके, ठहराकर, विचार करके, निश्चित करके।
उ.- गर्ग निरूपि कहयौ सब लच्छन, अबिगत हैं अबिनासी-१०-८७।
क्रि. अ.
(हिं. निरूपना)

निरूपित
जिसकी विवेचना हो चुकी हो।
वि.
[सं.]

निरूप्य
जो विवेचन के योग्य हो।
वि.
[सं.]

निरेखना
देखना, निरखना।
क्रि. स.
[सं. निरीक्षण]

निरै
नरक।
उ.- औरौ सकल सुकृत श्रीपति हित, प्रति-फल-हित सुप्रीति। नाक निरै, सुख-दुख, सूर नहिं, जेहि की भजन प्रतीति-२-१२।
संज्ञा
[सं. निरय]

निरैठा
मस्त, मनमौजी।
वि.
(सं. निर् + ईहा या इष्ट)

निरोग, निरोगी
रोगरहित।
वि.
[सं. नीरोग]

निरोठा
कुरूप, बदसूरत।
वि.
[देश.]

निरोध
रोक, रूकावट।
संज्ञा
[सं.]

पुजवना
पुजाना।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पुजवना
सफल करना।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पुजवाना
पूजा में लगाना।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पुजवाना
अपनी पूजा करना।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पुजवाना
आदर-सम्मान कराना।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पुजाई
पूजने का भाव, क्रिया या वेतन।
संज्ञा
[हिं. पूजना]

पुजाई
पूजा।
उ.-गोबर्धन की करी पुजाई मोहिं डार्यौ बिसराई- ९७५।
संज्ञा
[हिं. पूजना]

पुजाई
पूरा या सफल करने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. पूजना]

पुजाए
पूरा किया, पूर्ति की, कमी दूर की।
उ.-पांडु-बधू पटहीन सभा मै, कोटिन बसन पुजाए-१-१५८।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पुजाना
दूसरे से पूजा कराना।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पुजाही
पुजापा रखने की थैली या पात्र।
संज्ञा
[हिं. पूजा + आही]

पुजी
पूँजी।
उ.-समुझि सगुन लै चले न ऊधो यह तुमपै सब पुजी अकेली-३१४४।
संज्ञा
[हिं. पूँजी]

पुजेरी
पूजा करनेवाला।
उ.-आपुहिं देव आपुहीं पुजेरी-१०२९।
संज्ञा
[हिं. पूजारी]

पुजैया
पूजा करनेवाला।
संज्ञा
[हिं. पूजना]

पुजैया
पूरा करने या भरनेवाला।
संज्ञा
[हिं. पूजना]

पुजैया
पुजाई।
संज्ञा
[हिं. पूजाई]

पुजौरा
पूजा।
संज्ञा
[हिं. पूजा]

पुजौरा
पुजापा।
संज्ञा
[हिं. पूजा]

पुट
हलका छिड़काव।
संज्ञा
[अनु. पुट-पुट छींटा गिरंन का शब्द]

पुट
(२) रंग या हलका मेल देने के लिए किसी पतली चीज का रंग में डुबोना।
उ.-ज्यौं बिन पुट गहत न रँग कौ, रंग न रसै परै-३३५८।
संज्ञा
[अनु. पुट-पुट छींटा गिरंन का शब्द]

पुट
हलका मेल।
संज्ञा
[अनु. पुट-पुट छींटा गिरंन का शब्द]

पुट
दोना, कटोरा, गोल गहरा पात्र।
उ.-जलपुट आनि धरी आँगन मैं मोहन नेक तौ लीजै।
संज्ञा
[सं.]

पुट
दोने या कटोरे के आकार की कोई वस्तु या पात्र।
उ.-(क) लीला-गुन अमृत-रस स्रवननि-पुट पीजै-१-७२। (ख) नाहिंन इतनौ भाग जो यह रस नित लोचन-पुट पीजै-१०-९।
संज्ञा
[सं.]

पुट
मुँह बँद बरतन।
संज्ञा
[सं.]

पुट
डिबिया, संपुट।
उ.-नील पुट बिच मनौ मोती धरे बंदन बोरि-१०-२२५।
संज्ञा
[सं.]

पुट
अँतरौटा, अंतःपट।
संज्ञा
[सं.]

पुटकी
पोटली, छोटी गठरी।
संज्ञा
[हिं. पुट]

पुटपाक
मुँहबंद बरतन में रख कर औषध पकाने का विधान।
संज्ञा
[सं.]

पुटपाक
इस प्रकार पकायी गयी औषध का सिद्ध रस।
संज्ञा
[सं.]

पुटी
खाली स्थान जिसमें कोई चीज रक्खी जा सके।
उ.-मुक्ता मनौ चुगत खग खंजन, चोंच पुटी न समात-३६६।
संज्ञा
[सं. पुट]

पुटी
छोटा दोना या कटोरा।
संज्ञा
[सं. पुट]

पुटी
पुड़िया।
संज्ञा
[सं. पुट]

पुटी
लँगोटी, कौपीन।
संज्ञा
[सं. पुट]

पुड़िया
कागज में लिपटी वस्तु।
संज्ञा
[सं. पुटिका, प्रा. पुड़िया]

पुड़िया
खान भंडार।
संज्ञा
[सं. पुटिका, प्रा. पुड़िया]

पुण्य
पवित्र, भला।
वि.
[सं.]

पुण्य
पवित्र या धर्म कार्य।
संज्ञा

पुण्य
धर्म कार्य का संचय।
संज्ञा

पुण्यक
व्रत, अनुष्ठान, धर्म-कार्य।
संज्ञा
[सं.]

पुण्यक्षेत्र
तीर्थ स्थान।
संज्ञा
[सं.]

पुण्यदर्शन
जिसका दर्शन शुभ हो।
वि.
[सं.]

पुण्यवान्
पुण्य करनेवाला।
वि.
[सं. पुण्यव्रत]

पुण्यश्लोक
जिसका चरित्र पवित्र हो।
वि.
[सं.]

पुण्यस्थान
पवित्र या तीर्थ स्थान।
संज्ञा
[सं.]

पुण्याई
पुण्य का प्रभाव।
संज्ञा
[सं. पुण्य]

पुण्यात्मा
पुण्य करनेवाला।
वि.
[सं. पुण्यात्मन्]

पुण्याह
शुभ या मंगल दिवस।
संज्ञा
[सं.]

पुण्याहवाचन
अनुष्ठान के पूर्व कल्याण के लिए 'पुण्याह' शब्द की तीन बार आवृत्ति।
संज्ञा
[सं.]

पुतरा, पुतला
लकड़ी, मिट्टी, कपड़े की पुरुष-मूर्ति, बड़ा गुड्डा।
संज्ञा
[सं. पुत्रक, प्रा. पुत्तल, हिं. पुतला]

पुतरा, पुतला
(किसी का ) पुतला बाँधना- निंदा करना।
मु.

पुत्र
बेटा, लड़का।
संज्ञा
[सं.]

पुत्रवती
जिसके पुत्र हो।
वि.
[सं.]

पुत्रवधू
पुत्र की स्त्री, पतोहू।
संज्ञा
[सं.]

पुत्रिका
पुत्री, बेटी।
संज्ञा
[सं.]

पुत्रिका
पुत्र के स्थान पर मानी गयी कन्या।
संज्ञा
[सं.]

पुत्रिका
पुतली, गुड़िया।
संज्ञा
[सं.]

पुत्रिका
आँख की पुतली।
संज्ञा
[सं.]

पुत्रिका
नारी का चित्र।
संज्ञा
[सं.]

पुत्री
बेटी, लड़की।
संज्ञा
[सं.]

पुत्रेष्टि
एक यज्ञ जो पुत्रेच्छा से होता है।
संज्ञा
[सं.]

पुतरिका, पुतरिया, पुतरी, पुतली
लकड़ी, मिट्टी, कपड़े की स्त्री-मूर्ति, बड़ी गुड़ियाँ।
उ.- हमैं तुम्हैं पुतरी कैं भाइ। देखत कौतुक बिबिध नचाइ-६-५।
संज्ञा
[हिं. पुतला, पुतली]

पुतरिका, पुतरिया, पुतरी, पुतली
सुन्दर स्त्री।
संज्ञा
[हिं. पुतला, पुतली]

पुतरिका, पुतरिया, पुतरी, पुतली
आँख का काला भाग।
संज्ञा
[हिं. पुतला, पुतली]

पुतरिका, पुतरिया, पुतरी, पुतली
पुतली फिरना- (१) आँखें पथराना, मृत्यु होना। (२) घमंड होना।
मु.

पुताई
पोतने की क्रिया या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. पोतना]

पुत्त
बेटा।
संज्ञा
[सं. पुत्र]

पुत्तल, पुत्तलक
पुतला।
संज्ञा
[हिं. पुतला]

पुत्तलिका
बड़ी गुड़िया, पुतली।
संज्ञा
[सं.]

पुत्तलिका
आँख की पुतली।
संज्ञा
[सं.]

पुत्तलिका
सुंदरी स्त्री।
संज्ञा
[सं.]

पुदीना
एक छोटा पौधा।
संज्ञा
[फ़ा. पोदीनः]

पुनः
फिर।
अव्य.
[सं. पुनर]

पुनः
उपरांत।
अव्य.
[सं. पुनर]

पुनः पुनः
बार बार।
क्रि. वि.
[सं.]

पुनरपि
फिर भी।
क्रि. वि.
[सं.]

पुनरबस, पुनरबसु
एक नक्षत्र।
संज्ञा
[सं. पुनर्वसु]

पुनरुक्त
फिर से कहा हुआ।
वि.
[सं.]

पुनरुक्तवदाभास
एक शब्दालंकार।
संज्ञा
[सं.]

पुनरुक्ति
कही बात को फिर कहना।
संज्ञा
[सं.]

पुनर्जन्म
मृत्यु के बात फिर जन्मना।
संज्ञा
[सं.]

पुनर्भव
फिर जन्मना, पुनर्जन्म।
संज्ञा
[सं.]

पुनर्भू
विधवा जिसका पुनः विवाह हो।
संज्ञा
[सं.]

पुनर्वसु
सत्ताइस नक्षत्रों में सातवाँ।
संज्ञा
[सं.]

पुनि
फिर, पुनः, पश्चात, बार-बार, दोबारा, अनंतर।
उ.-(क) पांडव कौ , दूतत्व कियौ पुनि, उग्रसेन कौं राज दियौ- १-२६। (ख) गुरुबांधव-हित मिले सुदामहिं, तंदुल पुनि-पुनि जाँचत- १-३१।
क्रि. वि.
[सं. पुनः]

पुनि
पुनि-पुनि- बार-बार। उ.-सूरदास प्रभु कहत हैं पुनि-पुनि तब अति ही सुख पैहैं-२५५३।
मु.

पुनी
पुण्य करनेवाला।
संज्ञा
[सं. पुण्य]

पुनी
पूर्णिमा, पूनो।
संज्ञा
[सं. पूर्ण]

पुनीत
पवित्र, शुद्ध।
वि.
[सं.]

पुनीत
निष्कलंक।
वि.
[सं.]

पुनीत
सती (नारी)।
उ.-परम पुनीत जानकी सँग लै, कुल-कलंक किन टारौ- ९-११५।
वि.
[सं.]

पुन्न
धर्मकार्य, पुण्य,
संज्ञा
[सं. पुण्य]

पुन्नाग
एक वृक्ष।
संज्ञा
[सं.]

पुन्नाग
श्वेत कमल।
संज्ञा
[सं.]

पुन्नाग
श्रेष्ठ मलुष्य।
संज्ञा
[सं.]

पुन्य
धर्मकार्य, पुण्य।
संज्ञा
[सं. पुण्य]

पुन्यो
पूर्णिमा का।
उ.-सेज सँवारि पंथ निसि जोवत अस्त आनि भयो चंद पुन्यो-१९३१।
वि.
[हिं. पूनो]

पुरंजन
जीवात्मा। (भागवत के आधार पर शरीर रूपी पुर, उसके नवद्वार और पुरंजन नाम से जीवात्मा के निवास का सूरदास ने वर्णन किया है )
उ.-तन पुर जीव पुरंजन राव, कुमति तासु रानी कौ नाँव- ४-१२।
संज्ञा
[सं.]

पुरंदर
पुर, घर आदि को तोड़नेवाला।
संज्ञा
[सं.]

पुरंदर
इंद्र।
संज्ञा
[सं.]

पुरंदर
चोर।
संज्ञा
[सं.]

निरोध
घेरा।
संज्ञा
[सं.]

निरोध
नाश।
संज्ञा
[सं.]

निरोध
चित्त-वृत्ति का निग्रह।
संज्ञा
[सं.]

निरोधक
रोकनेवाला।
वि.
[सं.]

निरोधन
रोक, बंधन, अवरोध।
संज्ञा
[सं.]

निरोधी
रूकावट डालनेवाला।
वि.
[सं. निरोधन]

निर्ख
भाव, दर।
संज्ञा
[फ़ा.]

निर्खन
देखना।
उ.- लटकि निर्खन लग्यो, मटक सब भूलि गयो-२६०९।
क्रि. स.
(हिं. निरखना)

निर्गंध
जिसमें गंध न हो।
वि.
[सं.]

निर्गत
निकला या बाहर आया हुआ।
वि.
[सं.]

पुरंदर
विष्णु।
संज्ञा
[सं.]

पुरः
आगे।
अव्य.
[सं. पुरस]

पुरः
पहले।
अव्य.
[सं. पुरस]

पुरःसर
अग्रगमन।
संज्ञा
[सं.]

पुरःसर
साथी।
संज्ञा
[सं.]

पुर
नगर, नगरी।
उ.-उपवन बन्यो चहूंघा पुर के अति ही मोकों भावत-२५५९।
संज्ञा
[सं.]

पुर
घर।
उ.-मन मैं यह बिचार करि सुंदरि, चली आरने पुर को-७३८।
संज्ञा
[सं.]

पुर
कोठा, अटारी।
संज्ञा
[सं.]

पुर
लोक-भुवन।
संज्ञा
[सं.]

पुर
देह, शरीर।
संज्ञा
[सं.]

पुर
गढ़, किला।
संज्ञा
[सं.]

पुरइन, पुरइनि
कमल का पत्ता।
उ.-पुरइन कपिश निचोल बिबिध रँग बिहँसत सचु उपजायै।
संज्ञा
[सं. पुटकिनी, प्र. पुडइनी, हिं. पुरइनि]

पुरइन, पुरइनि
कमल।
उ.-(क) नँदनंदन तो ऐसे लागे ज्यों जल पुरइन पात-२५१९। (ख) पुइनपात रहत जल भीतर ता रस देह न दागी-३३३५।
संज्ञा
[सं. पुटकिनी, प्र. पुडइनी, हिं. पुरइनि]

पुरई
(मनोरथ, प्रतिज्ञा आदि) पूर्ण या सिद्ध की।
उ.-जन प्रहलाद-प्रतिज्ञा पुरई, सखा बिप्र-दारिद्र हयौ-१-२६।
क्रि. स.
[हिं. पूरना]

पुरखा
पूर्व पुरुष, पूर्वज।
संज्ञा
[सं. पुरुष]

पुरखा
घर या परिवार का बड़ा-बूढ़ा।
संज्ञा
[सं. पुरुष]

पुरजा
टुकड़ा, खंड।
संज्ञा
[फ़ा,]

पुरजा
कतरन, धज्जी।
संज्ञा
[फ़ा,]

पुरजा
अंग, भाग, अवयव।
संज्ञा
[फ़ा,]

पुरजा
चलता-पुरजा- तेज या चालाक आदमी।
मु.

पुरबुला
पूर्व जन्म का।
वि.
[सं. पूर्व]

पुरवइया
पूर्व से आनेवाली हवा।
संज्ञा
[सं. पूर्व]

पुरवट
चमड़े का मोट।
संज्ञा
[सं. पूर]

पुरवत
पूरा या पूर्ण करते हैं।
उ.-पर उपकाज हेतु तनु धारयौ पुरवत सब मन साध-१९९०।
क्रि. स.
[हिं. पूरना]

पुरवना
भरना, पुरना।
क्रि. स.
[हिं. पूरना]

पुरवना
(मनोरथ आदि) पूरा या पूर्ण करना।
क्रि. अ.

पुरवना
साथ पुरवना- साथ देना।
मु.

पुरवना
पूरा होना।
क्रि. अ.

पुरवना
उपयोग के योग्य होना।
क्रि. अ.

पुरवा
छोटा गाँव खेड़ा।
संज्ञा
[सं. पुर]

पुरट
सोना, सुवर्ण।
संज्ञा
[सं.]

पुरतः
आगे।
अव्य.
[सं.]

पुरत्राण
शहरपनाह, परकोटा।
संज्ञा
[सं.]

पुरनियाँ
बड़ा, बूढ़ा, वृद्ध।
वि.
[हिं. पुराना]

पुरबधू
ग्रामवधू, ग्राम की स्त्रियाँ।
उ.-लज्जित होहिं पुरबधू पूछैं, अंग-अंग मुसकात-९-४३।
संज्ञा
[हिं.]

पुरबला, पुरबलौ
पूर्व जन्म का, पूर्वजन्म-संबंधी।
उ.-नहिं अस जनम बारंबार। पुरबलौ धौं पुन्य-प्रगट्यौ लहयौ नर-अवतार-१८८।
वि.
[सं. पूर्व + ला]

पुरबला, पुरबलौ
पूर्व या पहले का।
वि.
[सं. पूर्व + ला]

पुरबा
छोटा गाँव खेड़ा।
संज्ञा
[सं. पूर]

पुरबिया, पुरबिहा
पूरब का रहनेवाला।
वि.
[हिं. पूरब]

पुरबुला
पूर्व का।
वि.
[सं. पूर्व]

पुरवा
पूरब से आनेवाली हवा।
संज्ञा
[हिं. पूरब]

पुरवा
मिट्टी की कुल्हिया।
संज्ञा
[सं. पुटक]

पुरवाई
पूरब से आनेवाली।
उ.-उल्हरि आयो सीतल बूँद पवन पुरवाई-१५६५।
वि.
[हिं. पूरब]

पुरवाई
पूरब से आनेवाली हवा।
संज्ञा

पुरवाना
पूरा कराना।
क्रि. स.
[हिं. पुरवना]

पुरवै
भर दे, व्याप्त कर दे।
उ.-या रथ बैठि बंधु की गर्जहिं पुरवै को कुरुखेत-१-२९।
क्रि. अ.
[हिं. पूरना]

पुरवै
(मनोरथ आदि) पूरा करो।
उ.-हरि बिनु को पुरवै मो स्वारथ-१-२८७।
क्रि. अ.
[हिं. पूरना]

पुरस्कार
आदर-पूजा।
संज्ञा
[सं.]

पुरस्कार
प्रधानता।
संज्ञा
[सं.]

पुरस्कार
पारितोषिक, उपहार, इनाम।
संज्ञा
[सं.]

पुरस्कार
स्वीकार.
संज्ञा
[सं.]

पुरस्कृत
आदृत।
वि.
[सं.]

पुरस्कृत
स्वीकृत।
वि.
[सं.]

पुरस्कृत
जिसे पारितोषिक या उपहार मिला हो।
वि.
[सं.]

पुरहूत
इंद्र।
संज्ञा
[सं. पुरुहूत]

पुरा
प्राचीन काल में।
अव्य.
[सं.]

पुरा
प्राचीन।
अव्य.
[सं.]

पुरा
पूर्व दिशा।
संज्ञा

पुरा
एक सुगंध द्रव्य।
संज्ञा

पुरा
गाँव खेड़ा।
उ.-(क) यह. बृषभानु-पुरा, ये ब्रज मैं, कहाँ दुहावन आई-७२९। (ख) ब्रज बृषभानु-पुरा जुवतिन को इक इक करि मैं जानौं पृ. ३१३ (२७)।
संज्ञा
[सं. पुर]

पुराइ
भरवाकर।
उ.-चंदन आँगन लिपाइ, मुतियनि चौकैं पुराइ-१०-९५।
क्रि. स.
[हिं. पुरना]

पुराइ
पूरी करके।
उ.-अखिल भुवन जन कामना पुराइ कै-२६२८।
क्रि. स.
[हिं. पुरना]

पुराई
पूरी की।
उ.-ताके मन की आस पुराईं-१० उ.-२८।
क्रि. स.
[हिं. पूरना]

पुराऊँ
खाली स्थान भर लै, पुर्ति करूँ।
क्रि. स.
[हिं. पूरना]

पुराऊँ
(पेट) भरूँ, भूख मिटाऊँ।
उ.-माँगत बारंबार सेष ग्वालनि कौ पाऊँ। आपु लियौ कछु जानि, भज्छ करि उदर पुराऊँ-४९२।
क्रि. स.
[हिं. पूरना]

पुराऊँ
रूपी करूँ या करूँगा।
उ.-(क) सरदरास तुम आस पुराऊँ। अंकम भरि सबकौं उर लाऊँ-७९७। (ख) अपनी साध पुराऊँ-१४२५।
क्रि. स.
[हिं. पूरना]

पुराए
पूरे किये।
उ.-अति. अल-सात जम्हात पियारी स्याम के काम पुराए-२११०।
क्रि. स.
[हिं. पूरना]

पुराण
प्राचीन, पुराना।
वि.
[सं.]

पुराण
पुरानी कथा।
संज्ञा

पुराण
हिंदुओं के प्राचीन धर्माख्यान ग्रंथ जिनकी संख्या १८ है विष्णु, पद्म, ब्रह्म, शिव, भागवत, नारद, मार्कंडेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त्त, लिंग, वाराह, स्कंद, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़, ब्रह्मांड, और भविष्य।
संज्ञा

पुराणपुरुष
विष्णु।
संज्ञा
[सं.]

पुरातत्व
प्राचीन काल संबंधी विद्या।
संज्ञा
[सं.]

पुरातन
पुराना, प्रचीन।
उ.-बिप्र सुदामा कियौ अजाँची, प्रीति पुरातन जानि-१-१३५।
वि.
[सं.]

पुरातन
पूर्व जन्म का, विगत जन्म का।
उ.-अजामील तौ बिप्र तिहारौ हुतौ पुरातन दास। नैंकु चूक तैं यह गति कीनी, पुनि बैकुंठ निवास-१-१३२।
वि.
[सं.]

पुरान
पुराना, प्रचीन।
वि.
[हिं. पुराना]

पुरान
पुराण।
संज्ञा
[सं. पुराण]

पुरान पुरुष
विष्णु।
उ.-पुरुष पुरान आनि कियो चतुरानन-४८४।
संज्ञा
[सं. पुराण, पुरुष]

पुराना
प्रचीन, पुरातन।
वि.
[सं. पुराण]

पुराना
फटा जीर्ण।
वि.
[सं. पुराण]

पुराना
जिसका अनुभव बहुत दिनों का हो।
वि.
[सं. पुराण]

पुराना
पुराना खुर्राट या घाघ- बहुत काइयाँ।
मु.

पुराना
बहुत पहले का, पर अब न हो।
वि.
[सं. पुराण]

पुराना
बहुत समय का।
क्रि. स.
[हिं. पुरना]

पुराना
भराना।
क्रि. स.
[हिं. पुरना]

पुराना
पालन कराना।
क्रि. स.
[हिं. पुरना]

पुराना
पूरा कराना।
क्रि. स.
[हिं. पुरना]

पुराना
पालन कराना।
क्रि. स.
[हिं. पुरना]

पुराना
पुरा डालना।
क्रि. स.
[हिं. पुरना]

पुरानी
बहुत वर्षा की, बड़ी आयुवाली।
उ.-डसि मानौं नागिनी पुरानी-२६४९।
वि.
[हिं. पुरानी]

पुरानो, पुरानौ
बहुत दिनों की।
वि.
[हिं. पुराना]

पुराय
मंगल अवसरों पर देव-पूजन के लिए आटे, अबीर आदि से चौखूँटे बनाकर।
उ.-गजमोतिनि के चौक पुराय बिच बिच लाल प्रबालिका-१०-८०८।
क्रि. स.
[हिं. पुरना]

पुरायो, पुरायौ
मंगल-चौक भरे।
उ.-चौक मुक्त हल पुरायो आइ हरि बेठे तहाँ- १० उ.-२४।
क्रि. स.
[हिं. पुरना]

पुरारि
शिव।
संज्ञा
[सं.]

पुरावृत्त
पुराना इतिहास या वृत्तांत।
संज्ञा
[सं.]

पुरावो
मंगल चौक आदि भरो।
उ.-ललिता बिसाखा अँगना लिपावो, चौक पुरावो तुम रोरी-२३९५।
क्रि. स.
[हिं. पुराना]

पुरि
शरीर।
संज्ञा
[सं.]

पुरि
पुरी।
संज्ञा
[सं.]

पुरिहै
पूरा होगा।
उ.-सकल मनोरथ तेरौ पुरिहै-४-९।
क्रि. अ.
[हिं. पुरना]

पुरी
नगरी।
संज्ञा
[सं.]

पुरी
जगन्नाथपुरी।
संज्ञा
[सं.]

निर्गम
निकास।
संज्ञा
[सं.]

निर्गमन
निकलना।
संज्ञा
[सं.]

निर्गमन
द्वार।
संज्ञा
[सं.]

निर्गमना
बाहर निकलना।
क्रि. अ.
[सं. निर्गमन]

निर्गर्व
जिसे गर्व न हो।
वि.
[सं.]

निर्गुण, निर्गुन
सत्व, रज, तम- इन तीनों गुणों से परे, परमेश्वर।
संज्ञा
[सं.]

निर्गुण, निर्गुन
जो सत्व, रज और तम नामक गुणों से परे हो।
वि.

निर्गुण, निर्गुन
जिसमें कोई गुण ही न हो।
वि.

निर्गुणता, निर्गुनता
निर्गुण होने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं. निर्गुणता]

निर्गुणिया, निर्गुनिया
वह जो निर्गुण ब्रह्म का उपासक हो।
वि.
[सं. निर्गुण + ईया (प्रत्य.)]

पुरीष
विष्टा, मल।
उ.-बहुतक जन्म पुरीष-परायन, सूकर-स्वान भयौ-१-७८।
संज्ञा
[सं.]

पुरु
देवलोक।
संज्ञा
[सं.]

पुरु
पराग।
संज्ञा
[सं.]

पुरु
शरीर।
संज्ञा
[सं.]

पुरु
ययाति का पुत्र जिसने पिता को यौवन दिया था।
संज्ञा
[सं.]

पुरुष
मनुष्य, नर।
उ.-ज्यों दूती पर-बधू भोरि कै लै पर-पुरुष दिखावै-१-४२।
संज्ञा
[सं.]

पुरुष
आत्मा।
संज्ञा
[सं.]

पुरुष
विष्णु।
संज्ञा
[सं.]

पुरुष
सूर्य।
संज्ञा
[सं.]

पुरुष
जीव।
संज्ञा
[सं.]

पुरुष
शिव।
संज्ञा
[सं.]

पुरुष
सर्वनाम और क्रिया-रूप जिससे सूचित हो कि वह कहने, सुनने अथवा अन्य व्यक्ति में से किसके लिए प्रयुक्त हुआ है (व्याकरण)।
संज्ञा
[सं.]

पुरुष
आत्मा।
संज्ञा
[सं.]

पुरुष
पूर्वज।
उ.-जा कुल माहिं भक्त मम होई। सप्त पुरुष लैं उधरै सोई।
संज्ञा
[सं.]

पुरुष
यज्ञपुरुष।
संज्ञा
[सं.]

पुरुष
पति, स्वामी।
संज्ञा
[सं.]

पुरुषत्व
पुरुष होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

पुरुषारथ, पुरुषार्थ
पुरुष के उद्योग का लक्ष्य या विषय।
संज्ञा
[सं. पुरुषार्थ]

पुरुषारथ, पुरुषार्थ
उद्यम, पराक्रम, शक्ति।
उ.-(क) करी गोपाल की सब होइ। जो अपनो पुरुषारथ मानत, अति जूठौ है सोई-१-२६२। (ख) अतिहि पुरुषारथ कियौ उन, कमल दह के ल्याइ-५८६।
संज्ञा
[सं. पुरुषार्थ]

पुरुषार्थी
उद्योगी, परिश्रमी।
वि.
[सं. पुरुषार्थिन्]

पुरुषार्थी
बली, शक्तिवान।
वि.
[सं. पुरुषार्थिन्]

पुरुषोत्तम
श्रेष्ठ पुरुष।
संज्ञा
[सं.]

पुरुषोत्तम
विष्णु।
संज्ञा
[सं.]

पुरुषोत्तम
जगन्नाथ।
संज्ञा
[सं.]

पुरुषोत्तम
ईश्वर।
संज्ञा
[सं.]

पुरुषोत्तम
मलमास।
संज्ञा
[सं.]

पुरुहूत
इंद्र।
संज्ञा
[सं.]

पुरुरवा
एक प्राचीन राजा जिसकी प्रतिष्ठानपुर नामक राजधानी प्रयाग में गंगा के किनारे थी। पुरुरवा इला के गर्भ से उत्पन्न बुध का पुत्र था। उर्वशी एक बार शपवश भूलोक में आ पड़ी थी। तब पुरुरवा ने उससे विवाह किया था। शाप से मुक्त होकर जब वह स्वर्ग चली गयी तब राजा ने बहुत विलाप किया। पश्चात, एकबार पुनः उर्वशी से उनकी भैंट हुई। उर्वशी से उत्पन्न उनके सात पुत्र थे- आयु, अमावसु, विश्वायु, श्रुतायु, दृढ़ायु, वनायु, और शतायु।
संज्ञा
[सं. पुरूरवा]

पुरेन, पुरेनि, पुरैन, पुरैनि
कमल।
संज्ञा
[हिं. पुरइनि]

पुरेन, पुरेनि, पुरैन, पुरैनि
कमल का पत्ता।
संज्ञा
[हिं. पुरइनि]

पुरोध, पुरोधा
पुरोहित।
संज्ञा
[सं. पुरोधस]

पुरोहित
कर्मकांड करानेवाला।
उ.-कह्यौ पुरोहित होत न भलौ। बिनसि जात तेज-तप सकलौ-६-५।
संज्ञा
[सं.]

पुरोहिताई
पुरोहित का काम।
संज्ञा
[हिं. पुरोहित]

पुल
सेतु।
संज्ञा
[फ़ा.]

पुल
(किसी बात का) पुल बँधना- ढेर लगना। (किसी बात का) पुल बाँधना- ढेर लगाना।
मु.

पुलक
रोमांच, प्रेम, हर्ष आदि के उद्वेग से पुलकित होना।
उ.-गदगद् सुर, पुलक रोम, अंग प्रेम भीजै-१-७२।
संज्ञा
[सं.]

पुलकना
गदगद होना।
क्रि. अ.
[सं. पुलक]

पुलकाई
गदगद होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. पुलरना]

पुलकालि, पुलकावलि, पुलकावली
हर्ष , रोमों का खड़ा होना।
संज्ञा
[सं. पुलकावलि]

पुलकि
गदगद या पुलकित होकर।
उ.-सूरदास प्रभु बोल न आयो प्रेम पुलकि सब गात-२५३१।
क्रि. अ.
[हिं. पुलकना]

पुलकित
रोमांचयुक्त, गदगद, प्रेम या हर्ष से जिसके रोएँ उभर आये हों।
उ.-लोचन सजल, प्रेम-पुलकित तन, डगर अंचल, कर-माल-१-१८९।
वि.
[हिं. पुलकना]

पुलकी
गदगद होनेवाला।
वि.
[सं. पुलकिन]

पुलस्त, पुलस्त्य
एक ऋषि जिनकी गणना ब्रह्मा के मानस पुत्रों, प्रजापतियों और सप्तर्षियों में हैश। ये कुबेर और रावण के पितामह थे।
संज्ञा
[सं.]

पुलह
एक ऋषि जिनकी गणना ब्रह्मा के मानस पुत्रों, प्रजापतियों और सप्तर्षियों में है।
संज्ञा
[सं.]

पुलिंदा
पूला, गडढा।
संज्ञा
[सं. पुल=ढेर]

पुलिन
नदी का तट।
उ.-जैसोइ पुलिन पवित्र जमुन को तैसोइ मंद सुगंध- पृ. ३१५ (४५)।
संज्ञा
[सं.]

पुलिहोरा
एक पकवान।
संज्ञा
[देश.]

पुश्त
पीठ।
संज्ञा
[फ़ा.]

पुश्त
पीढ़ी।
संज्ञा
[फ़ा.]

पुश्ता
ऊँची मेड़, बाँध।
संज्ञा
[फ़ा. पुश्तः]

पुश्ती
सहारा।
संज्ञा
[फ़ा.]

पुश्ती
सहायता।
संज्ञा
[फ़ा.]

पुश्तैनी
जो कई पुश्तों से चला आता हो।
वि.
[हिं. पुश्त]

पुश्तैनी
जो कई पुश्तों तक चले।
वि.
[हिं. पुश्त]

पुष्कर
जल।
संज्ञा
[सं.]

पुष्कर
जलाशय।
संज्ञा
[सं.]

पुष्कर
कमल।
उ.-पुष्कर माल उतार हृदय ते दीनी स्याम-सारा. ५५४।
संज्ञा
[सं.]

पुष्कर
सात द्वीपों में से एक।
उ.- जंबु, प्लच्छ क्रौंच, साक, साल्मलि, कुस, पुष्कर भरपुर-सारा. ३४।
संज्ञा
[सं.]

पुष्कर
एक तीर्थ।
संज्ञा
[सं.]

पुष्कर
विष्णु का एक रूप।
संज्ञा
[सं.]

पुष्कल
बहुत अधिक।
वि.
[सं.]

पुष्कल
भरा-पुरा, परिपूर्ण।
वि.
[सं.]

पुष्कल
श्रेष्ठ।
वि.
[सं.]

पुष्कल
पवित्र।
वि.
[सं.]

पुष्ट
पाला पोषा हुआ।
वि.
[सं.]

पुष्ट
मोटा-ताजा।
वि.
[सं.]

पुष्ट
बलवर्द्धक।
वि.
[सं.]

पुष्ट
दृढ़, मजबूत।
वि.
[सं.]

पुष्टई
बलवर्द्धक वस्तु।
संज्ञा
[सं. पुष्ट]

पुष्टता
दृढ़ता, मजबूती।
संज्ञा
[सं.]

पुष्टि
पोषण।
संज्ञा
[सं.]

पुष्टि
मोटाताजापन।
संज्ञा
[सं.]

पुष्टि
दृढ़ता।
संज्ञा
[सं.]

पुष्टि
बात का समर्थन।
संज्ञा
[सं.]

पुष्टि
वृद्धि।
संज्ञा
[सं.]

पुष्टिकर
बल-वीर्य-वर्द्धक।
वि.
[सं.]

पुष्टिकारक
बल-वीर्य-वर्द्धक।
वि.
[सं.]

पुष्टिमार्ग
वल्लभाचार्य का वैष्णव भक्तिमार्ग।
संज्ञा
[सं.]

पुष्प
फूल।
संज्ञा
[सं.]

पुष्प
ऋतुमती स्त्री का रज।
संज्ञा
[सं.]

पुष्प
कुबेर का 'पुष्पक' विमान।
संज्ञा
[सं.]

पुष्पक
फूल।
संज्ञा
[सं.]

पुष्पक
कुबेर का विमान।
संज्ञा
[सं.]

पुष्पचाप
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]

पुष्पधन्वा
कामदेव।
संज्ञा
[सं. पुष्पधन्वन]

पुष्पध्वज
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]

पुष्पवती
रजस्वला स्त्री।
संज्ञा
[सं.]

पुष्पवाटिका
फुलवारी।
संज्ञा
[सं.]

पुष्पबाण
फूलों का बाण।
संज्ञा
[सं.]

पुष्पबाण
कामदेव जिसके बाण फूलों के हैं।
संज्ञा
[सं.]

पूँछ
दुम, पुच्छ, लांगूल।
संज्ञा
[सं. पुच्छ]

पूँछ
पिछला भाग।
संज्ञा
[सं. पुच्छ]

पूँछ
पीछे लगा रहनेवाला, पिछलग्गा।
संज्ञा
[सं. पुच्छ]

पूँजी
संचित धन संपत्ति।
संज्ञा
[सं. पुंज]

पूँजी
मूलधन।
संज्ञा
[सं. पुंज]

पूँजी
रूपया-पैसा।
संज्ञा
[सं. पुंज]

पूँजी
विषय की जानकारी।
संज्ञा
[सं. पुंज]

पूँजी
पूंज, समूह।
संज्ञा
[सं. पुंज]

पूँठ
पीठ।
संज्ञा
[सं. पृ. ष्ठ]

पूआ
मीठी पूरी, मालपुआ।
उ.- दोनो मेलि धरे हैं खूआ। हौंस होइ तौ ल्याऊँ पूआ-३९६।
संज्ञा
[सं. पूव]

निर्गुणी, निर्गुनी
गुणरहित।
वि.
[सं. निर्गुण]

निर्गूढ़
जो बहुत ही गूढ़ हो, अगम।
वि.
[सं.]

निर्ग्रंथ
निर्धन।
वि.
[सं.]

निर्ग्रंथ
असहाय।
वि.

निर्घंट
शब्द या ग्रंथ-सूची।
वि.

निर्घात
विनाश।
संज्ञा
[सं.]

निर्घात
आघात।
संज्ञा
[सं.]

निर्घिन
जिसे गंदी वस्तुओं और बुरे कामों से घुणा न हो।
उ.- निर्घिन, नीचे, कुलज, दुर्बुद्धी, भोंदू, नित कौ रोऊ-१-१२६।
वि.
(सं. निर्घृण)

निर्घृण
जिसे घृणा न हो।
वि.
[सं.]

निर्घृण
जिसे लज्जा न हो।
वि.
[सं.]

पसाना
उचित लगना।
क्रि. अ.
[हिं. पोसना]

पुस्तक
पोथी, किताब, ग्रंथ।
संज्ञा
[सं.]

पुस्तकालय
पुस्तक-संग्रहालय।
संज्ञा
[सं.]

पुहकर, पुहुकर
कमल।
उ.-पुहुकर पुंडरीक पूरन मानो खंजन केलि खगे- पृ. ३५०(६४)।
संज्ञा
[सं. पुष्कर]

पुहाना
गुथवाना, ग्रथित कराना।
क्रि. स.
[हिं. पोहना]

पुहुप
फूल।
उ.- देखि यह सुरनि वर्षा करी पुहुप की-७-६।
संज्ञा
[सं. पुष्प]

पुहुपमाल, पुहुपमाला
फूलों की माला।
उ.- बीच माली मिल्यौ, दौरि चरननि पर्यौ, पुहुपमाला स्याम कंठ धारयौ-२५८८।
संज्ञा
[हिं. पुहुप + माला ]

पुहुपावलि
पुष्पों की राशि।
उ.- छाल सुगंध सेज पुहुपावलि हारू छुए ते हिय हारू जरैगौ-२८७०।
संज्ञा
[सं. पुष्पावली]

पुहुमि, पुहुमी
पृथ्वी।
उ.- (क) तब न कंस निग्रह्यौ पुहुमि को भार उतारयौ-११३९। (ख) चोंच एक पुहुमी लगाई, इक अकास समाई-४२७।
संज्ञा
[सं. भूमि]

पुहुरेनु
फूल का पराग।
संज्ञा
[सं. पुष्परेणु]

पुष्पवृष्टि
फूलों की वर्षा।
संज्ञा
[सं.]

पुष्पशर, पुष्पशरासन
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]

पुष्पायुध
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]

पुष्पित
फूलों से युक्त।
वि.
[सं.]

पुष्पोद्यान
फुलवारी।
संज्ञा
[सं.]

पुष्य
पोषण।
संज्ञा
[सं.]

पुष्य
सारवस्तु।
संज्ञा
[सं.]

पुष्य
२७ नक्षत्रों में आठवाँ।
संज्ञा
[सं.]

पुष्य
पूसमास।
संज्ञा
[सं.]

पसाना
पूरा पड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. पोसना]

पूगफल, पूगीफल
सुपारी।
संज्ञा
[सं. पूगफल]

पूछ
पूछने का भाव।
संज्ञा
[हिं. पूछना]

पूछ
चाह, जरूरत।
संज्ञा
[हिं. पूछना]

पूछ
आदर, आवभगत।
संज्ञा
[हिं. पूछना]

पूछगाछ, पूछताछ
जाँच-पड़-ताल।
संज्ञा
[हिं. पूछना]

पूछत
पूछता है, जाँच-पड़नाल करता हूँ।
उ.- जाति-पाँत कोइ पूछत नाहीं श्रीपति कैं दरबार-१-२३१।
क्रि. स.
[हिं. पूछना]

पूछन
पूछना, जिज्ञासा करना।
क्रि. स.
[हिं. पूछना]

पूछन
पूछन लागे - पूछने लगे।
उ.- बानी सुनि बलि पूछन लागे, इहाँ बिप्र कत आवन-८-१३।
प्र.

पूछना
जिज्ञासा करना।
क्रि. स.
[सं. पृच्छण]

पूछना
खोज-खबर लेना।
क्रि. स.
[सं. पृच्छण]

पूछना
आदर-सत्कार करना।
क्रि. स.
[सं. पृच्छण]

पूछना
आश्रय देना।
क्रि. स.
[सं. पृच्छण]

पूछना
ध्यान देना।
क्रि. स.
[सं. पृच्छण]

पूज
पूजने योग्य, पूजनीय।
वि.

पूज
देवात।
संज्ञा

पूज
शुभ कर्म के पूर्व गणेश का पूजन।
संज्ञा
[सं. पूजन]

पूजक
पूजा करनेवाला।
वि.
[सं.]

पूजत
पूजा करता है, देवी देवता के प्रति श्रद्धा प्रकट करता है।
उ.- फल माँगत फिरि जात मुकर ह्वौ, यह देवन की रीति। एकनि कौं जिय-बलि दै पूजे, पूजत नैंकु न तूटे-१-१७७।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पूजत
बराबर होते हैं, समान है।
उ.- ये सब पतित न पूजत मों सम, जिते पतित तुम हारे-१-१७९।
क्रि. अ.

पूजतिं
पूजा करती हैं।
उ.- गौरी-पति पूजतिं ब्रजनारी-७६६।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पूजन
देवी-देवता की सेवा, वंदना या अर्चना।
संज्ञा
[सं.]

पूजन
आदर, सम्मान।
संज्ञा
[सं.]

पूजना
देवी-देवात की सेवा, वंदना या अर्चना करना।
क्रि. स.
[सं. पूजन]

पूजना
आदर-सत्कार करना।
क्रि. स.
[सं. पूजन]

पूजना
भरना, बराबर हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. पूर्यते, प्रा. पूज्जति]

पूजना
गहरे स्थान का भरकर समतल हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. पूर्यते, प्रा. पूज्जति]

पूजना
चुकता हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. पूर्यते, प्रा. पूज्जति]

पूजना
बीतना, समाप्त होना।
क्रि. अ.
[सं. पूर्यते, प्रा. पूज्जति]

पूजनीय
पूजने-योग्य।
वि.
[सं.]

पूजनीय
आदरणीय।
वि.
[सं.]

पूजहु
पूजा करो।
उ.- अब तुम भवन जाहु पति पूजहु परमेश्वर की नाई-पृ. ३४१ (७०)।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पूजा
देवी-देवता की वंदना अर्चना।
उ.- जोग न जुक्ति, ध्यान नहिं पूजा बिरध भएँ पछितात -२-२२।
संज्ञा
[सं.]

पूजा
देवी-देवता पर जल, फल-फूल आदि चढ़ाना।
संज्ञा
[सं.]

पूजा
आदर-सत्कार, आवभगत।
संज्ञा
[सं.]

पूजा
प्रसन्न करने का प्रयत्न करना।
संज्ञा
[सं.]

पूजा
ताड़ना, दंड।
उ.- (क) करन देहु इनकी मोहिं पूजा, चोरी प्रगटत नाम-३७६। (ख) सूर सबै जुबतिन के देखत पूजा करौं बनाइ-११२५।
संज्ञा
[सं.]

पूजि
पूरा करके, बहुत अधिक भरकर, बराबर करके।
उ.- करत बिबस्त्र द्रुपद-तनया कौं सरन सब्द कहि आयौ। पूजि अनंत कोटि बसननि हरि, अरि कौ गर्ब गँवायौ-१-१९०।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पूजित
जिसकी पूजा की गयी हो।
वि.
[सं.]

पूजे
किसी देवी-देवात की वंदना के लिए कोई कार्य किया, अर्चना की।
उ.- एकनि कौं जिय-बलि दै पूजे, पूजत नैंकु न तूटे-१-१७७।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पूजै
पूजा करे।
उ.- (क) जो ऊजर खेरे के देवन को पूजै को मानै-३४०६। (ख) नँदनंदन ब्रत छाँड़ि कै को लखि पूजै भीति-३४४३।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पूजै
बराबरी, समता या तुलना कर सके, बराबर, समान या तुल्य हो सके।
उ.- (क) राम-नाम-सरि तऊ न पूजै जौ तनु गारौ जाइ हिबार-२-३। (ख) नान्हीं एड़ियनि अरूनता, फल-बिंब न पूजै-१०-१३४।
क्रि. अ.

पूजौ
समान, तुल्य या बराबर हो सका।
उ.- हिरन्याच्छ इक भयौ, हिरनकस्यप भयौ दूजौ। तिन के बल कौं इंद्र, अरून, कोऊ नाहिं पूजौ-३-११।
क्रि. अ.
[हिं. पूजना]

पूज्य
पूजनीय, माननीय।
वि.
[सं.]

पूज्यता
पूज्य या मान्य होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

पूज्यपाद
बहुत पूज्य या मान्य।
वि.
[सं.]

पूज्यमान
जो पूजा जा रहा हो।
वि.
[सं.]

पूज्यो, पूज्यौ
पूजा की।
उ.- कालिहिं पूज्यौ फल्यौ बिहाने-१०५१।
क्रि. स.
[हिं. पूजना]

पूठि
पीठ।
संज्ञा
[सं. पृष्ठ]

पूत
शुद्ध, पवित्र।
वि.
[सं.]

पूत
बेटा, पुत्र।
संज्ञा
[सं. पुत्र, प्रा. पुत्त]

पूतना
एक दानवी जो कंस की आज्ञा से, स्तनों पर विष मलकर, बालकृष्ण को मारने आयी थी। श्रीकृष्ण ने इसका रक्त चूसकर इसी को मार डाला था।
संज्ञा
[सं.]

पूतमति
पवित्र या शुद्ध चित्तवाला।
वि.
[सं.]

पूतरा
पुतला।
संज्ञा
[हिं. पुतला]

पूतरा
पुत्र, बाल, बच्चा।
संज्ञा
[सं. पुत्र]

पूतरी
पुतली, गुड़िया।
उ.- (क) ऐपन की सी पूतरी (सब) सखियनि कियौ सिंगार-१०-४०। (ख) इक टक भईं चित्र पूतरि ज्यों जीवनि की नहिं आश-२०५२। (ग) ए सब भई चित्र की पुतरी सून सरीरहिं डाहत-३०६५।
संज्ञा
[हिं. पुतली]

पूतात्मा
जिसका अंतःकरण शुद्ध हो।
संज्ञा
[सं.पूतात्मन्]

पूतैं
पुत्र, को, बेटे को।
उ.- मै हूँ अपनैं औरस पूतैं बहुत दिननि मैं पायौ-१०-३३९।
संज्ञा
[हिं. पूत]

पून
धर्म-कार्य, पुण्य।
संज्ञा
[सं. पुण्य]

पून
पूर्ण।
संज्ञा
[सं. पूर्ण]

पूनव, पूनिउँ
पूर्णिमा।
संज्ञा
[हिं. पूनो]

पूनी
धुनकी हुई रूई की मोटी बत्ती।
संज्ञा
[सं. पिजिका]

पूनो, पून्यो, पून्यौ
पूर्णिमा।
उ.- (क) चैत्र मास पूनो को सुभ दिन सुभ नक्षत्र सुभ बार-सारा. ६४१। (ख) पून्यौ प्रगटी प्रानपति हरि होरी है-२४२२।
संज्ञा
[सं. पूर्णिमा]

पूप
पूआ, मालपूआ।
संज्ञा
[सं.]

पूपला, पपली
एक मीठा पकवान।
संज्ञा
[देश.]

पूपली
पोली नली।
संज्ञा
[देश.]

पूय
पीप, मवाद।
उ.- बिषयी भजे, बिरक्त न सेए, मन धन-धाम धरे। ज्यों माखी, मृग मद-मंडित तन परिहरि पूय परै-१-१९८।
संज्ञा
[सं.]

पूर
घाव भरना।
संज्ञा
[सं.]

पूर
पूर्ण , भरापूरा।
वि.
[सं. पूर्ण]

पूरक
पूर्ति करनेवाला।
वि.
[सं.]

पूरक
प्राणायाम विधि के तीन भागों में पहला।
उ.- सब आसन रेचक अरू पूरक कुंभक सीखे पाइ-३१३४।
संज्ञा
[सं.]

पूरक
मृतक के दसवें को दिये जानेवाले दस पिंड।
संज्ञा
[सं.]

पूरण
भरने या पूर्ण करने की क्रिया।
संज्ञा
[सं. पूर्ण]

पूरण
समाप्त करने की क्रिया।
संज्ञा
[सं. पूर्ण]

पूरण
सेतु।
संज्ञा
[सं. पूर्ण]

पूरण
पूरा करनेवाला, पूरक।
बि.

पूरण
पूर्ण।
उ.- सूर पूरण ब्रह्म निगम नाहीं गम्य तिनहिं अक्रूर मन यह बिचारै-२५५१।
वि.
[सं. पूर्ण]

पूरणकाम
जिसकी सब इच्छाएँ पूरी हो गयी हों।
वि.
[सं. पूर्णकाम]

पूरणकाम
कामनारहित, निष्काम।
वि.
[सं. पूर्णकाम]

पूर्णता
पूर्ण होने की भाव।
उ.- पूरणता तो तबहीं बूड़ी संग गए लै चित को-३३३९।
संज्ञा
[सं. पूर्णता]

पूरत
बजाते हैं।
उ.- सूर स्याम बंशी ध्वनि पूरत श्रीराधा राधा लै नाम-१३२७।
क्रि. स.
[हिं. पूरना]

निर्घृण
अयोग्य।
वि.
[सं.]

निर्घृण
निर्दय।
वि.
[सं.]

निर्घोष
शब्द, आवाज।
संज्ञा
[सं.]

निर्घोष
जिसमें शब्द या आवाज न हो।
वि.

निर्छल
छल-कपट-रहित।
वि.
[सं. निश्छल]

निर्जन
जहाँ कोई न हो; सूनसान।
वि.
[सं.]

निर्जर
जो कभी बुड्ढा न हो।
वि.
[सं.]

निर्जर
देवता।
संज्ञा

निर्जर
अमृत।
संज्ञा

निर्जल
जिसमें जल न हो।
वि.
[सं.]

पूरन
(इच्छा, मनोरथ, आदि) पूर्ण करनेवाले, पूरा करनेवाले।
उ.- कहा कमी जाके राम धनी। मनसा नाथ, मनोरथ पूरन, सुखनिधान जाकी मौज घनी-१-३९।
वि.
[सं. पूरण]

पूरन
युक्त, सहित।
उ.- गायौ स्वपच परम अब पूरन, सुत पायौ बाम्हन रे-१-६६।
वि.
[सं. पूरण]

पूरन
पूर्ण, जिसमें कोई कमी न हो।
उ.- तुम सर्वज्ञ सबै बिधि पूरन अखिल भुवन निज नाथ-१-१०३।
वि.
[सं. पूरण]

पूरन
एक प्रकार का मीठा या नमकीन चूर्ण जो गुझिया समोसे आदि में भरा जाता है।
उ.- गूझा बहु पूरन पूरे-१०-१८३।
संज्ञा

पूरनकाम
निष्काम।
वि.
[सं. पूर्णकाम]

पूरनता
पूर्ण होने का भाव।
संज्ञा
[सं. पूर्णता]

पूरनपरब
पूर्णिमा।
संज्ञा
[सं. पूर्ण + पर्व]

पूरना
खाली जगह भरना।
क्रि. स.
[सं. पूरण]

पूरना
ढाँकना।
क्रि. स.
[सं. पूरण]

पूरना
मनोरथ सफल या पूर्ण करना।
क्रि. स.
[सं. पूरण]

पूरना
मंगल अवसर पर देव-पूजन के लिए चौक आदि बनाना।
क्रि. स.
[सं. पूरण]

पूरना
बटकर तैयार करना।
क्रि. स.
[सं. पूरण]

पूरना
बजाना, फूँकना।
क्रि. स.
[सं. पूरण]

पूरना
भर जाना, पूर्ण हो जाना।
क्रि. अ.

पूरनाहुती
यज्ञ की अंतिम आहुति, जिसे देकर होम समाप्त करते हैं।
उ.- नृप कह्यौ, इन्द्रपुर की न इच्छा हमैं, रिषिनि तब पूरनाहुता दीयौ-४-११।
संज्ञा
[सं. पूर्ण + आहुति]

पूरब
पूर्व या प्राची दिशा।
संज्ञा
[सं. पूर्व]

पूरब
पहले का।
उ.- जज्ञ कराइ प्रयाग न्हवायौ तौहूँ पूरब तन नहिं पायौ-६-८।
वि.

पूरब
पहले, पहले ही।
क्रि. वि.

पूरबल
पूर्वकाल।
संज्ञा
[हिं. पूरबला]

पूरबल
पूर्वजन्म।
संज्ञा
[हिं. पूरबला]

पूरबला
पुराना।
वि.
[सं. पूर्व + हिं. ला]

पूरबला
पूर्वजन्म का।
वि.
[सं. पूर्व + हिं. ला]

पूरबली
पूर्वजन्म की।
उ.- लंका दई बिभीषन जन कौं पूरबली पहिचानि-१-१३५।
वि.
[हिं. पूरबला]

पूरबिया, पूरबी
एक प्रकार का दादरा।
संज्ञा
[हिं. पूरब]

पूरबिया, पूरबी
‘पूर्वो’ नामक रागिनी।
उ.- सारंग नट पूरबी मिलौ कै राग अनूपम गाऊँ-पृ. ३११ (११)।
संज्ञा

पूरबिया, पूरबी
पूरब का, पूरब संबंधी।
वि.

पूरा
भरा हुआ।
वि.
[सं. पूर्ण]

पूरा
समूचा, सारा।
वि.
[सं. पूर्ण]

पूरा
जिसमें कोई कमी या कसर न हो।
वि.
[सं. पूर्ण]

पूरा
काफी।
वि.
[सं. पूर्ण]

पूरा
पूरा पड़ना- (१) काम पूरा हो जाना। (२) सामग्री आदि न घटना, अँट जाना। (३) जीवन निर्वाह होना।
मु.

पूरा
संपादित, कृत, संपन्न।
वि.
[सं. पूर्ण]

पूरा
तुष्ट।
वि.
[सं. पूर्ण]

पूरिका
कचौड़ी।
संज्ञा
[सं.]

पूरित
भरा हुआ।
वि.
[सं.]

पूरित
तृप्त।
वि.
[सं.]

पूरी
भरी-पुरी, पूर्ण।
वि.
[हिं. पूरा]

पूरी
तली या घी में उतारी हुई रोटी।
उ.- सद परसि धरी घृत-पूरी।
संज्ञा
[सं. पूलिका]

पूरी
ढोल आदि पर मढ़ा हुआ चमड़ा।
संज्ञा
[सं. पूलिका]

पूरे
पूरा किया, भर दिया, बहुत अधिक एकत्र किया।
उ.- (क) दुखित द्रौपदी जानि जगतपति, आए खगति त्याज। पूरे चीर भीरू तन कृष्ना, ताके भरे जंहाज-१-२५५। (ख) पूरे चीर, अंत नहिं पायौ, दुरमति हारि लही-१-२५८।
क्रि. स.
[हिं. पूरना]

पूरे
भरे हुए।
उ.- गूझा बहु पूरन परे-१०-१८३।
वि.

पूरैं
बजाते हैं।
उ.- कोउ मुरली कोउ बेनु सब्द सृंगी कोउ पूरैं-४३१।
क्रि. स.
[हिं. पूरना]

पूरै
नाप में पूरी हुई।
उ.- बाँधि पची डोरी नहिं पूरै-३९१।
क्रि. अ.
[हिं. पूरना]

पूरौ
पूरा, संपूर्ण, जिसमें कमी या कसर न हो।
उ.- जौ रीझत नहिं नाथ गुसाईं, तौ कत जात जँच्यौ। इतनी कहौ, सूर पूरौ दै, काहैं मरत पच्यौ-१-१७४।
वि.
[हिं. पूरा]

पूरौ
संपन्न, संपादित, कृत।
वि.
[हिं. पूरा]

पूरौ
पूरौ पायौ- पूरी सफलता मिली, अच्छी तरह काम हुआ। उ.- सूर अनेक देह धरि भूतल, नाना भाव दिखायौ। नाच्यौ नाच लच्छ चौरासी, कबहूँ न पूरौ पायौ-१-२०५।
मु.

पूर्ण
भरा हुआ, पूरित।
वि.
[सं.]

पूर्ण
जिसकी कोई इच्छा या कमी न हो।
वि.
[सं.]

पूर्ण
भरपूर।
वि.
[सं.]

पूर्ण
समूचा, सारा।
वि.
[सं.]

पूर्णाहुति
किसी कार्य की समाप्ति।
संज्ञा
[सं.]

पूर्णिमा
शुक्ल पक्ष का अंतिम दिन जब पूर्ण चंद्रोदय होता है।
संज्ञा
[सं.]

पूर्णेन्दु
पूर्णिमा का पूर्ण चंद्र।
संज्ञा
[सं.]

पूर्णेपमा
वह उपमा जिसमें उसके चारो अंग - उपमेय, उपमान, वाचक और धर्म- हों।
संज्ञा
[सं.]

पूर्ति
कार्य की समाप्ति।
संज्ञा
[सं.]

पूर्ति
पूर्णता।
संज्ञा
[सं.]

पूर्ति
कमी या अभाव को पूरा करने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

पूर्ति
भरने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

पूर्नता
पूर्ण होना, पूर्णता।
उ.- सेसनाग के ऊपर पौढ़त तेतिक नाहिं बड़ाई। जातुधानि-कुच-गर मर्षत तब, तहाँ पूर्नता पाई-१-२१५।
संज्ञा
[सं. पूर्णता]

पूर्व
पश्चिम के सामने की दिशा।
संज्ञा
[सं.]

पूर्ण
सब का सब।
वि.
[सं.]

पूर्ण
सिद्ध, सफल।
वि.
[सं.]

पूर्ण
समाप्त।
वि.
[सं.]

पूर्णकाम
जिसकी कोई कामना न हो।
वि.
[सं.]

पूर्णतया
पूरी तरह से।
क्रि. वि.
[सं.]

पूर्णतः
पूरी तौर से।
क्रि. वि.
[सं.]

पूर्णता
पूर्ण होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

पूर्णमासी
पूर्णिमा।
संज्ञा
[सं.]

पूर्णवतार
सोलह कलाओं के अवतार।
संज्ञा
[सं.]

पूर्णाहुति
यज्ञ की अंतिम आहुति।
संज्ञा
[सं.]

पूर्व
पहले का।
वि.

पूर्व
पुराना।
वि.

पूर्व
पिछला।
क्रि. वि.

पूर्व
पहले।
क्रि. वि.

पूर्वक
साथ, सहित।
क्रि. वि.
[सं.]

पूर्वकालिक
पूर्वकाल का, पूर्वकाल-संबंधी।
वि.
[सं.]

पूर्वकालिक क्रिया
वह अपूर्ण क्रिया जिसका काल, दूसरी पूर्ण क्रिया के पहले पड़ता हो।
संज्ञा
[सं.]

पूर्वज
अग्रज।
संज्ञा
[सं.]

पूर्वज
पुरखा।
संज्ञा
[सं.]

पूर्वज
पूर्वकाल में जन्मा हुआ।
वि.

पूर्वार्द्ध
आरंभ का आधा भाग।
संज्ञा
[सं.]

पूर्वाषाढ़
बीसवाँ नक्षत्र।
संज्ञा
[सं.]

पूर्वाह्न
सबेरे से दोपहर तक का काल।
संज्ञा
[सं.]

पूर्वो
पूर्व दिशा-संबंधी।
वि.
[सं. पूर्वीय]

पूर्वाक्त
पहले कहा हुआ।
वि.
[सं.]

पूला
पूला, गट्ठा।
संज्ञा
[सं. पूलक]

पूषण
सूर्य।
संज्ञा
[सं.]

पूस
अगहन के बाद का मास।
संज्ञा
[सं. पौष, पूष]

पृथक्
भिन्न, अलग।
वि.
[सं.]

पृथा
कुन्ती' का दूसरा नाम।
संज्ञा
[सं.]

पूर्वराग
नायक-नायिका में संयोग के पूर्व ही प्रेम होने की स्थिति।
संज्ञा
[सं.]

पूर्ववत्
पहले की तरह।
क्रि. वि.
[सं.]

पूर्ववर्ती
जो पहले रहा हो।
वि.
[सं. पूर्ववर्तिन्]

पूर्वा
पूर्व दिशा।
संज्ञा
[सं.]

पूर्वा
२७ नक्षत्रों में से ग्यारहवाँ।
संज्ञा
[सं.]

पूर्वानुराग
नायक-नायिका के मिलने के पूर्व प्रेम होना।
संज्ञा
[सं.]

पूर्वापर
आगे पीछे।
क्रि. वि.
[सं.]

पूर्वापर
आगे और पीछे का।
वि.

पूर्वाफाल्गुनी
ग्यारहवाँ नक्षत्र।
संज्ञा
[सं.]

पूर्वाभाद्रपद
पचीसवाँ नक्षत्र।
संज्ञा
[सं.]

निर्जल
(व्रत आदि) जिसमें जल भी न ग्रहण किया जाय।
वि.
[सं.]

निर्जित
पूरी तरह जीता हुआ।
वि.
[सं.]

निर्जीव
प्राणहीन।
वि.
[सं.]

निर्जीव
उत्साहहीन।
वि.
[सं.]

निर्ज्वाला
ज्वालारहित।
उ.- मानहु काम अग्नि निर्ज्वाला भई-२३०८।
वि.
[हिं. नि + ज्वाला]

निर्झर
झरना, सोता।
संज्ञा
[सं.]

निर्झरिणी
नदी।
संज्ञा
[सं.]

निर्झरिणी
झरना।
संज्ञा
[सं.]

निर्णय
उचित-अनुचित का निश्चय।
संज्ञा
[सं.]

निर्णय
फैसला, निबटारा।
संज्ञा
[सं.]

पृथिवी
भू, भूमि।
संज्ञा
[सं. पृथ्वी]

पृथिवीपति, पृथिवीपाल
राजा।
संज्ञा
[सं.]

पृथु
वेणु के पुत्र जिनकी उत्पत्ति पिता के मृत शरीर को हिलाने से हुई थी।
संज्ञा
[सं.]

पृथु
मोटा, चौड़ा, मांसल।
उ.- पृथु नितंब कर भीर कमलपद नखमनि चंद्र अनूप-पृ. ३५० (६४)।
वि.

पृथु
महान्।
वि.

पृथु
असंख्य।
वि.

पृथु
चतुर।
वि.

पृथी
पृथ्वी, धरणी, धरती।
उ.- हिरन्याच्छ तब पृथी कौं लें राख्यौ पाताल।¨¨¨¨। तब हरि धरि बाराह बपु, ल्याए पृथी उठाइ-३-११।
संज्ञा
[सं. पृथ्वी]

पृथ्वी
भूमि, धरती।
संज्ञा
[सं.]

पृथ्वी
पंच भूतों या तत्वों में एक जिसका प्रधान गुण गन्ध है।
संज्ञा
[सं.]

पृथ्वी
मिट्टी।
संज्ञा
[सं.]

पृथ्वीतल
धरातल।
संज्ञा
[सं.]

पृथ्वीतल
संसार।
संज्ञा
[सं.]

पृथ्वीधर
पर्वत, पहाड़।
संज्ञा
[सं.]

पृथ्वीपति, पृथ्वीपाल
राजा।
उ.- उतानपाद पृथ्वीपति भयौ-४-९।
संज्ञा
[सं.]

पृश्नि
एक राजा की रानी का नाम जिसके गर्भ से श्रीकृष्ण जन्मे थे।
उ.- पृश्नी गर्भ देव-ब्राह्मन जो कृष्ण रूप रंग भीन्हों-सारा. ३६७।
संज्ञा
[सं.]

पृश्निगर्भ
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[सं.]

पृष्ठ
जो पूछा गया हो।
वि.
[सं.]

पृष्ठ
पीठ।
संज्ञा
[सं.]

पृष्ठ
पीछे का भाग।
संज्ञा
[सं.]

पृष्ठ
पुस्तक का पन्ना।
संज्ञा
[सं.]

पृष्ठपोषक
सहायक, समर्थक।
संज्ञा
[सं.]

पृष्ठभाग
पीठ, पुश्त।
संज्ञा
[सं.]

पृष्ठभाग
कंधा।
उ.- पृष्ठभाग चढ़ि जनक-नंदिनी, पौरूष देखि हमार-९-८९।
संज्ञा
[सं.]

पेंग
झूले को बढ़ाने के लिए दिया गया तेज झोंका।
संज्ञा
[हिं. पटेग]

पेंग
झूले का एक ओर से दूसरी को तेजी से जाना।
संज्ञा
[हिं. पटेग]

पेंच
पगड़ी का फेरा।
उ.- लटपट पेंच सँवारति प्यारी अलक सँवारत नंदकुमार-१६०६।
संज्ञा
[हिं. पेच]

पेंदा
निचला भाग या तला।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पेखक
देखनेवाला।
वि.
[सं. प्रेक्षक, प्रा. प्रेक्खक]

पेखत
देखता है।
उ.- मनौकमल-दलसावक पेखत, उड़त मधुप छबि न्यारी-१०-९१।
क्रि. स.
[हिं. पेखना]

पेच
लपेट।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेच
झंझट।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेच
चालाकी।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेच
पगड़ी की लपेट।
उ.- छूटे बंदन अरू पाग की बाँधनि छुटी लटपटे पेच अटपटे दिए-२००९।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेच
कुश्ती में पछाड़ने की युक्ति।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेच
युक्ति।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेच
एक आभूषण जो पगड़ी में खोंसा जाता है, सिरपेच।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेच
कान का एक आभूषण।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेचीला
बहुत घुमाव-फिराव या पेच वाला।
वि.
[हिं. पेच + ईला ]

पेचीला
बड़ी उलझन वाला।
वि.
[हिं. पेच + ईला ]

पेखन
देखने की क्रिया।
उ.- मल्लजुद्ध नाना बिधि क्रीड़ा राजद्वार को पेखन-सारा. ५०८।
संज्ञा
[हिं. पेखना]

पेखना
देखना।
क्रि. स.
[सं. प्रेक्षण, प्रा. पेक्खण]

पेखा
देखा।
उ.- बैठी सकुच, निकट पति बोल्यौ, दुहुँनि पुत्र-मुख पेखा-१०-४।
क्रि. स.
[हिं. पेखना]

पेखि
देखकर।
उ.- प्राची दिखा पेखि पूरण ससि ह्वै आयौ तातो-१० उ.-१००।
क्रि. स.

पेखी
देखी।
उ.- दधि बेचन जब जात मधुपुरी मैं नीके करि पेखी-२८७८।
क्रि. स.
[हिं. पेखना]

पेखे
देखा।
उ.- बलमोहन को तहाँ न पेखे-२६६०।
क्रि. स.
[हिं. पेखना]

पेखै
देखता है।
उ.- कहुँ कछु लीला करत कहूँ कछु लीला पेखे-१० उ.-४७।
क्रि. स.
[हिं. पेखना]

पेखो
देखो।
उ.- कहति रही तब राधिका जब हरि संग पेखो-१५२८।
क्रि. स.
[हिं. पेखना]

पेखौं
देखती हूँ।
उ.- ज्ञानियनि मैं न आचार पेखौं-८-८।
क्रि. स.
[हिं. पेखना]

पेख्यो, पेख्यौ
देखी।
उ.- जैसोई स्याम बलराम श्री स्यंदन नढ़े वहै छबि कुँवर सर माँझ पेख्यौ-२५५४।
क्रि. स.
[हिं. पेखना]

पेट
उदर।
संज्ञा
[सं. पेटथैला]

पेट
पेट का कुत्ता- भोजन के लिए सब कुछ करनेवाला। पेट काटना- बचत के लिए कम खाना या खिलाना। पेट का पानी न पचना- रह न पाना, कल न पड़ना। पेट का पानी न हिलना- जरा भी मेहनत न पड़ना। पेट का हलका- जिसमें गंभीरता न हो। पेट की आग- भूख। पेट की आग बुझाना- भूख दूर करना। पेट की बात- गुप्त भेद। पेट की मार देना (मारना)- (१) भोजन न देना। (२) जीविका ले लेना। पेट के लिए दौड़ना- जिविका के लिये ही परिश्रम करना। पेट को धोखा देना- बचत के लिए कम खाना या खिलाना। पेट दिखलाना- (१) दीनता दिखाना। (२) भूखे होने का संकेत करना। पेट को लगना- भूख लगना। पेट जलना- (१) बहुत भूख लगना। (२) बहुत-असंतुष्ट होना। पेट दिखाना- भूखे होने का संकेत करना। पेट देना- मन की बात बताना। पेट दियो- मन का भेद बता दिया। उ. अपनो पेट दियौ तैं उनको नाक बुद्धि तिय सबै कहैं री-१६६०। पेट पाटना- अच्छा-बुरा खाकर पेट भर लेना। पेट पालना- जीवन निर्वाह करना। पेट पीठ एक हो (से लगना) जाना- (१) बहुत दुबला होना। (२) बहुत भूखा होना। पेट फूलना- भेद बताने के लिए बहुत व्याकुल होना। पेट मारना- बचत के लिए कम खाना। पेट मारकर मरना- आत्म-घात करना। पेट में आँत न मुँह में दाँत- बहुत बूढ़ा। पेट में खलबली पड़ना- बहुत चिंता या घबराहट होना। पेट में चूहे कूदना (दौड़ना) या (चूहों का कलाबाजी खाना)- बहुत भूख लगना। पेट में दाढ़ी होना- बचपन में ही बहुत चालाक होना। पेट में डालना- खा लेना। पेट में दाँत या पाँव होना- बहुत चालबाज होना। पेट में होना- गुप्त रूप से होना। पेट मोटा हो जाना- बहुत रिश्वत लेना। पेट लगना (लग जाना)- बहुत भूखा होना। पेट से पाँव निकालना- (१) कुमार्ग में लगना। (२) बहुत इतराना। एक ही पेट के होना- समान प्रकृति या स्वभाव के होना। उ.- ए सब दुष्ट हने हरि जेते भए एक ही पेट -२७०३। भरि पेट- जी भर कर। उ.- होड़ा-होड़ी मनहिं भावते किए पाप भरि पेट-१-१४६।
मु.

पेट
गर्भ।
संज्ञा
[सं. पेटथैला]

पेट
पेट की आग - संतान की ममता। पेट ठंढा होना- संतान का जीवित और सुखी रहना।
मु.

पेट
मन, अंतःकरण।
संज्ञा
[सं. पेटथैला]

पेट
पेट में घुसना- भेद लेने के लिए मेल-जोल बढ़ाना। पेट में डालना- बात मन में रखना। पेट में पैठना (बैठना)- भेद लेने को मेल-जोल बढ़ाना। पेट में होना- मन में होना।
मु.

पेट
वस्तु का भीतरी भाग।
संज्ञा
[सं. पेटथैला]

पेट
गुंजाइश, समाई।
संज्ञा
[सं. पेटथैला]

पेट
रोजी जीविका।
संज्ञा
[सं. पेटथैला]

पेटागि
भूख।
संज्ञा
[हिं. पेट + आग]

पेटार, पेटारा
पिटारा।
संज्ञा
[सं. पेटक]

पेटारी
छोटी पिटारी।
संज्ञा
[हिं. पिटारा]

पेटिका
पिटारी।
संज्ञा
[सं.]

पेटिका
संदूक।
संज्ञा
[सं.]

पेटी
छोटा संदूक।
संज्ञा
[सं. पेटिका]

पेटी
पेट का वह स्थान जहाँ त्रिबली होती है।
संज्ञा
[सं. पेटिका]

पेटी
कमरबंद।
संज्ञा
[सं. पेटिका]

पेटू
बहुत खानेवाला।
वि.
[हिं. पेट]

पेठा
सफेद रंग का कुम्हड़ा जिसका प्रायः मुरब्बा बनता है।
संज्ञा
[देश.]

पेठापाक
पेठे का मुरब्बा।
उ.- पेठापाक, जलेबी, कौरी,। गोंदपाक, तिनगरी, गिंदौरी -१०-३९६।
संज्ञा
[देश. पेठा + सं. पाक]

पेड़
वृक्ष, दरख्त।
संज्ञा
[सं.]

पेड़ा
खोए की एक मिठाई।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पेड़ि
वृक्ष की पींड़, पेड़ का तना।
संज्ञा
[सं. पिंड, हिं. पेड़ी]

पेड़ि
जड़।
उ.- कहौ तौ सैल उपारि पेड़ि तैं, दै सुमेरू सौं मारौं-९-१०७।
संज्ञा
[सं. पिंड, हिं. पेड़ी]

पेड़ी
वृक्ष का तना।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पेड़ी
मनुष्य का धड़।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पेड़ी
छोटा पेड़ा।
संज्ञा
[सं. पिंड]

पेड़ू
नाभि के कुछ नीचे का स्थान।
संज्ञा
[सं. पेट]

पेड़ू
गर्भाशय।
संज्ञा
[सं. पेट]

पैन्हाना
वस्त्राभूषण पहनाना।
क्रि. स.
[हिं. पहनाना]

पैन्हाना
पशु के थन में दूध उतरना।
क्रि. अ.
[सं. पयःस्रधन, प्रा. पह्णवन]

पेम
प्रीति, प्रेम।
संज्ञा
[सं. प्रेम]

पेय
पीने योग्य, जो पिया जा सके।
वि.
[सं.]

पेय
पीने की वस्तु।
संज्ञा

पेय
जल।
संज्ञा

पेय
दूध।
संज्ञा

पेयूष
गाय के ब्याने के सात दिन बाद तक का दूध।
संज्ञा
[सं.]

पेयूष
अमृत।
संज्ञा
[सं.]

पेयूष
ताजा घी।
संज्ञा
[सं.]

पेरना
दबाकर रस निकालना।
क्रि. स.
[सं. पीड़न]

पेरना
कष्ट देना, सताना।
क्रि. स.
[सं. पीड़न]

पेरना
काम में बहुत देर लगाना।
क्रि. स.
[सं. पीड़न]

पेरना
प्रेरणा करना।
क्रि. स.
[सं. प्रेरण]

पेरना
भेजना।
क्रि. स.
[सं. प्रेरण]

पेरवा, पेरवाइ
पेरनेवाला।
संज्ञा
[हिं. प्रेरण]

पेरी
पीली रँगी धोती।
संज्ञा
[हिं. पीली]

पेल
बगड़ा, झगड़ा, तकरार।
उ.- सखा जीतत स्याम जाने तक करी कछु पेल-१०-२४४।
संज्ञा
[हिं. पेला]

पेलना
दबाकर धँसाना या ठेलना।
क्रि. स.
[सं. पीड़न]

पेलना
धक्का देना।
क्रि. स.
[सं. पीड़न]

पेलना
टाल देना।
क्रि. स.
[सं. पीड़न]

निर्दोष, निर्दोषी
जिसमें कोई दोष न हो।
वि.
(सं. निर्दोष)

निर्दोष, निर्दोषी
जो अपराधी न हो।
वि.
(सं. निर्दोष)

निर्दोषता
दोष या दोषी न होने का भाव।
संज्ञा
[सं. निर्दोष + ता (प्रत्य.)]

निर्द्वंद, निर्द्वंद्व
जिसकी रोक-टोक करनेवाला न हो।
वि.
[सं.]

निर्द्वंद, निर्द्वंद्व
राग-द्वेष आदि से परे।
वि.
[सं.]

निर्धंधा
बेरोजगार।
वि.
[सं.]

निर्धन
धनहीन, कंगाल, दरिद्र।
वि.
[सं.]

निर्धनता
धनहीनता, दरिद्रता।
संज्ञा
[सं.]

निर्धर्म
जो धर्म से रहित हो।
वि.
[सं.]

निर्धार, निर्धारण
निश्चित या स्थिर करना।
संज्ञा
[सं.]

पेलना
फेंकना, त्यागना।
क्रि. स.
[सं. पीड़न]

पेलना
बल का प्रयोग करना।
क्रि. स.
[सं. पीड़न]

पेलना
प्रविष्ट करना, घुसेड़ना।
क्रि. स.
[सं. पीड़न]

पेलना
आक्रमण के लिए बढ़ाना।
क्रि. स.
[सं. प्रेरण]

पेला
झगड़ा, तकरार।
उ.- पेला करति देत नहिं नीके तुम हो बड़ी बँजारिनि।
संज्ञा
[हिं. पेलना]

पेला
अपराध ,कसूर।
संज्ञा
[हिं. पेलना]

पेला
धावा, आक्रमण।
संज्ञा
[हिं. पेलना]

पेला
पेलने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. पेलना]

पेलि
आक्रमण के लिए बढ़ा दिया।
उ.- घात मन करत लै डारिहौं दुहुँनि पर दियो गज पेलि आपुन हँकारयों-२५९२।
क्रि. स.
[हिं. पेलना]

पेलि
जबरदस्ती।
उ.- एक दिवस हरि खेलत मो सँग झगरौ कीन्हौं पेलि-२९२७।
क्रि. स.
[हिं. पेलना]

पेलि
अवज्ञा करके।
उ.- इंद्रहि पेलि करी गिरि पूजा सलिल बरषि ब्रज नाऊँ मिटावहिं-९४७।
क्रि. स.
[हिं. पेलना]

पेली
अवज्ञा करके। लाँघी।
उ.- रावन भेष धरयौ तपसी कौ, कत मैं भिच्छा मेली। अति अज्ञान मूढ़-मति मेरी, राम-रेख पग पेली-९-९४।
संज्ञा
[हिं. पेलना, पेला]

पेलौ
टालो, अवज्ञा करो, अस्वीकार करो।
उ.- बोलि लेहु सब सखा संग के मेरौ कह्यौ कबहुँ जिनि पेलौ-३९९।
क्रि. स.
[हिं. पेलना]

पेश
सामने, आगे।
क्रि. वि.
[फ़ा.]

पेशकश
भेंट, सौगात, उपहार।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेशगी
अग्रिम दिया गया धन।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेशल
सुन्दर, कोमल।
वि.
[फ़ा.]

पेशल
चालाक।
वि.
[फ़ा.]

पेशवा
नेता, सरदार।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेशवाई
स्वागत, अगवानी।
संज्ञा
[फ़ा.]

पैं
करणसूचक विभक्ति, से, द्वारा।
उ.- जाँचक पैं जाँचक कह जाँचै ? जो जाँचै तौ रसना हारी-१-३४।
प्रत्य.
[हिं. ऊपर]

पैंकड़ा
पैर का कड़ा।
संज्ञा
[हिं. पैर + कड़ा]

पैंकड़ा
बेड़ी, बंधन।
संज्ञा
[हिं. पैर + कड़ा]

पैंचा
हेर-फेर, पलटा।
संज्ञा
[देश.]

पैंजना
पैर का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. पैर + बजना]

पैंजनि, पैंजनियाँ, पैजनी
पैर में पहनने का झाँझ की तरह का एक गहना जों झुनझुन बोलता है।
उ.- कटि किंकिनि, पग पैंजनि बाजै-१०-११७।
संज्ञा
[हिं. पैंजना]

पैंठ
हाट, बाजार।
संज्ञा
[सं. पण्यस्थान, प्रा. पणठठा, अप पइँट्टा]

पैंठ
राजपथ, मार्ग।
उ.- होतौ नफा साधु की संगति, मूल गाँठि नहिं टरतौ। सूरदास बैकुंठ-पैंठ मैं, कोउ न फैंट पकरतौ-१-२९७।
संज्ञा
[सं. पण्यस्थान, प्रा. पणठठा, अप पइँट्टा]

पैंठ
हट्टी, दूकान।
उ.- ऊधौ तुम ब्रज मैं पैंठ करी। लै आए हो नफा जानिकै सबै बस्तु अकरी-३२०४।
संज्ञा
[सं. पण्यस्थान, प्रा. पणठ्ठा, अप पइँट्टा]

पैंठ
हाट का दिन।
संज्ञा
[सं. पण्यस्थान, प्रा. पणठठा, अप पइँट्टा]

पेशवाज
नर्तकी का घाँघरा।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेशा
उद्यम, व्यवसाय।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेशानी
भाल, ललाट।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेशानी
भाग्य।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेशानी
किसी वस्तु का ऊपरी और आगे का भाग।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेशी
मुकदमे की सुनवाई।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेशीनगोई
भविष्यवाणी।
संज्ञा
[फ़ा.]

