उ.- सुमिरन, ध्यान, कथा हरिजू की, यह एकौ न रही। लोभी, लंपट, बिषयिनि सौं हित, यौं तेरी निबही -१-३२४।
निर्वाह किया, पालन किया, रक्षा की।
उ.- रही ठगी चेटक सौ लाग्यौ, परि गई प्रीति सही।¨¨¨¨¨। सूर स्याम पै ग्वालि सयानी सरबस दै निबही - १०-२८१।
उ.- हम जान्यौ ऐसेहिं निबहैगी उन कछु औरै ठानी - ३३५९।
पार पाऊँगा, मुक्ति या छुटकारा पाऊँगा।
उ.- माधौ जू, सो अपराधी हौं। जनम पाइ कछु- भलौ न कीन्हौ, कहौ सु क्यों निबहौं - १-१५१।
पार पाओगे, बचोगे, छुट्टी पाओगे, छुटकारा मिलेगा।
उ.- लरिकनि कौं तुम सब दिन भुठवत मोसौं कहा कहौगे। मैया मैं माटी नहिं खाई, मुख देखौं, निबहौगे - १०-२५३।
निर्वाह किया, पूरा किया, पाला।
उ.- सूरदास धनि धनि वह प्रानी, जो हरि कौ ब्रत लै निबह्यौ - २-८।
उ.- दुर्बासा कौ साप निबारयौ, अंबरीषपति राखी - १-१०।
निबाहने की क्रिया या भाव।
संबंध, क्रम या परंपरा का निर्वाह।
उ.- कीन्हे नेह-निबाह जीव जड़ ते इत उत नहिं चाहत - १-२१०।
(वचन आदि का) पालन या पूर्ति।
वश, जोर या अधिकार चलता है।
उ.-चाहत बास कियो बृन्दाबन बिधि सौं कछु न बसाई-१० उ.-१०६।
बस जाने दिया, रहने दिया रहने को ठिकाना दिया।
उ.-नूपुर कलरव मनु हंसनि-सुत रचे नीड़, दै बाँह बसाए-१०-१०४।
उ.-नाहिंन बसात लाल कछु तुमसौं सबै ग्वांल इक-ठैयाँ।
घर बसाना- विवाह करके गृहस्थ बनना।
टिकने देना, ठहराना, स्थित करना।
मन में बसाना- (१) हर समय ध्यान बनाये रखना। (२) प्रेम करना।
उ.- (क) नगर आहि नागर बिनु सूनो कौन काज बसिबे सौं-३३६५। (ख) वहाँ के बासी लोगन को क्यो ब्रज को बसिबो भावै री-१० उ.-८४। (ग) या ब्रज कौ बसिबौ हम छाँड़यौ-१०-३३७।
बसते या रहते हैं, वास है, रहना है।
उ.- बसिये एकहिं गाँउ कानि राखत हैं ताते-११२५।
उ.- सूर कहि कर तैं दूर बसियै सदा, जमुन कौ नाम लीजै जु छानैं-१-२२३।
वसिष्ठ मुनि जो राजा दशरथ के कुल-गुरू थे।
उ.- तुम सारिखे बसिष्ठ पठाए कहिए कहा बुद्धि उन केरी-३०१२।
उ.- सुबस बसी मथुरा ता दिन ते उग्रसेन बैठायौ-सारा. ५३३।
तंत्र के चार प्रकारों (मारण, मोहन, वशीकरण और उच्चाटन) में एक, मणि, मंत्र या औषध द्वारा किसी को वश में करने का प्रयोग।
उ.- मोहन, मुर्छन, बसीकरन पढ़ि अग मिति देह बढाऊँ-१०-४९।
उ.- (क) अति सठ ढीठ बसीठ स्याम को हमैं सुनावत गीत। (ख) मैं कुल-कानि किये राखति हौं, ये हठि होत बसीठ-पृ. ३३४ (३६)।
[सं. अवसृष्ट, प्र. अवसिट्ठ=भेजा हुआ]
दूत-कर्म, संदेश देने का कार्य।
उ.- (क) नैननि निरखि बसीठी कीन्हीं मनु मिलियो पद पानी-११९७। (ख) हारि जोहारि जो करत बसीठी प्रथमहिं प्रथम चिन्हारि-१००६।
उ.- इनही ते ब्रजबास बसीनो-१००६।
आठ वैदिक देवताओं का एक गण।
उ.- बामन रूप धरथौ बलि छलि कै, तीनि परग बसुधाऊ-१०-२२१।
उ.-परनि परेवा प्रेम की, (रे) चित लै चढ़त अकास। तहँ चढ़ि तीय जो देखई, (रे) भू पर परत निसास-१-३२५।
उ.-राका निसि केते अंतर ससि निमिष चकोर न लावत-१-२१०।
उ.-जब देख्यौ दिव्यबान निसिचर कर तान्यौ। छाँड़थौ तब सूर हनू ब्रम्ह-तेज मान्यौ-९-९६।
उ.-तहँ इक अद्भुत देखि निसिचरी सुरसामुख-बिस्तार-९-७४।
बृष है लग्न, उच्च के निसिपति, तनहिं बहुत सुंख पैहैं-१०-८६।
जिसमें किसी चीज का मेल न हो, विशुद्ध।
उ.-तब लगि सेवा करि निस्वय सौं, जब लगि हरियर खेत-१-३२२।
उ.-ज्यौं-त्यौं कोउ हरि-नाम उच्चरै। निस्वय करि सो तरै पै तरै-६-४।
पक्का विचार. दृढ़ संकल्प।
पूर्ण विश्वास, अटल विश्वास।
उ.-जो जो जन निस्चै करि सेवै, हरि निज बिरद सँभारै। सूरदास प्रभु अपने जन कौं, उर तैं नैंकु न टारै-१-२५७।
पार जाने या होने की क्रिया या भाव।
निस्तार पाता, मुक्तहोता, छूट जाता।
उ.-मोतै कछू न उबरी हरि जू, आयौ चढ़त-उतरतौ। अजहूँ सूर पतित-पद तजतौ, जौ औरहु निस्तरतौ-१-२०३।
छुटकारा पायँगे, मुक्त होंगे, छूट जायेंगे।
उ.-जौ कहौ, कर्मयोग जब करिहैं। तब ये जीव सकल निस्तरिहैं-७-२।
पार जाऊँपा, मुक्त होऊँगा।
उ.-हौं तौ पतित सात पीढ़िन कौ, पतितै ह्वै निस्तरिहौं-१-१३४।
जिसके तल की थाह न हो, अथाह, गहरा।
छुटकारा, बचाव, मोक्ष, उद्धार।
उ.-(क) बिन हरि भजन नाहिं निस्तार-४-१२। (ख) बिना कृपा निस्तार न होइ-७-२।
जिलका निस्तार हो चुका हो।
जिसमें कंप या धड़कन न हो।
नाक या मुँह से बाहर आनेवाली साँस।
बचाना, छुड़ाना, उद्धार करना।
छुड़ाते हो, मुक्त करते हो, उद्धारते हो।
उ.-मोसौ कोउ पतित नहिं अनाथ-हीन-दीन। काहे न निस्तारत प्रभु, गुननि अंगनि-हीन-१-१८२।
[सं. निस्तर + ना (प्रत्य.)]
निस्तार करने या मुक्ति दिलाने वाला।
उ.-बरुन बिषाद नंद-निस्तारन-९८२।
उ.-अंध कूप ते काढ़ि बहुरि तेहि दरसन दै निस्तारा-१०उ.-८०।
उद्धार करो, मुक्ति प्रदान करो, छुड़ाओ।
उ.-कै प्रभु हार मानि कै बैठौ, कै अबहीं निस्तारौ-१-१३९।
निहकरमा, निहकरमी, निहकर्मा, निहकर्मी
उ.-लै उछंग उपसंग हुतासन, निहकलंक रघुराई-९-१६२।
जो काम कामना से न किया जाय।
जिसमें कामना या आसक्ति न हो।
उ.-प्रभु हैं निरलोभी निहकामी-१००५।
निश्चिंत, चिंतारहित, बेफिक्र।
जदुपति कह्यौ घेरि हौं आनौ, तुम जेंवहु निहचिंत भए-४३८।
चिंतारहित, चिंता से मुक्त।
उ.-गोबिंद गाढ़े दिन के मीत। गज अरु ब्रज प्रहलाद द्रौपदी, सुमिरत ही निहचीत-१-३१।
उ.-निहचै एक असल पै राखे, टरै न कबहूँ टारै-१-१४२।
नियमित या व्यवस्थित करना।
जो नियमानुकूल हो, व्यवस्थित।
उ.-जा बन की नृप इच्छा करैं। ताही द्वार होइ निस्सरै-४-१२।
जिसमें स्वार्थ का भाव न हो।
अकेला, एकाकी रहने-विचरनेवाला।
जो दुलार के कारण बहुत ढीठ हो गया हो।
निहकरमा, निहकरमी, निहकर्मा, निहकर्मी
जिसके हाथ में अस्त्र-शस्त्र न हो।
लोहे का एक औजार जिस पर रखकर कोई धातु कूटी पीटी जाती है।
आकाश में कुहरे- सी फैली हुई प्रकाश-रेखा।
उ.-अँधियारी आई तहँ भारी। दनुजसुता तिहिंतैं न निहारी-९-१७४।
ध्यानपूर्वक देखा, दृष्टि डाली।
उ.-आइ निकट श्रीनाथ निहारे, परी तिलक पर दीठि-१-२७४।
उ.-दोऊ ताकी ओर निहारैं-६-४।
उ.-षोड़स जुक्ति, जुवति चित षोडस, षोड़स बरस निहारै-१-६०।
उ.-याकौ सुंदरं रूप निहारौ-७-७-।
उ.-तोरि कोदंड मारि सब जोधा तब बल-भुजा निहारथौ-२५८६।
उ.-घँसि कै गरल लगाय उरोज़न कपट न कोउ निहारथौ।
पूर्ण संतुष्ट और प्रसन्न।
उ.-(क) जैसैं रंक तलक धन पाए ताहि महा वह होत निहाल-१३२३। (ख) जन्म मरन तैं रहि गयौ वह कियौ निहाला-२५७७।
उ.-तबहूँ गयौ न क्रोध-बिकार। महादेव हू फिरे निहार-७-२।
भरत चलै पथ जीव निहार। चलै नहीं ज्यौं चलैं कहार-५-४।
उ.-झूठौ मन, झूठी सब काया, झूठी आरभटी। अरु झूठनि के बदन निहारत मारग फिरत लटी-१-९८।
उ.-नावसत साजि सिंगार बनी सुंदरि आतुर पंथ निहारति-२५६२।
निहारने की क्रिया या भाव, चितवनि।
उ.-काकौ बदन निहारि द्रौपदी दीन दुखी संभरिहै ? -१-२९।
प्रार्थना की, विनय की, खुशामद की।
उ.-मोहिं भयौ माखन पछितावौ रीती देखि कमोरी। जब गहि बाँह कुलाहल कीनी, तब गहि चरन निहोरी-१०-२८६।
प्रशंसा, कृतज्ञता-प्रदर्शन।
उ.-दै मैया भौंरा चक डोरी।¨¨¨¨। मैया बिना और को राखै, बार-बार हरि करत निहोरी-१०-६६९।
मनाने या बहलाने कै लिए कहे गयै वचन या किये गये कार्य।
उ.-बरा कौर मेलत मुख भीतर, मिरिच दसन टकटौरे।¨¨¨¨। सूर स्याम कौं मधुर कौर दै कीन्हें तात निहोरे-१०-२२४।
अनुग्रह, कृतज्ञता, एहसान, उपकार।
उ.-(क) गीध, ब्याध, गज, गौतम की तिय, उनकौ कौन निहोरौ। गनिका तरी आपनी करनी, नाम भयौ प्रभु तोरौ-१-१३२। (ख) बिप्र सुदामा कियौ आजाची, प्रीति पुरातन जानि। सूरदास सौं कहा निहोरौ, नैननि हूँ की हानि-१०-१३५। (ग) कह दाता जो द्रवै न दीनहिं देंखि दुखित ततकाल। सूर स्याम कौ कहा निहोरौ तलत बेद की चाल-१-१५९।
उ.-गोबिंद गुन चित बिसारि, कौन नींद सोयौ-१-३३०।
नींद उचटना- फिर नींद न आना।
नींद उचाटना- नींद न आने देना।
नींद उचाट होना- नींद टूटने पर फिर न आना।
नींद जाना- नींद न आना।
नीद गई- नींद आती ही नहीं। उ.- कहा करौं चलत स्याम के पहिलेहि नींद गई दिन चार-२७९५।
नींद पड़ना- नींद आना।
नींद भरना- पूरी नींद सोना।
नींद भर सोना- जी भरकर सोना।
नींद लेना- सो जाना।
नींद लीन्हीं- सोयी। उ.-जब तें प्रीति स्याम सों कीन्हीं। ता दिन ते मेरे इन नैननि नैंकहुँ नींद न लीन्हीं।
नींद संचारना- नींद आना।
नींद हराम करना - सोने न देना।
नींद हराम होना- सो न सकना।
उ.-नींदति सैल उदधि पन्नग को श्रीपति कमठ कठोरहिं-२८६२।
वाक्य का अर्थ जो महत्वपूर्ण तो हो, पर जल्दी न खुले।