पेश्तर
पहले, पूर्व।
क्रि. वि.
[फ़ा.]

पेषना
देखना।
क्रि. स.
[हिं. पेखना]

पेस
सामने, आगे।
क्रि. वि.
[फ़ा. पेश]

पैठौर
दूकान।
संज्ञा
[हिं. पैंठ + ठौर]

पैंड़
डग, पग, कदम।
उ.- (क) तीनि पैंड़ बसुधा हौ चाहौं, परनकुटी कौं छावन-८-१३। (ख) जै-जैकार भयौ भुव मापत, तीनि पैंड़ भई सारी। आध पैंड़ बसुधा दै राजा, ना तरू चलि सत हारी-८-१४।
संज्ञा
[हिं. पायँ + ड़ [प्रत्य.] अथवा सं. पाददंड, प्रा. प्रायडंड]

पैंड़
पथ, मार्ग।
संज्ञा
[हिं. पायँ + ड़ [प्रत्य.] अथवा सं. पाददंड, प्रा. प्रायडंड]

पैंड़ा, पड़े
पथ, मार्ग।
उ.- पैंड़े चलत न पावै कोऊ रोकि रहत लरकन लै डगरी-८५४।
संज्ञा
[हिं. पैंड़]

पैंड़ा, पड़े
पैंड़े पड़ना (परना)- बार बार तंग करना। पैड़े परे- पीछे पड़े हैं, तंग करते हैं। उ.- मानत नाहिं हटकि हारीं हम पैंड़े परे कन्हाई।
मु.

पैंड़ा, पड़े
प्रणाली, रीति।
संज्ञा
[हिं. पैंड़]

पैंड़ा, पड़े
घुड़साल।
संज्ञा
[हिं. पैंड़]

पैंड़ौ
रास्ता पथ, मार्ग।
संज्ञा
[हिं. पैंड़, पैंड़ा]

पैंड़ौ
दियौ उन पैंड़ौ- उन्होंने जाने दिया, आगे बढ़ने का मार्ग दिया। उ. - तब मैं डरपि कियौ छोटौ तनु पैठ्यौ उदर-मँझारि। खरभर परी, दियौ उन पैंड़ौ, जीती पहिली रारि-९-१०४।
मु.

पैंत
बाजी।
संज्ञा
[सं.पणकृत, प्रा. पणइत]

पैंती
कुश का छल्ला, पवित्री।
संज्ञा
[सं. पवित्र, प्रा. पवित्त, पइत्त]

पैंती
ताँबे आदि की अँगूठी।
संज्ञा
[सं. पवित्र, प्रा. पवित्त, पइत्त]

पैंया
पैर, पावँ।
संज्ञा
[हिं. पायँ]

पै
पर, परंतु, लेकिन।
उ.- बरजत बार-बार हैं तुमकौ पै तुम नेक न मानौ।
अव्य.
[सं. परं]

पै
पीछे, बाद, अनंतर।
उ.- ऊधौ, स्याम कहा पावैंगे प्रान गए पै आए।
अव्य.
[सं. परं]

पै
अवश्य, जरूर।
उ.- निस्चय करि सो तरै पै तरै-६-४।
अव्य.
[सं. परं]

पै
जो पै - यदि, अगर। तो पै - तो फिर, उस दशा में।
यौ.

पै
पास, समीप, निकट।
उ.- (क) परतिज्ञा राखी मनमोहन फिर तापै पठ्यौ। (ख) वा पै कही बहुत बिधि सौं हम नेकु न दीनों कान।
अव्य.
[सं. प्रति, प्रा. पडी, पइ; हिं. पास, पहँ]

पै
प्रति, ओर।
अव्य.
[सं. प्रति, प्रा. पडी, पइ; हिं. पास, पहँ]

पै
पर, ऊपर, अधिकरण-सूचक बिभक्ति।
उ.- (क) षोड़स अंगनि मिलि प्रजंक पै छ-दस अंक फिरि डारै-१-६०। (ख) निहचै एक असल पै राखै, टरै न कबहूँ टारै-१-१४२।
प्रत्य.
[सं. उपरि, हिं. ऊपर]

पै
करण-सूचक विभक्ति, से, द्वारा।
उ.- दीन दयालु कृपालु कृपानिधि कापै कह्यौं परै।
प्रत्य.
[सं. उपरि, हिं. ऊपर]

पै
जल।
संज्ञा
[सं. पय]

पै
दूध।
संज्ञा
[सं. पय]

पैकरी
पैर का गहना।
संज्ञा
[हिं. पायँ + कड़ा]

पैगम्बर
धर्मप्रवर्तक।
संज्ञा
[फ़ा.]

पैग
डग, कदम, पग।
उ.- (क) तीन पैग बसुधा दै मोकों। तहाँ रचौं ध्रमसारी। (ख) कबहुँक तीनि पैग भुव मापत, कबहुँक देहरि उलँघि न जानी-१०-१४४।
संज्ञा
[सं. पदक, प्रा. पअक]

पैगाम
संदेश, सँदेसा।
संज्ञा
[फ़ा.]

पैज
प्रतिज्ञा, प्रण, टेक, हठ।
उ.- (क) राखी पैज भक्त भीषम की, पारथ कौ सारथी भयौ-१-२६। (ख) पैज करो हनुमान निसाचर मारि सीय सुधि ल्याऊँ। (ग) पैज करि कही हरि तोहि उबारौं।
संज्ञा
[सं. प्रतिज्ञा, प्रा. प्रतिज्ज, अप. पइज्जँ]

पैज
प्रतिद्वंद्विता, होड़, लागडाट।
उ.- सहस बरस गज जुद्ध करत भए, छिन इक ध्यान धरै। चक्र धरे बैकुंठ तैं धाए, वाकी पैज सरै-१-८२।
संज्ञा
[सं. प्रतिज्ञा, प्रा. प्रतिज्जा, अप. पइज्जाँ]

पैजनि, पैजनियाँ, पैजनी
पैजनी।
उ.- अरून चरन नख-जोति, जगमगति, रून-झुन करति पाइँ पैजनियाँ-१०-१०६।
संज्ञा
[हिं. पैंजनी]

पैठ
प्रवेश।
संज्ञा
[सं. प्रविष्ठ, प्रा. पइट्ठ]

पैठ
पहुँच, आना-जाना।
संज्ञा
[सं. प्रविष्ठ, प्रा. पइट्ठ]

पैठना
प्रवेश करना।
क्रि. अ.
[हिं. पैठ]

पैठाना
प्रवेश कराना।
क्रि. स.
[हिं. पैठना]

पैठार
पैठ, प्रवेश।
संज्ञा
[हिं. पैठ + आर]

पैठार
प्रवेशद्वार,फाटक।
उ.- सूर प्रभु सहर पठार पहुँचे आइ धनुष के पास जोधा रखाए-२५६३।
संज्ञा
[हिं. पैठ + आर]

पैठारी
प्रवेश गति।
संज्ञा
[हिं. पैठार]

पैठि
घुसकर, प्रविष्ट होकर, प्रवेश करके।
उ.- (क) सकल सभा मैं पैठि दुसासन अंबर आनि गह्यौ-१-२४७। (ख) अपने मरबे ते न डरत है पावक पैठि जरै-२८००।
क्रि. अ.
[हिं. पैठना]

पैठे
घुसे, प्रविष्ट हुए, प्रवेश किया।
उ.- सुंन्दर गऊ रूप हरि कीन्हौ। बछरा करि ब्रह्मा सँग लीन्हौ। अमृत-कुंड मैं पैठे जाइ। कह्यौ असुरनि, मारो इहिं गाइ-७-७।
क्रि. अ.
[हिं. पैठना]

पैठयौ
घुसा, प्रविष्ट हुआ, प्रवेश किया।
उ.- (क) धर-अंबर लौं रूप निसाचरि, गरजी बदन पसारि। तब मैं डरपि कियौ छोटौ तनु, पैठ्यो उदर-मँझारि-९-१०४। (ख) अंचल गाँठि दई, दुख भाज्यो, सुख जु आनि उर पैठ्यो-९-१६४।
क्रि. अ.
[हिं. पैठना]

पैड़ी
सीढ़ी, जीना।
संज्ञा
[हिं. पैर]

पैड़े
रास्ता, पथ, मार्ग।
उ.- सूर स्याम पाए पैड़े में, ज्यौं पावै निधि रंक परी-१०-८०।
संज्ञा
[हिं. पैड़, पैंड़ां]

पैड़े
पैड़ै परे- पीछे पड़े हैं, बहुत तंग करते हैं। उ.- मानत नाहिं हटकि हारी हम पैंड़े परे कन्हाई।
मु.

पैतरा
बार करने या बचाने की मुद्रा।
संज्ञा
[सं. पदांतर, प्रा. पयांतर]

पैतरा
पद-चिन्ह।
संज्ञा
[सं. पदांतर, प्रा. पयांतर]

पैतला
उथला, छिछला।
वि.
[हिं. पायँ + थल]

पैता
कृष्ण का सखा एक गोप।
उ.- रैता, पैता, मना, मनसुखा, हलधर संगहिं रैहौं-४१२।
संज्ञा
[देश.]

पैताना
पायताना।
संज्ञा
[हिं. पायताना]

पैतृक
पितृ-संबंधी, पुरखों की।
वि.
[सं.]

पैथला
उथला, छिछला।
वि.
[हिं. पायँ + थल]

पैदल
बिना सवारी के, पैर-पैर ही चलनेवाला।
वि.
[सं. पादतल, प्रा. पायतल]

पैदल
पैर-पैर ही।
क्रि. वि.

पैदल
पैदल सिपाही।
संज्ञा

पैदल
शतरंज की एक गोटी।
संज्ञा

पैदा
जन्मा हुआ, उत्पन्न।
वि.
[फ़ा.]

पैदा
घटित, उपस्थित।
वि.
[फ़ा.]

पैदा
प्राप्त, अर्जित।
वि.
[फ़ा.]

पैदा
आमदनी, आय।
संज्ञा

पैदाइश
जन्म, उत्तत्ति।
संज्ञा
[फ़ा.]

पैदाइशी
जन्म का।
वि.
[फ़ा.]

निर्णय
सिद्धांत से परिणाम निकालना।
संज्ञा
[सं.]

निर्णायक
निर्णय करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

निर्णीत
जिसका निर्णय हो चुका हो।
वि.
[सं.]

निर्त
नाच, नृत्य।
संज्ञा
[सं. नृत्य]

निर्तक
नाचनेवाला, नट।
संज्ञा
[सं. नर्त्तक]

निर्तत
नाचता है, नृत्य करता है।
उ.- चलित कुंडल गंड-मंडल, मनहुँ निर्तत मैन-१-३०७।
क्रि. अ.
[हिं. निर्तना]

निर्तना
नाचना, नृत्य करना।
क्रि. अ.
[सं. नृत्य]

निर्दंभ
जिसे दंभ या गर्व न हो।
वि.
[सं.]

निर्दई, निर्दय, निर्दयी
निष्ठुर।
वि.
[सं. निर्दय]

निर्दयता
निष्ठुरता, कठोरता।
संज्ञा
[सं.]

पैदाइशी
स्वाभाविक।
वि.
[फ़ा.]

पैदावार
उपज, फसल।
संज्ञा
[फ़ा.]

पैना
तेज, धारदार, तीक्ष्ण।
वि.
[सं. पैण]

पैनी
तेज, तीक्ष्ण।
उ.- सोभित अंग तरंग त्रिसंगम, धरी धार अति पैनी-९-११।
वि.
[हिं. पैना]

पैबौ
(कर) पाना, (कर) सकना, संपादित करना।
उ.- चोली चीर हाट लै भाजत, सों कैसैं करि पैबौं-७७९।
संज्ञा
[हिं. पाना]

पैबौ
प्राप्त करना, पा सकना।
उ.- गोबर्धन कहुँ गोप बृंद सचु कहा गोरस सचु पैबौ-३३७२।
संज्ञा
[हिं. पाना]

पैमाइश
माप, नाप।
संज्ञा
[फ़ा.]

पैमाना
मापने की वस्तु।
संज्ञा
[फ़ा.]

पैमाल
पददलित, नष्ट-भ्रष्ट।
वि.
[हिं. पामाल]

पैयत
पाता है, प्राप्त करता है, लाभ करता है।
उ.- अब कैसैं पैयत सुख माँगे-१-६१।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पैयाँ
पावँ, पैर।
संज्ञा
[हिं. पायँ]

पैया
पहिया,चक्का, चक्र।
उ.- मन-मंत्री सो रथ हँकवैया। रथ तन, पुन्य-पाप दोउ पैया-४-५२।
संज्ञा
[हिं. पहिया]

पैया
खोखला, खुक्ख।
संज्ञा
[सं. पाथ्य]

पैया
पैर, डग।
उ.- अरबराइ कर पानि गहावत डगमगाइ धरनी धरै पैया-१०-११५।
संज्ञा
[हिं. पैर]

पैया
पाया।
उ.- सूर स्याम अतिहीं बिरूझाने, सुर-मुनि अंत न पैया री-१०-१८६।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पैर
पावँ, चरण।
संज्ञा
[सं. पद + दड, प्रा.पयदंड, अप. पयँड़]

पैर
चरण चिन्ह।
संज्ञा
[सं. पद + दड, प्रा.पयदंड, अप. पयँड़]

पैरत
तैरता है।
उ,- कहा जानै दादुर जल पैरत सागर औ सम कूप-३३७९।
क्रि. अ.
[हिं. पैरना]

पैरना
तैरना।
क्रि. अ.
[सं. प्लवन, प्रा. पवण]

पैरवी
पक्ष के समर्थन की दौड़-धूप।
संज्ञा
[फ़ा.]

पैलगी
प्रणाम।
संज्ञा
[हिं. पायँ + लगना]

पैला
नाँद की बनावट का बड़ा ढक्कन।
उ.- स्याम सब भाजन फोरि पराने। हाँकि देत पैठत है पैला नेकु न मनहिं डराने।
संज्ञा
[हिं. पैली]

पैली
मिट्टि का नाँद की तरह का बड़ा पात्र जो ढकने के काम आता है।
संज्ञा
[सं. पातिली, प्रा. पाइली]

पैवंद
चकती, थिगली,जोड़।
संज्ञा
[फ़ा.]

पैवंद
पैवंद लगाना- अधूरी या अपूर्ण वस्तु या बात को वैसा ही मेल मिलाकर पूरा करना।
मु.

पैशाच
पिशाच का, पिशाच संबंधी।
वि.
[सं.]

पैशाच विवाह
आठ प्रकार के विवाहों में एक जो सोती कन्या का हरण करके या छल से किया जाय।
संज्ञा
[सं.]

पैशाचिक
घोर और बीभत्स, राक्षसी।
वि.
[सं.]

पैशाची
एक प्राकृत भाषा।
संज्ञा
[सं.]

पैसना
घुसना।
क्रि. अ.
[सं. प्रविश, प्रा. पइस + ना]

पैरा
पड़े हुए चरण, पौरा।
संज्ञा
[हिं. पैर]

पैरा
पैर का कड़ा।
संज्ञा
[हिं. पैर]

पैरा
बल्लियों का सीढ़ीदार जीना।
संज्ञा
[हिं. पैर]

पैराई
तैरने का भाव।
संज्ञा
[हिं. पैरना]

पैराना
तैराना।
क्रि. स.
[हिं. पैरना]

पैरि
तैरकर, पानी में हाथ-पैर चलाकर।
उ.- भवसागर मैं पैरि न लीन्हौ-१७५।
क्रि. अ.
[हिं. पैरना]

पैरी
पैर का एक चौड़ा गहना।
संज्ञा
[हिं. पैर]

पैरी
अनाज झाड़ने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. पैर]

पैरी
सीढ़ी।
संज्ञा
[हिं. पैर]

पैर्यौ
तैरता रहा, पानी में हाथ-पैर लगाकर चलता रहा।
उ.- जल औंड़े मैं चहुँ दिसि पैरयौ, पाँउ कुल्हारौ मारौ-१-१५२।
क्रि. अ.
[हिं. पैरना]

पैसरा
जंजाल, झंझट।
संज्ञा
[सं. परिश्रम]

पैसा
ताँबे का सिक्का जो पहले रूपए का चौसठवाँ भाग था और अब सौवाँ है।
संज्ञा
[सं. पाद या पणाश]

पैसा
धन-दौलत।
संज्ञा
[सं. पाद या पणाश]

पैसा
पैसा उठना- धन खर्च होना। पैसा उठाना- फिजूल खर्ची करना। पैसा कमाना- रूपया पैदा करना। पैसा डूबना- घाटा होना। पैसा ढो ले जाना- दूसरे देश का धन अपने देश ले जाना। पैसा धोकर रखना- मनौती मानकर पैसा रख देना।
मु.

पैसार
प्रवेश, पैठ।
संज्ञा
[हिं. पैसना]

पैसी
घुसी, पैठी।
उ.- करि बरिआइ तहाँऊँ पैसी-२४३८।
क्रि. अ.
[हिं. पैसना]

पैसेवाला
धनी, मालदार।
वि.
[हिं. पैसा + वाला]

पैहराइ
पहनाकर, धारण कराके।
उ.- पँचरँग सारी मँगाइ, बधू जननि पैहराइ, नाचैं सब उमँगि अंग, आनंद बढ़ावो-१०-९५।
क्रि. स.
[हिं. पहनाना]

पैहारी
दूध पर ही रहनेवाला।
वि.
[हिं. पय + अहारी]

पैहैं
पायँगे, प्राप्त करेंगे।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पोंछन
पोछने से छटनेवाला अंश।
संज्ञा
[हिं. पोछना]

पोंछना
लगी या सनी चीज को हाथ, कपड़े आदि से हटाना।
क्रि. स.
[सं. प्रोञ्छन, प्रा. पोंछन]

पोंछना
गर्द आदि को हाथ, कपड़े आदि से रगड़कर सुखाना। गीली चीज को सुखी से रगड़कर सुखाना।
क्रि. स.
[सं. प्रोञ्छन, प्रा. पोंछन]

पोंछना
पोंछने का कपड़ा, साफी।
संज्ञा

पोंछि
पोंछकर।
उ.- आँसू पोंछि निकट बैठारी-१०-३२।
क्रि. स.
[हिं. पोंछना]

पोंछियै
गीली चीज को सूखी से रगड़कर सुखाना।
उ.- बदन पोंछियौ जल-जमुन सौं धाइकै-४४०।
क्रि. स.
[हिं. पोंछना]

पोंछै
गीली वस्तु को पोंछती है।
क्रि. स.
[हिं. पोंछना]

पोंछै
पड़ी हुई गर्द आदि को झाड़ती है, या दूर करती है।
उ.- लै उठाइ अंचल गहि पोंछै, धूरि भरी सब देह-१०-१११।
क्रि. स.
[हिं. पोंछना]

पोइ
पिरोकर, गूँथकर।
उ.- ईषद हास, दंत-दुति बिकसित, मानिक मोती धरे जनु पोइ-१०-२१०।
क्रि. स.
[हिं. पोना]

पोइ
रह्यौ पोइ- पिरोया हुआ है।
उ.- कंचन कौ कठुला मनि-मोतिनि, बिच बधनहँ रह्यौ पोइ-१०-१४८।
प्र.

पैहैं
भोगेंगे, सहेंगे।
उ.- सुख सौं बसत राज उनकैं सब। दुख पै हैं सो सकल प्रजा अब-१-२९०।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पैहै
पायेगा, लाभ करेगा, प्राप्त करेगा।
उ.- अजहूँ मृढ़ करौ सतसंगति, संतनि मैं कछु पैहै-१-८६।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पैहौं
पाऊँगा।
उ.- बंसी बट तट ग्वालनि कैं सँग खेलत अति सुख पैहौं-४१२।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पैहौं
आवन पैहौं - आने पाऊँगा।
उ.- कैसेहुँ आज जसोदा छाँड़यो, काल्हि न आवन पैहौं-४१५।
प्र.

पैहौ
पाओगे, प्राप्त करोगे।
उ.- (क) हरि-संतनि कौ कह्यौ न मानत, क्यौ आपुनो पैहौ-१-३३५। (ख) मुख माँगो पैहौ सूरज प्रभु साहुहि आनि दिखावहु-३३४०।
क्रि. स.
[हिं. पाना]

पोंकना
बहुत डर जाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

पोंगा
खोखली नली। चोंगा।
संज्ञा
[सं. पुटक]

पोंगा
पोला, खोखला।
वि.

पोंगा
मूर्ख, बुद्धिहीन।
वि.

पोंछति
काछती है, (गीला बदन) पोंछती है।
उ.- तनक बदन, दोउ तनक-तनक कर, तनक चरन, पोंछति पट झोल-१०-९४।
क्रि. स.
[हिं. पोछना]

पोखर, पोखरा
तालाब।
संज्ञा
[सं. पुष्कर, प्रा. पुक्खर.]

पोखरी
छोटा तालाब, तलैया।
संज्ञा
[हिं. पोखर]

पोगंड
पाँच से दस वर्ष की अवस्था का बालक।
संज्ञा
[सं.]

पोगंड
छोटा, बड़ा या अधिक अंगवाला व्यक्ति।
संज्ञा
[सं.]

पोच
तुच्छ, बुरा, क्षुद्र, निकृष्ट।
उ.- (क) माधौ जू, मन सबही बिधि पोच। अति उन्मत्त, निरंकुस, मैगल, चिंता-रहित, असोच-१-१०२। (ख) कौन निडर कर आपको को उत्तम को पोच। (ग) जाहि बिन तन प्रान छाँड़े कौन बुधि यह पोच-८८९।
वि.
[फ़ा. पूच]

पोच
शक्तिहीन, क्षीण।
वि.
[फ़ा. पूच]

पोची
बुराई, नीचता।
संज्ञा
[हिं. पोच]

पोट
गठरी, पोटली।
संज्ञा
[सं.]

पोट
ढेर।
संज्ञा
[सं.]

पोटना
बटोरना।
क्रि. स.
[हिं.पुट]

पोइ
रत करके, एक ही ओर लगाकर।
उ.- सूर-दास स्वामी करूनामय, स्याम-चरन, मन पोइ-१-२६२।
क्रि. स.
[हिं. पोना]

पोइस, पोइसि
दौड़कर, सरपट।
उ.- काल जमनि सौं आनि बनी है, देखि देखि मुख रोइसि। सूर स्याम बिनु कौन छुड़ावै, चले जाव भाई पोइसि-१-३३३।
क्रि. वि.
[हिं. पोइया]

पोई
एक साग।
उ.- (क) पोई परवर फाँग फरी चुनि-२३२१। (ख) चौराई लाल्हा अरू पोई-३९६।
संज्ञा
[सं. पोदकी]

पोई
अंकुर,पौधा।
संज्ञा
[सं. पोत]

पोई
ईख का कल्ला।
संज्ञा
[सं. पोत]

पोई
आटे की रोटी बनायी।
क्रि. स.
[हिं. पोना]

पोई
रोटी पकायी।
उ.- सरस कनिक बेसन मिलै रूचि रोटी पोई-१५५५।
क्रि. स.
[हिं. पोना]

पोई
पिरोयी।
उ.- कंचन को कँठुला मन मोहत तिन बघनहा बिच पोई।
क्रि. स.
[हिं. पोय + ना]

पोख
पालन-पोषण।
संज्ञा
[सं. पोष]

पोखना
पालना-पोसना।
क्रि. स.
[सं. पोषण]

पोटना
फुसलाना।
क्रि. स.
[हिं.पुट]

पोटरी, पोटली
छोटी गठरी।
संज्ञा
[सं. पोटलिका]

पोटा
पेट की थैली।
संज्ञा
[सं. पुट=थैली]

पोटा
पोटा तर होना- धन से बेफिक्र होना।
मु.

पोटा
साहस, सामर्थ्य।
संज्ञा
[सं. पुट=थैली]

पोटा
समाई, बिसात, हैसियत।
संज्ञा
[सं. पुट=थैली]

पोटा
आँख की पलक।
संज्ञा
[सं. पुट=थैली]

पोटा
उँगली का छोर।
संज्ञा
[सं. पुट=थैली]

पोटा
चिड़िया का पंखहीन बच्चा।
संज्ञा
[सं. पोत]

पोढ़, पोढ़ा
पुष्ट।
वि.
[सं. प्रौढ़, प्रा. पोढ़]

निर्दयपन
कठोरता।
संज्ञा
[हिं. निर्दय + पन]

निर्दहना
जला देना।
क्रि. स.
[सं. दहन]

निर्दिष्ट
जो बताया जा चुका हो।
वि.
[सं.]

निर्दिष्ट
जो नियत या ठहराया जा चुका हो।
वि.
[सं.]

निर्देश
आज्ञा।
संज्ञा
[सं.]

निर्देश
कथन।
संज्ञा
[सं.]

निर्देश
वर्णन।
संज्ञा
[सं.]

निर्देश
निश्चित करना।
संज्ञा
[सं.]

निर्देशक
निर्देश करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

निर्देशन
निर्देश करने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

पोढ़, पोढ़ा
कड़ा।
वि.
[सं. प्रौढ़, प्रा. पोढ़]

पोढ़, पोढ़ा
जी पोढ़ा करना- दुख आदि से विचलित न होना।
मु.

पोढ़ाना
दृढ़ या पक्का होना।
क्रि. अ.
[हिं. पोढ़]

पोढ़ाना
दृढ़ या पक्का करना।
क्रि. स.

पोत
चिड़िया या छोटा बच्चा।
संज्ञा
[सं.]

पोत
पौधा।
संज्ञा
[सं.]

पोत
कपड़ा।
संज्ञा
[सं.]

पोत
नौका जहाज।
संज्ञा
[सं.]

पोत
ढंग।
संज्ञा
[सं. प्रवृत्ति, प्रा. पउत्ति]

पोत
बारी।
संज्ञा
[सं. प्रवृत्ति, प्रा. पउत्ति]

पोत
माला का दाना।
संज्ञा
[सं. प्रोता, प्रा. पोता]

पोत
काँच की गुरिया का दाना जो कई रंगों का होता है।
उ.- (क) झीनी कामरि काज कान्ह ऐसी नहिं कीजै। काँच पोत गिर जाइ नंद घर गथौ न पूजौ-१११७। (ख) यह मत जाइ तिन्हें तुम सिखवौ जिनहीं यह मत सोहत। सूर आज लौं सुनी न देखी पोत सूतरी पोहत-३१२२।
संज्ञा
[सं. प्रोता, प्रा. पोता]

पोत
जमीन का लगान, भू-कर।
संज्ञा
[फ़ा. [फोंता]

पोतना
गीली तह चढ़ाना, चुपड़ना, मिट्टी, गोबर आदि का घोल चढ़ाना।
क्रि. स.
[सं. प्लुत, प्रा. पुत + ना]

पोतना
पोतने का कपड़ा, पोता।
संज्ञा

पोता
पुत्र का पुत्र।
संज्ञा
[सं. पौत्र, प्रा. पोत्त]

पोता
वायु।
संज्ञा
[सं. पोतृ]

पोता
विष्णु।
संज्ञा
[सं. पोतृ]

पोता
पेट की थैली, उदराशय।
संज्ञा
[हिं. पोटा]

पोता
पोतने का कपड़ा।
संज्ञा
[हिं. पोतना]

पोता
पोत, लगान, भूमिकर।
उ.- मन महतो करि कैद अपने मैं, ज्ञान-जहतिया। लावै। माँड़ि- माँड़ि खरिहान क्रोध कौ, पोता भजन भरावै-१-१४२।
संज्ञा
[फ़ा. फोता]

पोति, पोती
काँच की गुरिया का दाना।
उ.- कंचन काँच कपूर कपर खरी, हीरा सम कैसे पोति बिकात री-२५०९।
संज्ञा
[हिं. पोत]

पोती
मिट्टी का लेप।
संज्ञा
[हिं. पोतना]

पोती
दीवार आदि पर घोल चढ़ाया।
क्रि. स.

पोती
पुत्र की पुत्री।
संज्ञा
[हिं. पोता]

पोते
(शरीर पर) मले हुए, लगाए हुए, लेसकर।
उ.- तब तू गयौ सून भवन, भस्म अंग पोते। करते बिन प्रान तोहिं, लछिमन जौ होते-९-९७।
क्रि. स.
[हिं. पोतना]

पोथा
बड़ी पुस्तक (व्यंग्य)
संज्ञा
[हिं. पोथी]

पोथी
पुस्तक।
संज्ञा
[सं. पुस्तिका, प्रा. पोत्थिआ]

पोदना
एक छोटी चिड़िया।
संज्ञा
[अनु. फुदकना]

पोना
गीले आटे से रोटी बनाना।
क्रि. स.
[सं. पूप, हिं. पूवा + ना]]

पोना
(रोटी, चपाती) पकाना।
क्रि. स.
[सं. पूप, हिं. पूवा + ना]]

पोना
पिरोना।
क्रि. स.
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोय + ना]

पोपला
जिसके दाँत न हों।
वि.
[अनु. पुल]

पोपलाना
पोपला होना।
क्रि. अ.
[हिं. पोपला]

पोप
(रोटी) पकाकर।
उ.- सूर आँखि मजीठ कीनी निपट काँची पोय।
क्रि. स.
[हिं. पोना]

पोप
एक साग।
संज्ञा
[हिं. पोई]

पोर
उँगली की गाँठ या जोड़।
संज्ञा
[सं. पर्व]

पोर
उँगली की गाँठों के बीच की जगह।
संज्ञा
[सं. पर्व]

पोर
ईख आदि की गाँठों के बीच का भाग।
संज्ञा
[सं. पर्व]

पोर
रीढ़, पीठ।
उ.- (सं.) निकसे सबै कुँअर असवारी उच्चैः- स्रवा के पोर-१० उ.-६।
संज्ञा
[सं. पर्व]

पोरि
ड़्योढ़ी, दहलीज, द्वार।
उ.- बोलि लिए सब सखा संग के, खेलत कान्ह नंद की पोरि-६९९।
संज्ञा
[हिं. पौरी]

पोरिया
उँगली का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. पौरि]

पोरी
एक तरह की रोटी।
उ.- रोटी, बाटी, पोरी, झोरी। इक कोरी, इक घीव चभोरी-३९६।
संज्ञा
[हिं. पोल]

पोल
खाली जगह।
संज्ञा
[हिं. पोला]

पोल
खोखलापन, सारहीनता।
संज्ञा
[हिं. पोला]

पोल
पोल खुलना- दोष या बुराई प्रकट होना। दोष या बुराई प्रकट करना
मु.

पोल
एक तरह की रोटी।
संज्ञा
[सं.]

पोल
प्रवेश-द्वार।
संज्ञा
[सं. प्रतोली, प्रा. पओली]

पोल
आँगन, सहन।
संज्ञा
[सं. प्रतोली, प्रा. पओली]

पोला
खोखला, खुक्ख।
वि.
[हिं. पोल]

पोला
सारहीन।
वि.
[हिं. पोल]

पोला
जो भीतर से पुलपुला हो।
वि.
[हिं. पोल]

पोलिया
पैर का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. पोला]

पोली
खोखली, खुक्ख।
वि.
[हिं. पोला]

पोशाक
वस्त्र, पहनावा।
संज्ञा
[फ़ा. पोश]

पोशीदा
गुप्त, छिपा हुआ।
वि.
[फ़ा.]

पोष
पोषण।
संज्ञा
[सं.]

पोष
उन्नति।
संज्ञा
[सं.]

पोष
अधिकता, बढ़ती।
संज्ञा
[सं.]

पोष
धन।
संज्ञा
[सं.]

पोष
संतोष।
संज्ञा
[सं.]

पोषक
पालक।
वि.
[सं.]

पोषक
सहायक, समर्थक।
वि.
[सं.]

पोषण
पालन।
संज्ञा
[सं.]

पोषण
बढ़ती।
संज्ञा
[सं.]

पोषण
पुष्टि, समर्थन।
संज्ञा
[सं.]

पोषण
सहायता।
संज्ञा
[सं.]

पोषन
पोषण, पालन।
उ.- प्रभु तेरौ बचन भरोसौ साँचौ। पोषन भरन बिसंभर साहब, जो कलपै सो काँचौ-१-३२।
संज्ञा
[सं. पोषण]

पोषना
पालन करना।
क्रि. स.
[सं. पोषण]

पोषि
पालन करके।
उ.- ऐसे मिल्यो जाइ मोको तजि मानहुँ इनहीं पोषि जयौ री-१४६६।
क्रि. स.
[हिं. पोषना]

पोषित
पाला-पोसा हुआ।
वि.
[सं.]

पोषिब
पालने (के लिए) पालन-पोषण (के हेतु)
उ.- अपनौ पिंड पोषिबैं कारन, कोटि सहस जिय मारे-१-३३४।
क्रि. स.
[हिं. पोषना]

पोषु
पालन करके।
उ.- राजकाज तुमते न सरैगौ काया अपनी पोषु-३०२६।
क्रि. स.
[हिं. पोषना]

पोषे
पाले।
उ.- पोषे नाहिं तुव दास प्रेम सौं, पोष्यौ अपनौ गात्र-१-२१६।
क्रि. स.
[हिं. पोषना]

पोषे
पाला-पोषा हुआ।
उ.- अधर सुधा मुरली की पोषे योग-जहर कत प्यावे रे -३०७०।
वि.

पोषैं
पालन करते हैं।
उ.- पोषैं ताहि पुत्र की नाई-५-३।
क्रि. स.
[हिं. पोषना]

पोषै
पालन करती है, पालती-पोषती है।
उ.- जैसैं जननि जठर अंतरगत सुत अपराध करै। तौऊ जतन करै अरू पोषै, निकसैं अंक भरै-१-११७।
क्रि. स.
[हिं. पोषना]

पोष्य
पालन के योग्य, पाला हुआ।
वि.
[सं.]

पोष्यपुत्र
पाला हुआ पुत्र।
संज्ञा
[सं.]

पोष्यपुत्र
दत्तक पुत्र।
संज्ञा
[सं.]

पोष्यौ
पालन किया, पाला, पाला-पोषा।
उ.- वैसी आपदा तैं राख्यौ, तोष्यौ, पोष्यौ, जिय दयौ, मुख-नासिका नयन-सौन-पद पानि-१-७७।
क्रि. स.
[हिं. पोषना]

पोस
पालक के प्रति प्रेम।
संज्ञा
[सं. पोष]

पोसन
पालन, रक्षा।
उ.- यह अचरज है अति मेरे जिय, यह छाँड़न वह पोसन।
संज्ञा
[सं. पोषण]

पोसना
रक्षा करना, पालना।
क्रि. स.
[सं. पोषण]

पोसना
(पशु को) दाना-पानी देकर रखना।
क्रि. स.
[सं. पोषण]

पोस्त
छिलका।
संज्ञा
[फ़ा.]

पोस्त
चमड़ा।
संज्ञा
[फ़ा.]

पोस्त
अफीम के पौधे का डोंड़ा।
संज्ञा
[फ़ा.]

पोस्त
अफीम का पौधा।
संज्ञा
[फ़ा.]

पोस्ता
अफ़ीम का पौधा।
संज्ञा
[फ़ा. पोस्त]

पोस्ती
अफीमची।
वि.
[हिं. पोस्ता]

पोस्ती
आलसी।
वि.
[हिं. पोस्ता]

पोहत
पिरोता या गूँथता है।
उ.- सूर आजु लौं सुनी न देखी पोत सूतरी पोहत-३१२२।
क्रि. स.
[हिं. पोहना]

पोहना
पिरोना, गूँथना।
क्रि. स.
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोय + ना]

पोहना
छेड़ना।
क्रि. स.
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोय + ना]

पोहना
घुसाना, धँसाना।
क्रि. स.
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोय + ना]

पोहना
जड़ना, जमाना।
क्रि. स.
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोय + ना]

पोहना
पीसना, घिसना।
क्रि. स.
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोय + ना]

पोहना
रोटी बनाना या पकाना।
क्रि. स.
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोय + ना]

पोहना
घुसनेवाला, भेदनेवाला।
वि.

निर्निमेष
जो पलक न गिराये, जिसमें पलक न गिरे।
वि.

निर्पक्ष
पक्षपात-रहित।
वि.
[सं. निष्पक्ष]

निर्फल
व्यर्थ, फलरहित।
वि.
[सं. निष्फल]

निर्बंध
रूकावट।
संज्ञा
[सं.]

निर्बंध
हठ, आग्रह।
संज्ञा
[सं.]

निर्बल
बलहीन, कमजोर।
वि.
[सं.]

निर्बलता
कमजोरी, शक्तिहीनता।
संज्ञा
[सं.]

निर्बहना
पार या दूर होना।
क्रि. अ.
(सं. निर्बहन)

निर्बहना
क्रम निभना या उसका पालन होना।
क्रि. अ.
(सं. निर्बहन)

निर्बाण, निर्बान
मुक्ति, मोक्ष।
उ.- सोई तुम उपदेशहू जो लहैं पद निर्बान-२९२४।
संज्ञा
[सं. निर्वाण]

पोहि
पिरोकर, गूँथकर।
उ.- (क) सूर प्रभु उर लाइ लीन्हों प्रेम-गुन करि पोहि-पृ. ३५२ (८०)। (ख) अपने हाथ पोहि पहिरावत कान्ह कनक के मनियाँ-२८७९।
क्रि. स.
[हिं. पोहना]

पोहि
मलकर, लगाकर, पोतकर।
उ.- पहिले पूतना कपट करि आई स्तननि विष पोहि-२५१५।
क्रि. स.
[हिं. पोहना]

पोहि
घुसाकर धँसाकर।
उ.- सूरस्याम यह प्रान पियारी उर मैं राखी पोहि।
क्रि. स.
[हिं. पोहना]

पोहे
पिरोये हैं, गूँथे हैं।
उ.- लटकन लटकि रहे भ्रू-ऊपर, रँग-रँग मनि-गन पोहे री। मानहुँ गुरू-सनि-सुक्र एक ह्वै, लाल भाल पर सोहै री-१०-१३९।
क्रि. स.
[हिं. पोहना]

पौंडा
मोटा गन्ना।
संज्ञा
[सं. पौंड्रक]

पौंड्र
भीम के शंख का नाम।
संज्ञा
[सं.]

पौंढ़ना
लेटना।
क्रि. स.
[हिं. पौंढ़ना]

पौंड्रक
पुँड्र देश का राजा जो जरासंध का संबंधी था।
संज्ञा
[सं.]

पौंड्रक
भीम के शंख का नाम।
उ.- तछक धनंजय देवदत्त अरू पौंड्रक शंख द्युमान-सारा. ९।
संज्ञा
[सं.]

पौंढ़ि
लेटकर।
उ.- मुरली तऊ गुपालहिं भावति।¨¨¨। आपुन पौढ़ि अधर सज्जा पर, कर-पल्लव पलुटावति-६५५।
क्रि. अ.
[हिं. पौंढ़ना]

पौंरना
तैरना।
क्रि. अ.
[सं. प्लवन]

पौंरि
द्वार, ड्योढ़ी।
संज्ञा
[हिं. पौरी]

पौंरिया
द्वारपाल।
उ.- निदरि पोरिया जाय नृप पैं पुकारे-२६११।
संज्ञा
[हिं. पौरिया]

पौ
प्याऊ, पौसाला।
संज्ञा
[सं. प्रया, प्रा. पवा]

पौ
किरण, ज्योति।
संज्ञा
[सं. प्रभा, प्रा. पव, पउ]

पौ
पौ फटना- सबेरा या तड़का होना।
मु.

पौ
पाँसे की एक चाल या दाँव। पाँसा फेकने पर जब ताक या दस, पचीस, तीस आते हैं तब पौ होती है।
उ.- बाल, किसोर, तरून, जर, जुग सो सुपक सारि ढिग ढारी। सूर एक पौ नाम बिना नर पिरि फिरि बाजी हारी-१-६०।
संज्ञा
[सं. पट, प्रा. पव=कदम, डग]

पौ
पौ बारह पड़ना- जीत का दाँव आना। पौ बारह होना- जीत का दाँव पड़ना, जीत होना।
मु.

पौ
पैर।
संज्ञा
[सं. पाद, प्रा. पाय, पाव]

पौगंड
५ से १० वर्ष की आयु।
संज्ञा
[सं.]

पौढ़त
लेटते हैं, सोते हैं।
उ.- सेसनाग के ऊपर पौढ़त, तेतिक नाहिं बढ़ाई-२१५।
क्रि. अ.
[हिं. पौंढ़ना]

पौढ़ना
झूलना।
क्रि. अ.
[सं. प्लवन, प्रा. पव्वलन]

पौढ़ना
लेटना, सोना।
क्रि. अ.
[सं. प्रलोठन]

पौढ़ाई
लिटाकर।
उ.- सूर स्याम कछु करौ बियारी, पुनि राखौं पौढ़ाइ-१०-२२६।
क्रि. स.
[हिं. पौढ़ाना]

पौढ़ाऊँ
लिटाकर, सुलाऊँ।
उ.- उठहु लाल कहि मुख पखरायौ, तुमकौं लै पौढ़ाऊँ-१०-२३०।
क्रि. स.
[हिं. पौढ़ाना]

पौढ़ाए
लिटाये, लिटा दिये।
उ.- पौढ़ाए हरि सुभग पालनैं-१०-५०।
क्रि. स.
[हिं. पौढ़ाना]

पौढ़ाना
लिटाना, सुलाना।
क्रि. स.
[हिं. पौढ़ना]

पौढ़ायौ
लेटाया।
उ.- चंदन अगर सुगंध और घृत, बिधि करि चिता बनायौ। चले बिमान संग गुरू-पुरजन, तापर नृप पौढ़ायौ-९-५०।
क्रि. स.
[हिं. पौढ़ाना]

पौढ़ी
लेटी।
उ.- मैं घर पौढ़ी आइ-१०-३२२।
क्रि. अ.
[हिं. पौढ़ना]

पौढ़े
लेटे, सोए।
उ.- (क) तुरत जाइ पौढ़े दोउ भैया-१०-२३०। (ख) पौढ़े हुते प्रयंक परम रूचि रूक्मिणि चमर डुलावति तीर-।
क्रि. अ.
[हिं. पौढ़ना]

पौढ़े
मूर्छित हुए, मरकर गिर पड़े।
उ.- पौढ़ै कहा समर सेज्या सुत, उठि किन उत्तर देत-१-२९।
क्रि. अ.
[हिं. पौढ़ना]

पौत्र
लड़के का लड़का।
संज्ञा
[सं.]

पौद, पौधि
छोटा पौधा।
संज्ञा
[सं. पोत]

पौद, पौधि
संतान।
संज्ञा
[सं. पोत]

पौद, पौधि
पाँवड़ा, पायंदाज।
संज्ञा
[हिं. पावँ + पट]

पौदा, पौधा
नया पौधा।
संज्ञा
[सं. पोत]

पौन, पौना
पवन, वायु।
उ.- (क) द्वार सिला पर पटकि तृना कौं ह्वै आयौ जो पैना-६०१। (ख) रूकत न पौन महावत हू पै मुरत न अंकुस मोरे-२८१८।
संज्ञा
[सं. पवन]

पौन, पौना
प्राण, जीवात्मा।
उ.- सोइ कीजो जैसे ब्रजबाला साधन सीखे पौन-२९२५।
संज्ञा
[सं. पवन]

पौन, पौना
भूत-प्रेत।
संज्ञा
[सं. पवन]

पौन, पौना
तीन-चौथाई।
वि.
[सं. पाद + ऊन, प्रा. पाओन]

पौनार, पौनारि
कमल-नाल।
संज्ञा
[सं. पद्मनाल]

पौनि, पौनी
गाँव के जिन्हें फसल पर अनाज मिलता है।
संज्ञा
[हिं. पावना]

पौनि, पौनी
नाई, बारौ, धोबी आदि जो उत्सवों या शुभ कार्यो में नेग पाते हैं।
उ.- काढौ कोरे कापर हो अरू काढ़ौ घी के मौन। जाति पाँति पहिराइ कै सब समदि छतीसौ पौनि।
संज्ञा
[हिं. पावना]

पौने
तीन चौथाई।
वि.
[हिं. पौन]

पौने
पौने सोलह आना- अधिकांश में।
मु.

पौमान
वायु।
संज्ञा
[सं. पवमान]

पौमान
जलाशय।
संज्ञा
[सं. पवमान]

पौर
पुर या नगर-संबंधी।
वि.
[सं.]

पौर
द्वार, ड्योढ़ी।
उ.- कनक कलस प्रति पौर बिराजत मंगलचार बधाई-सारा. २५।
संज्ञा
[हिं. पौरी]

पौरा
पड़े हुए चरण, आगमन।
संज्ञा
[हिं. पैर]

पौराणिक
पुराण का पाठक या पंडित।
वि.
[सं.]

पौराणिक
पुराण-संबंधी।
वि.
[सं.]

पौराणिक
पूर्वकाल का।
वि.
[सं.]

पौरि
ड्योढ़ी, द्वार।
उ.- (क) राजा, इक पंडित पौरि तुम्हारी-८-१३। (ख) पैठत पौरि छींक भइ बाएँ-५४१।
संज्ञा
[सं. प्रतोली, प्रा. पओली, हिं. पौरी]

पौरिआ, पौरिया
द्वारपाल, ड्योढ़ी- दार, दरबान।
उ.- अर्थ-काम दोउ रहैं दुवारै, धर्म मोक्ष सिर नावैं। बुद्धि विवेक, बिचित्र पौरिया, समय न कबहूँ पावैं-१-४०।
संज्ञा
[हिं. पौरि]

पौरी
ड्योढ़ी।
संज्ञा
[सं. प्रतोली, प्रा. पओली]

पौरुष
पुरूष का भाव, पुरूषत्व।
संज्ञा
[सं.]

पौरुष
पुरूष का कर्म, पुरूषार्थ।
संज्ञा
[सं.]

पौरुष
बलवीर्य, पराक्रम, साहस।
उ.- अति प्रचंड पौरूषबल पाएँ, केहरि भूख मरै-१-१०५।
संज्ञा
[सं.]

पौरुष
उद्यम, साहस।
संज्ञा
[सं.]

पौलस्त्य
पुलस्त्य का वंशज।
संज्ञा
[सं.]

पौलस्त्य
कुबेर।
संज्ञा
[सं.]

पौलस्त्य
रावण, कुंभकर्ण, विभीषण।
संज्ञा
[सं.]

पौलस्त्य
चंद्र।
संज्ञा
[सं.]

पौला
खड़ाऊँ जिसमें खूँटी के स्थान पर अँगूठा फंदे मे फँसाया जाता है।
संज्ञा
[हिं. पावँ + ला]

पौलि, पौली
रोटी, फुलका।
संज्ञा
सं.

पौलि, पौली
पैर का उतना भाग जिसमें जूता या खड़ाऊँ पहनते हैं।
संज्ञा
[हिं. पाँव + ली]

पौलि, पौली
चरण-चिन्ह।
संज्ञा
[हिं. पाँव + ली]

पौलि, पौली
ड्योढ़ी, द्वार।
संज्ञा
[हिं. पौरी]

पौवा
चौथाई भाग।
संज्ञा
[सं. पाद, हिं. पाव]

पौष
पूस का महीना।
संज्ञा
[सं.]

पौष्टिक
बल-वीर्य-वर्द्धक, पुष्टिकारक।
वि.
[सं.]

पौसेरा
पाव सेर की तौल।
संज्ञा
[हिं. पाव + सेर]

पौहारी
दूध पीकर रहनेवाला।
संज्ञा
[हिं. पय + आहारी]

प्याइ
पिलाकर।
क्रि. स.
[हिं. प्याना]

प्याई
पिलायी, पान करायी।
क्रि. स.
[हिं. प्याना]

प्याऊँ
पान कराऊँ।
उ.- असुर कौं सुरा, तुम्हैं अमृत प्याऊँ-८-८।
क्रि. स.
[हिं. प्याना]

प्याऊ
पौसरा, पौसाला।
संज्ञा
[हिं. प्याना]

प्याए
पिलाने से, पिला देने के कारण।
उ.- ऐरावत अमृत कैं प्याए, भयौ सचेत, इन्द्र तब धाए-६-५।
क्रि. स.
[हिं. प्याना]

प्याज
एक प्रसिद्ध कंद।
संज्ञा
[फ़ा.]

प्याजी
प्याज के हलके गुलाबी रंग का।
वि.
[फ़ा.]

प्यादा
पैदल, पैदल सिपाही
संज्ञा
[फ़ा.]

प्यादा
दूत, हरकारा।
संज्ञा
[फ़ा.]

प्यादा
शतरंज की एक गोट।
संज्ञा
[फ़ा.]

प्याना
पान कराना।
क्रि. स.
[हिं. पिलाना]

प्यार
प्रेम, प्रीति।
उ.- नृप ऐसौ है पर-तिय प्यार। मूरख करे सो बिना बिचार-६-७।
संज्ञा
[सं. प्रीति]

प्यार
चुंबन।
संज्ञा
[सं. प्रीति]

प्यारा
प्रेम या प्रीति पात्र।
वि.
[सं. प्रिय]

प्यारा
जो अच्छा लगे।
वि.
[सं. प्रिय]

प्यारा
जो छोड़ा या त्यागा न जाय।
वि.
[सं. प्रिय]

प्यारि, प्यारी
प्यारी पुत्री या सखी।
उ.- मैं बरजी कहँ जाति री प्यारी, तब खीझी रिस-झरतैं -७४४।
वि.
[हिं. पुं. प्यास]

प्यारि, प्यारी
प्रेयसी।
वि.
[हिं. पुं. प्यास]

प्यारि, प्यारी
जो भली लगे, जो अच्छी जान पड़े।
उ.- बिधु-मुख मृदु मुसक्यानि अमृत-सम, सकल लोक लोचन प्यारी-१-९९।
वि.
[हिं. पुं. प्यास]

प्यारे
भले, अच्छे, रूचिकर।
उ.- फेनी सेव अँदरसे प्यारे-३९६।
वि.
[हिं. प्यारा]

प्यारौ
प्रिय, प्रेमपात्र।
उ.- ब्राह्मन हरि हरि-भक्तिन प्यारौ-९-५।
वि.
[हिं. प्यारा]

प्यारौ
जिसे छोड़ा न जा सके, अत्यन्त प्रिय।
उ.- ठाढ़े बदत बात सब हलधर, माखन प्यारौ तोहि-१०-३७५।
वि.
[हिं. प्यारा]

प्याला
छोटा कटोरा।
संज्ञा
[फ़ा.]

प्याला
भिक्षापात्र।
संज्ञा
[फ़ा.]

प्यावत
पान कराता है।
उ.- मधुपनि प्यावत परम चैन-१९७७।
क्रि. स.
[हिं. प्यावना]

प्यावन
पिलाना, पिलाने को।
उ.- (क) चारू चखौड़ा पर कुंचित कच, छबि मुक्ता ताहू मैं। मनु मकरंद-बिंदु लै मधुकर, सुत-प्यावन-हित झूमै-१०-१७४। (ख) बकी कपट करि प्यावन आई-५३८।
संज्ञा
[हिं. प्यावना]

निभृत
रखा या धरा हुआ।
वि.
[सं.]

निभृत
अटल, निश्चल।
वि.
[सं.]

निभृत
छिपा हुआ।
वि.
[सं.]

निभृत
बंद किया हुआ।
वि.
[सं.]

निभृत
विनीत, नम्र।
वि.
[सं.]

निभृत
शांत, धीर।
वि.
[सं.]

निभृत
निर्जन, एकांत।
वि.
[सं.]

निभृत
पूर्ण, युक्त।
वि.
[सं.]

निभ्रांत
भ्रमरहित।
वि.
[सं. निर्भ्रात]

निमंत्रण
बुलावा, आह्वान।
संज्ञा
[सं.]

निर्बाध, निर्बाधित
बाधारहित।
वि.
[सं.]

निर्बाह
निश्चय के अनुसार किसी बात का पालन।
उ.- भक्ति-भाव की जो तोहिं चाह। तोसौं नहिं ह्वैहै निर्बाह-४-९।
संज्ञा
[सं. निर्वाह]

निर्बिष
विषरहित।
उ.-अति बल करि करि काली हार्यौ। लपाटि गयौ सब अंग-अंग प्रति, निर्बिष कियौ सकल बल झार्यौ-५७४।
वि.
[सं. निर्विष]

निर्बीर
वीर्यहीन, निस्तेज।
उ.-जे जे जात, परत ते भूतल, ज्यौं ज्वाला-गत चीर। कौन सहाइ, जानियत नाहीं, होत बीर निर्बीर-१-२६९।
वि.
[सं. निर्विर्य]

निर्बुद्धि
बुद्धिहीन, मूर्ख।
वि.
[सं.]

निर्बेद
विरक्ति या वैराग्य नामक एक संचारी भाव।
उ.-सूरज प्रभु ते कियो चाहियत है निर्बेद बिसेषी-सा. ४६।
संज्ञा
(सं. निर्वेद)

निर्बोध
अनजान, अज्ञान।
वि.
[सं.]

निर्भय
जिसे कोई डर न हो, निडर।
वि.
[सं.]

निर्भयता
निडरता।
संज्ञा
[सं.]

निर्भर
भरा-पूरा, पूर्ण।
वि.
[सं.]

प्यावना
पान कराना।
क्रि. स.
[हिं. पिलाना]

प्यास
जल पीने की इच्छा, तृष्णा, पिपासा।
संज्ञा
[सं. पिपासा]

प्यास
प्रबल कामना।
उ.- कहै सूरदास, देखि नैनन की मिटी प्यास-८-५।
संज्ञा
[सं. पिपासा]

प्यासा
जिसे प्यास लगी हो, तृषित।
वि.
[सं. पिपासित]

प्यासा
तीव्र इच्छा रखनेवाला।
वि.
[सं. पिपासित]

प्यो
पति।
संज्ञा
[हिं. पिय]

प्यो
प्रेमी।
संज्ञा
[हिं. पिय]

प्योसर, प्यौसर
हाल की ब्याही गाय का दूध।
उ.- अति प्यौसर रसर बनाई। तिहिं सोंठ मिरिच रूचि नाई-१०-१८३।
संज्ञा
[सं. पीयूष]

प्योसार, प्यौसारो, प्योसार, प्यौसारौ
पिता-गृह, मायका, पीहर, नैहर।
उ.- (क) परत फिराय पयोनिधि भीतर सरिता उलटि बहाई। मनु रघुपति भयभीत सिंधु पत्नी प्योसार पठाई-९-१२४। (ख) तजी लाज कुल-कानि लोक की, पति गुरूजन प्यौसारी री। जिनकी सकुच देहरी दुर्लभ, तिनमैं मूड़ उघारौ री-१०-१३५।
संज्ञा
[सं. पितृशाला, हिं. प्योसार]

प्रकंप, प्रकंपन
थरथराहट। कंपन।
संज्ञा
[सं.]

प्रकट
जो सामन आया या प्रत्यक्ष हुआ हो।
वि.
[सं.]

प्रकट
उत्पन्न।
वि.
[सं.]

प्रकट
स्पष्ट, ब्यक्त।
वि.
[सं.]

प्रकटित
प्रकट किया हुआ।
वि.
[सं.]

प्रकरण
उत्पन्न करना।
संज्ञा
[सं.]

प्रकरण
वाद-विवाद।
संज्ञा
[सं.]

प्रकरण
विषय, प्रसंग।
संज्ञा
[सं.]

प्रकरण
ग्रंथ का छोटा भाग।
संज्ञा
[सं.]

प्रकरण
रूपक के दस भेदों में एक।
संज्ञा
[सं.]

प्रकरी
एक तरह का गान
संज्ञा
[सं.]

प्रकरी
कार्य-सिद्धि के पाँच साधनों में एक (नाटक)।
संज्ञा
[सं.]

प्रकर्ष
उत्तमता।
संज्ञा
[सं.]

प्रकर्ष
अधिकता।
संज्ञा
[सं.]

प्रकांड
बहुत बड़ा।
वि.
[सं.]

प्रकांड
बहुत विस्तृत।
वि.
[सं.]

प्रकार
भेद, किस्म।
उ.- विस्वा-मित्र सिखाई बहु बिधि विद्या धनुष प्रकार- सारा. २०३।
संज्ञा
[सं.]

प्रकार
तरह, भाँति।
संज्ञा
[सं.]

प्रकार
समानता, बराबरी।
संज्ञा
[सं.]

प्रकार
घरा, परकोटा।
उ.-जान्यौ नहीं निसाचर कौ छल, नाध्यौ धनुष-प्रकार-९-८३।
संज्ञा
[सं. प्राकार]

प्रकारन
अनेक प्रकार सै।
उ.-पेठा बहुत प्रकारन कीने-२३२१।
क्रि. वि.
[हिं. प्रकार]

प्रकारौ
भेद से।
संज्ञा
[सं. प्रकार]

प्रकारौ
रोति से, भाँति से, तरह से।
उ.-यह भव-जल कलि-मलहिं गहे है, बोरत सहस प्रकारौ-१-२०९।
संज्ञा
[सं. प्रकार]

प्रकाश
आलोक, ज्योति।
संज्ञा
[सं.]

प्रकाश
विकास, विस्तार।
संज्ञा
[सं.]

प्रकाश
प्रकट होना, दिखाई देना।
संज्ञा
[सं.]

प्रकाश
प्रसिद्धि।
संज्ञा
[सं.]

प्रकाश
स्पष्ट होना, समझ में आना।
संज्ञा
[सं.]

प्रकाश
हँसी-ठट्ठा।
संज्ञा
[सं.]

प्रकाश
ग्रंथ का छोटा भाग।
संज्ञा
[सं.]

प्रकाश
धुप, घाम।
संज्ञा
[सं.]

प्रकाश
जगमगाता हुआ।
वि.

प्रकाश
विकसित।
वि.

प्रकाश
प्रकट।
वि.

प्रकाश
प्रसिद्धि।
वि.

प्रकाश
स्पष्ट।
वि.

प्रकाशक
प्रकाश करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रकाशक
प्रसिद्ध या प्रकट करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रकाशन
प्रकाशित करने का काम।
संज्ञा
[सं.]

प्रकाशित
चमकता हुआ।
वि.
[सं.]

प्रकाशित
जो प्रकाश में आ चुका हो।
वि.
[सं.]

प्रकाशित
प्रकट, स्पष्ट।
वि.
[सं.]

प्रकाश्य
प्रकट रूप से, जो स्वगत न हो।
क्रि. वि.
[सं.]

प्रकास
प्रकाश।
संज्ञा
[सं. प्रकाश]

प्रकास
विस्तार, विकास।
उ.-अबहीं हैं यह हाल करत है, दिन-दिन होत प्रकास-१०-६०।
संज्ञा
[सं. प्रकाश]

प्रकासत
जलाता है।
उ.-तेल-तुल-पावक-पुट भरि धरि, बनै न बिना प्रकासत। कहत बनाइ दीप की बतियाँ, कैसें धौं तम नासत-२-२५।
क्रि. स.
[सं. प्रकाश]

प्रकासत
प्रकाश करता है, चमकता है।
उ.-घन भीतर दामिनी प्रकासत, दामिनि घन चंहुँ पास-१६३७।
क्रि. स.
[सं. प्रकाश]

प्रकासित
प्रकाशपूर्ण, चमकता हुआ।
उ.-अंधकर अज्ञान हरन कौं, रबि- ससि जुगल-प्रकास। बासर-निसि दोउ करैं प्रकासित महा कुमग अनायास -१-९०।
वि.
[सं. प्रकाशित]

प्रकासित
जिसमें से प्रकाश निकल रहा हो।
वि.
[सं. प्रकाशित]

प्रकासित
जिस पर प्रकाश पड़ रहा हो।
वि.
[सं. प्रकाशित]

प्रकासी
प्रकट की, प्रकाशित की।
उ.-हृदय कमल में ज्योति प्रकासी-३४०८।
क्रि. स.
[हिं. प्रकासना]

प्रकास्यो
प्रकट किया।
उ.-जब हरि मुरली नाद प्रकास्यौ-पृ ३४७ (५२)।
क्रि. स.
[हिं. प्रकासना]

प्रकीर्ण
विस्तृत।
वि.
[सं.]

प्रकीर्ण
बिखरा हुआ।
वि.
[सं.]

प्रकीर्ण
मिश्रित, मिला हुआ।
वि.
[सं.]

प्रकीर्ण
अनेक प्रकार का।
वि.
[सं.]

प्रकीर्णक
चँवर।
संज्ञा
[सं.]

प्रकीर्णक
अध्याय।
संज्ञा
[सं.]

प्रकीर्णक
विस्तार।
संज्ञा
[सं.]

प्रकीर्णक
स्फुट संग्रह।
संज्ञा
[सं.]

प्रकृत
विशेष रूप से किया हुआ।
वि.
[सं.]

प्रकृत
यथार्थ, सच्चा।
वि.
[सं.]

प्रकृत
अविकृत।
वि.
[सं.]

प्रकृत
स्वभाववाला।
वि.
[सं.]

प्रकृति
गुण, स्वभाव।
संज्ञा
[सं.]

प्रकृति
प्राणी का स्वभाव।
उ.-कोटि करौ तनु प्रकृति न जाइ-२६७९।
संज्ञा
[सं.]

प्रकृति
आदत, बान।
उ.- कहा गति प्रकृति परी हो कान्ह तुम्हारी धरत कहा कत राखत घेरे-१०३९।
संज्ञा
[सं.]

प्रकृति
जगत का उपादान कारण, कुदरत।
संज्ञा
[सं.]

प्रकृतिस्थ
जो स्वाभाविक स्थिति में हो।
वि.
[सं.]

प्रकोट
परकोटा, चहारदीवारी।
संज्ञा
[सं.]

प्रकोप
बहुत क्रोध।
संज्ञा
[सं.]

प्रकोप
चंचलता।
संज्ञा
[सं.]

प्रकोपन
उत्तेजित करना।
संज्ञा
[सं.]

प्रकोपन
क्षोभ।
संज्ञा
[सं.]

प्रकोष्ठ
कोहनी के नीचे का भाग।
संज्ञा
[सं.]

प्रकोष्ठ
कोठा, कमरा।
संज्ञा
[सं.]

प्रकोष्ठ
बड़ा आँगन।
संज्ञा
[सं.]

प्रक्रिया
क्रिया, युक्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रक्षालन
धोना।
संज्ञा
[सं.]

प्रक्षालित
धोया हुआ।
वि.
[सं.]

प्रक्षिप्त
फेंका हुआ।
संज्ञा
[सं.]

प्रक्षिप्त
पीछे या ऊपर से बढ़ाया या जोड़ा गया।
संज्ञा
[सं.]

प्रक्षेप
फेंकना।
संज्ञा
[सं.]

प्रक्षेप
मिलाना , बढ़ाना।
संज्ञा
[सं.]

प्रखर
प्रचंड।
वि.
[सं.]

प्रखर
पैना, धारदार।
वि.
[सं.]

प्रखरता
प्रचंडता।
संज्ञा
[सं.]

प्रखरता
पैनापन।
संज्ञा
[सं.]

प्रख्यात
प्रसिद्धि,विख्याति।
वि.
[सं.]

प्रख्याति
प्रसिद्धि,विख्याति।
संज्ञा
[सं.]

प्रगट
जो सामने आया हो, जो प्रत्यक्ष हुआ हो।
वि.
[सं. प्रकट]

निर्धार, निर्धारण
निश्चित, निर्णय।
संज्ञा
[सं.]

निर्धार, निर्धारण
गुण कर्म आदि के विचार से छाँटना या अलग करना।
संज्ञा
[सं.]

निर्धारक
निश्चय करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

निर्धारना
निश्चित करना।
क्रि. स.
[सं. निर्धारण]

निर्धारित
स्थिर या निश्चित किया हुआ।
वि.
[सं.]

निर्धूत
धोया हुआ।
वि.
[सं.]

निर्धूत
खंडित।
वि.
[सं.]

निर्धूत
त्यक्त।
वि.
[सं.]

निर्धूम
आग जिसमें धुआँ न हो।
उ.- (क) नई दोहनी पोंछि पखारी धरि निर्धूम खीरनि पर तायो-११७९। (ख) मनहुँ धुईं निर्धूम अग्नि पर तप बैठे त्रिपुरारी-१६८९।
वि.
[हिं. निः + धूम]

निर्निमेष
बिना पलक झपकाये।
क्रि. वि.
[सं.]

प्रगट
उत्पन्न, आविर्भूत।
उ.- भीर के परे तैं धीर सबहिनि तजी, खंभ तैं प्रगट ह्वै जन छुड़ायौ-१-५।
वि.
[सं. प्रकट]

प्रगट
स्पष्ट या प्रत्यक्ष रूप से।
उ.- (क) हा जगदीस, राखि इहिं अवसर, प्रगट पुकारि कह्यौ-१-२४७। (ख) मोसौं कहिं तू प्रगट बखान-१-२८६।
वि.
[सं. प्रकट]

प्रगटन
संज्ञा
[सं. प्रकटन]

प्रगटना
प्रकट होना।
क्रि. अ.
[सं. प्रकटन]

प्रगटाना
प्रकट करना।
क्रि. स.
[सं. प्रकटन]

प्रगटाने
प्रकट या स्पष्ट हो गये।
उ.- सुनहु सूर लोचन बटमारी गुन जोइ सोइ प्रगटाने -पृ. ३२६ (५६)।
क्रि. अ.
[सं. प्रकटन]

प्रगटान्यौ
सामने आयी, व्यक्त हुई।
उ.- प्रथम सनेह दुहुँनि मन जान्यौ। नैन-नैन कीन्हीं सब बातैं, गुप्त प्रीति प्रगटान्यौ।
क्रि. अ.
[हिं. प्रगटना]

प्रगटायो
प्रकट किया।
उ.- प्रेम प्रवाह प्रगट प्रगटायो होरी खेलन लागे-सारा. ३०९।
क्रि. स.
[हिं. प्रगटना]

प्रगटावत
प्रकट करते हैं।
उ.- बदन कमल उपमा यह साँची ता गुन को प्रगटावत-१९७६।
क्रि. स.
[हिं. प्रगटना]

प्रगटि
प्रत्यक्ष होकर।
उ.- माया प्रगटि सकल जग मोहै-१०-३।
क्रि. अ.
[हिं. प्रगटाना]

प्रगल्भ
बकवादी, बातूनी।
वि.
[सं.]

प्रगल्भ
धृष्ट, उद्धत।
वि.
[सं.]

प्रगल्भ
अभिमानी।
वि.
[सं.]

प्रगल्भता
चतुरता।
संज्ञा
[सं.]

प्रगल्भता
प्रतिभा।
संज्ञा
[सं.]

प्रगल्भता
उत्साह।
संज्ञा
[सं.]

प्रगल्भता
निर्भयता।
संज्ञा
[सं.]

प्रगल्भता
बकवाद।
संज्ञा
[सं.]

प्रगल्भता
धृष्टता, उद्धतता।
संज्ञा
[सं.]

प्रगल्भता
अभिमान।
संज्ञा
[सं.]

प्रगटी
प्रसिद्ध हो गयी।
उ.- ब्रज घर घर प्रगटी यह बात-१०-२७२।
क्रि. अ.
[हिं. प्रगटना]

प्रगटी
उपजी, उत्पन्न हुई।
उ.- सूरदास कुंजनि तैं प्रगटी, चेरि सौत भई आइ-६५६।
क्रि. अ.
[हिं. प्रगटना]

प्रगटे
प्रकट हुए, अवतरे।
उ.- संकट हरन-चरन हरि प्रगटे, बेद बिदित जस गावै-१-३१।
क्रि. अ.
[हिं. प्रगटना]

प्रगटैहै
प्रकट या जाहिर करेगी।
उ.- बिनु देखें तू कहा करैगी, सो कैसैं प्रगटै है री-७११।
क्रि. अ.
[हिं. प्रकटना]

प्रगट्यौ
प्रकट हुआ, सामने आया, प्रत्यक्ष हुआ।
उ.- नहिं असजनम बारंबार। पुरबलौ धौं पुन्य प्रगटयौ, लह्यौ नर अवतार-१८८।
क्रि. अ.
[हिं. प्रगटना]

प्रगट्यौ
प्रसिद्ध हुआ, फैल गया।
उ.- सूरदास प्रभु कौ जस प्रगट्यौ, देवनि बंदि छुड़ाई-९-१४०।
क्रि. अ.
[हिं. प्रगटना]

प्रगल्भ
चतुर।
वि.
[हिं. प्रगटना]

प्रगल्भ
प्रतिभासंपन्न।
वि.
[सं.]

प्रगल्भ
उत्साही।
वि.
[सं.]

प्रगल्भ
निर्भय।
वि.
[सं.]

प्रगसना
प्रकट होना।
क्रि. अ.
[सं. प्रकाश]

प्रगाढ़
बहुत अधिक।
वि.
[सं.]

प्रगाढ़
बहुत गाढ़ा।
वि.
[सं.]

प्रघटना
प्रकट होना।
क्रि. अ.
[सं.]

प्रघट्टक
प्रकट या प्रकाशित करनेवाला।
वि.
[सं. प्रकटना]

प्रचंड
बहुत तेज या तीखा।
वि.
[सं. प्रकट]

प्रचंड
बहुत वेगवान।
वि.
[सं.]

प्रचंड
भयंकर।
वि.
[सं.]

प्रचंड
कठोर।
वि.
[सं.]

प्रचंड
बलवान।
वि.
[सं.]

प्रचंडता
तेजी, तीखापन।
संज्ञा
[सं.]

प्रचंडता
वेग।
संज्ञा
[सं.]

प्रचंडता
भयंकरता।
संज्ञा
[सं.]

प्रचंडता
कठोरता।
संज्ञा
[सं.]

प्रचरना
प्रचारित होना।
क्रि. अ.
[सं.]

प्रचलन
चलन, प्रचार।
संज्ञा
[सं. प्रचार]

प्रचलित
जिसका चलन हो।
वि.
[सं.]

प्रचार
चलन, रिवाज।
संज्ञा
[सं.]

प्रचार
प्रसिद्ध।
संज्ञा
[सं.]

प्रचारक
प्रचार करनेवाला।
वि.
[सं.]

प्रचारना
प्रचार करना , फैलाना।
क्रि. स.
[सं. प्रचारण]

प्रचारना
ललकारना, चुनौती देना।
क्रि. स.
[सं. प्रचारण]

प्रचारि
ललकार कर, सामने बुला कर, चुनौती देकर।
उ.- (क) मार्यौ ताहि प्रचारि हरि, सुर मन भयौ हुलास-१-११। (ख) एक समय सुर असुर प्रचारि। लरे, भई असुरनि की हारि -७-७।
क्रि. स.
[हिं.] प्रचारण]

प्रचारित
जिसका प्रचार हुआ हो।
वि.
[सं.]

प्रचारी
ललकार कर।
उ.- प्रद्युम्न सकल विद्या समुझि नारि सों, असुर सों जुद्ध माँग्यौ प्रचारी-१० उ.- २५।
क्रि. अ.
[हिं. प्रचारना]

प्रचारी
प्रारम्भ किया।
उ.- बृक्ष पाषाण को जब वहाँ नाश भयो, मुष्टिका-युद्ध दोऊ प्रचारी-१० उ.- ४५।
क्रि. स.

प्रचार्यौ
ललकारा, सामना करने के लिए बुलाया।
उ.- इंद्र आइ तब असुर प्रचार्यौ। कियौ जुद्ध पै असुर न हार्यौ।
क्रि. स.
[हिं. प्रचारना]

प्रचालित
जिसका प्रचलन हुआ हो।
वि.
[सं.]

प्रचुर
बहुत, अधिक।
वि.
[सं.]

प्रचुरता
अधिकता, विपुलता।
संज्ञा
[सं.]

प्रचेता
चतुर, बुद्धिमान।
वि.
[सं.]

प्रच्छक
प्रश्न पूछनेवाला।
वि.
[सं.]

प्रच्छना
प्रश्न पूछना।
क्रि. स.
[सं.]

प्रच्छन्न
छिपा या ढका हुआ।
वि.
[सं.]

प्रच्छादन
ढकने या छिपाने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

प्रच्छादन
आँख का पलँक।
संज्ञा
[सं.]

प्रच्छादन
ओढ़ने का वस्त्र।
संज्ञा
[सं.]

प्रछालि
प्रक्षालित करके, अच्छी तरह स्वच्छ करके।
उ.- त्रियाचरित मतिमंत न समुझत, उठि प्रछालि मुख धोवत-९-३१।
क्रि. वि.
[सं. प्रक्षालन]

प्रजंक
पलँग।
उ.- षोड़स जुक्ति, जुवति चित षोड़स, षोढ़स बरस निहारै। षोड़स अंगनि मिलि प्रजंक पै छ-दस अंक फिरि डारै-१-६०।
संज्ञा
[सं. प्रयंक]

प्रजंत
तक, लौं।
उ.- (क) प्राचीन-बर्हि भूप इक भए। आयु प्रजंत जज्ञ तिन ठए-४-१२। (ख) नाभि प्रजंत नीर मै ठाढ़ी, थऱ-थर अँग काँपति सुकुमारि-७८५।
अव्य.
[सं. पर्यंत]

प्रजा
छोटी जातियों के लोग जो वेतन न लेकर शुभ कार्यों में उपहार पाकर सेवा करते हैं।
संज्ञा
[सं.]

प्रजापति
सृष्टि का उत्पादक, सृष्टिकर्त्ता। पुराणों में इनकी संख्या कहीं दस और कहीं इक्कीस लिखी हुई है।
संज्ञा
[सं.]

प्रजापति
ब्रह्मा।
संज्ञा
[सं.]

प्रजारन
अच्छी तरह जलाना, सुलगाना।
संज्ञा
[हिं. प्रजारना]

प्रजारन
प्रजारन लागे - जलाने लगे।
उ.- सोभित सिथिल बसन मनमोहन, सुखवत स्त्रम के पागे। मानहुँ बुझी मदन की ज्वाला, बहुरि प्रजारन लागे-६८६।
प्र.

प्रजारना
जलाना, सुलगाना।
क्रि. स.
[सं. प्र + जारना]

प्रजुलित
जलता दहकता हुआ।
वि.
[सं. प्रज्वलित]

प्रज्ञ
ज्ञाता, विद्वान।
संज्ञा
[सं.]

प्रज्ञता
विद्वता, पांडित्य।
संज्ञा
[सं.]

प्रज्ञा
बुद्धि।
संज्ञा
[सं.]

प्रजनन
संतान उत्पन्न करना।
संज्ञा
[सं.]

प्रजनन
जन्म।
संज्ञा
[सं.]

प्रजनन
जन्म देनेवाला, जनक।
संज्ञा
[सं.]

प्रजरना
जलता, दहकना।
क्रि. अ.
[सं. प्र + हिं. जरना]

प्रजरि
जलकर।
उ.- बूड़ि न मुई नीर नैनन के, प्रेम न प्रजरि पची री-१० उ.-८६।
क्रि. अ.
[हिं. प्रजरना]

प्रजल्प
गप।
संज्ञा
[सं.]

प्रजल्प
संलाप।
संज्ञा
[सं.]

प्रजल्पन
बातचीत।
संज्ञा
[सं.]

प्रजा
संतान।
संज्ञा
[सं.]

प्रजा
रियाया, रैयत।
उ.- बसन ए नृपति के जासु के प्रजा तुम-२५८४।
संज्ञा
[सं.]

प्रज्ञा
सरस्वती।
संज्ञा
[सं.]

प्रज्ञाचक्षु
ज्ञानी।
संज्ञा
[सं.]

प्रज्ञाचक्षु
अंधा (ब्यंग्य)।
संज्ञा
[सं.]

प्रज्वलन
जलना, सुलगना।
संज्ञा
[सं.]

प्रज्वलित
जलता हुआ।
वि.
[सं.]

प्रज्वलित
स्पष्ट।
वि.
[सं.]

प्रण
अटलनिश्चय, प्रतिज्ञा।
संज्ञा
[सं.पण]

प्रणत
बहुत झुका हुआ, नमित।
वि.
[सं.]

प्रणत
प्रणाम करता हुआ।
वि.
[सं.]

प्रणत
विनम्र, दीन।
वि.
[सं.]

निर्भर
मिला हुआ।
वि.
[सं.]

निर्भर
अवलंबित, आश्रित।
वि.
[सं.]

निर्भीक
निडर।
वि.
[सं.]

निर्भीकता
निडरता, निर्भरता।
संज्ञा
[सं.]

निर्भीत
निडर, निर्भय।
वि.
[सं.]

निभ्रम
भ्रम या शंकारहित।
वि.
[सं.]

निभ्रम
बेखटके, निसंकोच।
उ.-स्यामा स्याम सुभग जमुना-जल निर्भ्रम करत बिहार।
क्रि.वि.

निर्भ्रांत
भ्रम या संदेहरहित।
वि.
[सं.]

निर्मना
रचना, बनाना।
क्रि. स.
[सं. निर्माण]

निर्मम
जिसे दया-ममता न हो।
वि.
[सं.]

प्रणत
सेवक।
संज्ञा

प्रणत
भक्त, उपासक।
संज्ञा

प्रणतपाल, प्रणतपालक
दीनरक्षक।
उ.- प्रणतपाल केशव करूणापति-९८२।
संज्ञा
[सं.]

प्रणति
नम्रता।
संज्ञा
[सं.]

प्रणति
विनती।
संज्ञा
[सं.]

प्रणति
प्रणाम।
संज्ञा
[सं.]

प्रणम्य
प्रणाम करने योग्य।
वि.
[सं.]

प्रणय
प्रेम।
संज्ञा
[सं.]

प्रणय
विश्वास।
संज्ञा
[सं.]

प्रणयन
रचना, बनाना।
संज्ञा
[सं.]

प्रणयिनी
पत्नी।
संज्ञा
[सं.]

प्रणयिनी
प्रेमिका।
संज्ञा
[सं.]

प्रणयी
प्रेमी।
संज्ञा
[सं.]

प्रणयी
पति।
संज्ञा
[सं.]

प्रणव
ओंकार मंत्र।
संज्ञा
[सं. प्रणय]

प्रणव
त्रिदेव।
संज्ञा
[सं. प्रणय]

प्रणवना
प्रणाम करना।
क्रि. स.
[सं. प्रणमन]

प्रणाली
रीति, ढंग।
संज्ञा
[सं.]

प्रणाली
परंपरा।
संज्ञा
[सं.]

प्रणिधान
समाधि।
संज्ञा
[सं.]

प्रणिधान
ध्यान।
संज्ञा
[सं.]

प्रणिधि
गुप्तचर।
संज्ञा
[सं.]

प्रणिधि
निवेदन।
संज्ञा
[सं.]

प्रणीत
रचित।
वि.
[सं.]

प्रणीत
संस्कृत।
वि.
[सं.]

प्रणेता
रचयिता, कर्त्ता।
संज्ञा
[सं. प्रणेतृ]

प्रतंचा
धनुष की डोरी।
संज्ञा
[हिं. प्रत्यंचा]

प्रतच्छ
प्रत्यक्ष या स्पष्ट
उ.- कौसिल्या सुनि परम दीन ह्वै, नेन-नीर ढरकाए। विह्हल तन-मन, चकृत भई सो, यह प्रतच्छ सुपनाए-९-३१।
वि.
[सं. प्रत्यक्ष]

प्रताप
बल, साहस, पराक्रम, तेज।
उ.- जाकौं हरि अंगीकार कियौ। ताके कोटि बिघन हरि हरि कै, अभै प्रताप दियौ-१-३८।
संज्ञा
[सं.]

प्रताप
महत्व, महिमा, महत्ता।
उ.- (क) सूरदास यह सकल समग्री प्रभु प्रताप पहिचानै-१-४०। (ख) सब हितकारन देव, अभय-पद नाम प्रताप बढ़ायौ-१-१८८। (ग) छिनक भजन, संगति-प्रताप तैं, गज अरू ग्राह छुड़ायौ-१-१९०।
संज्ञा
[सं.]

प्रताप
पौरूष, वीरता।
उ.- तुम प्रताप-बल बदत न काहूँ, निडर भएघर-चेरे-१-१७०।
संज्ञा
[सं.]

प्रताप
ताप, तेज।
उ.- दिनकर महाप्रताप पुंज बर सबको तेज हरै-३३११।
संज्ञा
[सं.]

प्रतापि, प्रतापी
प्रतापवान, तेजस्वी।
उ.- धन्य पिता जापर परुफुल्लित राघव भुजा अनूप। वा प्रतापि की मधुर बिलोकनि पर वारौं सब भूप-९-१३४।
वि.
[हिं. प्रतापी]

प्रतापि, प्रतापी
दुखदायी, सतानेवाला।
वि.
[हिं. प्रतापी]

प्रतारणा
ठगी, वंचकता।
संज्ञा
[सं.]

प्रतारित
जो ठगा गया हो।
वि.
[सं.]