झुकाना नवाना, नीचे या नम्र करना।
उ.- (क) प्रभु, मोहिं राखियै इहिं ठौर। केस गहते कलेस पाऊँ, करि दुसासन जोर। करन, भीषम, द्रोन मानत नाहिं कोउ निहोर-१-२५३। (ख) चितै पघुनाथ बदन की ओर। रघुपति सौं अब नेम हमारौ बिधि सौं करति निहोर-९-२३। (ग) लाइ उरहिं, बहाइ रिस जिय, तजहु प्रकृति कठोर। कछुक करुना करि जसोदा करतिं निपट निहोर-१०-३६४। (घ) माखन हेरि देतिं अपनैं कर, कछु कहि बिधि सौं करतिं निहोर-१०-३९८।
उ.-ग्वालिन चली जमुना बहोरि। वाहि सब मिलि कहत आवहु कछू कहति निहोरि।
उ.-(क) होरी खेलन की बिधि नीकी। (ख) माखन खाइ, निदरि नीकी बिधि यह तेरे सुत की घात-१०-३०६।
उ.-लोग सकल नीके जब भए। नृप कन्या दै, गृह कौं गए-९-२।
उ.-इतने काज किये हरि नीके-२६४३।
उ.-हरि की भक्ति करो सुत नीके जो चाहो सुख पायो।
उ.-नीकैं गाइ गुपालहिं मन रे। जा गाए निर्भय पद पाए अपराधी अनगन रे-१-६६।
उ.-(क) कोउ न समरथ अघ करिबे कौं, खैंचि कहत हौं लीकौ।मरियत लाज सूर पतननि मैं, मोहूँ तैं को नीकौ-१-१३८। (ख) हम तैं बिदुर कहा है नीकौ-१-२४३।
उ.-यक ऐसेहि झकझोरति मोको पायो नीको दाउँ-१६१३।
दोष देन कौं नीकौ- दोष देने को सदा तैयार, दूसरों के दोष निकालने में तेज। उ.-महा कठोर, सुन्न हिरदै कौ, दोष देन कौं नीको-१-१८६।
जाति, गुण, कर्म आदि में घट कर होना, क्षुद्र तुच्छ।
नीच मनुष्य, क्षुद्र व्यक्ति।
जो जाति, पद आदि में घटकर हो।
नीचा-ऊँचा- (१) भला-बुरा। (२) हानि-लाभ। (३) सुख-धुख।
नीचा खाना- (१) अपमानित होना। (२) पराजित होना। (३) लज्जित होना।
नीचा दिखाना- (१) अपमानित करना। (२) पराजित करना। (३) लज्जित करना। (४) घमंड चूर करना।
नीचा देखना- (१) अपमानित होना। (२) लज्जित होना। (३) घमंड चूर होना।
नीची दृष्टि करना- (लज्जा-संकोच से) सिर झुकाना।
नीची द्दष्टि से देखना- तुच्छ या छोटा समझना।
पलक झपकना भी, पलक गिरना तक।
उ.- अब इहिं बिरह अगर जो करी हम बिसरी नैन निमेषै - ३१९०।
चने या मटर के पिसे हुए हरे दानों को हल्दी-मसाले के साथ घी में भूनकर बनाया हुआ रसदार व्यंजन।
उ.- बहुत मिरच दैं किए निमोना। बेसन के दस-बीसक दोना - १०-३९६।
वह दिन जब पहली बार ईख काटी जाती है।
नीचे की ओर जाने या बहनेवाली।
उ.-ता दिन ते नींदौं पुनि नासी चौंकि परति अधिकारे-३०४५।
उ.-(क) नींब लगाइ अंब क्यौं खावै-१०४२। (ख) ता ऊपर लिखि जोग पठावत खाहु नींब तजि दाख-३३२२।
उ.-घायल सबै नीक ह्वै गए-४-५।
[सं. निक्त=स्वच्छ, साफ; फा. नेक]
[सं. निक्त=स्वच्छ, साफ; फा. नेक]
उ.-(क) सारँग सुत निकन ते बिछुरत सर्प बेलि रस जाई-सा. १६। (ख) नीकन अधिक दिपत हुत ताते अंतरिच्छ छवि भारी-सा. ५१।
उ.-तेई कमल सूर नित चितवत नीठ निरंतर संग-सा. ३-४४।
[सं. अनिष्टि, प्रा. अनिट्ठि]
उ.-छेक उक्त जहँ दुमिल समझ केका समुझावत नीटो। मिसिरी सूर न भावत घर की चोरी को गुड़ मीठो-सा० ९०।
चिड़ियों के रहने का घोंसला।
उ.-नूपुर कलरव मनु हंसनि सुत रचे नीड़, दै बाहँ बसाए-१०-१०४।
उ.-किधौं मंद गरजनि जलधर की पग नूपुर रव नीत।
उ.-लगे फरकन अंतरिछ अनूप नीतन रंग-सा. ७५।
[हिं. नीति=नीत=नय + न=नयन]
उ.-गुरु-पितु-ग्रह बिनु बोलेहु जैऐ। है यह नीति नाहिं सकुचेऐ-४-५।
ले जाने-चलने की क्रिया या भाव।
उ.-समुझि निज अपराध करनी नारि नावति नीचि-३४७५।
उ.-(क) (कह्यौ) उहाँ अब गयौ न जाइ। बैठि गई सिर नीचैं नाइ-४-५। (ख) सुरपति-कर तब नीचैं आयौ-९-३। (ग) सुनि ऊधौ के बचन नीचे कै तारे-३४४३।
नीचे-ऊपर- (१) एक पर एक, तले ऊपर। (२) उलट-पलट अस्त-व्यस्त।
नीचे गिरना- (१) मान-मर्यादा खोना। (२) पतित होना। (२) कुश्ती में हारना। नीचे डालना - (१) फेंकना। (२) पराजित करना।
नीचे लाना- कुश्ती में हराना।
उपर ले नीचे तक- (१) सब भागों में। (२) सिर से पैर तक।
उ.-सूर सीस नीच्यो क्यों नावत अब काहे नहिं बोलत-३१२१।
उ.-द्वै नृप लरत जाइ इन्द्रीगत कहा सूर को नीत्यो - २८९८।
उ.-एक घरी धीरज धरौं, बैठौ सब तर नीप-५८९।
उ.-नीबी ललित गही जदुराइ-६८२।
उ.-जानि लेहु हारि इतने ही में कहा करै नामन को बैद।
नीमषार, नीमषारण्य, नीमषारन
अवध के सीतापुर जिले में स्थित एक प्राचीन वन जो हिंदुओं का एक तीर्थस्थान माना जाता है।
जोमे के नीचे का एक पहनावा।
नीयत डिगना- मन में दोष या स्वार्थ आ जाना।
नीयत बद होना- मन में बुराई आना।
नीयत बदल जाना- (१) इच्छा या विचार कुछ का कुछ हो जाना। (२) भले से बुरा विचार हो जाना।
नीयत बाँधना- इरादा करना।
नीयत बिगड़ना- (१) इच्छा या विचार कुछ का कुछ हो जाना। (२) भले से बुरा विचार हो जाना।
नीयत भरना- इच्छा पूरी होना, जी भरना।
नीयत में फर्क आना- भला विचार बुरे में बदल जाना।
नीयत लगी रहना- जी ललचाता रहना।
नीर ढलना- मरते समय आँसू बहना।
उ.-कहँ वह नीर, कहाँ वह सोभा कहँ रँग-रूप दिखैहै-१-८३।
किसी का नीर ढल जाना- आत्माभिमान की भावना का न रह जाना, निर्लज्ज या बेहया हो जाना।
उ.-(क) पिउ पद-कमल कौ मकरंद। मलिन मति मन मधुप, परिहरि, बिषय नीरस मंद-९-१०। (ख) जीवै तो राजसुख भोग पावै जगत मुए निर्बान नीरस तुम्हारो-१० उ.-५७।
उ.-सूरदास क्यों नीर चुवत है नीरस बचन निचोयो-३४८२।
ताड़ के वृक्ष का बहुत स्वादिष्ट, गुणकारी और मस्त कर देनेवाला रस।
उ.-तुम इक कहत सकल घटै ब्यापक अरु सबही के नीरे-३१९८।
उ.-पसुपति मंडल मध्य मनो मनि छीरधि नीरधि नीर के-२५९९।
जिसमें शब्द न हो, निःशब्द।
नीले या गहरे आसमानी रंग का।
एक पौधा जिससे यह रंग निकाला जाता है।
नील का टीका लगना- कलंक लगना।
नील का टीका लगाना- कलंकी सिद्ध कर देना।
नील कौ खेत- कलंक का स्थान। उ.-सेवा नहिं भगवंत चरन की, भवन नील कौ खेत-२-१५।
नील की सलाई फिरवाना- आँखें फुड़वा देना।
नील घोटना- किसी बात को लेकर बहुत देर तक उलझना।
नील जलाना- पानी बरसाने के लिए नील जलाने का टोटका करना।
नील बिगड़ना- (१) चरित्र बिगड़ना। (२) चेहरे की आकृति बिगड़ना। (३) कलंक की बात फैलना। (४) बुद्धि ठिकाने न रहना। (५) दुर्दशा होना। (६) दिवाला निकलना।
शरीर पर पड़नेवाला चोट का नीला निशान।
नील डालना- इतना मारना कि शरीर पर मार के नीले-काले निशान बन जायें।
नाटक में सबको छोड़कर केवल एक ही उपाय से फल प्राप्ति का निश्चय।
निश्चित या बद्ध होने का भाव।
एक सिद्धांत जिसके अनुसार विश्वास किया जाता है कि जो कुछ संसार में घटित होता है, वह पूर्व निश्चित और अटल है।
उ.-सीय-सुधि सुनत रघुबीर धाए। चले तब लखन, सुग्रीव, अंगद, हनू, जामवँत, नील, नल, सबै आए-९-१०६।
एक संख्या जो दस हजार अरब की होती है।
उ.-सिर पर धरि न चलैगौ कोऊ, जो जतननि करि माया जोरी। राजपाट सिंहासन बैठो, नील पदुम हूँ सौं कहै थोरी-१-३०३।
नीले रंग का रत्न, नीलमणि, इंद्रनील नामक मणि।
नीला या काला वस्त्र धारण करनेवाला।
नीले रंग का (प्रायःरेश्मी) वस्त्र।
उ.- दाऊ जू, कहि स्याम पुकार्यौ। नीलांबर कर ऐंचि लियौ हरि, मनु बादर तैं चंद उजार्यौ-४०७।
नीले या काले वस्त्र धारण करनेवाला।
नीला करना- इतना मारना कि शरीर पर नीले दाग पड़ जायँ.।
नीला-पीला होना- क्रोध दिखाना।
नीले हाथ-पाँव हों- मर जाय।
चेहरा नीला पड़ जाना- (१) लज्जा, संकोच या भय से चेहरे का रंग फीका पड़ना। (२) मृत्यु के पश्चात् आकृति बिगड़ जाना।
उ.-अमला अबला कंजा मुकुता हीरा नीला प्यारि-१५८०।
उ.-नीलावती चावल दिव-दुर्लभ। भात परोस्यौ माता सुरलभ-३९६।
घर की दीवार उठाने के लिए गहरा किया हुआ स्थान।
नीव देना- घर उठाना प्रारंभ करना।
नींव का पत्थर- मकान बनाने के लिए रखा जाने वाला पहला पत्थर।
नीव जमाना (डालना, देना)- दीवार की जड़ जमाना जमाना।
नीव पड़ना- घर बनना आरंभ होना।
नीव देना- कार्यारंभ करना।
नीव का पत्थर- कार्यारंभ का प्रथम चरण।
नीव जमना- जड़ या स्थिति मजबूत कर लेना।
नीव डालना- कार्यारंभ करना।
नीव पड़ना- कार्यारंभ होना।
उ.-(क) है हरि-भजन कौ परमान। नीच पावैं ऊँच-पदवी, बाजते नीसान-१-२३५। (ख) देवलोक नीसान बजाये बरषत सुमन सुधारे-पृ. ३४४ (३१)।
आकाश में कुहरे- सा फैला प्रकाश-पुंज जो रात में एक धुँदली सफेद धारी-सा दिखायी पड़ता है।।
अद्भुत वस्तुओं का संग्रह-स्थान या प्रदर्शनी।
ऊपरी तड़क-भड़कवाला, वास्तव में (निस्सार)
उ.-(क) गौरि-कंत पूजत जहँ नूतन जल आनी-९-९६। (ख) अरुन नूत पल्लव धरे रँगभीजी ग्वालिनी।
उ.-किसलै कुसुम नव नूत दसहु दिसि मधुकर मदन दोहाई-२७८४।
झटके से या खिंचकर उखड़ना।
नाखून आदि से छिलना या खरुचना।