प्रतिंचा
धनुष की डोरी।
संज्ञा
[सं. पतंचिका]

प्रति
हर एक, एक-एक, प्रत्येक।
उ.-अंग-अंग-प्रति छबि-तरंग-गति सूरदास क्यौं कहि आवै-१-६९।
अव्य.
[सं.]

प्रति
विरूद्ध, विपरीत।
अव्य.
[सं.]

प्रति
सामने।
अव्य.
[सं.]

प्रति
बदले में।
अव्य.
[सं.]

प्रति
समान।
अव्य.
[सं.]

प्रति
जोड़ी का।
अव्य.
[सं.]

प्रति
सामने।
अव्य.

प्रति
ओर, तरफ।
अव्य.

प्रति
नकल।
संज्ञा

प्रति
एक ही वस्तु का एक अदद।
संज्ञा

प्रति
प्रतिबिंब।
उ.- जैसे केहरि उझकि कूप-जल, देखत अपनी प्रति-१-३००।
संज्ञा

प्रतिकार
बदला।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिकार
चिकित्सा।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिकूल
विरूद्ध, विपरीत।
वि.
[सं.]

प्रतिकूलता
विरोघ, विपरीतता।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिक्रिया
बदला।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिक्रिया
एक क्रिया के परिणाम या प्रत्युत्तर में होनेवाली क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिग्या
प्रण, प्रतिज्ञा।
संज्ञा
[सं. प्रतिज्ञा]

प्रतिग्रह
स्वीकार, ग्रहण।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिग्रह
वह दान लेना जो विधिपूर्वक दिया जाय।
उ.- बहुत प्रतिग्रह लेत बिप्र जो जाय परत भव कूप-सारा. ३३८।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिग्रह
अधिकार में लाना।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिग्रह
पाणिग्रहण।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिग्रह
ग्रहण।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिग्रह
स्वागत।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिग्रह
विरोध।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिग्रही, प्रतिग्राही
दान लेनेवाला।
वि.
[सं. प्रतिग्रह]

प्रतिघात
आघात के बदले या उत्तर में किया गया आघात।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिघात
टक्कर।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिघाती
प्रतिद्वंद्वी, शत्रु।
वि.
[सं. प्रतिघात]

प्रतिच्छा
प्रतीक्षा।
संज्ञा
[सं. प्रतीक्षा]

प्रतिच्छाया, प्रतिछाँई, प्रतिछाया, प्रतिछाँही
चित्र।
संज्ञा
[सं. प्रतिच्छाया]

प्रतिच्छाया, प्रतिछाँई, प्रतिछाया, प्रतिछाँही
प्रतिबिंब।
संज्ञा
[सं. प्रतिच्छाया]

प्रतिज्ञा
प्रण।
उ.- जिन हरि शकट प्रलंब तृणावृत इन्द्र प्रतिज्ञा टाली-२५६७।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिज्ञा
शपथ।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिज्ञा
अभियोग।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिज्ञा
उस बात का कथन जिसे सिद्ध करना हो।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिदान
लौटाना।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिदान
बदला।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिदासी
मूर्ति।
उ.- मानहु पाहन की प्रतिदासी नेक न इत उत डोलै-२२७५।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिद्वंद्व
बराबर वालों का झगड़ा।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिद्वंद्वी
शत्रु, विरोधी।
संज्ञा
[सं. पिरतुद्वंद्व]

प्रतिद्वंद्विता
बराबर वालों की लड़ाई।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिध्वनि
शब्द का गूँज।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिध्वनि
दूसरों के भावों या विचारों की आवृत्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिनायक
नायक का प्रतिद्वंद्वी पात्र।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिनिधि
प्रतिमा।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिनिधि
निर्वाचित व्यक्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिनिधित्व
प्रतिनिधि होने का काम।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपक्ष, प्रतिपच्छ
शत्रु या विरोधी पक्ष।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपक्षी, प्रतिपच्छी
शत्रु, विरोधी।
संज्ञा
[सं. प्रतिपक्ष]

प्रतिपदा
पक्ष की पहली तिथि, परिवा।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपक्षन्न
जाना हआ।
वि.
[सं.]

प्रतिपक्षन्न
स्वीकृत।
वि.
[सं.]

प्रतिपक्षन्न
प्रमाणित, स्थापित।
वि.
[सं.]

प्रतिपक्षन्न
सम्मानित।
वि.
[सं.]

प्रतिपलिहौं
पालन करूँगा, पालूँगा।
उ.- तुम्हरैं चरन-कमल सुख-सागर, यह ब्रत हौं प्रतिपलिहौं-९-३५।
क्रि. स.
[हिं. प्रतिपालना]

प्रतिपादक
कहने, समझाने या प्रति-पादन करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपादक
निर्वाह करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपादक
उत्पादक।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपादन
भलीभाँति समझाना।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपादन
प्रमाणपूर्वक कथन।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपादन
प्रमाण।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपादन
उत्पत्ति।
संज्ञा
[सं.]

निर्मल
स्वच्छ।
वि.
[सं.]

निर्मल
शुद्ध, पवित्र।
वि.
[सं.]

निर्मल
निर्दोष, दोषरहित।
उ.-भत्कनि-हाट बैठि अस्थिर ह्वै हरि नग निर्मल लेहि-१-३१०।
वि.
[सं.]

निर्मलता
सफाई।
संज्ञा
[सं.]

निर्मलता
शुद्धता, पवित्रता।
संज्ञा
[सं.]

निर्मलता
निष्कलंकता।
संज्ञा
[सं.]

निर्माण
रचना, बनावट।
संज्ञा
[सं.]

निर्माता
रचने या बनानेवाला।
संज्ञा
[सं.]

निर्मान
रचने या बनाने की क्रिया।
उ.-संकर प्रगट भए भृकुटी ते करी सृष्टि निर्मान-सारा. ६५।
संज्ञा
[सं. निर्माण]

निर्माना
रचना, बनाना।
क्रि. स.
[सं. निर्माण]

प्रतिपादित
जिसे कहा-समझाया या प्रति-पादन किया गया हो।
वि.
[सं.]

प्रतिपादित
प्रमाणित।
वि.
[सं.]

प्रतिपादित
निरूपित।
वि.
[सं.]

प्रतिपादित
प्रदत्त।
वि.
[सं.]

प्रतिपाद्य
कहने, समझाने, या प्रतिपादन करते योग्य।
वि.
[सं.]

प्रतिपाद्य
निरूपण के योग्य।
वि.
[सं.]

प्रतिपाद्य
देने योग्य।
वि.
[सं.]

प्रतिपार
पालनकर्त्ता, रक्षक, पोषक।
उ.- यहै विचार करत निसि-बासर, येई हैं जन के प्रतिपार-४९७।
संज्ञा
[सं. प्रतिपाल]

प्रतिपारी
पालन की, पूर्ण की, (ठानी हुई बात या इच्छा) निभायी।
उ.- सदा सहाइ करी दासनि की, जो उर धरी सोइ प्रतिपारी-१-१६०।
क्रि. स.
[हिं. प्रतिपालना]

प्रतिपारे
पालन करके।
क्रि. स.
[हिं. प्रतिपालना]

प्रतिपारे
रक्षा करके, सुरक्षित रखकर।
उ.- बंधू करियौ राज सँभारे। राजनीति अरू गुरू की सेवा, गाइ-बिप्र प्रतिपारे-९-५४।
क्रि. स.
[हिं. प्रतिपालना]

प्रतिपार्यौ
रक्षा की, बचाया।
उ.- नृप-कन्या कौ ब्रत प्रतिपार्यौ, कपट बेष इक धार्यौ-१-३१।
क्रि. स.
[हिं. प्रतिपालना]

प्रतिपाल
रक्षक, पालक, पोषक।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपालक
पालन करनेवाले, पोषक।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपालक
रक्षक, संरक्षक।
उ.- गुरू बसिष्ठ अरू मिलि सुमंत्र सौं, अतिहीं प्रेम बढ़ायौ। बालक प्रतिपालक तुम दोऊ, दसरथ लाड़ लड़ायौ-९-५५।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपालक
राजा।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपालन
पालने की क्रिया या भाव, पालन-पोषण।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपालन
रक्षण।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपालन
निर्वाह।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिपालना
पालन-पोषण करना।
क्रि. स.
[सं.]

प्रतिपालना
रक्षा करना।
क्रि. स.
[सं.]

प्रतिपालना
निर्वाह करना।
क्रि. स.
[सं.]

प्रतिपालित
पाला हुआ।
वि.
[सं.]

प्रतिपालित
रक्षित।
वि.
[सं.]

प्रतिपाली
पालन-पोषण किया, रक्षा की।
उ.- तब ए बेली सींचि स्यामघन, अपनी करि प्रतिपाली-३२२८।
क्रि. स.
[हिं. प्रतिपालन]

प्रतिपाली
निर्वाह किया।
उ.- धन्य सु गोकुल नारि सूर प्रभु प्रगट प्रीति प्रति-पाली-३५६७।
क्रि. स.
[हिं. प्रतिपालन]

प्रतिपालैं
पालन करें, पालन-पोषण करें।
उ.- ताकी सक्ति पाइ हम करैं। प्रति पालै बहुरौ संहरैं-४-३।
क्रि. स.
[हिं. प्रतिपालना]

प्रतिपाल्यौ
पालन किया, पाला-पोसा।
उ.- जिन पुत्रनिहिं बहुत प्रतिपाल्यौ, देवी-देव मनै हैं। तेई लै खोपरी बाँस दै, सीस फोरि बिखरै हैं-१-८६।
क्रि. स.
[हिं. प्रतिपालना]

प्रतिफल
परिणाम, नतीजा।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिफल
बदला, स्वार्थ।
उ.- औरौ सकल सुकृत श्रीपति-हित प्रतिफल-रहित सुप्रीति-२-२-१२।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिफल
प्रतिबिंब।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिबंध
रूकावट।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिबंध
बाधा।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिबंधक
रूकावट डालनेवाला, बाधक।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिबाद
विरोध, खंडन।
संज्ञा
[सं. प्रतिवाद]

प्रतिबाद
विवाद, विरोध,संघर्ष।
उ.- तुम्हैं हमैं प्रतिबाद भए तैं गौरव काकौ गरतौ-१-२०३।
संज्ञा
[सं. प्रतिवाद]

प्रतिबिंब
छाया, परछाईं।
उ.- किधौं यह प्रतिबिंब जल में देखत निज रूप दोउ हैं सुहाए-२५७०।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिबिंब
प्रतिमा।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिबिंब
चित्र।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिबिंब
दर्पण।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिमा
छाया।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिमा
चिन्ह, छाप।
उ.- यह सुनि धावत धरनि, चरन की प्रतिमा पथ मैं पाई। नैन-नीर रघुनाथ सानि सो, सिव ज्यौं गात चढ़ाई-९-६४।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिमान
प्रतिबिम्ब।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिमान
प्रतिनिधि।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिमूर्ति
प्रतिमा, मूर्ति, अनुकृति।
संज्ञा
[सं.]

प्रतियोगिता
प्रतिद्वद्विता।
संज्ञा
[सं.]

प्रतियोगिता
विरोध।
संज्ञा
[सं.]

प्रतियोगी
प्रतिद्वंद्वी।
संज्ञा
[सं.]

प्रतियोगी
शत्रु।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिरूप
चित्र।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिबिंब
झलक।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिबिंबक
छायावत् पीछे चलनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिबिंबित
जिसकी छाया पड़ती हो।
वि.
[सं.]

प्रतिबिंबित
जो छाया पड़ने से दिखायी देता हो।
वि.
[सं.]

प्रतिबिंबित
जिसका आभास हो।
वि.
[सं.]

प्रतिभट
समान योद्धा।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिभट
शत्रु।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिभा
बुद्धि।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिभा
असाधारण बुद्धि-बल या योग्यता।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिभा
दीप्ति, चमक।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिभावान्
प्रतिभाशाली।
वि.
[सं.]

प्रतिभावान्
चमकदार।
वि.
[सं.]

प्रतिभासंपान्न
प्रतिभा-शाली।
वि.
[सं.]

प्रतिभास
आकृति।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिभास
भ्रम।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिभू
जमानत में पड़नेवाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिभौ
कांति, दीप्ति, चमक या आभा भी।
उ.- सबनि सनेहौ छाँड़ि दयौ। हा जदुनाथ ! जरा तन ग्रास्यौ, प्रतिभौ उतरि गयौ-१-२९८।
संज्ञा
[सं. प्रतिभा]

प्रतिम
समान, सदृश।
अव्य.
[सं.]

प्रतिमा
मूर्ति, चित्र, अनुकृति।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिमा
मिट्टी, धातु आदि की देवमूर्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिवादी
विरोध या खंडन करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिवादी
तर्क या विवाद करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिवादी
प्रतिपक्षी।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिवेशी
पड़ोसी।
संज्ञा
[सं. प्रतिवेशिन्]

प्रतिशोध
बदला।
संज्ञा
[सं. प्रति + शोध]

प्रतिश्रुत
स्वीकार किया हुआ।
वि.
[सं.]

प्रतिश्रुति
प्रतिज्ञा।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिश्रुति
स्वीकृति।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिषेध
मनाही।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिषेध
खंडन।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिष्ठ
प्रसिद्ध।
वि.
[सं.]

प्रतिष्ठ
सम्मानित।
वि.
[सं.]

प्रतिष्ठा
स्थिति।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिष्ठा
स्थापना, या प्रतिमा स्थापना।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिष्ठा
मान-मर्यादा, गौरव।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिष्ठा
प्रसिद्ध।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिष्ठा
यश।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिष्ठा
आदर-सत्कार।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिष्ठान
स्थापित करने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिष्ठाना
देवमूर्ति-स्थापना।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिरूप
प्रतिनिधि।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिरोध
बाधा।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिरोध
तिरस्कार।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिलिपि
नकल, लेख की नकल।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिलोम
प्रतिकूल।
वि.
[सं.]

प्रतिलोम
उलटा।
वि.
[सं.]

प्रतिलोम विवाह
विवाह जिसमें पुरूष नीच और स्त्री उच्च वर्ण की हो।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिवस्तूपमा
एक काव्यालंकार।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिवाद
विरोध।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिवाद
विवाद।
संज्ञा
[सं.]

निर्मायक
निर्माण करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

निर्मायल, निर्माल्य
देवता पर चढ़ायी गयी वस्तु देवार्पित वस्तु; अर्पण के पूर्व 'नैवेद्य' और पश्चात् 'निर्माल्य' कही जाती है। शिव के अतिरिक्त सभी देवताओं का 'निर्मल्य' प्रसाद-रूप में ग्रहण किया जाता है।
संज्ञा
[सं. निर्मालय]

निर्मायौ
रचा, बनाया, उत्पन्न किया।
उ.-ब्रहम रिषि मरीचि निर्मायौ। रिषि मरीचि कस्यप उपजायौ-३-९।
क्रि. स.
[हिं. निर्माना]

निर्मित
बनाया या रचा हुआ।
वि.
[सं.]

निर्मुक्त
जो मुक्त हो, स्वच्छंद।
वि.
[सं.]

निर्मुक्ति
छुटकारा।
संज्ञा
[सं.]

निर्मुक्ति
मोक्ष।
संज्ञा
[सं.]

निर्मूल
जिसमें जड़ न हो।
वि.
[सं.]

निर्मूल
जिसकी जड़ तक न रह गयी हो।
वि.
[सं.]

निर्मूल
जिसका आधार न हो।
वि.
[सं.]

प्रतिष्ठाना
स्थान।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिष्ठाना
पदवी।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिष्ठाना
व्रत आदि की समाप्ति पर किया गया कृत्य।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिष्ठित
आदर-सम्मान-प्राप्त।
वि.
[सं.]

प्रतिष्ठित
जिसकी प्रतिष्ठा या स्थापना की गयी हो।
वि.
[सं.]

प्रतिस्पर्द्धा
होड़, लागडाँट, चढ़ा-ऊपरी।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिस्पर्द्धा
झगड़ा।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिस्पर्द्धी
होड़, लाग-डॉट रखनेवाला।
वि.
[सं. प्रतिस्पर्द्धा]

प्रतिस्पर्द्धी
झगड़ालू, विद्रोही।
वि.
[सं. प्रतिस्पर्द्धा]

प्रतिहंता
बाधक।
वि.
[सं. प्रतिहंतृ]

प्रतिहिंसा
हिंसा के बदले की हिंसा।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिहिंसा
बैर या बदला चुकाना।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीक
विरूद्ध।
वि.
[सं.]

प्रतीक
नीचे से ऊपर जानेवाला।
वि.
[सं.]

प्रतीक
चिन्ह।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीक
अंग।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीक
मुख।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीक
आकृति, रूप।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीक
वस्तु जिसमें दूसरी वस्तु का आरोप किया जाय।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीक
प्रतिमा, मूर्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिहंता
मारनेवाला।
वि.
[सं. प्रतिहंतृ]

प्रतिहत
रूका हुआ, अवरूद्ध।
वि.
[सं.]

प्रतिहत
हठया हुआ।
वि.
[सं.]

प्रतिहत
फेंका या गिराया हआ।
वि.
[सं.]

प्रतिहत
निराश।
वि.
[सं.]

प्रतिहार
द्वारपाल, ड्योढ़ीदार।
उ.- (क) परम चतुर सुंदर सुजान सखि या तनु को प्रतिहार-२८८८। (ख) जुग जुग बिरद इहै चलि आयो भए बलि के द्वारे प्रतिहार-२६२०।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिहार
द्वार, डयोढ़ी।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिहार
एक राज कर्मचारी जो हर समय राजाओं के साथ रहकर उन्हें विभिन्न समाचार सुनाता था।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिहार
ऐंद्रजालिक, जादूगर।
संज्ञा
[सं.]

प्रतिहारी
द्वारपाल।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीति
दृढ़ निश्चय, विश्वास।
उ.- नाम प्रतीति भई जा जन कौं, लै आनँद, दुख दह्यौ-२-८।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीति
प्रसिद्ध, ख्याति।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीप
आशा के विरूद्ध फल या घटना।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीप
एक अर्थालंकार।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीप
विरूद्ध, विपरीत, उलटा।
वि.

प्रत्यंच, प्रत्यंचा
धनुष की डोरी।
संज्ञा
[सं. पतंचिका]

प्रत्यक्ष
जो देखा जा सके।
वि.
[सं.]

प्रत्यक्ष
जिसका ज्ञान इंद्रियों से हो सके।
वि.
[सं.]

प्रत्यक्ष
प्रकट, स्पष्ट।
वि.
[सं.]

प्रत्यक्षता
प्रत्यक्ष होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीकार
बदला।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीकार
चिकित्सा।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीकोपासना
विशेष पादर्थ, जैसे सूर्य, देवमूर्ति आदि में ब्रह्म का आरोप करके उसकी उपासना करना।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीक्षक
प्रतीक्षा करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीक्षा
आसरा, इंतजार।
संज्ञा
[सं.]

प्रतीचि, प्रतीची
पश्चिम दिशा।
उ.- प्राची और प्रतीचि उदोची और अवाची मान- सारा. ७७५।
संज्ञा
[सं. प्रतीची]

प्रतीच्य
पश्चिमी, पश्चिम-संबंधी।
वि.
[सं.]

प्रतीत
ज्ञात, विदित।
वि.
[सं.]

प्रतीत
प्रसिद्धि।
वि.
[सं.]

प्रतीति
ज्ञान, जानकारी।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्यक्षदर्शी
साक्षी।
संज्ञा
[सं.] प्रत्त्यक्षदर्शिन्

प्रत्यय
विश्वास।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्यय
प्रमाण।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्यय
विचार।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्यय
ज्ञान।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्यय
व्याख्या।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्यय
कारण।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्यय
लक्षण।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्यय
निर्णय।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्यय
सम्मति।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्याख्यान
खंडन, निराकरण।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्यागत
पैतरा, पेंच, दाँव।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्यागत
जो लौट आया हो, वापस आया हुआ।
वि.

प्रत्यागमन
वापसी।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्यागमन
पुनरागमन।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्याघात
बदले का आघात या टक्कर।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्यावर्त्तन
लौटना, वापस आना।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्याशा
आशा, भरोसा।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्याहार
योग के आठ अंगों में से एक जिसमें इंद्रियों को अन्य विषयों से हटाकर चित्त का अनुसरण किया जाता है।
उ.- जम और नियम प्रान प्रत्याहार धारन घ्यान समाधि- सारा. ६०।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्युत
वरन्, इसके विरूद्ध, बल्कि।
अव्य.
[सं.]

प्रत्युत्तर
उत्तर का उत्तर।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्युत्पन्न
जो फिर से उत्पन्न हुआ हो।
वि.
[सं.]

प्रत्युत्पन्नमति
जो तुरंत उपयुक्त बात या काम करे।
वि.
[सं.]

प्रत्युत्पन्नमति
तुरंत उपयुक्त कार्य करने की बुद्धि।
संज्ञा

प्रत्युपकार
उपकार के बदले में उपकार।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्युष
प्रभात, प्रातःकाल।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्यूह
विघ्न-बाधा।
संज्ञा
[सं.]

प्रत्येक
हर एक।
वि.
[सं.]

प्रथम
पहला, जिसका स्थान पहले हो।
उ.- जन के उपजत दुख किन काटत ? जैसे प्रथम अषाढ़-आँजु-तृन, खेतिहर निरखि उपाटत-१-१०७।
वि.
[सं.]

प्रथम
सर्वश्रेष्ठ, सबसे उत्तम।
उ.- मनसा करि सुमिर्यौ गज बपुरैं, ग्राह प्रथम गति पावै-१-१२२।
वि.
[सं.]

प्रथम
सबसे पहले, आगे, आदि में।
उ.- जिहिं सुत कैं हित बिमुख गोविंद तैं, प्रथम तिहीं मुख जार्यौ-१-३३६।
क्रि. वि.
[सं.]

प्रथमा
मदिरा।
संज्ञा
[सं.]

प्रथमा
कर्त्ताकारक।
संज्ञा
[सं.]

प्रथमी
भू, भूमि।
संज्ञा
[सं.]

प्रथमैं
सबसे पहले, सर्वप्रथम।
उ.- प्रथमैं-चरन-कमल कौं ध्याव। तासु महातम मन मैं ल्यावै-१०-१८।
क्रि. वि.
[सं. प्रथम]

प्रथा
रीति-रिवाज।
संज्ञा
[सं.]

प्रथा
प्रसिद्धि।
संज्ञा
[सं.]

प्रथित
विख्यात, प्रसिद्धि।
वि.
[सं.]

प्रथिति
प्रसिद्धि, ख्याति।
संज्ञा
[सं.]

प्रथी
भू, भूमि।
संज्ञा
[सं. पृथ्वी]

प्रद
देनेवाला, दाता।
उ.- कनक-वलय मुद्रिका मोदप्रद, सदा सुभग संतनि काजैं-१-६९।
वि.
[सं.]

प्रदक्षिण, प्रदच्छिन
देवमूर्ति को दाहिनी ओर करके उसके चारों ओर घुमना, परिक्रमा, प्रदक्षिणा।
उ.- हरि कह्यौ, राजहेत तप कियौ। ध्रुव, प्रसन्न ह्यै मैं तोंहिं दियौ। अरू तेरे हित कियौ अस्थान। देहिं प्रदच्छिन जहाँ ससि-भान-४-९।
संज्ञा
[सं. प्रदक्षिणा]

प्रदक्षिणा, प्रदच्छिना
परिक्रमा।
संज्ञा
[सं. प्रदक्षिणा]

प्रदच्छिनकारी
प्रदक्षिणा करनेवाले, परिक्रमा करनेवाले।
उ.- जिहिं गोविंद अचल ध्रुव राख्यौ, रबि-ससि किए प्रदच्छिनकारी-१-३४।
वि.
[सं. प्रदक्षिणा + हिं. कारी=करनेवाला]

प्रदत्त
दिया हुआ, दिया गया।
वि.
[सं.]

प्रदर्शक
दिखलानेवाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रदर्शक
देखने या दर्शन करने वाला, दर्शक।
संज्ञा
[सं.]

प्रदर्शक
गुरू।
संज्ञा
[सं.]

प्रदर्शन
दिखलाने का काम।
संज्ञा
[सं.]

प्रदर्शनी
नुमाइश।
संज्ञा
[सं.]

निर्वसन
नंगा, वस्त्रहीन।
वि.
[सं.]

निर्वहण, निर्वहन
निर्वाह।
संज्ञा
[सं. निर्वाह]

निर्वहन
निभना, पालन होना।
क्रि. अ.
[सं. निर्वहन]

निर्वाक्
जो मौन या चुप हो।
वि.
[सं.]

निर्वाक्य
जो बोल न सुके, गूँगा।
वि.
[सं.]

निर्वाण, निर्वान
बुझा हुआ।
वि.
[सं. निर्वाण]

निर्वाण, निर्वान
अस्त, डूबा हुआ।
वि.
[सं. निर्वाण]

निर्वाण, निर्वान
धीमा पड़ा हुआ।
वि.
[सं. निर्वाण]

निर्वाण, निर्वान
मरा हुआ।
वि.
[सं. निर्वाण]

निर्वाण, निर्वान
बुझना।
संज्ञा
[सं. निर्वाण]

प्रदर्शित
जो दिखलाया गया हो।
वि.
[सं.]

प्रदर्शी
देखनेवाला, दर्शक।
संज्ञा
[सं. प्रदर्शिन]

प्रदाता
देनेवाला, दाता।
वि.
[सं. प्रदातृ]

प्रदान
दान।
संज्ञा
[सं.]

प्रदान
देने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

प्रदायक
देनेवाला, दाता।
वि.
[सं.]

प्रदायी
देनेवाला, दाता।
वि.
[सं. प्रदायिन]

प्रदीप
दीपक।
संज्ञा
[सं.]

प्रदीप
एक राग।
संज्ञा
[सं.]

प्रदीपक
प्रकाश में लानेवाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रदीपति
प्रकाश।
संज्ञा
[सं. प्रदीप्ति]

प्रदीपति
चमक।
संज्ञा
[सं. प्रदीप्ति]

प्रदीपन
प्रकाश करना।
संज्ञा
[सं.]

प्रदीपन
चमकाना।
संज्ञा
[सं.]

प्रदीप्त
प्रकाशित।
वि.
[सं.]

प्रदीप्त
चमकीला।
वि.
[सं.]

प्रदीप्ति
प्रकाश।
संज्ञा
[सं.]

प्रदीप्ति
चमक।
संज्ञा
[सं.]

प्रदेश, प्रदेस
शरीर का अंग, अवयव।
उ.- जानु सुजधन करभ-कर आकृति, कटि प्रदेस किंकिनि राजै-१-६९।
संज्ञा
[सं. प्रदेश]

प्रदेश, प्रदेस
प्रांत, सूबा।
संज्ञा
[सं. प्रदेश]

प्रदेश, प्रदेस
स्थान।
संज्ञा
[सं. प्रदेश]

प्रदेशी, प्रदेशीय
प्रदेश-संबंधी।
वि.
[सं. प्रदेशी]

प्रदोष
संध्याकाल।
संज्ञा
[सं.]

प्रदोष
त्रयोदशी का व्रत जिसमें दिनभर व्रत करके शाम को शिवपूजन के पश्चात् भोजन किया जाता है।
संज्ञा
[सं.]

प्रदोष
बड़ा दोष।
संज्ञा
[सं.]

प्रद्युम्न
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]

प्रद्युम्न
श्रीकृष्ण का बड़ा पुत्र।
संज्ञा
[सं.]

प्रद्योत
किरण।
संज्ञा
[सं.]

प्रद्योत
चमक।
संज्ञा
[सं.]

प्रधान
मुख्य।
उ.- तहाँ अवज्ञा नारि प्रधान-४-१२।
वि.
[सं.]

प्रधान
श्रेष्ठ।
वि.
[सं.]

प्रधान
नेता, मुखिया।
संज्ञा

प्रधान
मंत्री।
संज्ञा

प्रधानता
प्रधान होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

प्रधानी
प्रधान का काम या पद।
संज्ञा
[सं. प्रधान]

प्रन
दृढ़ निश्चय, प्रतिज्ञा।
संज्ञा
[सं. प्रण]

प्रनत
नम्र, दीन।
वि.
[सं. प्रणत]

प्रनत
झुका हुआ।
वि.
[सं. प्रणत]

प्रनत
भक्त।
संज्ञा

प्रनत
दास, सेवक।
संज्ञा

प्रनति
नम्रता।
संज्ञा
[सं. प्रणति]

प्रनति
विनती।
संज्ञा
[सं. प्रणति]

प्रनमन
झुकना, नमना।
संज्ञा
[सं. प्रणमन]

प्रनमना
प्रणाम करना।
क्रि. स.
[हिं. प्रणवना]

प्रनय
प्रेम, प्रीति।
संज्ञा
[सं. प्रणय]

प्रनव
ओंकार मंत्र।
संज्ञा
[सं. प्रणव]

प्रनवना
प्रमाण करना।
क्रि. स.
[हिं. प्रणवना]

प्रनाम
नमस्कार।
उ.- सिब प्रनाम करि ढिग बैठाए-४-५।
संज्ञा
[सं. प्रणाम]

प्रनामी
प्रमाण करने वाला।
संज्ञा
[सं. प्रणाम]

प्रनामी
गुरूदक्षिण।
संज्ञा

प्रनाली
रीति, प्रथा।
संज्ञा
[सं. प्रणाली]

प्रनिपात
प्रणाम।
संज्ञा
[सं. प्रणिपात]

प्रपंच
पाँच तत्वों का विस्तार, भवजाल।
संज्ञा
[सं.]

प्रपंच
विस्तार, फैलाव।
संज्ञा
[सं.]

प्रपंच
दुनिया का जंजाल।
संज्ञा
[सं.]

प्रपंच
बखेड़ा, झंझट, झगड़ा।
उ.- अति प्रपंच की मोट बाँधिकै अपनैं सीस धरी-१-१८४।
संज्ञा
[सं.]

प्रपंच
आडंबर, ढोंग, छल, धोखा।
उ.- बहुत प्रपंच किये माया के, तऊ न अधम अघानौ-१-३२९।
संज्ञा
[सं.]

प्रपंचन
विस्तार करना।
संज्ञा
[सं.]

प्रपंची
छली, कपटी, ढोंगी।
वि.
[सं. प्रपंचिन्]

प्रपत्ति
अनन्य भक्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रपन्न
शरणागत, आश्रित।
वि.
[सं.]

प्रपात
झरना, निर्झर।
संज्ञा
[सं.]

प्रपितामह
परदादा।
संज्ञा
[सं.]

प्रपुंज
बड़ा समूह, भारी झुंड।
उ.- बिकसत कमलावली, चले प्रपुंज-चंचरीक, गुंजत कल कोमल धुनि त्यागि कंज प्यारे-१०-२०५।
संज्ञा
[सं.]

प्रपौत्र
पुत्र का पौत्र।
संज्ञा
[सं.]

प्रफुलना
फूलना।
क्रि. स.
[सं. प्रफुल्ल]

प्रफुला
कुमुदिनी।
संज्ञा
[सं. प्रफुल्ल]

प्रफुला
कमलिनी।
संज्ञा
[सं. प्रफुल्ल]

प्रफुलित
खिला हुआ, कुसुमित।
उ.- तुम्हारी भक्ति हमार प्रान ¨¨¨। जैसें कमल होत अति प्रफुलित, देखत दरसन भान-१-१६९।
वि.
[सं. प्रफुल्ल]

प्रफुलित
प्रसन्न, प्रमुदित।
उ.- गदगद बचन कहत मन प्रफुलित बार-बार समुझैहौं-२९२३।
वि.
[सं. प्रफुल्ल]

प्रबाल
कोंपल।
संज्ञा
[सं. प्रवाल]

प्रबालिका
मूँगा, विद्रुम, प्रवाल।
उ.- गजमोतिन के चौक पुराए बिच-बिच लाल प्रबालिका-८०९।
संज्ञा
[सं. प्रवाल]

प्रबास
परदेस में रहना।
संज्ञा
[सं. प्रवास]

प्रबाह
क्रम, तार, सिलसिला।
उ.- राखी लाज द्रुपद-तनया की, कुरुपति चीर हरै। दुरजोधन कौ मान भंग करि बसन-प्रबाह भरै-१-३७।
संज्ञा
[सं. प्रवाह]

प्रबिसना
प्रवेश करना, पैठना।
क्रि. अ.
[सं. प्रवेश]

प्रबीन
चतुर।
उ.- चित दै सुनौ स्याम प्रबीन-३४५१।
वि.
[सं. प्रवीण]

प्रबीर
भारी योद्धा।
वि.
[सं. प्रबीर]

प्रबुद्ध
जागा हुआ।
वि.
[सं.]

प्रबुद्ध
सचेत।
वि.
[सं.]

प्रबुद्ध
सजग।
वि.
[सं.]

प्रफुलित
जो मुँदा न हो।
वि.
[सं. प्रफुल्ल]

प्रफुलित
प्रसन्न, आनंदित।
वि.
[सं. प्रफुल्ल]

प्रबंध
बाँधने की डोरी।
संज्ञा
[सं.]

प्रबंध
बाँधने का या योजना।
संज्ञा
[सं.]

प्रबंध
निबंध।
संज्ञा
[सं.]

प्रबंध
व्यवस्था।
संज्ञा
[सं.]

प्रबल
बलवान, प्रचंड।
उ.- (क) कह करौं तेरी प्रबल माया देति मन भरमाइ-१-४५। (ख) जीवन-आस प्रबल श्रुति देखी-१-२८४।
वि.
[सं.]

प्रबल
तेज, उग्र।
उ.- परिहस सूल प्रबल निसि-बासर, तातैं यह कहि आवत। सूरदास गोपाल सरनगत भऐं न को गति पावत-१-१८१।
वि.
[सं.]

प्रबल
घोर, महान्।
वि.
[सं.]

प्रबाल
मूँगा।
संज्ञा
[सं. प्रवाल]

प्रबुद्ध
ज्ञानी।
वि.
[सं.]

प्रबुद्ध
विकसित।
वि.
[सं.]

प्रबोध
जागना।
संज्ञा
[सं.]

प्रबोध
पूर्ण ज्ञान।
संज्ञा
[सं.]

प्रबोध
आश्वासन, ढाढ़स।
संज्ञा
[सं.]

प्रबोध
चेतावनी।
संज्ञा
[सं.]

प्रबोध
विकास।
संज्ञा
[सं.]

प्रबोधक
जगानेवाला।
वि.
[सं.]

प्रबोधक
चितावनी देनेवाला।
वि.
[सं.]

प्रबोधक
समझानेवाला।
वि.
[सं.]

निर्युक्तिक
युक्तिरहित।
वि.
[सं.]

निर्लज्ज
जिसको लाज-शर्म न हो।
वि.
[सं.]

निर्लज्जता
बेशर्मी, बेहयाई।
संज्ञा
[सं.]

निर्लिप्त
राग-द्वेष से मुक्त।
वि.
[सं.]

निर्लिप्त
जो किसी से संबंध न रखता हो।
वि.
[सं.]

निर्लेप
संबंध न रखनेवाला, निर्लिप्त।
वि.
[सं.]

निर्लोभि, निर्लोभी
लोभ-लालच न करनेवाला।
वि.
[सं.]

निर्वश, निर्वंस
जिसके वंश में कोई न हो।
उ.- (क) करत है गंग निर्वंश जाहीं- २५५६। (ख) इनको कपट करै मथुरापति तौ ह्वै है निर्वंस-२५९७।
वि.
[सं. निर्वंश]

निर्वचन
निश्चित रूप से बात करना।
संज्ञा
[सं.]

निर्वचन
शब्द की रचना या व्युत्पत्ति-विवेचन।
संज्ञा
[सं.]

प्रबोधक
सांत्वना देनेवाला।
वि.
[सं.]

प्रबोधत
समझाते-बुझाते हैं।
क्रि. स.
[हिं. प्रबोधना]

प्रबोधत
ढाढ़स बँधाते हैं, धीरज देते हैं।
उ.- जननी ब्याकुल देखि प्रबोधत, धीरज करि नीकैं जदुराई। सूर स्याम कौं नैंकु नहीं डर, जनि तू रोवै जसुमति माई-५४८।
क्रि. स.
[हिं. प्रबोधना]

प्रबोधन
जागरण।
संज्ञा
[सं.]

प्रबोधन
बोध, चेत।
संज्ञा
[सं.]

प्रबोधन
ज्ञान या बोध कराना।
संज्ञा
[सं.]

प्रबोधन
विकास।
संज्ञा
[सं.]

प्रबोधन
सांत्वना।
संज्ञा
[सं.]

प्रबोधना
जगाना।
क्रि. स.
[सं. प्रबोधन]

प्रबोधना
सजग या सचेत करना।
क्रि. स.
[सं. प्रबोधन]

प्रबोधना
समझाना-बुझाना।
क्रि. स.
[सं. प्रबोधन]

प्रबोधना
सिखाना-पढ़ाना।
क्रि. स.
[सं. प्रबोधन]

प्रबोधना
धीरज देना।
क्रि. स.
[सं. प्रबोधन]

प्रबोधि
समझा-बुझाकर।
उ.- ठानी कथा प्रबोधि तबहिं फिरि गोप समोधे-३४४३।
क्रि. स.
[सं. ]प्रबोधना]

प्रबोधित
जो प्रबोधा गया हो।
वि.
[सं.]

प्रबोधे
समझाया-बुझाया।
उ.- कै वह स्याम सिखाय प्रबोधे, कै वह बीच मरे-२९८२।
क्रि. स.
[हिं. प्रबोधे]

प्रभंजन
आँधी।
संज्ञा
[सं.]

प्रभंजन
हवा।
संज्ञा
[सं.]

प्रभव
जन्म।
संज्ञा
[सं.]

प्रभव
सृष्टि।
संज्ञा
[सं.]

प्रभविष्णु
प्रभावशील।
वि.
[सं.]

प्रभा
दीप्ति, आभा।
संज्ञा
[सं.]

प्रभा
सूर्यबिंब।
संज्ञा
[सं.]

प्रभाउ
सामर्थ्य, शक्ति।
उ.- जुद्ध न करौं, शस्त्र नहिं पकरौं, एक ओर सेना सिगरी। हरि-प्रभाउ राजा नहिं जान्यौ, कह्यौ सैन मोहिं देहु हरी-१-२६८।
संज्ञा
[सं. प्रभाव]

प्रभाउ
महत्व, माहात्म्य।
संज्ञा
[सं. प्रभाव]

प्रभाकर
सूर्य।
संज्ञा
[सं.]

प्रभाकर
चन्द्र।
संज्ञा
[सं.]

प्रभाकीट
जुगनूँ, खद्योत।
संज्ञा
[सं.]

प्रभात
सबेरा, प्रातःकाल।
संज्ञा
[सं.]

प्रभाती
प्रातःकालीन एक गीत।
संज्ञा
[सं.]

प्रभासना
दिखायी पड़ना।
क्रि. अ.
[सं. प्रभासिन]

प्रभासु
गुजरात का एक तीर्थ।
उ.- आय प्रभासु बिचु बहु जन को बहुतहिं दान देवाये- सारा. ८३६।
संज्ञा
[सं. प्रभास]

प्रभु
अधिपति।
संज्ञा
[सं.]

प्रभु
स्वामी।
संज्ञा
[सं.]

प्रभु
ईश्वर, भगवान।
उ.- बिनु दीन्हैं ही देत सूर-प्रभु ऐसे हैं जदुनाथ गुसाईं-१-३।
संज्ञा
[सं.]

प्रभु
‘महात्मा’ के लिए संबोधन।
संज्ञा
[सं.]

प्रभुता
महत्व, बड़ाई, महत्ता।
उ.- दूरि गयौ दरसन के ताईं, व्यापक प्रभुता सब बिसरी-१-११५।
संज्ञा
[सं.]

प्रभुता
साहिबी, मालिकपन, प्रभुत्व।
उ.- प्रभु की प्रभुता यहै जु दीन सरन पावै-१-१२४।
संज्ञा
[सं.]

प्रभुता
शासनाधिकार।
संज्ञा
[सं.]

प्रभुता
वैभव।
संज्ञा
[सं.]

प्रभाव
सामर्थ्य, शक्ति।
उ.- भक्ति-प्रभाव सूर लखि पायौ, भजन-छाप नहिं पाई-१-९३।
संज्ञा
[सं.]

प्रभाव
उद्भव, प्रादुर्भाव।
संज्ञा
[सं.]

प्रभाव
महिमा, माहात्म्य।
संज्ञा
[सं.]

प्रभाव
फल, परिणाम, असर।
संज्ञा
[सं.]

प्रभाव
साख, दबाव।
संज्ञा
[सं.]

प्रभाव
मन को किसी ओर प्रेरित कर देने का गुण।
संज्ञा
[सं.]

प्रभास
प्रभापूर्ण।
उ.- अंग-अंग भूषन बिराजत कनक मुकुट प्रभास-१३५६।
वि.
[सं.]

प्रभास
ज्योति।
संज्ञा

प्रभास
गुजरात एक तीर्थ।
संज्ञा

प्रभासन
ज्योति, आभा।
संज्ञा
[सं.]

प्रभृति
आदि, इत्यादि।
अव्य.
[सं.]

प्रभेद
भेद, उपभेद।
संज्ञा
[सं.]

प्रमत, प्रमत्त
उन्मत्त, प्रमत्त, मतवाला, मस्त।
उ.- तू कहाँ ढीठ, जोबन-प्रमत्त सुंदरी, फिरति इठलाति गोपाल आगैं-१०-३०७।
वि.
[सं. प्रमत्त]

प्रमत्तता
मस्ती।
संज्ञा
[सं.]

प्रमत्तता
पागलपन।
संज्ञा
[सं.]

प्रमदा
सुंदरी, युवती।
संज्ञा
[सं.]

प्रमाण
सबूत।
संज्ञा
[सं.]

प्रमाण
एक अर्थालंकार।
संज्ञा
[सं.]

प्रमाण
सत्यता।
संज्ञा
[सं.]

प्रमाण
दृढ़ धारणा, निश्चय।
संज्ञा
[सं.]

प्रभुताई
बड़ाई, महत्व।
उ.- तौ क्यों तजै नाथ अपनौ प्रन ? है प्रभु की प्रभुताई-१-२०७।
संज्ञा
[सं. प्रभुता]

प्रभुताई
वैभव।
उ.- सोवत मुदित भयौ सपने मैं, पाई निधि जो पराई। जागि परैं कछु हाथ न आयौ, यौं जग की प्रभुताई-१-१४७।
संज्ञा
[सं. प्रभुता]

प्रभुत्व
अधिकार, वैभव, पद-मान।
उ.- जग-प्रभुत्व प्रभु ! देख्यौ जोइ। सपन-तुल्य छन-भंगुर सोइ-७-२।
संज्ञा
[सं.]

प्रभुभक्त
स्वामी का सच्चा सेवक।
वि.
[सं.]

प्रभू
स्वामी।
संज्ञा
[सं. प्रभु]

प्रभू
ईश्वर।
संज्ञा
[सं. प्रभु]

प्रभूत
उत्पन्न।
वि.
[सं.]

प्रभूत
बहुत अधिक।
वि.
[सं.]

प्रभूति
उत्पत्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रभूति
अधिकता।
संज्ञा
[सं.]

प्रमाण
मान-आदर।
संज्ञा
[सं.]

प्रमाण
प्रामाणिक बात या वस्तु।
संज्ञा
[सं.]

प्रमाण
हद, सीमा, इयत्ता।
संज्ञा
[सं.]

प्रमाण
आदेशपत्र।
संज्ञा
[सं.]

प्रमाण
सत्य, प्रमाणित।
वि.

प्रमाण
स्वीकार योग्य, मान्य।
वि.

प्रमाण
परिमाण आदि में समान या बराबर।
वि.

प्रमाण
तक, प्रर्यन्त।
अव्य.

प्रमाणित
प्रमाण से सिद्ध।
वि.
[सं.]

प्रमाद
भूल-चूक, भ्रम।
संज्ञा
[सं.]

प्रमानो
सत्य मानो, ठीक समझो।
उ.- करो उपाय, बचो जो चाहो, मेरो बचन प्रमानो-सारा. ४८७।
क्रि. स.
[हिं. प्रमानना]

प्रमान्यो, प्रमान्यौ
स्थिर या निश्चित किया, ठहराया।
उ.- जोगेस्वर बपु धारि हरि प्रगटे जोग समाधि प्रमान्यो-सारा. ३५१।
क्रि. स.
[हिं. प्रमानना]

प्रमुख
सामने आगे।
क्रि. वि.
[सं.]

प्रमुख
तत्काल।
क्रि. वि.
[सं.]

प्रमुख
प्रथम।
वि.

प्रमुख
मुख्य।
वि.

प्रमुख
प्रतिष्ठित।
वि.

प्रमुख
और-और, इनके अतिरिक्त और, इत्यादि।
उ.- बंधुक सुमन अरून पद पंकज, अंकुस प्रमुख चिन्ह बनि आए-१०-१०४।
अव्य.

प्रमुख
आरंभ, आदि।
संज्ञा

प्रमुख
समूह।
संज्ञा

प्रमुद
प्रसन्न, आनंदित।
वि.
[सं.]

प्रमुदा
राधा की एक सखी का नाम।
उ.- (क) स्यामा कामा चतुरा नवला प्रमुदा सुमना नारि-१५८०। (ख) सूर प्रभु स्याम सकुचि गए प्रमुदा धाम-२१५३।
संज्ञा
[सं.]

प्रमुदित
प्रसन्न, आनंदित।
वि.
[सं.]

प्रमोद
हर्ष।
संज्ञा
[सं.]

प्रमोद
सुख।
संज्ञा
[सं.]

प्रयंक
पलँग।
संज्ञा
[सं.]

प्रयंत
तक, लौ।
अव्य.
[सं.]

प्रयंत्न
प्रयास, चेष्टा।
संज्ञा
[सं.]

प्रयंत्न
वर्णोच्चारण में होने वाली क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

प्रयात्नवान
प्रयत्न में लगा हुआ।
वि.
[सं. प्रयत्नवान्]

निर्मूल
जो सर्वथा नष्ट हो गया हो।
वि.
[सं.]

निर्मूलन
निर्मूल होना या करना।
संज्ञा
[सं.]

निर्मूल्यो
निर्मूल, नष्ट।
उ.-मरै वह कंस निर्बेस बिधना करै, सूर क्योहूँ, होइ निर्मूल्यो-२६२५।
वि.
[सं.]

निर्मोल, निर्मोलि
बहुत अधिक मूल्य का।
उ.-नैना लोभहिं लोभ भरे ¨¨¨¨। जोइ देखैं सोइ निर्मोलैं कर लै तहीं धरै।
वि.
[हिं. निः + मोल]

निर्मोह, निर्मोहिया, निर्मोही
जिसके मन में मोह-ममता न हो।
उ.-हरि निर्मोहिया सों प्रीति कीनी काहे न दुख होइ-२४०९।
वि.
[हिं. निर्मोह]

निर्मोहिनी
जिस (स्त्री) में मोह-ममता न हो, निर्दय।
वि.
[हिं. निर्मोही + इनी [प्रत्य.]]

निर्यात
वह जो कहीं से बाहर जाय।
संज्ञा
[सं.]

निर्यात
देश से माल के बाहर जाने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

निर्यास
वृक्षों से बहनेवाला रस।
संज्ञा
[सं.]

निर्यास
बहना, झरना, क्षरण।
संज्ञा
[सं.]

प्रमाद
आलस्य।
संज्ञा
[सं.]

प्रमाद
अंतःकरण की दुर्बलता।
संज्ञा
[सं.]

प्रमादी
भूल-चूक करनेवाला।
वि.
[सं. प्रमादिन]

प्रमान
इयत्ता, हद, मान, सीमा।
उ.- हरि जू, मोसौ पतित न आन। मन-क्रम-वचन पाप जे कीन्हे, तिनकौ नाहिं प्रमान-१-१९७।
संज्ञा
[सं. प्रमाण]

प्रमान
हद, मान, इयत्ता।
उ.- अतल, वितल अरु सुतल तलातल और महातल जान। पाताल और रसातल मिलि कै सातौ भुवन प्रमान-सारा. ३१।
संज्ञा
[सं. प्रमाण]

प्रमान
मानने योग्य, मान्य, स्वीकृत।
उ.- युग प्रमान कीन्हौ व्यवहार- १० उ.-१२९।
वि.

प्रमानना
सत्य या ठीक मानना।
क्रि. स.
[सं. प्रमाण]

प्रमानना
सिद्ध या प्रमाणित करना।
क्रि. स.
[सं. प्रमाण]

प्रमानना
निश्चित या स्थिर करना।
क्रि. स.
[सं. प्रमाण]

प्रमानी
मान्य, मानने योग्य।
वि.
[सं. प्रमाणिक]

प्रयुक्त
सम्मिलित।
वि.
[सं.]

प्रयुक्त
जिसका खूब प्रयोग किया गया हो।
वि.
[सं.]

प्रयुक्त
जो काम में लगाया गया हो।
वि.
[सं.]

प्रयोक्ता
प्रयोग या व्यवहार करनेवाला।
संज्ञा
[सं. प्रयोक्तृ]

प्रयोक्ता
लगानेवाला।
संज्ञा
[सं. प्रयोक्तृ]

प्रयोक्ता
सूत्रधार।
संज्ञा
[सं. प्रयोक्तृ]

प्रयोग
किसी काम में लगना।
संज्ञा
[सं.]

प्रयोग
व्यवहार।
संज्ञा
[सं.]

प्रयोग
तांत्रिक साधन।
संज्ञा
[सं.]

प्रयोग
क्रिया का विधान।
संज्ञा
[सं.]

प्रयोग
अभिनय।
संज्ञा
[सं.]

प्रयोग
अनुष्ठान विधि।
संज्ञा
[सं.]

प्रयोगी
प्रयोग करनेवाला।
संज्ञा
[सं. प्रयोगिन्]

प्रयोजन
कार्य।
संज्ञा
[सं.]

प्रयोजन
उद्देश्य, अभिप्राय।
संज्ञा
[सं.]

प्रयोजन
उपयोग, व्यवहार।
संज्ञा
[सं.]

प्रयोजना
रूचि बढ़ाना।
संज्ञा
[सं.]

प्रयोजना
बढ़ावा।
संज्ञा
[सं.]

प्रलंब
प्रलंबासुर जो बलराम के हाथ से मारा गया था। गोवेश में यह उनके साथ खेलने आया था। हारने पर बलराम को कंधे पर चढ़ा कर यह भागा। तभी उन्होंने इसे मार डाला।
उ.- धेनुक और प्रलंब सँहारे संख-चूड बध कीन्हों- सारा. ४७९।
संज्ञा
[सं.]

प्रलंब
लटकता हुआ।
वि.

प्रयाग
अनेक यज्ञों का स्थान।
संज्ञा
[सं.]

प्रयाग
एक प्रसिद्ध तीर्थ जो गंगा-यमुना के संगम पर है।
संज्ञा
[सं.]

प्रयाण
प्रस्थान।
संज्ञा
[सं.]

प्रयाण
चढ़ाई।
संज्ञा
[सं.]

प्रयाणकाल
यात्राकाल।
संज्ञा
[सं.]

प्रयाणकाल
मृत्युकाल।
संज्ञा
[सं.]

प्रयान
गमन, प्रस्थान, जाना।
संज्ञा
[सं. प्रयाण]

प्रयास
प्रयत्न, उद्योग।
संज्ञा
[सं.]

प्रयास
श्रम, मेहनत।
उ.- बिना प्रयास मारिहौं तोकैं आजु रैनिकै प्रात-९-७९।
संज्ञा
[सं.]

प्रयास
इच्छा।
संज्ञा
[सं.]

प्रलाप
बातचीत, वार्तालाप।
उ.- विह्वल बिकल दीन दारिदबस करि प्रलाप रूक्मिनि समुझाये- १० उ.-६२।
संज्ञा
[सं.]

प्रलापी
व्यर्थ बकनेवाला।
वि.
[सं. प्रलापिन्]

प्रलोभन
लोभ, लालच।
संज्ञा
[सं.]

प्रलोभी
लोभ में फँसनेवाला।
वि.
[सं. प्रलोभिन्]

प्रवंचक
ठग, धूर्त, धोखेबाज।
वि.
[सं.]

प्रवंचना
ठगी, धूर्तता।
संज्ञा
[सं.]

प्रवक्ता
अच्छा वक्ता।
संज्ञा
[सं. प्रवत्क]

प्रवचन
व्याख्या।
संज्ञा
[सं.]

प्रवचन
उपदेश।
संज्ञा
[सं.]

प्रवर
श्रेष्ठ, प्रधान।
वि.
[सं.]

प्रलंब
लंबा।
वि.

प्रलंब
टँगा हुआ।
वि.

प्रलंब
किसी ओर निकला हुआ।
वि.

प्रलंब
शिथिल।
वि.

प्रलयंकर
प्रलयकारी।
वि.
[सं.]

प्रलय
लय को प्राप्त होना, विलीन होना।
उ.- सूरजदास अकाल प्रलय प्रभु मेटौ दास दिखाइ-९-११०।
संज्ञा
[सं.]

प्रलय
संसार का तिरोभाव या नाशा।
संज्ञा
[सं.]

प्रलय
मूर्च्छा।
संज्ञा
[सं.]

प्रलाप
बकना।
संज्ञा
[सं.]

प्रलाप
बकवाद।
संज्ञा
[सं.]

प्रवर्त
कार्यारंभ।
संज्ञा
[सं.]

प्रवर्त
एक तरह के मेघ।
उ.- अनिल वर्त, बज्रवर्त, प्रवर्त-१०-४४।
संज्ञा
[सं.]

प्रवर्त
एक गोलाकार आभूषण।
संज्ञा
[सं.]

प्रवर्तक
आरंभ करनेवाला।
संज्ञा
[सं. प्रवर्त्तक]

प्रवर्तक
चलाने वाला, संचालक।
संज्ञा
[सं. प्रवर्त्तक]

प्रवर्तक
प्रेरित करनेवाला।
संज्ञा
[सं. प्रवर्त्तक]

प्रवर्तक
उसकानेवाला।
संज्ञा
[सं. प्रवर्त्तक]

प्रवर्तन
कार्यारंभ।
संज्ञा
[सं. प्रवर्त्तन]

प्रवर्तन
संचालन।
संज्ञा
[सं. प्रवर्त्तन]

प्रवर्तन
उत्तेजना, प्रेरणा।
संज्ञा
[सं. प्रवर्त्तन]

प्रवर्तन
प्रवृत्ति।
संज्ञा
[सं. प्रवर्त्तन]

प्रवर्तित
आरंभ किया हुआ।
वि.
[सं. प्रवर्तित]

प्रवर्तित
चलाया हुआ।
वि.
[सं. प्रवर्तित]

प्रवर्तित
निकाला हुआ।
वि.
[सं. प्रवर्तित]

प्रवर्तित
उत्पन्न।
वि.
[सं. प्रवर्तित]

प्रवर्तित
प्रेरित, उत्तेजित।
वि.
[सं. प्रवर्तित]

प्रवर्षण
वर्षा।
संज्ञा
[सं.]

प्रवर्षण
एक पर्वत।
संज्ञा
[सं.]

प्रवाद
बातचीत, वार्तालाप।
संज्ञा
[सं.]

प्रवाद
जनश्रुति, जनरव।
संज्ञा
[सं.]

प्रवाद
झूठी बदनामी, अपवाद।
संज्ञा
[सं.]

प्रवान
प्रमाण।
संज्ञा
[सं. प्रमाण]

प्रवाल
मूँगा।
संज्ञा
[सं.]

प्रवाल
कोंपल , किशलय।
उ.- सिखि-सिखंड, बन-धातु बिराजत, सुमन सुगंध प्रवाल-४७८।
संज्ञा
[सं.]

प्रवास
विदेश।
संज्ञा
[सं.]

प्रवास
विदेश-वास।
संज्ञा
[सं.]

प्रवासन
देश निकाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रवासित
देश से निकाला हुआ।
वि.
[सं.]

प्रवासी
विदेश में रहनेवाला।
वि.
[सं.]

प्रवाह
जल की गति, बहाव।
संज्ञा
[सं.]

प्रवाह
वारा।
संज्ञा
[सं.]

प्रवाह
कार्य का चलते रहना।
संज्ञा
[सं.]

प्रवाह
झुकाव, प्रवृत्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रवाह
क्रम, तार, सिलसिला।
उ.- (क) सुमिरत ही ततकाल कृपानिधि बसन-प्रवाह बढ़ायौ-१-१०९। (ख) ऐसौ और कौन करूनामय बसन-प्रवाह बढ़ावै-१-१२२।
संज्ञा
[सं.]

प्रवाहित
बहाया हुआ।
वि.
[सं.]

प्रवाहित
ढोया हुआ।
वि.
[सं.]

प्रवाही
बहने या बहानेवाला।
वि.
[सं. प्रवाहिन्]

प्रविष्ट
घुसा या पैठा हुआ।
वि.
[सं.]

प्रविसना
घुसना, पैठना।
क्रि. अ.
[सं. प्रवेश]

प्रवीण, प्रवीन, प्रवीने
निपुण, कुशल, दक्ष।
उ.- अति है चतुर चातुरी जानत सकल कला जु प्रवीने-पृ. ३३५ (४२)।
वि.
[सं.]

निर्वेद
अपमान।
संज्ञा
[सं.]

निर्वेद
वैराग्य।
संज्ञा
[सं.]

निर्वेद
दुख, विषाद।
संज्ञा
[सं.]

निर्वेदी
वह (ब्रह्म) जो वेदों से भी परे है।
संज्ञा
[सं. निः + वेद]

निर्व्यलीक
छल-कपट-रहित।
वि.
[सं.]

निर्व्याज
निष्कपट।
वि.
[सं.]

निर्व्याज
बाधारहित।
वि.
[सं.]

निर्व्याधि
रोग या व्याधि से मुक्त।
वि.
[सं.]

निर्हरण
शव जलाना।
संज्ञा
[सं.]

निर्हेतु
जिसमें हेतु या कारण न हो।
वि.
[सं.]

प्रवीणता, प्रवीनता
चतुराई।
संज्ञा
[सं. प्रवीणता]

प्रवीर
भारी योद्धा, सुभट।
वि.
[सं.]

प्रबृत्त
रत, तत्पर।
वि.
[सं.]

प्रबृत्त
तैयार।
वि.
[सं.]

प्रवृत्ति
बहाव, प्रवाह।
संज्ञा
[सं.]

प्रवृत्ति
मन का झुकाव, रूचि, लगन।
संज्ञा
[सं.]

प्रवृत्ति
वृत्तांत।
संज्ञा
[सं.]

प्रवृत्ति
सांसारिक कार्यो या विषयों में लीनता।
संज्ञा
[सं.]

प्रवेश, प्रवेशनि
घुसना, पैठना।
उ.- सैसवता में हे सखी जोबन कियो प्रवेश-२०६५।
संज्ञा
[सं. प्रवेश]

प्रवेश, प्रवेशनि
गति, पहुँच।
उ.- किधौं उहि देशन गवन मग छाँड़े, धरनि न बूँद प्रवेशनि-२८२४।
संज्ञा
[सं. प्रवेश]

प्रवेशना, प्रवेसना
प्रवेश करना।
क्रि. अ.
[सं. प्रवेश]

प्रवेसि
प्रविष्ट होकर।
उ.- वृंदाबन प्रवेसि अघ मारयौ, बालक जसुमति, तेरैं-४३२।
क्रि. अ.
[सं. प्रवेश]

प्रवेशिका
वह पत्र, धन आदि जिसे दिखाकर या देकर प्रवेश किया जा सके।
संज्ञा
[सं.]

प्रव्रज्या
संन्यास।
संज्ञा
[सं.]

प्रव्रज्
न्यास।
संज्ञा
[सं.]

प्रशंस
बड़ाई, प्रशंसा।
संज्ञा
[सं. प्रशंसा]

प्रशंस
प्रशंसा के योग्य।
उ.- एक मराल पीठि आरोहण विधि भयो प्रबल प्रशंस-२३४०।
वि.
[सं. प्रशंस्य]

प्रशंसक
प्रशंसा करनेवाला।
वि.
[सं.]

प्रशंसक
खुशामदी।
वि.
[सं.]

प्रशंसन
गुणकथन, बड़ाई, सराहना।
संज्ञा
[सं.]

प्रशंसन
साधुवाद।
संज्ञा
[सं.]

प्रशंसना
तारीफ करना, सराहना।
क्रि. स.
[सं. प्रशंसन्]

प्रशंसा
स्तुति, बड़ाई, श्लाघा।
उ.- उपजत छबि कर अधर शंख मिलि सुनियत शब्द प्रशंसा-२५६६।
संज्ञा
[सं.]

प्रशंसित
सराहा हुआ।
उ.- चहुँ दिसि चाँदनी चमू चली मनहु प्रशंसित पिक बर बानी-२३८३।
वि.
[सं.]

प्रशंसी
प्रशंसा की।
उ.- (क) सूरदास प्रभु सब सुखदाता लै भुज बीच प्रशंसी-१६८५।
क्रि. स.
[हिं. प्रशंसना]

प्रशस्त
परशंसनीय।
वि.
[सं.]

प्रशस्त
चौड़ा।
वि.
[सं.]

प्रशस्ति
प्रशंसा, स्तुति।
संज्ञा
[सं.]

प्रशस्ति
पत्र का सरनामा।
संज्ञा
[सं.]

प्रशस्ति
ताम्रपत्रादि जिन पर राजाओं की कीर्ति लिखी हो।
संज्ञा
[सं.]

प्रशस्ति
प्राचीन ग्रंथ के अंत का परिचायक विवरण।
संज्ञा
[सं.]

प्रशांत
स्थिर।
वि.
[सं.]

प्रशांत
शांत।
वि.
[सं.]

प्रशाखा
शाखा की शाखा।
संज्ञा
[सं.]

प्रशासन
कर्तव्य-शिला।
संज्ञा
[सं.]

प्रशासन
शासन।
संज्ञा
[सं.]

प्रश्न
पूछताछ, सवाल।
संज्ञा
[सं.]

प्रश्न
पूछने की बात।
संज्ञा
[सं.]

प्रश्न
विचारणीय विषय।
संज्ञा
[सं.]

प्रश्नोत्तर
प्रश्न और उत्तर, संवाद।
संज्ञा
[सं.]

प्रश्रय
आश्रय स्थान।
संज्ञा
[सं.]

प्रश्रय
सहारा, आधार।
संज्ञा
[सं.]

प्रश्रय
विनय।
संज्ञा
[सं.]

प्रश्रय
विशेष ध्यान।
संज्ञा
[सं.]

प्रश्वास
नथने से बाहर आनेवाली साँस।
संज्ञा
[सं.]

प्रसंग
संबंध, लगाव।
संज्ञा
[सं.]

प्रसंग
बात या विषय का संबंध।
संज्ञा
[सं.]

प्रसंग
स्त्री-पुरूष-संयोग।
संज्ञा
[सं.]

प्रसंग
अनुरक्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रसंग
बात, विषय।
संज्ञा
[सं.]

प्रसंग
उपयुक्त अवसर।
उ.- तब तैं मैं सुधि कछू न पाई। बिनु प्रसंग तहँ गयौ न जाई-९-३१।
संज्ञा
[सं.]

प्रसंग
बात, वार्ता, विषय।
उ.- जौ अपनौ मन हरि सौं राँचै। आन उपाय-प्रसंग छाँड़ि कै, मन-बच-क्रम अनुसाँचै-१-८१।
संज्ञा
[सं.]

प्रसंग
हेतु, कारण।
संज्ञा
[सं.]

प्रसंग
विस्तार, फैलाव।
संज्ञा
[सं.]

प्रसंसत
प्रशंसा करते हैं।
उ.- आपहुँ खात प्रसंसत आपुहिं, माखन रोटी बहुत पयौ-१०-१६८।
क्रि. स.
[सं. प्रशंसना]

प्रसंसना
प्रशंसा करना।
क्रि. स.
[सं. प्रशंसन्]

प्रसन्न
संतुष्ट।
वि.
[सं.]

प्रसन्न
हर्षित, आनंदित।
वि.
[सं.]

प्रसन्न
अनुकूल।
वि.
[सं.]

प्रसन्न
निर्मल, स्वच्छ।
वि.
[सं.]

प्रसाद
प्रसन्नता।
संज्ञा
[सं.]

प्रसाद
कृपा, अनुग्रह।
उ.- (क) मुक्ति मनोरथ मन मैं ल्यावै। मम प्रसाद तैं सो वह पावै-३-१३। (ख) करहु मोहिं ब्रज रेनु देहु बृंदाबन बासा। माँगैं यहै प्रसाद और मेरैं नहिं आसा-४९२।
संज्ञा
[सं.]

प्रसाद
निर्मलता।
संज्ञा
[सं.]

प्रसाद
वह वस्तु जो देवता पर चढ़ाई जाय।
संज्ञा
[सं.]

प्रसाद
वह पदार्थ जो आचार्य या गुरू जन, पूजन, यज्ञ आदि करके या प्रसन्न होकर भक्तों या सेवकों को दें।
उ.- रिषि ता नृप सों जज्ञ करायो। दै प्रसाद यह बचन सुनायौ-६-५।
संज्ञा
[सं.]

प्रसाद
देवता की जूठन जो भक्तों या सेवकों में बाँटी जाय।
उ.- जूठन माँगि सूर जन लीन्हौ। बाँटि प्रसाद सबनि कौं दीन्हौ-३९६।
संज्ञा
[सं.]

प्रसाद
भोजन (साधु)।
संज्ञा
[सं.]

प्रसाद
काव्य का एक गुण जिसमें भाषा प्रचलित, सरल और स्वच्छ रहती है।
संज्ञा
[सं.]

प्रसाद
कोमलावृत्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रसाद
प्रासाद, महल।
संज्ञा
[सं.]

प्रसरण
काम में प्रवृत्त होना।
संज्ञा
[सं.]

प्रसरित
फैला हुआ।
वि.
[सं.]

प्रसरित
विस्तृत।
वि.
[सं.]

प्रसव
बच्चा जनना।
संज्ञा
[सं.]

प्रसव
जन्म, उत्पत्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रसव
संतान।
संज्ञा
[सं.]

प्रसव
वृद्धि।
संज्ञा
[सं.]

प्रसव
विकास।
संज्ञा
[सं.]

प्रसविता
जन्म देनेवाला।
वि.
[सं. प्रसवितृ]

प्रसविनी
जन्म देनेवाली, जननेवाली।
वि.
[सं.]

प्रसन्न
पसंद, मनोनीत।
वि.
[फ़ा. पसंद]

प्रसन्नता
संतोष।
संज्ञा
[सं.]

प्रसन्नता
हर्ष, आनंद।
संज्ञा
[सं.]

प्रसन्नता
कृपा, अनुग्रह।
संज्ञा
[सं.]

प्रसन्नता
निर्मलता, स्वच्छता।
संज्ञा
[सं.]

प्रसन्नमुख
जो सदा हँसता रहे।
वि.
[सं.]

प्रसन्नात्मा
आनंदी, मनमौजी।
वि.
[सं. प्रसन्नात्मान्]

प्रसन्नित
हर्षित, आनंदित।
वि.
[सं. प्रसन्न]

प्रसरण
बढ़ना, फैलना।
संज्ञा
[सं.]

प्रसरण
फैलाव, विस्तार।
संज्ञा
[सं.]

प्रसादना
प्रसन्न करना।
क्रि. स.
[सं. प्रसाद]

प्रसादनीय
प्रसन्न करने योग्य।
वि.
[सं.]

प्रसादी
प्रसन्न करनेवाला।
वि.
[सं. प्रसादिन्]

प्रसादी
प्रीति करनेवाला।
वि.
[सं. प्रसादिन्]

प्रसादी
कृपालु।
वि.
[सं. प्रसादिन्]

प्रसादी
शांत।
वि.
[सं. प्रसादिन्]

प्रसादी
देवी-देवता पर चढ़ाया गया पदार्थ।
संज्ञा
[सं. प्रसाद]

प्रसादी
नैवेद्य।
संज्ञा
[सं. प्रसाद]

प्रसादी
वह पदार्थ जो बड़े लोग छोटों को दें।
संज्ञा
[सं. प्रसाद]

प्रसादी
देवी-देवता की जूठन।
संज्ञा
[सं. प्रसाद]

निर्वाण, निर्वान
समाप्ति।
संज्ञा
[सं. निर्वाण]

निर्वाण, निर्वान
अस्त, डूबना।
संज्ञा
[सं. निर्वाण]

निर्वाण, निर्वान
शांति,
संज्ञा
[सं. निर्वाण]

निर्वाण, निर्वान
मुक्ति, मोक्ष।
उ.- (क) यह सुनि कै तिहिं उपज्यौ ज्ञान। पायौ पुनि तिहिं पद-निर्वान-४-१२। (ख) सूर प्रभु परस लहि लह्यौ निर्वान तेहि सुरन आकास जै जैत यह धुनि सुनाई - २६०८।
संज्ञा
[सं. निर्वाण]

निर्वासक
देशनिकाला देनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

निर्वासन
बध।
संज्ञा
[सं.]

निर्वासन
देशनिकाला।
संज्ञा
[सं.]

निर्वाह
क्रम या परंपरा का पालन।
संज्ञा
[सं.]

निर्वाह
(वचन आदि का ) निर्वाह।
संज्ञा
[सं.]

निर्वाह
समाप्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रसाधक
वस्त्राभूषण पहनानेवाला।
वि.
[सं.]

प्रसाधन
श्रृंगार, सजावट।
संज्ञा
[सं.]

प्रसाधित
सजाया-सँवारा हुआ।
वि.
[सं.]

प्रसार
विस्तार, फैलाव, पसार।
संज्ञा
[सं.]

प्रसारित
पसारा या फैलाया हुआ।
वि.
[सं.]

प्रसिद्ध
विख्यात, नामी।
वि.
[सं.]

प्रसिद्धि
ख्याति, सुनाम।
संज्ञा
[सं.]

प्रसुप्त
खूब सोया हुआ।
वि.
[सं.]

प्रसुप्त
असावधान।
वि.
[सं.]

प्रसू
जननेवाली, जननी।
संज्ञा
[सं.]

प्रसूत
उत्पन्न।
वि.
[सं.]

प्रसूत
उत्पादक।
वि.
[सं.]

प्रसूता
जननेवाली, बच्चा, जननी।
संज्ञा
[सं.]

प्रसूति
प्रसव।
संज्ञा
[सं.]

प्रसूति
उत्पत्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रसूति
कारण।
संज्ञा
[सं.]

प्रसूति
संतति।
संज्ञा
[सं.]

प्रसूति
जच्चा।
संज्ञा
[सं.]

प्रसूति
उत्पत्ति स्थान।
संज्ञा
[सं.]

प्रसून
फूल।
उ.- सुनि सठनीति प्रसून-रस लंपट अबलनि को घाँचहि-३१४५।
संज्ञा
[सं.]

प्रसृत
फैला हुआ।
वि.
[सं.]

प्रसृत
विकसित।
वि.
[सं.]

प्रसृत
प्रेरित।
वि.
[सं.]

प्रसृत
तत्पर।
वि.
[सं.]

प्रसृत
प्रचलित।
वि.
[सं.]

प्रसेद
पसीना।
उ.- तट बारू उपचार चूर जल पूर प्रसेद पनारी-२७२८।
संज्ञा
[सं. प्रस्वेद]

प्रसेन, प्रसेनजित
सत्राजित् का भाई जिसकी मणि के कारण श्रीकृष्ण को झूठा कलंक लगा था।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्तर
पत्थर।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्तर
बिछावन।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्ताव
प्रसंग, विषय, चर्चा।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्ताव
सभा में स्वीकृत मंतव्य।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्ताव
भूमिका, पूर्व वक्तव्य।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्तावना
आरंभ।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्तावना
पूर्व वक्तव्य, भूमिका।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्तावना
नाटक के विषय आदि का परिचायक प्रसंग।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्तावित
जिसके लिए प्रस्ताव हुआ हो।
वि.
[सं.]

प्रस्तुत
जिसकी चर्चा की गयी हो।
वि.
[सं.]

प्रस्तुत
उपस्थित, जो सामने हो।
वि.
[सं.]

प्रस्तुत
उद्यत, तैयार।
वि.
[सं.]

प्रस्थ
चौरस पहाड़ी भूमि।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्थान
यात्रा, गमन, कूच।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्थान
ठीक मुहूर्त पर यात्रा न कर सकने पर वस्त्रादि यात्रा की दिशा में रखवा देने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्थान
मार्ग।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्थानी
जानेवाला।
वि.
[हिं. प्रस्थान]

प्रस्न
प्रश्न, सवाल।
संज्ञा
[सं. प्रश्न]

प्रस्फुट
खिला हुआ।
वि.
[सं.]

प्रस्फुट
प्रकट।
वि.
[सं.]

प्रस्फुरण
निकलना।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्फुरण
प्रकट या प्रकाशित होना।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्राव
झरना, बहना, क्षरण।
संज्ञा
[सं.]

प्रस्वेद
पसीना।
उ.- नख छत सोनित प्रस्वेद गात तें चंदन गयो कछु छूटि-१९१२।
संज्ञा
[सं.]

प्रहर
पहर।
संज्ञा
[सं.]

प्रहरखना
आनंदित होना।
क्रि. अ.
[सं. प्रहर्षिण]

प्रहरी
पहर-पहर पर घंटा बजानेवाला।
संज्ञा
[सं. प्रहरिन]

प्रहरी
पहरा देनेवाला, पहरूआ।
संज्ञा
[सं. प्रहरिन]

प्रहलाद
हिरण्यकशिपु का पुत्र।
संज्ञा
[सं. प्रह्लाद]

प्रहर्षण
आनन्द।
संज्ञा
[सं.]

प्रहर्षण
एक अलंकार।
संज्ञा
[सं.]

प्रहसन
हास-परिहास।
संज्ञा
[सं.]

प्रहसन
हास्यरस-प्रधान नाटक।
संज्ञा
[सं.]

प्रहार
वार, आघात, चोट।
संज्ञा
[सं.]

प्रहारक
प्रहार करनेवाला।
वि.
[सं.]

प्रहारन
प्रहार करनेवाला।
वि.
[हिं. प्रहार]

प्रहारन
तोड़नेवाला।
उ.- जानि लई मेरे जिय की उन गर्व-प्रहारन उनको नाऊँ-१६५४।
वि.
[हिं. प्रहार]

प्रहारना
मारना, आघात करना।
क्रि. अ.
[सं. प्रहार]

प्रहारना
मारने को अस्त्रादि चलाना।
क्रि. अ.
[सं. प्रहार]

प्रहारित
जिस पर प्रहार हो।
वि.
[सं. प्रहार]

प्रहारि
मारकर।
उ.- दैत्य प्रहारि पाप-फल प्रेरित, सिर-माला सिव-सीस चढ़ौहौं-९-१५७।
क्रि. अ.
[सं. प्रहारना]

प्रहारी
नष्ट करनेवाला, दूर करनेवाला, भंजन करनेवाला।
उ.- (क) जाकौ बिरद है गर्ब प्रहारी, सों केसैं बिसरै-१-३७। (ख) सूरदास प्रभु गोकुल प्रगटे, मथुरा-गर्व-प्रहारी-१०-४।
वि.
[सं. प्रहारिन्]

प्रहारी
मारनेवाला।
वि.
[सं. प्रहारिन्]

प्रहारी
अस्त्र चलानेवाला।
वि.
[सं. प्रहारिन्]

प्रहारो
प्रहार करो।
उ.- डारि-अग्नि में शस्त्रनि मारो नाना भाँति प्रहारो-सारा. १२०।
क्रि. अ.
[हिं. प्रहारना]

प्रहारौं
मारूँ।
क्रि. अ.
[हिं. प्रहारना]

प्रहारौं
प्रान प्रहारौं-प्राण दे दूँ।
उ.- तब देवकी भई अति ब्याकुल कैसैं प्रान प्रहारौं-१०-४।
प्र.

प्रहारौ
आघात, चोट।
उ.- गोपाल सबनि प्यारौ, ताकौं तैं कीन्हौ प्रहारौ-३७३।
संज्ञा
[सं. प्रहार]

प्रहार्यौ
नष्ट किया, (गर्व, मान आदि) तोड़ दिया।
उ.- नृप-कन्या कौ ब्रत प्रतिपारयौ, कपट वेष इक धारयौ। तामैं प्रगट भए श्रीपति जू, अरिगन-गर्ब प्रहारयौ-१-३१।
क्रि. अ.
[हिं. प्रहारना]

प्रहारयौ
मारा, आघात किया।
उ.- डारि अगिनि मैं सस्त्रनि मारयौ, नाना भाँति प्रहारयौ।
क्रि. अ.
[हिं. प्रहारना]

प्रहारयौ
मारने के लिए चलाया, फेंका।
उ.- ऐरावत अमृत कैं प्याए। भयो सचेत इंद्र तब धाए। बृत्रासुर कौं बज्र प्रहारयौ। तिन त्रिसूल सुरपति कौं मारयौ-६-५।
क्रि. अ.
[हिं. प्रहारना]

प्रहास
अट्टहास, ठहाका।
संज्ञा
[सं.]

प्रहासी
खूब हँसने-हँसानेवाला।
वि.
[सं. प्रहासिन]

प्रहेलिका
पहेली, बुझौवल
संज्ञा
[सं.]

प्रह्लाद
आनंद।
संज्ञा
[सं.]

प्रह्लाद
हिरण्यकशिपु दैत्य का पुत्र जो विष्णु का भक्त था। पिता की विष्णु से शत्रुता थी; इसलिए पुत्र को उसने बहुत ताड़ना दी और उसके प्राण हरने के अनेक उपाय किये। अंत में विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु को मारडाला और अपने भक्त की रक्षा की।
संज्ञा
[सं.]

प्रांगण, प्रांगन
आँगन, सहन।
संज्ञा
[सं. प्रांगण]

प्रांजल
सरल, सीधा।
वि.
[सं.]

प्रांजल
सच्चा।
वि.
[सं.]

प्रांजल
जो ऊँचा-नीचा न हो, समतल।
वि.
[सं.]

प्रांत
अंत, सीमा।
संज्ञा
[सं.]

प्रांत
किनारा, छोर।
संज्ञा
[सं.]

प्रांत
ओर, तरफ।
संज्ञा
[सं.]

प्रांत
प्रदेश भू-भाग।
संज्ञा
[सं.]

प्रांतिक, प्रांतीय
प्रांत का, प्रांत संबधी।
वि.
[सं.]

प्राकाम्य
आठ सिद्धियों में एक।
संज्ञा
[सं.]

प्राकार
परकौंटा, चहारदीवारी।
संज्ञा
[सं.]

प्राकृत
प्रकृति-संबंधी।
वि.
[सं.]

प्राकृत
स्वाभाविक, नैसर्गिक, सहज।
उ.- प्राकृत रूप धरयौ हरि छिन में सिसु ह्यै रोवन लागे- सारा. ३७०।
वि.
[सं.]

प्राकृत
साधारण।
वि.
[सं.]

प्राकृत
लौकिक, भौतिक।
वि.
[सं.]

प्राकृत
बोलचाल की भाषा।
संज्ञा
[सं.]

प्राकृत
एक प्रचीन भाषा।
संज्ञा
[सं.]

निमंत्रण
भोजन का बुलावा, न्योता।
संज्ञा
[सं.]

निमंत्रना
न्योता देना।
क्रि. स.
[सं. निमंत्रण]

निमंत्रित
जिसे बुलाया गया हो।
वि.
[सं.]

निम
शलाका, शंकु।
संज्ञा
[सं.]

निम
राजा इक्ष्वाकु के एक पुत्र जिनसे मिथिला का विदेह वंश चला माना गया है। इनका स्थान मनुष्य की पलकों पर माना गया है।
उ.- मैं बिधना सों कहौं कछू नहिं नितप्रति निम को कोसौं - १४०७।
संज्ञा
[सं. निमि]

निमकौरी
निबौली।
संज्ञा
[हिं. नीम + कौड़ी]

निमग्न
डूबा हुआ।
वि.
[सं.]

निमग्न
तन्मय।
वि.
[सं.]

निमज्जक
समुद्री गोताखोर।
संज्ञा
[सं.]

निमज्जन
गोता लगाकर या डुबकी मार कर किया जानेवाला स्नान, अवगाहन।
संज्ञा
[सं.]

निर्वाहक
निर्वाह करने या निभानेवाला।
वि.
[सं.]

निर्वाहना
निभाना।
क्रि. अ.
[सं. निर्वाह]

निर्विकल्प
स्थिर, निश्चित।
वि.
[सं.]

निर्विकार
जिसमें दोष या परिवर्तन न हो।
वि.
[सं.]

निर्विघ्न
जिसमें विघ्न न हो।
वि.

निर्विघ्न
बिना किसी विघ्न या बाधा के।
क्रि. वि.
[सं.]

निर्विचार
विचाररहित।
वि.
[सं.]

निर्विवाद
बिना विवाद या झगड़े का।
वि.
[सं.]

निर्विष
जिसमें विष न हो।
वि.
[सं.]