पैर में पहनने का बच्चों और स्त्रियों का एक गहना, घूँघरू, पैंजनी।
उ.-रुनुक-झुनुक चलत पाइ नूपुर-धुनि बाजै-१०-१४६।
उ.-जब अप्सरा नृत्य करि रही। तब राजा ब्रह्या सौं कही-९-४।
उ.-मानहु नृत्यक भाव दिखावत गति लिय नायक मैन-२३२४।
उ.-(क) नृत्यत मदन फूले, फूली रति अँग-अँग, मन के मनोज फूले हलधर वर के-१०-३४। (ख) कुंडल लोल तिलक मृगमद रचि गावत नृत्यत नटवर बेस-३२२५।
बँधा हुआ क्रम या विधान, परंपरा।
निश्चित रीति या व्यवस्था।
योग के आठ नियमों में एक शौच, संतोष, तपस्या स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान - इनका निर्वाह या पालन ‘नियम’ कहा जाता है।
उ.- अनुसूया के गर्भ प्रगट ह्वै कियौ योग आराधि। यम अरू नियम प्रान प्रत्याहार धारन ध्यान समाधि - सारा० ६०।
क्रम, विधान या व्यवस्था बाँधना।
एक दानी राजा जिन्होंने अनजाने ही एक ब्राह्मण की गाय अपनी सहस्त्र गौओं के साथ दूसरे ब्राह्मण को दान मे दे दी। गाय हरण के पाप का फल भोगने के लिए राजा नृग को सहस्त्र वर्ष के लिए गिरगिट होकर कुएँ में रहना पड़ा। इस योनि से श्रीकृष्ण ने उनका उद्धार किया।
उ.-इंद्रसभा थकित भई, लगी जब करारी। रंभा कौ मान मिट्यौ, भूली नृतकारी-६४९।
[सं. नृत्य + हिं. कारी=कला]
उ.-कटि पितंबर बेष नटवर नृतत फन प्रति डोल ५६३।
उ.-जरासंध बंदी कटैं, नृप-कुल जस गावै-१-४।
नृपराई, नृपराउ, नृपराय, नृपराव
सम्राट, राजाओं में श्रेष्ठ।
भगवान विष्णु का चौथा अवतार जिसका आधा शरीर मनुष्य का और आधा सिंह का था। हिसण्यकशिपु को मारने के लिए यह अवतार धारण किया गया था।
वैशाख शुक्ल चतुर्दशी जब नृसिंहावतार हुआ था।
भूतकालिक सकर्मक क्रिया के कर्ता की विभक्ति।
थोड़ा, तनिक, कुछ, किंचित।
उ.-(क) नरक कूपनि जाइ जमपुर परथौ बार अनेक। थके किंकर-जूथ जमके, टरत टारैं न नेक-१-१०६। (ख) ढाकति कहा प्रेमहित सुंदरि सारँग नेक उघारि-२२२०।
थोड़ा, तनिक, कुछ भी, किंचित।
उ.-सात दिन भरि ब्रज पर गई नेक न झार-९७३।
नेकी और पूछ पूछ- किसी का उपकार करने में पूछने की जरूरत क्या है?
उ.-तुम बिनु नँदनंदन ब्रजभूषन होत न नेको चैन-सा. ८।
शुभ अथवा प्रस,न्नता के अवसरों पर संबंधियों, आश्रितों आदि को कुछ देने का नियम।
वह धन, वस्तु आदि जो शुभ अवसरों पर संबंधियों, आश्रितों आदि को दिया जाता है, बँधा हुआ पुरस्कार।
उ.-लाख टका अरु झूमका (देहु) सारी दाइ कौं नेग-१०-४०।
नेग लगना- (१) पुरस्कार आदि देना आवश्यक होना। (२) सार्थक या सफल होना।
शुभ अवसर पर संबंधियों, आश्रितों आदि को भेंट, उपहार आदि देने की रीति।
वह वस्तु, उपहार या धन जो ऐसे अवसर पर दिया जाय।
नेग की रीति या दस्तूर का निर्वाह करनेवाला।
[हिं. नेग + टा [प्रत्य.]]
उ.-हँसनि दुज चमक करिवर निलैहेन झलक नखन छत घात नेजा सेंभारे-१७००।
इति (अंत) नहीं है'। यह वाक्य ब्रह्म की अनंतता सूचित करने के लिए लिखा जाता है।
उ.-सोई जस सनकादिक गावत नेति नेति कहि मानि-२-३७।
वह रस्सी जिसे मथानी में लपेट कर दूध-दही मथा जाता है।
उ.-कह्यौ भगवान अब बासुकी ल्याइयै, जाइ तिन बासुकी सौं सुनायौ। मानि भगवंत-आज्ञा सो आयौ तहाँ, नेति करि अचल कौं सिंधु नायौ-८-८।
हठयोग की क्रिया जिसमें कपड़े की धज़्जी पेट मे पहुँचाकर आँते साफ करते हैं।
नेता होने का भाव, कार्य या पद, सरदारी, नेतागीरी।
किसी बात की स्थिरता या ठहराव।
उ.-आजु न जान देहुँ री ग्वालिनि बहुत दिननि को नेत-१०३५।
उ.-को उठि प्रात होत लै माखन को कर नेत गहै-२७११।
उ.-कहुँ कंकन कहुँ गिरी मुद्रिका कहुँ ताटंक कहूँ नेत-३४५६।
प्रवर्तक, निर्वाहक, संचालक।
धर्म या पुण्य की दृष्टि से व्रत, उपवास आदि का पालन।
उ.-(क) नौमी-नेम भली बिधि करै-९-५। (ख) जा सुख कौ सिव-गौरि मनाई, तिय ब्रत-नेम अनेक करी-१०-८०। (ग) नेम-धर्म-तप-साधन कीजै।¨¨¨¨। बर्ष-दिवस कौ नेम लेइ सब-७९९।
नेम-धरम-पूजा-पाठ व्रत-उपवास आदि।
पूजा पाठ, व्रत-उपवास करनेवाला।
नेमी-धरमी-पूजा-पाठ में लगा रहनेवाला।
नृत्य अभिनय या नाटक मे नर-नारी या अभिनेताओं के सजने का स्थान।
उ.-आए नँदनंदन के नेब। गोकुल माँझ जोग बिस्तारथौ भली तुम्हरी जोब।
विधान या व्यवस्था करनेवाला।
उ.-(क) बिपति परी तब सब सँग छाँड़े, कोउ न आवै नेरे-१-७९। (ख) सूरस्याम बिन अंतकाल मैं कोउ न आवत नेरे-१-८५।
उ.-तुम तौ दोष लगावन कौं सिर, बैठे देखत नेरैं-१-२०६।
उ.-हरकर पाट बंध नेवछावरि करत रतन पट सारी-२६३०।
देवता को अर्पित करने की वस्तु, भोग।
उ.-(क) बरस दिवस को दिवस हमारो घर घर नेवज करौ चँड़ाई-९१०। (ख) बहुत भाँति सब करे पकवान। नेवज करि धरि साँझ बिहाने-१००८।
निमंत्रण देकर, नेवता भेजकर।
उ.-सुर-गंधर्व जे नेवति बुलाए। ते सब बधुनि सहित तहँ आए-४-५।
उ.-कहियत कुबिजा कृष्न नेवाजी-३०९४।
जूही या चमेली की जाति का, सफेद फूलवाला एक पौधा।
उ.-कोपि कौरव गहे केस जब सभा मैं, पांडु की बधू जस नैंकु गायौ। लाज के साज मैं हुती ज्यौं द्रौपदी, बढ़थौ तन-चीर नहिं अंत पायौ-१-५।
उ.-हरि, हौं महापतित, अभिमानी। परमारथ सौं बिरत, बिषय-रत, भाव-भगति नहिं नैंकहु जानी-१-१४९।
[हिं. न + एक + हु (प्रत्य.)]
उ.-स्याम, तुम्हरी मदन-मुरलिका नैंसुक-सी जग मोहथौ-६५६।
भूतकालिक सकर्मक क्रिया के कर्ता की विभक्ति।
उ.-दियौ सिरपाव नृपराव नै महर कौं आपु पहिरावने सब दिखाए-५८७।
उ.-कहा मल्ल चाणूर कुबलिया अब जिय त्रास नहीं तिन नैको-२५५८।
नेत्रों का, नेत्र-संबंधी।
उ.-सबनि मूँदे नैन, ताहि चितये सैन, तृषा ज्यौं नीर दव अँचै लीन्हौ-५९७।
मतवाले नैन- मद भरे नैन। रस भरे या रसीले नैन- नैन जिनमें रसिकता का भाव हो।
नैन उठाना- (१) निगाह सामने करना। (२) बुरा व्यवहार करना।
नैन न उघारना- लज्जा या संकोच से आँख न खोलना।
नैन न जात उघारे- लज्जा या संकोच के कारण आँख खोलकर सामने न कर पाना। उ.- दुरलभ भयौ दरस दसरथ कौ सो अपराध हमारे। सूरदास स्वामी करुनामय नैन न जात उघारे-९-५२।
नैन चढ़ाना- झुँझलाहट, अनख या क्रोध से देखना।
नैन चढ़ाए डोलत- अनख या क्रोध से देखती घूमती है। उ.- कापर नैन चढ़ाए डोलत ब्रज में तिनुका तोर-१०-३१०।
नैन चलाना- (१) आँख मटकाकर संकेत करना। (२) अनख या क्रोध से देखना।
नैन चलावै- आँख चमकाकर या मटकाकर संकेत करती है। उ.-सखियनि बीच भरथौ घट सिर पर तापर नैन चलावै-८७५।
नैन चलावति- अनख या क्रोध से देखती हुई। उ.-कापर नैन चलावति आवति जाति न तिनका तोर-१०-३२०।
नैन जुड़ाना- आँखें शीतल होना, तृप्ति होना।
नैन जुड़ाने- नेत्रशीलत हुए, तृप्ति हुई। उ.-अँचवत तब नैन जुड़ाने-१०-१८३।
नैन भर आना- आँख में आँसू आना।
नैन भरि आए- नेत्रों में आँसू आ गये। उ.-देखत गमन नैन भरि आए गात गह्यौ ज्यौं केत-९-३९।
नैन भरि जोवना- खूब अच्छी तरह तृप्त होकर देखना।
नैन भरि जोवना- खूब अच्छी तरह देखले। उ.-चाहति नैंकु नैन भरि जोवै-१०-३।
नैन लगाना- टकटकी बांधकर देखना।
नैन रहे लगाइ- टकटकी बांधकर देखते रह गये। उ.-मथति ग्वालि हरि देखी जाइ। गए हुते माखन की चोरी, देखत छबि रहे नैन लगाइ-१०-२९८।
नैन सिराना- नेत्रों को परम तृप्ति मिलना।
नैन सिराए- आँखें ठंडी हुईं, बहुत सुख मिला। उ.-सिया-राम-लछिमन मुख निरखत सूरदास के नैन सिराए-९-१६८।
नेत्र रूपी अदालती या राजकीय कर्मचारी।
उ.-नैन अमीन, अधर्मिनि कैं बस, जहँ कौं तहाँ छयौ-१-६४।
उ.-सुत कुबेर के मत्त-मगन भए बिषै-रस नैननि छाए (हो)-१-७।
आँख पर बांधने की कपड़े की पट्टी।
उ.-अपनी रुचि जित ही जित ऐंचति इन्द्रिय-कर्म-गटी। हौं तित हीं उठि चलत कपट लगि, बाँधे नैन-पटी-१-९८।
उ.-(क) सूरदास उमँगे दोउ नैना, सिंधु-प्रवाह बह्यौ-१-२४७। (ख) नैना तेरे जलज जीत हैं, खंजन तैं अति नाचैं -१०-७१८।
उ.-दर्बा, रंभा, कृष्ना, ध्याना मैना नैना रूप-१५८०।
उ.-जा जल-शुद्ध निरखि सन्मुख ह्वै, सुन्दर सरसिज नैनी-९-११।
उ.-जाके घर की हानि होति नित, सो नहिं आनि कहै री। जाति-पाँति के लोग न देखति, और बसैहै नैरी-१०-३२४।
पश्चिम-दक्षिण-कोण का स्वामी।
पश्चिम और दक्षिण दिशाओं के दीच का कोण।
उ.-धूप-दीप-नैवेद्य साजि कै मंगल करै बिचारी-२५८७।
उ.-(क) जो जिहिं भाव भजै, प्रभु तैसे। प्रेम बस्य दुष्टनि कौं नैसे-१०-३९१। (ख) कहु राधा हरि कैंसे हैं ? तेरे मन भाए की नाहीं, की सुंदर की नैंसे हैं-१३०७।
माता-पिता का घर, मायका, पीहर।
[सं. ज्ञाति, प्रा. णाति णाई=पिता + घर]]
बैलों को हाँकने की छड़ी, औगी।
[हिं. लोन=नोन [फ़ा. नमक] + अ. हराम + ई (प्रत्य.)]