निर्वीर्य
जिसमें बल और तेज न हो।
वि.
[सं.]

प्राकृतिक
प्रकृत से उत्पन्न।
वि.
[सं.]

प्राकृतिक
प्रकृति-संबंधी।
वि.
[सं.]

प्राकृतिक
सहज, स्वाभाविक, नैसर्गिक।
वि.
[सं.]

प्राकृतिक
साधारण।
वि.
[सं.]

प्राकृतिक
भौतिक, लौकिक।
वि.
[सं.]

प्राग
प्रयाग तीर्थ।
उ.- सुभ कुरूछेत्र, अजोध्या मिथिला प्राग त्रिबेनी न्हाये -सारा. ८२८।
संज्ञा
[सं. प्रयाग]

प्राची
पूर्व दिशा।
उ.- प्राची दिसा पेखि पूरन ससि ह्वै आयौ तन तातो- १० उ-१००।
संज्ञा
[सं.]

प्राचीन
पूर्व देश का।
वि.
[सं.]

प्राचीन
पुराना, पुरातन।
वि.
[सं.]

प्राचीन
पहले का, पिछला।
उ.- ढूँढत फिरै न पूँछन पावै आपुन ग्रह प्राचीन- १० उ. ६९।
वि.
[सं.]

प्राचीन
बूढ़ा।
वि.
[सं.]

प्राचीनता
पुरानापन।
संज्ञा
[सं.]

प्राचीनबर्ही
एक प्राचीन राजा जो अग्निगोत्रीय थे और प्रजापति कहलाते थे।
संज्ञा
[सं. प्राचीनबर्हिस]

प्राचीर
परकोटा, चहारदीवारी।
संज्ञा
[सं.]

प्राचुर्य
अधिकता।
संज्ञा
[सं. प्राचुर्य्य]

प्राच्य
पूर्व का, पूर्व-संबंधी, पूर्वीय।
वि.
[सं.]

प्राच्य
पुराना, प्राचीन, पूर्वकालीन।
वि.
[सं.]

प्राज्ञ
बुद्धिमान।
वि.
[सं.]

प्राज्ञ
पंडित, विज्ञ।
वि.
[सं.]

प्राण
वायु।
संज्ञा
[सं.]

प्राण
वायु जिससे मनुष्य जीवित रहता है।
संज्ञा
[सं.]

प्राण
साँस।
संज्ञा
[सं.]

प्राण
बल, शक्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्राण
जीवन, जान।
उ.- प्रीति पतंग करी दीपक सों आपै प्राण दह्यौ-२८०९।
संज्ञा
[सं.]

प्राण
प्राण उड़ जाना- (१) होश-हवास न रहना। (२) डर जाना। प्राण आना या प्राणों में प्राण आना- चित्त कुछ ठिकाने होना, धीरज आना। प्राण (प्राणों) का अधर या गले तक आना- मरने पर होना। उ.- प्रीतम प्यारे प्राण हमारे रहे अधर पर आइ-३०५९। प्राण (प्राणों का) मुँह को आना- (१) बहुत दुख होना। (२) मरने पर होना। प्राण खाना- बहुत तंग करना। प्राण जाना (छूटना, निकलना)- मरना। प्राण डालना- जीवन का संचार करना। प्राण छोड़ना (तजना, त्याग.,,, देना)- मरना। किसी के ऊपर प्राण देना- (१) किसी के काम या व्यवहार से बहुत दुखी होकर मरना।(२) प्राणों से भी अधिक चाहना। प्राण निकलना- (१) मरना। (२) घबरा जाना। प्राण पयान होना- मरना। प्राण पर आ पड़ना- जीवन का संकट में पड़ जाना। प्राण पर खेलना- ऐसा काम करना जिस में जान जाने का डर हो, पर इसकी परवाह न करना। उ.- हमसों मिले बरस द्वादस दिन चारिकतुम सो तूठे। सूर आपने प्राणन खेलैं ऊधौ खेलैं रूठे। प्राण पर बीतना- (१) जीवन संकट में पड़ना। (२) मर जाना। प्राण बचाना- (१) जान बचाना। (२) पीछा छड़ाना। प्राण मुट्ठी में (हथेली पर) लिये फिरना (रहना)- जान की जरा भी परवाह न करना। प्राण रखना- (१) जिला देना। (२) जान बचाना। प्राण हरना- (१) मर जाना। (२) साहस न रहना। प्राण हारति- मर जाती है। उ.- समुझत मीन नीर की बातैं, तऊ प्राण हठि हारति।
मु.

प्राण
परम प्रिय व्यक्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्राणअधार, प्राणअधारा
परम प्रिय व्यक्ति।
उ.- (क) अब ही और की और होति कछु ¨¨¨¨¨। ताते मैं पाती लिखी तुम प्राण अधारा। (ख) अपने ही गेह मधुपुरी आवन देवकी प्राण-अधारा हो।
संज्ञा
[सं.]

प्राणअधार, प्राणअधारा
पति, स्वामी।
संज्ञा
[सं.]

प्राणअधार, प्राणअधारा
प्रिय, प्यारा।
वि.

प्राणघात
हत्या, वध।
संज्ञा
[सं.]

प्राणजीवन
परम प्रिय व्यक्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्राणजीवन
वह जो प्राण का आधार हो।
संज्ञा
[सं.]

प्राणत्याग
मर जाना।
संज्ञा
[सं.]

प्राणदंड
मृत्यु का दंड।
संज्ञा
[सं.]

प्राणदाता
प्राण देनेवाला।
संज्ञा
[सं. प्राणदातृ]

प्राणदान
मरने या मारे जाने से बचाना।
संज्ञा
[सं.]

प्राणदान
प्राण देना।
संज्ञा
[सं.]

प्राणधन, प्राणधनियाँ
बहुत प्रिय व्यक्ति।
उ.- नेक रहौ माखन देउँ मेरे प्राणधनियाँ।
संज्ञा
[सं.]

प्राणधारी
जीवित।
वि.
[सं. प्राणधारिन्]

प्राणधारी
जो साँस लेता हो, चेतन।
वि.
[सं. प्राणधारिन्]

प्राणनाथ
प्रिय व्यक्ति, प्रियतम।
संज्ञा
[सं.]

प्राणनाथ
पति, स्वामी।
संज्ञा
[सं.]

प्राणनाशक
प्राण लेनेवाला।
वि.
[सं.]

प्राणपति
आत्मा।
संज्ञा
[सं.]

प्राणपति
हृदय।
संज्ञा
[सं.]

प्राणपति
पति, स्वामी।
संज्ञा
[सं.]

प्राणपति
प्रियतम।
उ.- प्राणपति की निरखि सोभा पलक परन न देहिं।
संज्ञा
[सं.]

प्राणप्यारा
बहुत प्रिय व्यक्ति, प्रियतम।
संज्ञा
[हिं. प्राण + प्यारा]

प्राणप्यारा
पति, स्वामी।
संज्ञा
[हिं. प्राण + प्यारा]

प्राण-प्रतिष्ठा
प्राण धारण कराना।
संज्ञा
[सं.]

प्राण-प्रतिष्ठा
मंदिर में मंत्रोच्चार के साथ नयी मूर्ति की प्रतिष्ठा।
संज्ञा
[सं.]

प्राणप्रद
प्राणदायक।
वि.
[सं.]

प्राणप्रद
स्वास्थ्यवर्द्धक।
वि.
[सं.]

प्राणपिरय
परम प्रिय, प्रियतम।
वि.
[सं.]

प्राणप्रिय
बहुत प्यारा व्यक्ति।
संज्ञा

प्राणप्रिय
पति।
संज्ञा

प्राणबल्लभ
प्रियतम, पति।
संज्ञा
[सं. प्राणवल्लभ]

प्राणमय
जिसमें प्राण हों।
वि.
[सं.]

प्राणवल्लभ
प्रियतम, पति।
संज्ञा
[सं.]

प्राणवायु
प्राण।
उ.- प्राणवायु पुनि आइ समावै। ताकौ इत उत पवन चलावै।
संज्ञा
[सं.]

प्राणवायु
जीव।
संज्ञा
[सं.]

प्राणहंता
प्राणघातक।
वि.
[सं. प्राणहंतृ]

प्राणहारी
प्राण हरनेवाला।
वि.
[सं. प्राणहारिन्]

प्राणांत
मरण, मृत्यु।
संज्ञा
[सं.]

प्राणांतक
प्राण लेनेवाला।
वि.
[सं.]

प्राणात्मा
जीवात्मा, जीव।
संज्ञा
[सं. प्राणत्मन्]

प्राणाधार
अत्यंत प्रिय।
वि.
[सं.]

प्राणाधार
प्रियतम, प्रेमपात्र।
संज्ञा

प्राणाधार
पति, स्वामी।
संज्ञा

प्राणाधिक
प्राण से अधिक प्यारा।
वि.
[सं.]

प्राणाधिक
पति।
संज्ञा

प्राणायाम
योग के आठ अंगों में चौथा। इसमें श्वास-प्रश्वास की गतियों को धीरे-धीरे कम किया जाता है।
संज्ञा
[सं.]

प्राणी
जिसमें प्राण हों।
वि.
[सं. प्राणिन्]

प्राणी
जीव।
संज्ञा

प्राणी
मनुष्य।
संज्ञा

प्राणी
व्यक्ति।
संज्ञा

प्राणेश
पति।
संज्ञा
[सं.]

प्राणेश
प्रिय।
संज्ञा
[सं.]

प्राणेश्वर
पति।
संज्ञा
[सं.]

प्राणेश्वर
प्रिय व्यक्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रात
सबेरे, तड़के।
उ.- प्रात जो न्हात, अघ जात ताके सकल; ताहि जमदूत रहत हाथ जोरे-१-२२२।
अव्य.
[सं. प्रातः]

प्रात, प्रातः
प्रभात, तड़का।
संज्ञा
[सं. प्रातर]

प्रातःकालीन
प्रातःकाल-संबंधी।
वि.
[सं.]

प्रातःस्मरण, प्रातःस्मरणीय
प्रातःकाल स्मरण करने योग्य, पूज्य।
वि.
[सं.]

प्रातनाथ
सूर्य।
संज्ञा
[सं. प्रातः + नाथ]

प्राता
सबेरा, प्रभात।
उ.- कहत आधे बचन भयौ प्राता-४४०।
संज्ञा
[सं. प्रातः]

प्राथमिक
पहले का।
वि.
[सं.]

प्राथमिक
प्रारंभिक।
वि.
[सं.]

प्रादुर्भाव
प्रकट होना, अस्तित्व में आना।
संज्ञा
[सं.]

प्रादुर्भाव
उत्पत्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रादुर्भाव
विकास।
संज्ञा
[सं.]

प्रादुर्भूत
जो प्रकट हुआ हो, प्रकटित।
वि.
[सं.]

प्रादुर्भूत
विकसित।
वि.
[सं.]

प्रादुर्भूत
उत्पन्न।
वि.
[सं.]

प्रादेशिक
प्रदेश-संबंधी।
वि.
[सं.]

प्राधान्य
प्रधानता, मुख्यता।
संज्ञा
[सं.]

प्रान
प्राण।
उ.- इनहीं मैं मेरे प्रान बसत हैं, तेरैं भाएँ नैंकु न माइ-७१०।
संज्ञा
[सं. प्राण]

प्रान
त्यागति प्रान- प्राण देने को तैयार है। उ.- त्यागति प्रान निरखि सायक धनु-१-२९।
मु.

प्रान
जीवन का आधार, जीने का सहारा।
उ.- तुम्हारी भक्ति हमारे प्रान-१-१६९।
संज्ञा
[सं. प्राण]

प्रानजिवन
प्राणाधार।
संज्ञा
[सं. प्राणजीवन]

निलज
लज्जाहीन, बेशर्म।
उ.-हौं तौ जाति गँवार, पतित हौं, निपट निलज, खिसिआनौ-१-१९६।
वि.
[सं. निर्लज्ज]

निलजइ, निलजई
निर्लज्जता, बेशर्मी, बेहयाई।
संज्ञा
[सं. निर्लज्ज + ई [प्रत्य.]]

निलजता, निलजताई
बेशर्मी, बेहयाई, निर्लज्जता।
संज्ञा
[सं. निर्लजता]

निलज्जी
लाजहीन (स्त्री)।
वि.
[हिं. निर्लज्ज]

निलज्ज
लज्जाहीन, बेशर्म।
उ.-इनकैं गृह रहि तुम सुख मानत। अति निलज्ज, कछु लाजन आनत-१-२८४।
वि.
[सं. निर्लज्ज]

निलय, निलै
घर।
उ.- नील निलै मिलि घंटा बिबिधि दामिन मनो षोडस सृंगार सोभित हरि हीन-सा. उ. ३८।
संज्ञा
[सं.]

निलय, निलै
(२) स्थान।
संज्ञा
[सं.]

निवछरा, निवछरो, निवछरौ
(ऐसा समय) जब बहुत काम-काज न हो, फुर्सत का या खाली (समय)।
उ.-अबहिं निवछरौ समय, सुचित ह्वै, हम तौ निधरक कीजै-१-१९१।
वि.
[सं. निवृत्त]

निवरा
जिसके वर न हो, कुमारी।
वि.
[सं.]

निवसथ
गाँव।
संज्ञा
[सं.]

प्रानजिवन
परम प्रिय व्यक्ति।
उ.- (क) कहु री ! सुमति कहा तोहिं पलटी, प्रानजिवन कैसै बन जात-९-३८। (ख) आतुर ह्वै अब छाँड़ि कौसलपुर प्रान जीवन कित चलन चहत हैं।
संज्ञा
[सं. प्राणजीवन]

प्रानपति
पति, स्वामी।
संज्ञा
[सं. प्राणपति]

प्रानपति
प्रिय व्यक्ति, प्यारा, प्राणप्रिय।
उ.- (क) मम कुटुँब की कहा गति होइ। पुनि पुनि मूरख सोचै सोइ। काल तहीं तिहिं पकरि निकारयौ। सखा प्रानपति तउ न सँभारयौ-४-१२। (ख) सूर श्रीगोपाल की छबि दृष्टि भरि भरि लोहिं। प्रानपति की निरखि सोभा पलक परन न देहिं।
संज्ञा
[सं. प्राणपति]

प्रानी
जीव, जंतु।
संज्ञा
[हिं. प्राणी]

प्रानी
मनुष्य।
उ.- सूरदास धनि धनि वह प्रानी, जो हरि कौ ब्रत लै निबह्यौ-२-८।
संज्ञा
[हिं. प्राणी]

प्रापति
उपलब्धि, प्राप्ति, मिलना।
उ.- (क) ताकों हरि-पद-प्रापति होइ-१-२३०। (ख) त्रिबिधि भक्ति कहौं सुनि अब सोइ। जातै हरि-पद प्रापति होइ-३-१३।
संज्ञा
[सं. प्राप्ति]

प्रापति
पहुँच।
संज्ञा
[सं. प्राप्ति]

प्रापना
मिलना, प्राप्त होना।
क्रि. स.
[सं. प्रापण]

प्राप्त
लब्ध।
वि.
[सं.]

प्राप्त
उत्पन्न।
वि.
[सं.]

प्राप्त
जो मिला हो।
वि.
[सं.]

प्राप्त
समुपस्थित।
वि.
[सं.]

प्राप्तयौवन
युवक, जवान।
वि.
[सं.]

प्राप्तव्य
मिलनेवाला, प्राप्य।
वि.
[सं.]

प्राप्ति, प्राप्ती
उपलब्धि।
संज्ञा
[सं. प्राप्ति]

प्राप्ति, प्राप्ती
पहुँच।
संज्ञा
[सं. प्राप्ति]

प्राप्ति, प्राप्ती
उदय।
संज्ञा
[सं. प्राप्ति]

प्राप्ति, प्राप्ती
भाग्य।
संज्ञा
[सं. प्राप्ति]

प्राप्ति, प्राप्ती
प्रवेश, प्रवृत्ति।
संज्ञा
[सं. प्राप्ति]

प्राप्ति, प्राप्ती
कंस की पत्नी का नाम जो जरासंध की पुत्री थी।
उ.- अस्ती अरू प्राप्ती दोउ पत्नी कंसराय की कहियत। जरासंध पै जाय पुकारी महाक्रोध मन दहियत-सारा. ५९६।
संज्ञा
[सं. प्राप्ति]

प्राप्य
पाने योग्य।
वि.
[सं.]

प्राप्य
जो मिल सके।
वि.
[सं.]

प्राप्य
जिस तक पहुँच हो सके।
वि.
[सं.]

प्राबल्य
प्रबलता।
संज्ञा
[सं.]

प्राबल्य
प्रधानता।
संज्ञा
[सं.]

प्रामाणिक
जो प्रमाण से सिद्ध हो।
वि.
[सं.]

प्रामाणिक
माननीय।
वि.
[सं.]

प्रामाणिक
सत्य।
वि.
[सं.]

प्रामाणिक
शास्त्रसिद्ध।
वि.
[सं.]

प्राय
समान।
वि.
[सं.]

प्रियंवद
प्रिय बचन बोलनेवाला।
वि.
[सं.]

प्रिय
प्रेमी।
संज्ञा
[सं.]

प्रिय
पति, स्वामी।
संज्ञा
[सं.]

प्रिय
प्यारा।
वि.

प्रिय
जो अच्छा लगे, मनोहर।
वि.

प्रियतम
प्राण से भी प्रिय, सबसे प्यारा।
वि.
[सं.]

प्रियतम
प्रेमी।
संज्ञा

प्रियतम
पति, स्वामी।
संज्ञा

प्रियता
प्रिय होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

प्रियदर्शन
देखने में सुन्दर, शुभदर्शन।
वि.
[सं.]

प्रारब्ध
भाग्य, किस्मत।
संज्ञा
[सं.]

प्रारब्धी
भाग्यवान्।
वि.
[सं. प्रारब्धिन्]

प्रार्थना
याचना।
संज्ञा
[सं.]

प्रार्थना
बिनती।
संज्ञा
[सं.]

प्रार्थना
विनय या विनती करना।
क्रि. स.

प्रार्थनीय
प्रार्थना करने योग्य।
वि.
[सं.]

प्रार्थी
याचक। निवेदक।
वि.
[सं. प्रार्थिन्]

प्रालब्ध
भाग्य, किस्मत।
संज्ञा
[सं. प्रारब्ध]

प्रासंगिक
प्रसंग का, प्रसंगागत।
वि.
[सं.]

प्रासाद
बहुत बड़ा मकान, महल।
संज्ञा
[सं.]

प्राय
लगभग।
वि.
[सं.]

प्रायः
बहुधा।
वि.
[सं.]

प्रायः
लगभग।
वि.
[सं.]

प्रायद्वीप
स्थल का वह भाग जो तीन ओर पानी से घिरा हो।
संज्ञा
[सं. प्रायोद्वीप]

प्रायश्चित्त
वह कृत्य जिसके करने से पाप या दोष से मुक्ति मिल जाती है।
संज्ञा
[सं.]

प्रारंभ
आरंभ।
संज्ञा
[सं.]

प्रारंभ
आदि।
संज्ञा
[सं.]

प्रारंभिक
आरंभ का।
वि.
[सं.]

प्रारंभिक
आदिम।
वि.
[सं.]

प्रारब्ध
आरंभ किया हुआ।
वि.
[सं.]

प्रियौ
प्रिय, प्यारी, रूचिकर।
उ.- आपुहिं खात प्रशंसत आपुहिं, माखन-रोटी बहुत प्रियौ-१०-१६८।
वि.
[हिं. प्रिय]

प्रीत
प्रीतियुक्त, प्रेमपूर्ण।
वि.
[सं.]

प्रीत
प्रेम, स्नेह।
संज्ञा
[सं.]

प्रीतम
प्रेमी।
संज्ञा
[सं.]

प्रीतम
पति।
संज्ञा
[सं.]

प्रीति
तृप्ति।
संज्ञा
[सं.]

प्रीति
आनंद।
संज्ञा
[सं.]

प्रीति
प्रेम, स्नेह।
उ.- तुम्हारी प्रीति हमारी सेवा गनियत नाहिंन कातें-२५२८।
संज्ञा
[सं.]

प्रीति
कामदेव की एक पत्नी।
संज्ञा
[सं.]

प्रीतिभोज
वह भोज जिसमें इष्टमित्र सप्रेम आमंत्रित हों।
संज्ञा
[सं.]

प्रियदर्शी
सबको प्रिय देखने-समझने वाला।
वि.
[सं.]

प्रियपात्र
जिससे प्रेम किया जाय।
वि.
[सं.]

प्रियभाषी
मीठी बात कहनेवाला।
वि.
[सं. प्रियभाषिन्]

प्रियवक्ता
मधुरभाषी।
वि.
[सं. प्रियवक्त]

प्रियवर
अति प्रिय।
वि.
[सं.]

प्रियवादी
प्रिय बोलनेवाला।
वि.
[सं. प्रियवादिन्]

प्रियव्रत
स्वायंभुव मनु का एक पुत्र।
उ.- प्रियव्रत बंस धरेउ हरि निज बपु ऋषभदेव यह नाम-सारा. ८५।
संज्ञा
[सं.]

प्रियव्रत
वह जिसे व्रत प्रिय हो।
संज्ञा
[सं.]

प्रिया
प्रेमिका।
संज्ञा
[सं.]

प्रिया
पत्नी।
संज्ञा
[सं.]

प्रीतिरीति
प्रेमपूर्ण व्यवहार।
संज्ञा
[सं.]

प्रीती
प्रेम, प्रीति।
उ.-सूरदास स्वामी सो छल सों, कही सकल ब्रजप्रीती-२९४२।
संज्ञा
[सं. प्रीति]

प्रीते
प्यारे, प्रिय।
उ.- सुफलकसुत लै गए दगा दे प्राणन ही प्रीते-२४९३।
वि.
[सं. प्रीति]

प्रीत्यो
प्रीति, प्रेम।
उ.- बहुरि न जीवन-मरन सो साझो करी मधुप की प्रीत्यो-२८८४।
संज्ञा
[सं. प्रीति]

प्रेक्षक
देखनेवाला, दर्शक।
संज्ञा
[सं.]

प्रेक्षण
देखने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

प्रेक्षणीय
देखने के योग्य।
वि.
[सं.]

प्रेक्षा
देखना।
संज्ञा
[सं.]

प्रेक्षा
विचार करना।
संज्ञा
[सं.]

प्रेक्षा
नाच-तमाशा देखना।
संज्ञा
[सं.]

प्रेक्षा
दृष्टि।
संज्ञा
[सं.]

प्रेक्षा
बुद्धि।
संज्ञा
[सं.]

प्रेक्षागार, प्रेक्षागृह
मंत्रणागृह।
संज्ञा
[सं.]

प्रेत
मृतक प्राणी।
संज्ञा
[सं.]

प्रेत
एक कल्पित देवयोनि जिसका रंग काला और आकृति बिकराल मानी जाती है।
संज्ञा
[सं.]

प्रेत
वह कल्पित शरीरजो मनुष्य को मरने के बाद मिलता है।
उ.- घर की नारि बहुत हित जासौं रहति सदा सँग लागी। जा छन हंस तजी यह काया, प्रेत-प्रेत कहि भागी-१-७९।
संज्ञा
[सं.]

प्रेत
नरक में रहनेवाला प्राणी।
संज्ञा
[सं.]

प्रेत
बहुत चालाक और कंजूस आदमी।
संज्ञा
[सं.]

प्रेतगृह, प्रेतगेह
श्मशान।
संज्ञा
[सं. प्रेतगृह]

प्रेतनी
भूतनी, चुड़ैल।
संज्ञा
[सं. प्रेत]

निवसथ
सीमा।
संज्ञा
[सं.]

निवसन
घर।
संज्ञा
[सं. निस् + वसन]

निवसन
वस्त्र।
संज्ञा
[सं. निस् + वसन]

निवसना
रहना, निवास करना।
क्रि. अ.
[हिं. निवस]

निवह
समूह।
संज्ञा
[सं.]

निवह
एक वायु-रूप।
संज्ञा
[सं.]

निवाई
नया, नवीन।
वि.
[सं. नव]

निवाई
अनोखा, अदभुत।
उ.-पुनि लक्ष्मी यों विनय सुनाई। डरौं रूप यह देखि निवाई।
वि.
[सं. नव]

निवाज
अनुप्रह करनेवाला, कृपालु।
उ.-खंभ फारि हरनाकुस मारथौ, जन प्रहलाद निवाज-१-२५५।
वि.
[फ़ा. निवाज़]

निवाजना
कृपा करना।
क्रि. स.
[हिं. निवाज़]

प्रेतपावक
वह प्रकाश जो जंगलों-वनों में सहसा दिखायी देता और प्रेत-लीला समझा जाता है।
संज्ञा
[सं.]

प्रेतिनी
प्रेत की स्त्री।
संज्ञा
[सं. प्रेत]

प्रेती
प्रेत-उपासक।
संज्ञा
[सं. प्रेत]

प्रेम
प्रिय।
उ.- मेरे लाल के प्रेम खिलौना ऐसौ को ले जैहै री-७११।
वि.
[सं.]

प्रेम
प्रीति, अनुराग।
उ.- सूरदास प्रभु बोलि न आयो प्रेम पुलकि सब गात-२५३१।
संज्ञा

प्रेम
ममता।
संज्ञा

प्रेम
लोभ, माया।
संज्ञा

प्रेमपात्र
वह जिससे प्रेम किया जाय।
संज्ञा
[सं.]

प्रेमपुलक
प्रेम-जनित रोमांच।
संज्ञा
[सं.]

प्रेमा
स्नेह।
संज्ञा
[सं. प्रेमन्]

प्रेमा
स्नेही।
संज्ञा
[सं. प्रेमन्]

प्रेमा
राधा की एक सखी का नाम।
उ.- प्रेमा, दामा रूपा हंसा रंगा हरषा जाउ-१५८०।
संज्ञा

प्रेमातुर
प्रेम के कारण व्याकुल, प्रेम-पीड़ित।
उ.- गोपीजन प्रेमातुर तिनकौं सुख दीन्हौं-८-३९४।
वि.
[प्रेम + आतुर]

प्रेमालाप
प्रेमपूर्ण संलाप।
संज्ञा
[सं.]

प्रेमाश्रु
प्रेम के आँसू।
संज्ञा
[सं.]

प्रेमी
अनुरागी।
संज्ञा
[सं. प्रेमिन्]

प्रेमी
आसक्त।
संज्ञा
[सं. प्रेमिन्]

प्रेय
प्रिय, प्यारा।
वि.
[सं.]

प्रेयस्
प्यारा व्यक्ति, प्रियतम।
संज्ञा
[सं.]

प्रेयसी
प्रेमिका।
संज्ञा
[सं.]

प्रौढ़
जिसकी युवावस्था समाप्ति पर हो।
वि.
[सं.]

प्रौढ़
पुष्ट, दृढ़।
वि.
[सं.]

प्रौढ़
गंभीर, गूढ़।
वि.
[सं.]

प्रौढ़
पुराना।
वि.
[सं.]

प्रौढ़
चतुर, निपुण।
वि.
[सं.]

प्रौढ़ता
प्रौढ़ होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

प्रौढ़त्व
प्रौढ़ होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

प्रोढ़ा
स्त्री जिसकी युवावस्था समाप्ति पर हो।
संज्ञा
[सं.]

प्रोढ़ा
काम-कला-निपुण नायिका।
संज्ञा
[सं.]

प्रौढ़ोक्ति
एक काव्यालंकार।
संज्ञा
[सं.]

प्रेरक
प्रेरणा देनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रेरणा
प्रवृत्त या नियुक्त करने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

प्रेरना
प्रेरित करना।
क्रि. स.
[सं. प्रेरण]

प्रेरित
जो कोई कार्य करने को उत्साहित या प्रवृत्त किया गया हो।
वि.
[सं.]

प्रेरित
धकेला हुआ।
वि.
[सं.]

प्रेरै
प्रेरित करता है, प्रवृत्त करता है, कार्य-विशेष में लगाता है, उत्तेजना या उत्साह प्रदान करता है।
उ.- मन बस होत नाहिंनै मेरैं। जिन बातनि तैं बह्यौ फिरत हौं, सोई लै लै प्रेरै-१-२०६।
क्रि. स.
[सं. प्रेरण]

प्रेर्यौ
प्रवृत्त किया, लगाया, बढ़ाया।
उ.- भीषम ताहि देखि मुख फेरयौ। पारथ जुद्ध रथ फेर्यौ-१-२७६।
क्रि. स.
[सं. प्रेरण]

प्रेषक
भेजनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रेषण
भेजना, रवाना करना।
संज्ञा
[सं.]

प्रेषित
भेजा या रवाना किया हुआ।
वि.
[सं.]

प्रोक्त
कहा हुआ, दोहराया हुआ।
वि.
[सं.]

प्रोत
अच्छी तरह मिला या छिपा हुआ।
वि.
[सं.]

प्रोत्साह
अधिक उत्साह या उमंग।
संज्ञा
[सं.]

प्रोत्साहक
उत्साह या उमंग बढ़ानेवाला।
संज्ञा
[सं.]

प्रोत्साहन
उत्साह या उमंग बढ़ाना।
संज्ञा
[सं.]

प्रोत्साहित
जो उत्साह या उमंग से पूर्ण हो।
वि.
[सं.]

प्रोषित
विदेश गया हुआ, प्रवासी।
वि.
[सं.]

प्रोषितपतिका
वह नायिका जो पति के विदेश जाने से उसके विरह में दुखी हो।
संज्ञा
[सं.]

प्रोषितभार्थ
वह नायक जो नायिका के विदेशा जाने से उसके विरह में दुखी हो।
संज्ञा
[सं.]

प्रौढ़
खूब बढ़ा हुआ।
वि.
[सं.]

प्लक्ष, प्लच्छ
सात कल्पित द्वीपों में एक।
उ.- जम्बू, प्लच्छ, क्रौंच, सराक साल्मलि, कुस, पुष्कर भरपूर-सारा. ३४।
संज्ञा
[सं. प्लक्ष]

प्लावन
जल की बाढ़ या बहिया।
संज्ञा
[सं.]

प्लीहा
पेट की तिल्ली।
संज्ञा
[सं. प्लीहन्]

प्लुत
टेढ़ी चाल।
संज्ञा
[सं.]

प्लुत
तीन मात्राओं का।
संज्ञा
[सं.]

देवनागरी वर्णमाला का बाईसवाँ व्यंजन और प वर्ग का दूसरा वर्ण जिसका उच्चारण-स्थान ओष्ठ है।

फंका
कोई सूखा महीन चूर्ण लेकर फाँकने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. फाँकना]

फंका
चूर्ण की एक बार में फाँकी जानेवाली मात्रा।
संज्ञा
[हिं. फाँकना]

फंका
टुकड़ा, कतरा।
संज्ञा
[हिं. फाँकना]

फंकी
फाँकने की क्रिया।
संज्ञा
[सं. फंका]

फंकी
चूर्ण की मात्रा जो एक बार में फाँकी जाय।
संज्ञा
[सं. फंका]

फंग, फँग
फंदा, बंधन।
उ.- (क) सदा जाहु चोरटी भई, आजु परी फँग मोर-१०२३। (ख) दूरि करौं लँगराई वाकी, मेरे फंग जो परिहै-१२६४। (ग) अब तो स्याम परे फँग मेरे सूधे काहे न बोलत-१५१०। (घ) चतुर काम फँग परे कन्हाई अबधौं इनहिं बुझावै को री-१५९३। (ङ) मति कोई प्रीति के फंग परै-२८०८।
संज्ञा
[सं. बंध]

फंग, फँग
प्रीति या अनुराग का बंधन।
उ.- (क) रैनि कहूँ फँग परे कन्हाई कहति सबै करि दौर-२०९०। (ख) कीधौं कतहूँ लमि रहे, फँग परे पराए-२१५९।
संज्ञा
[सं. बंध]

फंद
बंध, बंधन।
उ.- (क) हमैं नन्दनन्दन मोल लिये। जम के फंद काटि मुकराये, अभय अजाद किये-१-१७१। (ख) काटौ न फंद मों अन्ध के अब विलंब कारन कवन-१-१५०। (ग) त्यागे भ्रम-फंद द्वंद निरखि के मुखारबिंद सूरदास अति अनंद मेटे दुख भारे।
संज्ञा
[सं. बंध, हिं. फंदा]

फंद
सस्सी या बाल का फंदा, जाल, फाँस।
उ.- (क) माधौ जी, मन सबही बिधि पोच।¨¨¨¨¨¨ लुबध्यौ स्वाद मीन-आमिष ज्यौं, अवलोक्यौ नहिं फंद-१-१०२। (ख) हरि-पद-कमल को मकरन्द। मलिन मति मन मधुप परिहरि बिषय नीर-रस फंद। (ग) मनहुँ काम रचि फंद बनाए कारन नन्दकुमार-१०७९।
संज्ञा
[सं. बंध, हिं. फंदा]

फंद
छल, धोखा।
संज्ञा
[सं. बंध, हिं. फंदा]

फंद
भेद, रहस्य।
संज्ञा
[सं. बंध, हिं. फंदा]

फंद
दुख, कष्ट।
संज्ञा
[सं. बंध, हिं. फंदा]

फंद
नथ, बाली आदि की गूँज जिसमें काँटी फँसायी जाती है।
संज्ञा
[सं. बंध, हिं. फंदा]

फंदत
फंदे में पड़ता है।
उ.- चारौ कपट पांछ ज्यों फंदत-१०४२।
क्रि. अ.
[हिं. फंदना]

फंदन
बंध, बंधन या फंदे में।
उ.- (क) आरतिवंत सुनत गजक्रंदन, फंदन काटि छुड़ायौ-१-१८८। (ख) कमल मध्य मनु द्वै खग खंजन बँधे आइ उड़ि फंदन-४७६।
संज्ञा
[सं. बंध, हिं. फंदा]

फंदना
फंदे में पड़ना, फँसना।।
क्रि. अ.
[हिं. फंदा]

फंदना
लाँघना, उल्लंघन करना।
क्रि. स.
[हिं. फाँदना]

फंदरा
फंदा।
संज्ञा
[हिं. फंदा]

फंदवार
फंदा लगानेवाला।
वि.
[हिं. फंदा]

फंदा
सस्सी, डोरी आदि का घेरा जो किसी को फँसाने के लिए बनाया गया हो, फनी, फाँद।
संज्ञा
[सं. पाश या बंध]

फंदा
फाँस, जाल।
उ.- फंदा फाँसि कमान बान सों काहू देख्यो डारत मारी।
संज्ञा
[सं. पाश या बंध]

फंदा
फंदा लगना- धोखे में फँस जाना। फंदा लगाना- (१) फँसाने के लिए जाल पैलाना। (२) अपनी चाल में फँसाने का प्रयत्न करना। फंदे में पड़ना- (१) जाल में फँसना। (२) किसी के वश में होना।
मु.

फँदाई
पास, फाँस, जाल।
उ.- मोह्यौ जाइ कनक-कामिनि-रस, ममता, मोह बढ़ाई। जिह्वा -स्वाद मीन ज्यों उरझ्यौ सूझी नहीं फँदाई-१-१४७।
संज्ञा
[हिं. फंदा]

फँदाना
जाल में फँसाना।
क्रि. स.
[हिं. फंदना]

फँदाना
कुदाना, उछालना।
क्रि. स.
[हिं. फंदन]

फँकाना
हकलाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फँसना
बंधन या फंदे में पड़ना।
क्रि. स.
[हिं. फाँस]

फँसना
उलझना, अटकना।
क्रि. स.
[हिं. फाँस]

फँसना
किसी से फँसना- किसी से वासनायुक्त प्रेम होना। बुरा फँसना- विपत्ति या झंझट में पड़ना।
मु.

फँसरी
फँदा, पाश, बंधन।
सूरदास तैं कछू सरी नहिं, परी काल-फँसरी-१-७१।
संज्ञा
[सं. पाश, हिं. फंसना या फंदा]

फँसाना
बंधन या फंदे में अटका लेना।
क्रि. स.
[हिं. फँसाना]

फँसाना
उलझाना, अटकाना।
क्रि. स.
[हिं. फँसाना]

फँसाना
अपने वश में करना।
क्रि. स.
[हिं. फँसाना]

फँसिहारा
फँसा लेनेवाला।
वि.
[हिं. फाँस]

फँसिहारिनि
फँसानेवाली।
उ.- फँसिहारिनि बटपारिनि हम भईं आपुन भये सुधर्मा भारी-११६०।
वि.
[हिं. फाँसिहारा]

फक
सफेद।
वि.
[सं. स्फटिक]

फक
बदरंग।
वि.
[सं. स्फटिक]

फक
चेहरा फक हो (पड़) जाना- घबरा जाना।
मु.

फकड़ी
दुर्दशा, दुर्गति।
संज्ञा
[हिं. फक]

फकत
बस।
वि.
[अ. फ़क़त]

फकत
केवल।
वि.
[अ. फ़क़त]

फकीर
भिखमंगा, साधु।
संज्ञा
[अ. फ़क़ीर]

फकीर
साधु, संन्यासी।
संज्ञा
[अ. फ़क़ीर]

फकीर
ऐसा निर्धन जिसके पास कुछ न हो।
संज्ञा
[अ. फ़क़ीर]

निवाजिश
कृपा, दया।
संज्ञा
[फ़ा.]

निवाजैं
अनुग्रह करें, कृपा करके अपना लें।
उ.-जाकौं दीनानाथ निवाजैं। भवसागर मैं कबहूं न झूकै, अभय निसाने बाजैं-१-३६।
वि.
[हिं. निवाजना]

निवाज्यो, निवाज्यौ
कृपा करके अपना लिया।
उ.-सकटा तृना इनहीं संहारथौ काली इनहिं निवाज्यो-२५८१।
क्रि. स.
[हिं. निवाजना]

निवाड़
मोटे सूत की बिनी पट्टी।
संज्ञा
[फ़ा. नवार]

निवान
झुकाना, नीचे करना।
संज्ञा
[सं. निम्न]

निवार
तिन्नी का धान, पसही।
संज्ञा
[सं. नीवार]

निवारक
रोकनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

निवारक
मिटाने या नष्ट करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

निवारति
दूर करती हे, मिटाती है।
झझकि उठथौ सोवत हरि अबहीं, (जसुमति) कछु पढ़ि तन-दोष निवारति -१०-२००।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

निवारण, निवारन
रोकने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. निवारण]

फकीरी
भिखमंगापन।
संज्ञा
[हिं. फकीर]

फकीरी
संन्यास, साधुता।
संज्ञा
[हिं. फकीर]

फकीरी
निर्धनता, गरीबी।
संज्ञा
[हिं. फकीर]

फखर
गर्व, अभिमान।
संज्ञा
[फ़ा. फख्र]

फग
बंधन।
संज्ञा
[हिं. फंग]

फग
अनुराग।
संज्ञा
[हिं. फंग]

फगुआ
होली।
संज्ञा
[हिं. फागुन]

फगुआ
फागुन का आमोद- प्रमोद, रंग छिड़कना, गाली गाना आदि।
संज्ञा
[हिं. फागुन]

फगुआ
फागुन के अश्लील गीत।
संज्ञा
[हिं. फागुन]

फगुआ
फगुआ खेलने के उपलक्ष में दिया जानेवाला उपहार।
उ.-(क) अब काहे दुरि रहे साँवरे ढोटा फगुआ देहु हमार-२४०४। (ख) सूरदास प्रभु फगुआ दीजै चिरजीवौ राधा बर जोरी-२८९४।
संज्ञा
[हिं. फागुन]

फगुआना
फागुन में रंग छिड़कना और अश्लील गीत गाकर आनंद मनाना।
क्रि. अ.
[हिं. फगुआ]

फगुनहट
फागुन की वर्षा।
संज्ञा
[हिं. फांगुन]

फगुहरा, फगुहारा
फागुन का उत्सव मनाने, रंग खेलने और गीत गानेवाला।
संज्ञा
[हिं. फागुन + हारा]

फजर
सबेरा, प्रातःकाल।
संज्ञा
[अ.]

फजल
कृपा, अनुग्रह।
संज्ञा
[अ.]

फजीहत
दुर्दशा, दुर्गति।
संज्ञा
[अ.]

फजूल
व्यर्थ, बेकार।
वि.
[अ. फुजूल]

फट
फैली और पतली चीज के हिलने, झटकने या गिरने का शब्द।
संज्ञा
[अनु.]

फट
फट से- झट, तुरंत।
मु.

फटक
सूप जिसमें रखकर अनाज साफ किया जाय।
मूँग-मसूर उरद चनदारी। कनक-फटक धरि फटकि पछारी-३९६।
संज्ञा
[हिं. फटकना]

फटकना
सूप से फटककर साफ करना।
क्रि. स.
[अनु. फट]

फटकना
फटकना-पछोरना- (१) सूप से फटककर साफ करना। (२) जाँचना-परखना।
मु.

फटकना
रुई आदि को फटके से धुनना।
क्रि. स.
[अनु. फट]

फटकना
जाना, पहचाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फटकना
दूर होना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फटकना
तड़फड़ाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फटकना
हाथ-पैर मारना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फटका
रुई धुनने की धुनकी।
संज्ञा
[अनु.]

फटकाई
फेंकी, दूर की।
उ.-मोको जुरि मारन जब धाईं तबहिं दीन्हीं गेंडुरि फटकाई।
क्रि. स.
[हिं. फटकाना]

फटकाना
फटकने का काम कराना।
क्रि. स.
[हिं. फटकना]

फटक
स्फटिक।
संज्ञा
[सं. स्फटिक, पा. फटकि]

फटक
झट, तुरंत, तत्क्षण।
क्रि. वि.

फटकत
फटफटाता है, 'फटफट' शब्द करता है
उ.-फटकत स्रवन स्वान द्वारे पर, गररी करत लराई। माथे पर ह्वै काग उड़ान्यौ, कुसगुन बहुतक पाई -५४१।
क्रि. स.
[हिं. फटकना]

फटकत
सूप से फटक कर अनाज साफ करता है।
उ.-झूठी बात तुसी सी बिन कन फटकत हाथ न अवै-३२८७।
क्रि. स.
[हिं. फटकना]

फटकन
महीन या मिला हुआ अनाज और कूड़ा जो फटकने से बच जाय।
संज्ञा
[हिं. फटकना]

फटकन
फेंकना, चलाना, मारना।
क्रि. स.

फटकन
फ़टकन लग्यो-मारने लगा।
उ.-बहुरि तरु लेहि पाषान फटकन लग्यौ हल मुसल करन परहार बाँके-१० उ.-४५।
प्र.

फटकना
फटफटाना, फटफट करना।
क्रि. स.
[अनु. फट]

फटकना
झटकना, पटकना, फेंकना।
क्रि. स.
[अनु. फट]

फटकना
फेंककर मारना।
क्रि. स.
[अनु. फट]

फटकाना
फेंक देना।
क्रि. स.
[हिं. फटकना]

फटकार
झिड़की, दुतकार
संज्ञा
[हिं. फटकारना]

फटकारना
फेंक कर मारना।
क्रि. स.
[अनु.]

फटकारना
झटका देकर हिलाना।
क्रि. स.
[अनु.]

फटकारना
लेना, प्राप्त करना।
क्रि. स.
[अनु.]

फटकारना
पटक-पटत कर धोना।
क्रि. स.
[अनु.]

फटकारना
दूर फेंकना।
क्रि. स.
[अनु.]

फटकारना
हटाना, अलग करना।
क्रि. स.
[अनु.]

फटकारना
कड़ी और खरी बातें करना।
क्रि. स.
[अनु.]

फटकारी
फेंक दी।
उ.-(क) घींच मरोरि दियौ कागासुर मेरैं ढिंग फटकारी-१०-६०। (ख) जमुना दह गेंडुरि फटकारी फोरी सिर की गगरी।
क्रि. स.
[हिं. फटकारना]

फटना
चिरना, खंडित होना, टूटना।
क्रि. अ.
[हिं. फाड़ना]

फटना
छाती फटना- बहुत दुख होना। चित्त या मन फटना- संबंध रखने को जी न चाहना।
मु.

फटना
झटका लगने से अलग होना।
क्रि. अ.
[हिं. फाड़ना]

फटना
छिन्न-भिन्न हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. फाड़ना]

फटना
अलग या पृथक होना,
क्रि. अ.
[हिं. फाड़ना]

फटना
पानी और सार भाग अलग होना।
क्रि. अ.
[हिं. फाड़ना]

फटना
बहुत अधिक प्राप्त हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. फाड़ना]

फटना
फट पड़ना- अचानक आ जाना।
मु.

फटना
बहुत अधिक पीड़ा होना।
क्रि. अ.
[हिं. फाड़ना]

फटफट
फटफट होना।
संज्ञा
[अनु.]

फटकि
सूप पर फटक कर साफ करके, कूड़ा-कर्कट निकालकर।
क्रि. स.
[हिं. फटकना]

फटकि
फटकि पछोरी- सूप पर फटक कर साफ की है। उ.-मूँग, मसूर, उरद, चनदारी। कनक-फटक धरि फटकि पछारी-३९६। फटकि पछोरे- जाँच या परख कर। उ.-तुम मधुकर निर्गुन निज नीके देखे फटकि पछोरे-३२७६। फटकि पिछोर्यौ- छान छूनकर या खोज-खाजकर गवाँ दी। उ.-नाच कछयौ, अब घूँघट छोर्यौ, लोक-लाज सब फटकि पिछोर्यौ-१२०१।
मु.

फटकि
फटफटाकर।
उ.-बिषधर झटकी पूँछ, फटकि सहसौ फन काढ़ौ-५९।
क्रि. स.
[हिं. फटकना]

फटकि
फेंककर, चलाकर।
असुर गजरूढ़ ह्वै गदा मारे फटकि स्याम अंग लागि सो गिरे ऐसे-१० उ.-३२।
क्रि. स.
[हिं. फटकना]

फटके
आये, लौटे।
उ.-मिले जाइ हरदी चूना त्यों फिरि न सूर फटके- पृ. ३३६ (५२)।
क्रि. अ.
[हिं. फटकना]

फटके
दूर हुए, अलग हो गये।
उ.-ललित त्रिभंगी छबि पर अटके फटके मोसों तोरि- पृ. ३२२ (१४)।
क्रि. अ.
[हिं. फटकना]

फटकै
फटकता है।
क्रि. स.
[हिं. फटकना]

फटकै
भुस फटकै-निरर्थक या मूर्खता का प्रयास करता है।
उ.-सूर स्याम तजि को भुस फटकै मधुप तुम्हारैं हेति-३२५६।
प्र.

फटक्यौ
फटका, झटका, फेंका।
(क) कंठ चाँपि बहु बार फिरायौ, उ.-गहि फटक्थौ, नृप पास परयौ-१०-५९। (ख) नेक फटक्यौ लात, सब्द भयौ आघात, गिरथौ भहरात, सकटा सँहारयौ।
क्रि. स.
[हिं. फटकना]

फटत
फटता है, चिरता है, टूटता है।
उ.-चटचटात अँग फटत हैं, राखु राखु प्रभु मोहिं-५८९।
क्रि. अ.
[हिं. फटना]

फटिक
संगमरमर।
संज्ञा
[सं. स्फटिक, पा. फटिक]

फटिकाई
फेंककर।
उ.- मोक जुरि मारन जब आईं तब दीनी गेंडुरि फटिकाई-८५६।
क्रि. स.
[हिं. फटकाना]

फट्यो
टूक-टूक हुआ।
उ.- यह सब दोष हमहिं-लागत है बिछुरत फटयौ न हियो-२६९२।
क्रि. अ.
[हिं. फटना]

फड़
जुए का दाँव।
संज्ञा
[सं. पण]

फड़
जुए का अड्डा।
संज्ञा
[सं. पण]

फड़
माल खरीदने-बेचने का स्थान।
संज्ञा
[सं. पण]

फड़
पक्ष, दल।
संज्ञा
[सं. पण]

फड़
विवाह में वह अवसर जब लेन-देन चुकता हो।
संज्ञा
[सं. पण]

फड़क
फड़कने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[अनु.]

फड़क
फड़क उठना- उमंग में आना। फड़क उठना (जाना)- मुग्ध हो जाना।
मु.

फटफट
बकवाद।
संज्ञा
[अनु.]

फटफटाना
बकवाद करना।
क्रि. स.
[अनु.]

फटफटाना
फड़फड़ाना।
क्रि. स.
[अनु.]

फटफटाना
इधर-उधर घूमना।
क्रि. स.
[अनु.]

फटफटाना
हाथ-पैर मारना।
क्रि. स.
[अनु.]

फटफटाना
फटफट शब्द होना।
क्रि. अ.

फटा
छेद, छिद्र।
संज्ञा
[हिं. फटना]

फटि
फाड़कर, छिन्न-भिन्न, करके।
उ.- मनहुँ मथत सुर सिंधु, फेन फटि, दयौ दिखाई पूरन चंद-१०-२०४।
क्रि. अ.
[हिं. फटना]

फटि
चिरकर, फटकर।
उ.- फटि तब खंभ भयौ द्वै फारि-८-२१।
क्रि. अ.
[हिं. फटना]

फटिक
एक प्रकार का पारदर्शक सफेद पत्थर, बिल्लौर।
उ.- (क) ज्यौं गज फटिक सिला मैं देखत, दसननि डारत हति-१-३००। (ख) ऐसे कहत गए आने पुर सबहिं बिलक्षण देख्यौ। मणिमय महल फटिक गोपुर लखिओं कनक भूमि अवरेख्यौ-।
संज्ञा
[सं. स्फटिक, पा. फटिक]

फड़कन
फड़फड़ाहट।
संज्ञा
[हिं. फड़कना]

फड़कन
धड़कन।
संज्ञा
[हिं. फड़कना]

फड़कन
लालसा, उत्सुकता।
संज्ञा
[हिं. फड़कना]

फड़कन
तेज, चंचल।
वि.

फड़कन
भड़कनेवाला।
वि.

फड़कना
फड़फड़ाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फड़कना
अंग या शरीर में गति या स्फुरण होना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फड़कना
हिलना-डोलना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फड़कना
बोटी बोटी फड़कना- (१) बहुत चंचलता होना। (२) बड़ी उमंग होना।
मु.

फड़कना
घबराना व्याकुल होना।
क्रि. अ.
[अनु.]

निवारी
त्याग दी, छोड़ दी।
उ.-रावन हरन सिया कौ कीन्हो, लुनि नँदनंदन नींद निवारी-१०-१९८।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

निवारी
सकै निवारी-हटा सकता है, रोक सकता है।
उ.-कबहूँ जुवाँ देहिं दुख भारी। तिनकौं सो नहिं सकै निवारी-३-१३।
प्र.

निवारी
जूही की जाति का एक पौधा या उसका फूल जो सफेद होता है।
संज्ञा
[सं. नेपाली]

निवारे
दूर किये, नष्ट किये, हटाये।
उ.-सूरदास प्रभु अपने जन के नाना त्रास निवारे-१-१०।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

निवारे
रोक दिये, काट दिये।
उ.-रुक्मिनी भय कियो स्याम धीरज दियो, बान से बान तिनके निवारे-१० उ.-२१।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

निवारैं
रोकें, मना करें।
उ.-पुनि जब षष्ट बरष कौ होइ। इत-उत खेल्यौ चाहै सोइ। माता-पिता निवारैं जबहीं। मन मैं दुख पावै सो तबहीं-३-१३।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

निवारै
छोड़ती या त्यागती है।
उ.-जब तैं गंग परी हरि-पग ते बहिबो नहीं निवारै-३१८९।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

निवारौं
दूर करूँ, हटाऊँ, नाश करूँ।
उ.-करौं तपस्या, पाप निवारौं-१-२६१।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

निवारौ
दूर करो।
उ.-प्रभु मेरे गुन- अवगुन न बिचारौ। कीजै लाज सरन आए की, रवि-सुत आस निवारौ-१-१११।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

निवारौ
मिटाया, हटाया, दूर किया।
उ.-कियौ न कबहूँ बिलंब कृपानिधि, सादर सोच निवारौ-१-१५७। (ख) अंबरीष कौ साप निवारौ-१-१७२।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

फड़कना
पंख हिलना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फड़काना
हिलाना।
क्रि. स.
[हिं. फड़कना]

फड़काना
उमंग दिलाना।
क्रि. स.
[हिं. फड़कना]

फड़फड़ाना
फड़फड़ करना।
क्रि. स.
[अनु.]

फड़फड़ाना
फड़फड़ होना।
क्रि. अ.

फड़फड़ाना
घबराना, तड़पना।
क्रि. अ.

फड़फड़ाना
उमंग में होना, उत्सुक होना।
क्रि. अ.

फड़ुआ, फड़ुहा
फावड़ा।
संज्ञा
[सं. फावड़ा]

फड़ालना
उलटना-पलटना।
क्रि. स.
[सं. स्फरण]

फण
साँप का फन।
संज्ञा
[सं.]

फतह
सफलता।
संज्ञा
[अ.]

फतूह
विजय।
संज्ञा
[हिं. फतह का बहु.]

फतूह
लूट का माल।
संज्ञा
[हिं. फतह का बहु.]

फतूही
एक तरह की सदरी।
संज्ञा
[अ.]

फते, फतेह
विजय, जीत।
संज्ञा
[हिं. पतह]

फदकना
फदफद' करना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फन
साँप का फण।
उ.- भूमि अति डगमगी, जोगिनी सुनि जगी, सहस फन सेस कौ सीस काँप्यौ-९-१०६।
संज्ञा
[सं. फण]

फन
फन पीटना- बहुत हाथ-पैर मारना।
मु.

फन
गुण।
संज्ञा
[फ़ा.]

फन
विद्या।
संज्ञा
[फ़ा.]

फण
फंदा।
संज्ञा
[सं.]

फणकर फणधर
साँप।
संज्ञा
[सं.]

फणिक
साँप, नाग।
संज्ञा
[सं. फणी]

फणौद्र
शेषनाग।
संज्ञा
[सं.]

फणौद्र
वासुकि।
संज्ञा
[सं.]

फणी
साँप।
संज्ञा
[सं. फणन्]

फणीश
शेषनाग।
संज्ञा
[सं.]

फणीश
वासुकि।
संज्ञा
[सं.]

फतवा
आचार्य की धर्म-व्यवस्था।
संज्ञा
[अ. फतवा]

फतह
विजय।
संज्ञा
[अ.]

फनस
कटहल।
संज्ञा
[सं. पनस, प्रा. फनस]

फनिग
साँप।
संज्ञा
[हिं. फणि + इंग]

फनिंगन
साँप।
उ.- कोकिल कीर कपोल किसलता हाटक हंस फनिंगन की।
संज्ञा
[हिं. फनिंग]

फनि
नाग।
संज्ञा
[सं. फणि]

फनि
कालियनाग।
उ.- सहसौ फन फनि फुंकरै, नैंकु न तिन्हैं बिकार-५८९।
संज्ञा
[सं. फणि]

फनिक, फनिग
साँप, सर्प।
उ.- नील पाट पिरोइ मनि-गन, फनिग धोखैं जाइ-१०-१७०।
संज्ञा
[सं. फणिक]

फनिधर
साँप।
संज्ञा
[सं. फणिधर]

फनिपति
शेष।
संज्ञा
[सं. फणिपति]

फनिपति
वासुकि।
संज्ञा
[सं. फणिपति]

फनियाला
साँप।
संज्ञा
[हिं. फणि + हिं. इयाला]

फन
कला, दस्तकारी।
संज्ञा
[फ़ा.]

फन
छलने का ढंग।
संज्ञा
[फ़ा.]

फनकना
फनफन' करना, फनफनाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फनकार
फनफन' होने की ध्वनि।
संज्ञा
[अनु.]

फनगना
अँकुर निकरना कल्ला फूटना।
क्रि. अ.
[हिं. फुनगी]

फनना
कार्यारंभ होना।
क्रि. अ.
[हिं. फानना]

फनफनाना
फनफन' करना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फनफनाना
चंवलता से इधर-उधर हिलना-डोलना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फनपति
शेषनाग।
संज्ञा
[सं. फणि + पति=स्वामी]

फनपति
वासुकि।
संज्ञा
[सं. फणि + पति=स्वामी]

फनिराज
शेषनाग।
संज्ञा
[सं. फणिराज]

फनिराज
वासुकिनाग।
संज्ञा
[सं. फणिराज]

फनींद्र
शेषनाग।
उ.- जे नख-चन्द्र फनींद्र हृदय ते एकौ निमिष न टारत-१३४२।
संज्ञा
[सं. फणीन्द्र]

फनींद्र
वासुकिनाग।
संज्ञा
[सं. फणीन्द्र]

फनी
शेषनाग।
उ.- कच्छप अध आसन अनूप अति, डाँड़ी सहसफनी-२-२८।
संज्ञा
[हिं. फणी]

फफदना
बढ़ना, फैलना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फफसा
पोला।
वि.
[सं. फुप्फुस]

फफसा
स्वादहीन।
वि.
[सं. फुप्फुस]

फफूँदी
साड़ी-बंदन, नीदी।
संज्ञा
[हिं. फुबती]

फफूँदी
एक तरह की सफेद काई।
संज्ञा
[देश. भुकड़ी]

फरक
फड़कने का भाव या क्रिया।
संज्ञा
[हिं. फड़क]

फरक
चपलता, चंचलता।
संज्ञा
[हिं. फड़क]

फरक
फड़कती (है)।
उ.- बातन न धरति कान, तानति हैं भौंह-बान, तऊ न चलति बाम, आँखियाँ फरकि रही-२२३६।
क्रि. अ.
[हिं. फड़कना]

फरक
पृथकता।
संज्ञा
[अ. फ़रक]

फरक
दूरी।
संज्ञा
[अ. फ़रक]

फरक
फरक फरक होना- ' हटो-बचो' होना।
मु.

फरक
भेद, अंतर।
संज्ञा
[अ. फ़रक]

फरक
परायापन।
संज्ञा
[अ. फ़रक]

फरक
कमी।
संज्ञा
[अ. फ़रक]

फरकत
फड़कता है।
उ.- कुच भुच अधर नयन फरकत हैं, बिनहिं बात अंचल ध्वज डोली।
क्रि. अ.
[हिं. फड़कना]

फबाना
ऐसी जगह स्थापित करना या रखना कि सुंदर या भला जान पड़े।
क्रि. स.
[हिं. फबना]

फबावत
भला जान पड़ता है।
उ.- कहाँ साँच मैं खोवत करते झूठे कहाँ फबावत।
क्रि. स.
[हिं. फबाना]

फबि
छबि, शोभा, सुंदरता।
संज्ञा
[हिं. फबना]

फबि
शोभित है।
उ.- फबि रही मोर चन्द्रिका माथे छवि की उठत तरंग-१३५७।
क्रि. अ.
[हिं. फबना]

फबी
भली लगी।
उ.- तब उलटी-पलटी फबी जब सिसु रहे कन्हाई-९१०।
क्रि. अ.
[हिं. फबना]

फबीला
सुंदर, शोभा देनेवाला।
वि.
[हिं. फबि + ईला]

फर
वृक्ष का फल।
उ.- उचटत अति अंगार, फुटत फर, झटपट लपट कराल-६१५।
संज्ञा
[हिं. फल]

फर
डोंड़ी।
उ.- उड़ियै उड़ी फिरति नैननि सँग, फर फूटें ज्यों आक रुई-१४३३।
संज्ञा
[हिं. फल]

फर
मुकाबला, सामना।
संज्ञा
[हिं. फल]

फर
बिछौना।
संज्ञा
[हिं. फल]

फफोला
छाला, झलका।
संज्ञा
[सं. प्रस्फोट]

फफोला
दिल कै फफ़ोला (के फफोले) फूटना- जलन या क्रोध प्रकट होना। दिल का फफोला (के फफोले) फोड़ना- जलन या क्रोध प्रकट करना।
मु.

फबकना
फैलना, बढ़ना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फबति
भली लगती है।
उ.- फागुन में तो लखत न कोऊ फबति अचगरी भारी-२४२०।
क्रि. अ.
[हिं. फबना]

फबती
सारपूर्ण और समयानुकूल कथन।
संज्ञा
[हिं. फबना]

फबती
व्यंग्य, चुटकी।
संज्ञा
[हिं. फबना]

फबती
फबती उड़ाना- हँसी उड़ाना। फबती कसना (कहना)- हँसी उड़ाते हुए चुटकी लेना या व्यंग्य करना।
मु.

फबती
शोभा देती है।
उ.- सदा चतुरई फबती नाहीं अति ही निझरि रही हौ-१५२७।
क्रि. अ.
[हिं. फबना]

फबन
शोभा, छवि, सुंदरता।
संज्ञा
[हिं. फबना]

फबना
सुंदर या भला जान पड़ना, शोभा देना, सोहना।
क्रि. अ.
[सं. प्रभवन, प्रा. पभवन]

फरकाना
बार-बार हिलाना, फड़फड़ाना।
क्रि. स.
[हिं. फड़काना]

फरकाना
अलग करना।
क्रि. स.
[हिं. फरक]

फरकावै
फड़काते हैं, हिलाते हैं, संचालित करते हैं।
उ.- कबहुँ पलक हरि मूँदि लेतहैं, कबहुँ अधर फरकावैं-१०-४३।
क्रि. स.
[हिं. फड़काना]

फरकी
बाँस की तीली जिसमें लासा लगा कर पक्षी फँसाया जाता है।
संज्ञा
[हिं. फरक]

फरके
(शरीर के अवयव का सहसा) फड़कने लगे, उड़ने या फड़फड़ाने लगे।
उ.- इतनौ कहत नैन उर फरके, सगुन जनायौ अंग-९-८३।
क्रि. अ.
[हिं. फड़कना]

फरके
द्वार का टट्टर।
उ.- घर घर केरी फरके खोलै-२४३८।
संज्ञा
[हिं. फरका]

फरकौ
द्वार का का टट्टर।
उ.- नव लख धेनु दुहत हैं नित प्रति, बढ़ा नाम है नन्द महर कौ। ताके पूत कहावत हौ तुम, चोरी करत उघारत फरकौ-१०-३३३।
संज्ञा
[हिं. फरका]

फरचा
जो जूठा न हो, शुद्ध।
वि.
[सं. स्प्रश्य, प्रा. फरस्स]

फरचा
साफ-सुथरा, स्वच्छ।
वि.
[सं. स्प्रश्य, प्रा. फरस्स]

फरचाई
शुद्धता।
संज्ञा
[हिं. फरचा]

निवारण, निवारन
मिटाने, हटाने या दूर करने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. निवारण]

निवारण, निवारन
छुटकारा, निवृत्ति।
संज्ञा
[हिं. निवारण]

निवारण, निवारन
निवृत्ति या छुटकारा दिलानेवाला।
उ.-तीनि लोक के ताप-निवारन, सूर स्याम सेवक सुखकारी-१-३०।
संज्ञा
[हिं. निवारण]

निवारण, निवारन
हटाने, दूर करने या मिटाने के उद्देश्य से।
उ.-अजिर चली पछिताति छींक कौ दोष निवारन-५८९।
संज्ञा
[हिं. निवारण]

निवारना
रोकना, हटाना।
क्रि. स.
[सं. निवारण]

निवारना
बचाना।
क्रि. स.
[सं. निवारण]

निवारना
निषेध या मना करना।
क्रि. स.
[सं. निवारण]

निवारहु
रोको, दूर करो, हटाओ, छोड़ो।
उ.-लेहु मातु, सहिदानि मुद्रिका, दई प्रीति करि नाथ। सावधान ह्वै सोक निवारहु, ओड़हु दच्छिन हाथ-९-८३।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

निवारि
छोड़कर, रोककर, त्यागकर।
उ.-अपनी रिस निवारि प्रभु, पितु मम अपराधी, सो परम गति पाई-७-४।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

निवारी
हटायी, दूर की, नष्ट की।
उ.- (क) लाखा-गृह तैं, सत्रु-सैन तैं, पांडव-बिपति निवारी-१-१७। (ख) सरनागत की ताप निवारी-१-२८।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

फरकन
फड़कने की क्रिया या भाव, फड़क।
संज्ञा
[हिं. फड़कना]

फरकन
चपलता, चंचलता।
संज्ञा
[हिं. फड़कना]

फरकना
भंग या शरीर फड़कना।
क्रि. अ.
[सं. स्फुग्ण]

फरकना
उभड़ना, स्फुरित होना।
क्रि. अ.
[सं. स्फुग्ण]

फरकना
उड़ना।
क्रि. अ.
[सं. स्फुग्ण]

फरकना
अलग या पृथक् होना।
क्रि. अ.
[हिं. फरक]

फरका
छप्पर जो अलग छाकर बँडेर पर चढ़ाया जाय।
संज्ञा
[सं. फलक]

फरका
टट्टर जो द्वार पर लगाया जाता है।
संज्ञा
[सं. फलक]

फरकाइ
अंग या शरीर फड़काकर।
उ.- अंग फरकाइ अलप मुसुकाने-१०-४६।
क्रि. स.
[हिं. फड़काना]

फरकाना
अंग या शरीर हिलाना-डुलाना या संचालित करना।
क्रि. स.
[हिं. फड़काना]

फरचाई
स्वच्छता।
संज्ञा
[हिं. फरचा]

फरचाना
शुद्ध या साफ करना।
क्रि. स.
[हिं. फरचा]

फरजंद, फरजिंद
पुत्र, बेटा।
संज्ञा
[फ़ा.]

फरजी
शतरंज का एक मोहरा।
संज्ञा
[फ़ा.]

फरची
नकली, बनावटी, जो असली न हो।
वि.

फरद
सूची, तालिका।
उ.- माँड़ि माँड़ि खरिहान क्रोध कौ, पोता-भजन भरावै। वट्टा काटि कसूर भरम कौ, फरद तले लै डारै-१-१४२।
संज्ञा
[अ. फ़र्द]

फरद
कपड़े का पल्ला।
संज्ञा
[अ. फ़र्द]

फरद
रजाई आदि का पल्ला।
संज्ञा
[अ. फ़र्द]

फरद
बेजोड़, अनुपम।
वि.

फरना
फलना।
क्रि. अ.
[सं. फल]

फरनि
फलों से युक्त।
उ.- जिनि जायौ ऐसौ पूत, सब सुख-फरनि फरी-१०-२४।
संज्ञा
[हिं. फल]

फरफंद
छल-कपट, दाँव-पेच।
संज्ञा
[अनु. फर + हिं. फंदा]

फरफंद
नखरा, चोंचला।
संज्ञा
[अनु. फर + हिं. फंदा]

फरफर
उड़ने-फड़कने का शब्द।
संज्ञा
[अनु.]

फरफराना
फड़फड़ाना।
क्रि. अ.
[अनु. फरफर]

फरफराना
फड़फड़ करना।
क्रि. स.

फरफराना
फड़फड़ाना।
क्रि. स.

फरफराने
तड़फड़ाये।
उ.- कंस के प्रान भयभीत पिंजरा जैसे नव बिहंगम तैसे मरत फरफराने-२५९६।
क्रि. अ.
[हिं. फड़फड़ाना]

फरफुन्दा
फतिंगा, कीड़ा।
संज्ञा
[अनु. फरफर]

फरमाँबरदार
आज्ञाकारी।
वि.
[फ़ा.]

फरहर
अलग-अलग।
संज्ञा
[सं. स्फार, प्रा. फार]

फरहर
साफ, स्पष्ट।
संज्ञा
[सं. स्फार, प्रा. फार]

फरहर
निर्मल।
संज्ञा
[सं. स्फार, प्रा. फार]

फरहर
प्रसन्न।
संज्ञा
[सं. स्फार, प्रा. फार]

फरहरना
फरकना, फर-फराना।
क्रि. अ.
[अनु. फरहर]

फरहरना
उड़ना,फहराना।
क्रि. अ.
[अनु. फरहर]

फरहरा
झंडा, पताका।
संज्ञा
[हिं. फहराना]

फरहरा
स्पष्ट।
वि.
[हिं. फरहर]

फरहरा
शुद्ध।
वि.
[हिं. फरहर]

फरहरा
प्रसन्न।
वि.
[हिं. फरहर]

फरमाइश
आज्ञा, इच्छा।
संज्ञा
[फ़ा.]

फरमाइशी
आज्ञा से तैयार।
वि.
[फ़ा.]

फरमान
राजकीय आज्ञापत्र।
संज्ञा
[फ़ा.]

फरमाना
कहना, आज्ञा देना।
क्रि. स.
[फ़ा.]

फरश
बिछाने का वस्त्र, बिछावन।
संज्ञा
[अ.]

फरश
समतल भूमि।
संज्ञा
[अ.]

फरश
गच।
संज्ञा
[अ.]

फरशबंद
जहाँ फरश बना हो।
वि.
[फ़ा.]

फरशी
गुड़गुड़ी।
संज्ञा
[फ़ा.]

फरसा
एक तरह की कुल्हाड़ी।
संज्ञा
[सं. परशु]

फरहरी
फल।
संज्ञा
[हिं. फल + हरा]

फरा
एक प्रकार का व्यंजन।
संज्ञा
[देश.]

फराए
फलाये, फल उत्पन्न किये, फल लगाये।
उ.- सूर. स्याम जुवतिनि ब्रत पूरन, कौ फल डारनि कदम फराए-७८४।
क्रि. स.
[हिं. फलना]

फराक
मैदान।
संज्ञा
[फ़ा. फ़राख]

फराक
लंबा चौड़ा, विस्तृत।
वि.

फराकत
लंबा चौड़ा, विस्तृत।
वि.
फ़ा. फराख]

फराकत
छुट्टी।
संज्ञा
[अ. फ़रागत]

फराकत
निश्चिंचतता।
संज्ञा
[अ. फ़रागत]

फरामोश
भूला हुआ, विस्मृत।
वि.
[फ़ा.]

फरार
जो भाग गया हो।
वि.
[अ.]

फरियाना
छँटकर अलग होना।
क्रि. अ.

फरियाना
साफ होना।
क्रि. अ.

फरियाना
तय होना।
क्रि. अ.

फरियाना
दिखायी पड़ना।
क्रि. अ.

फरिश्ता
देवदूत।
संज्ञा
[फ़ा.]

फरिश्ता
देवता।
संज्ञा
[फ़ा.]

फरी
फल से युक्त हुई, फली।
उ.- जिनि जायौ ऐसौ पूत, सब सुख-फरनि फरी-१०-२४।
क्रि. अ.
[हिं. फलना]

फरी
फली।
उ.- पोई परवर फाँग फरी चुनि-२३२१।
संज्ञा
[हिं. फली]

फरीक
विपक्षी।
संज्ञा
[अ.]

फरीक
तरफदार।
संज्ञा
[अ.]

फरिका
अलग छाया गया छप्पर।
संज्ञा
[हिं. फरका]

फरिका
द्वार का टट्टर।
संज्ञा
[हिं. फरका]

फरिकै
द्वार के टट्टर को।
उ.- लरत निकसी सबै तोरि फरिकै-पृ. ३३९ (९०)।
संज्ञा
[हिं. फरका]

फरिया
एक प्रकार का लहँगा-नुमा कपड़ा जो सामने सिला नहीं रहता और जिसे स्त्रियाँ और लड़कियाँ कमर में बाँधती हैं।
उ.- (क) सारी चीरि नी फरिया लै, अपने हाथ बनाइ। अंच्ल सौं मुख पोंछि अंग सब, आपुहि लै पहिराइ-७०४। (ख) नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनी पीठ रूचिर झकझोरी।
संज्ञा
[हिं. फरना]

फरियाद
शिकायत।
संज्ञा
[फ़ा.]

फरियाद
प्रार्थना।
संज्ञा
[फ़ा.]

फरियादी
फरियाद करनेवाला।
वि.
[फ़ा.]

फरियाना
भूसी आदि साफ करना।
क्रि. स.
[सं. फलीकरण]

फरियाना
साफ करना।
क्रि. स.
[सं. फलीकरण]

फरियाना
निपटाना।
क्रि. स.
[सं. फलीकरण]

फरुई, फरुही
छोटा फावड़ा।
संज्ञा
[हिं. फावड़ा]

फरुहरि, फरुहरी
कँपकँपी, फुरेरी।
संज्ञा
[हिं. फुरहरी]

फरेंद, फरैंदा
बड़ी जामुन।
संज्ञा
[सं. फलेंद]

फरे
फले, फलयुक्त हुए।
उ.- फूले फरे तरुवर आनँद लहर के-१०-३४।
क्रि. अ.
[हिं. फलना]

फरेब
छल-कपट।
संज्ञा
[फ़ा.]

फरेरा
पताका, झंडा।
संज्ञा
[हिं. फरहरा]

फरेरी
जंगली फल।
संज्ञा
[हिं. फल]

फरै
फलता है, फल लगते हैं।
उ.- (क) तरुवर फूलै, फरै, पतझरै, अपने कालहिं पाइ-१-२६५। (ख) जंबू बृक्ष क्हो क्यों लंपट फल बर अंबु फरै-३३११।
क्रि. अ.
[हिं. फलना]

फरोख्त
बिक्री, विक्रय।
संज्ञा
[फ़ा.]

फर्यौ
फला (है)।
उ.- नैन भर ब्रत फलहिं देखौ, फर्यौ है द्रुम डार-७८६।
क्रि. स.
[हिं. फलना]

फर्ज
धर्म-कर्म।
संज्ञा
[अ. फ़र्ज़]

फर्ज
कर्तव्य।
संज्ञा
[अ. फ़र्ज़]

फर्ज
उत्तरदायित्व।
संज्ञा
[अ. फ़र्ज़]

फर्ज
मान लेना, कल्पना।
संज्ञा
[अ. फ़र्ज़]

फर्जी
माना हुआ।
वि.
[हिं. पर्ज]

फर्जी
नाम मात्र का।
वि.
[हिं. पर्ज]

फर्द
सूची।
संज्ञा
[फ़ा. फ़र्द]

फर्द
रजाई का पल्ला।
संज्ञा
[फ़ा. फ़र्द]

फर्राटा
वेग, तेजी।
संज्ञा
[अनु.]

फर्राटा
फर्राटा भरना (मारना)- तेजी से दौड़ना।
मु.

निवारयौ
मिटाया, हटाया, दूर किया।
उ.-भयौ प्रसाद जु अंबरीष कौं, दुरबासा कौ क्रोध निबार्यौ-१-१४।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

निवारयौ
दूर किया, हटाया।
उ.-सतगुरु कौ उपदेस हृदय धरि, जिन भ्रम सकल निवार्यौ-१-३३६।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

निवारयौ
बचाया, रक्षा की।
उ.-मेघ बारि तैं हमैं निवारथौ-३४०९।
क्रि. स.
[हिं. निवारना]

निवाला
कौर, ग्रास।
संज्ञा
[फ़ा.]

निवास
रहने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं.]

निवास
वास-स्थान, गृह, घर।
उ.-सूरदास के प्रभु बहुरि, गए बैकुंठ-निवास-३-११।
संज्ञा
[सं.]

निवास
वस्त्र, कपड़ा।
संज्ञा
[सं.]

निवासित
बसा या बसाया हुआ।
वि.
[सं. निवास]

निवासी
रहने-बसनेवाला।
संज्ञा
[सं. निवासिन]

निवास्य
रहने-बसने योग्य।
वि.
[सं.]

फर्राश
नौकर, सेवक।
संज्ञा
[अ.]

फर्राशी
फर्राश से संबंधित।
वि.
[फ़ा.]

फर्राशी
फर्राशी पंखा- हाथ का बहुत बड़ा पंखा।
यौ.

फर्श
बिछावन।
संज्ञा
[अ.]

फर्श
गच।
संज्ञा
[अ.]

फलंक
आकाश, अंतरिक्ष।
संज्ञा
[फ़ा. फलक]

फल
लताओं और पेड़- पौधों में लगनेवाला वह पोषक द्रव्य जिसमें गूदा, रस और बीज आदि रहते हैं और जो फूलों के बाद उत्पन्न होता है
उ.- भिल्लिनि के फल खाए भाव सौं खाटे-मीठे खारे-१-२५।
संज्ञा
[सं.]

फल
लाभ।
संज्ञा
[सं.]

फल
प्रयत्न या क्रिया का परिणाम, नतीजा।
संज्ञा
[सं.]

फल
फल चखाना- मजा चखाना, दंड देना। फल चखैहौं- दंड दूँगा, मजा चखाऊँगा। उ.- यह हित मनै कहत सूरज-प्रभु इहिं कृतिकौ फल तुरत चखेहौं-७-५। फल देना-मजा चखाना, दंड देना। फल देहिंगी- मजी चखाएँगी, दंड देंगी। उ.- लालन हमहिं करे जो हाल उहै फल देहिंगी हो-२४१६। फल पाना- दंड पाना, मजा चखना। फल पैहैं- दंड पायैगे। उ.- कितक ब्रज के लोग, रिस करत बिहिं जोग, गिरि लियो भोग, फल तुरत पैहैं-९४४।
मु.

फल
शुभ अशुभ कमों के सुखद-दुखद परिणाम।
उ.- (क) बालक ध्रुव वन करन गहन तप ताहि तुरत फल दैहौं। (ख) जा दिन संत पाहुने आवत। तीरथ कोटि सनान करैं फल जैसौ दरसन पावत-२-१७। (ग) सिव-संकर हमकौं फल दीन्हों-७९८। (घ) मुँह माँगे फल जो तुम पावहु तौ तुम मानहु मोहिं-९१५।
संज्ञा
[सं.]

फल
गुण, प्रभाव।
संज्ञा
[सं.]

फल
शुभ कमों के चार परिणाम-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
उ.- होइ अटल डगदीस भजन में सेवा तासु चारि फल पावै।
संज्ञा
[सं.]

फल
बदला, प्रतिफल।
संज्ञा
[सं.]

फल
बाण, छुरी आदि का अगला भाग।
संज्ञा
[सं.]

फल
हल का फाल।
संज्ञा
[सं.]

फल
फलक।
संज्ञा
[सं.]

फल
उद्देश्य-सिद्धि।
संज्ञा
[सं.]

फल
गणित की क्रिया का परिणाम।
संज्ञा
[सं.]

फलक
पटल।
संज्ञा
[सं.]

फलक
चादर।
संज्ञा
[सं.]

फलक
आकाश।
संज्ञा
[अ.]

फलक
स्वर्ग।
संज्ञा
[अ.]

फलकना
छलकना, उमँगना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फलका
छाला, फफोला।
संज्ञा
[हिं. फोला]

फलतः
फल या परिणामस्वरूप।
अव्य.
[सं.]

फलद
फल देनेवाला।
वि.
[सं.]

फलदान
विवाह की रीति जिसमें धन, मिठाई आदि भेजकर वर को कन्या के लिए निश्चित किया जाता है।
संज्ञा
[हिं. फल + दान]

फलना
फल से युक्त होना।
क्रि. अ.
[हिं. फल]

फलना
लाभ -दायक होना।
क्रि. अ.
[हिं. फल]

फलना
फलना-फूलना- (१) मनोरथ पूर्ण होना। (२) सुखी होना। (३) धन-संतान से पूर्ण होना।
मु.

फलयोग
नाटक में नायक के उद्देश्य की सिद्धि या फल की प्राप्ति का स्थल।
संज्ञा
[सं.]

फलहार
फलों का आहार।
संज्ञा
[सं. फलाहार]

फलहरी, फलहारी
जिसमें अनाज न हो।
वि.
[सं. फलाहार]

फलाँ
अमुक।
वि.
[फ़ा. फलौ]

फलाँग
कूद, कुदान, चौकड़ी।
उ.- गर्भवती हिरनी तहँ आई। पानी सो पीवन नहिं पाई। सुनि कै सिंहभयान अवाज। मारि फनाँग चली सो भाग-५-३।
संज्ञा
[सं. प्लवन या प्रलंघन]

फलाँग
वह दूरी जो फलाँग से तै की जाय।
संज्ञा
[सं. प्लवन या प्रलंघन]

फलाँगना
कूदना-फाँदना।
क्रि. अ.
[हिं. फलौग]

फलादेश
(ग्रह आदि का) फल बताना।
संज्ञा
[सं.]

फलाना
फलने को प्रवृत करना।
क्रि. स.
[हिं. फलना]

फलाना
अमुक।
संज्ञा
[हिं. फलाँ]

फलार
फल का आहार।
संज्ञा
[सं. फलाहार]

फलार्थी
फल चाहनेवाला।
वि.
[सं. फलर्थिन]

फलाहार
फलों का ही आहार।
संज्ञा
[सं.]

फलाहारी
फल ही खानेवाला।
वि.
[सं. फलाहार]

फलाहारी
जो (भोजन) फलों का हो, अनाज का न हो।
वि.
[सं. फलाहार]

फलित
फला हुआ।
उ.- फल फलित होत फल-रूप जानैं-१-१०४२।
वि.
[सं.]

फलित
संपन्न, पूर्ण।
वि.
[सं.]