उ.-जो तन-दियौ ताहि बिसरायौ ऎसौ नोनहरामी-१-१४८।
उ.-कैंसी बुद्धि रची है नोखी देखी सुनी न होइ-पृ. ३१३ (३०)।
उ.-तब बृषभानु-सुता हँसि बोली, हम पै नाहिं कन्हाइ। काहे कौं झकझोरत नोखे, चलहु न देउँ बताइ-६८२।
उ.-सत्य जानि जिय, चित चेत आनि, तू अब नख क्यौं तन नोचै-१० उ.-१०२।
माँग माँग कर या लेकर तंग करनेवाला।
क्रम,विधान या नियम से बद्ध।
नियम का निर्वाह करनेवाला।
उ.- (क) मरन-अवस्था जब नियराई - ४-१२। (ख) प्रगट भई तहँ आइ पूतना, प्रेरित काल-अवधि नियराई - १०-५०।
निकट, पास या समीप आना-पहुँचना।
[हिं. नियर + आना (प्रत्य.)]
उ.- अब तौ जरा निपट नियरानी, कर्यौ न कछुवै कान - १-५७।
उ.- मधुबन ते चल्यो तबहिं गोकुल नियरान्यो - २९४९।
उ.- (क) भक्ति पंथ मेरे अति नियरैं जब तब कीरति गाई - १-९३। (ख) भवसागर मैं पैरि न लीन्हौ।¨¨¨। अतिगंभीर, तीर नहिं नियरैं, किहिं बिधि उतर्यौ जात - १-१७५।
उ.-और हार चौकी हमेल अब तेरे कंठ न नैहौं-१५५०।
दुहते समय गाय के पिछले पैर बाँधने की रस्सी, बंधी।
दुहते समय गाय के पैर में बाँधने की रस्सी, बंधी।
उ.-रीझि रहे उत हरि इत राधा अरस परस दोउ नोकत हैं।
नगाड़े के साथ चौबोले गाकर होनेवाला अभिनय।
उ.-नए गोपाल नई कुबिजा बनी नौतन नेह ठयौ-३३४७।
नौ दो ग्यारह होना- देखते-देखते भाग जाना।
नौ तेरह बताना- टालटूल करना।
उ.-जब लगि नहि बरषत ब्रज ऊपर नौ घन श्याम सरीर-२७७१।
उ.-रोवत देखि जननि अकुलानी दियौ तुरत नौआ कौं घुरकी-१०-१८०।
उ.-मेरी नौका जनि चढ़ौ त्रिभुवनपति राई-९-४२।
हाथ का एक गहना जिसमें नौ रत्म जड़े रहते हैं।
दुहते समय रस्सी से गाय का पैर बाँधते हैं।
उ.-बछरा छोरि खरिक कौं दीन्हौं, आपु कान्ह तल-सुधि बिसराई। नोवत बृषभ निकसि गैंयाँ गई, हँसतसखाकहदुहत कन्हाई-८२०।
दुहते समय रस्सी से गाय का पैर बाँधना।
दुहते समय रस्सी से गाय का पैर बाँधता है, नोवता है।
उ.-ग्वाल कहैं धनि जननि हमारी, सुकर सुरभि नित नोवे-३४७।
बदनामी, निंदा, अपकीर्ति, बुराई।
उ.-नौधा भक्ति दास रति मानै-३४४२।
बाहु का एक गहना जिसमें नौ तरह के नग जड़े होते हैं।
जिसमें हाल ही में उन्नति की हो।
वैभव, उत्सव या मंगल-सूचक वाद्य (शहनाई और नगाड़े ) जो पहर-पहर भर बजते हैं, समय-समय पर बजनेवाले बाजे।
नौबत झड़ना (बजना)- (१) आंनदोत्सव होना। (२) प्रताप की घोषणा होना।
नौबत बजावत- (१) खुशी मनाता है। उ.-निंदा जग उपहास करत, मग बंदीजन जस गावत। हठ, अन्याय अघर्म, सूर नित नौवत द्वार बजावत-१-१४१। (२) प्रताप या ऐश्वर्य की घोषणा करता है।
नौबत बजाकर (की टकोर)- डंके की चोट पर, खुल्लमखुल्ला।
दोनों पक्षों की नवीं तिथि।
उ.-(क) नौमी-नेम भली बिधि करै-९-५। (ख) नौमी नवसत साजिकै हरि होरी है-२४११।
पारसियों के नव वर्ष का नया दिन।
उ.-नौसत साजे चली गोपिका गिरिवर बूजन हेत।
नौसिख, नौसिखिया, नौसिखुवा
जिसने नया-नया ही कोई काम सीखा हो।
न्यवछावार, न्यवछावरि, न्यवछावरी
न्यवछावार, न्यवछावरि, न्यवछावरी
न्यवछावर करति- उत्सर्ग करती हैं, वारती हैं। उ.- सूरदास प्रभु की छबि ब्रज ललना निरखि थकित तन-मन न्यवछावरि करति आनंद बर ते -२३५३।
न्यवछावार, न्यवछावरि, न्यवछावरी
निछावर या वाराफेरा की वस्तु।
उ.-मुक्ति-भुक्ति न्यवछावरी पाई सूर सुजान- उ. १० उ.-८।
न्यवछावार, न्यवछावरि, न्यवछावरी
धरोहर या अमानत रूप में रखा हुआ।
उचित या नियमानुकूल बात, नीति।
उ.- सूरदास वह न्याउ निवेरहु हम तुम दोऊ साहु-३३६८।
दो पक्षों के बीच निर्णय, निष्पक्ष निश्चय।
उ.- कौन करनी घाटि मोसौं, सो करौं फिरि काँधि। न्याय कै नहिं खुनुस कीजै, चूक पल्लै बाँधि-१-१९९।
उ.- बैठे नंद करत हरि पूजा, बिधिवत् औ बहु भाँति। सूर स्याम खेलत तैं आए, देखत पूजा न्याति-१०-२६०।
उ.- मधुकर कहा कारे की न्याति। ज्यौं जलमीन कमल मधुपन कौ छिन नहिं प्रीति खटाति-३१६८।
प्रमाण या तर्कयुक्त वाक्य।
न्यायी, नीतियुक्त व्यवहार करनेवाला।
उ.- तुम न्याय कहावत कमलनैन-१९७७।
उ.- ¨¨¨¨¨नाम स्रमिष्ठा तासु कुमारी। तासु देवयानी सौं प्यार। रहै न तासौं पल भर न्यार-९-१७४।
[सं. निर्निकट, प्रा. निन्निअड़, निन्नियर, पू. हिं. निन्यार, हिं. न्यारा]
[सं. निर्निकट, प्रा. निन्निअड़, निन्नियर, पू. हिं. निन्यार, हिं. न्यारा]
[सं. निर्निकट, प्रा. निन्निअड़, निन्नियर, पू. हिं. निन्यार, हिं. न्यारा]
[सं. निर्निकट, प्रा. निन्निअड़, निन्नियर, पू. हिं. निन्यार, हिं. न्यारा]
उ.- परम रुचिर मनि-कंठ किरनि-गन, कुंडल-मुकुट प्रभा न्यारी-१-६९।
उ.- दूध बरा उत्तम दधिबाटी, गाल-मसूरी की रुचि न्यारी-१०-२२७।
नियम, विधान या व्यवस्था बाँधनेवाली।
[सं. निर्निकट, प्रा. निन्निअड़]
मिली-जुली वस्तुओं को अलग करनेवाला।
जो निकट या समीप न हो, दूर।
उ.- इन अँखियनि आगै तैं मोहन, एकौ पल जनि होहु नियारे - १०-२९६।
उ.- पाँच-पचीस साथ अगवानी, सब मिलि काज बिगारे। सुनी तगीरो, बिसरि गई सुधि, मो तजि भए नियारे - १-१४३।
उ.- एक ही संग हम तुम सदा रहति, आजु ही चटकि त भई न्यारी -१२००।
उ.- क्यौं दासी सुत कैं पग धारे ? ¨¨¨¨¨। सुनियत हीन, दीन, बृषली-सुत, जाति-पाँति तैं न्यारे-१-२४२।
और ही, अलग-अलग, भिन्न-भिन्न।
उ.- (क) बहुत भाँति मेवा सब मेरे षटरस व्यंजन न्यारे-४९४। (ख) मथुरा के द्रुम देखियत न्यारे-२७८१।
उ.- न्यारो करि गयंद तू अजहूँ-२५८९।
उ.- पतित समूह सबै तुम तारे, हुतौ जु लोक भरथौ। हौं उनतैं न्यारौ करि डारथौ, इहिं दुख जात मरथौ-१-१५।
उ.- जाति-पाँति कुलहू तैं न्यारौ, है दासी कौ जायौ-२१-२४४।
उ.- कमल नैन काँधे पर न्यारो पीत बसन फहरात-२५३९।
उ.- ऊधो, ताको न्याव है जाहि न सूझे नैन।
यथाक्रम लगाना, सजाना या प्रस्तुत करना।
देव-अंगों पर विशेष वर्णों का स्थापन।
उ.- मुद्रा न्यास अंग भूषन पति-ब्रत ते न टरों-३०२७।
रोग-बाधा-शान्ति के लिए अंगों पर हाथ रख कर मंत्र पढ़ना।
न्योते में दिया जाने वाला धन।
पेट के नलों को पानी से साफ करने की हठयोगियों की क्रिया।
निछावर, उत्सर्ग, वारा-फेरा, उतारा।
उ.- सूर कहा न्यौछावर करिंयै अपनैं लाल ललित लरखर पर-१०-९३।
उ.- जग्य-पुरूष गए बैकुंठ धामहि जबै, न्यौति नृप प्रजा कौ तब हँकारयौ-४-११।
न्योता दिया, निमंत्रित किया।
उ.- इच्छा करि मैं ब्राम्हन न्यौत्यौ, ताकौं स्याम खिझावै-१०-२४९।
उ.- जननी उबटि न्हवाइ (सिसु) क्रम सौं लीन्हें गोद-१०-४२।
उ.- जज्ञ कराइ प्रयाग न्हयायौ-६-८।
उ.-मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी।¨¨¨¨¨। काढ़त-गुहत न्हवावत जैहै नागिनि सी भुईं लोटी-१०-१७५।
उ.- रिषि कह्यौ, आवंत हौं मैं न्हाइ-९-५।
उ.- ग्रीषम कमल-बदन कुम्हिलैंहै, तजि सर निकट दूरि कित न्हाउ-९-३४।
उ.- जो सुख होत गुपालहिं गाऐं। सो सुख होत न जप तप कीन्हैं, कोटिक तीरथ न्हाऐं -२-६।
स्नान करते-करते, नहाते नहाते।
उ.- दुरबासा दुरजोधन पठयौ पांडव-अहित बीचारी। साकपत्र लै सबै अघाए, न्हात भजे कुस डारी-१-१२२।
उ.- गौतम लख्यौ, प्रात है भयौ। न्हान काज सो सरिता गयौ-६-८।
उ.- एक बार ताके मन आई। न्हावन काज तढ़ाग सिधाई-९-१७४।
उ.- मानसरो-वर छाँड़ि हंस तट काग-सरोवर न्हावै-२-१३।
उ.- हंस उज्लज पंख निर्मल अंग मलि-मलि न्हाहिं-१-३३८।
उ.- चलौ सबै कुरुक्षेत्र तहाँ मिलि न्हैये जाई-१० उ.-१०५।
प वर्ग का पहला और हिंदी का इक्कीसवाँ व्यंजन; वह स्पर्श ओष्ठ्य वर्ण है।
उ.- कुंभकरनतन पंक लगाई, लंक बिभीषन पाइ-९-८३।
उ.- स्याम अंग चंदन की आभा नागरि केसरि अंग। मलयज पंक कुमकुमा मिलि कै जल-जमुना इक रंग।
कीचड़ से उत्पन्न होनेवाला।