फलिहै
फल देगा।
उ.- विष के बक्ष विषहिं बिष फलिहै-१०४२।
क्रि. स.
[हिं. फलाना]

फली
पौधों के वे लंबे चिपटे फल जिनमें गूदा-रस न होकर दीज बोने हैं।
उ.- फली अगस्त्य करी अमृत सम-२३२१।
संज्ञा
[हिं. फल]

फसल
मौसम, ऋतु।
संज्ञा
[अ. फ़स्ल]

फसल
समय।
संज्ञा
[अ. फ़स्ल]

फसल
खेत की उपज।
संज्ञा
[अ. फ़स्ल]

फसल
अन्न की उपज।
संज्ञा
[अ. फ़स्ल]

फसली
ऋतु-संबंधी।
वि.
[हिं. फसल]

फसाद
बलवा, विद्रोह।
संज्ञा
[अ.]

फसाद
उधम, उपद्रव।
संज्ञा
[अ.]

फसाद
झगड़ा, लड़ाई।
संज्ञा
[अ.]

फसाद
विवाद।
संज्ञा
[अ.]

फसादी
उपद्रवी।
वि.
[फ़ा.]

फली
फल निकले।
उ.- वह रितु अमृत लता सुनि सूरज अब विष फलनि फली-२७३४।
क्रि. स.
[हिं. फलना]

फलीता
पलीता, बत्ती।
संज्ञा
[अ. फतीला]

फलीभूत
फल या लाभदायक।
वि.
[सं.]

फलेंदा, फलेंद्र
बड़ा जामुन।
संज्ञा
[सं. फलेंद्र]

फले
फलीभूत हुए।
उ.- यहै कहत सब जात परस्पर, सुकृत हमारे प्रगट फले-९८३।
क्रि. अ.
[हिं. फलना]

फल्यो, फल्यौ
फला, फलीभूत हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. फलना]

फल्यो, फल्यौ
फल्यो बिहाने (प्रातःकाल)-कल ही पूजा की यी, प्रातः होते ही उसका फल मिल गया (व्यंग्य)।
उ.- कालिहि पूज्यो फल्यो बिहाने-१०५१।
प्र.

फसकड़ा
पालथी।
संज्ञा
[हिं. फँसना + कड़ी]

फसकना
कुछ कुछ फटना, मसकना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फसकना
जो जल्दी फट या मसक जाय।
वि.

फसादी
झगड़ालू।
वि.
[फ़ा.]

फस्द
नस काट कर, दूषित रक्त निकालने की क्रिया।
संज्ञा
[अ. फ़स्द]

फहम
समझ, विवेक।
संज्ञा
[अ.]

फहरना
उड़ना, फड़फड़ाना।
क्रि. अ.
[सं. प्रसरण]

फहरनि
फहरने की क्रिया या भाव।
उ.- न्यौछावर अचल की फहरनि अर्ध नैन जलधार घनी-१४५६।
संज्ञा
[हिं. फहरना]

फहरात
फहराता है, उड़ता या हिलता है।
उ.- (क) स्वेत छत्र फहरात सीस पर, मनौ लच्छि कौ बंध-९-७५। (ख) कमलनैन काँधे पर न्यारो पीत बसन फहरात-२५३९।
क्रि. अ.
[हिं. फहराना]

फहरान
फहरने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. फहराना]

फहराना
उड़ान, हवा में हिलाना।
क्रि. स.
[सं. प्रसारण]

फहराना
फहरान हवा में हिलना।
क्रि. अ.

फहरानि
फहराने की क्रिया या भाव।
(उ.- क) वा पट पीत की फहरानि। कर धरि चक्र चरन की धावनि, नहिं बिसरत वह बानि-१-२७९। (ख) पीत पट फहरानि मानो लहरि उठत अपार -१३५६।
संज्ञा
[हिं. फहरान]

फाँका
फंफा।
संज्ञा
[हिं. फेकना]

फाँका
एक फंके में आनेवाली वस्तु।
संज्ञा
[हिं. फेकना]

फाँकी
फाँक।
संज्ञा
[हिं. फाँक]

फाँकौ
फाँक, टुकड़ा।
उ.- जरासिंधु कौ जोर उघारयौ फारि कियौ द्वौ फाँकौ-१-१३३।
संज्ञा
[हिं. फाँक]

फाँगी
एक प्रकार का साग।
उ.- (क) रुचिर लजालु लोनिका थीगी। कढ़ी कृपालु दूसरैं माँगी-३९६। (ख) पोई परवर फाँग फरी टुनि-२३२१।
संज्ञा
[देश.]

फाँद
उछाल, कुदान।
संज्ञा
[हिं. फाँदना]

फाँद
फंदा, जाल।
संज्ञा
[हिं. फंदा]

फाँदना
कूदना, उछलमा।
कूदना, उछलना।
क्रि. अ.
[सं. फणन]

फाँदना
लाँघना, डाँकना, नाँधना
क्रि. स.

फाँदना
फंदे में फेंसाना।
क्रि. स.
[हिं. फंदा]

फहरावत
वायु में फड़फड़ाता या उड़ता हे।
उ.- आजु हरि धेनु चराए आवत। मोर मुकुट बनमाल बिराजत, पीतांबर फहरावत-४९३।
क्रि. स.
[हिं. फहराना]

फहराव
उड़ता या फड़फड़ाता है।
उ.- मोर मुकुट कुंडल बनमाला पीतांबर फहरावै-८४०।
क्रि. अ.
[हिं. फहरना]

फहरैहैं
उड़ायेंगे।
उ.-सूरदास प्रभु नवल कान्ह वर पीतांबर फहरैहैं-१२७७।
क्रि. स.
[हिं. फहराना]

फहरैहै
फहरेगी, हवा में उड़े या हिलेगी।
उ.- जा दिन कंचनपुर प्रभु ऐहैं, बिमल ध्वजा रथ पर फहरैहै-९-८१।
क्रि. अ.
[हिं. फहरना]

फाँक
कटा हुआ टुकड़ा, खंड।
संज्ञा
[सं. फलक]

फाँक
टुकड़े में बाँटनेवाली लकीर।
संज्ञा
[सं. फलक]

फाँकड़ा
बाँका-तिरछा।
वि.
[देश.]

फाँकड़ा
मजबूत।
वि.
[देश.]

फाँकना
फंकी मार कर खाना।
क्रि. स.
[हिं. फाँका]

फाँकना
धूल फाँकना- मारे-मारे घूमना।
मु.

निविड़
घना।
वि.
[सं.]

निविड़
गहरा।
वि.
[सं.]

निविष्ट
एकाग्र।
वि.
[सं.]

निविष्ट
एकाग्र चित्तवाला।
वि.
[सं.]

निविष्ट
घुसा हुआ।
वि.
[सं.]

निविष्ट
स्थित।
वि.
[सं.]

निवृत्त
छूटा हुआ या अलग।
वि.
[सं.]

निवृत्त
विरक्त।
वि.
[सं.]

निवृत्त
जो छुट्टी पा चुका हो।
वि.
[सं.]

निवृत्ति
मुक्ति, छुटकारा।
संज्ञा
[सं.]

फाँदना
रुई धुनना।
क्रि. स.
[हिं. फानना]

फाँदा
जाल, फंदा।
संज्ञा
[हिं. फंदा]

फाँदि
फंदे में फँसाकर।
उ.- मनो मन्मथ फाँदि फंदनि मीन बिवि तट ल्याइ-१४०५।
क्रि. स.
[हिं. फंदा]

फाँदी
गट्ठा बाँधने की रस्सी।
संज्ञा
[हिं. फंदा]

फाँफी
बहुत महीन झिल्ली।
संज्ञा
[सं. पर्परी]

फाँस
पाश, बंधन, फंदा, बंध।
उ.- (क) मेरी बेर क्यौं रहे सोचि ? काटिकै अव-फाँस पठवहू, ज्यौं दियौ गज मोचि-१-१९९। (ख) सूरद्वास भगवंत-भजन बिनु, करम-फाँस न कटै-१-२६३। (ग) ए सब त्रय गुन फाँस समान।
संज्ञा
[सं. पाश, प्रा. फाँस]

फाँस
किसी को बाँधने या फँसाने का फंदा या जाल।
उ.- (क) ब्रह्म-फाँस उन लई हाथ करि-९-१०४। (ख) हँसि-हँसि नाग- फाँस सर साँधत, बंधन बंधु-समेत बँधायौ-९-१४१। (ग) बरुन फाँस ब्रज-पतिहिं छिन माँहि छुड़ावै।
संज्ञा
[सं. पाश, प्रा. फाँस]

फाँस
बाँस या काठ का कड़ा महीन रेशा जो काँटे की तरह चुभ जाता है।
संज्ञा
[सं. पनस]

फाँस
फाँस चुभना- चित को खटकने या चुभनेवाली बात होना। फाँस निकलना- कष्ट देने वाली चीज का न रह जाना। फाँस निकालना- कष्ट देनेवाली चीज को दूर करना।
मु.

फाँस
बाँस आदि की पतली तीली या कमानी।
संज्ञा
[सं. पनस]

फाका
उपवास।
संज्ञा
[अ. फ़ाकः]

फाखता
पंडुक पक्षी।
संज्ञा
[अ. फ़ाख्ता]

फाग, फागु
फागुन मास में मनाया जानेवला उत्सव जिसमें लोग एक-दूसरे पर रंग छिड़कते हैं।
उ.- (१) सकुच न करत, फाग सी खेलत, तारी देत, हँसत मुख मोरि-१०-३२७। (२) कुबिजा कमल नैन मिलि खेलत बारहमासी फाग-३०९५।
संज्ञा
[हिं. फागुुन]

फागुन
फाल्गुन, माध के बाद का महीना जिसकी पूर्णिमा को होली जलती है।
संज्ञा
[सं.]

फागुनी
फागुन-संबंधी।
वि.
[हिं. फागुुन]

फाजिल
बहुत अधिक।
वि.
[अ. फ़ाजिल]

फाजिल
विद्वान, पंडित।
वि.
[अ. फ़ाजिल]

फाटक
बड़ा द्वार या दरवाजा।
संज्ञा
[सं. कपाट]

फाटक
भूसी या किनकी जो अनाज फटकने से बच जाय, फटकन, पछोड़न।
उ.- फाटक दै कै हाटक माँगत मोरो निपट सुधारी-३३४०।
संज्ञा
[हिं. फटकना]

फाटत
फटता, टूटता या विदीर्ण होता है, भग्न होता है।
उ.- (क) टूटत फन, फाटत तन दुहुँ दिसि, स्याम निहोरौ कीजै-५७६। (ख) निकसि न जात प्रान ए पापी फाटत नहीं बज्र की छाती-२८८२।
क्रि. अ.
[हिं. थटना]

फाँसना
बंधन में डालना, जाल में फँसाना।
क्रि. स.
[हिं. फाँस]

फाँसना
धोखे में डालना।
क्रि. स.
[हिं. फाँस]

फाँसना
वश में करना।
क्रि. स.
[हिं. फाँस]

फाँसि
पाश, बंधन, फंदा।
उ.- (क) भजन-प्रताप नाहिं मैं जान्यौ, परयौ मोह की फाँसि-१-१११। (ख) माया मोह लोभ अरु मान। ए सब त्रयगुण फाँसि समान।
संज्ञा
[सं. पाश]

फाँसि
रस्सी जिससे शिकारी फंदा डालते हैं।
संज्ञा
[सं. पाश]

फाँसि
फाँस कर, बंधन में डालकर।
क्रि. स.
[हिं. फाँसना]

फाँसी
फाँसने का फंदा, पाश।
उ.- (क) चंचल, चपल, चबाइ, चौपटा लिए मोह की फाँसी-१-१८६। (ख) ताकौं देह-मोह बड़ फाँसी-४-५। (ग) आए ऊधौ फिरि गए आँगन डारि गए गर फाँसी-३०३०। (घ) कीनी प्रीति हमारे ब्रज सों दई प्रेम की फाँसी-३१३३।
संज्ञा
[सं. पाशी]

फाँसी
फंदा जो दम घोटकर मारने के लिए डाला जाता है।
संज्ञा
[सं. पाशी]

फाँसी
प्राणदण्ड देने के लिए डाला जानेवाला फंदा।
संज्ञा
[सं. पाशी]

फाँसी
प्राणदण्ड।
संज्ञा
[सं. पाशी]

फाटना
भग्न या विदीर्ण होना।
क्रि. अ.
[हिं. फटना]

फाटि
फटकर।
उ.- दूध फाटि जैसे भयो काँजी कौन स्वाद करि खाइ-३३३४।
क्रि. अ.
[हिं. फटना]

फाटी
फट गयी, विदीर्ण हुई।
उ.- (क) बड़ी बार भई, लोचन उघरे, भरम-जवनिका फाटी-१०-२५४। (ख) सरिता संयम स्वच्छ सलिल जनु फाटी काम कई-२८५३।
क्रि. अ.
[हिं. फटना]

फाटे
फटा हुआ, भग्न, विदीर्ण।
उ.- फूटी चुरी गोद भरि ल्यावैं, फाटे चीर दिखावैं गात-१०-३३२।
वि.
[हिं. फटना]

फाट्यो, फाटयौ
फटा, छिन्न-भिन्न हुआ, एकत्र न रहा।
उ.- (क) ज्यौं रवि-तेज पाइ दसहूँ दिसि, दोष-कुहर कौ फाटयौ-९-८७। (ख) हरि बिछुरत फाटयो न हियो-२५४५।
क्रि. अ.
[हिं. फटना]

फाड़खाऊ
फाड़कर खा जाने वाला।
वि.
[हिं. फाड़ + खाना]

फाड़खाऊ
क्रोधी, चिड़चिड़ा।
वि.
[हिं. फाड़ + खाना]

फाड़खाऊ
भयानक।
वि.
[हिं. फाड़ + खाना]

फाड़न
फाड़ा हुआ टुकड़ा।
संज्ञा
[हिं. फाड़ना]

फाड़ना
चीरना, विदीर्ण करना।
क्रि. स.
[सं. स्फाटन]

फाड़ना
धज्जियाँ उड़ाना।
क्रि. स.
[सं. स्फाटन]

फाड़ना
संधि या जोड़ खोलना।
क्रि. स.
[सं. स्फाटन]

फाड़ना
द्रव का पानी और सार अलग करना।
क्रि. स.
[सं. स्फाटन]

फातिहा
प्रार्थना।
संज्ञा
[अ.]

फातिहा
मृतक के लिए चढ़ावा।
संज्ञा
[अ.]

फानना
रुई धुनना।
क्रि. स.
[हिं. फारण]

फानना
काम आरम्भ करना।
क्रि. स.
[सं. उपायन]

फानूस
बड़ा कंदील।
संज्ञा
[फ़ा.]

फानूस
शीशे का कमल या गिलास जिसमें बत्ती जले।
संज्ञा
[फ़ा.]

फाब
शोभा।
संज्ञा
[सं. प्रभा, प्रा. पभा]

फाबना
शोभा देना।
क्रि. अ.
[हिं. फ़बना]

फायदा
लाभ।
संज्ञा
[अ. फ़ायदा]

फायदा
भला परिणाम
संज्ञा
[अ. फ़ायदा]

फायदा
प्रयोजन सिद्ध होना।
संज्ञा
[अ. फ़ायदा]

फार
खंड, फाल।
संज्ञा
[हिं. फारना]

फारना
चीरना-फाड़ना।
क्रि. स.
[हिं. फाड़ना]

फारसी
फारस देश फी भाषा।
संज्ञा
[फ़ा.]

फारा
फाँक, फाल टुकड़ा।
संज्ञा
[सं. फाल]

फारि
फाड़कर, चीरकर, विदीर्ण करके।
उ.- (क) खंभ फारि नरसिंह प्रगट ह्वै, असुर के प्रान हरे-१-८२। (ख) चीरि फारि करिहौं भगौहौं सिखनि सिखि लवलेस-३४१३।
क्रि. स.
[फाड़ना]

फारि
खंड खंड करके, धज्जियाँ
उ.- उड़ाकर। फोरि-फारि, तोरि-तारि, गगन होत गाजैं-९-१३९।
क्रि. स.
[फाड़ना]

फारि
खंड, टुकड़ा।
उ.- फटि तब खंभ भयौ ह्वै फारि-७-२।
संज्ञा
[हिं. फाल]

फारी
चीरी फाड़ी।
उ.- (क) संकट तैं प्रहलाद उधार्यौ, हिरनाकसिपु-उदर नख फारी-१-२। (ख) कबहिं गुपाल कंचुकी फारी-७७४।
क्रि. स.
[हिं. फाड़ना]

फारी
चीरकर।
उ.- कहत प्रहलाद के धारि नरसिंह बपु निकसि आए तुरत खंभ फारी-७-६।
क्रि. स.
[हिं. फाड़ना]

फारे
फाड़े, चीरे।
उ.- हिरनकसिपु उर फारे हो-१०-१२८।
क्रि. स.
[हिं. फाड़ना]

फारै
फाड़ता-चीरता है।
उ.- हार तोरै चीर फारै, नैन चलै चुराइ-७८०।
क्रि. स.
[हिं. फाड़ना]

फार्यौ
फाड़ दिया, चौरा, विदीर्ण किया।
उ.- जिहिं बल हिरनकसिपु उर फार्यौ, भए भगत कौं कृपानिधान-१०-१२७।
क्रि. स.
[हिं. फाड़ना]

फाल
कटा हुआ, छोटा टुकड़ा।
संज्ञा
[सं. फलक]

फाल
डग, फलाँग।
संज्ञा
[सं. प्लव]

फाल
फाल भरना- डग भरना। फाल बाँधना- फलाँग या छलाँग मारना।
मु.

फाल
डग भर का फासला, पैंड।
उ.- तीन फाल बसुधा सब कीनी सोइ बामन भगवान।
संज्ञा
[सं. प्लव]

फाश
खुला, प्रकट।
वि.
[फ़ा. पाश]

फासला
दूरी, अंतर।
संज्ञा
[अ.]

फाहिशा
व्यभिचारिणी।
वि.
[अ. फ़ाहिशा]

फिकर, फिकिर, फिक्र
चिंता।
संज्ञा
[अ. फ़िक्र]

फिकर, फिकिर, फिक्र
ध्यान, विचार।
संज्ञा
[अ. फ़िक्र]

फिकर, फिकिर, फिक्र
यत्न, उपाय।
संज्ञा
[अ. फ़िक्र]

फिचकुर
मूर्च्छा या बेहोशी में मुँह से निकलनेवाला फेन।
संज्ञा
[सं. छिंछ]

फिट
धिक्, छी।
अव्य.
[अनु.]

फिटकार
धिककार।
संज्ञा
[हिं. फिट + करना]

फिटकार
मुँह पर फिटकार बरसना- चेहरा बहुत फीका या उदास होना।
मु.

फाल
जमीन खोदने की छड़, कुसी।
संज्ञा
[सं.]

फालतू
आवश्यकता या जरूरत से ज्यादा।
वि.
[हिं. फाल + तू]

फालतू
बेकार, निकम्मा।
वि.
[हिं. फाल + तू]

फालसई
फालसे के रंग का, ललाई लिये हल्के ऊदे रंग का।
वि.
[हिं. फालसा]

फालसा
एक छोटा पेड़ जिसमें मोती के दाने जैसे फल लगते हैं।
संज्ञा
[फ़ा. फ़ालसा]

फालिज
पक्षाघात रोग।
संज्ञा
[अ. फ़ालिज]

फाल्गुन
माघ के बाद का महीना जिसकी पूर्णिमा को होली जलायी जाती है।
संज्ञा
[सं.]

फाल्गुन
अर्जुन का एक नाम।
संज्ञा
[सं.]

फाल्गुनि
अर्जुन।
संज्ञा
[सं.]

फावड़ा
मिट्टी खोदने का एक औजार जो फरसे की तरह का होता है।
संज्ञा
[सं. फाल, प्रा. फाड़]

फिटकार
कोसना, बददुआ।
संज्ञा
[हिं. फिट + करना]

फिटकार
हलकी मिलावट।
संज्ञा
[हिं. फिट + करना]

फिट्टा
फटकार खाया हुआ, मलिन।
वि.
[हिं. फिट]

फितना
उपद्रव।
संज्ञा
[अ.]

फितना
उपद्रवी।
संज्ञा
[अ.]

फितरती
काँइयाँ, धूर्त।
वि.
[अ. फ़ितरत]

फितूर
खराबी।
संज्ञा
[अ. फूत्र]

फितूर
झगड़ा।
संज्ञा
[अ. फूतर]

फिनिया
कान का एक गहना।
संज्ञा
[देश.]

फिर
दुबारा, पुनः।
क्रि. वि.
[हिं. फिरना]

निवृत्ति
विरक्ति, 'प्रवृत्ति' का विपरीतार्थक।
संज्ञा
[सं.]

निवेद
देवता का भोग।
संज्ञा
[सं. नैवेद्य]

निवेदक
निवेदन करनेवाला, प्रार्थी।
संज्ञा
[सं.]

निवेदन
प्रार्थना।
संज्ञा
[सं.]

निवेदन
समर्पण।
संज्ञा
[सं.]

निवेदना
बिनती या प्रार्थना करना।
क्रि. स.
[हिं. निवेदन]

निवेदना
समर्पण करना, नैवेद्य चढ़ाना।
क्रि. स.
[हिं. निवेदन]

निवेदित
निवेदन किया हुआ।
वि.
[सं.]

निवेदित
चढ़ाया या अर्पित किया हुआ।
वि.
[सं.]

निवेरत
वसूल करना, लेना, संग्रह करना।
उ.-सूर मूर अक्रूर गयौ लै ब्याज निवेरत ऊधौ-३२७८।
क्रि. स.
[हिं. निवेरना]

फिर
फिर-फिर-बार बार, पुनः पुनः।
यौ.

फिर
किसी और समय।
क्रि. वि.
[हिं. फिरना]

फिर
बाद में।
क्रि. वि.
[हिं. फिरना]

फिर
तब।
क्रि. वि.
[हिं. फिरना]

फिर
फिर क्या है- तब क्या पूछना है ?
मु.

फिर
आगे बढ़कर, दूरी पर।
क्रि. वि.
[हिं. फिरना]

फिर
इसके अतिरिक्त।
क्रि. वि.
[हिं. फिरना]

फिरकना
नाचना, चक्कर खाना।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरका
जाति।
संज्ञा
[अ. फिरका]

फिरका
पंथ।
संज्ञा
[अ. फिरका]

फिरकी
वह गोल चीज जो कीली पर घूमती हो।
संज्ञा
[हिं. फिरकना]

फिरकी
लड़कों की फिरहरी नामक खिलौना जो नचाया जाता है।
संज्ञा
[हिं. फिरकना]

फिरकी
चकई नामक खिलौना।
संज्ञा
[हिं. फिरकना]

फिरत
डोलता या घूमता है।
उ.- काल फिरत बिलार तनु धरि, अब घरी तिहिं लेत-१-३११।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरत
प्रचारित या घोषित होता हे।
उ.- बोलत बग निवेत गरजै अति मानो फिरत दोहाई-२८३६।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरत
करत फिरत-करता-फिरता है।
उ.- कहा कृपिन की माया गनियै, करत फिरत अपनी-अपनी-१-३९।
प्र.

फिरता
वापसी।
संज्ञा
[हिं. फिरना]

फिरता
अस्वीकार।
संज्ञा
[हिं. फिरना]

फिरता
लौटाया हुआ। लौटनेवाला।
वि.

फिरति
फिरती है, घूमती है।
उ.- माधौ जू, यह मेरी इक गाइ।¨¨¨¨¨¨ फिरति बेद-बन-ऊख उखारति, सब दिन अरु सब राति-१-५१।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरते
इधर- उधर घूमते, चलते।
उ.- अपने दीन दास कैं हित लोग, फिरते सँग-सँगही-१-२८३।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरतौ
घूमता, डोलता।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरतौ
दिखावत फिरतौ-दिखाता फिरता।
उ.- धर्म-धुजा अन्तर कछु नाहीं, लोक दिखावत फिरतौ-१-२०३।
प्र.

फिरना
चलना, भ्रमण करना।
क्रि. अ.
[हिं. फेरना का अक.]

फिरना
टहलना, सैर करना।
क्रि. अ.
[हिं. फेरना का अक.]

फिरना
बार-बार चक्कर खाना।
क्रि. अ.
[हिं. फेरना का अक.]

फिरना
ऐंठा मरोड़ा जाना।
क्रि. अ.
[हिं. फेरना का अक.]

फिरना
वापस होना, लौटना।
क्रि. अ.
[हिं. फेरना का अक.]

फिरना
बिकी चीज का वारस होना।
क्रि. अ.
[हिं. फेरना का अक.]

फिरना
मुख या सामना दूसरी ओर घूम जाना, मुड़ना, रुख बदलना।
क्रि. अ.
[हिं. फेरना का अक.]

फिराइ
फिराकर, लौटाकर, अपने वचन को वापस लेकर।
उ.- भक्तबछल श्री जादवराइ। भीषम की परतिज्ञा राखी, अपनों बचन फिराइ-१-२६७।
क्रि. स.
[हिं. फिराना]

फिराइ
ऐंठ या मरोड़कर।
उ.- बृषभ-गंजन मथन-केसी हने पूँछ फिराइ-४९८।
क्रि. स.
[हिं. फिराना]

फिराई
घुमाकर, फेरकर।
उ.- (क) भुकृटी कुटिल, अरून अति लोचन, अगिनि-सिखा-मुख कहयौ फिराई-९-५६। (ख) नगन त्रिय देखिबे जगत नाहिन कहयो, जानि इह हरि रहे मुख फिराई-१०उ.-३५
क्रि. स.
[हिं. फिराना]

फिराई
दूसरी दिशा में चलने की प्रेरणा दी।
उ.- उतही जातहि सखी सहेली मैं ही सबको इतहि फिराई-१०४९।
क्रि. स.
[हिं. फिराना]

फिराक
चिंता।
संज्ञा
[अ.फिराक]

फिराक
टोह।
संज्ञा
[अ.फिराक]

फिराक
फिराक में रहना- खोज में रहना।
मु.

फिराना
इधर से उधर ले जाना।
क्रि. स.
[हिं. फिरना]

फिराना
टहलाना, सैर कराना।
क्रि. स.
[हिं. फिरना]

फिराना
चक्कर या फेरा खिलाना।
क्रि. स.
[हिं. फिरना]

फिरना
किसी ओर फिरना- झुकना, प्रवृत्त होना। जी फिरना- जी हट जाना, उदास या विरक्त होना।
मु.

फिरना
विरुद्ध या विपक्ष में हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. फेरना का अक.]

फिरना
बदल जाना, परिवर्तित हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. फेरना का अक.]

फिरना
बात या वचन पर दृढ़ न रहना।
क्रि. अ.
[हिं. फेरना का अक.]

फिरना
झुकना, टेढ़ा हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. फेरना का अक.]

फिरना
चारो ओर प्रचारित या घोषित होना।
क्रि. अ.
[हिं. फेरना का अक.]

फिरना
लीपा-पोता जाना।
क्रि. अ.
[हिं. फेरना का अक.]

फिरना
स्पर्श किया जाना।
क्रि. अ.
[हिं. फेरना का अक.]

फिरवाना
फेरने का काम कराना।
क्रि. स.
[हिं. फेरना]

फिरवाना
फिराने का काम कराना।
क्रि. स.
[हिं. फिराना]

फिराना
ऐंठना, घुमाना, मरोड़ना।
क्रि. स.
[हिं. फिरना]

फिराना
लौटाना, पलटाना।
क्रि. स.
[हिं. फिरना]

फिराना
मुख या सामना दूसरी ओर करना।
क्रि. स.
[हिं. फिरना]

फिराना
एक ओर जाते हुए को दूसरी ओर चलाना।
क्रि. स.
[हिं. फिरना]

फिराना
बदल देना।
क्रि. स.
[हिं. फिरना]

फिराना
बात या बचन पर दृढ़ न रहने देना।
क्रि. स.
[हिं. फिरना]

फिरानो
घूमा, फिरा।
उ.- बहुत जतन करि हौं पचि हारी इतको नहीं फिरानो-पृ. ३२० (९०)।
क्रि. स.
[हिं. फिरना]

फिराय
ऐंठ या मरोड़कर।
उ.- उन नहिं मारयौ सम्मुख आयो पकरयो पूँछ फिराय।
क्रि. स.
[हिं. फिराना]

फिरायो, फिरायौ
घुमाया, चक्कर खिलाया।
उ.- (क) कंठ चाँपि बहु बार फिरायो, गहि पटक्यौ, नृप पास परयौ-१०-५९। (ख) यह ऐसो तुम अतिहि तनक से कैसे भुजन फिरायो-२३६९।
क्रि. स.
[हिं. फिराना]

फिरावत
लौटाता है, वापस करता है, विमुख करता है।
उ.- तुम नारायन भक्त कहावत। काहे को तुम मोहि फिरावत।
क्रि. स.
[हिं. फिराना]

फिरि
प्रचारित या घोषित होकर।
उ.- लंका फिरि गई राम दुहाई-९-१४०।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरि
पलटकर, मुँह फेरकर।
उ.- खेलन जाहु बाल सब टेरत। यह सुनि कान्ह भए अति आतुर, द्वारैं तन फिरि हेरत-१०-२४३।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरिबौ
फिरना, घूमना।
संज्ञा
[हिं. फिरना]

फिरिबौ
आवागमन, बार-बार जन्म लेना और मरना।
उ.- जिय करि कर्म, जन्म बहु पावै। फिरत-फिरत बहुतै स्रम आवै। अरू अजहूँ न कर्म परिहरै। जातैं याकौ फिरिबौ टरै-५-४।
संज्ञा
[हिं. फिरना]

फ़िरियाद
दुहाई, पुकार।
संज्ञा
[अ. फरियाद]

फिरियादी
फरियाद करनेवाला।
वि.
[हिं. फरियाद]

फिरिये
लौटिए, वापस आइए।
उ.- बेगि ब्रज को फिरिए नँदराइ-२६५१।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरिहरा
नचाने का एक खिलौना।
संज्ञा
[हिं. फिरना + हारा]

फिरिहौं
फिरता रहूँगा, घूमता रहूँगा।
उ.- कब लग फिरिहौं दीन बह्यौ-१-१६२।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरी
चारों ओर प्रचारित हुई. घोषित हुई।
उ.- गहि सारँग; रन रावन जीत्यौ, लंक बिभीषन फिरी दुहाई-१-२४।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरावति
फिराती है।
क्रि. स.
[हिं. फिराना]

फिरावति
घुमाती या नचाती हुई।
उ.- चली पीठि दै दृष्टि फिरावति, अंग-अंग आनन्द रली-७३९।
क्रि. स.
[हिं. फिराना]

फिरावन
फिराने या लौटाने की क्रिया।
उ.- मंत्री गयौ फिरावन रथ लै, रघुबर फेरि दियौ-९-४६।
संज्ञा
[हिं. फिराना]

फिरि
पुनः फिर, दोबारा।
उ.- (क) दुरबासा अँबरीष सतायौ, सो हरि-सरन गयौ। परतिज्ञा राखी मन-मोहन, फिरि तापैं पठयौ-१-३८। (ख) यह औसर कब ह्रैहै फिरिकै पायौ देव मनाई-१०-१८।
क्रि. वि.
[हिं. फिर, फिरना]

फिरि
फिरि फिरि-पुनः पुनः, बार-बार।
उ.- (क) सूरदास भगवंत-भजन बिनु फिरि फिरि जठर जरै-१-३५। (ख) फिरि फिरि ऐसोई है करत। जैसैं प्रेम पतंग दीप सौं पावक हू न डरत-१-५५। (ग) दीन-दयाल सूर हरि भजि लै, यह औसर फिरि नाहीं-१-३१९।
यौ.

फिरि
इसके अंनतर, बाद में, पश्चात, उपरांत।
उ.- सूर पाइ यह समै लाहु लहि, दुर्लभ, फिरि संसार-१-६८।
क्रि. वि.
[हिं. फिर, फिरना]

फिरि
तब, इस पर।
उ.- फल माँगत फिरि जात मुकर ह्वै यह देवन की रीति-१-१७।
क्रि. वि.
[हिं. फिर, फिरना]

फिरि
घूमकर, मुँह, फेरकर, पलटकर।
उ.- फिरि देखैं तो कुँवर कन्हाई मीजत रूचि सौं पीठ-७३८।
क्रि. वि.
[हिं. फिर, फिरना]

फिरि
घूमकर, भ्रमण करके।
उ.- (क) कौन कौन तीरथ फिरि आए-१-१८४। (ख) नृप चौरासी लछ फिरि आनौ-४-१२।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरि
लौटकर।
उ.- इहिं अंतर अर्जुन फिरि आयौ-२८६।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरी
घूमी, ढूँढ़ती रही।
उ.- बहुत फिरी तुम काज कन्हाई-४६२।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरे
लौटे, पलटे, वापस आये।
उ.- (क) देखि फिरे हरि ग्वाल दुवारैं-१०-२७७। (ख) अपने धाम फिरै तब दोऊ जानि भई कछु साँझ। (ग) नैन निरखि अजहूँ न फिरे री-पृ. ३२७ (६०)।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरैं
फिरते हैं, घूमते हैं।
उ.- किंकिन नूपुर पाट-पटंबर, मानौं लिये फिरैं घर-बार-१-४१।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरै
घूमता है, भ्रमण करता है।
उ.- कौन बिरत्क अधिक नारद तैं,निसि दिन भ्रमत फिरै-१-३५।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरै
सैर करती है, विचरती है, टहलती है।
उ.- अंकथ कथा याकी कछू, कहत नहीं कहि आई (हो)। छैलनि के सँग यौं फिरै, जैसैं तनु सँग छाई (हो)-१-४४।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिरैगौ
फिरेगा, इधर-उधर डोलेगा, घूमेगा।
उ.- चौरासी लख जोनि जन्मि जग, जल-थल भ्रमत फिरैगौ-१-७५।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिर्यो
फिरा, घूमा, भ्रमण किया।
उ.- बहुतक दिवस भए या जग मैं, भ्रमत फिरयौ मतिहीन-१-४६।
क्रि. अ.
[हिं. फिरना]

फिसड्डी
जो काम में पीछे रहे।
वि.
[अनु. फिस]

फिसफिसाना
शिथिल होना।
क्रि. अ.
[अनु. फिस]

फिसलन
रपटन।
संज्ञा
[हिं. फिसलना]

फीकी
व्यर्थ, निष्फल, सारहीन, प्रभावरहित।
उ.- जन यह कैसे कहे गुसाईं। तुम बिनु दीनबंधु, जादवपति, सब फीकी ठकुराई-१-१९५।
वि.
[हिं. फीका]

फीके
नीरस, अरूचिकर, सारहीन।
उ.- बिनु रघुनाथ माहिं सब फीके, आज्ञा मेटि न जाइ-९-१६१।
वि.
[हिं. फीका]

फीको, फोकौ
अरसिक, जो मिलनसार न हो।
उ.- महा कठोर, सुत्र हिरदै कौ, दोष देन कौ नीकौ- बड़ौ कुतध्नी और निकम्मा,बेधत, राँकौ-फीकौ-१-१८६।
वि.
[हिं. फीका]

फीको, फोकौ
स्वादहीन, नीरस, अरीचिकर, जो चखने में अच्छा न लगे।
उ.- (क) देह गेह सनेह अर्पन कमल लोचन ध्यान। सूर उनको भजन देखत फीकौ लागतज्ञान। (ख) जो रस खाइ स्वद करि छाँड़े सो रस लागत फीको-२९३८।
वि.
[हिं. फीका]

फीता
पतली धज्जी या किनारा।
संज्ञा
[पुर्त.]

फीरोजा
एक नग।
संज्ञा
[फा. फ़ीरोजा]

फीरोजी
हरापन लिये नीला।
वि.
[हिं. फ़ीरोजा]

फील
हाथी।
संज्ञा
[फा. फ़ील]

फीलवान
महावत।
संज्ञा
[फा. फ़ील + वान]

फीली
पिंडली।
संज्ञा
[सं. पुंड]

निवेरना
लेना, वसूलना।
क्रि. स.
[हिं. निवेड़ना]

निवेरना
निबटाना।
क्रि. स.
[हिं. निवेड़ना]

निवेरना
खत्म करना।
क्रि. स.
[हिं. निवेड़ना]

निवेरना
चुनना, छांटना।
क्रि. स.
[हिं. निवेड़ना]

निवेरना
हटाना, दूर करना।
क्रि. स.
[हिं. निवेड़ना]

निवेरा
चुना या छाँटा हुआ।
वि.
[हिं. निवेड़ना]

निवेरा
नया, अनोखा।
वि.
[हिं. निवेड़ना]

निवेरि
खत्म करके।
क्रि. स.
[हिं. निवेड़ना]

निवेरि
आए निवेरि-खत्म कर आये।
उ.-सूरदास सब नातो ब्रज को आए नंद निवेरि-२८७५।
प्र.

निवेरी
चुनी-छँटी हुई।
उ.-आजु भई कैसी गति तेरी ब्रज में चतुर निवेरी।
वि.
[हिं. निवेरा]

फिसलना
चिकनाई से पैर आदि रपटना।
क्रि. अ.
[सं. प्र. + सरण]

फिसलना
झुकना, प्रवृत्त होना।
क्रि. स.
[सं. प्र. + सरण]

फिसलना
जी फिसलना- (१) मन ललचाना। (२) मोहित होना।
मु.

फिसलाना
रपटाना, खिसलाना।
क्रि. स.
[हिं. फिसलना]

फीचना
पटककर धोना।
क्रि. स.
[अनु. फिच फिव]

फी
प्रति एक, हर एक।
अव्य.
[अ. फ़ी]

फीका
नीरस, स्वादहीन।
वि.
[सं. अपक्क, प्रा. अपिक्क]

फीका
जो चटक रंग का न हो।
वि.
[सं. अपक्क, प्रा. अपिक्क]

फीका
कांति या तेजहीन।
वि.
[सं. अपक्क, प्रा. अपिक्क]

फीका
निष्फल, प्रभावहीन।
वि.
[सं. अपक्क, प्रा. अपिक्क]

फुँकना
जँलना।
क्रि. अ.
[हिं. फूँकना]

फुँकना
नष्ट होना।
क्रि. अ.
[हिं. फूँकना]

फुँकना
ईर्ष्या करना।
क्रि. अ.
[हिं. फूँकना]

फुँकना
हवा फूँकने की नली।
संज्ञा

फुँकनी
हवा फूँकने की पतली नली।
संज्ञा
[हिं. फूँकना]

फुँकनी
भाथी।
संज्ञा
[हिं. फूँकना]

फुंकरना
फुंकार छोड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. फुंकार]

फुकरै
फुंकार मारता है।
उ.- सहसौ फत फनि फुंकरे, नैंकु न तिन्हैं बिकार-५८९।
क्रि. अ.
[हिं. फुँकरना]

फुँकर्यौ
फुँकार मारी, फूत्कार छोड़ी, फूँ फूँ शब्द किया।
उ.- पूंछ लीन्हीं झटकि धरनि सौं गाहे पटकि फुंकरयौ लटाकि करि क्रोध फूले-५५२।
क्रि. अ.
[हिं. फुंकारना]

फुँकवाना, फुँकाना
फूँकने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. फूँकना]

फुँकवाना, फुँकाना
मुख से हवा निकलवाना।
क्रि. स.
[हिं. फूँकना]

फुँकवाना, फुँकाना
जलवाना।
क्रि. स.
[हिं. फूँकना]

फुँकार
मुख से हवा का झोंका निकलने का शब्द, फूत्कार।
उ.- (क) कंस कोट जरि जाहिंगे, बिष की एक फुंकार-५८९। (ख) सहस फन फुंकार छाँड़ जाइ काली नाथियाँ।
संज्ञा
[अनु.]

फुँदना
फुलरा, झब्बा।
संज्ञा
[हिं. फूल + फंदा]

फुँदी
गाँठ, फंदा।
संज्ञा
[हिं. फंदा]

फुंसी
छोटी फुड़िया।
संज्ञा
[सं. पनसिका, फा. फनस]

फुट
अकेला।
वि.
[सं. स्फुट]

फुट
अलग।
वि.
[सं. स्फुट]

फुटकर
जिसका जोड़ा न हो।
वि.
[सं. स्फुट + कर]

फुटकर
कई प्रकार का।
वि.
[सं. स्फुट + कर]

फुटकर
अलग।
वि.
[सं. स्फुट + कर]

फुटकर
छोड़ा-थोड़ा।
वि.
[सं. स्फुट + कर]

फुटका
छाला, फफोला।
संज्ञा
[सं. स्फोटक]

फुटकी
छोटे कण या लच्छे।
संज्ञा
[सं. फुटक]

फुटत
फूटता है।
उ.- उचटत अति अंगार, फुटत फर, झटपट लपट कराल-६१५।
क्रि. अ.
[हिं. फूटना]

फुटट
अकेला।
वि.
[हिं. फुट]

फुटट
अलग।
वि.
[हिं. फुट]

फुट्टैल
जिसका जोड़ा न हो।
वि.
[हिं. फुट + ऐल]

फुट्टैल
अलग रहनेवाला।
वि.
[हिं. फुट + ऐल]

फुट्टैल
जिसका भाग्य फूटा हो।
वि.
[हिं. फुटना]

फुदकना
उछलना-कदना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फुदकना
हर्ष या उमंग से फूल जाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फुनंग, फुनँगी
वृक्ष का छोर।
संज्ञा
[सं. पुलक]

फुप्फुस
फेफड़ा।
संज्ञा
[सं.]

फुफँदी, फुफंदी
नीबी, इजारबंद।
संज्ञा
[हिं. फूल + फंद]

फुफकाना
फुफकारना।
क्रि. स.
[अनु.]

फुफुकार
साँप की फुंकार, फूत्कार।
उ.- सहस फन फुफुकार छाँड़े, जाइ काली नाथियाँ-५७७।
संज्ञा
[अनु.]

फुफुकारना
साँप का फूत्कार करना।
क्रि. अ.
[हिं. फुफकार]

फुफेरा
फुफा से उत्पन्न।
वि.
[हिं. फूफा]

फुर
सत्य, सच्चा।
वि.
[हिं. फुरना]

फुरना
उच्चरित होना।
क्रि. अ.
[सं. स्फुरण, प्रा. फुरण]

फुरना
सत्य या ठीक उतरना।
क्रि. अ.
[सं. स्फुरण, प्रा. फुरण]

फुरना
असर या प्रभाव करना।
क्रि. अ.
[सं. स्फुरण, प्रा. फुरण]

फुरना
सफल होना।
क्रि. अ.
[सं. स्फुरण, प्रा. फुरण]

फुरफुर
पंख की फरफराहट।
संज्ञा
[अनु.]

फुरफुराना
फुरफुर' करना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फुरफुराना
हलकी वस्तु का लहराना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फुरफुराना
किसी वस्तु को हिलाना-डुलाना।
क्रि. स.

फुरफुरी
पंख फड़फड़ाने का भाव।
संज्ञा
[अनु.]

फुरसत
अवकाश, छुट्टी।
संज्ञा
[अ. फुरसत]

फुर
पंख फड़फड़ाने की ध्वनि।
संज्ञा
[अनु.]

फुरई
प्रभाव करता है, असर डालता है, लगता है।
उ.- पौढ़े कहा समर-सेज्या सुत, उठि किन उत्तर देत। थकित भए कछु मंत्र न फुरई, कीने मोह अचेत-१-२९।
क्रि. अ.
[हिं. फुरना]

फुरत
असर या प्रभाव करती है।
उ.- जंत्र न फुरत मंत्र नहिं लागत प्रीति सिरानी जाति।
क्रि. अ.
[हिं. फुरना]

फुरत
स्फुटित हुआ, उच्चरित हुआ, मुँह से निकला।
उ.- (क) कोउ निरखति अधरन की सोभा फुरति नहीं मुख बानी-६४४। (ख) फुरत न बचन कछू कहिवे को रहे बैन सो हारी-३३१३।
क्रि. अ.
[हिं. फुरना]

फुरति, फुरती
शीघ्रता, तेजी।
उ.-द्विविद लै साल को बृक्ष सम्मुख भयो फरति करि राम तनु फेंकि मारयौ-१० उ.-४५।
संज्ञा
[सं. स्फूर्ति]

फुरति, फुरती
उच्चरित होता है।
उ.- सिथिल गात मुख बचन फुरति नहिं ह्वै जो गई मति भोरी।
क्रि. अ.
[हिं. फुरना]

फुरतीला
लो फुरती करे, तेज।
वि.
[हिं. फुरती + ईला]

फुरना
प्रकट या उदय होना।
क्रि. अ.
[सं. स्फुरण, प्रा. फुरण]

फुरना
चमक उठना।
क्रि. अ.
[सं. स्फुरण, प्रा. फुरण]

फुरना
फड़कना, फड़फड़ाना।
क्रि. अ.
[सं. स्फुरण, प्रा. फुरण]

फुरहरना
निकलना, उत्पन्न होना।
क्रि. अ.
[सं. स्फुरण]

फुरहरी
पंख फड़फड़ाने की क्रिया।
संज्ञा
[अनु.]

फुरहरी
पंख, कपड़े आदि की फड़फड़ाहट।
संज्ञा
[अनु.]

फुरहरी
कंप और रोमांच, कँपकँपी।
संज्ञा
[अनु.]

फुराना
सच्चा या ठीक उतारना।
क्रि. स.
[हिं. फुर]

फुराना
प्रमाणित करना।
क्रि. स.
[हिं. फुर]

फुराना
उच्चारित करना।
क्रि. स.
[हिं. फुर]

फुरी
सत्य या ठीक हुई, पूरी उतरी।
उ.- फुरी तुम्हारी बात कही जो मोसों रही कन्हाई।
क्रि. स.
[हिं. फुरना]

फुरे
उच्चरित हुए।
उ.- उठि के मिले तंदुल हरि लीन्हें मोहन बचन फुरे।
क्रि. स.
[हिं. फुरना]

फुरे
प्रभाव किया।
फुरे न जंत्र मंत्र नहिं लागे, चले गुनी गुन हारे-७४७।
क्रि. स.
[हिं. फुरना]

फुरेरी
सींक जिसके सिरे पर दवा, इत्र आदि लगाने को रुई लिपटी हो।
संज्ञा
[हिं. फुरफुराना]

फुरेरी
कँपकपी।
संज्ञा
[हिं. फुरफुराना]

फुरेरी
फुरेरी आना- कँपकँपी होना। फुरेरी लेना- (१) काँपना। (२) फड़कना, फड़फड़ाना।
मु.

फुरेरी
सजग या होशियार होना।
संज्ञा
[हिं. फुरफुराना]

फुरै
उच्चरित होता है।
उ.- फुरै न बचन बरजिबै कारन, रहीं बिचारि बिचारि-१०-२८३।
क्रि. अ.
[हिं. फुरना]

फुरै
प्रभाव या असर करता है।
उ.- फुरै न मंत्र, जंत्र नहिं लागे, चले गुनी गुन हारे-७४७।
क्रि. अ.
[हिं. फुरना]

फुलका
हलकी पतली रोटी।
संज्ञा
[हिं. फूलना]

फुलझड़ी, फुलझरी
ऐसी आतिशबाजी जिसमें फूल-सी चिनगारियाँ निकलें।
संज्ञा
[हिं. फूल + झड़ना]

फुलझड़ी, फुलझरी
ऐसी बात जिससे परस्पर झगड़ा या विवाद हो जाय।
संज्ञा
[हिं. फूल + झड़ना]

फुलरा
फुँदना।
संज्ञा
[हिं. फूल]

फुलवाई, फुलवाड़ी, फुलवारी
फुलवाटिका।
उ.- (क) इक दिन सुक्रसुता मन आई। देखौ जाइ फूल फुलवाई-९-१७४। (ख) रितु बसंत फूली फुलवाइ-११७-५।
संज्ञा
[हिं. फूल + वारी, फुलवाड़ी]

फुलहारा
माली।
संज्ञा
[हिं. फूल + हारा]

फुलही
एक तरह की गाय।
उ.- पियरी, भौरी, गोरी, गैनी, खेरी, कजरी, जेती। दुलही, पुलहीं, भौंरी, भूरी, हाँकि ठिकाई तेती-१०-४४५।
संज्ञा
[देश.]

फुलाना
वस्तु के विस्तार या फैलाव के बाहर की ओर बढ़ाना।
क्रि. स.
[हिं. फूलना]

फुलाना
गाल (मुँह) फुलाना- रूठना, रिसाना।
मु.

फुलाना
पुलकित या आनंदित करना।
क्रि. स.
[हिं. फूलना]

फुलाना
गर्व या घमंड बढ़ाना।
क्रि. स.
[हिं. फूलना]

फुलाना
फूलों से युक्त करना।
क्रि. स.
[हिं. फूलना]

फुलाव
फूलने की स्थिति।
संज्ञा
[हिं. फूलना]

फुलावट
फूलने का भाव।
संज्ञा
[हिं. फूलना]

निमज्जना
गोता लगाना।
क्रि. अ.
[सं. निमजन]

निमज्जित
डूबा हुआ।
वि.
[सं.]

निमज्जित
नहाया हुआ
वि.
[सं.]

निमता
जो उन्मत्त न हो।
वि.
[हिं. नि + मत्त]

निमान
गड्ढा।
संज्ञा
[सं. निम्न]

निमान
जलाशय।
संज्ञा
[सं. निम्न]

निमाना
ढलुवाँ, ढाल।
वि.
[सं. निम्न]

निमाना
सीधा-सादा, सरल, विनीत।
वि.
[सं. निम्न]

निमाना
दब्ब।
वि.
[सं. निम्न]

निमि
दत्तात्रेय के पुत्र, एक ऋषि।
संज्ञा
[सं.]

निवेरी
नयी, अनोखी।
उ.-मैं कह आजु निवेरी आई ? बहुतै आदर करति सबै मिलि पहुने की कीजै पहुनाई।
वि.
[हिं. निवेरा]

निवेश
विवाह।
संज्ञा
[सं.]

निवेश
घर, गृह।
संज्ञा
[सं.]

निशंक
निडर, निर्भय।
परम निशंक समर सरिता तट क्रीड़त यादववीर-१० उ.-१०२।
वि.
[सं. निःशंक]

निश, निशा
रात्रि, रात।
संज्ञा
[सं. निशा]

निश, निशा
मेष, वृष, मिथुन आदि छह राशियाँ।
संज्ञा
[सं. निशा]

निशांत
प्रभात।
संज्ञा
[सं. निशा + अंत]

निशाकर
चंद्रमा।
संज्ञा
[सं.]

निशाचर
राक्षस।
संज्ञा
[सं.]

निशाचर
उल्लू।
संज्ञा
[सं.]

फुल्ली
फूल की तरह का कोई आभूषण या उसका भाग।
संज्ञा
[हिं. फूल]

फुस
बहुत धीमी आवाज।
संज्ञा
[अनु.]

फुसकारना
फूत्कार छोड़ना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फुसफुसा
ढीला।
वि.
[हिं. फूस]

फुसफुसा
कमजोर।
वि.
[हिं. फूस]

फुसफुसाना
बहुत धीरे बोलना।
क्रि. स.
[अनु.]

फुसलाना
बहलाना, ध्यान बटाना।
क्रि. स.
[हिं. फिसलाना]

फुसलाना
चकमा देना, बहकाना।
क्रि. स.
[हिं. फिसलाना]

फुसलाना
मीठी बातों से अपने अनुकूल करना।
क्रि. स.
[हिं. फिसलाना]

फुसलाना
राजी करना।
क्रि. स.
[हिं. फिसलाना]

फुलावा
बाल गूँथने की डोरी या चोटी जिसमें फूल या फुँदना लगा हो।
संज्ञा
[हिं. फूल]

फुलिंग
चिनगारी।
संज्ञा
[सं. स्फुलिंग, प्रा. फुलिंग]

फुलिया
कील, काँटे आदि का चिपटा सिरा।
संज्ञा
[हिं. फूल]

फुलिया
कान या नाक की ‘लौंग’ नामक गहना।
संज्ञा
[हिं. फूल]

फुलेरा
फूल की छतरी।
संज्ञा
[हिं. फूल]

फुलेल, फुलेलन
सुगंधित तेल।
उ.- उर धारी लटैं छूटी आनन पै, भीजी फुलेलन सों आली हरि संग केलि-१५८२।
संज्ञा
[हिं. फूल + तेल]

फुलेहरा
सूत, रेशम आदि के फूलों से बना बंदनवार।
संज्ञा
[हिं. फूल + हार]

फुलौड़ा, फुलौरा
बड़ा पकौड़ा।
संज्ञा
[हिं. फूल]

फुलौड़ी, फुलौरी
बरी, पकौड़ी।
उ.- पापर, बरी, मिथौरि फुलौरी। कूर बरी काचरी पिठौरो-३९६।
संज्ञा
[हिं. फूल + बरी]

फुल्ल
फूला हुआ, विकसित।
वि.
[सं.]

फुहार
बहुत महीन बूँदों की वर्षा जो उड़ती जान पड़े।
संज्ञा
[सं. फूत्कार]

फुहारा
एक जलयंत्र।
संज्ञा
[हिं. फुहार]

फुही
महीन-महीन बूँदों की झड़ी, फुहार।
उ.- सिर बरसत सुमन सुटेस, मानौ मेघ फुही-१०-२४।
संज्ञा
[हिं. फुहार]

फुही
महीन बूँद।
संज्ञा
[हिं. फुहार]

फूँक
ओठों सी छोड़ी हुई सवेग वायु।
संज्ञा
[हिं. फू फू. (अनु.)]

फूँक
विषैली फूत्कार।
उ.- (क) कहा कंस दिखरावत इनकौं, एक फूँक ही मैं जरि जाई-५५०। (ख) एक फूँक कौ नाहिं तू बिष-ज्वाला अति तात-५८९।
संज्ञा
[हिं. फू फू. (अनु.)]

फूँक
साँस।
संज्ञा
[हिं. फू फू. (अनु.)]

फूँक
फूँक निकल जाना (निकलना)- मरना।
मु.

फूँक
मंत्र पढ़ कर मुँह स छोड़ी गयी वायु।
संज्ञा
[हिं. फू फू. (अनु.)]

फूँक
झाड़-फूँक - तंत्र-मंत्र का उपचार।
यौं.

फूँकति
फूँक मारती है, फूँकती है।
उ.- बरा कौर मेलत मुख भीतर, मिरिच दसन टकटौरे। तीछन लगी नैन भरि आए, रोवत बाहर दौरे। फूँकति बदन रोहिनी ठाढ़ी, लिए लगाइ अँकोरे-१०-२२४।
क्रि. स.
[हिं. फुँकना]

फूँकना
जोर से फूँक छोड़ना।
क्रि. स.
[हिं. फूँक]

फूँकना
फूँक फूँक कर चलना (पैर रखना)- बहुत सावधानी से काम करना।
मु.

फूँकना
मंत्र आदि पढ़कर फूँक मारना।
क्रि. स.
[हिं. फूँक]

फूँकना
शंख आदि को फूँक मारकर बजाना।
क्रि. स.
[हिं. फूँक]

फूँकना
जला देना, भस्म करना।
क्रि. स.
[हिं. फूँक]

फूँकना
जलाकर भस्म बनाना।
क्रि. स.
[हिं. फूँक]

फूँकना
नष्ट करना।
क्रि. स.
[हिं. फूँक]

फूँकना
दुख देना।
क्रि. स.
[हिं. फूँक]

फूँकना
फूँककर सुलगाना।
क्रि. स.
[हिं. फूँक]

फूँकि
जोर से फूँक मारकर।
उ.- फूँकि फूँकि जननी पय प्यावति, सुख पावति जो उर न समैया-१०-२२९।
क्रि. स.
[हिं. फूँकना]

फूँकि
फूँफिँ फूँकि पग धारौ- बहुत बचाकर चलो, होशियारी से काम करो। उ.- फूँकि फूँकि धरनी पग धारौ, अब लागीं तुम करन अयोग-१४९७।
मु.

फूँकि
फूँक से सुलगाकर।
उ.- (क) फूँकि फूँकि हियरौ सुलगावत उठि किन इहाँ ते जात-३०२३। (ख) सुलगि सुलगि हम जरत हो तुम आनि फूँकि दई।३१३१।
क्रि. स.
[हिं. फूँकना]

फूँद, फूँदा
फुँदना, झब्बा।
उ.- रत्न जटित गजरा बाजूबँद सोभा भुजन अपार। फूँदा सुभग फूल फूले मनो मदन बिटप की डार-२०६२।
संज्ञा
[हिं. फूँल + फंद]

फुई
महीन बूँद।
संज्ञा
[हिं. फुही]

फुई
फफूँदी।
संज्ञा
[हिं. फुही]

फूट
फूटने का भाव
संज्ञा
[हिं. फूटना]

फूट
वैर, विरोध।
संज्ञा
[हिं. फूटना]

फूट
फूट डालना- वैर या झगड़ा कराना।
मु.

फूट
एक तरह की बड़ी ककड़ी, एक फल।
संज्ञा
[हिं. फूटना]

फूट
फूट-सा खिलना- पककर दरक जाना।
मु.

फूटन
अंगों की पीड़ा।
संज्ञा
[हिं. फूटना]

फूटना
भग्न होना, दरकना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
फटना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
नष्ट होना, बिगड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
फूटी आँख का तारा- कई बेटों के मरने पर बच जानेवाला बेटा। फूटी आँखों न भाना- बहुत ही बुरा लगना। फूटी आँखों न देख सकना- बहुत जलना, कुढ़ना। फूटे मुँह से भी न बोलना- (१) मुँह से एक शब्द भी न निकालना। (२) उपेक्षा करना।
मु.

फूटना
झोंक के साथ बाहर आना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
फोड़े फुंसी की तरह निकलना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
कली का खिलना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
अंकुर-शाखा आदि निकलना, अंकुरित होना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
मार्ग आदि का अलग होकर जाना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
बिखरना, फैलना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
संग या साथ छोड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
दूसरे पक्ष में हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
मिलाप न बना रहना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
शब्द का मुँह से निकलना, बोलना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
फूट फूट कर रोना- बहुत विलाप करना।
मु.

फूटना
प्रकट या प्रकाशित होना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
गुप्त बात का प्रकट होना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
रोक, परदा, बाँध आदि का टूटना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूफा
बाप का बहनोई।
संज्ञा
[हिं. फूफी]

फूफी, फूफू
बाप की बहन, बुआ।
संज्ञा
[अनु.]

फूल
पुष्प, सुमन, कुसुम
उ.- ज्यों सुक सेमर-फूल बिलोकत, जात नहीं बिनु खाए -१-१००।
संज्ञा
[सं. फुल्ल]

फूल
फूल आना- फूल लगना। फूल उतारना (चुनना) - फूल तोड़ना। फूल झड़ना- प्रिय और मधुर शब्द कहना। फूल-सा- बहुत कोमल, हलका या सुन्दर। फूल सूँघकर रहना- बहुत कम खाना (व्यंग्य)। पान-फूल-सा- बहुत कोमल और सुकुमार।
मु.

फूल
फूल की तरह के बेल-बूटे।
संज्ञा
[सं. फुल्ल]

फूल
फूल की बनावट का गहना।
संज्ञा
[सं. फुल्ल]

फूल
दीपक की बत्ती का गुल या उससे निकलने वाली चिनगारी।
उ.- हरि जू की आरती बनी।¨¨¨। उढ़त फूल उड़गन नभ अंतर, अंजन घटा घनी -२-८८।
संज्ञा
[सं. फुल्ल]

फूल
आग की चिनगारी।
संज्ञा
[सं. फुल्ल]

फूल
सार, सत्त।
संज्ञा
[सं. फुल्ल]

फूल
देशी शराब।
संज्ञा
[सं. फुल्ल]

फूटना
द्रव का किसी चीज पर फैल जाना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटना
शरीर के जोड़ों में दर्द होना।
क्रि. अ.
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]

फूटा
भग्न, टूटा हुआ।
वि.
[हिं. फूटना]

फूटि
फूट गयी, भग्न हई।
क्रि. अ.
[हिं. फूटना]

फूटि
नष्ट हुई, विनष्ट हुई
उ.- निसि दिन बिषय- बिलासनि बिलसत, फूटि गईं तब चारयौ-१-१०१।
क्रि. अ.
[हिं. फूटना]

फूटी
भग्न, टूटी हुई, फटी हुई।
उ.- (क) टूटे कंध अरू फूटी नाकनि, कौलौं धौं भुस खेहो-१-३३१। (ख) फूटी चूरी गोद भरि ल्यावै-१०-३३२।
वि.
[हिं. फूटना]

फूटी
(आँख) जिससे दिखायी न दे।
उ.- एक अँधेरौ, हिए की फूटी, दौरत पहिरि खराऊँ -३४६६।
वि.
[हिं. फूटना]

फूटै
भेदकर निकले, झोंके से बाहर आए, छटे, उदित हो।
उ.- सूरदास तबहीं तम नासे, ज्ञान-आंगनि-झर फूटें -२-१९।
क्रि. अ.
[हिं. फूटना]

फूत्कार
फूँका।
संज्ञा
[सं.]

फूत्कार
सर्प की फुफकार।
संज्ञा
[सं.]

फूल
शव के जलने से बची हड्डियाँ।
संज्ञा
[सं. फुल्ल]

फूल
एक मिश्र धातु।
संज्ञा
[सं. फुल्ल]

फूल
उमंग।
संज्ञा
[हिं. फूलना]

फूल
आनंद।
संज्ञा
[हिं. फूलना]

फूलडोल
चैत्र शुक्ल एकादशी को मनाया जानेवाला उत्सव जिसमें श्रीकृष्ण का झूला फूलों से सजाया जाता है।
संज्ञा
[हिं. फूल + डोल]

फूलडोल
फूलों का झूला।
उ.- माई फूले फूले ही फूलत श्री राधेकृष्णा झूलत सरस रस ही फूलडोल -२४०१।
संज्ञा
[हिं. फूल + डोल]

फूलत
खिलता है।
उ.- ज्यों जल-रूह ससि-रस्मि पाइ कै फूलत नाहिंन सर तैं -३५४।
क्रि. अ.
[हिं. फूलना]

फूलति
खिलती है।
उ.- हरि-बिधु मुख नहिं नाहिंनै फूलति मनसा कुमुद कली -२७३४।
क्रि. अ.
[हिं. फूलना]

फूलदान
फूल सजाने का पात्र।
संज्ञा
[हिं. फूल + दान]

फूलदार
जिसमें फूल बने हों।
वि.
[हिं. फूल + दार]

निशान
प्राकृतिक चिह्न या बाग।
संज्ञा
[फ़ा.]

निशान
विगत घटना या वस्तु सूचक चिह्न।
संज्ञा
[फ़ा.]

निशान
नाम-निशान- शेष चिह्न।
यौ.

निशान
नाम-निशान- शेषांश।
यौ.

निशान
पता-ठिकाना।
संज्ञा
[फ़ा.]

निशान
लक्ष्य, निशाना।
उ.-तीर चलावत शिष्य सिखावत धर निशान देखरावत-सारा. १९०।
संज्ञा
[फ़ा.]

निशान
ध्वजा, पताका, झंडा।
संज्ञा
[फ़ा.]

निशापति
चंद्र।
संज्ञा
[सं.]

निशापति
कपूर।
संज्ञा
[सं.]

निशाना
लक्ष्य।
संज्ञा
[फ़ा.]

फूलना
फूलों से युक्त होना।
क्रि. अ.
[हिं. फूल]

फूलना
फूलना-फूलना- (१) धन-संतान से सुखी रहना। (२) सभी तरह से प्रसन्न और सुखी रहना।
मु.

फूलना
खिलना, विकसित होना।
क्रि. अ.
[हिं. फूल]

फूलना
हवा आदि से किसी चीज की गोलाई, या मोटाई बढ़ना।
क्रि. अ.
[हिं. फूल]

फूलना
सतह का उठना या उभरना।
क्रि. अ.
[हिं. फूल]

फूलना
सूज जाना।
क्रि. अ.
[हिं. फूल]

फूलना
मोटा या स्थूल होना।
क्रि. अ.
[हिं. फूल]

फूलना
गर्व-घमंड करना।
क्रि. अ.
[हिं. फूल]

फूलना
आनंदित या प्रसन्न होना।
क्रि. अ.
[हिं. फूल]

फूलना
रूठना, मान करना।
क्रि. अ.
[हिं. फूल]

फूलमती
एक देवी।
संज्ञा
[हिं. फूल + मत]

फूला
खील, लावा।
संज्ञा
[हिं. फूलना]

फूला
मोटा, स्थूल।
संज्ञा
[हिं. फूलना]

फूला
गर्वीला।
संज्ञा
[हिं. फूलना]

फूलि
गर्व में भरकर, घमंड में होकर, इतराकर।
उ.-कबहुँक फूलि सभा मैं बैठ्यौ, मूँछनि ताव दिवायौ-१-३०१।
क्रि. अ.
[हिं. फूलना]

फूलीं
विकसित हुईं, खिल गईं।
उ.-(क) मनु भोर भऐं रवि देखि, फूलीं कमल-कली-१०-२४। (ख) पूरन मुख-चंद देखि नैन-कोइ फलीं-६४२।
क्रि. अ.
[हिं. फूलना]

फूली
पुष्पित हुई, फूल लगे।
उ.-रितु बसंत फूली फुलवाई-१० उ.-२०५।
क्रि. अ.
[हिं. फूलना]

फूली
प्रसन्न या आनंदित हुई।
उ.-फूली फिरै धेनु धाम, फूली गोपी अँग अँग-१०-३४।
क्रि. अ.
[हिं. फूलना]

फूली
फूले अंग न समाई- बहुत आनंदित हुई। उ.-भले ही मेरे लालन आये री आजु मैं फूली अंग न समाई- पृ ३१९(८१)।
मु.

फूले
बहुत प्रसन्न या आनंदित होकर।
उ.-(क) आजु दसरथ कैं आँगन भीर।¨¨¨¨¨ फूले फिरत अजोध्यावासी, गनत न त्यागत चीर-९-१६। (ख) फूले फिरैं गोपी-ग्वाल टहर-टहर के-१०-३४। (ग) गावत गुन गोपाल फिरत कुंजन में फूले-३४४३।
क्रि. अ.
[हिं. फूलना]

फूही
बहुत हलकी वर्षा।
संज्ञा
[अनु.]

फेंक
फेंकने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. फेंकना]

फेंकना
ऐसा झोंका देना कि दूर जाकर गिरे।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेखण]

फेंकना
कुश्ती में गिराना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेखण]

फेंकना
एक स्थान से हटाकर दूसरे में डालना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेखण]

फेंकना
लापरवाही से रख छोड़ना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेखण]

फेंकना
अपना पीछा छड़ाकर दूसरे पर बोझ डालना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेखण]

फेंकना
कौड़ी, पासा आदि डालना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेखण]

फेंकना
खोना, गँवाना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेखण]

फेंकना
अपमान से त्यागना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेखण]

फूले
फूले अंग न मात (समात)- बहुत अधिक प्रसन्न हुए। उ.-जानि चीन्हि पहिचानि कुँवर मन फूल अंग न मात-१० उ.-८।
मु.

फूले
पुष्पित हुए, खिले।
उ.-(क) मन के मनोज फूले हलधर बर के-१०-३४। (ख) व जो देखत राते राते फूलन फूले डार-२७९८।
क्रि. अ.
[हिं. फूलना]

फूले
फूले-फरे- फल और पुष्प से युक्त हो गयै। उ.-फूले-फरे तरुवर आनंद लहर के-१०-३४।
मु.

फूले
बहुत क्रुद्ध हुए।
उ.-पूँछ लीन्ही झटकि, धरनि सौं गहि पटकि, फुंकरयौ लटकि करि क्रोध फूले-५५२।
क्रि. अ.
[हिं. फूलना]

फूल
फूल लगते हैं, पुष्पित होता है।
उ.-तरुवर फूलै, फरै, पतझरै, अपने कालहिं पाइ-१-२६५।
क्रि. अ.
[हिं. फूलना]

फूल्यौ
प्रफुल्ल या आनंदित हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. फूलना]

फूल्यौ
फूल्यौ न समाई- फूला न समाया, अत्यंत आनंदित हुआ। उ.-हनुमत बल प्रगट भयौ, आज्ञा जब पाई। जनक-सुतृचरन बंदि, फूल्यौ न समाई-९-९६।
मु.

फूस
सूखी घास और तिनके।
संज्ञा
[सं. तुष]

फूहड़, फृहर
भद्दी चाल-ढाल वाला।
वि.
[अनु.]

फूहा
रुई का गाला।
संज्ञा
[हिं. फुही]

फेंकना
बेकार खर्च करना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेखण]

फेंकना
उछालना, झटकना-पटकना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेखण]

फेंकना
(पटा) घुमाना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेखण]

फेंकरना
गीदड़ का रोना या बोलना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फेंकरना
चिल्ला-चिल्लाकर रोना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फेंट
कमर का घेरा, कटि-मंडल।
उ.-फेंट पीतपट, साँवरे कर पलास के पात। परस्पर ग्वाल सब बिमल-बिमल दधि खात।
संज्ञा
[हिं. पेट या पेटी]

फेंट
कमर में बेंधा कपड़ा, कमरबंद, पटुका।
उ.-(क) खायबे को कछु भाभी दीनी श्रीपति मुख तैं बोले। फेंट उपरि तैं अंजुलि तंदुल बल करि हरि जू खोले। (ख) स्याम सखा कौं गेंद चलाई। श्रीदामा हरि अंग बचायौ, गेंद परयौ कालीदह जाई। धाय गह्यौ तब फेंट स्याम की, देहु न मेरी गेंद मँगाई।
संज्ञा
[हिं. पेट या पेटी]

फेंट
फेंट कसना (बाँधना)- कमर कसकर हर बात के लिए तैयार होना। कसि फेंट- कटिबद्ध होकर, सन्नद्ध होकर, कमर कसकर सब कठिनाइयों को झेलने के लिए तैयार होकर। उ.-अब लोग प्रभु तुम बिरद बुलाए, भई न मोसों भेंट। तजौ बिरद कै मोहिं उधारौ, सूर कहै कसि फेंट-१-१४५। फेंट गद्दता, धरता (पकड़ता)- रोक लेता, जाने न देता। फेंट पकरतौ- रोकता, थामता, जाने न देता। उ.-सूरदास बैकुंठ पैठ मैं कोउ न फेंट पकरतौ-फेट गही- जाने से रोका। उ.-हम अबला कछु मर्म न जान्यौ चलत न फेंट गही-२७९७।
मु.

फेंट
फेरा, लपेट, घुमाद।
संज्ञा
[हिं. पेट या पेटी]

फेंट
फेंटने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. फेंटना]

फेंटना
गाढ़े लेप को खूब हिलाना या मथना।
क्रि. स.
[सं. पृप्ठ, प्रा. पिटठ + ना]

फेंटना
उँगली से खूब मिलाना।
क्रि. स.
[सं. पृप्ठ, प्रा. पिटठ + ना]

फेंटा
कटि-मंडल।
संज्ञा
[हिं. फेंट]

फेंटा
कपड़ा जो कर में लपेटा हो, कमरबंद, पटुका।
उ.-माया को कटि फेटा बाँध्यौ, लोभ तिलक दियौ भाल-१-१५३।
संज्ञा
[हिं. फेंट]

फेंटा
धोती का घेरा जो कमर पर लिपटा हो।
संज्ञा
[हिं. फेंट]

फेकरना
(सिर) नंगा होना।
क्रि. अ.
[हिं. फेंकना]

फेण, फेन
झाग, फेना।
उ.-मनहुँ मथत सुर सिंधु, फेन फटि, दयौ दिख ई पूरनचंद-१०-२०४।
संज्ञा
[सं. फेन]

फेनक
फेन, झाग।
संज्ञा
[सं.]

फेनक
एक मिठाई।
संज्ञा
[सं.]

फेनना
किसी द्रव को इतना मथना कि झाग उठने लगे।
क्रि. स.
[हिं. फेन]

फेनिल
जिसमें फेन हो।
वि.
[सं.]

फेनि, फेनी
मैदा के महीन लच्छे की एक मिठाई जो चाशनी में पागकर या दूध में भिगोकर खाई जाती है।
उ.-(क) घेवर-फेनी और सुहारी। खोवा-सहित खाहु बलिहारी-१०-११४। (ख) अपनी पत्रावलि सब देखत, जहँ तहँ फेनि पिराक-४६४।
संज्ञा
[सं. फेनिका]

फेनु
झाग, फेन।
उ.-आनंद मगन धेनु स्रवैं थन पय फेनु, उमँग्यौ, जमुन-जल उछलि लहर के -१०-३०।
संज्ञा
[सं. फेन]

फेफड़ा
साँस की थैली।
संज्ञा
[सं. फुप्फुस]

फेफड़ी, फेफरी
पपड़ी।
उ.-पीरो भयो फेफरी अधरन हिरदय अतिहिं डर्यौ-२५६४।
संज्ञा
[हिं. पपड़ी]

फेर
चक्कर, घुमाव।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेर
फेर की बात- घुमाववाली बात।
मु.

फेर
मोड़, झुकाव।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेर
उलट-पलट, परिवर्तन।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेर
दिनों का फेर- दुर्दश का समय।
मु.

फेर
अंतर, फर्क।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेर
उलझन, दुबधा।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेर
फेर में पड़ना- उलझन में पड़ना। फेर डालना- अनिश्चिय की स्थिति में डालना।
मु.

फेर
भ्रम, धोखा।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेर
चाल-बाजी, धोखा।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेर
फेर में आना (पड़ना)- धोखा खाना। फेर की बात- छल-कपट या चालबाजी की बात।
मु.

फेर
बखेड़ा, झंझट, जंजाल।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेर
निन्नानबे का फेर- रुपया जमा करने का चक्कर।
मु.

फेर
युक्ति, उपाय।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेर
अदला-बदली।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेर
हेर-फेर- लेन-देल, अदला-बदली।
मु.

फेर
हानि।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेर
भूत-प्रेत का प्रभाव।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेर
ओर, दिशा।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेर
पुनः, फिर।
अव्य.

फेरत
स्पर्श करते हैं, छुआते या रखते हैं।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरत
कर फेरत- स्पर्श करते हैं, छूते हैं। उ.-कृपाकटाच्छ कमल-कर-फेरत, सूर जननि सुख देत-१०-१५४।
मु.

फेरत
उलटता-पुलटता है।
उ.-फेरत पलटत भोर भए कछु लई न छाँड़ि दई-१३२०।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरत
भूली या दबी बात पुनः उठाते हैं या उसका बदला लेते हैं।
उ.-सूनो जानि नंदनंदन बिनु बैर आपनो फेरत-३१६५।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरन
फेरने या फहराने की क्रिया या भाव।
उ.-बरनि न जाइ सुभग उर सोभा पीतांबर की फेरन-३२७७।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरना
पोतना, लेप करना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

फेरना
पानी फेरना- धो देना, नष्ट कर देना।
मु.

फेरना
रुख या मुख दूसरी ओर करना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

फेरना
पानी फेरना- धो देना, नष्ट कर देना।
मु.

फेरना
उलट-पलट करना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

फेरना
विरुद्ध या विपरीत करना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

फेरना
बार-बार दोहराना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

फेरना
बारी बारी से सबके सामने उपस्थित करना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

फेरना
प्रचारित या घोषित करना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

फेरना
(घोड़े को) चल चलाना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

निशाचर
चोर।
संज्ञा
[सं.]

निशाचर
जो रात में चले या विचरण करे।
वि.

निशाचरी
राक्षसी।
संज्ञा
[सं.]

निशाचरी
कुलटा।
संज्ञा
[सं.]

निशाचारी
शिव, महादेव।
संज्ञा
[सं. निशाचारिन्]

निशाचारी
राक्षस।
संज्ञा
[सं. निशाचारिन्]

निशाचारी
उल्लू।
संज्ञा
[सं. निशाचारिन्]

निशाचारी
चोर।
संज्ञा
[सं. निशाचारिन्]

निशान
चिह्न।
संज्ञा
[फ़ा.]

निशान
किसी पदार्थ से अंकित चिह्न।
संज्ञा
[फ़ा.]

फेरन
लौटाना, वापस करना।
उ.-जे जे आए हुते जज्ञ में परिहै तिनकौ फेरन।
क्रि. स.

फेरना
घुमा देना, मोड़ना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

फेरना
आते हुए को लौटाना या वापस करना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

फेरना
ली हुई वस्तु लौटाना या वापस करना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

फेरना
दी हुई वस्तु वापस कर लेना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

फेरना
चक्कर खिलाना, घुमाव देना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

फेरना
माला फेरना- (१) माला जपना। (२) नाम लेना।
मु.

फेरना
ऐंठना, मरोड़ना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

फेरना
स्पर्श करना।
क्रि. स.
[सं. प्रेषण, प्रा. पेरन]

फेरना
हाथ फेरना- (१) प्यार से सहलाना। (२) ले लेना।
मु.

फेरा
घूमते-फिलते आना।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरा
लौट-फिर कर वापस आना।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरा
घेरा, मंडल।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरि
फिर, पुनः, दोबारा।
उ.-(क) झैसो कियौ सो तेसौ पायौ। अब उहिं चहियै फेरि जिवायौ-४-५। (ख) हय गय खोलि भंडार दिए सब फेरि भरे ता भाँति-१०-३६।
क्रि. वि.
[हिं. फिर]

फेरि
फेरि फेरि- बार-बार, पुनः पुनः।
मु.

फेरि
इसके बाद, तत्पश्चात।
उ.-तौ लगि बेगि हरौ किन पीर। जौ लगि आन न आनि पहूँचै, फेरि परैगी भीर-१-१९१।
क्रि. वि.
[हिं. फिर]

फेरि
लौटाकर।
क्रि. स.
[हिं. फेरना]

फेरि
फेरि दयौ-लौटा दिया, वापस कर दिया।
उ.-मंत्री गयौ फिरावन रथ लै, रघुबर फेरि दयौ-९-४६।
प्र.

फेरी
पुनः, दोबारा।
उ.-जिहिं भुज परसुराम बल करष्यौ, ते भुज क्यों न सँभारत फेरी-९-९३।
अव्य.
[हिं. फिर]

फेरी
फिरि फेरी- बार बार, पुनः पुनः। उ.-मैं जिनको सपनेहु न देखे, तिनकी बात कहत फिरि फेरी-१२७०।
मु.

फेरी
मेट दी, हटा दी, मिटायी, दूर की।
उ.-हा जदुनाथ, द्वारकावासी, जुग-जुग भक्त-आपदा फेरी-१-२५१।
क्रि. स.
[हिं. फेरना]

फेरी
पलट दी, बदल दी, विपरीत की।
उ.-बसन प्रवाह बढ़्यौ जब जान्यौ, साधु-साधु सबहिनि मति फेरी-१-२५२।
क्रि. स.
[हिं. फेरना]

फेरी
फेरा, जाकर लौटना।
उ.-जहाँ बसत जदुनाथ जगतमनि बारक तहाँ आउ दै फेरी-२८५१।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरी
घुमना, भ्रमण करना।
उ.-बाट-घाट बीथी ब्रज घर बन संग लगाए फरी-२७१९।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरी
परिक्रमा, प्रदक्षिणा, भाँवर। फेरी पड़ना-भाँवर होना, विवाह होना।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरी
योगी का भिक्षा माँगने का चक्कर।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरी
वस्तु को बेचने के लिए इधर-उधर घूमना।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरे
ओर,दिशा।
उ.-सूरदास प्रभु बैठि सिला पर भोजन करैं ग्वाल चहुँ फेर-४६३।
संज्ञा
[हिं. फेर]

फेरे
(बहु.) चक्कर, घुमाव।
उ.-तेरी सो बृषभानु नंदिनी एक गाँठि सौ फेरे-२२२०।
संज्ञा
[हिं. फेर]

फेरे
रुख बदल दिया।
उ.-कहा करौं सखि दोष न काहू हरि हित लोचन फेरे-२७२०।
क्रि. स.
[हिं. फेरना]

फेरनि
फेलने की क्रिया या भाव।
उ.-भौंह मोरनि नेन फेरनि तहाँ ते नहिँ टरे- पृ. ३५१ (७७)।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरनो, फेरनौ
फेरने की क्रिया या भाव।
उ.-तब मधुमंगल कहि ग्वाल सों गैया हो भैया फेलनो -२२८०।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेर-पल्टा
गौना।
संज्ञा
[हिं. फेर + पलटा]

फेरफार
उलट-फेर।
संज्ञा
[हिं. फेर]

फेरफार
अंतर, बीच।
संज्ञा
[हिं. फेर]

फेरफार
टालटूल, बहाना।
संज्ञा
[हिं. फेर]

फेरफार
घुमाव-फिराव।
संज्ञा
[हिं. फेर]

फेरा
चक्कर, घूमना।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरा
लपेट, घुमाव।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरा
इधर से उधर घूमना।
संज्ञा
[हिं. फेरना]

फेरैं
प्रचारित या घोषित करें।
उ.-सूरदास प्रभु लंका तोरैं फेरैं राम दोहाई-९-११७।
क्रि. स.
[हिं. फेरना]

फेर
स्पर्श करता है।
उ.-सूरदास प्रभु सकल लोकपति पीतांबर कर फेरैं हो-४५२।
क्रि. स.
[हिं. फेरना]

फेरो
आगमन, जाकर आना।
उ.-(क) गयौ जु संग नंदनंदन के बहुरि न कीन्हौ फेरौ-३१४३। (ख) आपु नहीं या ब्रज के कारन करिहौ फिरि फिरि फेरो-१० उ.-१२४।
संज्ञा
[हिं. फेरी]

फेरो
घुमा लिया, हार मान ली।
उ.-सात दिवस जल वर्षि सिराने हारि मानि मुख फेरो-९५९।
क्रि. स.
[हिं. फेरना]

फेरो
मुख घुमाते हो, सामना नहीं करते।
उ.-मेरी सौं हाहा करि पुनि-पुनि उत काहे मुख फेरो जू-१९३४।
क्रि. स.
[हिं. फेरना]

फेरौं
चक्कर दूँ, घुमाऊँ, चारों ओर चलाऊँ।
उ.-कहौ तौ लंक लकुट ज्यौं फेरौं, फेरि कहूँ लै डारौं-९-१०७।
क्रि. स.
[हिं. फेरना]

फेरौं
लौटाऊँ, विमुख करूँ, पराजित करूँ।
उ.-अब हौं कौन कौ मुख हेरौं। रिपु- सैना-समूह-जल उमड़्यौ, काहि संग लै फेरौं-९-१४६।
क्रि. स.
[हिं. फेरना]

फेरौ
बदलो, पलटो, मिटाओ।
उ.-सूर हँलति ग्वालिनि दै तारी, चोर नाम कैसैहुँ सुत फेरौ-३९९।
क्रि. स.
[हिं. फेरना]

फेर्यौ
फेरा, मोड़ लिया, दूसरी ओर किया।
उ.-पारथ भीषम सौं मति पाइ। कियौ सारथी सिखंडी आइ। भीषम ताहि देखि मुख फेर्यौ-१-२७६।
क्रि. स.
[हिं. फेरना]

फेर्यौ
साथ छोड़ा।
उ.-सब दिन सुख-साथिनि आजु कैसे मुख फेरयौ-१०-८।
क्रि. स.
[हिं. फेरना]

फैलना
मोटा या स्थूल होना।
क्रि. अ.
[सं. प्रसरण]

फैलना
भर जाना, व्यापना।
क्रि. अ.
[सं. प्रसरण]

फैलना
बढ़ती या वृद्धि होना।
क्रि. अ.
[सं. प्रसरण]

फैलना
बिखरना, छितराना।
क्रि. अ.
[सं. प्रसरण]

फैलना
ज्यादा खुलना।
क्रि. अ.
[सं. प्रसरण]

फैलना
तनाव के साथ बढ़ना।
क्रि. अ.
[सं. प्रसरण]

फैलना
प्रचार पाना या होना।
क्रि. अ.
[सं. प्रसरण]

फैलना
दूर-दूर तक पहुँचना।
क्रि. अ.
[सं. प्रसरण]

फैलना
प्रसिद्ध होना।
क्रि. अ.
[सं. प्रसरण]

फैलना
हठ या आग्रह करना।
क्रि. अ.
[सं. प्रसरण]

फैंट
कमरबंद, पटुका।
संज्ञा
[हिं. पेट, फेंट]

फैंट
फैंट पकरतौ- रोकता, जाने न देता, थाम लेता, घर रखता। उ.-होतौ नफा साधु की संगति, मूल गाँठि नहिं टरतौ। सूरदास बैकुंठ-पैठ मैं, कोउ न फैंट पकरतौ-१-२९७। कसि फेंट- ललकार कर, चुनौती देकर। उ.-तजौ विरद कै मोहिं उधारौ, सूर कहै कसि फैंट-१-१४५।
मु.

फैनु
फेन, झाग, फेना।
संज्ञा
[सं. फेन]

फैनु
सर्प के मुख का झाग, विष।
उ.-तुम हमकौं कहँ-कहँ न उबारयौ, पियौ काली मुँह फैनु-५०२।
संज्ञा
[सं. फेन]

फैल
काम।
संज्ञा
[अ. फेल]

फैल
खेल।
संज्ञा
[अ. फेल]

फैल
नखरा।
संज्ञा
[अ. फेल]

फैल
विस्तृत, फैला हुआ।
संज्ञा
[सं. प्रसृत]

फैलना
विस्तार या फैलाव से स्थान घेरना।
क्रि. अ.
[सं. प्रसरण]

फैलना
इधर उधर बढ़ जाना।
क्रि. अ.
[सं. प्रसरण]

फैलसूफी
फिजूल-खर्ची।
संज्ञा
[यू फिलसफ]

फैलाना
विस्तार या फैलाव से स्थान घिरवाना।
क्रि. स.
[हिं. फैलना]

फैलाना
इधर-उधर बढ़ाना।
क्रि. स.
[हिं. फैलना]

फैलाना
लपेटा या तहाया हुआ न रखना।
क्रि. स.
[हिं. फैलना]

फैलाना
छा देना, भर देना।
क्रि. स.
[हिं. फैलना]

फैलाना
बिखेरना, छितराना।
क्रि. स.
[हिं. फैलना]

फैलाना
बढ़ती या वृद्धि करना।
क्रि. स.
[हिं. फैलना]

फैलाना
तान कर बढ़ाना।
क्रि. स.
[हिं. फैलना]

फैलाना
प्रचार करना।
क्रि. स.
[हिं. फैलना]

फैलाना
दूर-दूर तक पहुँचाना।
क्रि. स.
[हिं. फैलना]

फैलाना
प्रसिद्ध करना।
क्रि. स.
[हिं. फैलना]

फैलाना
आयोजन करना।
क्रि. स.
[हिं. फैलना]

फैलाना
लेखा-जोखा करना।
क्रि. स.
[हिं. फैलना]

फैलाव
प्रसार।
संज्ञा
[हिं. फैलना]

फैलाव
प्रचार।
संज्ञा
[हिं. फैलना]

फैसला
निबटेरा।
संज्ञा
[हिं. फैसला]

फैसला
न्याय।
संज्ञा
[हिं. फैसला]

फोंक
तीर की पिछली नोक जिसके पास पर होते हैं और जिस पर डोरी बैठने की खड्डी बनी होती है।
उ.-परिमल लुब्ध मधुप जहँ बैठत उड़ि न सकत तेहि ठाँते। मनहुँ मदन के है सर पाए पोंक बाहरी घाते-३१३४।
संज्ञा
[सं. पुंख]

फोंदा
फुलरा, झब्बा।
उ.-पचरँग बरन-बरन पाटहि पवित्रा बिच बिच फोंदा गोहनो-२२८०।
संज्ञा
[हिं. फुँदना]

फोक
सारहीन वस्तु, सीठी।
संज्ञा
[हिं. बोकला]

फोक
भूसी।
संज्ञा
[हिं. बोकला]

फोक
स्वादहीन या नीरस वस्तु।
संज्ञा
[हिं. बोकला]

फोकट
निःसार, व्यर्थ, सारहीन, नीर, मूल्यहीन।
उ.-अलि चलि औरै ठौर देखावहु अपनो फोकट ज्ञान-३१२५।
वि.
[हिं. फोक]

फोकला
भूसी, छिलका।
संज्ञा
[हिं. बोकला]

फोड़ना
खंड-खंड करना, दरकाना।
क्रि. स.
[सं. स्फोटन, प्रा. फोडन]

फोड़ना
ऐसी चीज तोड़ना जो भीतर से पोली, मुलायम या रसभरी हो।
क्रि. स.
[सं. स्फोटन, प्रा. फोडन]

फोड़ना
दबाव से, भेदकर निकल जाना।
क्रि. स.
[सं. स्फोटन, प्रा. फोडन]

फोड़ना
शरीर में दोष हो जाना जिससे घाव या फोड़े हो जायँ।
क्रि. स.
[सं. स्फोटन, प्रा. फोडन]

फोड़ना
अंकुर आदि निकलना।
क्रि. स.
[सं. स्फोटन, प्रा. फोडन]

फोड़ना
शाखा के समान अलग होकर जाना।
क्रि. स.
[सं. स्फोटन, प्रा. फोडन]

निशाना
वह जिसे लक्ष्य करके कोई व्यंग्य या आक्षेप किया जाय।
संज्ञा
[फ़ा.]

निशानाथ
चंद्र।
संज्ञा
[सं.]

निशानाथ
कपूर।
संज्ञा
[सं.]

निशानी
चिह्न, निशान।
उ.-आपुहिं हार तोरि चोली बँद उर नख घात बनाइ निशानी-१०५७।
संज्ञा
[फ़ा.]

निशानी
स्मृति-चिह्न, यादगार।
संज्ञा
[फ़ा.]

निशानी
निशान, पहचान।
संज्ञा
[फ़ा.]

निशापति
चंद्रमा।
संज्ञा
[सं.]

निशामुख
संध्या का समय।
संज्ञा
[सं.]

निशावसान
प्रभात, तड़का।
संज्ञा
[सं.]

निशास्ता
भीगे गेहूँ का सत।
संज्ञा
[फ़ा.]

फोड़ना
विपक्ष में कर देना।
क्रि. स.
[सं. स्फोटन, प्रा. फोडन]

फोड़ना
साथ न रहने देना।
क्रि. स.
[सं. स्फोटन, प्रा. फोडन]

फोड़ना
फूट डाल देना।
क्रि. स.
[सं. स्फोटन, प्रा. फोडन]

फोड़ना
भेद प्रकट करना।
क्रि. स.
[सं. स्फोटन, प्रा. फोडन]

फोड़ा
शरीर पर उभार आनेवाला बड़ा दाना, बड़ी फुंसी।
संज्ञा
[सं. स्फोटन]

फोता
पटुका, कमरबंद।
संज्ञा
[फ़ा. फ़ोता]

फोता
पगड़ी।
संज्ञा
[फ़ा. फ़ोता]

फोता
भूमि- कर, पोत।
उ.-माँड़ि माँड़ि खलिहान क्रोध को फोता भजन भरावै।
संज्ञा
[फ़ा. फ़ोता]

फोता
थैली।
संज्ञा
[फ़ा. फ़ोता]

फोरत
तोड़ना, चूर-चूर करना।
उ.-काहू की छीनत हौ गेंडुरि काहू की फोरत हौ गगरी-८५३।
क्रि. स.
[हिं. फोड़ना]

फोरै
फोड़ता है, खंड-खंड करता हे, भग्न करता है।
उ.-अँग-आभूषन सब तोरै। लवनी-दधि-भाजन फोरै-१०-१८३।
क्रि. स.
[हिं. फोड़ना]

फोरयौ
ऐसी चीज भग्न की जो भीतर से पोली, कोमल या रसभरी हो।
क्रि. स.
[हिं. फोड़ना]

फोरयौ
फोरयौ नयन- आँख फोड़ दी, अंधा कर दिया। उ.-फोर्यौ नयन, काग नहिं छाँड़्यौ, सुरपति के बिद्मान-९-८३।
मु.

फौकना
डींग हाँकना।
क्रि. अ.
[अनु.]

फौज
सेना, सैन्य।
उ.-(क) गज-अहँकार चढ़्यौ दिगबिजयी, लोभ-छत्र करि सीस। उ.- फौज असत-संगति की मेरैं, ऐसौ हौं मैं ईस-१-१४४। (ख) मागध मगध देस तैं आयौ साजे फौज अपार। (ग) हो जानति हौं फौज मदन की लूटि लई सारी-२१०६।
संज्ञा
[अ.] फौज]

फौज
झुंड, जत्था।
संज्ञा
[अ. फौज]

फौजदार
सेनापति।
संज्ञा
[हिं. फौज + दार]

फौजदारी
मार-पीट।
संज्ञा
[हिं. फौजदार]

फौजपति
सेनापति।
उ.-निधरक भयो चल्यो ब्रज आवत आउ फौजपति मैन-२८१९।
संज्ञा
[हिं. फौज + सं. पति]

फौजी
सेना-संबंधी।
वि.
[हिं. फौज]

फोरतिं
फोड़ती है।
क्रि. स.
[हिं. फोड़ना]

फोरतिं
सिर फोरतिं- सिर पटक-पटक कर विलाप करती हैं। उ.-सिर फोरति, गिरि जाति, अभूषन तोरतिं अँग को-५८९।
मु.

फोरतौ
फोड़ डालता, चूर-चूर कर देता, खंड-खंड कर डालता।
उ.-हौ तो न भयौ री घर, देखत्यौ तेरी यौ अर, फोरतौ बासन सब, जानति बलैया-३७२।
क्रि. स.
[हिं. फोड़ना]

फोरना
तोड़ना, फोड़ना।
क्रि. स.
[हिं. फोड़ना]

फोरि
खंड-खंड करके, भग्न करके।
क्रि. स.
[हिं. फोड़ना]

फोरि
ऐसी वस्तुओं को तोड़कर जिनके भीतर मुलायम या पतली चीज भरी हो।
उ.-जिन पुत्रनिहिं बहुत प्रतिपाल्यौ, देवी-देव मनैहैं। तेई लै खोपरी बाँस दै, सीस फोरि बिखरै हैं-१-८६।
क्रि. स.
[हिं. फोड़ना]

फोरि
तोड़-फोड़कर, तोड़-ताड़कर। खंड-खंड करके, नष्ट करके।
उ.-फोरि फारि, तोरि तारि, गगन होत गाजैं-९-१३९।
यौ.

फोरी
खंड-खंड करके, भग्न करके।
उ.-गुदी चाँपि लै जीभ मरोरी। दधि ढर-कायौ भाजन फोरी-१०-५७।
क्रि. स.
[हिं. फोड़ना]

फोरी
तोड़-फोड़ डाली।
उ.-कब दधि मटुकी फोरी-१०-२९३।
क्रि. स.
[हिं. फोड़ना]

फोरी
उल्लंघन की, भंग की।
उ.-पय पीवत जिन हती पूतना, स्रुति मर्यादा फोरी-२८६३।
क्रि. स.
[हिं. फोड़ना]

फौरन
तुरंत, तत्काल।
क्रि. वि.
[अ. फ़ौरन]

फौलाद
बहुत कड़ा लोहा।
संज्ञा
[फ़ा. पोलाद]

हिन्दी का तेईसवाँ व्यंजन और पवर्ग का तीसरा वर्ण। यह अल्पप्राण ओष्ठय वर्ण है।

बंक
टेढ़ा, तिरछा।
उ.-(क) कुंतल कुटिल, मकर कुंडल, भ्रुव नैन-बिलोकनि बंक-१०-१५४। (ख) लोचन बंक बिसाल चितै कै रहत तब हो सबके मन-२५७३। (ग) बं बिलोकनि लगी लोभ सम सकति न पँख पसारि-२७१७।
वि.
[सं. वक्र, वंक]

बंक
विक्रमी।
वि.
[सं. वक्र, वंक]

बंक
दुर्गम।
वि.
[सं. वक्र, वंक]

बंकट
टेढ़ा, तिरछा।
उ.-(क) ठठकति चलै मटकि मुँह मोरै बंकट भौंह मरोरै। (ख) भृकुटि बंकट चारु लोचन रही जुवती देखी। (ग) गज उरोज बर बाजि बिलोचन बंकट बिसद बिसाल मनोहर-१९०६।
वि.
[हिं. बंक]

बंकट
दुर्गम।
उ.-मनो कियो फिंरि मान मवासों मन्मथ बंकट कोट-२२१८।
वि.
[हिं. बंक]

बंकति
बहुत टेढ़ी।
उ.-बंकति भौंह चपल अति लोचन बेसरि रस मुकताहल छायो-२०६३।
वि.
[हिं. बंक + अति]

बंका
टेढ़ा, तिरछा।
वि.
[हिं. बंक]

बंका
बाँका।
वि.
[हिं. बंक]

बंका
बली, पराक्रमी।
वि.
[हिं. बंक]

बंका
दुर्गम।
वि.
[हिं. बंक]

बंकाई
टेढ़ा-तिरछापन।
संज्ञा
[हिं. बंक]

बंकुर
टेढ़ा।
वि.
[हिं. बंक]

बंकुर
दुर्गम।
वि.
[हिं. बंक]

बंकुरता
टेढ़ा-तिरछापन।
संज्ञा
[हिं. बंकुर]

बंग
बंगाल देश।
संज्ञा
[सं. बंग]

बँगला
बंगाल की भाषा।
संज्ञा
[हिं. बंगाल]

बँगला
बंगाल देश-संबंधी।
वि.

बँगली
कलाई का एक भूषण।
संज्ञा
[हिं. बगल]

बंगा
टेढ़ा।
वि.
[हिं. बंक]

बंगा
मूर्ख, उजड्ड।
वि.
[हिं. बंक]

बंगाल
बंग देश।
संज्ञा
[सं. वंग]

बंगाल
एक राग।
संज्ञा
[सं. वंग]

बंगाली
बंगाल देश-वासी।
संज्ञा
[हिं. बंगाल]

बंगाली
एक राग।
उ.-मुरली माहिं बजावत गावत बंगाली अधर चुवत अमृत बनवारी-२३९७।
संज्ञा
[हिं. बंगाल]

बंगाली
बंगाल देश की भाषा।
संज्ञा

बंचक
धूर्त, ठग, पाखंडी।
संज्ञा
[सं. वंचक]

बंचकता, बंचकताई
छल, ठगी।
संज्ञा
[सं. वंचकता]

बंचन
छल-कपट।
संज्ञा
[सं. वंचन]

बंचनता, बंचनताई
ठगी।
संज्ञा
[सं. वंचनता]

बंचना
ठगी।
संज्ञा
[सं. वंचना]

बंचना
ठगना, छलना।
क्रि. स.
[सं. वंचन]

बँचवाना
पढ़वाना।
क्रि. स.
[हिं. बाँचना]

बंचित
जो ठगा गया हो।
वि.
[सं. वंचित]

बंचित
अलग किया हुआ।
वि.
[सं. वंचित]

बंचित
जिसे कोई वस्तु न मिले।
वि.
[सं. वंचित]

बंचित
हीन, रहित।
वि.
[सं. वंचित]

बंछना
इच्छा करना।
क्रि. स.
[सं. वांछा]

बंछनीय
चाहने योग्य।
वि.
[सं. वांछनीय]

बंछनीय
जिसे प्राप्त करने की इच्छा हो। जो प्रिय हो।
वि.
[सं. वांछनीय]

बंछित
चाहा हुआ।
वि.
[सं. वांछित]

बंज
व्यापार,
संज्ञा
[हिं. बनिज]

बंज
सौदा।
संज्ञा
[हिं. बनिज]

बंजर
ऐसी भूमि जहाँ कुछ उत्पन्न न हो, ऊसर।
संज्ञा
[सं. बन + ऊजड़]

बंजारनि
टाँड़ लादकर बेचने वाली।
उ.-पेला करति देति नहिं नीकै तुम हो बड़ी बं जारिनि-१०४०।
संज्ञा
[हिं. बनजारिन]

बंजारा
वैल पर अनाज लादकर बेचने वाला, बनजारा।
संज्ञा
[हिं. बनजारा]

बंझा
जिसके संतान न हो, बाँझ।
उ.-ब्यावर बिथा न बंझा जानै-३४४१।
वि.
[सं. वध्या]

बंझा
बाँझ स्त्री।
संज्ञा

बँटना
भाग या हिस्सा होना।
क्रि. अ.
[हिं. बटन]

बँटना
कई प्राणियों में बाँटा जाना।
क्रि. अ.
[हिं. बटन]

बँटना
उबटन।
संज्ञा
[हिं. बटना]

बँटवाई
बाँटने की मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. बाँटना]

बँटवाई
पिसाने की मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. बाँटना]

बँटवाना
दूसरे से वितरण कराना।
क्रि. स.
[सं. वितरण]

बँटवाना
दूसरे से पिसवाना।
क्रि. स.
[सं. वर्तन]

बँटा
गोल या चौकोर डिब्बा।
संज्ञा
[हिं. बटा]

बँटा
छोटे कद या आकारवाला।
वि.

बँटाइ
बाँटकर, वर्ग करके।
क्रि. स.
[हिं. बाँटना]

बँटाइ
बँटाइ लीने-दलों में विभाजित कर लिये।
उ.-कान्ह, हलधर बीर दोऊ, भुजा बल अति जोर। सुबल, श्रीदामा, सुदामा वै भए इक ओर। और सखा बँटाइ लीन्हैं, गोपबालक-बृन्द-१०-१४४।
प्र.

बँटाई
बाँटने का काम, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. बाँटना]

बँटाना
भाग या हिस्सा कराना।
क्रि. स.
[हिं. बाँटना]

बँटाना
बाँटने को साझीदार बनना।
क्रि. स.
[हिं. बाँटना]

बँटाना
हाथ बटाना- सहायता करना।
मु.

बँटावन
बँटानेवाला, भाग लेनेवाला।
उ.-बारह बरष नींद है साधी, तातैं बिकल सरीर। बोलत नहीं मौन कहा साध्यौ, बिपति-बँटावन-बीर-९-१४५।
वि.
[हिं. बाटना]

बंटी
पशु फँसाने का जाल।
संज्ञा
[हिं.]

बंटी
छोटी डिबिया।
संज्ञा
[हिं. बंटा]

बंटैया
बाँटने वाला।
संज्ञा
[हिं. बाँटना + ऐया (प्रप्य)]

बटैया
बँटा लेनेवाला।
संज्ञा
[हिं. बाँटना + ऐया (प्रप्य)]

निशि
रात, रात्रि।
उ.-निशि दिन रहत सूर के प्रभु बिनु मरिबो तऊ न जात जियो -२५४५।
संज्ञा
[सं.]

निशिकर
चंद्रमा।
संज्ञा
[सं.]

निशिचर, निशिचारी
राक्षस।
संज्ञा
[सं. निशाचर]

निशिचर, निशिचारी
उल्लू।
संज्ञा
[सं. निशाचर]

निशिचर, निशिचारी
चोर।
संज्ञा
[सं. निशाचर]

निशित
सान पर चढ़ाया हुआ, तेज।
वि.
[सं.]

निशिदिन
रातदिन।
क्रि. वि.
[सं.]

निशिदिन
सदा।
क्रि. वि.
[सं.]

निशिनाथ
चंद्रमा।
संज्ञा
[सं.]

निशिपाल
चंद्र।
संज्ञा
[सं.]

बंडा
बड़ी अरूई या घुइयाँ।
संज्ञा
[हिं. बंटा]

बंडी
बिना बाँह की फतुही।
संज्ञा
[हिं. बाँड़ा]

बँडेरा
खपरैल की लंबी लकड़ी।
संज्ञा
[हिं. बरेड़ा]

बँडेरी
खपरैल की लम्बी लकड़ी।
संज्ञा
[हिं. बँडेरा]

बंद
बाँधने की वस्तु।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंद
पानी रोकने का पुश्ता, मेड़।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंद
अंगों का जोड़।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंद
अंगरखे, चोली आदि की तनी।
उ.- (क) सूर सुतहिं बरजौ नँदरानी, अब तोरत चोली-बँद डोर। (ख) चीर फटे कंचुकि-बंद छूटे-७९९। (ग) गए कंचुकि बँद टूटि-१० उ.-८।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंद
उर्दू काव्य का एक पद।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंद
बंधन, कैद।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंद
जो किसी तरफ से खुला न हो।
वि.
[फ़ा.]

बंद
जो सब तरफ से घिरा हो।
वि.
[फ़ा.]

बंद
जिसका मुँह या मार्ग न खुला हो।
वि.
[फ़ा.]

बंद
जो ढकना, दरवाजा आदि खुला न हो।
वि.
[फ़ा.]

बंद
जिसका कार्य रूका या स्थगित हो।
वि.
[फ़ा.]

बंद
जो चलता न हो।
वि.
[फ़ा.]

बंद
जिसका प्रचार-प्रकाशन आदि न हो।
वि.
[फ़ा.]

बंद
जो कैद में हो।
वि.
[फ़ा.]

बंद
बंदनीय।
उ.- जदुकुल-नभ तिथि द्वितीय देवकी प्रगटे त्रिभुवन बंद-१३३१।
वि.
[सं. वंद्य]

बंदगी
आराधना।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंदगी
प्रणाम।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंदत
प्रणाम करते हैं, नमस्कार करते हैं।
उ.- दसरथ चले अवध आनन्दत। जनकराइ बहु दाइज दै करि, बार-बार पद बंदत-९-२७।
क्रि. स.
[हिं. बंदना]

बंदन
स्तुति।
संज्ञा
[सं. वंदन]

बंदन
प्रणाम।
उ.- सकुचासन कुल सील करषि करि जगत बंद्य कर बंदन-३०१४।
संज्ञा
[सं. वंदन]

बंदन
रोली, रोचन।
संज्ञा
[सं. वंदनी=गोरोचन]

बंदन
सिंदूर, सेंदुर, ईंगुर।
उ.- (क) नील पुट बिच मनौ मोती धरे बंदन बोरि-१०-२२५। (ख) मुत्का मनौ नील-मनि-मय-पुट, धरे भुरकि बर बंदन-४७६।
संज्ञा
[सं. वंदनी=गोरोचन]

बंदनता
स्तुति, आदर या वंदना की जाने की योग्यता।
संज्ञा
[सं. वंदनता]

बंदनमाला
फूल-पत्तों की झालर जो मंगल कार्यों के शुभावसर पर खंभो-दीवारों पर बाँधी जाती है, तोरण।
उ.-लछिमी. सी जहँ मालिनि बोले बंदनमाला बाँधत डोलै-१०-३२।
संज्ञा
[सं.]

बंदनवार
फूल-पत्तों की बनी हुई माला या झालर जो मंगल कार्यों के अवसर पर खंभों- दीवारों पर बाँधी जाती है।
उ.-अच्छत दूब लिये रिषि ठाढ़े, बारिनि बंदनवार बँधाई-१०-१९।
संज्ञा
[सं. वंदनमाला]

बंदना
स्तुति, प्रार्थना।
संज्ञा
[सं. वंदना]

बंदना
प्रणाम या नमस्कार करने।
उ.-सुर-नर-देव बंदना आए, सोवत तैं उठि जागी-१०-४।
क्रि. स.
[सं. वंदन]

बंदनी
एक भूषण जो माथे से ऊपर सिर पर रहता है, बंदी, सिरबंदी।
संज्ञा
[सं. वंदनी]

बंदनी
स्तुति या वंदना योग्य।
वि.
[सं. वंदनी]

बंदनीमाल
गले से पैर तक की माला।
संज्ञा
[सं. वंदनमाल]

बंदर, बँदरा
बानर, मर्कट।
संज्ञा
[सं. वानर]

बंदर, बँदरा
बंदर घुड़की या भबकी- डराने, धमकाने या धौंस जमाने के लिए की जानेवाली डाँट, फटकार या धमकी।
मु.

बँदवारे
स्तुति, प्रार्थना या बंदना करनेवाले याचक आदि।
उ.-फूले बंदीजन द्वारे, फूले-फूले वँदवारे, फूले जहाँ जोइ लोइ गोकुल सहर के-१०-३४।
संज्ञा
[हिं. बंदन + वाला]

बंदहि
बंद (रहकर) बंदी (होकर)।
उ.-गूँगी बातनि यौं अनुरागति, भँवर गुंजरत कमल मों बंदहिं-१०-१०७।
वि.
[फा. बंद + हिं, हिं. (प्रत्य.)]

बंदा
सेवक, दास।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंदा
वक्ता' का अपने लिए शिष्टता य़ा नम्रतासूचक प्रयोग।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंदारु
पूजनीय, वंदनीय।
वि.
[सं. वंदारु]

बंदि
कारावास, कैद।
उ.-राज रवनि सुमिरे पति-कारन असुर-बंदि तैं दिए छुड़ाई-१-२४।
संज्ञा
[सं. बंदिन]

बंदि
बंदना करके।
उ.-यह कह्यौ नंद, नृप बंदि, अहिं इन्द्र पै गयौ मेरौ नंद, तुव नाम लीन्हौ-५८४।
क्रि. स.
[सं. बंदना]

बंदिया
बंदी' नामक आभूषण।
संज्ञा
[हिं. बंदनी]

बंदिश
बाँधने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंदिश
प्रबंध, योजना।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंदिश
कुचक, षडयंत्र।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंदियै
प्रशंसा कीजिए।
उ.-जाको निदि बंदियै, सो पुनि वह ताकौ निदरै-११५५।
क्रि. स.
[हिं. बंदना]

बंदी
भाट, चारण।
उ.-मोह पया बंदी गुन गावत, मागध दोष-अपार- १-१४४
संज्ञा
[सं.]

बंदी
सिर का एक भूषण।
संज्ञा
[हिं. बंदनी]

बंदी
कैदी।
उ.-जरासंध बन्दी कटैं नृप-कुल जस गावै-१-४।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंदी
दासी, सेविका।
संज्ञा
[हिं. बंदा]

बंदी
वक्ता नारी का अपने लिए शिष्टता अथवा नम्रता सूचक प्रयोग।
संज्ञा
[हिं. बंदा]

बंदीखाना
कैदखाना।
संज्ञा
[हिं. बंदी + फ़ा. खाना]

बंदीघर
कैदखाना।
संज्ञा
[सं. बंदीगृह]

बंदीछोर
बंधन से छुड़ानेवाला।
संज्ञा
[फ़ा. बंदी + हिं. छोर]

बंदीछोर
बंदीगृह से छुड़ानेवाला।
संज्ञा
[फ़ा. बंदी + हिं. छोर]

बंदीजन
राजा की गुणावली गाने वाले लोग, एक प्राचीन जाति के लोग, जो राजा-महा राजाओं का यश वर्णन करते थे।
उ.-(क) निंदा जग उपहास करत, मग बंदीजन जस गावत-१-१४१। (ख) बिप्र-सुजन-चारन-बंदीजन सकल नन्द-गृह आए-१०-८७।
संज्ञा
[सं. वन्दीजन]

बंदीवान
कैदी।
संज्ञा
[सं. वंदिन्]

बंदेरी
दासी, चेरी।
संज्ञा
[हिं. बंदा + ऐरी]

बंध
डोरी।
संज्ञा
[सं. बंधन]

बंध
लगाव-फँसाव।
संज्ञा
[सं. बंधन]

बंध
शरीर।
संज्ञा
[सं. बंधन]

बंधक
रेहन-रूप में रखी वस्तु।
संज्ञा
[सं.]

बंधक
बदला करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

बंधक
बाँधनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

बंधन
बाँधने की क्रिया।
संज्ञा
[सं. वंधन]

बंधन
बाँधने की वस्तु।
संज्ञा
[सं. वंधन]

बंधन
प्रतिबंध, फँसाने की चीज।
संज्ञा
[सं. वंधन]

बंधन
वध, हिंसा।
संज्ञा
[सं. वंधन]

बंदोबस्त
प्रबंध।
संज्ञा
[फ़ा.]

बंद्य
बंदना या स्तुति के योग्य।
उ.-सकुचासन कुल सील करुषि करि जगत बंद्य करि बंदन-३०१४।
वि.
[सं. वंद्य]

बंध
बंधन।
संज्ञा
[सं. बंधन]

बंध
कैद।
उ.-कोटि छ्यानवै नृप सेना सब जरासंध बँध छोरे-१-३१।
संज्ञा
[सं. बंधन]

बंध
पानी रोकने का धुस्स, बाँध।
उ.-जाकै संग सेत-बंध कीन्हौं, अरु जीत्यौ महभारथ। गोपी हरी सूर के प्रभु बिनु, रहत प्रान किहिं स्वारथ-१-२८७।
संज्ञा
[सं. बंधन]

बंध
रति के सोलह आसनों में से एक।
उ.-परिरंभन सुख रास हास मृदु सुरति केलि सुख साजे। नाना बंध बिबिध रस क्रीड़ा खेलत स्याम अपार।
संज्ञा
[सं. बंधन]

बंध
गाँठ, गिरह।
संज्ञा
[सं. बंधन]

बंध
योग की कोई मुद्रा।
संज्ञा
[सं. बंधन]

बंध
निबंध-रचना।
संज्ञा
[सं. बंधन]

बंध
चित्र काव्य-रचना।
संज्ञा
[सं. बंधन]

बंधन
बंदीगृह।
संज्ञा
[सं. वंधन]

बंधन
फंदा, गाँठ।
उ.-हा करुनामय कुञ्जर टेर्यौ, रह्यौ नहीं बल थाकौ। लागि पुकार तुरत छुटकायौ, काट्यौ बंधन ताकौ-१-११३।
संज्ञा
[सं. वंधन]

बँधना
बंधन में आना या पड़ना।
क्रि. अ.
[सं. बंधन]

बँधना
रस्सी आदि से फँसाया जाना।
क्रि. अ.
[सं. बंधन]

बँधना
बंदी होना।
क्रि. अ.
[सं. बंधन]

बँधना
स्वतंत्र न रहना, अटकना।
क्रि. अ.
[सं. बंधन]

बँधना
ठीक या संगठित होना।
क्रि. अ.
[सं. बंधन]

बँधना
क्रम स्थिर होना।
क्रि. अ.
[सं. बंधन]

बँधना
वचन-बद्ध होना।
क्रि. अ.
[सं. बंधन]

बँधना
प्रेम में फँसना।
क्रि. अ.
[सं. बंधन]

बँधना
बाँधने का साधन।
संज्ञा

बँधना
थैली।
संज्ञा

बंधनि
बाँधने का साधन।
संज्ञा
[हिं. बँधना]

बंधन
भाई।
संज्ञा
[हिं. बाँधव]

बंधन
संबंधी।
संज्ञा
[हिं. बाँधव]

बँधवाना
बाँधने का काम कराना।
क्रि. स.
[हिं. बाँधना]

बँधवाना
नियत कराना।
क्रि. स.
[हिं. बाँधना]

बँधवाना
बंदी कराना।
क्रि. स.
[हिं. बाँधना]

बँधवाना
तैयार कराना।
क्रि. स.
[हिं. बाँधना]

बँधाई
बँधवायी या वंधन में करायी।
उ.-इनहीं के हित भुजा बँधाई, अब बिलंब नहिं लाऊँ-१०-३८२।।
क्रि. स.
[हिं. बाधाना]

निशिपाल
एक छंद।
संज्ञा
[सं.]

निशिवासर
रातदिन।
संज्ञा
[सं.]

निशिवासर
सदा।
संज्ञा
[सं.]

निशिथ
रात।
संज्ञा
[सं.]

निशिथ
आधी रात।
संज्ञा
[सं.]

निशिथिनी
रात, रात्रि।
संज्ञा
[सं.]

निशुंभ
वध, हिंसा।
संज्ञा
[सं.]

निशुंभ
एक असूर जो कश्यप की स्त्री दनु के गर्भ से जन्मा था। इसने इंद्र तक को जीत लिया था; पर दुर्गा के हाथ से मारा गया था।
संज्ञा
[सं.]

निशुंभन
वध, मारना।
संज्ञा
[सं.]

निशुंभमर्दिनी
दुर्गा।
संज्ञा
[सं.]

बँधाई
बंदी करा लेगा।
उ.-मो समेत दोउ बंधु तुम, काल्हिहिं लेहि बँधाइ -५८९।
प्र.

बँधाऊँ
बाँधने के लिए प्रेरित करूँ, बँधवाऊँ।
उ.-कंचन-मनि खोलि डारि, काँच गर बंधाऊँ-१-१६६।
क्रि. स.
[हिं. बँधाना]

बँधाएँ
बंदी कराया।
उ.-बाँधन गए बंधाएँ आपुन, कौन सयानप कीन्यौ-८-१५।
क्रि. स.
[हिं. बँधाना]

बंधान
निश्चित क्रम, नियत परिपाटी।
संज्ञा
[हिं. बंधना]

बंधान
धन जो निश्चित क्रम के अनुसर दिया जाय।
संज्ञा
[हिं. बंधना]

बंधान
पानी रोकने का बाँध।
संज्ञा
[हिं. बंधना]

बंधान
ताल का सम (संगीत)।
उ.-(क) सूर स्त्रुति तान बंधान अमित अति, सप्त अतीत अनागत आवत-६४८। (ख) औधर तान बँधान सरस सुर अरु रस उभंगि भरी-२३३८।
संज्ञा
[हिं. बंधना]

बँधाना
बाँधने का काम कराना।
क्रि. स.
[हिं. बंधन]

बँधाना
धारण काराना।
क्रि. स.
[हिं. बंधन]

बँधाना
बंदी बनवाया।
क्रि. स.
[हिं. बंधन]

बँधाने
बँध रहा है, बाँधा गया है।
उ.-कदली कंटक, साधु असाधुहिं, केहरि के संग धेनु बँधाने-१-२१७।
क्रि. स.
[हिं. बँधाना]

बँधायो, बँधायौ
गुँथवाया।
उ.-मोतिनि बँधायौ बार महल में जाइकै-१०-३१।
क्रि. स.
[हिं. बँधाना]

बँधायो, बँधायौ
बंधन में डलवाया।
उ.-सूरदास ग्वालिनि अति झूठी बरबस कान्ह बँधायौ-१०-३३०।
क्रि. स.
[हिं. बँधाना]

बँधावत
(तालाब, कुआँ, पुल आदि) बनवाते या तैयार कराते हैं।
उ.-दस अरु आठ पदुम बनचर लै, लीला सिंधु बँधावत-९-१३३।
क्रि. स.
[सं. बंधन, हिं. बँधाना]

बँधावत
बाँधने को प्रेरित करते हैं, बंधन में डलवाते हैं।
उ.-इहाँ हरि प्रगट प्रेम जसुमति के ऊखल आप बँधावत -३१३५।
क्रि. स.
[सं. बंधन, हिं. बँधाना]

बँधावै
अपने को बाँधने के लिए दूसरे को प्रेरित करे
उ.-दुखित जानि कै सुत कुबेर के तिन्ह लगि आपु बँधावै-१-१२२।
क्रि. स.
[हिं. बँधाना (प्र.)]

बँधावै
अपने को बंदी कराता है।
उ.-भौंरा भोगी बन भ्रमै (रे) मोद न मानै ताप। सब कुसुमनि मिलि रस करै (पै) कमल बँमल बँधावै आप-१०-३२४।
क्रि. स.
[हिं. बँधाना [प्र.]]

बँधि
पुल आदि बाँधकर।
उ.-सिला तरी, जल माँहिँ सेत बैधि-१-३४।
क्रि. अ.
[हिं. बंधना]

बँधि
वचनबद्ध होकर।
उ.-पति अति रोष मारि मन ही मन, भीषम दई बचन बँधि बेरी-१-२५२।
क्रि. अ.
[हिं. बंधना]

बंधित
बाँझ (स्त्री)।
वि.
[सं. बंध्या]

बंधुता
मित्रता।
संज्ञा
[सं.]

बंधुत्व
भाईचारा।
संज्ञा
[सं.]

बंधुत्व
मित्रता।
संज्ञा
[सं.]

बंधुर
मुकुट।
संज्ञा
[सं.]

बंधुर
दुपहरिया फूल।
संज्ञा
[सं.]

बंधुर, बंधुल
सुन्दर।
वि.
[सं.]

बंधुर, बंधुल
नम्र।
वि.
[सं.]

बंधुवा
कैदी।
संज्ञा
[हिं. बँधना]

बंधूक
दुपहंरिया का फुल।
संज्ञा
[सं. बंधुक]

बंधेज
रुकावट, प्रतिबंध।
संज्ञा
[हिं. बँधना]

बंधी
जो बाँधा गया।
वि.
[सं. बंधिन्]

बंधी
बँधा हुआ क्रम।
संज्ञा
[हिं. बँधना]

बंधु
भाई, भ्राता।
संज्ञा
[सं.]

बंधु
सहायक।
संज्ञा
[सं.]

बंधु
मित्र।
संज्ञा
[सं.]

बंधु
एक वर्णवृत्त।
संज्ञा
[सं.]

बंधु
बंधूक पुष्प।
संज्ञा
[सं.]

बँधुआ
बंदी, कैदी।
संज्ञा
[हिं. बंधना +उआ]

बंधुंक
दुपहंरिया का लाल फुल।
उ.-अधर दसन-छत बंदन राजत बंधुक पर अलि मानो-१९९१।
संज्ञा
[सं.]

बंधुता
भाईचारा,
संज्ञा
[सं.]

बंध्या
बाँझ स्त्री।
वि.
[सं.]

बंध्यापन
बाँझपन।
संज्ञा
[हिं. बंध्या + पन]

बँध्यौ
बँधा, बँधन में पड़ा।
उ.-(क) ऊखल बँध्यो जु हेतु भगत के-३९१। (ख) सूरदास प्रभु को मन सजनी बँध्यौ राग की डोर-६५७।
क्रि. अ.
[हिं. बँधना]

बंब
बं बं शब्द जो शैवगण करते हैं।
संज्ञा
[अनु.]

बंब
रण का फोलाहल।
संज्ञा
[अनु.]

बंब
नगाड़ा, डंका।
संज्ञा
[अनु.]

बँबाना
पशु का रँभाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बँभनाई
ब्राह्मणपन।
संज्ञा
[सं. ब्राह्मण]

बँभनाई
हठ, दुराग्रह।
संज्ञा
[सं. ब्राह्मण]

बंस
वंश, परिवार।
उ.-ये तुम्हरे कुल-बंस हैं-१-२३८।
संज्ञा
[सं. वंश]

बउरा
पागल, बावला।
वि.
[हिं. बावला]

बउराना
पागल होना।
क्रि. अ.
[हिं. बौराना]

बए
बोया, बीज जमाया या लगाया।
उ.-(क) गोकुलनाथ बए जसुमति के आँगन भीतर, भवन मँझार।साखा- पत्र भए जल मेलत, फूलत-फरत न लागी बार-१०-१७३। (ख) सुरदास प्रभु दूत धर्म ढिग दुख के बीज बए-२९९३। (ग) जनु तनुजा में सद्य अरुन दल काम के बीज बए-२०८४।
क्रि. स.
[हिं. बपना]

बक
बगला।
संज्ञा
[सं. वक]

बक
बकासुर।
उ.-अघ बक बच्छ अरिष्ट केसी मथि जल तें कार्ढेयो काली -२५६७।
संज्ञा
[सं. वक]

बक
एक राक्षस जिसे भीम ने मारा था।
संज्ञा
[सं. वक]

बक
बगले सा सफेद।
वि.

बक
बकवाद, प्रलाप।
संज्ञा
[हिं. बकना]

बक
बकझक या बकबक, व्यर्थ की बकवाद।
यौ.

बकठाना
बकठा हो जाना।
क्रि. स.
[सं. विकुठिन]

बंसकार
बाँसुरी।
संज्ञा
[सं. वंश]

बंसरी
बाँसुरी।
संज्ञा
[हिं. बंशी]

बंसा
वंश, कुल।
उ.-ग्वाल परम सुख पाइ, कोटि मुख करत प्रसंसा। कहा बहुत जो भए, सपूतौ एकैबंसा-४३१।
संज्ञा
[सं. वंश]

बंसी
बाँसुरी, मुरली।
संज्ञा
[सं. वंशी]

बंसीधर
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[सं. वंशीधर]

बंसीबट
वृंदावन में एक बरगद का पेड़ जिसके नीचे श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते थे।
संज्ञा
[सं. वंशीवट]

बँहगी
भार ढोने का एक साधन।
संज्ञा
[सं. वह]

बई
बोयी, बीज जमाया।
उ.-(क) इंद्रिय मूल किसान, महातृन- अग्रज-बीज बई-१-१८५। (ख) मनहुँ पीक दल सींचि स्वेद जल आल बाल रति-बेलि बई री-२११५। (ग) मेरे नयना बिरह की बेलि बई-२७७३।
क्रि. स.
[हिं. बपना]

बई
बली, जली, सुलगी, छितरी, बिखरी।
उ.-जोग की गति सुनत मेरे अंग-आगि बई-३१३१।
क्रि. स.
[हिं. बलना]

बउर
बौर।
संज्ञा
[हिं. बौर]

बकमौन
चुपचाप मतलब साधनेवाला।
वि.
[सं. वक + मौन]

बकरति
बकती है, बड़बड़ाती है।
उ.-जसोदा ऊखल बाँधे स्याम।¨¨। दहयौ मथति मुख तैं कछु बकरति गारी दै लै नाम। घर-घर डोलत माखन चोरत, षटरस मेरैं धाम-३७९।
क्रि. स.
[हिं. बकरना]

बकरना
बड़बड़ाना।
क्रि. स.
[हिं. बकना]

बकरना
अपना दोष ,स्वीकार करना या स्वगत-रूप से कहना।
क्रि. स.
[हिं. बकना]

बकरा
एक प्रसिद्ध पशु।
संज्ञा
[सं. वर्कार]

बकराना
दोष कबूल कराना।
क्रि. स.
[हिं. बकरना]

बकला
छाल।
संज्ञा
[सं. वल्कल]

बकला
छिलका।
संज्ञा
[सं. वल्कल]

बकवाद
व्यर्थ की बात, बकवाद।
उ.-(क) कहि कहि करट सँदेसन मधुकर कृत बकवाद बढ़ावत। (ख) सूर बृथा बकवाद करत हो, इहिं ब्रज नंदकुमार-३२५३।
संज्ञा
[हिं. बक + वाद]

बकवादी
बकवाद करनेवाला।
वि.
[हिं. बकवाद]

बकत
बकती-झकती हूँ, बकते-बकते।
उ.-कहाँ लगि सहौं रिस, बकत भई हौं कृस, इहिं मिस सूर स्याम-बदन चहूँ-१०-२९५।
क्रि. अ.
[सं. वचन, हिं. बकना]

बकत
डाँटते-डपटते।
उ.-बकत-बकत तोसों पचिहारी, नैंकहुँ लाज न आई-१०-३२९।
क्रि. अ.
[सं. वचन, हिं. बकना]

बकतर
एक तरह का कवच।
संज्ञा
[फ़ा.]

बकता
व्याख्यान देनेवाला।
वि.
[सं. वक्ता]

बकति, बकती
प्रलापती है, बड़बड़ाती है, बुरा-भला कहती है।
उ.-करति कछू न कानि, बकति हैं कटु बानि, निपट निलज बैन बिलखि सहूँ-१०-२९५।
क्रि. स.
[सं. वचन, हिं. बकना]

बकध्यान
बनावटी भल-मनसाहत, भले बनने का आडंबर।
संज्ञा
[सं. वक + ध्यान]

बकध्यानी
जो दिखावटी भला हो, पर हृदय से कपटी और कुटिल हो।
वि.
[सं. वकध्यानिन]

बकना
व्यर्थ ही बहुत बोलना।
क्रि. स.
[सं. वचन]

बकना
बड़बड़ाना, प्रलाप करना।
क्रि. स.
[सं. वचन]

बकना
बकना-झकना- बड़बड़ाना।
मु.

बकवाना
बकवाद कराना।
क्रि. स.
[हिं. बकना]

बकवास
बकबक।
संज्ञा
[हिं. बकना + वास]

बकवास
बकवाद करने की तलब या इचछा।
संज्ञा
[हिं. बकना + वास]

बकवृत्ति
कपटाचरण।
संज्ञा
[सं. बकवृत्ति]

बकब्रती
कपटी, आडंबरी।
वि.
[सं. बकव्रतिन्]

बकसना
कृपापूर्वक प्रदान करना।
क्रि. स.
[फ़ा. बख्श + हिं. ना]

बकसना
क्षमा करना।
क्रि. स.
[फ़ा. बख्श + हिं. ना]

बकसाऊँ
क्षमा कराऊँ।
उ.-चूक परी मोतैं मैं जानी, मिलैं स्याम बकसाऊँ री-१६७३।
क्रि. स.
[हिं. बकसाना]

बकसाना
क्षमा करना।
क्रि. स.
[हिं. बकसना]

बकसियो
क्षमा करना।
उ.-पालागौं यह दोष बकसियो सन्मुख करत ढिठाई-३३४३।
क्रि. स.
[हिं. बकसना]

निश्चित
तै किया हुआ।
वि.
[सं.]

निश्चित
दृढ़।
वि.
[सं.]

निश्चेष्ट
अचेत।
वि.
[सं.]

निश्चेष्ट
अचल।
वि.
[सं.]

निश्चै
निश्चित घारणा।
संज्ञा
[सं. निश्चय]

निश्चै
विश्वास, यकीन।
संज्ञा
[सं. निश्चय]

निश्चै
निर्णय।
संज्ञा
[सं. निश्चय]

निश्छल
छल-कपट-रहित।
वि.
[सं.]

निश्रेयस
मोक्ष।
संज्ञा
[सं. निःश्रेयस]

निश्रेयस
कष्ट अथवा दुख का पूर्ण आभाव।
संज्ञा
[सं. निःश्रेयस]

बकुल
मौलसिरी।
उ.-नूतन कदम तमाल बकुल बट परसत जनम गए।
संज्ञा
[सं.]

बकुल
शिव।
संज्ञा
[सं.]

बकै
बकता है।
उ.-कायर बकै, लोभ तैं भागै लरै सो सूर बखानैं-३३३७।
क्रि. अ.
[हिं. बकना]

बकोट
पंजे की स्थिति जो नोचते समय होती है।
संज्ञा
[हिं. काटना]

बकोट
नोचने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. काटना]

बकोट
चुटकी भर वस्तु।
संज्ञा
[हिं. काटना]

बकोटना
नोचना, पंजा मारना।
क्रि. स.
[हिं.] बकोट]

बकोटनि
बकोटने या नोचने की क्रिया।
उ.-चंचल अधर, चरन-कर चंचल, मंचल अंचल गहत बकोटनि-१०-१८७।
संज्ञा
[हिं. बकोट]

बक्कल
फल का छिलका।
संज्ञा
[सं. वल्कल, पा. बक्कल]

बक्कल
पेड़ की छाल।
संज्ञा
[सं. वल्कल, पा. बक्कल]

बकावत
रटाता है।
उ.-बार बार बकि स्याम सों कछु बोल बकावत।
क्रि. स.
[हिं. बकाना]

बकासुर
वक दैत्य जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
संज्ञा
[सं. बकासुर]

बकिहै
बक- झककर मना करेगा, डाँट-फटकार करेगा।
सूर आइ तू करति अचगरी, को बकिहै निसि जामहिं-७२२।
क्रि. स.
[हिं. बकना]

बकी
बकासुर की बहिन पूतना जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
संज्ञा
[सं. वकी]

बकुचा
गठरी, पोटली।
संज्ञा
[हिं. बकुचना]

बकुचाना
पोटली में बाँधकर कंधे या पीठ पर लटकाना।
क्रि. स.
[हिं. बकुचा]

बकुची
छोटी गठरी।
संज्ञा
[हिं. बकुचा]

बकुचौहाँ
बकुचा-जैंसा।
वि.
[हिं. बकुचा + औहाँ]

बकुरना
स्वीकार करना।
क्रि. स.
[हिं. बकुरना]

बकुराना
स्वीकार करना।
क्रि. स.
[हिं. बकुरना]

बकसीस
इनाम, पारितोषिक।
(क) नाचै फूल्यौ अँगनाइ, सूर बकसीस पाइ, माथे कै चढ़ाइ लीनौ लाल कौ बगा-१०-३९। (ख) कमल जब ते उरग पीठि ल्याए सुने वैहैं बकसीस अब उनहिं दैहैं-२४६७।
संज्ञा
[फ़ा. बखशिश]

बकसीस
दाक।
संज्ञा
[फ़ा. बखशिश]

बकसो, बकसौ
क्षमा करो।
उ.-(क) ढीठो बहुत कियो हम तुमसों बकसो हरि चूक हमारी-११९१। (ख) यह अपराध मोहिं बकसौ री इहै कहति हौ मेरी माई-८६३।
क्रि. स.
[हिं. बकसना]

बकस्यौ
क्षमा किया, कुछ न कहा।
उ.-पूत सपूत भयौ कुल मेरैं, अब मैं जानी बात। सूर स्याम अब लौं तुहिं बकस्यौ, तेरी जानी घात-१०-३२९।
क्रि. स.
[हिं. बकसना]

बकाना
बकबक कराना।
क्रि. स.
[हिं. बकना]

बकाना
रटाना।
क्रि. स.
[हिं. बकना]

बकाना
बकने-झकने को विवश करना।
क्रि. स.
[हिं. बकना]

बकाया
बाकी, शेष।
संज्ञा
[अ.]

बकाया
बचत।
संज्ञा
[अ.]

बकारि
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[सं. वक + अरि]

बखारी
छोटा बखार।
संज्ञा
[हिं. बखार]

बखूबी
भली-भाँति, पूर्णतया।
क्रि. वि.
[फ़ा. ब + खूबी]

बखेड़ा
झंझट।
संज्ञा
[हिं. बखेरना]

बखेड़ा
विवाद, झगड़ा।
संज्ञा
[हिं. बखेरना]

बखेड़ा
कठिनता।
संज्ञा
[हिं. बखेरना]

बखेड़ा
व्यर्थ आडंबर।
संज्ञा
[हिं. बखेरना]

बखेड़िया
झगड़ालू, झंझटी।
वि.
[हिं. बखेड़ा]

बखेरना
फैलाना, छितराना।
क्रि. स.
[सं. विकिरण]

बख्त
भाग्य, तकदीर।
संज्ञा
[फ़ा. बख्त]

बख्तर
लोहे का कवच।
संज्ञा
[फ़ा. बत्कर]

बखानत
वर्णन करता है, कहता है।
उ.-(क) सिव कौ धन, संतनि को सरबस, महिमा बेद-पुरान बखानत-१-११४। (ख) सुर-नर-मुनि सब सुजस बखानत-९-१३९। (ग) तुम्हैं बेद ब्रह्मण्य बखानत। ताते तुम्हरी अस्तुति ठानत-१० उ.-११५।
क्रि. स.
[हिं. बखानना]

बखानना
कहना, वर्णन करना।
क्रि. स.
[हिं. बखान]

बखानना
प्रशंसा या बड़ाई करना।
क्रि. स.
[हिं. बखान]

बखानना
बुरा-भला कहना।
क्रि. स.
[हिं. बखान]

बखानिए
वर्णन कीजिए।
उ.-गुन-रूप कछु अनुहारि नाहीं, का बखान बखानिए-१० उ.-११५।
क्रि. स.
[हिं. बखानना]

बखानी
वर्णन किया, कहा, चर्चा की।
उ.-(क) तिहिं बिनु रहत नहीं निसि बासर, जिहिं सब दिन रस-बिषय बखानी-१-१४९। (ख) उमा कही, मैं तौ नहिं जानी। अरु सिवहूँ मासौं न बखानी-१-१२६।
क्रि. स.
[हिं. बखानना]

बखानै
वर्णन करते हैं, कहते हैं।
उ.-पूरन ब्रह्म पुरान बखानै-१०-३।
क्रि. स.
[हिं. बखानना]

बखानै
वर्णन करे।
उ.-सूर सूजस कहि कहा बखानै-१०-३।
क्रि. स.
[हिं. बखानना]

बखानौं
वर्णन करता हूँ।
उ.-सो अब तुमसौं सकल बखानौं-१०-२।
क्रि. स.
[हिं. बखानना]

बखार
अनाज रखने का घेरा।
संज्ञा
[सं. प्राकार]

बक्काल
बनिया, वणिक।
संज्ञा
[अ.]

बक्की
बहुत बोलनेवाला।
वि.
[हिं. बकना]

बखतर
एक तरह का कवच।
संज्ञा
[हिं. बकतर]

बखरा
भाग, हिस्सा।
संज्ञा
[फ़ा. बखरः]

बखरैत
साझीदार।
वि.
[हिं. बखरा + ऐत]

बखसीस
इनाम, पुरस्कार नेग।
उ.-नाचै फूल्यौ अँगनाई सूर बखसीस (बकसीस) पाई माथे कै चढ़ाइ लीनो लाल को बगा-१०-३९।
संज्ञा
[फ़ा. बख़शीश]

बखसीसना
इनाम देना।
क्रि. स.
[हिं. बखशीश]

बखान
वर्णन करके, व्याख्या करके।
उ.-ये ब्रह्मा सौं कह्ने भगवान। ब्रह्म मोसौं कहे बखान-१-२३०।
क्रि. स.
[सं. व्याऱ्यान, पा. बक्खान]

बखान
वर्णन, कथन।
उ.-गुन-रूप कछु अनुहार नाहीं, कर बखान बखानिए-१० उ.-२४।
संज्ञा

बखान
प्रशंसा, बड़ाई।
संज्ञा

बख्शना
देना।
क्रि. स.
[फ़ा. बख्श]

बख्शना
क्षमा करना।
क्रि. स.
[फ़ा. बख्श]

बग
बगुला।
संज्ञा
[सं. वक]

बगछुट, बगटुट
बड़ी तेजी से, बेतहाशा।
क्रि. वि.
[हिं. बाग + छूटना, टूटना]

बगदई
बिगड़ने या चौकनेवाला।
उ.-(गैया) घेरे फिरत न तुम बिनु माधौ जू मिलत नहीं बगदई।
वि.
[हिं. बगदहा]

बगदना
खराब होना।
क्रि. अ.
[सं. विकृत, हिं. बिगड़ना]

बगदना
भूलना, बहकना।
क्रि. अ.
[सं. विकृत, हिं. बिगड़ना]

बगदना
ठीक रास्ते से हट जाना।
क्रि. अ.
[सं. विकृत, हिं. बिगड़ना]

बगदर
मच्छड़।
संज्ञा
[देश.]

बगदवाना
खराब कराना।
क्रि. स.
[हिं. बगदना]

बगदवाना
भुलवाना।
क्रि. स.
[हिं. बगदना]

बगदवाना
गिरा देना।
क्रि. स.
[हिं. बगदना]

बगदवाना
वचन से हटाना।
क्रि. स.
[हिं. बगदना]

बगदहा
चौंकनेवाला।
वि.
[हिं. बगदना + हा]

बगदाना
खराब कराना।
क्रि. अ.
[हिं. बगदना]

बगदाना
ठीक मार्ग से हटाना।
क्रि. अ.
[हिं. बगदना]

बगदाना
भूलाना, भटकाना।
क्रि. अ.
[हिं. बगदना]

बगना
घूमना-फिरना।
क्रि. अ.
[सं. वक्र [गति]]

बगनी
एक तरह का घास।
संज्ञा
[देश.]

बगमेल
दूसरा के घोड़े के साथ या पाँति बाँधकर चलना।
संज्ञा
[हिं. बाग + मेल]

बगमेल
समानता।
संज्ञा
[हिं. बाग + मेल]

बगमेल
पंक्तिबद्ध, साथ-साथ।
क्रि. वि.

बगर
महल, प्रासाद।
संज्ञा
[सं. प्रधण, पा. पघण]

बगर
बड़ा मकान, घर।
संज्ञा
[सं. प्रधण, पा. पधण]

बगर
घर, कोठरी।
संज्ञा
[सं. प्रधण, पा. पधण]

बगर
आँगन।
संज्ञा
[सं. प्रधण, पा. पधण]

बगर
गाय बँधने का स्थान।
संज्ञा
[सं. प्रधण, पा. पधण]

बगरना
बिखरना, छितरना।
क्रि. अ.
[सं. विकिरण]

बगराइ
बिखरी है, बिखराकर।
उ.-गोरे बरन चूनरी सारी अलकैं मुख बगराइ-८८४।
क्रि. अ.
[हिं. बगरना]

बगराई
फैलकर, बिखरकर, छितराकर।
उ.-अति सुदेस मृदु हरत चिकुर मन मोहन-मुख बगरई-१०-१०८।
क्रि. अ.
[हिं. बगरना]

बगराए
फैलाये हुये, छिटकाए हुए, छितराये।
उ.-ते दिन बिसरि गए इहाँ आए। अति उन्मत्त, मोह-मद छाकयौ, फिरत केस बगराए-१-३२०।
क्रि. अ.
[हिं. बगराना]

बगराना
छितराना, छिटकाना।
क्रि. स.
[हिं. बगरना]

बगराना
फैलना, बिखरना, छितरना।
क्रि. अ.

बगरानी
बिखर गयीं।
उ.-बेनी छूटि, लटैं बगरानी, मुकुट लटकि लटकानो- पृ ३४६ (४७)।
क्रि. अ.
[हिं. बगराना]

बगरि
फैल गयी, बिखर गयी।
क्रि. अ.
[हिं. बगरना]

बगरि
इधर-उधर चली गयीं।
उ.-बगरि गईं गैयाँ बन-बीथिन, देखीं अति अकुलाइ-५००।
क्रि. अ.
[हिं. बगरना]

बगरीं
बिखरीं, छिटकीं।
उ.-तैसीयै लट बगरीं ऊपर स्रवत नीर अनूप-१८४९।
क्रि. अ.
[हिं. बगरना]

बगरी
बखरी, घर, मकान।
उ.-(क) बड़े बाप के पूत कहावत, हम वै बास बसत इक बगरी। नंदहु तैं ये बड़े कहैहैं, फेरि बसैहैं यह व्रज नगरी-१०-३१९। (ख) घाट-बाट सब देखत आवत, युवती डरनि मरत हैं सिगरी। सूर स्याम तेहि गारी दीनो जो कोई आवै तुमरी बगंरी-८५३।
संज्ञा
[हिं. बगर]

बगरो
गैयाँ बँधने का स्थान।
उ.-ग्वाल बास सँग लिये सब घेरि रहे बगरो-।
संज्ञा
[हिं. बगर]

बगरो
ठौर, स्थान, गाँव।
उ.-और कहूँ जाइ रहे, छाँड़ि ब्रज बगरो-१०५६।
संज्ञा
[हिं. बगर]

निश्चय
संदेहरहित धारणा।
संज्ञा
[सं.]

निश्चय
विश्वास।
संज्ञा
[सं.]

निश्चय
निर्णय।
संज्ञा
[सं.]

निश्चय
दृढ़ विचार।
संज्ञा
[सं.]

निश्चयात्मक
जोबिलकुल निश्चित हो।
संज्ञा
[सं.]

निश्चल
अचल।
वि.
[सं.]

निश्चल
स्थिर।
वि.
[सं.]

निश्चलता
स्थिरता, दृढ़ता।
संज्ञा
[सं.]

निश्चिंत
चिंतारहित, बेफिक्र।
वि.
[सं.]

निश्चिंतई, निश्चिंतता
निश्चित होने का भाव, बेफिक्री।
संज्ञा
[सं. निश्चंतता]

बगल
बाहुमूल के नीचे का गड़ढा, काँख।
संज्ञा
[फ़ा.]

बगल
छाती के दोनों किनारे के भाग, पार्श्व।
संज्ञा
[फ़ा.]

बगल
बगल में दबाना (धरना)- छल से अधिकार में करना। बगल बजाना- खूब खुशी मनाना।
मु.

बगल
किनारे या पार्श्व का भाग।
संज्ञा
[फ़ा.]

बगल
समीप का स्थान।
संज्ञा
[फ़ा.]

बगलन
छाती के दोनों किनारों के भाग।
उ.-बगलन दाबे पिचकारी-२४४४।
संज्ञा
[हिं. बगल]

बगला
एक प्रसिद्ध पक्षी।
संज्ञा
[सं. वक + ला]

बगला
बगला भगत- छली, कपटी, ढोंगी।
मु.

बगलामुखी
एक देवी।
संज्ञा
[देश.]

बगलियाना
राह काटकर या अलग हटकर जाना।
क्रि. अ.
[हिं. बगल + इयाना]

बगलियाना
अलग करना।
क्रि. स.

बगलियाना
बगल में लाना।
क्रि. स.

बगली
बगल का।
वि.
[हिं. बगल]

बगली
बगुले की मादा।
संज्ञा
[हिं. बगला]

बगलौहाँ
तिरछा, झुका हुआ।
वि.
[हिं. बगल + औहाँ]

बगसना
देना।
क्रि. स.
[हिं. बख्शना]

बगसना
क्षमा करना।
क्रि. स.
[हिं. बख्शना]

बगा
जामा, बागा।
उ.-नाचै फूल्यौ अँगनाइ, सूर बकसीस पाइ, माथै कै चढ़ाइ लीनौ लाल कौ बगा-१०-३९।
संज्ञा
[हिं. बागा]

बगा
बगला।
संज्ञा
[सं. वक]

बगाना
घुमाना-फिराना।
क्रि. स.
[हिं. बगना]

बगैर
बिना।
अव्ष.
[अ. बग़ैर]

बघंबर
बाघ का चर्म जो आसन का काम देता है।
संज्ञा
[सं. व्याघ्रांबर]

बघंबर
बाघ की खाल-सा कंबल।
संज्ञा
[सं. व्याघ्रांबर]

बघनहाँ, बघनहियाँ, बघना
एक आभूषण जिसमें सोने-चाँदी से मढ़ बाघ के नाखून रहते हैं।
उ.-(क) कठुला कंठ बघनहाँ नीके। नैन-सरोज मैन सरसी के -१०-११७। (ख) सूरदास प्रभु ब्रज-बधु निरखतिं, रुचिर हार हिय सोहत बघना-१०-११३। (ग) सीप जयमाल स्याम उर सोहै बिच बघना छबि पावै री।
संज्ञा
[हिं. बाघ + नहँ=नाखून]

बघनहाँ, बघनहियाँ, बघना
एक तरह का हथियार।
संज्ञा
[हिं. बाघ + नहँ=नाखून]

बघनियाँ
एक आभूषण जिसमें बाघ के नाखून चाँदी या सोने से मढ़े रहते हैं। यह गले में तागे में गूँथ कर पहना जाता है।
उ.-घर-घर हाथ दिवावति डोलति, बाँधति गरैं बघनियाँ-१०-८३।
संज्ञा
[हिं. बाघ + नहँ=नाखून ; पुं. बघनहाँ]

बघरूरा
बवंडर।
संज्ञा
[हिं. वायु + गँडूरा]

बघार
तड़का, छौंक।
संज्ञा
[हिं. बधारना]

बघारना
छौंकना, तड़का देना।
क्रि. स.
[सं. अवधारण]

बघारना
मौके-बेमौके योग्यता दिखाना।
क्रि. स.
[सं. अवधारण]

बगाना
जल्दी जाना, भागना।
क्रि. अ.

बगार
गाय बाँधने का स्थान।
संज्ञा
[देश.]

बगारना
छिटकाना, बिखेरना।
क्रि. स.
[हिं. बगरना]

बगावत
विद्रोह, राजद्रोह।
संज्ञा
[अ. बग़ावत]

बगिया
छोटा बाग।
संज्ञा
[हिं. बाग]

बगीचा
छोटा बाग।
संज्ञा
[फ़ा. बागचा]

बगुला
वक, बगला।
संज्ञा
[हिं. बगला]

बगुली
बगला की मादा, स्त्री-वक।
उ.-बग-बगुली अरु गीध-गीधनी, आइ जनम लियौ तैसौ-२-१४।
संज्ञा
[बगला]

बगूला
वायु का भँवर, बवंडर।
संज्ञा
[हिं. वायु + गोला]

बगेड़ी, बरोरी
एक छोटी चिड़िया।
संज्ञा
[देश.]

बघारना
शेखी बघारना- बढ़-बढ़कर बात करना।
मु.

बच
वचन, वाक्य, बात।
उ.-अपनौ मन हरि सौं राँचै। आन उपाय प्रसंग छाँड़ि कै मन-बच-क्रम अनुसाँचै-१-८१।
संज्ञा
[हिं. वचन]

बचकाना
बच्चों का, बच्चों-सा।
वि.
[हिं. कच्चा + काना]

बचत
रक्षा, बचाव।
संज्ञा
[हिं. बचना]

बचत
व्यय होने से बचा भाग या अंश।
संज्ञा
[हिं. बचना]

बचत
शेखी बधारना- बढ़-बढ़कर बात करना।
मु.

बचत
लाभ।
संज्ञा
[हिं. बचना]

बचत
कहता या बोलता है।
उ.-अबल प्रहलाद बल देत मुख ही बचत दास ध्रुव चरन चित सीस नायो।
क्रि. स.
[सं. वचन]

बचन
वाणी, वाक्।
संज्ञा
[सं. वचन]

बचन
शब्द, बचन, बात।-
उ.-भृगु को चरन राखि उर ऊपर बोले बचन सदा सुखदाई-१-३।
संज्ञा
[सं. वचन]

बचन
बचन खंडना- बात न मानना, आज्ञा का पालन न करना। बचन खंडै- बात न मानें, आज्ञा का पालन न करे। उ.-पिता-बचन खंडै सो पापी-१-१०४। बचन डालना- याचना करना। बचन छोड़ना (तोड़ना)- कहकर हट जाना, बात का निर्वाह न करना। बचन देना- प्रतिज्ञा करना। वचन निभाना (पालना)- जो कहना, सो करना; कही हुई बात का निर्वाह करना। बचन बाँधना- प्रतिज्ञाबद्ध करना। बचन बँधायो- प्रतिज्ञा या बचनबद्ध किया। उ.-नंद जसोदा बचन बँधायो। ता कारन देही धरि आयो-११६१। बचन बनाना- बात बनाना, कुछ अर्थ या उद्देश्य समझाते हैं। उ.-सूरदास प्रभु बचन बनावत अब चोरत मन मोर-१९६५। बचन लेना- प्रतिज्ञा कराना। बचन हारना- प्रतिज्ञा या बचन बद्ध होना।
मु.

बचना
कष्ट आदि से सुराक्षित रहना।
क्रि. अ.
[सं. वचन=न पाना]

बचना
बुरी बात या आदत से दूर रहना।
क्रि. अ.
[सं. वचन=न पाना]

बचना
छूट या रह जाना।
क्रि. अ.
[सं. वचन=न पाना]

बचना
खरचने या काम में न आ पाना, बाकी रहना।
क्रि. अ.
[सं. वचन=न पाना]

बचना
दूर या अलग रहना।
क्रि. अ.
[सं. वचन=न पाना]

बचना
सामने से हटना।
क्रि. अ.
[सं. वचन=न पाना]

बचना
कहना, बोलना।
क्रि. स.
[सं. वचन]

बचना
बात, कथन, वचन।
संज्ञा

बचपन, बचपना
बाल्यावस्था।
संज्ञा
[हिं. बच्चा + पन]

बचपन, बचपना
बालक होने का भाव, अबोधता और सरलता।
संज्ञा
[हिं. बच्चा + पन]

बचवैया
बचानेवाला।
संज्ञा
[हिं. बचाना + वैया]

बचा
बालक।
संज्ञा
[हिं. बच्चा]

बचा
पुत्र।
संज्ञा
[हिं. बच्चा]

बचाउ
बचने का भाव, रक्षा, त्राण।
उ.-महरि सबै ब्रजनारि सौं, पूछति कौन उपाउ। जनमहिं त करब टरी, अबकैं नाहिं बचाउ-५८९।
संज्ञा
[हिं. बचाना]

बचाऊ
रक्षा की, कष्ट या विपत्ति में न पड़ने दिया।
उ.-बिकट रूप अवतार धरयौ जब, सो प्रहलाद बचाऊ-२२१।
क्रि. स.
[हिं. बचाना]

बचाए
रक्षा की।
उ.-जे पद कमल-भजन महिमा तैं, जन प्रहलाद बचाए-५३८।
क्रि. स.
[हिं. बचाना]

बचाना
रक्षा करना।
क्रि. स.
[हिं. बचना]

बचाना
अलग या अप्रभावित रखना।
क्रि. स.
[हिं. बचना]

बचाना
खर्चने के बाद भी रख छोड़ना।
क्रि. स.
[हिं. बचना]

बचाना
छिपाना, चुराना।
क्रि. स.
[हिं. बचना]

बचाना
दूर रखना।
क्रि. स.
[हिं. बचना]

बचाना
रोग आदि से अलग या मुक्त रखना।
क्रि. स.
[हिं. बचना]

बचाना
सामने से हटाना।
क्रि. स.
[हिं. बचना]

बचाव
रक्षा, त्राण।
उ.-ऐसो कैसे होय सखी री घर पुनि मेरो हे बचाव री-१२३७।
क्रि. स.
[हिं. बचाना]

बचावत
रक्षा करता है, आपत्ति या कष्ट से बचाता है।
उ.-तोकौं कौन बचावत आइ-७-१।
क्रि. स.
[हिं. बचाना]

बचावें
रक्षा करे।
उ.-आउ हम नृपति, तुमकौं बचावैं -८-१६।
क्रि. स.
[हिं. बचाना]

बचावै
बचावे, रक्षा करे, कष्ट में न पड़ने दे।
उ.-पग पग परत कर्म-तम-कूपहिं, को करि कृपा बचावै-१-४८।
क्रि. स.
[हिं. बचाना]

बचि
कष्ट-विपत्ति में न पड़े, रक्षित रहे।
उ.-मन सबकैं आनन्द, कान्ह जल तैं बचि आए-५८९।
क्रि. अ.
[हिं. बचना]

बचिबो
बचेगा, रक्षा होगी।
उ.-रे मन, छाँड़ि बिषय कौ रचिबौ। कत तू सुवा होत सेमर कौ, अंतहिं कपट न बचिबौ-१-५९।
क्रि. अ.
[हिं. बचना]

बच्ची
लड़की।
संज्ञा
[हिं. बच्चा]

बच्छ
बच्चा, बेटा।
संज्ञा
[सं. वत्स, प्रा. वच्छ]

बच्छ
गाय का बछड़ा।
उ.-(क) जैसैं गैया बच्छ कैं सुमिरत उठि धावै। (ख) बच्छ पुच्छ लै दियो हाथ पर मंगल गीत गवायो। जसुमति रानी कोख सिरानी मोहन गोद खेलयो।
संज्ञा
[सं. वत्स, प्रा. वच्छ]

बच्छ
वत्सासुर।
उ.-अघ बक बच्छ अरिष्ट केसी मथि जल तें काढ़थो काली-२५६७।
संज्ञा
[सं. वत्स, प्रा. वच्छ]

बच्यो, बच्यौ
बचा, शेष भाग, बाकी रहा, बच सका।
उ.-(क) पाप मारग जिते, सबै कीन्हें तिते, बच्यौ नहिं कोउ जहँ सुरति मेरी-१-११०। (ख) कीन्हें स्वाँग जिते जाने मैं, एकौ तौ न बच्यौ-१-१७४।
क्रि. अ.
[हिं. बचना]

बच्यो, बच्यौ
कष्ट या विपत्ति से बचा, रक्षित रहा।
उ.-कैसैं बच्यौ, जाउँ बलि तेरी, तृनावर्त कैं घात-१०-८१।
क्रि. अ.
[हिं. बचना]

बच्छल
माता पिता के समान स्नेह या प्यार करनेवाला।
उ.-भक्तबच्छल कृपाकरन, असरनसरन, पतित-उद्धरन कहैं बेद गाई-८-९।
वि.
[सं. वत्सल, प्रा. बच्छल]

बच्छस
छाती, वक्षस्थल।
संज्ञा
[सं. वक्षस्]

बच्छा
बच्चा, बछड़ा।
संज्ञा
[सं. वत्स, प्रा. बच्छ]

बछ
बछड़ा, गाय का बच्चा।
उ.-(क) आगैं बछ, पाछें ब्रज-बालक, करत चले मधुरैं सुर गान-४३८। (ख) बाल-बिलख मुख गौ न चरति तृन बछ पय पियन न धावैं- (ग) ब्रह्मलोक ब्रह्मा गए लै बालक बछ संग-४९२।
संज्ञा
[सं. वत्स, प्रा. बच्छ]

बचुआ
पुत्र' के लिए स्नेहपुर्ण या दुलार-भरा संबोधन।
संज्ञा
[हिं. बच्चा]

बचे
रक्षा हुई।
उ.-दुहूँ बृच्छ-बिच बचे कन्हाई-३९१।
क्रि. अ.
[हिं. बचना]

बचैं
कष्ट या विपत्ति में न पड़े, रक्षित रहें
उ.-(क) बरु हमकौं लै जाइ, स्याम बलराम बचैं घर-५८९। (ख) सूर कर जोरि अंचल छोरि बिनवैं, बचैं ए आजु बिधि इहै मागैं-२६०३।
क्रि. अ.
[हिं. बचना]

बचै
रक्षित रहे।
उ.-अब बालक क्यों बचै कन्हाई-१०-५१।
क्रि. अ.
[हिं. बचना]

बचौगे
बच सकोगे, पकड़ में न आओगे।
उ.-भागैं कहाँ बचौगे मोहन, पाछैं आइ गईं तुव गोहन-७९९।
क्रि. अ.
[हिं. बचना]

बच्चा
नवजात प्राणी।
संज्ञा
[सं. वत्स]

बच्चा
लड़का, बालक।
संज्ञा
[सं. वत्स]

बच्चा
बेटा, पुत्र।
संज्ञा
[सं. वत्स]

बच्चा
अनजान, अबोध।
वि.

बच्ची
बेटी।
संज्ञा
[हिं. बच्चा]

निश्रेयस
व्यापार।
संज्ञा
[सं. निःश्रेयस]

निश्वास
नाक या मुँह से बाहर निकलने वाली श्वास या इसके बाहर निकलने का व्यापार।
संज्ञा
[सं.]

निश्शंक
निडर।
वि.
[सं.]

निश्शंक
शंकारहित।
वि.
[सं.]

निश्शक्त
शक्तहीन, निर्बल।
वि.
[सं.]

निश्शेष
जिसमें कुछ बाकी न हो।
वि.
[सं.]

निषंग
तरकश, तूणीर।
संज्ञा
[सं.]

निषंग
खड़ग।
संज्ञा
[सं.]

निषंग
एक बाजा जो मुँह से बजाया जाता था।
संज्ञा
[सं.]

निषंगी
तीर या खड्गधारी।
वि.
[सं. निषंगिनि]

बछड़ा, बछरा, बछरु, बछरुवा, बछरू
बछड़ा, गाय का बछेड़ा।
उ.-(क) ब्रह्मा बाल बछरुवा हरि गयौ, सो ततछन सारिखे सँवारी-१-३०। (ख) ब्यानी गाय बछरुवा चाटति, हौं पय पियत पतूखिनि लैया-१०-३१५। (ग) -भोजन करत सखा इक बोल्यौ, बछरू कतहूँ दूरि गए-४३८। (घ) राँभति गो खरिकनि मैं, बछरा हित धाई-१०-२०२। (ङ) कोउ गए ग्वाल गाउ वन घेरन, कोउ गए बछरु लिवाइ-५००।
संज्ञा
[हिं. बछड़ा, बछवा]

बछल
छोटों से स्नेह करनेवाला।
वि.
[सं. वत्सल]

बछलता
छोटों के प्रति स्नेह का भाव।
उ.-भक्तबछलता प्रगट करी-१-२६८।
संज्ञा
[सं. वत्सलता]

बछवा, बछा
गाय का बछड़ा।
उ.-धेनु बिकल सो चरत नहीं तृन बछा न पीवन धावैं-३४२३।
संज्ञा
[हिं. बच्छ]

बछिया
बिन ब्याई गाय।
संज्ञा
[हिं. बछवा]

बछिया
बछिया का ताऊ (बाबा)- मुर्ख।
मु.

बछुरुवनि
गाय के बछड़े।
उ.-ता पर सूर बछुरुवनि ढीलत, बन-बन फिरतिं बही-१०-२९१।
संज्ञा
[हिं. बछवा]

बछेड़ा
घोड़े का बच्चा।
संज्ञा
[हिं. बछड़ा]

बछेरू
गाय का बछड़ा।
संज्ञा
[हिं. बाजा]

बजंत्री
बाजा बजानेवाला।
संज्ञा
[हिं. बाजा]

बजमारी
जिससे दैव रूठा हो।
उ.-जो कह्यौ करै दी हठ याही मारग आवै बजमारी।
वि.
[हिं. बजमारा]

बजरंग
बज्र के समान दृढ़ शरीर वाला।
वि.
[सं. बज्र + अंग]

बजरंग
हनुमान।
संज्ञा

बजर
वज्र।
संज्ञा
[सं. बज्र]

बजरा
एक तरह की नाव।
संज्ञा
[देश.]

बजरी
कंकड़ी।
संज्ञा
[सं. बज्र]

बजरी
गोला।
संज्ञा
[सं. बज्र]

बजरी
किले के ऊपरी भाग के कंगूरे जिनकी बगल में गोलियाँ चलाने के लिए कुछ अवकाश रहता है।
संज्ञा
[सं. बज्र]

बजवाई
बाजा बजाने की मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. बजवाना]

बजवाना
बजाने में प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. बजाना]

बजना
बाजे में शब्द उत्पन्न होना।
क्रि. अ.
[हिं. बाजा]

बजना
आघात या प्रहार होना।
क्रि. अ.
[हिं. बाजा]

बजना
शस्त्रों का चलना।
क्रि. अ.
[हिं. बाजा]

बजना
हठ करना।
क्रि. अ.
[हिं. बाजा]

बजना
प्रसिद्ध या विख्यात होना।
क्रि. अ.
[हिं. बाजा]

बजना
बजनेवाला बाजा।
संज्ञा

बजना
जो बजता हो, जिसमें से ध्वनि निकले।
वि.