उ.- मनो मुख मृदुल पानि पंकेरुह गुरुगति मनहुँ मराल बिहंगा-१९०५।
भोज में साथ साथ खानेवालों की पाँती।
उ.-हंस उज्जल पंख निर्मल अंग मलि मलि न्हाहिं-१-३३८।
पंख जमना- (१) भाग जाने के लक्षण दीख पड़ना। (२) बुरे रास्ते पर जाने के रंग-ढंग दीख पड़ना। (३) अंत समय आया जान पड़ना।
पंख लगना- बहुत वेगवान होना।
उ.- (क) हौं तौ मोहन के बिरह जरी रे तू कत जारत रे पापी, तू पंखि पपीहा पिउ पिउ पिउ अधराति पुकारत-२८४९। (ख) पंखी पति सकुचाने चातक अनँग भर्यो-२८४९।
[सं. पक्षी, पा. पक्खी, हिं. पंखी]
[सं. पक्षी, पा. पक्खी, हिं. पंखी]
[सं. पक्षी, पा. पक्खी, हिं. पंखी]
उ.- (क) पंछी एक सुहृद जानत हौं, कर्यौ निसाचर भंग। तातैं बिरमि रहे रघुनंदन, करि मनसा-गति पंग-९-८३। (ख) छोभित सिंधु, सेष सिर कंपित पवन भयौ गति पंग-९-१५८। (ग) सूर हरि की निरखि सोभा भई मनसा पंग-६२७। (घ) भई गिरा-गति पंग-६४०।
उ.- नखसिख रूप देखि हरि जू के होत नयन-गति पंग-३०७९।
श्रेणी, पाँती, पंक्ति, कतार।
उ.- (क) कनक मनि मेखला राजत, सुभग स्यामल अंग। मनौ हंस अकास-पंगति, नारि-बालक-संग-६३३। (ख) कोउ कहति अलि-बाल-पंगति जुरी एक सँजोग -६३६। (ग) मनौ इंद्रबधून पंगति सोभा लागति भारि-९ २१। (घ) चपला चमचमाति आयुध बग-पंगति ध्वजा अकार-२८२६।
साथ भोजन करनेवालों की पंक्ति।
जो पैर से चल न सकता हो, लँगड़ा।
उ.- जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै-१-१।
पाँच या अधिक व्यक्तियों का समाज जनता।
पंच की भीख- सर्वसाधारण का आशीर्वाद, जनता की कृपा। उ.-(क) मैं- मेरी कबहूँ नहिं कीजै, कीजै पंच-सुहातौ-१-३०२। (ख) राज करैं वे धेनु तुम्हारी, नेतहिं कहति सुनाई। पंच की भीख सूर बलि मोहन कहति जसोदा माई-४५५।
पंच की दुहाई- समाज से धर्म या न्याय करने की पुकार।
पंच-परमेश्वर- समाज का मत ईश्वर का वाक्य है।
किसी बात का न्याय करने के लिए चुने गये पाँच या अधिक आदमी।
पाँच नक्षत्र जिनमें नये कार्य का करना मना है।
पाँच नारियाँ जो विवाहादि होने पर भी कन्यावत् मान्य हैं-अहल्या, द्रौपदी, कुंती, तारा और मंदोदरी।
पाँच ग्रास जो भोजन के पूर्द निकाल दिये जाते हैं।
कामदेव के पाँच रूप-काम, मन्मथ, कंदर्प, मकरध्वज और मीनकेतु।
जिसमें पाँच कोने हों, पँचकोना।
काशी जो पाँच कोस लंबी-चौड़ी भूमि में बसी है।
दूध, दही, घी, गोबर, और गोमूत्र।
श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के पाँच प्रकरण-वेणगीत, गोपीगीत, युगलगीत, भ्रमरगीत और महिषी गीत।
एक असुर जो श्रीकृष्ण के गुरु संदीपन का पुत्र चुरा ले गया था। श्रीकृष्ण ने इसे मारा था और इसी की हड्डियों से उनका 'पांचजन्य' शंख बना था।
पाँच तत्व-पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश।
मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन (वाम मार्ग)।
निश्चित या स्थिर किया हुआ।
कार्य में लगाने या नियोजित करनेवाला।
एक प्राचीन प्रथा जिसके अनुसार निसंतान स्त्री, देवर या पति के अन्य गोत्रज से संतान उत्पन्न करा लेती थी।
मंदार, परिजात, संतान, कल्पवृक्ष और हरिचंदन।
एक तरह का बहुत महीन या झीना कपड़ा।
पंचत्व (को) प्राप्त होना- मृत्यु होना।
पाँच प्रधान देवता- आदित्य, रुद्र, विष्णु गणेश और देवी।
उ.-साँची की झूठी करि डारैं पंचन मैं मर्यादा जाइ-१३१६।
पंजाब की पाँच प्रधान नदियाँ-सतजल, व्यास, रावी, चनाब और झेलम।
काशी का 'पंच गंगा' नामक तीर्थ।
बदरीनाथ, द्वारकानाथ, जगन्नाथ, रंगनाथ और श्रीनाथ।
पाँच प्राण या वायु-प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान।
दंडकारण्य का वह स्थान जहाँ सीता-हरण हुआ था।
आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी-ये पाँच प्रधान तत्व जिनसे सृष्टि की उत्पत्ति हुई है।
संगीत के सात स्वरों कें पाँचवाँ।
मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन (वाम-मार्ग)।
किसी पक्ष की पाँचवीं तिथि।
उ.-(क) पँचरंग सारी मँगाइ, बधू जननि पैहराइ-१०-९५। (ख) पगनि जेहरि लाल लहँगा अंग पँचरंग सारि-पृ. ३४४ (२९)।
पाँच रत्न-सोना, हीरा, नीलम, लाल और मोती।
एक शिव मंत्र-ऊँ नमः शिवाय।
एक तप जिसमें चारों ओर पाग जलाकर धूप में बैठा जाता है।
दूध, दही, घी, चीनी और मधु मिलाकर बनाया गया पेय जिससे देवता को स्नान कराया जाता है।
पाँच देव-मूर्तियों का समूह।
दंडकारण्य का वह स्थान जहाँ श्रीराम वनवास-काल में रहे थे और जहाँ से सीता-हरण हुआ था।
काम के पाँच वाण-द्रवण, शोषण, तापन, मोहन और उन्माद।
काम के पाँच पुष्पबाण-कमल, अशोक, आम्र, नवमल्लिका और नीलोत्पल।
मंगलोत्सव में बजनेवाले पाँच बाजे-तंत्री, ताल, झाँझ नगारा और तुरही।
पाँच प्रकार की ध्वनि-वेदध्वनि, बंदीध्वनी, जयध्वनि, शंखध्वनि और निशानध्वनि।
पंचायत का, पंचायत संबंधी।
एक प्राचीन देश, द्रौपदी यहीं के राजा की पुत्री थी।
उ.-जा दिन मन-पंछी उड़ि जैहै। ता दिन तेरे तन-तरुवर के सबै पात झरि जैहैं-१-८६।
पंजा फैलाना (बढ़ाना)- लेने का डौल लगाना।
पंजा मारना- झपट्टा मारना।
पंजे झाड़कर चिपटना या पीछे पड़ना- जी जाना से जुट जाना।
छक्का-पंजा- दाँव-पेच, चालाकी।
भुने आँटे की मिठाई जो प्रसाद-रूप में बाँटी जाती है।
तीर्थ या मंदिर का पुजारी।
उ.-सोई हरि काँधे कामरि, काछ किए नाँगे पाइनि गाइनि टहल करैं। त्रिभुवनपति दिसिपति नर-नारी-पति पंछिनिपति, रबि ससि जाहि डरैं-४५३।
शरीर की हड़्डियों का ढाँचा, ठठरी, कंकाल।
उ.-जब सुत भयो कहेउ ब्राह्मन ते अर्जुन गये गृह ताइ। सर-रोप्यो चहुँ दिसि ते जहाँ पवन नहिं जाइ-सारा. ८५१।
हाथ की पाँचों उँगलियों का समूह।
चालाकी, कुशलता (व्यंग्य)।
जिस पर किसी का अंकुश, प्रतिबंध या दबाव न हो, स्वेच्छाचारी।
उ.- माधौ जू, मन सबही बिधि पोच। अति उनमत्त, निरंकुस, मैगल, चिंतारहित, असोच - १-१०२।
पंथकि, पंथकी, पंथि, पंथिक, पंथी
उ.-बीर बटाऊ पंथी हो तुम कौन देश तें आए-२९८३।
दक्षिण की एक नदी और उसका निकटवर्ती ताल।
दक्षिण की पंपानदी का निकटवर्ती ताल।
उ.-(क) मोंकौं पंथ बतायौ सोई नरक कि सरग लहौं-१-१५१। (ख) चलत पंथ कोउ था क्यो होई-३-१३।
उ.-नहिं रुचि पंथ पयादि डरनि छकि पंच एकादस ठानै-१-६०।
पंथ गहना- (१) चलने के लिए राह पर होना। (२) विशेष, प्रकार का आचरण करना।
पंथ गहौ- चलो, जाओ। उ. -बिछुरत प्रान पयान करेंगे, रहौ आजु पुनि पंथ गहौ-९-३३।
पंथ दिखाना- (१) मार्ग बताना। (२) धर्माचरण की रीति बताना या तस्संबंधी उपदेश देना।
पंथ देखना (निहारना)- बाँट जोहना, प्रतीक्षा करना।
पंथ निहारौं- प्रतीक्षा करता हूँ, बाट जोहती हूँ। उ.-(क) तुमरो पंथ निहारौं स्वामी। कबहिं मिलौके अंतर्यामी। (ख) मैं बैठी तुम पंथ निहारौं। आवौ तुम पै मन वारौं।
पंथ में (पर) पाँव देना- (१) चलना (2) विशेष आचरण करना।
पंथ पर लगना- रास्ते पर होना, चाल चलना।
किसी के पंथ लगना- (१) किसी का अनुयायी होना। (२) किसी को तंग करना।
पंथ पर लाना (लगाना)- (१) ठीक मार्ग पर लाना। (२) अच्छी चाल सिखाना। (३) अनुयायी बनाना।
पंथ सेना- बाट जोहना, आसरा देखना।
एक पंथ द्वैकाज- एक कार्य करके अथवा एक रीति-नीति का निर्वाह करने से दोहरा लाभ होना। उ.- ज्ञान बुझाइ खबरि दै आवहु एक पंथ द्वैकाजु-- २९२५।
पंथ लेना- अनुयायी बनना।
पंथ पर लाना (लगाना)- अनुयायी बनाना।
उ.-आतुर जाइ पँवरि भयो ठाढ़ो-२४६५।
उ.-(क) आतुर जाइ पँवरि भयौ ठाढ़ो कहो पँवरिआ जाइ-२४६५। (ख) सकल खग गन पैक पायक पँवरिया प्रतिहार-२७५५।
खूबबढ़ा-चढ़ाकर कही हुई कहानी। या बात।