बजनियाँ, बजनिहाँ
बाजा बजानेवाला।
संज्ञा
[हिं. बजना + इयाँ, इहाँ]

बजनी, बजनू
जो बजता हो।
वि.
[हिं. बजना]

बजमारा
बज्र का मारा हुआ, खोटे भाग्यवाला, जिससे दैव रूठा हो।
वि.
[हिं. बज्र + मारा]

बजवैया
बजानेवाला।
वि.
[हिं. बजाना + वैया]

बजा
उचित ठीक।
वि.
[फ़ा.]

बजा
बजाना।
क्रि. स.
[हिं. बजाना]

बजा
बजा लाना- पालन करना।
मु.

बजाइ
बजा कर, घोषित करके, डंके की चोट पर।
उ.-नैना भए बजाइ गुलाभ-पृ. ३२१ (६)।
क्रि. स.
[हिं. बजाना]

बजाइ
लीजै ठौंकि बजाइ- अच्छी तरह देख भालकर, खूब समझ-बूझकर। उ.-नन्द ब्रज लीजै ठोंकि बजाइ-२७००।
मु.

बजाई
बाजे से ध्वनि निकाली, बजायी।
उ.-सुरनि मिलि देव-दुंदुभि बजाई-८-८।
क्रि. स.
[हिं. बजाना]

बजाई
कींने बजाई- खुल्लमखुल्ला या डंके की चोट पर किया। उ.-सूरदास प्रभु हम पर ताको कीने सवति बजाई -२३२९।
मु.

बजाऊँ
बाजे से ध्वनि निकालूँ।
उ.-गाऊँ बजाऊँ रस प्रेम भरि नाचौं-पृ. ३१९ (८१)।
क्रि. स.
[हिं. बजाना]

बजागि
बिजली।
संज्ञा
[सं. वज्र + आगि]

बजायो
बाजे से शब्द निकाला, बजाया।
उ.-(क) ताल, मृदंग, झाँझ, इन्द्रिन मिलि, बीना, बेनु बजायौ-१-२०५। (द्द) जागी महरि पुत्र मुख देख्यौ, आनन्द-तूर बजायौ-१०-४।
क्रि. स.
[हिं. बजाना]

बजार
हाट, पठ, बाजार।
संज्ञा
[फ़ा. बाजार]

बजारी
बजारू।
वि.
[हिं. बाजारी]

बजारी
साधारण।
वि.
[हिं. बाजारी]

बजारू
बाजार का।
वि.
[हिं. बाजारू]

बजारू
मामूली।
वि.
[हिं. बाजारू]

बजावत
बजाता है, बाजे से स्वर निकालता है।
उ.-हठ, अन्याय, अधर्म सूर नित नौबत द्वार बजावत-१-१४१।
क्रि. स.
[हिं. बजाना]

बजावते
बजाते हैं।
उ.-दूरहिं ते वह बैन अधर धरि बारंबार बजावते-२०३५।
क्रि. स.
[हिं. बजाना]

बजावहिंगे
बजायँगे।
उ.-तैसीए दमकति दामिनि अरु मुरली मलार बजावहिंगे-२८८९।
क्रि. स.
[हिं. बजाना]

बजावहीं
बजाते हैं।
उ.-दिबि दुंदुभी बजावहीं, फन-प्रति निरतत स्याम-५८९।
क्रि. स.
[हिं. बजाना]

बजावै
बजाता है।
उ.-मदन मोहन बेनु मृदु मृदुल बजावै री-६२९।
क्रि. स.
[हिं. बजाना]

बजी
बजने लगी, (बाँसुरी आदि) से शब्द निकाला गया।
उ.-(क) राजा के घर बजी बधाइ-५-२। (ख) तैसे सूर सुने जदुनंदन बजी एक रस ताँति-३१६८।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]

बजुल्ला
बाँह का एक भूषण।
संज्ञा
[हिं. बाजू]

बजैहै
बजायगी।
क्रि. स.
[हिं. बजाना]

बजैहै
गाल बजैंहै- बढ़-बढ़कर बात करेगी, डींग हाँकेगी। उ.-देखहु जाइ चरित तुम वाके जैसे गाल बजैहै-१२६३।
मु.

बज्जना
बजना।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]

बज्जर
वज्र।
संज्ञा
[सं. वज्र]

बज्जर
बिजली।
संज्ञा
[सं. वज्र]

बज्जात
दुष्ट, पाजी।
वि.
[फ़ा. बदजात]

बज्र
इंद्र का शस्त्र, कुलिश।
संज्ञा
[सं. वज्र]

बजाज
कपड़ा बेंचनेवाला।
संज्ञा
[अ. बज्जाज]

बजाजा
कपड़े का व्यापार।
संज्ञा
[हिं. बजाज]

बजाजिनि
कपड़ा बेचने वाली।
उ.-बजाजिनि है जाउँ निरखि नैनन सुख देऊँ-पृ. ३४९ (६१)।
संज्ञा
[हिं. बजाज]

बजाजी
बजाज का काम।
संज्ञा
[हिं. बजाज]

बजाना
बाजे आदि से शब्द उत्पन्न करना।
क्रि. अ.
[हिं. बजा]

बजाना
आघात से शब्द उत्पन्न करना।
क्रि. अ.
[हिं. बजा]

बजाना
ठोकना-बजाना- देखना-भालना, जाँच-कर परखना।
मु.

बजाना
शस्त्र से मारना।
क्रि. अ.
[हिं. बजा]

बजाना
पूरा या पालन करना।
क्रि. स.

बजाय
स्थान पर, बदले में।
अव्य.
[फ़ा.]

बज्र
बज्र परै- नाश हो जाय। उ.-परै बज्र या नृपति-सभा पै, कहति प्रजा अकुलानी-१-२५०।
मु.

बज्र
दृढ़, बहुत मजबूत।
उ.-बंदि बेरी सबै छुटी, खुले बज्र कपाट-१०-५।
वि.

बज्री
इंद्र।
संज्ञा
[सं. वज्रिन]

बज्रनाभ
अनिरुद्ध का पुत्र जिसे युधिष्ठिर ने मथुरापति बनाया था।
उ.-राज परीच्छत कौं नृप दीन्हौ। बज्रनाभ मथुरापति कीन्हौ-१-२८८।
संज्ञा
[सं. वज्रनाभ]

बज्रवर्त
मेघों का एक भेद।
उ.-जलवर्त, बारिवर्त, पवनबर्त, बज्रवर्त, अग्निवर्तक-९४४।
संज्ञा
[सं. वज्रवर्त]

बझना
बंधन में पड़ना, बँध जाना।
क्रि. अ.
[सं. वद्ध, प्रा. बज्झ + ना]

बझना
उलझना, अटकना।
क्रि. अ.
[सं. वद्ध, प्रा. बज्झ + ना]

बझना
हठ करना।
क्रि. अ.
[सं. वद्ध, प्रा. बज्झ + ना]

बझवट
बाँझ (स्त्री या पशु)।
वि.
[हिं. बाँझ + वट]

बझाना
बंधन में डालना।
क्रि. स.
[हिं. बझना]

बझाना
उलझना, अटकना, फँसाना।
क्रि. स.
[हिं. बझना]

बझाव
फँसाव।
संज्ञा
[हिं. बझना]

बझाव
उलझाव।
संज्ञा
[हिं. बझना]

बझावट
फँसने का भाव।
संज्ञा
[हिं. बझना + आवट]

बझावट
उलझाव, अटकाव।
संज्ञा
[हिं. बझना + आवट]

बझावना
बँधाना।
क्रि. स.
[हिं. बझाना]

बझावना
फँसाना।
क्रि. स.
[हिं. बझाना]

बझे
बँधन में पड़े, बँध गये।
उ.-(क) स्याम हृदय अति बिसाल, माखन दधि बिदु-जाल, मोह्यौ मन नंदलाल, बाल हीं बझे री-१०-२७५। (ख) चली प्रात ही गोपिका मटुकिन लै गोरस।¨¨¨¨¨¨। जीव परयौ या ख्याल में अरु गए दसादस। बझे जाय खगवृंद ज्यौं प्रिय छबि लटकनि बस-१३७७।
क्रि. अ.
[हिं. बझना]

बट
बरगद का वृक्ष।
संज्ञा
[सं. वट]

बट
बड़ा (एक खाद्य)।
संज्ञा
[सं. वट]

बट
गोल वस्तु।
संज्ञा
[सं. वट]

बट
ऐंठन, बटाई।
संज्ञा
[सं. वट]

बट
पुराणानुसार वह वट-वृक्ष जो प्रलयकाल में सुरक्षित रहा था और जिस पर भगवान ने बालरूप में शयन किया था।
उ.-कर पग गहि, अँगुठा मुख मेलत।¨¨¨¨¨¨। बट बाढ्यौ सागर-जल झेलत-१०-६३।
संज्ञा
[सं. वट]

बट
मार्ग, रास्ता।
संज्ञा
[हिं. बाट]

बटई
बटेर (पक्षी )।
संज्ञा
[सं. वर्त्तक]

बटखर, बटखरा
तौलने का बाट।
संज्ञा
[सं. वटक]

बटन
बटने का भाव, ऐंठन।
संज्ञा
[हिं. बटना]

बटना
ऐंठन देकर मिलाना।
क्रि. स.
[सं. वट=बटना]

बटना
सिल पर पीसा जाना।
क्रि. अ.
[हिं. बट्टा]

बटना
उबटन।
संज्ञा
[सं. उद्वर्त्तन, प्रा. उब्बट्टन]

निषद
निषाद स्वर (संगीत)।
संज्ञा
[सं.]

निषध
संगीत का सातवाँ स्वर।
संज्ञा
[सं.]

निषाद
एक प्राचीन अनार्य जाति।
संज्ञा
[सं.]

निषाद
संगीत का सातवाँ स्वर जिसका संक्षिप्त रूप ‘नि’ है।
संज्ञा
[सं.]

निषादी
हाथीवान, महावत।
संज्ञा
[सं. निषादिन्]

निषिद्ध
जिसके लिए निषेघ या मना किया जाय।
वि.
[सं.]

निषिद्ध
बुरा, दूषित।
वि.
[सं.]

निषेक
छिड़कना।
संज्ञा
[सं.]

निषेक
डुबाना।
संज्ञा
[सं.]

निषेक
अरक उतारना।
संज्ञा
[सं.]

बटा
गद।
उ.- (क) लै चौगान-बटा अपनैं कर, प्रभु आए घर बाहर-१०-२४३। (ख) बटा धरती डारि दीनौ, लै चले ढरकाइ-१०-२४४। (ग) देखत ही उढ़ि गए हाथ ते भए बटा नट के- पृ.- २३६ (५२)।
संज्ञा
[सं. वटक]

बटा
रोड़ा, ढेला।
संज्ञा
[सं. वटक]

बटा
पथिक, राही।
संज्ञा
[सं. वटक]

बटाइ
बाँट कर, हिस्से करके।
क्रि. स.
[हिं. बाँटना]

बटाइ
देहु बटाइ- बाट दो, विभाग कर दो।
उ.- बिदुर कह्यौ मति करौ अन्याइ। देहु पांडवनि राज बटाइ-१-२८४।
प्र.

बटाई
बटने का काम या भाव।
संज्ञा
[हिं. बटना]

बटाई
बाँटने का काम या भाव।
संज्ञा
[हिं. बँटाई]

बटाई
विभाजित की।
क्रि. स.
[हिं. बटाना]

बटाऊ
बटोही, पथिक, राही।
उ.- किहिं घाँ के तुम बीर बटाऊ, कौन तुम्हारौ गाउँ-९-४४। (ख) कहि धौं सखी बटाऊ को हैं-९-४५। (ग) बीर बटाऊ पंथी हो तुम कौन देस तें आए-२८८३।
संज्ञा
[हिं. बाट = रास्ता + आऊ (प्रत्य.)]

बटाऊ
बटाऊ होना- चल देना।
मु.

बटपरा, बटपार
ठग, डाकूँ, लुटेरा।
उ.- चोर ढुंठ बटपार अन्याई अपमारगी कहावैं- पृ. ३२६ (५२)।
संज्ञा
[हिं. बाट + पड़ना, बटपार]

बटपारी
डकैती, ठगी, लूट।
संज्ञा
[हिं. बटपार]

बटपारी
डाकू, लुटेरा।
उ.- (क) बटपारी, ठग, चोर, उच्कका, गाँठिकटा, लठबासी-१-१८६। (ख) सुनहु सूर प्रभु नीके जान्यो ब्रज जुवती तुम सन बटपारी-११६०।
संज्ञा

बटपारे, बटपारो
ठग, लुटेरा।
उ.- राधे तेरे नैन किधौं बटपारे-२१९२।
संज्ञा
[हिं. बटपार]

बटमार
ठग, लुटेरा।
संज्ञा
[हिं. बट + मारना]

बटला
बड़ी बटलोई।
संज्ञा
[सं. वर्तुल, प्रा. बट्टुल]

बटली, बटलोई
पतीली।
संज्ञा
[हिं. बटला]

बटवार
राह-बाट का पहरेदार।
संज्ञा
[हिं. बाट + वाला]

बटवार
राह का कर वसूलनेवाला।
संज्ञा
[हिं. बाट + वाला]

बटा
गोल वस्तु।
संज्ञा
[सं. वटक]

बटाक
ऊँचा, बड़ा।
वि.
[हिं. बड़ा]

बटाना
(मेह) बंद हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. बटाना]

बटान्यो
(मेह) बंद हो गया।
उ.- सात दिवस जल बरषि बटान्यो आवत चल्यो ब्रजहि अत्रावत।
क्रि. अ.
[हिं. बटाना]

बटिया
छोटा गोला।
संज्ञा
[हिं. बटा]

बटिया
लोढ़िया।
संज्ञा
[हिं. बटा]

बटी
गोली
संज्ञा
[सं. वटी]

बटी
बड़ी (खाद्य)।
संज्ञा
[सं. वटी]

बटी
वाटिका, उपवन।
संज्ञा
[सं. बाटी]

बटु
ब्रह्मचारी।
उ.- धरि बटु रूप चले बामन जू अंबुज नयन बिसाला-सारा. ३३३।
संज्ञा
[सं. वटु]

बटुआ
एक तरह की छोटी थैली।
उ.- बटुआ झोरी दंड अधारा इतनेन को आराधै-३२८४।
संज्ञा
[हिं. बटुवा]

बटुआ
बड़ी बटलोई।
संज्ञा
[हिं. बटुवा]

बटेर
एक छोटी चिड़िया।
संज्ञा
[सं. वर्त्तक, प्रा. बट्टा]

बटोई
यात्री, पथिक।
संज्ञा
[हिं. बटोही]

बटोर
जमाव।
संज्ञा
[हिं. बटोरना]

बटोर
ढेर।
संज्ञा
[हिं. बटोरना]

बटोरत
समेटता है, बटोरकर उठाता है।
उ.- कबहूँ मग-मग धूरि बटोरत, भोजन कौं बिलखात-२-२२।
क्रि.स
[हिं. बटोरना]

बटोरन
बिखरी वस्तुओं को समेट कर लगाया, गया ढेर।
संज्ञा
[हिं. बटोरना]

बटोरन
खेतों में बिखरा हुआ दाना जो बटोरा जाय।
संज्ञा
[हिं. बटोरना]

बटोरन
कूड़-कर-कट का ढेर।
संज्ञा
[हिं. बटोरना]

बटोरना
बिखरी चीज को एक स्थान पर एकत्र करना।
क्रि.स
[हिं. बटुरना]

बटोरना
फैली चीज को समेटना।
क्रि.स
[हिं. बटुरना]

बटोरना
इधर-उधर पड़ी चीजों को चुनना।
क्रि.स
[हिं. बटुरना]

बटोरना
इकट्ठा या एकत्र करना।
क्रि.स
[हिं. बटुरना]

बटोहिया, बटोही
यात्री, पथिक, राही।
संज्ञा
[हिं. बाट + वाह (प्रत्य.)]

बट्ट
गोला।
संज्ञा
[हिं. बटा]

बट्ट
गेंद।
संज्ञा
[हिं. बटा]

बट्ट
ऐंठन, मरोड़
संज्ञा
[हिं. बटा]

बट्ट
तौल का बाट।
संज्ञा
[हिं. बटा]

बट्टा
दलाली, दस्तूरी।
उ.- बट्टा काटि कसूर भरम कौ, पोता-भजन भरावै-१-१४२।
संज्ञा
[सं. वार्त्त, प्रा. वाट्ट=बनियाई]

बट्टा
बट्टा कटना- दस्तूरी ले लेना।
मु.

बट्टा
सिक्के आभूषण आदि के बदलने, बेचने या तुड़ाने से कटने वाली कमी।
संज्ञा
[सं. वार्त्त, प्रा. वाट्ट=बनियाई]

बट्टा
खोटे सिक्के के बदलने में बेचने से होनेवाली कमी।
संज्ञा
[सं. वार्त्त, प्रा. वाट्ट=बनियाई]

बट्टा
बट्टा लगना- दाग या कलंक लगना। बट्टा लगाना- दाग या कलंक लगाना।
मु.

बट्टा
घाटा, हानि, टोटा।
संज्ञा
[सं. वार्त्त, प्रा. वाट्ट=बनियाई]

बट्टा
सिल पीसने का लोढ़ा।
संज्ञा
[हिं. बटा=गोला]

बट्टा
ईंट, पत्थर का गोल टुकड़ा।
संज्ञा
[हिं. बटा=गोला]

बट्टाखाता
वह बही या खाता जिसमें डूबी हुई रकम लिखी जाय।
संज्ञा
[हिं. बट्टा + खाता]

बट्टी
छोटा बट्टा, लोढ़िया।
संज्ञा
[हिं. बट्टा]

बटटी
बड़ी टिकिया या टिक्की।
संज्ञा
[हिं. बट्टा]

बठपारिनि
ठग, लुटेरी।
उ.- फंसिहारिनि बठपारिनि हम भईं, आपुन भए सुधर्मा-११६०।
संज्ञा
[हिं. बटपारी]

बड़बोल
बहुत बोलनेवाला, बकवादी।
वि.
[हिं. बड़ा + बोल]

बड़बोल
बढ़-बढ़ कर बोलनेवाला, शेखीखोर।
वि.
[हिं. बड़ा + बोल]

बड़बोला
डींग हाँकनेवाला।
वि.
[हिं. बड़ा + बोल]

बड़भाग, बड़भागि, बड़भागी
भाग्यवान।
उ.- (क) भुजा छौरि उठाई लीन्हें, महर हैं बड़भागि-३८७। (ख) बड़भागी कै सब ब्रजबासी। जिनकैं संग खेलैं अबिनासी-१०-३। (ग) ऊधो, हम आजु भईं बड़भागी-३०१५।
वि.
[हिं. बड़ा + भागी]

बड़रा
आकार में बड़ा।
वि.
[हिं. बड़ा]

बड़राना
नींद में बकना।
क्रि. अ.
[हिं. बर्राना]

बड़री
आकार में बड़ी।
वि.
[हिं. बड़री]

बड़बा, बड़वागि, बड़वाग्नि
समुद्र के भीतर की आग।
संज्ञा
[सं. बड़वाग्नि]

बड़वानल
समुद्र की आग।
संज्ञा
[सं.]

बड़वार
बड़ा, श्रेष्ठ।
वि.
[हिं. बड़ा]

बड़वारी
बड़ाई, महत्व।
संज्ञा
[हिं. बड़वार]

बड़हर, बड़हल
एक वृक्ष।
संज्ञा
[हिं. बड़ा + फल]

बढ़हार
विवाह के पश्चात् वर और बरातियों का भोज।
संज्ञा
[हिं. वर + आहार]

बड़ा
दीर्घ, विशाल।
वि.
[सं. वर्द्धान]

बड़ा
बड़ा घर- बंदीगृह, कारागार।
मु.

बड़ा
अवस्था में अधिक।
वि.
[सं. वर्द्धान]

बड़ा
अवस्था, परिमाण या विस्तार का।
वि.
[सं. वर्द्धान]

बड़ा
पद, मान आदि में अधिक।
वि.
[सं. वर्द्धान]

बड़ा
बड़ा घर- धनी और प्रतिष्ठित घराना।
मु.

बड़ा
गुण, प्रभाव आदि में अधिक।
वि.
[सं. वर्द्धान]

बड़
बकवाद, लाप।
संज्ञा
[अनु.]

बड़
बरगद का पेड़।
संज्ञा
[सं. वट]

बड़
बड़ा, बड़ी।
उ.- (क) हौं बड़ हौं बड़ बहुत कहावत, सूधैं करत न बात-२-२२। (ख) दानव-सुर बढ़ सूर-९-२६। (ग) जाति-पाँति हमहैं बड़ नाहीं-१०-२४५। (घ) खेलत मैं कह छोट-बड़-५८९।
वि.
[हिं. बड़ा]

बड़
पद, शक्ति, अधिकार, मान-मर्यादा में अधिक, श्रेष्ठ।
उ.- हरि के जन सब तैं अधिकारी। ब्रह्मा महादेव तैं को बड़, तिनकी सेवा कछु न सुधारी-१-३४।
वि.
[हिं. बड़ा]

बड़का
बड़ा, बड़ावाला।
वि.
[हिं. बड़ा]

बड़प्पन
बड़ाई, श्रेष्ठता, महत्व, गौरव।
उ.- ताके झुगिया मैं तुम बैठे कौन बड़प्पन पायौ-१-२४४।
संज्ञा
[हिं. बड़ा + पन]

बड़बड़
बकवाद, प्रलाप।
संज्ञा
[अनु.]

बड़बड़ाना
बकवाद करना।
क्रि. अ.
[अनु. बड़बड़]

बड़बड़ाना
झुंझलाहट की स्थिति में धीर-धीरे बकना।
क्रि. अ.
[अनु. बड़बड़]

बड़बड़िया
बकवादी।
वि.
[अनु. बड़बड़]

बड़ा
बड़ा आदमी- (१) धनी। (२) ऊँचे पदवाला।
मु.

बड़ा
किसी बात में बढ़कर।
वि.
[सं. वर्द्धान]

बड़ा
एक खाद्य पकवान।
संज्ञा
[हिं. बटा]

बड़ाइ, बड़ाई
परिमाण या विस्तार में अधिक।
संज्ञा
[हिं. बड़ा + ई]

बड़ाइ, बड़ाई
पद, मान, गौरव में अधिक, बड़प्पन।
उ.-(क) बासुदेव की बड़ी बड़ाई। जगतपति, जगदीस, जगतगुरु, निज भक्तन की सहत ढिठाई-१-३। (ख) राजा छोरि बंदि तैं ल्याए, तिहूँ लोक मैं बिदित बड़ाइ -४९७।
संज्ञा
[हिं. बड़ा + ई]

बड़ाइ, बड़ाई
प्रशंसा।
संज्ञा
[हिं. बड़ा + ई]

बड़ाइ, बड़ाई
महिमा, प्रशंसा, तारीक।
उ.-(क) जहँ-तहँ सुनियत यहै बड़ाई मो समान नहिं आन-१-१४५। (ख) दिन दिन इनकी करौं बड़ाई अहिर गए इतराइ-२५७८।
संज्ञा
[हिं. बड़ा + ई]

बड़ाइ, बड़ाई
बड़ाई देना- आदर करना। बड़ाई मारना- शेखी हाँकना, डींग मारना।
मु.

बड़ाइ, बड़ाई
परिमाण, विस्तार या फैलाव।
संज्ञा
[हिं. बड़ा + ई]

बड़ाबोल
घमंड की बात।
संज्ञा
[हिं. बड़ा + बोलना]

निमि
राजा इक्ष्वाकु के एक पुत्र जिनसे मिथिला का राजवंश चला माना गया है। इनका स्थान मनुष्य की पलकों पर कहा जाता है।
उ.- पलक वोट निमि पर अनखाती यह दुख कहा समाइ - ३४४४।
संज्ञा
[सं.]

निमि
आँख का झपकना, निमेष।
संज्ञा
[सं.]

निमित
के लिए, हेतु, कारण।
उ.- अस्व-निमित उत्तर दिसि कैं पथ गमन धनंजय कीन्हौं - १-२९।
संज्ञा
[सं. निमित्त]

निमित्त
हेतु, लिए, वास्ते, कारण।
उ.- (क) मेरौ बचन मानि तुम लेहु। सिव-निमित्त आहुति जनि देहु - ४-५। (ख) वाहि निमित्त सकल तीर्थ स्नान करि पाप जो भयो सो सब नसाई - १० उ. ५८।
संज्ञा
[सं.]

निमित्तक
जनित, सहेतुक।
वि.
[सं.]

निमिराज
निमिवंशी राजा जनक।
संज्ञा
[सं.]

निमिष
आँख मिचना या झपकना, निमेष।
संज्ञा
[सं.]

निमिष
क्षण भर का समय, पलक मारने भर का समय।
उ.- (क) सूरदास प्रभु आपु बाहुबल कियौ निमिष मैं कीर - ९-१५८। (ख) सूर हरि की निरखि सोभा, निमिख तजत न मात - १०-१००।
संज्ञा
[सं.]

निमिषहूँ
पल भर भी, क्षण मात्र को भी।
उ.- बिमुख भए अकृपा न निमिषहूँ, फिर चितयौं तौ तैंसैं - १-८।
संज्ञा
[सं. निमिष + हूँ (प्रत्य.)]

निमिषित
मिचा या मुँदा हुआ।
वि.
[सं.]

निषेक
गर्भ धारण कराना।
संज्ञा
[सं.]

निषेध
मनाही।
संज्ञा
[सं.]

निषेध
बाधा।
संज्ञा
[सं.]

निषेधक
मना करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

निषेधात्मक
नकारात्मक।
वि.
[सं.]

निष्कंटक
जिसमें बाधा-झंझट न हो।
वि.
[सं.]

निष्कंप
जिसमें कंप न हो, स्थिर।
वि.
[सं.]

निष्कपट
छल-कपट-रहित, सीधा।
वि.
[सं.]

निष्कपटता
निश्छिलता, सरलता।
संज्ञा
[सं.]

निष्कर्म, निष्कर्मा
जो काम में लीन न हो।
वि.
[सं. निष्कर्मन्]

बड़िए
बड़ी ही।
उ.-बड़ो दूत तू बड़ी उमर को बड़िए बुद्धि बड़ोई-३०२२।
वि.
[हिं. बड़ी]

बड़ियाईं
बड़ाई, प्रशंसा।
उ.-प्रभु आज्ञा तैं घर कौं आईं। पुरुष करत तिनकी बड़ियाई-८००।
संज्ञा
[हिं. बड़ाई]

बड़ी
बड़े आकार या विस्तार की।
वि.
[हिं. बड़ा]

बड़ी
पद, मान आदि में अधिक।
वि.
[हिं. बड़ा]

बड़ी
बड़ी बात- बहुत संतोषजनक बात, गनीमत। उ.-बड़ी बात भई कमल पठाए, मानहुँ आपुन जल तैं ल्याए-५८८।
मु.

बड़े
आदर, पद आदि में अधिक।
उ.-(क) बड़े बाप के पूत कहावत ¨¨¨¨¨¨ नंदहु तैं ये बड़े कहैहैं-१०-३१९। (ख) वहाँ जादव पति प्रभु कहियत हमैं न लगत बड़े-३१५१।
वि.
[हिं. बड़ा]

बड़े
बड़े घर की- प्रतिष्ठित और धनी घराने की। उ.-बड़े घर की बहू-बेटी करति बृथा झवारि- ११३५।
मु.

बड़ेरर
बवंडर, चक्रवात।
संज्ञा
[देश.]

बड़ेरा
बड़ा।
वि.
[हिं. बड़ा]

बड़ेरा
प्रधान।
वि.
[हिं. बड़ा]

बड़ेरा
छाजन के बीच की लकड़ी जो लंबाई के बल होती है।
संज्ञा

बड़ेरे
बड़े।
उ.-जे द्रुम सींचि सींचि अपने कर कियो बढ़ाय बड़ेरे-२७२०।
वि.
[हिं. बड़ेरा]

बड़ेरो
बड़ा।
उ.-बनि बनि आवत हैं लाल भाग बड़ेरो मेरे- पृ ३१९ (८९)।
वि.
[हिं. बड़ेरा]

बड़ेरो
आयु या पद में बड़ा।
उ.-मेरो सुत सरदार सबनि कौ बहुतै कान्ह बड़ेरौ-१०-२१५।
वि.
[हिं. बड़ेरा]

बड़ैया
कीर्ति, मान।
उ.-इतने बड़े और नहिं कोऊ इहिं सब देत बड़ैया-२३७४।
संज्ञा
[हिं. बड़ाई]

बड़ोइ
खूब लंबा-चौड़ा अधिक विस्तार का।
वि.
[हिं. बड़ा]

बड़ोइ
अधिक अवस्था का।
उ.- सुनि देवता बड़े, जग-पावन, तू पति या कुल कोइ। पद पूजिहौं, बेगि यह बालक करि दै मोहिं बड़ोइ-१०-५६।
वि.
[हिं. बड़ा]

बड़ौ
बढ़कर, श्रेष्ठ, अधिक, बढ़ा-चढ़ा।
उ.- व्याध, गीध अरू पतित पूतना, तिनतैं बड़ौ जु और-१-१४५।
वि.
[हिं. बड़ा]

बड़ौ
बड़े डील-डौल का, मोटा-ताजा।
उ.- मैया मोहिं बड़ौ करि लै री-१०-१७६।
वि.
[हिं. बड़ा]

बड़ौना
बड़ाई, महिमा।
संज्ञा
[हिं. बड़ापन]

बढ़
अधिक, बड़ा हुआ।
वि.
[हिं. बढ़न]

बढ़
बढ़ती, अधिकता।
संज्ञा

बढ़इयै
बढ़ाइए, वर्द्धित कीजिए।
उ.- सूरदास प्रभु भक्तनि कैं बस, भक्तनि प्रेम बढ़इयै-१-२३९।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ाना]

बढ़ई
लकड़ी को छील और गढ़कर अनेक सामान बनानेवाला।
संज्ञा
[सं. वर्द्धाकि, प्रा. बढ्ढइ]

बढ़त
बढ़ता है।
उ.- पुनि पाछैं-अघ-सिंधु बढ़त है, सूर खाल किन पाटत-१-१०७।
क्रि. अ.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ती
वृद्धि, उन्नति।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना + ती]

बढ़न
वृद्धि, बढ़ती।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना]

बढ़ना
डील-डौल या लंबाई-चौड़ाई में वृद्धि को प्राप्त होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]

बढ़ना
बात बढ़ना- विवाद या झगड़ा होना।
मु.

बढ़ना
गिनती या नाप-तौल में ज्यादा होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]

बढ़ना
बल, प्रभाव या गुण में अधिक होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]

बढ़ना
पद, मर्यादा, अधिकार आदि में अधिक होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]

बढ़ना
स्थान-विशेष से आगे जाना।
क्रि. अ.
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]

बढ़ना
चलने-दौड़ने में आगे हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]

बढ़ना
किसी बात में आगे हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]

बढ़ना
भाव आदि का अधिक हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]

बढ़ना
लाभ होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]

बढ़ना
दूकान आदि बंद होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]

बढ़ना
दीपक का बुझना।
क्रि. अ.
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]

बढ़नी
झाड़ू।
संज्ञा
[सं. वर्द्धनी, प्रा. बड्ढनी]

बढ़यौ
बढ़ा, विस्तार में अधिक हुआ।
उ.- द्रौपदी कौ चीर बढ़यौ, दुस्सासन गारी-१-१७६।
क्रि. अ.
[हिं. बढ़ना]

बढ़वारी
वृद्धि, बढ़ती।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना]

बढ़ाइ, बढ़ाई
बढ़ाकर, अधिक करके।
उ.- मोह्यौ जाइ कनक कामिनि-रस, ममता-मोह बढ़ाई-१-१४७।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ाना]

बढ़ाइ, बढ़ाई
विस्तृत की (भूत.)।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ाना]

बढ़ाऊँ
विस्तृत करूँ, आकार में बढ़ाऊँ।
उ.- मोहन-मुर्छन-बसीकरन पढ़ि, अगमिति देह बढ़ाऊँ-१०-४९।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ाना]

बढ़ाए
बढ़ाया, वृद्धि की।
उ.- हरष नँदराइ कैं मन बढ़ाए-५८७।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ाना]

बढ़ायौ
वृद्धि की।
उ.- गुरू बसिष्ठ अरू मिलि सुमंत सौं अति हीं प्रेम बढ़ायौ-९-५५।।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ाना]

बढ़ाना
लम्बाई-चौड़ाई या डील-डौल में अधिक करना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ाना
बात बढ़ाना- (१) अत्युक्तिपूर्वक कुछ कहना। (२) झगड़ा या विवाद करना।
मु.

बढ़ाना
गिनती या नाप-तौल में अधिक करना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ाना
बल, प्रभाव या गुण में अधिक करना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ाना
पद, मर्यादा, अधिकार आदि में अधिक करना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ाना
स्थान-विशेष से आगे कर देना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ाना
चलने, दौड़ने में आगे कर देना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ाना
किसी बात में आगे कर देना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ाना
भाव आदि को बढ़ा देना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ाना
फैलाना, विस्तार करना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ाना
दूकान आदि बंद करना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ाना
फैलाना, लंबा करना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ाना
दीपक बुझाना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ाना
चुकना, समाप्त होना।
क्रि. अ.

बढ़ाने
समाप्त हो गये, चुक गये।
उ.-मेघ सबै जल बरषि बढ़ाने, बिवि गुन गए सिराई-९६७।
क्रि.प्र.
[हिं. बढ़ाना]

बढ़ाली
कटार, कटारी।
संज्ञा
[देश.]

बढ़ाव
बढ़ाती है।
उ.-जाकौ सिव-बिरंचि सनकादिक मुनिजन ध्यान न पाव। सूरदास जसुमति ता सुत हित, मन अभिलाष बढ़ाव-१०-७५।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ाना]

बढ़ाव
बढ़ने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना + आव]

बढ़ाव
विस्तार, फैलाव।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना + आव]

बढ़ाव
अधिकता।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना + आव]

बढ़ाव
उन्नति।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना + आव]

बढ़ावत
बढ़ाते हैं।
उ.-छज्जे महलन देखि कै मन हरष बढ़ावत -२५६०।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ावना]

बढ़ावति
बढ़ाती है।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ावना]

बढ़ावति
बढ़ावति रारि- झगड़ा बढ़ाती है, विवाद करती है। उ.-बादति है बिन काज हीं बृथा बढ़ावति रारि-५८९।
मु.

बढ़ावना
वृद्धि करना, बढ़ाना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ाना]

बढ़ावा
प्रोत्साहन।
संज्ञा
[हिं. बढ़ाव]

बढ़ावै
परिमाण या मात्रा में अधिक किया।
उ.-ऐसौ और कौन करुनामय, बसन-प्रवाह बढ़ावै-१-१२२।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ाना]

बढ़ि
वृद्धि पाकर।
क्रि. अ.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ि
बढ़ि गयौ-डील-डौल में अधिक हो गया।
उ.-पुनि कमंडल धरयौ, तहाँ सो बढ़ि गयौ -८-१६।
प्र.

बढ़ि
कहन लगीं बढ़ि बात- घमण्डभरी या इतरानेवाली बात कहने लगीं, छोटे मुँह बड़ी बात कहने लगीं। उ.-कहन लगीं अब बढ़ि बढ़ि बात। ढोटा मेरौ तुमहिं बँधायौ, तनकहिं माखन खात-३५५।
मु.

बढ़िया
अच्छा, उत्तम।
वि.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ी
परिमाण, विस्तार या फैलाव में अधिक हो गयी।
उ.-बीच बढ़ी जमुना जलकारी-१०-११।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ै
बढ़ जाय, वृद्धि को प्राप्त हो।
उ.-(क) अज्ञानी-सँग बढ़ै अज्ञान-४-२। (ख) कजरी कौ पय पियहु लाल, जासौं तेरी बेनि बढ़ै-१०-१७४।
क्रि. अ.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ैया
लकड़ी का काम करनेवाला, बढ़ई।
उ.-पालनौ अति सुंदर गढ़ि ल्याउ रे बढ़ैया-१०-४१।
संज्ञा
[हिं. बढ़ई]

बढ़ैया
बढ़नेवाला।
वि.
[हिं. बढ़ना, बनाना]

बढ़ैया
बढ़ानेवाला।
वि.
[हिं. बढ़ना, बनाना]

बढ़ैहैं
बढ़ायेँगे।
उ.-पचऐं बुध कन्या कौ जौ है, पुत्रनि बहुन बढ़ै हैं-१०-८६।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ाना]

बढ़ैहै
बढ़ायेगी।
उ.-गुप्त प्रीति काहै न करी हरि सों प्रगट किंए कछु नफा बढ़ै है-११९२।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]

बढ़ोतरी
वृद्धि, उन्नति।
संज्ञा
[हिं. बढ़ + उतर]

बढ़्यौ
अधिक प्रबल हो गया, बल और प्रभाव में अधिक हो गया।
उ.-हिरनकस्यप बढ़्यौ उदय अरु अस्त लौं-१-५।
क्रि. अ.
[हिं. बढ़ना]

बणिक
व्यापार करनेवाला, बनिया।
संज्ञा
[सं.]

बणिक
बेचनेवाला, विक्रेता।
संज्ञा
[सं.]

बत
बात (यौगिक शब्द प्रयोग)।
संज्ञा
[हिं. बात]

बतकहाव
बातचीत।
संज्ञा
[हिं. बात + कहाव]

बतकहाव
कहा-सुनी, तर्क-कुतर्क, विवाद।
संज्ञा
[हिं. बात + कहाव]

बतकही
बातचीत।
संज्ञा
[हिं. बात + कहना]

बतख
एक बड़ी चिड़िया।
संज्ञा
[अ.बत]

बतचल
बकवादी, बकनेवाला, वक्की।
उ.-जानी जात सूर हम इनकी, बतचल चंचल लोल-३२६५।
वि.
[हिं. बात + चलना]

बतबढ़ाव
कहासुनी, विवाद।
संज्ञा
[हिं. बात + बढ़ाव]

बतरस
बात करने का आनन्द।
संज्ञा
[हिं. बात + रस]

बतराति
बात करती है।
उ.-हम जानी अब बात तुम्हारी सुधे नहिं बतराति-१०८७।
क्रि.प्र.
[हिं. बातराना]

बतरान
बातचीत।
संज्ञा
[हिं. बातराना]

बतराना
बात करना।
क्रि.प्र.
[हिं. बात + आना]

निष्कर्म, निष्कर्मा
निकम्मा।
वि.
[सं. निष्कर्मन्]

निष्कर्मण्य
अयोग्य, निकम्मा।
वि.
[सं.]

निष्कर्ष
तत्व, सार, सारांश।
संज्ञा
[सं.]

निष्कलंक, निष्कलंकित, निष्कलंकी
कलंक या दोषरहित।
वि.
[सं. निष्कलंक]

निष्कल
कलाहीन।
वि.
[सं.]

निष्कल
अंगहीन।
वि.
[सं.]

निष्कल
वीर्यहीन, वृद्ध
वि.
[सं.]

निष्कल
सारा, समूचा।
वि.
[सं.]

निष्काम
कामनारहित, आसक्तरहित, निस्वार्थ।
उ.- यम, नियमासन, प्रानायाम। करि अभ्यास होइ निष्काम-२-२१।
वि.
[सं.]

निष्काम
(काम) जो निस्वार्थ भाव से किया जाय।
वि.
[सं.]

बतरौहाँ
बात करने की चाह रखनेवाला।
वि.
[हिं. बात]

बतरौहाँ
बात करता हुआ।
वि.
[हिं. बात]

बतलाना
कहना, बताना।
क्रि. स.
[हिं. बताना]

बतलाना
बातचीत करना।
क्रि. अ.

बताइ
कहना, सूचित करना।
क्रि. स.
[हिं. बताना]

बताइ
देहु बताई- बता दो, सूचित करो।
उ.-तुम बिनु साँकरैं को काकौ। तुम हीं देहु बताइ देवमनि, नाम लेउँ धौं ताकौ-१-११३।
प्र.

बताई
सूचित किया, जताया, निर्देश दिया।
उ.-मन-बच-क्रम हरि-नाम हृदय धरि, ज्यौं गुरु बेद बताई-१-३१८।
क्रि. स.
[हिं. बताना]

बताउ
बताओ, सूचित करो, जनाओ।
उ.-को करि सकै बराबरि मेरी, सो धौं मोहिं बताउ-१-१४५।
क्रि. स.
[हिं. बताना]

बताऊँ
कहूँ, जानकारी कराऊँ सूचित करूँ।
उ.-अंबर जहाँ बताऊँ तुमकौं, तौ तुम कहा देहुगी हमकौं-७९९।
क्रि. स.
[हिं. बताना]

बतात
बताते हो या बात करते हो।
उ.-टेढ़ै कहा बतात, कंस कौं देहु कमल अब। काल्हिहिं पठए माँगि पुहुप अब ल्याइ देहु जब-३८९।
क्रि. अ.
[हिं. बताना]

बताना
कहना, कहंकर सूचित करना।
क्रि. स.
[हिं. बात + ना]

बताना
समझाना-बुझाना।
क्रि. स.
[हिं. बात + ना]

बताना
दिखाना, निर्देश करना।
क्रि. स.
[हिं. बात + ना]

बताना
काम के लिए कहना।
क्रि. स.
[हिं. बात + ना]

बताना
नाचने-गाने में भाव प्रकट करना।
क्रि. स.
[हिं. बात + ना]

बताना
दण्ड देकर ठीक रास्ते पर
क्रि. स.
[हिं. बात + ना]

बताना
बोलना।
क्रि. अ.

बतानी
बोली, आवाज दी।
उ.-नंद महर घर के पिछवारे राधा आइ बतानी हो-१५५६।
क्रि. अ.
[हिं. बताना]

बतायौ
दिखाया, प्रर्दशित या निर्देशित किया।
उ.-मंद धरनि तब मथि दह्यौ, इहि भाँति बतायौ-७१६।
क्रि. स.
[हिं. बताना]

बतावत
संकेत करता है, संकेत से बात करता है।
उ.-चितै रहै तब आपुन ससि-तन, अपने कर लै लै जु बतावत -१०-१८८।
क्रि. स.
[हिं. बताना]

बतावति
सूचित करती हे, निर्देश देती है, जताती है, दिखाती है।
उ.-प्रात समय रवि-किरनि-कोंवरी, सो कहि, सुतहिं बतावति है-१०-७३।
क्रि. स.
[हिं. बताना]

बतावति
कहती या बताती है।
उ.-कबहुँ कहति बन गए, कंबहुँ कहि घरहिं बतावति-५८९।
क्रि. स.
[हिं. बताना]

बतावै
बताता है, सूचित करता है, जताता है।
उ.-अहंकार पटवारी कपटी, झूठी लिखत बही। लागै धरम, बतावै अधरम, बाकी सबै रही-१-१८५।
क्रि. स.
[हिं. बताना]

बतावै
संगीत या नृत्य के भाव बताता है।
उ.-कबहुँक आगे कबहुँक पाछे नाना भाव बतावै-८७७।
क्रि. स.
[हिं. बताना]

बतावौ
बताओ, कहो, सूचित करो।
उ.-कत ब्रीड़त कोउ और बतावौ, ताही के ह्वै रहिये-१-१३६।
क्रि. स.
[हिं. बताना]

बतास
वायु, हवा।
उ.-जबतैं जनम भयौ है तेरौ, तबहिं तैं यह भाँति लला रे। कोउ आवति जुवती मिस करिकै, कोउ लै जात बतास-कला रे-६०८।
संज्ञा
[सं. वातासह]

बतास
वात-रोग, गठिया।
संज्ञा
[सं. वातासह]

बतासा
एक तरह की मिठई।
संज्ञा
[हिं. बतास=हवा]

बतासा
बुलबुला, बुदबुद।
संज्ञा
[हिं. बतास=हवा]

बतासा
बतासा सा घुलना- (१) शीघ्र नष्ट होना (कोसना, घाली)। (२) क्षीण होते जाना।
मु.

बतासे
बहुत से बतासे।
उ.-तिल चाँवरी बतासे, मेवा दियौ कुँवरि की गोद -७०४।
संज्ञा
[हिं. बतासा]

बतिअन, बतिअनि
केवल बातों से, कोरा उपदेश देकर।
उ.-बतिअन सब कोऊ समुझावै-३३८१।
संज्ञा
[हिं. बात]

बतियाँ
बात, बचन।
उ.-वै बतियाँ छतियाँ लिखि राखीं जे नँदलाल कहीं-२८९९।
संज्ञा
[हिं. बात]

बतियाँ
कहत बनाइ बतियाँ- सिर्फ बात करने से, कोरी चर्चा से। उ.-कहत बनाइ दीप की बतियाँ, कैसैं धौ तम नासत-२-२५। झूँठी बतियाँ जोरि- मनमानी बातें गढ़कर। उ.-उरहन लै जुवती सब आवतिं झूँठी बतियाँ जोरि-८६८।
मु.

बतिया
छोटा कच्चा फल।
संज्ञा
[सं. वर्त्तिका, प्रा. बत्तिआ]

बतियाना
बातचीत करना।
क्रि. अ.
[हिं. बात]

बतियार
बातचीत।
संज्ञा
[हिं. बात]

बतू
रेशम पर बटा हुआ सोने-चाँदीका तार।
संज्ञा
[हिं. कलाबतू]

बतीस
बत्तीस।
उ.-द्वै पिक बिंब बतीस बज्र कन एक जलज पर थात-१६८२।
वि.
[हिं. बत्तीस]

बतैए
बताइए, समझाइए।
उ.-जेहि उपदेश मिलैं हरि हमको सो ब्रत-नेम बतैए-३१२४।
क्रि. स.
[हिं. बताना]

बत्तीसी
बत्तीसी झड़ जाना (पड़ना)- सब दाँत गिर जाना। बत्तीसी दिखान- हँसना। बत्तीसी बजना- दाँत किटकिटाना।
मु.

बत्यावई
बातचीत करती है, बतियाती है।
उ.-जसुमति भाग-सुहा-गिनी, हरि कौं सुत जानै। मुख-मुख जोरि बत्यावई, सिसुताई ठानै-१०-७२।
क्रि. अ.
[हिं. बात, बतियाना]

बत्स
बछड़ा।
संज्ञा
[सं. वत्स]

बत्स
बालक।
संज्ञा
[सं. वत्स]

बत्सल
अत्यन्त स्नेहवान् या कृपालु।
उ.-भक्त-बत्सल कृपानाथ, असरन-सरन, भार-भूतंल हरन जस सुहायौ-१-११९।
वि.
[सं. वत्सल]

बत्सलता
प्रेम, स्नेह।
संज्ञा
[सं. वत्सल + हिं. ता]

बत्सलता
दया, कृपा।
उ.-सूर भक्त-बत्सलता बरनौं, सर्व कथा कौ सार-१-२६७।
संज्ञा
[सं. वत्सल + हिं. ता]

बत्सासुर
कंस का अनुचर एक राक्षस जो श्रीकृष्ण द्वारा मारा गया था।
संज्ञा
[सं. वत्सासुर]

बथान
गो-गृह।
संज्ञा
[सं. वत्स + स्थान]

बथुआ
एक साग।
उ.-बथुआ भली भाँति रचि राँध्यौ-२३२१।
संज्ञा
[सं. वांस्तुक, पा. बात्थुअ]

बतैहैं
बतायेँगे।
क्रि. स.
[हिं. बताना]

बतैहैं
कहा बतैहैं- क्या उत्तर देंगे, कैसे अस्वीकार करेंगे। उ.-खायो खेले संग हमारे याको कहा बतैहैं-३४३६।
मु.

बतौर
रीति से।
क्रि. वि.
[अ.]

बतौर
समान।
क्रि. वि.
[अ.]

बत्ती
सूत, रुई, कपड़े आदि का बटा हुआ टुकड़ा जो दीपक में जलाया जाता है।
संज्ञा
[सं. वर्त्ति, प्रा. बत्ति]

बत्ती
दीपक।
संज्ञा
[सं. वर्त्ति, प्रा. बत्ति]

बत्ती
पलीता।
संज्ञा
[सं. वर्त्ति, प्रा. बत्ति]

बत्ती
फूस का पूला।
संज्ञा
[सं. वर्त्ति, प्रा. बत्ति]

बत्तीसी
बत्तीस का समूह।
संज्ञा
[हिं. बत्तीस]

बत्तीसी
मनुष्य के दाँत जो बत्तीस होते हैं।
संज्ञा
[हिं. बत्तीस]

बद
बुरा।
वि.
[फ़ा.]

बद
दुष्ट, नीच।
वि.
[फ़ा.]

बद
बदला, एवज।
संज्ञा
[सं. वर्त]

बद
बद में- बदले में, स्थान पर। उ.-गुरुगृह जब हम बन को जात। तुरत हमारे बद में लकरी लावत सहि दुख गात।
मु.

बद
ठहराकर, स्थिर करके।
क्रि. स.
[हिं. बदना]

बद
बद कर (काम करना)- (१) दृढ़ता या हठ के साथ। (२) ललकारकर, चुनौती देकर। बदकर कहना- पूरी दॄढ़ता से कहना।
मु.

बदत
गिनती में लाता है, समझता है, मानता है, बड़ा या महत्व का ख्याल करता है।
उ.-(क) सब तजि तुम सरनागत आयौ, द्दढ़ करि चरन गहे रे। तुम प्रताप बल बदत न काहूँ, निडर भए घर-चेरे-१-१७०। (ख) सब आनंद-मगन गुवाल, काहूँ बदत नहीं-१०-२४। (ग) बदत काहू नहीं निधरक निदरि मोहिं न गनत।
क्रि. स.
[हिं. बदना]

बदत
कहते हैं, वर्णन करते हैं, गाते हैं।
उ.-मनौ बेद-बंदीजन सूत-बृंद मागध-गन, बिरद बदत जै जै जै जैति कैटभारे-१०-२०५।
क्रि. स.
[हिं. बदना]

बदति
समझती या मानती है।
उ.-जोबनदान लेउँ गो तुमसों। जाके बल तुम बदति न काहुहि कहा दुरावति मोसों।
क्रि. स.
[हिं. बदना]

बदन
शरीर, देह।
संज्ञा
[फ़ा.]

बदबू
दुर्गन्ध।
संज्ञा
[फ़ा.]

बदमाश
दुष्ट।
वि.
[फ़ा. बद + अ. मआश]

बदमाशो
दुष्टता, नीचता।
संज्ञा
[हिं. बदमाश]

बदरंग
बुरे या भद्दे रंग का।
वि.
[फ़ा.]

बदरंग
जिसका रंग बिगड़ गया हो।
वि.
[फ़ा.]

बदर
बेर का पेड़ या फल।
संज्ञा
[सं.]

बदरन, बदरनि
मेघ, बादल।
उ.- देखौ माई, बदरनि की बरियाई-९८५।
संज्ञा
[हिं. बादल]

बदरा
बादल, मेघ।
संज्ञा
[हिं.]

बदराह
दुष्ट, कुमार्गी।
वि.
[फ़ा.]

बदरि
बेर का पेड़ या फल।
संज्ञा
[सं.]

बदन
मुख।
उ.-गोपिनि के सों बदन निहारै-१०-३।
संज्ञा
[सं. वदन]

बदना
कहना, वर्णन करना।
क्रि. स.
[सं. वद = कहना]

बदना
स्वीकार करना।
क्रि. स.
[सं. वद = कहना]

बदना
स्थिर करना।
क्रि. स.
[सं. वद = कहना]

बदना
भाग्य में बदना- भाग्य में लिखा होना। काम करने को बदना- दृढ़ता के साथ काम करने को कहना।
मु.

बदना
बाजी या शर्त लगाना।
क्रि. स.
[सं. वद = कहना]

बदना
कुछ समझना, महत्व का मानना।
क्रि. स.
[सं. वद = कहना]

बदनाम
कलंकित, निंदित।
वि.
[फ़ा.]

बदनामी
कलंक, निंदा।
संज्ञा
[फ़ा.]

बदनिंयाँ
छोटा मुख।
उ.-निरखति ब्रज-जुवती सब ठाढ़ी, नंद-सुवन-छबि चंद-बदनियाँ-१०-१०६।
संज्ञा
[सं. वदन]

बदरिकाश्रम, बदरिकीसरम
हिमालय पर स्थित वैष्णवों का एक श्रेष्ठ तीर्थ। यहाँ नर-नारायण और व्यास का आश्रम है। एक श्रृंग पर बदरी (बेर) वृक्ष होने के कारण इसका यह नाम पड़ा कहा जाता है।
संज्ञा
[सं. बदरिकाश्रम]

बदरिआ, बदरिया, बदरी
छाये हुए बादल, बादल।
उ.- (क) बदरिआ बधन बिरहिनी आई-२८२१। (ख) जोबन-धन है दिवस चारि को ज्यों बदरी की छाहीं-२१९४।
संज्ञा
[हिं. बदली]

बदरी
बेर का पेड़ या फल।
संज्ञा
[सं.]

बदरीनाथ
बदरिकाश्रम तीर्थ।
संज्ञा
[सं.]

बदरीनायण
नारायण जिनकी मूर्ति बदरिकाश्रम में है।
संज्ञा
[सं.]

बदरौह
बदचलन, कुमार्गी।
वि.
[फ़ा. बन + रौ]

बदरौह
बदली का आभास।
संज्ञा
[हिं. बादर + औंह]

बदरौला
वृषभानु की एक दासी।
उ.- नारि बदरौला रही बृषभानु घर रखवारि-९७९।
संज्ञा
[देश.]

बदल
हेर-फेर।
संज्ञा
[अ.]

बदल
पलटा, एवज।
संज्ञा
[अ.]

निष्क्रियता
निष्क्रिय होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

निष्ठ
स्थित।
वि.
[सं.]

निष्ठ
तत्पर, संलग्न।
वि.
[सं.]

निष्ठा
स्थिति, ठहराव।
संज्ञा
[सं.]

निष्ठा
चित्त जमना।
संज्ञा
[सं.]

निष्ठा
विश्वास।
संज्ञा
[सं.]

निष्ठा
श्रद्धा-भाव, पूज्य बुद्धि।
संज्ञा
[सं.]

निष्ठा
ज्ञान की अंतिम अवस्था जब ब्रह्म और आत्मा की एकता हो जाती है।
संज्ञा
[सं.]

निष्ठावान
जिसमें श्रद्धा-भाव हो।
वि.
[सं. निष्ठा]

निष्ठुर
कड़ा।
वि.
[सं.]

बदलो, बदलौ
पलटा, एवज।
उ.- (क) ताहि सूल पर सूली दयौ। ताकौ बदलौ तुमसौ लयौ-३-५। (ख) जेते मान सेवा तुम कीन्ही, बदलो दयो न जात-२६५७। (ग) हमसों बदलो लेन उठि धाए मनो धारि कर सूप-३१८२।
संज्ञा
[हिं. बदलना]

बदलो, बदलौ
परिवर्तन करो।
उ.- ते अब कहत जटा माथे पर बदलो नाम कन्हाई-३१०६।
क्रि. स.
[हिं. बदलना]

बदलौवल
हेर-फेर।
संज्ञा
[हिं. बदलना]

बदसूरत
कुरूप।
वि.
[फ़ा. बद + सूरत]

बदावदी
लागडाँट, होड़।
संज्ञा
[हिं. बदना]

बदाम
एक मेवा, बादाम।
उ.- खारिक, दाख, चिरौंजी, किसमिस, उज्वल गरी बदाम-८१०।
संज्ञा
[फ़ा. बादाम]

बदामी
बादाम के रंग का।
वि.
[हिं. बदाम]

बदि
बदला, एवज, पलटा।
संज्ञा
[सं. वर्त]

बदि
बदले या पलटे में।
अव्य.

बदि
लिए।
अव्य.

बदलना
हेर-फेर होना।
क्रि. अ.
[अ. बदल +ना]

बदलना
एक के स्थान पर दूसरा होना।
क्रि. अ.
[अ. बदल +ना]

बदलना
एक के स्थान पर दूसरा नियुक्त होना।
क्रि. अ.
[अ. बदल +ना]

बदलना
हेर-फेर करना।
क्रि. स.

बदलना
एक के स्थान पर दूसरा करना, कहना या रखना।
क्रि. स.

बदलना
विनिमय करना।
क्रि. स.

बदलवाना
बदलने का काम कराना।
क्रि. स.
[हिं. बदलना]

बदला
परस्पर लेना-देना, विनिमय।
संज्ञा
[हिं. बदलना]

बदला
हानि की पूर्ति-रूप में उपस्थित की गयी वस्तु।
संज्ञा
[हिं. बदलना]

बदला
पलटा, एवज।
संज्ञा
[हिं. बदलना]

बदला
प्रतीकार।
संज्ञा
[हिं. बदलना]

बदला
प्रतिफल, नतीज।
संज्ञा
[हिं. बदलना]

बदलाना
बदलने का काम कराना।
क्रि. स.
[हिं. बदलना]

बदलि
एक वस्तु देकर दूसरी वस्तु लेकर, विनिमय करके, परवर्तन करके।
उ.- इते मान यह सूर महा सठ, हरि-नग बदलि, विषय विष आनत-१-११४।
क्रि. अ.
[हिं. बदलना]

बदली
बदल गयी, भिन्न हो गयी परिवर्तित हो गयी।
उ.- मदनगोपाल बिना या तन की सबै बात बदली-२७३४।
क्रि. अ.
[हिं. बदल

बदली
छाये हुए बादल।
संज्ञा
[हिं. बादलना]

बदली
तबदीली, तबादला।
संज्ञा
[हिं. बदला]

बदले
एक के स्थान पर दूसरे को रखना।
उ.- चढ़ि सुख-आसन नृपति सिधायौ। तहाँ कहार एक दुख पायौ। भरत पंथ पर देख्यौ खरौ। वाकैं बदले ताकौं धरौ-५-४।
संज्ञा
[हिं. बदला]

बदले
विनिमय।
उ.- मूरा के पातन के बदले को मुक्ताहल दैहै-३१०५।
संज्ञा
[हिं. बदला]

बदलैं
बदले में, स्थान पर, स्थान की पूर्ति में।
उ.- (क) दच्छ-सीस जो कुंड मैं जरयौ। ताके बदलैं अज-सिर धरयौ-४-५। (ख) मम कृत इनके बदलैं लेहु। इनके कर्म सकल मोहिं देहु-७-२।
संज्ञा
[हिं. बदला]

बदिहै
मानेगी, स्वीकार करेगी।
उ.- मेरो प्रगट कह्यौ बदिहै ब्रज ही देउँ पठाइ-२९१३।
क्रि. स.
[हिं. बदना]

बदिहौं
मानूँगा, स्वीकार करूँगा, सकारूँगा।
उ.- जानिहौं अब बाने की बात। मोसौं पतित उधारौ प्रभु जौ, तौ बदिहौं निज तात-१-१७९।
क्रि. स.
[हिं. बदना]

बदी
कृष्ण पक्ष, अन्धेरा पाख।
संज्ञा
[देश.]

बदी
बुराई, अपकार।
संज्ञा
[फ़ा.]

बदी
निश्चित की, ठहराई, स्थिर करके।
उ.- (क) स्याम गए बदि अवधि सखी री। (ख) नैननि होड़ बदी बरसा सों-३४५७।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बदौलत
कृपा से।
क्रि. वि.
[फ़ा.]

बदौलत
कारण से।
क्रि. वि.
[फ़ा.]

बद्दर, बद्दल
बादल।
संज्ञा
[हिं. बादल]

बद्ध
बँधा हुआ।
वि.
[सं.]

बद्ध
अज्ञान में फँसा हुआ।
वि.
[सं.]

बधत
मार डालता है, बधता है, हत्या करता है।
उ.- जैसैं मगन नाद-रस सारँग, बधत बधिक बिन बान-१-१६९।
क्रि. स.
[हिं. बधना]

बधन
बध, हनन, हत्या।
उ.-बालक करि इनकौं जनि जान्यौ, कंस बधन येई करिहैं-१०-८५।
संज्ञा
[सं. बध]

बधना
हत्या करना।
क्रि. स.
[सं. बध + ना]

बधना
टोंटीदार लोटा।
संज्ञा
[सं. वर्द्धन]

बधाइ, बधाई
वृद्धि, बढ़ती।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना, बढ़ाई]

बधाइ, बधाई
जन्म या मंगल अवसर का आनन्द या गाना बजाना।
उ.-(क) रिषभदेव तब जनमें आइ। राजा कैं गृह बजी बधाइ-५-२। (ख) महरि जसोदा ढोटा जायौ, घर घर होति बधाई-१०-२१। (ग) आजु गृह नंद महर कैं बधाइ-१०३३।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना, बढ़ाई]

बधाइ, बधाई
खुशी, चहल-पहल।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना, बढ़ाई]

बधाइ, बधाई
पुत्र-जन्म पर माता-पुता को आनन्द-सूचक संदेश, मुबारकबाद।
उ.-सुत के भऐं बधाई पाई-१०-३२३।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना, बढ़ाई]

बधाइ, बधाई
शुभ अवसर पर इष्ट-मित्र को दिया जानेवाला संदेश।
एक परस्पर देत बधाई एक उठत हँसि गाइ-१०-२०।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना, बढ़ाई]

बधाइ, बधाई
शुभ या मंगल अवसर पर दिया जानावाला उपहार।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना, बढ़ाई]

बद्ध
जिस पर रोक या प्रतिबंध हो।
वि.
[सं.]

बद्ध
व्यवस्थित, परिमित।
वि.
[सं.]

बद्ध
निर्धारित।
वि.
[सं.]

बद्ध
बैठा या जमा हुआ।
वि.
[सं.]

बद्ध
सटा या जुड़ा हुआ।
वि.
[सं.]

बद्धपरिकर
कमर कसे, तैयार।
वि.
[सं.]

बद्धमूल
जमी जड़ का, दृढ़।
वि.
[सं.]

बद्धी
रस्सी, तसमा।
संज्ञा
[सं. बद्ध]

बध
हनन, हत्या।
संज्ञा
[सं.]

बधक
बध करनेवाला।
वि.
[सं.]

बधिरता
बहरापन।
संज्ञा
[सं.]

बधी
हत्या की।
क्रि. स.
[हिं. बधना]

बधू
नव विवाहिता स्त्री, दुलहन।
संज्ञा
[सं. वधू]

बधू
पत्नी, भार्या।
उ.-जितनी लाज गुपालहिं मेरी। तितनी नाहिं बधू हौं जिनकी, अंबर हरत सबनि तन हेरी-१-२५२।
संज्ञा
[सं. वधू]

बधू
स्त्री, नारी।
उ.-(क) ज्यौं दूती पर-बधू भोरि कै, लै पर-पुरुष दिखावै-१-४२। (ख) भोर होत उरहन लै आवतिं, ब्रज की ब अधूकने-३७७।
संज्ञा
[सं. वधू]

बधू
अवस्था और पद में छोटे पुरुष की पत्नी।
संज्ञा
[सं. वधू]

बधूटी
नव बधू।
संज्ञा
[सं. वधूटी]

बधूटी
पुत्र की स्त्री, पतोहू।
संज्ञा
[सं. वधूटी]

बधूटी
सौभाग्यवती स्त्री।
संज्ञा
[सं. वधूटी]

बधूरा
अंधड़, बवंडर।
संज्ञा
[हिं. बहुधूर]

बधैया
पुत्र-जन्म के शुभ अवसर पर हर्ष-सूचक वचन या संदेश।
उ.-सूरदास प्रभु की माइ जसुमति, पितु नँदराइ, जोइ जोइ माँगत सोइ देत हैं बधैया-१०-४१।
संज्ञा
[हिं. बधाई]

बधैया
मंगलाचार।
उ.-गोपी-ग्वाल करत कौतूहल, घर-घर बजति बधैया-१०-१५५।
संज्ञा
[हिं. बधाई]

बध्य
मारने के योग्य।
वि.
[सं.]

बन
कानन, जंगल।
संज्ञा
[सं. वन]

बन
होत जो बन को रोयो- ऐसी बात या प्रकार जिस पर कोई ध्यान न दे। उ.-कत श्रम करत सुनत को इहाँ है, होत जो बन को रोयो-३०२१।
मु.

बन
समूह।
संज्ञा
[सं. वन]

बन
जल, पानी।
संज्ञा
[सं. वन]

बन
बांग, बगीचा।
संज्ञा
[सं. वन]

बन
कपास का पेड़।
संज्ञा
[सं. वन]

बनए
बनाये।
उ.-मनौ। बिवि मरकत बीच महानग चतुर नारि बनए-९८४।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बधाए
मंगलचार।
उ.-घर घर होत अनंद बधाए, जहँ तहँ मगध-सूत-१०-३६।
संज्ञा
[हिं. बधाई]

बधाना
बध कराना।
क्रि. स.
[हिं. बध]

बधाया, बधायो
बधाई।
संज्ञा
[हिं. बधाई]

बधाया, बधायो
बध कराया।
उ.-ए दोउ नीर खीर निरवारत इनहिं बधायो कंस-३०४९।
क्रि. स.
[हिं. बधाना]

बधावन, बधावना, बधावा
आनन्द-मंगल, मंगलाचार।
उ.-(क) बनि ब्रजसुंदरि चलीं, सु गाई बधावन रे-१०-२८। (ख) हरषि बधावा मन भयौ (हो) रानी जायौ पूत-१०-४०।
संज्ञा
[हिं. बधाई]

बधावन, बधावना, बधाना
मंगलोत्सव आदि का उपहार।
संज्ञा
[हिं. बधाई]

बधिक
वध करनेवाला।
संज्ञा
[सं. वध]

बधिक
प्राण लेनेवाला, जल्लाद।
संज्ञा
[सं. वध]

बधिक
व्याध, बहेलिया।
संज्ञा
[सं. वध]

बधिर
बहरा।
संज्ञा
[सं.]

बनक
बनावट, सजधज।
संज्ञा
[हिं. बनना]

बनक
बाना, भेस, वाश।
संज्ञा
[हिं. बनना]

बनक
बन की उपज।
संज्ञा
[सं. वन + क]

बनकोरा, वनकौरा
लोनिया का साग।
उ.-बनकौरा पिंडीक चिचिंडी-३९६।
संज्ञा
[देश.]

बनखंडी
बनवासी।
[हिं. बन + खंड]

बनचर
जंगली पशु।
संज्ञा
[सं. वनचर]

बनचर
जंगली मनुष्य।
संज्ञा
[सं. वनचर]

बनचर
जल के जीव।
संज्ञा
[सं. वनचर]

बनचारी
बनवासी।
उ.-तात बचन लगि राज तज्यौ तिन अनुज घरनि सँग भए बनचारी-१०-१९८।
संज्ञा
[सं. वनचारिन्]

बनचारी
बन के जीव।
संज्ञा
[सं. वनचारिन्]

निष्कामता
निष्काम होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

निष्कामी
व्यक्ति जो कामना या आसक्तिरहित हो।
उ.- निष्कामी बैकुंठ सिधावै। जनम-मरन तिहिं बहुरि न आवै-३-१३।
वि.
[सं. निष्कामिन्]

निष्काशन, निष्कासन
बहिष्कार।
संज्ञा
[सं.]

निष्काशित, निष्कासित
बाहर निकाला हुआ, बहिष्कृत।
वि.
[सं.]

निष्काशित, निष्कासित
जिसकी निंदा हो, निंदित।
वि.
[सं.]

निष्क्रमण
बाहर निकालना।
संज्ञा
[सं.]

निष्क्रमण
हिंदू-बच्चे का वह संस्कार जिसमें चार महीने का होने पर उसे घर से बाहर लाकर सूर्य-दर्शन कराया जाता है।
संज्ञा
[सं.]

निष्क्रय
वेतन।
संज्ञा
[सं.]

निष्क्रय
बिक्री।
संज्ञा
[सं.]

निष्क्रिय
क्रिया या चेष्टा रहित।
वि.
[सं.]

बनचारी
जल के जीव।
संज्ञा
[सं. वनचारिन्]

बनचौंर, बनचौंरी
सुरागाय जिसकी पूँछ का चँदर बनता है।
संज्ञा
[सं. वन + चमर, चमरी]

बनज
वयापार, व्यवसाय।
संज्ञा
[सं. वाणिज्य]

बनज
कमल।
संज्ञा
[सं. वनज]

बनज
जल-जीव।
संज्ञा
[सं. वनज]

बनज
जल में उत्पन्न होनेवाले पदार्थ।
संज्ञा
[सं. वनज]

बनजात
कमल।
संज्ञा
[सं. वन + जात]

बनजारनि
बनजारा वर्ग की नारी।
उ.-लीन्हें फिरति रूप त्रिभुवन को ऐ नोखी बवजारनि-१०४१।
संज्ञा
[हिं. बनजारा]

बनजारा
बैलों पर अनाज लादकर बेचनेवाला, टाँड़ा लादनेवाला।
संज्ञा
[हिं. बनिज + हारा]

बनजारा
व्यापारी।
संज्ञा
[हिं. बनिज + हारा]

बनजी
व्यापार।
संज्ञा
[सं. वाणिज्य]

बनजी
व्यापारी।
संज्ञा
[सं. वाणिज्य]

बनत
बनावट।
संज्ञा
[हिं. बनना]

बनत
अनुकूलता।
संज्ञा
[हिं. बनना]

बनताई
बन की सघनता या भयंकरता।
संज्ञा
[हिं. बन + ताई (प्रत्य.)]

बनद
बादल, जलद।
संज्ञा
[सं. वन + द]

बनदाम
वनमाला।
संज्ञा
[सं. वन + दाम]

बनदेवी
वन की अधिष्ठात्री देवी।
संज्ञा
[सं. वनदेवी]

बनधातु
गेरू या वैसी ही रंगीन मिट्टी।
उ.-सखा संग आनंद करत सब अंग अंग बनधातु चित्र करि।
संज्ञा
[सं. वनधातु]

बनना
तैयार होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
जान (प्राण) पर आ बनना- प्राण संकट में पड़ जाना।
मु.

बनना
आविष्कार होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
आपस में निभना या पटना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
सुन्दर लगना, स्वादिष्ट होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
सुयोग या सुअवसर मिलना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
स्वरूप धारना, स्वाँग बनाना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
मूर्ख सिद्ध होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
उच्च या बड़ा सिद्ध करने का प्रयत्न करना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
खूब सजना, श्रृंगार करना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बननि
बनाव-सिंगार, सजावट।
संज्ञा
[हिं. बनना]

बनना
काम में आने याग्य होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
ठीक रूप या स्थिति में आना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
एक पदार्थ से दूसरा तैयार होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
संबंध हो जोना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
पद, अधिकार आदि प्राप्त करना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
उन्नत दशा में पहुँचना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
प्राप्त होना, मिलना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
पूरा या समाप्त होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
मरम्मत होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बनना
संभव होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्णन]

बननि
रचना, बनावट।
संज्ञा
[हिं. बनना]

बननिधि
सागर, समुद्र।
संज्ञा
[सं. वननिधि]

बनपट
छाल से बना कपड़ा।
संज्ञा
[सं. वनपट]

बनपथ
जलमार्ग, सागर।
संज्ञा
[सं. वनपथ]

बनपत्र
एक बाजा।
उ.-किनहु सृंग कोउ बेनु किनहु बनपत्र बजाये-११०७।
संज्ञा
[सं. वनपत्र]

बनपाती
वनस्पति।
संज्ञा
[हिं. बन + पत्ती]

बनबाहन
जलयान, नौका।
संज्ञा
[सं. वन + वाहन]

बनमाल, बनमाला
तुलसी, कुंद, मंदार, परजाता और कमल- इन पाँच पौधों की पत्तियों और फूलों की बनी हुई ऐसी माला जो प्रायः गले से पैर तक लम्बी होती थी।
उ.-मुकुट सिर धरैं, बनमाल कौस्तुभ गरैं-४-१०।
संज्ञा
[सं. वनमाला]

बनमालाधर
विष्णु और उनके राम-कृष्ण अवतर।
उ.-कंबु कंठधर, कौतुभ-मनिधर, बनमालाधर, भुत्क मालधर-५७२।
संज्ञा
[सं. वनमाला, + हिं. धरना]

बनमाली
बनमाला धारण करनेवाला।
संज्ञा
[सं. वनमाली]

बनवैया
बनानेवाला।
संज्ञा
[हिं. बनाना + क्यौ]

बना
वर, दूलह।
संज्ञा
[हिं. बनना]

बना
रचा गया, तैयार हुआ।
क्रि. स.

बना
बना रहना - (१) जीवित रहना। (२) उपस्थित रहना।
मु.

बनाइ
रचकर, तैयार करके।
उ.- व्यास कहे सुकदेव सौं द्वादस स्कंध बनाइ-१-२२५।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाइ
तैयार करके, व्यवहार-योग्य रूप देकर।
उ.- षटरस सौंज बनाइ जसोदा, रचिकै कंचन-थार-३९७।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाइ
साजकर।
उ.- तिलक बनाइ चले स्वामी ह्वै-१-५२।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाइ
गढ़ गढ़कर।
उ.- कहत बनाइ दीप की बतियाँ, कैसैं धौं तम नासत-२-२५।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाइ
निपट, नितांत।
उ.- यह बालक धौं कौन कौ, कीन्हौ जुद्ध बनाइ-५८९।
क्रि. वि.

बनाइ
भली-भाँति, अच्छी तरह।
उ.- आपु अपनौ घात निरखत खेल जम्यौ बनाइ-१०-२४४।
क्रि. वि.

बनमाली
श्रीकृष्ण।
उ.-अब ए बेली सूखत हरि बिनु छाँड़ि गए बनमाली-३२२८।
संज्ञा
[सं. वनमाली]

बनमाली
विष्णु।
संज्ञा
[सं. वनमाली]

बनमाली
मेघ, बादल।
संज्ञा
[सं. वनमाली]

बनमाली
घने वनवाला प्रदेश।
संज्ञा
[सं. वनमाली]

बनरखा
वनरक्षक।
संज्ञा
[हिं. बन + रखना]

बनरा
बानर, बंदर।
संज्ञा
[हिं. बंदर]

बनरा
वर, दूलह।
संज्ञा
[हिं. बनना]

बनरा
विवाह का मंगलगीत।
संज्ञा
[हिं. बनना]

बनराई
वन का राजा, सिंह।
संज्ञा
[सं. वनराज]

बनराई
तोता।
उ.- सजल लोचन चारू नासा, णरभ रूचर बनाइ। जुगल खंजन करत अबिनति, बीच कियौ बनराइ-१०-२२५।
संज्ञा
[सं. वनराज]

बनराज, बनराजा, बनराय, बनराया
सिंह।
संज्ञा
[सं. वनराज]

बनराज, बनराजा, बनराय, बनराया
तोता।
संज्ञा
[सं. वनराज]

बनरी
नवबधू, दूलहिन।
संज्ञा
[हिं. बनरा]

बनरुह
अपने आप उगनेवाले जंगली पेड़।
संज्ञा
[सं. वनरुह]

बनरुह
कमल।
संज्ञा
[सं. वनरुह]

बनवना
रचना, बनाना।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनवसन
छाल का कपड़ा।
संज्ञा
[सं. वनवसन]

बनवाना
दूसरे को बनाने के काम में प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनवारी
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[सं. वनमाली]

बनबासी
वन का निवासी।
संज्ञा
[सं. वनवासी]

बनाइए
श्रृंगार कीजिए, सजाइए।
उ.- छूटे चिहुर बदन कुँभिलानौ सुहथ सँवारि बनाइए-१६८८।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनाई
रची, निर्मित की।
उ.- नाना भाँति पाँति सुंदर मनौ कंचन की है लता बनाई-९-५९।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनाई
व्यवहार-योग्य रूप दिया।
उ.- अति प्यौसर सरस बनाई-१०-१८२।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनाई
सजाया, श्रृंगार किया।
उ.- लोचन ललित, ललाट भुकुटि बिच तकि मृगमद की रेख बनाई-६१६।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनाई
रचकर, गढ़कर, गढ़ी, कल्पित की।
उ.- (क) हम जानी यह बात बनाई-७९९। (ख) देखे तब बोल्यौ कान्ह, उतर यौं बनाई-१०-२८४।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनाई
बिलकुल, अत्यन्त।
उ.- हरि तासौं कियौ युद्ध बनाई-७-२।
क्रि. वि.

बनाई
भलीभाँति, अच्छी तरह।
क्रि. वि.

बनाउ
किसी पदार्थ को काट-छाँटकर और गढ़कर, सँवारकर, सुंदर रूप देकर।
उ.- सीतल चंदन कटाउ, धरि खराद रंग लाउ, बिबिध चौकरी बनाउ, धाउ रे बनैया-१०-४१।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनाउ
बनाओ, निर्मित करो।
उ.- रिषि दधीचि हाड़ लै दान। ताकौ तू निज बज्र बनाउ-६-५।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनाउ
बनावट।
संज्ञा

बनाउ
सजावट।
संज्ञा

बनाउ
युक्ति।
संज्ञा

बनाऊँ
सजाऊँ।
उ.- तुमरे भूषन मोकों दीजै अपने तुमहिं बनाऊँ- पृ. ३११ (११)।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनाए
रचे।
उ.- बालक बच्छ हरे चतुरानन, ब्रह्म-लोक पहुँचाए। सूरदास-प्रभु गर्व बिनासन, नव कृत फेरि बनाए-४३६।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनगि, बनाग्नि
दावानल।
संज्ञा
[सं. वनाग्नि]

बनाना
रचना, तैयार करना।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाना
गढ़कर, सँवारकर या पकाकर तैयार करना।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाना
ठीक या उचित रूप देना।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाना
एक पदार्थ से दूसरा तैयार करना।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाना
नया भाव या संबंध प्रदान करना।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

निष्ठुर
कठोर, निर्दयी।
वि.
[सं.]

निष्ठुरता
कड़ापन।
संज्ञा
[सं.]

निष्ठुरता
निर्दयता।
संज्ञा
[सं.]

निष्ण, निष्णात्
कुशल, दक्ष, चतुर।
वि.
[सं.]

निष्पंद
जिसमें कंप या धड़कन न हो।
वि.
[सं.]

निष्पक्ष
जो किसी के पक्ष में न हो।
वि.
[सं.]

निष्पक्षता
निष्पक्ष होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

निष्पत्ति
अंत, समाप्ति।
संज्ञा
[सं.]

निष्पत्ति
हठ योग में नाद की अंतिम अवस्था।
संज्ञा
[सं.]

निष्पत्ति
निश्चय।
संज्ञा
[सं.]

बनाना
पद, मान, अधिकार-विशेष प्रदान करना।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाना
उन्नत दशा में पहुँचना।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाना
प्राप्त करना।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाना
समाप्त करना।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाना
आविष्कार करना।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाना
मरम्मत करना।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाना
हँसी उड़ाना।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनाबंत, बनाबनत
विवाह के लिए लड़के-लड़की की जन्मपत्री का मिलान।
संज्ञा
[हिं. बनना + अबनना]

बनाम
नाम पर, किसी के प्रति।
अव्य.
[फ़ा.]

बनाय
नितांत।
क्रि. वि.
[हिं. बनाकर]

बनाय
भली भाँति, अच्छी तरह।
क्रि. वि.
[हिं. बनाकर]

बनाय
पकाकर, तैयार करके।
उ.- मधु-मेवा पकवान मिठाई ब्यंजन बहुत बनाय-९१८।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनायौ
धारण किया, रखा।
उ.- नर-तन, सिंह-बदन बपु कीन्हौ, जन-लगि भेष बनायौ-१-१९०।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनायौ
रची, निर्मित की।
उ.- चंदन अगर सुगंध और घृत, बिधि करि चिता बनायौ-९-५०।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनारसी
काशी का, काशी-वासी।
वि.
[हिं. बनारस]

बनाव
रचना, बनावट।
संज्ञा
[हिं. बनना + आव]

बनाव
सजावट, श्रृंगार।
संज्ञा
[हिं. बनना + आव]

बनाव
युक्ति, उपाय।
संज्ञा
[हिं. बनना + आव]

बनावट
रचना, गढ़ंत।
संज्ञा
[हिं. बनाना + वट]

बनावट
आडंबर, ऊपरी दिखावा।
संज्ञा
[हिं. बनाना + वट]

बनावै
बनाता है, रचता है, तैयार करता है।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनावै
रूप धारण करता है, रूप धरता है।
उ.- दर-दर लोभ लागि लिये डोलति, नाना स्वाँग बनावै-१-४२।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनावै
सुधारता है, पूर्णतः संपादन करता है, पूरा करता है।
उ.- मूकू निंद, नोढ़ा, भोंड़ा, कायर, काम बनावै-१-१८६।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनासपति, बनासपती
जड़ी, बूटी आदि।
संज्ञा
[सं. वनस्पति]

बनासपति, बनासपती
साग-पात, फलफूल आदि।
संज्ञा
[सं. वनस्पति]

बनि
पूर्ण, सब, समस्त।
वि.
[हिं. बनना]

बनि
बनकर, रचकर।
क्रि. अ.