उ.-(क) बिंब पँवारे लाजही दामिनि द्युति थोरी-१८२१। (ख) बिंब पँवारे लाजहीं हरषत बरसत फूल-२०६५।
हारेहू नहिं हरत अमित बल बदन पयोठि पईठि-पृ. ३३४ (३६)।
धरने, पकड़ने या ग्रहण करने का काम।
[सं. प्रकृष्ट, प्रा. पक्कड़]
[सं. प्रकृष्ट, प्रा. पक्कड़]
[सं. प्रकृष्ट, प्रा. पक्कड़]
दोष, भूल-आदि निकालने की क्रिया।
[सं. प्रकृष्ट, प्रा. पक्कड़]
किसी चीज की धरना, थामना या ग्रहण करना।
उ.-जाको कहूँ थाह नहिं पइअत अगम अपार अगाधै-३२८४।
उ.-ऊधौ, चलौ बिदुर कैं जइयै। दुरजोधन कै कौन काज जहँ आदर-भाव न पइयै -१-२३९।
आगे बढ़े हुए के बराबर हो जाना।
[सं. पक्व, हिं. पक्का + ना]
[सं. पक्व, हिं. पक्का + ना]
फोड़े-फुंसी का मवाद से भरना।
[सं. पक्व, हिं. पक्का + ना]
उ.-अधम समूह-उधारन-कारन तुम जिय जक पकरी-१-१३०।
इस तरह पकड़ी कि छूट न सके।
उ.-(क) दुस्सासन अति दारुन रिस करि, केसनि करि पकरी-१-२५४। (ख) मन-क्रम बचन नंदनंदन उर यह द्दढ़ करि पकरी-३३६०।
पकड़ता है, (हाथ में ) लेता है, ग्रहण करता है।
उ.-जद्यपि मलय-बृक्ष जड़ काटै, कर कुठाक पकरै। तऊ सुभाव न सीतल छाँड़ै, रिपु-तन-ताप हरै-१-१-११७।
उ.-जो हरि-ब्रत निज उर न धरैगौ। तो को अस माता जु अपुन करि करे कुठाँव पकरैगौ-१-७५।
पकड़ लिया, अधिकार में किया, बंदी बनाया।
उ.-रिस भरि गए परम किंकर तब, पकरयौ छूटि न सकौं-१-१५१।
घी में तलकर बनाये गये खाद्य पदार्थ जो कई दिन तक खाये जा सकते हैं।
पकानें का काम कराना, पकाने को प्रवृत्त करना।
उ.-अन्नकूट बिधि करत लोग सब नेम सहित करि पकवान्ह-९१०।
पकाने की क्रिया, भाव या वेतन।
उ.-बिधि-कुलाल कीने काचे घट ते तुम आनि पकाए-३१९१।
चौसर की गोटी का सब घर पार कर लेना।
[सं. पक्व, हिं. पक्का + ना]
[सं. पक्व, हिं. पक्का + ना]
पकड़ना, थामना, रोकना, छूना।
उ.-कबहूँ निरखि हरि आपु छाहँ कौं, कर सौं पकरन चाहत-१०-११०।
पकड़ने को प्रेरित किया, पकड़ाया।
उ.-मोहन प्यारी सैन दे हलधर पकराए-२४४६।
पकड़वाता है, (दुसरे से) बंदी बनवाता है।
उ.-द्रुपद-सुताहिं दुष्ट दुरजोधन सभा माहिं पकरावै-१-१२२।
पकड़कर, थामकर, हाथ में लेकर।
उ.-मिथ्याबाद आप-जस सुनि-सुनि, मूछहिं पकरि अकरतौ-१-८०३।
पकड़ने (के लिए) गहने या ग्रहण करने (के उद्देश्य से)।
उ.-मुख प्रतिबिंब पकरिबे कारन हुलसि घुटुरुवनि धावत-१०-१०२।
उ.-मनिमय कनक नंद कैं आँगन बिंब पकरिबैं धावत-१०-११०।
टकसाली, प्रामाणिक मानवाला।
अनकूल प्रवृत्ति या स्थिति।
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)
उ.- सूरदास वह न्याउ निबेरहु हम तुम दोऊ साहु - ३३६८।
उ.- (क) आदि निरंजन, निराकार, कोउ हुतौ न दूसर - २-३६। (ख) अलख निरंजन ही को लेखो - ३४०८।
कच्चे फल आदि को पुष्ट या तैयार करना।
आँच या गरमी से सिझाना या पक्का करना।
फोड़े-फुंसी आदि को तैयार करना।
घी या तेस में तली बेसन या पीठी की बड़ी।
उ.-मूँग पकौरा पनौ पतबरा। इक कोरे इक भिजे गुरबरा-३९६।
[हिं. पकौड़ा=पका + बरी, बड़ी]
उ.-दधि, दूध, बरा, दहिरौरी सो खात अमृत पक्कौरी-१०-१८३।
पूरा, पूर्णता को प्राप्त।
चांद मास के दो अर्द्ध विभाग।
उ.-चरन पखराइ कै सुभग आसन दियौ-२४९३।
उ.-उत्तम बिधि सौं मुख पखरायौ-६०९।
चाँद-मास के दो विभागों में एक।
[सं. पक्ष + वार, हिं. पखवारा]
[सं. पक्ष + वार, हिं. पखवारा]
उ.-बीना झाँझ-पखाउज-आउज और राजसी भोग-९-७५।
उ.-बालापन ते निकट रहत ही सुन्यौ न एक पखानो-३३९३।
धोते हैं, (जल से) स्वच्छ करते हैं।
उ.-अपनौ मुख मसि-मलिन मंद मति, देखत दर्पन माहीं। ता कालिमा मेटिबे कारन, पचत पखारत छाहीं-२-२५।
[सं. प्रक्षालन, प्रा. पक्खाड़न]
उ.-चरन पखारि लियो चरनोदक धनि-धान कहि दैत्यारी-२५८७।
उ.-(क) अरु अँचयो जल बदन पखारी-१०-२४१। (ख) नई दोहनी पोंछि-पखारी-११७९।
उ.-स्यामहिं ल्याई महरि जसोदा तुरतहिं पाइँ पखारे-१०-२३७।
उ.-की सृक सीपज की बग पंगति की मयूर की पीड पखीरी-१६२७।
उ.-ससा सियार अरु बन के पखेरू धृग धृग सबन करी-२७४१।
[सं. पक्षालु, प्रा. पक्खाडु, हिं. पखेरू]
उ.- नगन पगन ता पाछै गयौ-९-२।
रस या चासनी लिपटना या सनना।
उ.- सूर सनेह ग्वारि मन अटक्यो छाँड़हु दिए परत नहिं पगरो-१०३१।
उ.-(क) मुख मुरली सिर मोर पखौआ बन-बन घेनु चराई-२६८४। (ख) मुख मुरली सिर मोर पखौआ गर घुँ घुचीन को हार-१० उ.-११९।
पग धारे- आये। उ.-(क) गरुड़ छाँड़ि प्रभु पाँय पियादे गज-कारन पग धारे-१-२५। (ख) ध्रुव निज पुर को पुनि पग धारे-४-९। (ग) सूर तुरत मधुवन पग धारे धरनी के हितकारी-२५३३।
पग पग पर- जरा-जरा सी दूर पर, हर स्थान पर, जहाँ जाय वहीं। उ.-दीन जन क्यौं करि आवै सरनु ॽ ¨¨¨¨¨। पग पग परत कर्म-तम-कूपहिं, को करिकृपा बचावै-१-४८।
फूँकि पग धारौ- बहुत समझ-बूझकर और सतर्कता से आओ। उ.-फूँकि फूँकि धरनी पग धारौ अब लागीं तुम करन अयोग-१४९७।
मैदान में लोगों के चलने से बन जानेवाला पतला मार्ग।
उ.-जनु उड़ि चले बिहंगम को गन कटी कठिन पग डोरी-१० उ.-५२।
सिर में बाँधने की पाग, साफा।
पगड़ी अटकना- मुकाबला होना।
पगड़ी उछलना- दुर्गति होना।
पगड़ी उछालना- (१) दुर्गति बनाना। (२) हँसी उड़ाना।
पगड़ी उतरना- अपमान होना।
पगड़ी उतारना- अपमान करना।
पगड़ी बँधना- (१) उत्तराधिकार मिलना। (२) अधिकार मिलना। (३) आदर मिलना।
पगड़ी बदलना- मित्रता या नाता करना।
(किसी की) पगड़ी रखना- इज्जत बचाना।
(किसी के आगे या सामने) पगड़ी रखना- बहुत गिड़गिड़ाना।
अनुरक्त हुआ, प्रेम में डूबा, मग्न हुआ।
उ.- बिषय-भोग ही मैं पगि रह्यौ। जान्यौ मोहिं और कहुँ गयौ-४-१२।
उ.- इहीं सोच सब पगि रहे, कहूँ नहीं निरबार-५८९।
उ.- (क) एते पर अँखियाँ रससानी अरू पगिया लपटानी-१६६७। (ख) सिर पगिया बीरा मुख सोहै सरस रसीले दोल-२४१४।
उ.- अंग अंग अवलोकन कीन्हों कौन अंग पर रहे पगे-१३१८।
उ.- धोए छूटत नहीं यह कैसेहु मिलैं पघिलि ह्वै मैन- पृ. ३२३ (११)।
पाँचवें, पाँचवें स्थान पर।
उ.- पचएँ बुध कन्या कौ जौ है, पुत्रनि बहुत बढ़ै हैं-१०-८६।
दुखी होता है, हैरान होता है।
उ.- अपनौ मुख मसि-मलिन मंदमति, देखत दर्पन माहीं। ता कालिमा मेटिबे कारन, पचत पखारत छाहीं-२-२५।
पकने या पकाने की क्रिया या भाव।
उ.- झँगा, पगा अरू पाग पिछौरी दाढ़िन को पहिराए।
चौपायों के बाँधने का रस्सा, मोटी रस्सी।
उ.- तृन दसननि लै मिलु दसकंधर कंठहि मेलि पगा-९-११४।
गढ़, प्रासाद आदि के रक्षार्थ बनी चहारदीवारी।
वस्तु जो पैरों से कुचली जाय।
पैरों से कुचली मिट्टी या गारा।
वह पानी या छिछली नदी जिसे पैदल ही चलकर पार किया जा सके।
जिस (व्रत, साधना) में बिना पानी पिये रहा जाय।
जिसे अपना प्राप्य भाग न मिला हो।
उ.- सेष सहसफन नाथिज्यों सुरपतिकरे निरंस १११२।
उ.- उरझ्यौ बिबस कर्म निरअंतर, स्रमि सुख-सरनि चह्यौ - १-१६२।
जो उत्तर न दे सके। मौन, चुप।
उ.- निरउत्तर भई ग्वालि बहुरि कह कछू न आयो - १०७२।
उ.- (क) जद्यपि विद्यमान सब निरखत, दुःख सरीर भर्यौ - १-१००। (ख) दुष्ट-सभा पिसाच दुरजोधन, चाहत नगन करी। भीषम, द्रोन, करन, सब निरखत, इनतैं कछु न सरी - १-२५४।
चौक पूरने की सामग्री - अबीर, हल्दी, बुक्का आदि।
अवैध उपाय से ली वस्तु काम में लाना।
एक चीज को दूसरी में खपाना।
उ.- सहज पचास पुत्र उपजाएँ-९-८।
[सं. पंचाशत, प्रा. पंचासा]
उ.- कोई कहे बात बनाई पचासक, उनकी बात जु एक-३४६४।
रचि-पचि- बड़ी कठिनाई से, हैरान होकर। उ.- एक अधार साधु-संगति कौ, रचि पचि गति सचरी। याहू सौंज संचि नहिं राखी, अपनी धरनि धरी-१-१३०।
जड़ा हुआ, पच्ची किया हुआ।
उ.- हीरा लाल प्रबाल पिरोजा पंगति बहु मणि पचित पचावनो-२२८०।
सूखना या क्षीण होना, दुखी होना, हैरान होना।
उ.- रे मन छाँड़ि बिषय कौ रँचिबो। कत तू सुवा होत सेमर कौ, अंतहिं कपट न बचिबौ। अंतर गहत कनक-कामिनि कौं, हाथ रहैगौ पचिबौ-१-५९।
हैरान होगे, कष्ट सहोगे, परेशानी होगी।
उ.- मोकौं मुक्ति बिचारत हौ प्रभु, पचिहौ पहर-घरी। स्रम तैं तुम्हैं पसीना ऐहै, कत यह टेक करी ?-१-१३०।
उ.- बाँधि पची डोरी नहिं पूरै। बार-बार खीझै, रिस झूरै-३९१।
उ.- (क) बिद्रुम फटिक पची परदा छबि लाल रंध्र की रेख-२५६१। (ख) बिद्रुम स्फटिक पची कंचन खचि मनिमय मंदिर बने बनावत- १० उ.-५।
पच्चर अड़ाना- बाधा डालना।
पच्चर ठोंकना- खूब तंग करना।
पच्चर मारना- बनती बात पर भाँजी मारना।
मरत पच्यौ- हैरान होता है, जी तोड़ मेहनत करता है। उ.-जौ रीझत नहिं नाथ गुसाईं तौ कत जात जँच्यौ। इतनी कहौ, सूर पूरौ दै, काहैं मरत पच्यौ-१-१७४।
उ.- सिखी वह नहिं, सिर मुकुट श्रीखंड पछ तड़ित नहिं पीत पट छबि रसाला-१६३१।
पिछड़ जाना, पीछे रह जाना।
उ.- जो तब साधि दीजतो कोऊ तो अब कत पछताती-३४१८।
ऐसी जड़ावट कि जड़ी गयी चीज तल से बिलकुल मिल जाय।
घातु के पदार्थ पर अन्य धातु के पत्तर की जड़ावट।
पच्ची हो जाना- लीन हो जाना।
जड़ने या जमावट करने की क्रिया या भाव।
चिड़ियों या पक्षियों का डैना, पंख या पर।
उ.- (क) अद्भुत राम-नाम के अंक।¨¨¨। मुनि-मन-हंस-पच्छ-जुग, जाकैं बल डड़ि ऊरध जात-१-९०। (ख) मानौ पच्छ सुमेरहिं लागे उड़यौ अकासहिं जात-९-७४।
उ.- (क) आठैं कृष्न पच्छ भादौं, महर के दधिकाँदौं-१०-३१। (ख) कृष्न पच्छ रोहिनी अर्द्धा निसि हर्षन जोग उदार-१०-८६।
उ.- मेरौ मन अनत कहाँ सुख पावै। जैसैं उड़ि जहाज कौ पच्छी फिरि जहाज पर आवै-१-१६८।
उ.- मोसौं पतित न और गुसाई। अवगुन मोपैं अजहुँ न छूटत, बहुत पच्यौ अब ताई-१-१४७।
कोई बुरा या अनुचित काम करने के बाद होनेवाला दुख, अनुताप।
[सं. पश्चाताप, पा. पच्छाताव]
उ.- धरि न सकत पग पछमनौ, सर सनमुख उरलाग-१-३२५।
उ.- केस गहे अरि कंस पछरिहौं-१०६१।
परयौ खाइ पछार- अचानक गिर पड़ना, बेसुध होकर खड़े से गिरना। उ.- (क) अर्जुन स्त्रवत नैन जल धार। परयौ धरनि पर खाइ पछार-१-२८६। (ख) परति पछार खाइ छिन ही छिन अति आतुर ह्यौ दीन-३४२१।
साफ करने के लिए कपड़े की पटकना।
[सं. प्रक्षालन, प्रा. पच्छाड़न]
परी खाइ पछारि- बेसुध होकर गिर पड़ना। उ.- दासी बालक मृत निहारि। परी धरनि पर खाइ पछारि-६-५।
उ.- सूरदास प्रभु सूर सुखदायक मारयौ नाग पछारी-२५९४।
उ.- सूरस्याम पूतना पछारी, यह सुनि जिय डरप्यौ नृपराई-१०-५१।
सूप आदि में रखकर और फटककर साफ की हुई, फटकी हुई।
उ.- मूँग, मसूर, उरद, चनदारी। कनक-फटक धरि फटकि पछारी-३९६।
[सं. प्रक्षालन, प्रा. पच्छाड़ना, हिं. पछोरना, पछोड़ना]
उ.- खड़ग धरे आवै तुव देखत, अपनैं कर छिन माँह पछारै-१०-१०।
उ.- (क) कहौ तौ सचिव-सबंधु सकल अरि एकहिं एक पछारौं-९-१०८। (ख) रंगभूमि मैं कंस पछारौं, घीसि बहाऊँ बैरी-१०-१७६।
उ.- हिरनाकुस प्रहलाद भक्त कौं बहुद सासना जारयौ। रहि न सके, नरसिंह रूप धरि, गहि कर असुर पछारयौ-१-१०९।
उ.- (क) जोधा सुभट सँहारि मल्ल कुबलया पछार्यो-२६२५। (ख) भ्रुम अरू केसी इहाँ पछार्यौ-३४०९।
उ.- सूरदास भगवंत-भजन बिनु, चल्यौ पछि-ताइ, नयन जल ढारौ-१-८०।
पछताने से, पश्चाताप करने से।
उ.- होत कहा अबके पछिताएँ, बहुत बेर बितई-१-२९९।
उ.- चलत न फेंट गही मोहन की अब ठाढी पछितात-२५४१।
लाग्यौ पछितान- (क) पछताने लगा, पश्चाताप करने लगा।
उ.-अब लाग्यौ पछितान पाइ दुख, दीन, दई को मारथौ-१-१०१। (ख) सुरपति अब लाग्यौ पछितान-६-५। लागीं पछितान-पछताने लगीं। उ.-रिस ही मोकौं दीन्हौ, अब लागीं पछितान-३५५।
उ.- (क) रोहिनि चितै रही जसुमति तन, सिर धुनि धुनि पछतानी-३९५। (ख) मधुकर प्रीति किए पछतानी-३३५९।
पछताने से, पश्चाताप करने से।
उ.- सृंगी यह कीन्हौ बिनु जानैं। होत कहा अब के पछितानैं-१-२९०।
उ.- (क) बिरध भऐं कफ कंठ बिरोध्यौ, सिर धुनि धुनि पछितान्यौ। १-३२९ (ख) मथुरापति जिय अतिहिं डरान्यौ। सभा माँझ असुरनि के आगैं, सिर धुनि धुनि पछितान्यौ-१०-६०।
उ.- रसमय जानि सुवा सेमर कौं चोंच घालि पछितायौ-१-५८।
उ.- रह्यौ मन सुमिरन कौ पछितायौ-१-६७।
उ.- पावति नहीं स्याम बलरामहिं, ब्याकुल ह्यै पछतावति-४५९।
उ.-पिछली चूक समुझि उर अंतर अब लागी पछितावन-३१०१।
उ.- मोहिं भयौ माखन पछितावौ, रीती देखि कमोरि-१०-२८६।
उ.- कीजै कहा कहत नहिं आवै सोचि हृदय पछितैए-३२९८।
उ.- सूरदास प्रभु की यह लीला हम कत जिय पछितैया-४२८।
प्रत्यक्ष, प्रकट, जो अंतर्धान न हो।
उ.- निकसि खंभ तैं नाथ निरंतर, निज जन राखि लियौ - १-३८।
उ.- करि निरंध निबहै दै माई आँखिनि रथ-पद धूरि- २६९३।
उ.- सूरदास अवसर के चूकैं, फिरि पछितैहौ देखि उघारी-१-२४८।
पश्चिम से आनेवाली हवा, पछुआ हवा।
पिछले, पहले के, विगत, पूर्व के।
उ.- पछिले कर्म सम्हारत नाहीं, करत नहीं कछु आगे-१-६१।
सूप आदि से फटककर अनाज इत्यादि साफ करना।
[सं. प्रक्षालन, प्रा. पन्छाड़न, हिं. पछोड़ना]
फटकना-पछोड़ना- अच्छी तरह परीक्षा करना।
सूप में रखकर और फटककर साफ की।
उ.- बिन आज्ञा मैं भवन पजारे, अपजस करिहैं लोइ-९-९९।
उ.- किंकिन नूपुर पाट पटंबर, मनौ लिये फिरैं घर-बार-१-४१।
उ.- (क) हम तन हेरि चितै अपनौ पट देखि पसारहिं लात- ३२८३। (ख) भरि भरि नैन ढारति है सजल करति अति कंचुकि के पट-३४६२।
कागज, लकड़ी या धातु का टुकड़ा।।
फटकि पछोरी- अच्छी तरह परीक्षा की। उ.- सूर जहाँ लौं स्याम गात हैं, देखे फटकि पछोरी।
उ.- कहौ कौन पै कढ़ै कनूका भुस की रास पछोरे।
फटकि पछोरे- अच्छी तरह परीक्षा की। उ.- तुम मधुकर निर्गुन निज नीके देखे फटकि पछोरे-३१००।
जलता है, दहकता है, सुलगता है।
उ.- भयौ पलायमान दानवकुल, ब्याकुल, सायक-त्रास। पजरत धुजा, पताक, छत्र, रथ, मनिमय कनक-अवास-९-८३।
उ.-पजरि पजरि तनु अधिक दहत है सुनत तिहारे बैन।
उ.- बचन दुसह लागत अति तेरे ज्यों पजरे पर लौन-३१२२।
‘पट’ शब्द के साथ चटकता है।
उ.- (क) पटकत बाँस, काँस, कुस ताल-५९४। (ख) पटकत बाँस, काँस कुस चटकत-६१५।
पटकत सिला गई आकासहिं-१०-४।
गेहूँ, चने आदि का भीगने के बाद सूखकर सिकुड़ना।
‘पट’ शब्द के साथ फटना या दरकना।
पटकने या पटके जाने की क्रिया या भाव।
उ.- भई पैज अब हीन हमारी, जिय मैं कहै बिचारि। पटकि पूँछ, माथौ धुनि लोटै, लखी न राघव-नारि-९-७५।
उ.- ज्यों कुजुवारि रस बिंघि हारि गथु सोचतु पटकि चिती-१० -१०३।
झटका देकर गिराये, पटक-पटक कर मारे।
उ.- कंस सौंह दै पूछिये जिन पटके सात-११३७।
उ.- पटक्यो भूमि फेरि नहिं मटक्यो लीन्हें दंत उपारी-२५९४।
समता, तुलना, बराबरी, समानता।
उ.- केसर-तिलक-रेख अति सोहै। ताकी पटतर कौं जग को है-३-१३।
[सं. पट्ट=पटरी + तल=पटरी के समान चौरस=बराबर]
उ.-ग्रीवकर परसि पग पीठि तापर दियो उर्बसी रूप पटतरहिं दीन्ही-२५८८।
[सं. पट्ट=पटरी + तल=पटरी के समान चौरस=बराबर]
उ.- खंजन मीन मृगज चपलाई नहिं पटतर एक सैन-१३४९।
वार करने के लिए भाले आदि को सँभालना।
वार करने को हथियार सँभाला।
उ.- रथ तैं उतरि, केस गहि राजा, कियौ खड़ग पटतारा-१०-४।
पटपटाकर, ‘पटपट’ की ध्वनि करके।
उ.- जबहिं स्याम तन अति बिस्तार्यौ। पटपटात टूटत अँग जान्यौ, सरन-सरन सु पुकारयौ-५५६।
‘पटपट’ शब्द उत्पन्न करना।
पटरा कर देना- (१) मार-काटकर बिछा देना। (२) चौपट या तबाह कर देना।
पटरा होना- नष्ट हो जाना।
मुख्य रानी जो सिंहासन पर बैठने की अधिकारिणी हो।