बनि
बनि जाइ - काम बन जाय, इच्छा पूरी हो, दशा सुधर जाय।
उ.- उचित अपनी कृपा करिहौ, तबै तो बनि जाइ। बनि आइहै -१-१२६।
प्र.

बनि
करते-धरते बन पड़ेगा, कर सकोगे, सम्हाल सकोगे।
उ.- तब न कछु बनि आइहै, जब बिरूझैं सब नारि-११२५।
प्र.

बनि
बन-ठनकर, सज-धजकर।
उ.- (क) बनि ब्रज सुंदरि चलीं-१०-२८। (ख) बन तैं बनि ब्रज आवत-४७९। (ग) जुवति बनि भईं ठाढ़ी और पहिरे चीर-१८५२।
क्रि. अ.
[हिं. बनना]

बनावत
(किसी पदार्थ का रूप परिवर्तित करके ) नई वस्तु तैयार करता है, रूप परिवर्तित करता है।
उ.- मातु उदर मैं रस पहुँचावत। बहुरि रूधिर तैं छीर बनावत-२-२०।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनावत
मनगढ़ंत करता है, उपहास करता है।
उ.- सूर सीस तृन दै बूझति हौ, साँच कहत की बनावत री-१५८५।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनावत
(रूप) धरते हैं, (स्वाँग) बनाते हैं।
उ.- मनहीं मन बलबीर कहत हैं, ऐसे रंग बनावत। सूरदास-प्रभु-अगनित महिमा, भगतनि कैं मन भावत-१०-१२५।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनावति
बनाती है।
क्रि. स.
[हिं. बनाना]

बनावति
बुद्धि बनावति- उपाय सोचती है, युक्ति निकालती है। उ.- यह सुनिकै मन हर्ष बढ़ायौ, तब इक बुद्धि बनावति-११७४।
मु.

बनावन
बनाने का भाव, रचना।
संज्ञा
[हिं. बनाना]

बनावन
बात बनावन - बात गढ़ने में। उ.- बात बनावन कौं है नीकौ, बचन-रचन समुझावै-१-१८६।
मु.

बनावनहारा
बनाने-वाला, रचयिता।
संज्ञा
[हिं. बनाना + हारा]

बनावनहारा
सुधारनेवाला, सुधारक।
संज्ञा
[हिं. बनाना + हारा]

बनावनो
बनावट, रचना।
उ.- पँचरँग पाट कनक मिलि डोरी अतिही सुधर बनावनो-२२८०।
संज्ञा
[हिं. बनावना]

बनित
वेश, साजबाज।
उ.-चढ़ि जदुनन्दन बनित बनाय कै। साजि बरात चले जादव जाय कै।
संज्ञा
[हिं. बनना]

बनिता
स्त्री, नारी।
उ.-सूर स्याम बनिता ज्यों चंचल पग-नूपुर झनकार।
संज्ञा
[सं. वनिता]

बनिता
पत्नी।
संज्ञा
[सं. वनिता]

बनियाँ
बन पड़ता है।
क्रि. स.
[हिं. बनना]

बनियाँ
गावत नहिं बनियाँ-गाते नहीं बन पड़ता है, गा नहीं पाता है।
उ.-सेस सहस आनन गुन गावत वहिं बनियाँ-१०-१४४।
प्र.

बनियाँ
कहति न बनियाँ-कही नहीं जाती, वर्णन नहीं की जा सकती।
उ.-आपुन खात, नंद-मुख नावत, सो छबि कहत न बनियाँ-१०-२३८।
प्र.

बनिया
व्यापारी।
संज्ञा
[सं. वणिक]

बनिया
वैश्य।
संज्ञा
[सं. वणिक]

बनिखत
अपेक्षा, तुलना में।
अव्य.
[फ़ा.]

बनिहै
बनेगा, अच्छा रहेगा।
उ.-गेंद खेलत बहुत बनिहै, आनौ कोऊ जाइ-५३२।
क्रि. अ.
[हिं. बनना]

बनिक
व्यापारी।
संज्ञा
[सं. बणिक]

बनिक
बनिया।
संज्ञा
[सं. बणिक]

बनिज
व्यापार, वस्तुओं का क्रय-विक्रय।
उ.- (क) प्रेम-बनिज कीन्हों हुतो नेह नफा जिय जानि-३२४९। (ख) सूरदास तेहि बनिज कवन गुन भूलहु माँझ गवाँए-३२०१। (ग) और बनिज मैं नाहीं लाहा, होति मूल मैं हानि-१-३१०।
संज्ञा
[सं. वाणिज्य]

बनिज
व्यापार की वस्तु, सौदा।
संज्ञा
[सं. वाणिज्य]

बनिज
धनी, मालदार।
संज्ञा
[सं. वाणिज्य]

बनिजना
व्यापार करना।
क्रि. स.
[हिं. बनिज]

बनिजना
मोल लेना।
क्रि. स.
[हिं. बनिज]

बनिजति
लेन-देन करती है।
उ.-यह बनिजति बृषभानु सुता तुम हम सों बैर बढ़ावति।
क्रि. स.
[हिं. बनिजना]

बनिजाहा
टाँड़ा लादनेवाला।
संज्ञा
[हिं. बनजारा]

बनिजारिन, बनिजारी
बनजारी जाती की स्त्री।
उ.-लीन्हें फिरति रूप त्रिभुवन को ए नोखी बनिजारिनि।
संज्ञा
[हिं. बनजारी]

बनी
बाग, वाटिका, वनस्थली।
संज्ञा
[हिं. बन]

बनी
दुलहिन।
संज्ञा
[हिं. बना]

बनी
नायिका।
संज्ञा
[हिं. बना]

बनी
बनिया।
संज्ञा
[सं. वणिक]

बनी
खूब पटती है, अच्छी तरह निभती है।
उ.-सूर कहत जे भजत राम कौं तिनसौं हरि सौं सदा बनी-१-३९।
क्रि. अ.
[हिं. बनना]

बनी
शोभित है।
उ.-कंठ मुक्तामाल, मलयज, उर बनी बनमाल-१-३०७।
क्रि. अ.
[हिं. बनना]

बनी
योग्य या उचित थी, फबी, भली लगी।
उ.-ते दीनी बधुनि बुलाइ, जैसी जाहि बनी -१०-२४।
क्रि. अ.
[हिं. बनना]

बनी
फबती है, भली लगती है।
मुकुट कुण्डल जड़ित हीरा लाल सोभा अति बनी-१० उ.-२४।
क्रि. अ.
[हिं. बनना]

बनी
उपयुक्त है, योग्य है।
उ.- नन्द सुत बृषभानु-तनया रास में जोरी बनी- पृ. ३४५ (३)।
क्रि. अ.
[हिं. बनना]

बनी
प्रस्तुत हुई, तैयार हुई, निर्मित हुई।
उ.- हरि जू की आरती बनी-२-२८।
क्रि. अ.
[हिं. बनना]

बनी
जिय आनि बनी- जी में दृढ़ विश्वास हो गया है, धारणा बन गयी है। उ.- मेरैं जिय ऐसी आन बनी-८९४। कठिन बनी है- बड़ी विपत्ति आ पड़ी है। उ.- निबाहौ बाँह गहे की लाज। द्रुपद-सुता भाषति नँदनंदन, कठिन बनी है आज-१-२५५।
मु.

बनीनी
वैश्य की स्त्री।
संज्ञा
[हिं. बनी + ईनी]

बनीर
बेंत।
संज्ञा
[सं. वानीर]

बने
तैयार हुए, बनाये गये।
क्रि. अ.
[हिं. बनना]

बने
बहुत बने हैं- बहुत स्वादिष्ट हैं। उ.- मिलि बैठे सब जेंवन लागे। बहुत बने कहि पाक-४६४।
मु.

बनै
बनता है, काम देता है।
उ.- तेल-तूल-पावक्र-पुट भरि धरि, बनै न बिना प्रकासत
क्रि. अ.
[हिं. बनना]

बनै
बच सकोगो, रक्षा होगी।
उ.-(क) पहुप देहु तौ बनै तुम्हारी, ना तरु गये बिलाइ-५२६। (ख) गेंद दियैं ही पै बनै, छाँड़ि देहु मतिधूत-५८९।
क्रि. अ.
[हिं. बनना]

बनै
खेलत बनै- खलते बनता है, ठीक तरह से खेला जाता है। उ.-खेलत बनै घोष निकास- १०-२४४।
मु.

बनै
बन में ही, बन ही को।
उ.-व्यंजन सहस प्रकार जसोदा बनै पठाए- ४३७
संज्ञा
[हिं. बन + ऐ.]

बनैया
बनानेवाला, गढ़नेवाला, निर्माण करनेवाला।
उ.- सीतल चंदन कटाउ, धरि खराद रंग लाउ, बिबिध चौकरी बनाउ, धाउ रे बनैया-१०-४१।
संज्ञा
[सं. बनाना + ऐया (प्रत्य.)]

बप
पिता।
संज्ञा
[हिं. बाप]

बपन
केशमुंडन।
संज्ञा
[सं. वपन]

बपन
बीज बोना।
संज्ञा
[सं. वपन]

बपना
बीज बोना।
क्रि. स.
[सं. वपन]

बपु
शरीर।
उ.- तात-मरन, सिय-हरन, राम बन-बपु धरि बिपति भरै-१-२६४।
संज्ञा
[सं. वपु]

बपु
अवतार।
संज्ञा
[सं. वपु]

बपु
रूप।
संज्ञा
[सं. वपु]

बपुरा
बेचारा, अनाथ, निरीह।
उ.- बपुरा मोकौं कहति, तोहिं बपुरी करि डारौं-५८९।
वि.
[हिं. बापुरा]

बपुरी
बेचारी, अनाथ, निरीह।
उ.- हमतें भली जलचरी बपुरी अपनौ नेम निबाह्यौ-३१४९।
वि.
[हिं. बपुरा]

बपुरे
तुच्छ, नगण्य, जिसकी कोई गिनती न हो।
उ.- इंद्र समान हैं जाके सेवक, नर बपुरे की कहा गनी-१-३९।
वि.
[हिं. बापुरो]

बनैला
जंगली, वन्य।
वि.
[हिं. बन + ऐला]

बनोवास
वन में रहना।
संज्ञा
[सं. वनवास]

बनौटी
कपास के फूल जैसा, कपास का, कपासी।
वि.
[हिं. वन + औटी]

बनौरी
वर्षा का ओला।
संज्ञा
[सं. वन + ओला]

बनौआ, बनौवा
बनावटी।
वि.
[हिं. बनना + औवा]

बन्यौ
शोभित हुआ, धारण किया।
उ.- कटी लहँगा नीलौ बन्यौ, को जो देखि न मोहै (हो) ?-१-४५।
क्रि. अ.
[हिं. बनाना]

बन्यौ
बनता है, होता है, (काम) चला करता है।
उ.- या बिधि कौ ब्योपार बन्यौ जग, तासौ नेह लगायौ-१-७९।
क्रि. अ.
[हिं. बनाना]

बन्यौ
भलौ बन्यौ है संग- अच्छा साथ हुआ है, खूब साथ बना है। उ.- प्रथम आजु मैं चोरी आयौ, भलौ बन्यौ है संग। आपु खात, प्रतिबिंब खवावत, गिरत कहत, का रंग-१०-२६५।
मु.

बन्हि
आग, अग्नि।
संज्ञा
[सं. वह्नि]

बपंस
बपौती, दाय।
संज्ञा
[हिं. बाप + अंश]

निसंस
क्रूर, निर्दय।
वि.
[सं. नशंस]

निसंसना
हाँफना।
क्रि. अ.
[सं. निःश्वास]

निस
रात।
संज्ञा
[सं. निशि]

निसक
निर्बल, शक्तिहीन।
वि.
[सं. निःशक्त]

निसकर
चंद्रमा।
संज्ञा
[सं. निशाकर]

निसचय
दृढ़ वाचार या धारणा।
संज्ञा
[सं. निश्चय]

निसत
असत्य, मिथ्या।
वि.
[सं. निसत्य]

निसतरना
छुट्टी या मुक्ति पाना।
क्रि. अ.
[सं. निस्तार]

निसतार
मुक्ति, छुटकारा।
संज्ञा
[सं. निस्तार]

निसद्योस
सदा, नित्य।
क्रि. वि.
[सं. निशि + दिवस]

बपुरे
अनाथ, निरीह।
वि.
[हिं. बापुरो]

बपुरैं
बेचारे ने, गरीब ने, अनाथ ने।
उ.- मनसाकरि सुमिरयौ गज बपुरैं, ग्राह प्रथम गति पावै-१-१२२।
वि.
[हिं. बपुरा]

बपुरो, बपुरौ
बेचारा, अनाथ, अशक्त।
उ.- (क) केतिक जीव कृपिन मम बपुरौ, तजै कालहू प्रान। सूर एकहीं बान बिदारैं, श्री गोपालकी आन-१-२७५।
वि.
[हिं. बपुरा]

बपुरो, बपुरौ
तुच्छ, क्षुद्र।
उ.- कहा बपुरो कंस मिट्यौ तब मन संस करत है जी को-२५५६।
वि.
[हिं. बपुरा]

बपौती
पिता से प्राप्त धन-संपति और जायदाद।
संज्ञा
[हिं. बाप + औती]

बप्पा
पिता, जनक।
संज्ञा
[हिं. बाप]

बफारा
भाप से सेंकना।
संज्ञा
[हिं. भाप]

बबकना
चिल्लाना, बमकना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बबा
पिता।
उ.- (क) मन मैं माष करत, कछु बोलत, नंद बाबा पै आयौ-१०-१५६। (ख) सिर कुलही, पग पहिरि पैजनी, तहाँ जाहु जहँ नंद बबा रे -१०-१६०।
संज्ञा
[तु. बाबा]

बबा
बाबा, दादा।
संज्ञा
[तु. बाबा]

बयन
वाणी, वचन।
उ.- बरु ए प्रान जाहिं ऐसे ही बयन होय क्यों हीनों-३०३४।
संज्ञा
[सं. वचन]

बयना
बीज बोना।
क्रि. स.
[सं. वयन, प्रा. बयन]

बयना
कहना, वर्णन करना।
क्रि. स.
[सं. वचन]

बयना
उत्सव पर दी गयी मिठाई।
संज्ञा
[हिं. बैना]

बयनी
बोलनेवाली।
वि.
[हिं. बपन]

बय-प्रापत
युवावस्था को प्राप्त, युवक या युवती।
उ.- (क) पारवती बय-प्रापत भई-४-७। (ख) मम पुत्री बय-प्रापत आहि-४-९।
वि.
[सं. वय + प्राप्त]

बयर
झगड़ा, शत्रुता।
संज्ञा
[हिं. बैर]

बयस
अवस्था, आयु, वय।
उ.- मैं तौ बृद्ध भयौ, वह तरुनी, सदा बयस इकसारी-१-१७३।
संज्ञा
[सं. वयस]

बयसवाला
युवक।
वि.
[सं. वयस + हिं. वाला]

बयस-सिरोमनि
अवस्थाओं में श्रेष्ठ, युवावस्था।
संज्ञा
[वयस् + शिरोमणि]

बबुआ
बेटा (प्यार का संबोधन)।
संज्ञा
[हिं. बाबू]

बबुई
बेटी।
संज्ञा
[हिं. बाबू]

बबुई
छोटी ननद।
संज्ञा
[हिं. बाबू]

बबुर, बबूल
एक काँटेदार पेड़, बबूल।
उ.- बोवत बबुर दाख फल चाहत, जोवत है फल लागे-१-६१।
संज्ञा
[सं. कीकर, हिं. बबूल]

बबूला
बवंडर, अंधड़।
संज्ञा
[हिं. बगूला]

बबूला
बुलबुला।
संज्ञा
[हिं. बुलबुला]

बमत
उगलता है, कै करता है।
उ.- निरतत पद पटकट फन-फन प्रति, बमत रुधिर नहिं जात सम्हारयौ-५७४।
क्रि. स.
[सं. वमन]

बमनहिं
वमन किये हुए पदार्थ को।
उ.- बमनहिं खाइ, खाइ सो डारै, भाषा कहि कहि टेरा-१-१८६।
संज्ञा
[सं. वमन + हिं. हिं]

बमनना
उगलना, कै करना।
क्रि. स.
[सं. वमन]

बय
अवस्था, उम्र।
संज्ञा
[सं. वय]

बया
एक पक्षी।
संज्ञा
[सं. वयन=बुनना]

बया
अनाज तौलनेवाला।
संज्ञा
[अ. बायः]

बयाई
तौलने की मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. बया + आई]

बयान
वर्णन।
संज्ञा
[फ़ा.]

बयान
विवरण।
संज्ञा
[फ़ा.]

बयाना
पेशगी, अगाऊ।
संज्ञा
[अ. बै + फ़ा. आना]

बयार, बयारि
हवा, पवन।
उ.- (क) बिषय-बिकार-दवानल उपजी , मोह-बयारि लई-१-२९९। (ख) बेगिहिं नारि छोरि बालक कौं, जाति बयारि भराई-१०-३६। (ग) (तरु) गिरे कैसैं, बड़ौ अचरज, नैंकु नहीं बयार-३८७।
संज्ञा
[सं. वायु]

बयार, बयारि
बयर करना- पंखा हाँकना। बयारि न लागी ताती- गरम हवा नहीं लगी, जरा भी कष्ट नहीं हुआ। उ.- गोकुल बसत नंदनंदन के कबहुँ बयारि न लागी ताती-२९७७। जैसी बयारि बहै तैसी ओढ़िए जू पीठि- जैसी हवा चले वैसी ही पीठि दीजिए, जैसी स्थिति हो, वैसा ही काम कीजिए। उ.- सूरदास के पिय, प्यारी आपुही जाइ मनाय लीजै, जैसी बयारि बहै तैसी ओढ़िए जू पीठि-२०२५।
मु.

बयारा
झोंका, अन्धड़, तूफान।
संज्ञा
[हिं. बयार]

बयारी
हवा, हवा का झोंका।
उ.- असुर के तनहि को लग्यो कलपन तुरंग गज उड़ि चले लागी बयारी-१० उ.-३१।
संज्ञा
[हिं. बयार]

बयारी
वायु नामक तत्व।
उ.- सप्त पताल अध ऊर्ध्व पृथ्वी तल जल नभ बरुन बयारी-३२६१।
संज्ञा
[हिं. बयार]

बयारी
रात का भोजन।
संज्ञा
[हिं. बियारी]

बयाला
दीवार का गोखा।
संज्ञा
[सं. वीह्य + आला]

बयाला
ताख, आला।
संज्ञा
[सं. वीह्य + आला]

बयाला
दीवाल से तोप का गोला निकालने का छेद।
संज्ञा
[सं. वीह्य + आला]

बयो, बयौ
बीज बोया।
उ.- (क) अब मेरी-मेरी करि बौरे, बहुरौ बीज बयौ-१-७८। (ख) सूर सुरपति सुन्यौ, बयौ जैसो लुन्यौ प्रभु कह गुन्यौ गिरि सहित वेहै-९४४।
क्रि. स.
[हिं. बयना]

बरंग
कवच, बख्तर।
संज्ञा
[देश.]

बरंगा
छत पाटने की लकड़ी, झाँप।
संज्ञा
[देश.]

बर
बरगद का वृक्ष।
संज्ञा
[सं. वट]

बर
आशीर्वादात्मक वचन बरदान, वर।
उ.- (क) ब्यास पुत्र-हित बहु तप कियौ तब नारायन यह बर दियौ-१-२२५। (ख) हम तीनौं हैं जग करतार। माँगि लेहु हमसौं बर सार-४-३।
संज्ञा
[सं. वर]

बर
दूल्हा।
उ.- बर अरु बधू आवत जब जाने रुकमिनि करत बधाई।
संज्ञा
[सं. वर]

बर
अच्छा, उत्तम।
वि.

बर
पूरा, पूर्ण।
वि.

बर
बर परना- बढ़कर होना।
मु.

बर
शक्ति।
संज्ञा
[सं. बल]

बर
इच्छाशक्ति, मन।
उ.-अतिहिं हठीली, कह्यौ न मनति, करति आपने बर तैं-७४४।
संज्ञा
[सं. बल]

बर
ऊपर।
अव्य.
[फ़ा.]

बरकत
बढ़ती, अधिकता।
संज्ञा
[अ.]

बरकत
लाभ।
संज्ञा
[अ.]

बरकत
समाप्ति।
संज्ञा
[अ.]

बरकत
धन-दौलत।
संज्ञा
[अ.]

बरकत
कृपा।
संज्ञा
[अ.]

बरकना
बुरी बात न हो पाना।
क्रि. अ.
[हिं. बरकाना]

बरकना
दूर या अलग हटना।
क्रि. अ.
[हिं. बरकाना]

बरकाज
विवाह।
संज्ञा
[सं. वर + कार्य]

बरकाना
बुरी बात न होने देना।
क्रि. अ.
[सं. वारण, वारक]

बरकाना
बहलाना, फुसलाना।
क्रि. अ.
[सं. वारण, वारक]

बरख
बरस, साल।
संज्ञा
[सं. वर्ष]

बरखना
पानी बरसना।
क्रि. अ.
[सं. वर्षण]

बरखा
बर्षा।
संज्ञा
[सं. वर्षा]

बरखा
बर्षा होना।
संज्ञा
[सं. वर्षा]

बरखाना
पानी बरसना।
क्रि. स.
[सं. वर्षा]

बरखाना
छितराकर गिराना।
क्रि. स.
[सं. वर्षा]

बरखाना
अधिकता से देना
क्रि. स.
[सं. वर्षा]

बरखास, बरखास्त
सभा आदि जो समाप्त हो गयी हो।
वि.
[फ़ा. बरखास्त]

बरखास, बरखास्त
जो नौकरी से हटा दिया गया हो।
वि.
[फ़ा. बरखास्त]

बरगद
बड़ का पेड़।
संज्ञा
[सं. वट, हिं. बड़]

बरछा
भाला नामक हथियार।
संज्ञा
[सं. व्रश्चन]

बरछैत
बरछा मारनेवाला।
वि.
[हिं. बरछ + ऐत]

बरजत
मना करता है, रोकता है।
उ.- लोक-वेद बरजत सबैं (रे) देखत नैननि त्रास। चोर न चित चोरी तजै, (रे) सरबस सहै बिनास -१-३२५।
क्रि. स.
[हिं. बरजना]

बरजना
मना करना।
क्रि. स.
[सं. बर्जन]

बरजनि
रोक, मनाही।
संज्ञा
[हिं. बरजना]

बरजि
मना करके, रोककर, निवारण करके।
उ.- इहिं लाजनि मरिऐ सदा, सब कोउ कहत तुम्हारी (हो)। सूर स्याम इहिं बरजि कै, मेटौ अब कुल-गारी (हो)-१-४४।
क्रि. स.
[हिं. बरजना]

बरजिबैं
रोकने या मना करने के लिए।
उ.- फुरैं न बचन बरजिबैं कारन, रहीं बिचारि-बिचरि-१०-२८३।
संज्ञा
[हिं. बरजना]

बरजी
मना किया, रोका।
उ.- हम बरजी, बरज्यौ नहिं मानत-३६९।
क्रि. स.
[हिं. बरजना]

बरजे
मना किया, रोका।
उ.- मैं बरजे तुम करत अचगरी। उरहन कैं ठाढ़ी रहैं सिगरी-३९१।
क्रि. स.
[हिं. बरजना]

बरजै
मना करते हैं, रोकते हैं।
उ.- हाथ तारी देत भाजत, सबै करि करि होड़। बरजै हलधर, स्याम, तुम जनि चोट लागै गोड़-२१३।
क्रि. स.
[हिं. बरजना]

बरजो
रोको, मना करो।
उ.- कोऊ खीझो कोऊ कितने बरजो जुवतिन के मन ध्यान-८७०।
क्रि. स.
[हिं. बरजना]

बरजोर
बली, बलवान।
वि.
[हिं. बल + फा. जोर]

बरजोर
बल का अनुचित प्रयोग करनेवाला।
वि.
[हिं. बल + फा. जोर]

बरजोर
जबरदस्ती।
क्रि. वि.

बरजोर
बहुत जोर से।
क्रि. वि.

बरजोरन
विवाह।
संज्ञा
[सं. वर + हिं. जोड़ना]

बरजोरो
बल प्रयोग, जबरदस्ती।
उ.- नंद बाबा की गऊ चरावो हमसो करो बरजोरी-२४०९।
संज्ञा
[हिं. बरजोर]

बरजोरो
बलपूर्वक, जबरदस्ती।
क्रि. वि.

बरजौं
मना करूँगी।
उ.- करत अन्याय न बरजौं कबहूं अरु माखन की चोरी-२७०८।
क्रि. स.
[हिं. बरजना]

बरजौ
मना करों, रोको।
उ.- सूर सुताहिं बरजौ नँदरानी अब तोरत चोलीबँद-डोरि-१०-३२७।
क्रि. स.
[हिं. बरजना]

बरज्यौ
मना किया, रोका निषेध किया, निवारण किया।
उ.- (क) ब्रह्म-पुत्र सनकादि गए बैकुराठ एक दिन। द्वारपाल जय-विजय हुते, बरज्यौ तिनकौं तिन-३-११। (ख) बार-बार बरज्यौ, नहिं मान्यौ, जनक-सुता तैं कत घर आनी-९-१६०।
क्रि. स.
[हिं. बरजना]

बरत
व्रत, उपवास।
उ.- दृढ़ बिस्वास बरत कौ कीन्हौ। गौरीपति-पूजन मन दीन्हौं-७९९।
संज्ञा
[सं. व्रत]

बरत
निष्ठापूर्ण और अनन्य प्रीति।
उ.- सूर प्रभु पति बरत राखै, मेटि कै कुलकानि-८९५।
संज्ञा
[सं. व्रत]

निष्पन्न
जो पूरा या समाप्त हो चुका हो।
वि.
[सं.]

निष्प्रभ
तेज या प्रभा से रहित।
वि.
[सं.]

निष्प्रयोजन
उद्देश्य या स्वार्थरहित।
वि.
[सं.]

निष्प्रयोजन
व्यर्थ, निरर्थक।
वि.
[सं.]

निष्प्रयोजन
जिससे कुछ लाभ न हो।
वि.
[सं.]

निष्प्राण
निर्जीव।
वि.
[सं.]

निष्प्राण
हताश।
वि.
[सं.]

निष्प्रेही
इच्छा न रखनेवाला।
वि.
[सं. निस्पृह]

निष्फल
व्यर्थ, निरर्थक।
वि.
[सं.]

निसंक
निर्भय, निडर।
उ.- (क) अति निसंक, निरलज्ज, अभागिनि घर-घर फिरति बही-१-१७३। (ख) निपट निसंक बिवादति सम्मुख, सुनि सुनि नंद रिसात-१०-३२६।
वि.
[सं. निःशंक, हिं. निशंक]

बरत
रस्सी।
संज्ञा
[हिं. बरना]

बरत
नट की रस्सी।
संज्ञा
[हिं. बरना]

बरत
(छड़ी आदि से) मारे जाने का उभरा या सूजा हुआ चिह्न।
संज्ञा
[सं. व्रण]

बरत
जलता-बलता हुआ।
उ.- दसहुँ दिसा तैं बरत दवानल आवत है ब्रज जन पर धायौ-५९१।
वि.
[हिं. बलना]

बरतत
संबंध रखते हैं, व्यवहार करते हैं, साथ निभाते हैं।
उ.- प्रभु तैं जन, जन तैं प्रभु बरतत, जाकी जैसी प्रीति हिऐं-१-८९।
क्रि. अ.
[हिं. बरतना]

बरतन
पात्र, बर्तन।
संज्ञा
[सं. वर्तन]

बरतन
बरताव, व्यवहार।
संज्ञा
[हिं. बरतना]

बरतना
बरताव करना।
क्रि. अ.
सं. वर्तन]

बरतना
काम या व्यवहार में लाना।
क्रि. स.

बरताना
काम में लाना।
क्रि. स.
[हिं. बरतना]

बरताना
बाँटना, वितरण करना।
क्रि. स.
सं. वितरण]

बरताव
व्यवहार, बर्ताव।
संज्ञा
[हिं. बरतना]

बरतावै
भोग करे, व्यवहार में लाये।
उ.- अरु जो परालब्ध सौं आवै। ताहीं कौं सुख सौं बरतावै-३-१३।
क्रि. स.
[हिं. बरतना]

बरति
बलती-जलती है।
क्रि. अ.
[हिं. बलना]

बरति
आँखि बरति है- आँख जलती है, दुख और क्रोध होता है। उ.- काहे को अब रोष दिवावत, देखति आँखि बरति है मेरी-३०१२।
मु.

बरति
ब्याहती है।
उ.- मरे से अपसरा आइ ताकौ बरति भजिहैं देखि अब गेह नारी।
क्रि. स.
[हिं. बरना]

बरती
जिसने व्रत रखा हो।
वि.
[हिं. ब्रती]

बरतोर
रोम या बाल उखड़ने से होनेवाला फोड़ा।
संज्ञा
[हिं. बार + तोरना]

बरदारि
ढोनेवाला।
वि.
[फ़ा.]

बरदारि
माननेवाला।
वि.
[फ़ा.]

बरदौर
गोशाला।
संज्ञा
[सं. बरद + और]

बरध, बरधा
बैल।
संज्ञा
[सं. बलीबर्द]

बरन
रंग, वर्ण।
उ.- ग्वाल-बाल सब बरन बरन के, कोटि मदन की छबि किए पाछे-५०७।
वि.
[सं. वर्ण]

बरन
भाँति-भाँति।
उ.- बरन बरन मंदिर बने लोचन नहिं ठहरात-२५६०।
वि.
[सं. वर्ण]

बरनन
वर्णन।
संज्ञा
[सं. वर्णन]

बरनन
विवरण।
संज्ञा
[सं. वर्णन]

बरनना
वर्णन करना।
क्रि. स.
[सं. वर्णन]

बरना
वर्णन क्या, कहा।
उ.- (क) काहूँ कहयौ मंत्र-जप करना। काहूँ कछु, काहूँ कछु बरना-१,३४१। (ख) जड़ तन कौं है जनमऽरु मरना। चेतन पुरुष अमर-अज बरना-३-१३।
क्रि. स.
[हिं. बरनना]

बरना
ब्याहना, विवाह करना।
क्रि. स.
[सं. वरण]

बरना
नियुक्त करना।
क्रि. स.
[सं. वरण]

बरना
दान देना।
क्रि. स.
[सं. वरण]

बरना
जलना।
क्रि. अ.
[हिं. बलना]

बरनि
वर्णन करके।
उ.- मुण्ड माल सिव-ग्रोवा कैसी ? मोसौं बरनि सुनावौ तैसी-१-२२६।
क्रि. स.
[हिं. बरनना]

बरनि
वर्णन कर सकूँ, बखान सकूँ।
उ.- ता रिस मैं मोहिं बहुतक मार्यौ, कहुँ लगि बरनि सकौं-१-१५१।
प्र.

बरनिए
वर्णन कीजिए, बखानिए, कहिए।
उ.- सुनि याके उतपात कौं, सुक सनका-दिक भागे (हो)। बहुत कहाँ लौं बरनिऐ, पुरुष न उबरन पावै (हो) -१-४४।
क्रि. स.
[हिं. बरनना]

बरनी
वर्णन की।
उ.- (क) तुम हनुमंत पवित्र पवनसुत, कहियौ जाइ जोइ मैं बरनी-९-१०१। (ख) सुता लई उर लाइ, तनु निरखि पछिताइ, डरनि गई कुम्हिलाइ, सूर बरनी-६९८।
क्रि. स.
[हिं. बरनना]

बरनी
बरनी जाइ- वर्णन की जाय, कही जाय।
उ.- हृदय हरि-नख अति राजत, छबि न बरनी जाइ-१०-२३४।
प्र.

बरने
वर्णन किये।
क्रि. स.
[हिं. बरनना]

बरने
बरने जाइ-वर्णन किये (जाते हैं), वरने (जाते ङैं) कहते (हैं)।
उ.- बाबर बरने नहि जाई। जिहिं देखत अति सुख पाई-१०-१८३।
प्र.

बरनेत
विवाह की एक रीति।
संज्ञा
[हिं. बरना + ऐत]

बरनौं
वर्णन करूँ, कहूँ।
उ.- कहा गुन बरनौं स्याम, तिहारे-१-२५।
क्रि. स.
[सं. वर्णन]

बरन्यौ
वर्णन किया, कहा।
क्रि. स.
[हिं. बरनना]

बरन्यौ
बरन्यौ जाइ (जाई)-वर्णन किया जा सकता है।
उ.- (क) मुख देखत मोहिनि सी लागी, रूप न बरन्यौ जाई री-१०-१३९। (ख) बृन्दाबन ब्रज कौ महत कापै बरन्यौ जाइ-४९२।
प्र.

बरफी
एक मिठाई।
संज्ञा
[फा. बरफ]

बरबंड
बली।
वि.
[सं. बलवंत]

बरबंड
प्रचंड।
वि.
[सं. बलवंत]

बरबर
व्यर्थ की बात, बकवाद।
संज्ञा
[अनु.]

बरबस
बलपूर्वक।
क्रि. वि.
[सं. बल + वश]

बरबस
व्यर्थ, फिजूल।
उ.- खेलत मैं को काकौ गुसैयाँ। हरि हारे, जीते श्रीदामा, बरबस हीं कत करत रिसैयाँ-१०-२४५।
क्रि. वि.
[सं. बल + वश]

बरबाद
नष्ट।
वि.
[फ़ा.]

बरबाद
व्यर्थ खर्चा हुआ।
वि.
[फ़ा.]

बरबादी
नाश, तबाही।
संज्ञा
[फ़ा.]

बरम
कवच, चिरह बख्तर।
संज्ञा
[सं. वर्म]

बरम्हा
ब्रह्मा।
संज्ञा
[सं. ब्रह्मा]

बरम्हाना
(ब्राह्मण का) आशीर्वाद देना।
क्रि. स.
[सं. ब्राह्मण]

बरम्हाव
ब्राह्मणत्व।
संज्ञा
[सं. ब्रह्म + राव]

बरम्हाव
ब्राह्मण का आशीर्वाद।
संज्ञा
[सं. ब्रह्म + राव]

बरवा, बरवै
एक प्रसिद्ध छंद।
संज्ञा
[देश.]

बरष, बरस
साल, वर्ष।
उ.- सहस बरस गज जुद्ध करत भए, दिन इक ध्यान धरे-१-८२।
संज्ञा
[सं. वर्ष]

बरष, बरस
बरष-बरषनि-प्रति वर्ष, बहुत वर्षों तक।
उ.- कान्ह बरष-गाँठि उमँग, चहति बरष बरषनि-१०-९६।
यौ.

बरषगाँठ, बरसगाँठ
जन्म-दिन, सालगिरह।
उ.- सूर स्याम ब्रज-जन-मन-मोहन-बरष-गाँठि कौ डोरा खोल-१०-९४।
संज्ञा
[हिं. बरस + गाँठ]

बरषत, बरसत
बरसाती हुई, गिराती या बहाती है।
उ.- इतनी सुनत कुंति उठिधाई, बरषत लोचन नीर-१-२९।
क्रि. स.
[हिं. बरसाना]

बरषत, बरसत
बरसाते या गिराते हैं।
उ.- स्रवत स्रोनकन, तन सोभा, छबिधन बरसत मनु लाल-१-२७३।
क्रि. स.
[हिं. बरसाना]

बरषना, बरसना
मेह पड़ना।
क्रि. अ.
[सं. वर्षण, हिं. बरसना]

बरषना, बरसना
वर्षा-जल के समान ऊपर से गिरना।
क्रि. अ.
[सं. वर्षण, हिं. बरसना]

बरषना, बरसना
अधिकता से प्राप्त होना।
क्रि. अ.
[सं. वर्षण, हिं. बरसना]

बरषना, बरसना
अच्छी तरह झलकना।
क्रि. अ.
[सं. वर्षण, हिं. बरसना]

बरषा, बरसा
पानी बरसने की क्रिया, वृष्टि, वर्षा।
उ.- कीजै कृपा-द्दष्टि की बरषा, जन की जाति लुनाई-१-१८५।
संज्ञा
[सं. वर्षा]

बरषा, बरसा
वर्षा-काल, बरसात।
संज्ञा
[सं. वर्षा]

बरषाइ, बरसाइ
मेह गिराकर।
क्रि. स.
[हिं. बरसना]

बरषाइ, बरसाइ
ऊपर से गिराकर।
उ.- जय जय धुनि नभ करत हैं बरषि पुहुप बरषाइ-४३१।
क्रि. स.
[हिं. बरसना]

बरषाऊ, बरसाऊ
बरसनेवाला।
वि.
[हिं. बरसना]

बरषात, बरसात
वर्षाकाल।
संज्ञा
[सं. वर्षा]

बरषाती, बरसाती
बरसात-संबंधी।
वि.
[हिं. बरसात]

बरषाना, बरसाना
मेह गिराना।
क्रि. स.
[हिं. बरसना]

बरषाना, बरसाना
ऊपर से मेह की तरह गिराना।
क्रि. स.
[हिं. बरसना]

बरषाना, बरसाना
खूब प्राप्त करना।
क्रि. स.
[हिं. बरसना]

बरषावति, बरसावति
बरसाती है।
क्रि. स.
[हिं. बरसाना]

बरषावति, बरसावति
वर्षा के जल के समान (कोई वस्तु) गिराती है।
उ.- आनँद उर अंचल सम्हारति, सीस सुमन बरषावति -१०-२३।
क्रि. स.
[हिं. बरसाना]

बरषासन, बरसासन
एक मनुष्य या एक परिवार के लिए पर्याप्त एक वर्ष की भोजन-सामग्री।
संज्ञा
[सं. वर्षासन]

बरषी, बरसी
वार्षिक श्राद्ध।
संज्ञा
[हिं. बरस]

बरषावै, बरसावै
वर्षा के जल की तरह ऊपर से गिराते हैं।
उ.- ब्योम-जान फूल अति गति बरसावै री-६९।
क्रि. स.
[हिं. बरसाना]

बरषै, बरसै
बरसता है, मेह पड़ता है।
उ.- निसि अँधेरी, बीजु चमकै सधन बरसै मेह-१०-५।
क्रि. स.
[हिं. बरसना]

बरष्यौ, बरस्यौ
बरसा, जल गिरा (गिराया), मेह पड़ा।
उ.- देवराज मष-भंग जानि कै बरष्यौ ब्रज पर आई-१-१२२।
क्रि. स.
[हिं. बरसना]

बरह
मोर, मयूर।
उ.- बरह मुकुट कैं निकट लसति लट, मधुप मनौ रुचि पाए-१०-४१७।
संज्ञा
[हिं. बरही]

बरहहिं
वृक्ष के पत्ते।
संज्ञा
[हिं. बरह + हि (प्रत्य.)]

बरहहिं
वृक्ष की पतली सींक या डाल को, तिनकेको।
उ.- सोवत काग छुयौ तन मेरौ, बरहहिं कीनौ बान। फोरयौ नयन, काग नहिं छाँड़यौ सुरपति के बिदमान-९-८३।
संज्ञा
[हिं. बरह + हि (प्रत्य.)]

बरहा
खेती की छोटी नाली।
संज्ञा
[हिं. बहना]

बरहा
मोर, मयूर।
उ.- बरहा पिक चातक जै जै निसान बाजै-२८१६।
संज्ञा
[हिं. बरही]

बरही
मोर, मयूर।
उ.- बरही मुकुट इंद्रधनु मानहुँ तड़ित दसन-छबि लाजति-६३८।
संज्ञा
[सं. वर्हि]

बरही
साही' नामक जंतु।
संज्ञा
[सं. वर्हि]

बरही
मुरगा।
संज्ञा
[सं. वर्हि]

बरही
आग।
संज्ञा
[सं. वर्हि]

बरही
मोटा रस्सा।
संज्ञा
[देश.]

बरही
जन्म का बारहवाँ दिन।
संज्ञा
[हिं. बारह]

बरहीपीड़
मोरमुकुट।
उ.- बरहीपीड़ दाम गुंजामनि अद्भुत बेष बनावत सारा. -४७५।
संज्ञा
[सं. बर्हिपीड़]

बरहीमुख
देवता।
संज्ञा
[सं. वहिर्मुख]

बरहौं
जन्म का बारहवाँ दिन।
संज्ञा
[हिं. बरही]

बरा
एक पकवान जो उर्द की मसालेदार पीठी की टिकियों को घी या तेल में तल कर बनता है, (दही) बड़ा।
उ.- दधि दूध बरा दहिरौरी। सो खात अमृत पक्कौरी-१०-१८३।
संज्ञा
[हिं. बरा, बड़ा]

बरा
बरगद का पेड़।
संज्ञा
[सं. बट]

निसरौगी
निकलोगी, बाहर आओगी।
उ.-गहि गहि बाँह सबनि करि ठाढ़ी कैसेहूँ घर ते निसरौगी-१२८९।
क्रि. अ.
[सं. निसरना]

निसनेह, निसनेहा
निर्मोही।
वि.
[हिं. नि + स्नेह]

निसबत
संबंध।
संज्ञा
[अ.]

निसबत
तुलना।
संज्ञा
[अ.]

निसमानी
जिसके होशहवास ठिकाने न हों, विकल।
वि.
[हिं. निस=नहीं + मन]

निसरना
बाहर निकलना।
क्रि. अ.
[सं. निःस्रवण]

निसर्ग
स्वभाव।
संज्ञा
[सं.]

निसर्ग
आकृति, रूप।
संज्ञा
[सं.]

निसर्ग
प्रकृति।
संज्ञा
[सं.]

निसर्ग
सृष्टि।
संज्ञा
[सं.]

बरा
बड़ा, जो छोटा न हो।
उ.- बरा कौर मेलत मुख भीतर, मिरिच दसन टकटोरै-१०-२२५।
वि.
[हिं. बड़ा]

बरा
भुजदंड का भूषण, टाँड़।
संज्ञा
[देश.]

बराई
बड़ाई, प्रशंसा।
संज्ञा
[हिं. बड़ाई]

बराक
शिव।
संज्ञा
[सं. वराक]

बराक
युद्ध।
संज्ञा
[सं. वराक]

बराक
नीच, अधम।
वि.

बराक
बापुरा, बेचारा।
वि.

बरात
बर का संबंधियों और इष्टमित्रों-सहित सजधजकर कन्या के यहाँ जाना, जनेव।
उ.- (क) जनकराज तब बिप्र पठाये बेग बरात बुलाई-सारा. २२९। (ख) सो बरात जोरि तहँ आयो-१० उ.-७।
संज्ञा
[सं. बरयात्रा]

बरात
बहुत से लोगों का सजधज कर साथ जाना।
संज्ञा
[सं. बरयात्रा]

बरात
शव ले जाने वालों का समूह।
संज्ञा
[सं. बरयात्रा]

बराती
विवाह के अवसर पर वर-पक्ष की ओर से सम्मिलित होनेवाले।
उ.- (क) तेरी सौं, मेरी सुनि मैया, अबहिं बियाहन जैहौं। सूरदास ह्वै कुटल बराती, गीत सुमंगल गैहौं-१०-१९३। (ख) भए जो मन्मथ सैन्य बराती-पृ ३४५ (५)।
संज्ञा
[हिं. बरात + ई [प्रत्य.]]

बराती
शव के साथ जानेवाला।
संज्ञा
[हिं. बरात + ई (प्रत्य.)]

बराना
बेमतलब की बात बचा जाना।
क्रि. अ.
[सं. वारण]

बराना
बहुत सी बातों या विचारों में कुछ को बचा जाना।
क्रि. अ.
[सं. वारण]

बराना
रक्षा करना।
क्रि. अ.
[सं. वारण]

बराना
चुनना, छाँटना।
क्रि. स.
[सं. वरण]

बराना
जताना, बताना।
क्रि. स.
[हिं. बलाना]

बराबर
समान, तुल्य, एक सा।
वि.
[फ़ा. बर]

बराबर
समान पद या मर्यादावाला।
वि.
[फ़ा. बर]

बराबर
समतल।
वि.
[फ़ा. बर]

बराबर
बराबर करना- समाप्त कर देना।
मु.

बराबर
लगातार।
क्रि. वि.

बराबर
एक साथ, साथ।
क्रि. वि.

बराबर
सदा।
क्रि. वि.

बराबरि, बराबरी
बराबर होने की क्रिया या भाव, समानता।
उ.- हरि, हौं सब पतितनि कौ राउ। को करि सकै बराबरि मेरी, सोधौं मोहिं बताउ-१-१४५।
संज्ञा
[हिं. बराबर]

बराबरि, बराबरी
सादृश्य।
संज्ञा
[हिं. बराबर]

बराबरि, बराबरी
सामना, मुकाबला।
संज्ञा
[हिं. बराबर]

बराबरि, बराबरी
सम, समान, तुल्य।
उ.- ज्वाला देखि अकास बराबरि, दसहुँ दिसा कहुँ पार न पाइ-५९४।
वि.

बराबरि, बराबरी
समान रूप, गुण, मूल्यवाला।
उ.- सूरदास प्रभु पारस परसै लोहौ कनक बराबरी-३३३१।
वि.

बरामद
निकासी, आमदनी।
उ.- बढ़ौ तुम्हार बरामंद हूँ कौ लिखि कीनौ है साफ-१-१४३।
संज्ञा
[फ़ा.]

बरामद
सामने आया हुआ।
वि.

बरामद
खोज निकाला हुआ।
वि.

बराम्हण, बराम्हन
ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं. ब्राह्मण]

बराय
लिए, वास्ते, निमित्त।
अव्य.
[फ़ा.]

बरायन
दूल्हे का लोहे का छल्ला जिसमें गुंजा लगे रहते हैं।
संज्ञा
[सं. वर + आयन]

बराव
बचाव, निवारण।
संज्ञा
[हिं. बराना + आव]

बराह
सुअर (पशु)।
संज्ञा
[सं. वराह]

बरि
जल-बलकर।
उ.- देती अबहिं जगाइ कै, जरि बरि होत्यौ छार-५८९।
क्रि. अ.
[हिं. बलना]

बरिआई
जबरदस्ती, बलात्।
उ.- कृषि आइहैं सब लैहैं बरिआई-१२-३।
क्रि. वि.
[सं. बलात्]

बरिआई
बल-प्रयोग, जबरदस्ती।
उ.- (क) अपनी ओर देखि धौं लीजै ता पाछे करियै बरिआई-११३४। (ख) सूरस्याम जो देखिहैं करिहैं बरियाई- पृ. ३१७ (६१)।
संज्ञा

बरिआत
बरात।
संज्ञा
[हिं. बरात]

बरिया
जबरदस्ती।
उ.- हरि हौं महा अधम संसारी। आन समुझ मैं बरिया ब्याही आसा कुमति कुनारी-१-१७३।
क्रि. वि.
[हिं. बलात्]

बरियाईं
जबदस्ती, बल से।
क्रि. वि.
[हिं. बलात्]

बरियाई
जबरदस्ती।
संज्ञा
[हिं. बलात्]

बरियाई
धृष्टता, अन्याय।
उ.- देखौ माई बदरनि की बरियाई-९८५।
संज्ञा
[हिं. बलात्]

बरियार
बली, बलवान्।
वि.
[हिं. बल + आरत]

बरिल
‘बड़े’ जैसा एक पकवान।
संज्ञा
[हिं. बड़ा]

बरिबंड
बलवान, बली प्राणी।
उ.- आगर इक लोह जटित लीन्ही बरिबंड। दुहूँ करनि असुर हयौ, भयौ मांस पिंड-९-९६।
वि.
[सं. बलवंत]

बरिबंड
प्रचंड।
वि.
[सं. बलवंत]

बरिष, बरिस
साल, वर्ष।
संज्ञा
[सं. वर्ष]

बरिषा, बरिसा
वर्षा।
संज्ञा
[सं. वर्षा]

बरिष्ठ
बड़ा, श्रेष्ठ।
वि.
[सं. वरिष्ठ]

बरी
टिकिया, बरी।
संज्ञा
[सं. बटी, बड़ी]

बरी
उर्द या मूँग की पीठी की सुखायी हुई छोटी पकौड़ियाँ।
उ.- (क) पापर बरी अचार परम सुचि। (२) कूटबरी काचरी पिठौरी-३९६।
संज्ञा
[सं. बटी, बड़ी]

बरी
वह मेवा, मिठाई, आदि जो वर के यहाँ से कन्या के यहाँ जाय।
संज्ञा
[सं. बटी, बड़ी]

बरी
विवाही, ब्याह किया।
उ.- (क) बहुरि हिमाचल कैं अवतरी। समय पाइ सिव बहुरौ बरी-४-५। (ख) जद्यपि रानी बरी अनेक-६-५।
क्रि. स.
[हिं. बरना]

बरी
बलवान्, बली।
वि.
[हिं. बली]

बरी
जिसे मुक्त किया गया हो, मुक्त।
वि.
[फ़ा.]

बरीस
वर्ष, साल, बरस।
उ.- नंदराइ कौ लाड़िलौ, जीवै कोटि बरीस-१०-२७।
संज्ञा
[हिं. बरस]

बरु
भले ही, चाहे, कुछ हर्ज नहीं, ऐसा भले ही हो जाय।
उ.- (क) बरू मेरी परतिज्ञा जाय-१-२७३। (ख) सूरदास बरू उपहास सहोई, सुर मेरे नंद-सुवन मिलैं तो पै कहा चाहियै। (ग) बरू मरि जाइ चरै नहिं तिनका सिंह को है सुभाइ रे-३०७०।
अव्य.
[सं. वर=श्रेष्ठ, भला]

बरु
प्रत्युत, बल्कि।
उ.- तब कत कंस रोकि राख्यौ पिय, बरू वाही दिन काहैं न मारी-१०-११।
अव्य.
[सं. वर=श्रेष्ठ, भला]

बरु
अब तो।
उ.- बरू ऐ बदरौ बरषन आए-३९२६।
अव्य.
[सं. वर=श्रेष्ठ, भला]

बरुआ
ब्रह्मचारी।
संज्ञा
[हिं. बटु]

बरुआ
जनेऊ।
संज्ञा
[हिं. बटु]

बरुक
चाहे।
अव्य.
[हिं. बरु]

बरुक
प्रत्युत।
अव्य.
[हिं. बरु]

बरुन
वरूण देवता।
संज्ञा
[सं. बरण]

बरुनी
पलक के बाल।
संज्ञा
[सं. बरण=ढाँकना]

बरुवा
ब्रह्मचारी।
संज्ञा
[हिं. वरुआ]

बरुवा
जनेऊ।
संज्ञा
[हिं. वरुआ]

बरुथ
सैन्य, सेना।
उ.- इतनी बिपति भरत सुनि पावैं आवैं साजि बरूथ-९-१४७।
संज्ञा
[सं. वरूथ]

बरुथी
एक नदी।
संज्ञा
[सं. वरूथ]

बरेंड़ा
खपरैल या छाजन की आधार गोल लकड़ी।
संज्ञा
[सं. वटंडक=गोल लकड़ी]

बरेंड़ा
खपरैल या छाजन का बिचला ऊँचा भाग।
संज्ञा
[सं. वटंडक=गोल लकड़ी]

बरे
बलपूर्वक, जबरदस्ती से।
क्रि. वि.
[सं. बल]

बरे
ऊँचे स्वर में।
क्रि. वि.
[सं. बल]

बरे
बदले में।
अव्य.
[हिं. बद]

बरे
निमित्त।
अव्य.
[हिं. बद]

बरे
जल-बल गये।
उ.- कै वह स्याम सिखाय प्रबोधे कै वह बीच बरे-२९८२।
क्रि. अ.
[हिं. बलना]

बरेखी, बरेषी
बाँह का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. बाँह + रखना]

बरेखी, बरेषी
विवाह के लिए वर या कन्या को देखना, ठहरौनी।
संज्ञा
[हिं. बर + देखना]

वर
जल-बल जायेँ।
क्रि. अ.
[हिं. बलना]

वर
जरैं-बरैं वै आँखि- आँखे नष्ट हो जाये या फूट जायें। उ.- डीठि लगावति कान्ह को जरैं-बरैं वै आँखि-१०६९।
मु.

बरै
बल जाय, नष्ट हो जाय।
उ.- बरै जेंवरी जिहिं तुम बाँधे, परै हाथ भहराइ-३८९।
क्रि. अ.
[हिं. बलना]

बरै
विवाह करे।
उ.- अंतःपुर भीतर तुम जाहु। बरै तुम्हैं, तिहिं करौं बिबाहु-९-८।।
क्रि. स.
[हिं. बरना]

बरों
वरण करूँ।
क्रि. स.
[हिं. बरना]

बरो
वरण करो।
क्रि. स.
[हिं. बरना]

बरोक
वह धन जो कन्या पक्ष वाले विवाह-संबंध को पक्का करने के लिए वर को उसी कन्या के लिए रोक रखने को देते हैं; बरच्छा, फलदान।
संज्ञा
[हिं. बर + रोक]

बरोक
सेना, दल।
संज्ञा
[सं. बलौक]

बरौं
वरण करूँ, वर या वधू के रूप में स्वीकार करूँ।
उ.- देखि सुर असुर सब दौरि लागे गहन, कह्यौ मैं बर बरौं आपु-भायौ-८-८। (ख) कन्या एक नृपति की बरौं-९-८।
क्रि. स.
[हिं. बरना]

बरौ
वरण करो, वर या वधू-रूप में स्वीकार करो।
उ.- या कन्या कौं प्रभु तुम बरौ-९-३।
क्रि. स.
[हिं. बरना]

बरौ
बड़ा, श्रेष्ठ।
वि.
[हिं. बड़ा]

बरोठा
द्वार।
संज्ञा
[हिं. बार + कोठा]

बरोठा
बैठक।
संज्ञा
[हिं. बार + कोठा]

बरोठा
बरोठा-चार- द्वार-पूजा।
मु.

बरोरु
सुडौल जाँघवाली।
वि.
[सं. बरोरु]

बरोह
बरगदी की जटा।
संज्ञा
[हिं. वट + रोह]

बरौनी
पलक के बाल।
संज्ञा
[सं. वरण]

बरौरी
बड़ी या बरी (पकवान)।
संज्ञा
[हिं. बरी]

बर्ज
वर, श्रेष्ठ।
वि.
[सं. वर्य]

निसवादिल
जिसमें स्वाद न हो।
वि.
[सं. निःस्वाद]

निसवासर
सदा, नित्य।
क्रि. वि.
[सं. निशि + वासर]

निसस
अचेत, बेहोश।
वि.
[सं. निःश्वास]

निसहाय
असहाय।
वि.
[सं. निस्सहाय]

निसाँक
बेखटके, बेफिक्र।
वि.
[सं. निःशंक]

निसाँस, निसाँसा
ठंढी या लंबी साँस।
संज्ञा
[सं. निःश्वास]

निसाँस, निसाँसा
बेदम, मृतकप्राय, मरण-तुल्य।
वि.

निसा
रात, रात्रि।
संज्ञा
[सं. नशा]

निसाकर
चंद्रमा।
संज्ञा
[सं. निशाकर]

निसाचर
निशाचर।
संज्ञा
[सं. निशाचर]

बर्जना
मना करना, रोकना।
क्रि. स.
[हिं. बरजना]

बर्णना
वर्णन करना।
क्रि. स.
[हिं. वर्णन]

बर्त
व्रत, उपवास।
संज्ञा
[सं. व्रत]

बर्तना
व्यवहार करना।
क्रि. स.
[सं. वर्तन]

बर्तना
काम, उपयोग या व्यवहार में लाना।
क्रि. स.
[सं. वर्तन]

बर्ताव
काम।
संज्ञा
[हिं. बरताव]

बर्ताव
व्यवहार।
संज्ञा
[हिं. बरताव]

बर्द
बैल।
संज्ञा
[सं. बलद]

बर्नना
वर्णन करना।
क्रि. स.
[हिं. वर्णन]

बर्फ
पाला, हिम, तुषार।
संज्ञा
[फ़ा. बर्फ]

बर्फ
जमाया हुआ दूध आदि।
संज्ञा
[फ़ा. बर्फ]

बर्फ
ओला।
संज्ञा
[फ़ा. बर्फ]

बर्बर
असभ्य, उद्दंड।
वि.
[सं.]

बर्बर
घुँघराले बाल।
संज्ञा

बर्बर
असभ्य मनुष्य।
संज्ञा

बर्यौ
वर या वधू के रूप में स्वीकार किया, बरा, ब्याहा।
उ.- (क) पारबती सिव-हित तप करयौ। तब सिव आइ तहाँ तिहिं बरथौ-४-७। (ख) हरि करि कृपा ताहि तब बरयौ-१० उ.-७।
क्रि. स.
[हिं. बरना]

बर्णना
व्यर्थ बकना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बर्णना
स्वप्न या अति ज्वर की अवस्था में बकना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बरैं
भिड़, ततैया (कीड़ा)।
संज्ञा
[सं. बरट]

बुलंद
ऊँचा।
वि.
[फ़ा.]

बल
शक्ति, सामर्थ्य।
उ.- अति बल करि करि काली हारयौ-५७४।
संज्ञा
[सं.]

बल
भार उठाने की शक्ति।
संज्ञा
[सं.]

बल
सहारा, आश्रय।
उ.- मुनि- मन- हंस -पच्छ- जुग, जाकैं बल उड़ि ऊरध जात-१-९०।
संज्ञा
[सं.]

बल
आसरा, भरोसा।
संज्ञा
[सं.]

बल
सेना, दल।
संज्ञा
[सं.]

बल
बलराम।
उ.- जबहि मोहिं देखत लरिकनि सँग तबहिं खिझत बलभैया-१०-२१७।
संज्ञा
[सं.]

बल
बगल, पहलू, पार्श्व।
संज्ञा
[सं.]

बल
ऐंठन, मरोड़।
संज्ञा
[सं. वलय]

बल
फेरा, लपेट।
संज्ञा
[सं. वलय]

बल
लहरदार घुमाव।
संज्ञा
[सं. वलय]

बल
टेढ़ापन।
संज्ञा
[सं. वलय]

बल
सिकुड़न।
संज्ञा
[सं. वलय]

बल
लचक।
संज्ञा
[सं. वलय]

बल
कमी, कसर।
संज्ञा
[सं. वलय]

बलकत
उमंग, आवेश या जोश में आता है।
उ.- पिये प्रेम बर बारूनी बलकति बल न सँभार। पग डगमग जित तित धरति मुकुलित अलक लिलार-११८२।
क्रि. अ.
[हिं. बलकना]

बलकना
उबलना, उफनना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बलकना
उमंग, आवेश या जोश में आना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बलकर
बलकारक।
वि.
[सं.]

बल्कल
वृक्ष की छाल।
संज्ञा
[सं. वल्कल]

बलकाना
उबालना, खौलाना।
क्रि. स.
[हिं. बलकना]

बलकाना
उभारना, उत्तेजित करना।
क्रि. स.
[हिं. बलकना]

बलकि
आवेश में आकर, जोश में आकर।
उ.- सखा कहत हैं स्याम खिसाने। आपुहिं आपु बलकि भए ठाढ़े, अब तुम कहा रिसाने-१०-२१४।
क्रि. अ.
[हिं. बलकना]

बलद
बैल।
संज्ञा
[सं.]

बलद
बल देनेवाला, बलकारी।
वि.

बलदाउ, बलदाऊ
बलदेव, बलराम, जो रोहिणी के पुत्र थे।
उ.- कछु बलदाऊ कौं दीजै। अरू दूध अधावट पीजै-१-१८३।
संज्ञा
[सं. बल + हिं. दाऊ=दादा=बड़ा भैया]

बलदेव
बलराम।
संज्ञा
[सं.]

बलना
जलना, दहकना।
क्रि. अ.
[सं. वर्हण]

बलनिधि
बली, बलवान।
उ.- इंद्रजीत बलनिधि जब आयौ, ब्रह्मअस्त्र उन डारे- सारा. २८४।
वि.
[सं.]

बलबलाना
ऊँट का बोलना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बलबलाना
व्यर्थ बकना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बलबलाना
निरर्थक शब्द बोलना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बलबलाहट
ऊँट की बोली।
संज्ञा
[हिं. बलबलाना]

बलबलाहट
बकवाद।
संज्ञा
[हिं. बलबलाना]

बलबलाहट
उमंग।
संज्ञा
[हिं. बलबलाना]

बलबलाहट
घमंड।
संज्ञा
[हिं. बलबलाना]

बलबीर, बलबीरा
बलराम के भाई, श्रीकृष्ण।
उ.- (क) है करयौ सिरावन सीरा। कछु हठ न करौ बलबीरा-१०-१८३। (ख) छहौ रागिनी गाय रिझावत अति नागर बलबीर।
संज्ञा
[सं. बल=बलराम + हिं. बीर=भाई]

बलबीर, बलबीरा
बली, बलवान।
उ.- जनि पूछौ तुम कुसल नाथ की, सुनौ भरत बलबीर-९-१५१।
वि.

बलभद्र
बलदेव।
संज्ञा
[सं.]

बलभी
मकान की ऊपरी कोठरी।
संज्ञा
[सं. वलभि]

बलम
पति।
संज्ञा
[सं. वल्लभ]

बलम
प्रेमी।
संज्ञा
[सं. वल्लभ]

बलय, बलया
चूड़ी।
उ.- (क) कनक- वलय, मुद्रिका मोदप्रद, सदा सुभग संतनि काजैं-१-६९। (ख) छूटी लट भुज फूटी बलया टूटी लर फटी कंचुकी झीनी-३४४९।
संज्ञा
[सं. वलय]

बलराम
रोहिणी पुत्र बलराम।
संज्ञा
[सं.]

बलवंड
बली।
उ.- आगर इक लोह जटित लीन्ही बरिबंड। दुहूँ करनि असुर हयो, भयो मांस पिंड-९-९६।
वि.
[सं. बल + वंतः]

बलवंत
प्रधान।
उ.- भरम ही बलवंत सबमैं, ईसहू कैं भाइ-१-७०।
वि.
[सं. बलवंतः]

बलवंत
बली।
उ.- जो ऐसे बलवंत हौ मथुरा काहे न जात-११३९।
वि.
[सं. बलवंतः]

बलवा
दंगा।
संज्ञा
[फ़ा.]

बलवा
विद्रोह।
संज्ञा
[फ़ा.]

बलवाई
उपद्रवी।
वि.
[हिं. बलवा]

बलवाई
विद्रोही।
वि.
[हिं. बलवा]

बलवान
बली, सशक्त।
वि.
[सं. बलवान]

बलवान
दृढ़।
वि.
[सं. बलवान]

बलवीर
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[हिं. बलबीर]

बलशाली, बलसार
बली।
उ.- कुंभकरन पुनि इंद्रजित यह महाबली बलसार- सारा. २९२।
वि.
[हिं. बलशाली]

बलशील, बलसील
बली, सशक्त।
वि.
[सं. बलशील]

बला
विपत्ति।
संज्ञा
[अ.]

बला
दुख।
संज्ञा
[अ.]

बला
भूत प्रेत।
संज्ञा
[अ.]

बला
रोग, व्याधि।
संज्ञा
[अ.]

बला
बला का- गजब का। बला से- कुछ चिंता नहीं।
मु.

बलाइ
आपत्ति, विपत्ति, बला।
उ. बालगोपाल लगौ इन नैननि रोग बलाइ तुम्हारी-१०-९१।
संज्ञा
[अ. बला]

बलाइ
दुख, कष्ट।
संज्ञा
[अ. बला]

बलाइ
लेत बलाइ- दूसरे के दुख को अपने ऊपर लेती है, मंगल-कामना करते हुए प्यार करती है। उ.- निकट बुलाइ बिठाइ निरखि मुख, अंचर लेत बलाइ। चिरजीवौ सुकुमार पवन-सुत, गहति दीन ह्वै पाइ-९-८३।
मु.

बलाइ
दुखदायी वस्तु या प्राणी।
उ.- स्याम सौं वै कहन लागे, आगैं एक बालाइ-४२७।
संज्ञा
[अ. बला]

बलाक
बक, बगुला।
उ.-(क) मुक्तादाम बिलोकि, बिलखि करि, अँवलि बलाक बनावत -६६५। (ख) मनहु बलाक पाँति नव घन पर यह उपमा कछु भाजै री-१३४३।
संज्ञा
[सं.]

बलाका
बगुली।
संज्ञा
[सं.]

बलाका
बगुलों की पंक्ति।
संज्ञा
[सं.]

बलाका
कामुकी नारी।
संज्ञा
[सं.]

बलात्
बलपूर्वक।
क्रि. वि.
[सं.]

बलात्
हठपूर्वक।
क्रि. वि.
[सं.]

बलात्कार
बलपूर्वक काम करना।
संज्ञा
[सं.]

बलात्कार
अत्याचार।
संज्ञा
[सं.]

बलात्कार
स्त्री से बलपूर्वक संभोग।
संज्ञा
[सं.]

बलाध्यक्ष
सेनापति।
संज्ञा
[सं.]

बलाय
विपत्ति।
उ.-बाल गोपाल लगौ इन नैननि रोग-बलाय (बलाइ) तुम्हारी-१०-९१।
संज्ञा
[अ. बला]

बलाय
दुख, कष्ट।
संज्ञा
[अ. बला]

बलाय
भूत-प्रेत की बाधा।
संज्ञा
[अ. बला]

बलाय
रोग, व्याधि।
संज्ञा
[अ. बला]

बलाय
शत्रु, दुखदायी प्राणी।
संज्ञा
[अ. बला]

बलाय
बलाय करे- स्वयं नहीं कर सकता। बलाय लेना- किसी का रोग-दुख अपने ऊपर लेने को प्रस्तुत होकर उसकी मंगल-कामना करते हुए प्यार करना। लेति बलाय- मंगल कामना करके प्यार करती है। उ.- (क) निकट बुलाय बिठाय निरखि मुख आँचर लेति बलाय। (ख) लेति बलाय रोहिनी नारि के सुंदर रूप निहारी-सारा. ४५७।
मु.

निसाचरि
राक्षसी, निशाचरी।
उ.-रखवारी कौं बहुत निसाचरि, दीन्हीं तुरत पटाइ-९-६१।
संज्ञा
[सं. निशाचरी]

निसाथा
अकेला।
वि.
[हिं. नि + साथ]

निसान
नगाड़ा, घौंसा।
उ.-(क) हरि, हौ सब पतितनि कौ राजा। निंदा पर-मुख पूरि रह्यौ जग, यह निसान नित बाजा-१-१४४। (ख) धुरवा धुंधि बढ़ी दसहूँ दिसि गर्जि निसान बजायो-२८१९।
संज्ञा
[फ़ा. निशान]

निसानन
संध्या, प्रदोष काल।
संज्ञा
[सं. निशानन]

निसाना
लक्ष्य, निशाना।
संज्ञा
[फ़ा. निशाना]

निसानाथ
चंद्रमा।
संज्ञा
[सं. निशानाथ]

निसानी
निशान।
संज्ञा
[फ़ा. निशानी]

निसानी
स्मृतिचिह्न।
संज्ञा
[फ़ा. निशानी]

निसाने
नगाड़े, धौसे।
उ.-जाकौ दीनानाथ निवाजैं। भव-सागर मैं कबहुँ न झूकै, अभय निसाने बाजैं-१-३६।
संज्ञा
[फ़ा.]

निसापति
चंद्रमा।
संज्ञा
[सं. निशापति]

बलाहक
मेघ, बादल।
उ.-कहा कहौं वर्षा रबि-तमचुर-कमल-बलाहक कारे-२८६२।
संज्ञा
[सं.]

बलि
राजकर।
संज्ञा
[सं.]

बलि
उपहार, भेंट।
संज्ञा
[सं.]

बलि
पूजा की सामग्री।
संज्ञा
[सं.]

बलि
देवता को उत्सर्ग किया गया खाद्य पदार्थ।
संज्ञा
[सं.]

बलि
भक्ष्य, अन्न।
उ.- हम सेवक वै त्रिभुवनपति, कत स्वान सिंह-बलि खाइ-९-४७।
संज्ञा
[सं.]

बलि
चढ़ावा, नैवेद्य।
उ.-(क) सक्र कौ दान-बलि-मान ग्वारनि लियौ, गह्यौ गिरि पानि, जस जगत छायौ-१-५। (ख) पर्वत सहित धोइ ब्रज डारौं देउँ समुद्र बहाई। मेरी बलि औरहिं लै अर्पत इनकी करौं सजाई।
संज्ञा
[सं.]

बलि
वह पशु जो किसी देवी-देवता पर भेंट चढ़ाने के लिए मारा जाय।
संज्ञा
[सं.]

बलि
बलि चढ़ना- मारा जाना। बलि चढ़ाना- (१) मारना। (२) देवता के लिए मारना। बलि-बलि जाना- निछावर होना। बलि जाइ- निछावर होता है। उ.-यह सुख निराखि मुदित सुर-नर-मुनि, सुरदास बलि जाइ-९-२९।
मु.

बलि
प्रहलाद का पौत्र और विरोचन का पुत्र जिसे छलकर वामन भगवान ने पाताल भेजा था।
उ.-जुग जुग बिंरद इहै चलि आयो भए बलि के द्वारे प्रतिहार-२६२०।
संज्ञा
[सं.]

बलि
सखी।
संज्ञा
[सं. बला=छोटी बहन]

बलिकर्म
बलिदान।
संज्ञा
[सं.]

बलित
बलि चढ़ाया हुआ।
वि.
[हिं. बलि]

बलित
घूमा या मुड़ा हुआ।
वि.
[सं. वलित]

बलिदान
देवी-देवता को नैवेद्य चढ़ाना।
संज्ञा
[सं.]

बलिदान
पशु को देवी-देवता के नाम पर मारना।
संज्ञा
[सं.]

बलिनंदन
वाणासुर।
संज्ञा
[सं.]

बलिपशु
वह पशु जो देवी-देवता पर भेंट चढ़ाने के लिए मारा जाय।
संज्ञा
[हिं. बलि + पशु]

बलिष्ठ
बहुत बली या सशक्त।
वि.
[सं.]

बलिहारना
निछावर करना।
क्रि. स.
[हिं. बलि + हारना]

बलिहारी
निछावर, अपने को उत्सर्ग कर देना।
उ.-बेर मेरी क्यौं ढील दीन्ही, सूर बलिहारी-१-१७६।
संज्ञा
[हिं. बलि + हारना]

बलिहारी
बलिहारी जाना- निछावर होना, बलैया लेना। बलिहारी लेना- प्रेम दिखाना। लेन लगीं बलिहारी- बलैया लेने लगीं। उ.-दरसन करि जसु-मति-सुत को सब लेन लगीं बलिहारी। बलिहारी है- (१) इतना सुंदर है कि मैं अपने को निछावर करने को प्रस्तुत हूँ (प्रशंसा)। (२) इतना बुरा या बेढंगा है कि धन्य है (व्यंग्य)।
मु.

बलिहि
भोजन से निकाला हुआ ग्रास।
उ.-पिक चातक बन धसन न पावहिं बाइस बलिहिं न खात-३४६०।
संज्ञा
[सं. बलि + हिं. हि]

बली
बलवान, पराक्रमी।
उ.-काल बली तैं सब जग काँप्यौ-१-५२।
वि.
[सं. बलिन्]

बलीमुख
बंदर।
संज्ञा
[सं. बलिमुख]

बलुआ
रेतीला।
वि.
[हिं. बालू]

बलैया
बला, बलाय।
उ.-(क) फोरतौ बासन सब, जानति बलैया-३७२। (ख) यह सुनिकै हरि हँसे, काल्हि मेरी जाय बलैया-४३७।
संज्ञा
[हिं. बलाय]

बलैया
बलैया लेना- मंगल कामना करते हुए प्यार करना। लेति बलैया- मंगल-कामना करते हुए प्यार करती है। उ.-(क) सिखवति चलन जसोदा मैया। ¨¨¨¨¨¨। कबहुँक सुंदर बदन बिलोकति पर आनंद भरि लेति बलैया-१०-११५। (ख) सूर निंरखि जननी हँसी, तब लेति बलैया-६६६।
मु.

बल्कल
वृक्ष की छाल के वस्त्र जिन्हें तपस्वी पहनते थे।।
उ.-पात्र स्थान हाथ हारे दीन्हे। बसन-काज बल्कल प्रभु कीन्हे-२-२०।
संज्ञा
[सं. वल्कल]

बल्कि
प्रत्युत।
अव्य.
[फ़ा.]

बल्ली
खंभा।
संज्ञा
[हिं. बल्ला]

बल्ली
डाँड़।
संज्ञा
[हिं. बल्ला]

बल्ली
लता, बेल।
संज्ञा
[सं. वल्ली]

बवँडत
मारा-मारा फिरता है।
उ.-इत उत है तुम बवँडत डोलत करत आपने जी की।
क्रि. अ.
[हिं. बवँडना]

बवँडना
घूमना।
क्रि. अ.
[सं. व्यावर्त्तन, प्रा. व्यावट्टन]

बवंडर
बगूला, चक्रवात।
संज्ञा
[सं. वायु + मंडल]

बवंडर
आँधी, तूफान।
संज्ञा
[सं. वायु + मंडल]

बवधूरा
बगूला, बवंडर।
संज्ञा
[हिं. वायु + घूर्णन]

बवना
बोना।
क्रि. स.
[सं. बयन]

बवना
बिखराना।
क्रि. स.
[सं. बयन]

बल्कि
अच्छा हो यदि।
अव्य.
[फ़ा.]

बल्लभ
पति।
संज्ञा
[सं. वल्लभ]

बल्लभ
प्रेमी।
संज्ञा
[सं. वल्लभ]

बल्लम
सोंटा।
संज्ञा
[हिं. बल्ला]

बल्लम
भाला।
संज्ञा
[हिं. बल्ला]

बल्लव
चरवाहा।
संज्ञा
[सं.]

बल्लव
रसोइया।
संज्ञा
[सं.]

बल्ला
डंडा।
संज्ञा
[सं. वल=लटठा]

बल्ला
डाँड़ा।
संज्ञा
[सं. वल=लटठा]

बल्लिन, बल्लिनि
लताएँ, बेलें।
उ.-पुहुप गए बहुरौ बल्लिन के नेक निकट नहिं जात-३३५४।
संज्ञा
[सं. वल्ली]

बवना
छिटकना, बिखरना।
क्रि. अ.

बवना
वामन अवतार।
संज्ञा
[सं. वामन]

बवरना
आम में बौर लगना।
क्रि. अ.
[हिं. बौरना]

बसंत
वसंत ऋतु।
संज्ञा
[सं. वसंत]

बसंत
बसते हो।
उ.-ब्रज-बनिता के नयन प्रान बिच तुमही स्याम बसंत।
क्रि. अ.
[हिं. बसना]

बसंती
बसंत ऋतु संबंधी।
वि.
[हिं. बसंत]

बसंती
सरसों के रंग का, खुलते पीले रंग का।
वि.
[हिं. बसंत]

बसंती
हलका पीला रंग।
संज्ञा

बसंती
पीला कपड़ा।
संज्ञा

बसंदर
आग।
संज्ञा
[सं. वैश्वानर]

बसति
बसती है, वास करती है।
उ.-(क) परम कुबुद्धि, अजान ज्ञान तैं, हिय जु बसति जड़ताई-१-१८७। (ख) नाहिंन बसति लाल कछु तुम्हरै-७३५।
क्रि. स.
[हिं. बसना]

बसतै
बसता, निवास करता।
क्रि. अ.
[हिं. बसना]

बसतै
बसतै रहियै-निवास कर सकूँ, बसूँ, बसा रहूँ।
उ.-सोइ करौ जु बसतै रहियै, अपनौ धरियै नाउँ-१-१८५।
प्र.

बसन
वस्त्र।
उ.-कमलनैन काँधे पर न्यारो पोत बसन फहरात-२५३९।
संज्ञा
[सं. वसन]

बसना
रहना, वास करना।
क्रि. अ.
[हिं. वसन]

बसना
आबाद होना। घर बसना-विवाह करके गृहस्थ बनना। घर में बसना-घर बनाकर सुख से रहना।
क्रि. अ.
[हिं. वसन]

बसना
टिकना, ठहरना, डेरा डालना।
क्रि. अ.
[हिं. वसन]

बसना
मन में बसना- हर समय ध्यान रहना।
मु.

बसना
सुगंधित हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. बास]

बसना
बेठन।
संज्ञा
[सं. वसन]

बस
अधिकार, काबू।
संज्ञा
[सं. वश]

बस
वशीभूत, विवश, अधीन।
उ.-(क) जिहिं जिहिं जोनि फिर्यौ संकट-बस तिहिं-तिहिं यहै कमायौ-१-१११। (ख) सदा सुभाव सुलभ सुमिरन बस, भक्तनि अभै दियौ-१-१२१।
संज्ञा
[सं. वश]

बस
किसी बात को अपने अनुकूल घटित करने की सामर्थ्य, शक्ति, काबू।
उ.-गर्भ परिच्छित रच्छा कीनी, हुतौ नहीं बस माँ कौ-१-११३।
संज्ञा
[सं. वश]

बस
पर्याप्त, बहुत काफी।
वि.
[फ़ा.]

बस
बस या बस करो- इतना पर्याप्त है।
मु.

बस
पर्याप्त।
अव्य.

बस
केवल, इतना मात्र।
अव्य.

बसत
बसा है, स्थिति है।
उ.-कालिंदी कैं कूल बसत इक मधुपुरि नगर रसाला-१०-४।
क्रि. अ.
[हिं. बसना]

बसत
बसते हैं, रहते हैं।
उ.-जाति-पाँति हमतैं बहु नाहीं, नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ-१०-२४५।
क्रि. अ.
[हिं. बसना]

बसत
प्रान बसत हैं- इन्हीं को देखकर जीवित हूँ। उ.-इनहीं में मेरे प्रान बसत हैं, तेरे भाएँ नैकु न माई-७१०।
मु.

बसना
थैली।
संज्ञा
[सं. वसन]

बसनि
बास, निवास।
संज्ञा
[हिं. बसना]

बसवास
निवास।
उ.-(क) मथुरा में बसवास तुम्हारौ। (ख) जौ तुम पुहुप पराग छाँड़ि कै करौ ग्राम बसवास।
संज्ञा
[हिं. बसना + वास]

बसवास
रहने का ढंग, स्थिति।
संज्ञा
[हिं. बसना + वास]

बसवास
रहने का डौल या ठिकाना।
उ.-अब बसवास नहीं लखौं यहि तुव ब्रज नगारी।
संज्ञा
[हिं. बसना + वास]

बसर
गुजर, निर्वाह।
संज्ञा
[फ़ा.]

बसह
बैल।
उ.-अमरा सिव रषि ससि चतुरानन हय गय बसह हंस मृग जावत।
संज्ञा
[सं. वृषभ, प्र. बसह]

बसा
बर्र, भिड़, ततैया।
संज्ञा
[देश.]

बसाइ
वश, जोर या अधिकार चलता है।
उ.-(क) तौ कछु न बसाइ पार्थ जौ श्रीपति तोहिं जितावै-१-२७५। (ख) जहाँ तहाँ सोइ करत सहाइ। तासौं तेरौ कछु न बसाइ-७-२। (ग) यासौं हमरौं कछु न बसाइ-७-७।
क्रि. अ.
[सं. वश]

बसाई
बसने या रहने को प्रवृत्त किया।
उ.-पृथी सम करि प्रजा सब बसाई-४-११।
क्रि. स.
[हिं. बसाना]

बसाना
रखना।
क्रि. स.
[सं. वेशन]

बसाना
वश या जोर चलना।
क्रि. अ.
[हिं. बस]

बसाना
महकना, सुगंध देना।
क्रि. अ.
[हिं. बास]

बसायो, बसायौ
बसाया, टिकाया।
क्रि. स.
[हिं. बसना]

बसायो, बसायौ
हृदय बसायौ- चित्त में इस प्रकार जमाया कि सदैव ध्यान बना रहे, हृदय में (सदा के लिए) अंकित किया, हृदयंगम किया। उ.-ब्यासदेव जब सुकहिं पढ़ायौ। सुनि कै सुक सो हृदय बसायौ-१-२२७।
मु.

बसायो, बसायौ
स्थित किया।
उ.-हरि जी कियौ बिचार, सिंधु-तट नगर बसायौ-१० उ.-३।
क्रि. स.
[हिं. बसना]

बसायो, बसायौ
वश, जोर या अधिकार चल सका।
उ.-उनसौं हमरौ कछु न बसायौ। तातैं तुम कौं आनि सुनायौ-६-४।
क्रि. अ.
[हिं. बस]

बसावै
बस, जोर या अधिकार चलता (हे)।
उ.-कह्यौ, इंद्रानी मोपै आवै। नृप सौं ताकौं कहा बसावै-६-७।
क्रि. अ.
[हिं. बस]

बसाहीं
बसते हैं।
उ.- सूरदास प्रभु टरत न टारे नैननि सदा बसाहीं-१४३९।
क्रि. अ.
[हिं. बसना]

बसाऐ
रहिए, वास कीजिए।
उ.- गोकुल होत उपद्रव दिन प्रति, बसिऐ बृन्दावन में जाई-४०२।
क्रि. अ.
[हिं. बसना]