उ.- जा रानी कौं तू यह दैहै। ता रानी सैंती सुत ह्वैहे। पटरानी कौं सो नुप दियौ-६-५।
काठ का छोटा सलोतर टुकड़ा।
पटरी बैठना- मन मिलना, मित्रता होना।
सुनहरे-रूपहले तारों का फीता।
उ.- पटली बिन बिद्रुम लगे हीरा लाल खचावनो-२२८०।
रेशम या सूत के फुँदने आदि गूँथने वाला, पटहार।
उ.- सुंदर बदन तडाग रूपजल निरखनि पुट भरि पीवत- पृ. ३३५ (४६)।
उ.- (क) इतनी सुनत कुंति उठि धाई, बरषत लोचन नीर।¨¨¨। त्यागति प्रान निरखि सायक धनु, गति-मति-बिकल-सरीर - १-२९। (ख) सुंदर बदन री सुख सदन स्याम के निरखि नैन-मन थाक्यो - २५४६।
उ.- बिछुरन भेंट देहु ठाढ़े ह्वै निरखो घोष जन्म को खेरो - २५३२।
उ.- यह भावी कछु और काज है, को जो याकौ मेटनहारौ। याकौ कहा परेखौ-निरखौ, मधु-छीलर, सरितापति खारौ - ९-३६।
सत्व, रज और तम-निश्चय रूप से जो इन तीनों गुणों से परे हो।
उ.- बेद-उपनिषद जासु कौं निरगुनहिं बतावै। सोइ सगुन ह्वै नंद की दाँवरी बँधावै - १-४।
जिसमें गुण न हो, जो गुणी न हो, अनाड़ी।
जमीन के लगान का हिसाब रखनेवाला कर्मचारी।
वस्त्र को सुगंधित करनेवाली वस्तु।
उ.- डिमडिमी पटह ढोल डफ बीना मृदंग उपंग चंग तार-२४४६।
लोहे की लंबी पट्टी जिससे तलवार के वार की काट सीखी जाती है।
पटाफेर- विवाह की एक रीति जिसमें वर-वधू के आसन बदल दिये जाते हैं।
पटा बँधाना- पटरानी बनाना। उ.- चौदह सहस तिया मैं तोकौं पटा बँधाऊँ आजु-९-७९।
छोटी चीज के गिरने का शब्द।
नाटक में दृश्य की समाप्ति पर गिरनेवाला परदा।
उ.- (क) मुंडली पटिया पारि सँवारै कोढ़ी लावै केसरि-३०२६। (ख) वे मोरे सिर पटिया पारैं कंथा काहि उढ़ाऊँ-३४६६।
पट्टी, कपड़े की धज्जी जो घाव या अन्य किसी स्थान पर बाँधी जाय।
उ.- अपनी रूचि जित ही जित ऐंचति इंद्रिय-कर्म-गटी। हौं तित ही उठि चलति कपटि लगि बाँधे नैनपटी-१-९८।
उ.- यह चतुराई अधिकाई कहाँ पाई स्याम वाके प्रेम की गढ़ि पढ़े हौ पटी-२००८।
समझा-बुझाकर अपने ढंग पर लाना।
उ.- पटुली लगे नग नाग बहुरंग बनी डांडी चारि-२२७८।
किसी वस्तु या धातु की चिपटी पट्टी।
धातु, कागज या कपड़े की धज्जी।
माँग के दोनों ओर की पटियाँ।
उ.- (क) अंग मरगजी पटोरी राजति छबि निरखत रीझत ठाढ़े हरि-१२३२। (ख) जाइ श्रीदामा लै आवत तब दै मानिनि बहु भाँति पटोरी-२४४५।
[सं. पाट + ओरी (प्रत्य.)]
उ.- जाकैं मीत नंदनंदन सें, ढकि लइ पीत पटोलै। सूरदास ताकौ डर काकौ, हरि गिरिधर के ओलै-१-२५६।
उ.- मनु रघुपति भयभीत सिंधु पत्नी प्यौसार पठाई-९-१२४।
उ.-बकी कपट करि मारन आई, सो हरि जू बैकुंठ पठाई-१-३।
उ.-सहस संकट भरि ब्याल पठाए-५८६।
[सं. प्रस्थान, प्रा.पट्ठान]
उ.- सो छलि बाँधि पताल पठायौ, कौन कृपानिधि धर्मा-१-१०४।
उ.- काके पति-सुत-मोह कौन को घर है, कहाँ पउवत- पृ. ३४१ (७)।
उ.- मनौ सुरपुर तेहि सुरपति पठइ दियौ पठावनो-२२८०।
कोई वस्तु या संदेश भेजने का भाव।
जिस (व्रत आदि) में जल न ग्रहण किया जाय।
उ.- (क) कंस, केसि, चानूर, महाबल करि निरजीव जमुन-जल बोयौ - १-५४। (ख) पटक्यो सिला खरिक के आगे छिन निरजीव करायो-सारा. ४२९।
सिखाया हुआ नया कुश्तीबाज।
उ.- (क) घर पठई प्यारी अंकम भरि-१२३२। (ख) अतिहिं निठुर पतियाँ नहिं पठई काहू हाथ सँदेस-२७५३।
उ.- मेरी देह छुटत जम पठए जितक दूत घर मौं-१-१५१।
उ.- (क) परतिज्ञा राखी मन-मोहन, फिरि तापैं पठयौ-१-३८। (ख) दुरबास दुरजोधन पठयौ पांडव-अहित बिचारी-१-१२२।
उ.- काहे को लिखि पठवत कागर-२९८०।
उ.- कहत पठवन बदरिका मोहिं, गूढ़ ज्ञान सिखाइ-३-३।
भेजो, प्रस्थान कराओ, पठाओ।
उ.- मेरी बेर क्यों रहे सोचि? काटि कै अघ-फाँस पठवहु, ज्यौं दियौ गज मोचि-१-१९९।
उ.- कंसहिं कमल पठाइहै, काली पठवै दीप-५८९।
उ.- कंसहिं कमल पठाइहै, काली पठवै दीप-५८९।
चाँद मास के प्रत्येक पक्ष की पहली तिथि।
[सं. प्रतिपदा, प्रा. पड़िवआ]
उ.- कान्हहिं पठै, महरि कौं कहति है पाइनि परि-७५२।
कोई वस्तु या संदेश भेजना।
धन जो पढ़ने के बदले में दिया जाय।
वह स्थान जहाँ यात्री ठहरते हों, चट्टी टिकान।
[सं. प्रतिवेश या प्रतिवास, प्रा. पड़िबेस, पड़िवास]
धन जो पढ़ाने के बदले में दिया जाय।
सिखाता हूँ, शिक्षा देता हूँ।
उ.-सूर सकल षट दरसन वै, हौं बारहखरी पढ़ाऊँ-३४६६।
शिक्षा देना, अध्यापन करना।
पक्षियों को मनुष्य की भाषा सिखाना।
उ.-(क) नंद धरनि सुत भलौ पढ़ायौ-१०-३४०। (ख) भलौ काम हैं सुतहिं पढ़ायौ-३९१। (ग) बारे ते जेहि यहै पढ़ायो बुधि-बल-कल बिधि चोरी।
उ.-(क) कीर पढ़ावत गनिका तारी, ब्याध परम पद पायौ-१-६७। (ख) सुवा पढ़ावत, जीभ लड़ावति, ताहि बिमान पठौ-१-१८८। (ग) चातक मोर चकोर बदत पिक मनहुँ मदन चटसार पढ़ावत-१०-३०५।
शिक्षा देती है, अध्यापन करती है।
पक्षियों को बोलना सिखाती हें।
(क) गनिका किए कौन ब्रत-संजम, सुकहित नाम पढ़ावै-१-१२२। (ख) आपन ही रँग रगी साँवरी सुक ज्यौं बैठि पढ़ावै-३०८८।
उ.-पढ़ौ भाई राम-मुकुंद-मुरारि-७-३।
उ.-गर्जनि पणव निसान संख रव हय गय हींस चिकार-१० उ.-२।
उ.- मोहन-मुर्छन-बसीकरन पढ़ि अगमति देह बढ़ाऊँ-१०-४९।
मंत्रादि उच्चारण करके या फूँककर।
उ.-जसुमति मन-मन यहै बिचारति। झझकि उठयौ सोवत हरि अबहीं कछु पढ़ि-पढ़ि तन-दोष निवारति-१०-२००।
पढ़कर, शिक्षा प्रहण करके।
उ.-कुबिजा सों पढ़ि तुमहिं पठाए नागर नवल हरी-३३७०।
उच्चारण करने की क्रिया कहना।
उ.-जब तें रसना राम कह्यौ। मानौ धर्म साधि सब बैठयौ, पढ़िबे मैं धौं कहा रह्यौ-२-८।
उ.-(द्विजनि अनेक ) हरषि असीस पढ़ीं-१०-१४।
उ.-(क) जेहि गोपाल मेरे बस होते विद्या न पढ़ी-२७९४। (ख) तैं अलि कहा पढ़ी यह नीति-३२७०।
उ.-चुगुल, ज्वारि, निर्दय, अपराधी, झूटौ, खोटौ-खूटा। लोमी, लौंद, मुकरवा, झगरू, बड़ौ पढ़ैलौ, लूटा-१-१८५।
नाचता है, नृत्य करते हैं।
उ.- (क) कोउ निरतत कोउ उघटि तार दै, जुरी ब्रज-बालक-सेनु - ४४८। (ख) सूर स्याम काली पर निरतत, आवत हैं ब्रज ओक - ५६५।
उ.- (क) उलटे भुज बाँधि तिन्हैं लकुट लिए डाँटै। नैकहुँ न थकत पानि, निरदई अहीरी-३४८। (ख) है निरदई, दया कछु नाहीं-३६१। (ग) को निरदई रहै तेरैं घर-३६८।
उ.- (क) लघु अपराध देखि बहु सोचति, निरदय हृदय बज सम तोर-३५७। (ख) सब निरदैं सुर असुर सैंल सखि सायर सर्प समेत-२८५९।
उ.- सोइ निरधन, सोइ कृपन दीन हैं, जिन मम चरन बिसारे-१-२४२।
उ.-दीपक पीर न जानई (रे) पावक परत पतंग -१-३२५।
योगशास्त्र' के रचयिता एक ऋषि।
महाभाष्य' के रचयिता एक मुनि।
पत उतारना (लेना)- बेइज्जती करना।
पत रखना- इज्जत बचाना।
मान की रक्षा न कर सकने वाला।
पतझड़, पतझर, पतझल, पतझाड़, पतझार
वह ऋतु जिसमें वृक्षों की पत्तियाँ झड़ जाती हैं।
[हिं. पत = पत्ता + झड़ना]
पतझड़, पतझर, पतझल, पतझाड़, पतझार
[हिं. पत = पत्ता + झड़ना]
पत्ते गिरते हैं, पतझड़ होता है।
उ.-तरुवर फूलै, फरै, पतझरै, अपनें कालहिं पाइ-१-२६५।
पतले-पतले 'बड़े' (एक व्यजन या खाद्य)।
उ.-मूँग-पकौरा, पनौ पतबरा। इक कोरे, इक भिजे गुरबरा-१०-३९६।
नाव का 'कर्ण' जिससे उसे मोड़ते और घुमाते हैं।
[सं. पत्रबाल, पात्रपाल, प्रा. पात्रवाड़]
[सं. प्रत्यय, प्रा. पत्तय]
[सं. प्रत्यय, प्रा. पत्तय]
[सं. प्रत्यय, प्रा. पत्तय]
[सं. प्रत्यय, प्रा. पत्तय]
उ.-(क) पजरत, धुजा, पताक, छत्र, रथ, मानिमय कनक-अवास-९-८३। (ख) स्वेत छत्र फहरात सीस पर ध्वज पताक बहुबान -२३७७। (ग) पवन न पताका अंबर भई न रथ के अंग-२५४०।
डंडा जिसमें पताका पहनायी जाती है।
नाटक का वह स्थल जहाँ पात्र की चिंता आदि का समर्थन आगंतुक भाव से हो।
मर्यादा प्रतिष्ठा, लज्जा, साख,
उ.-(क) रिपु कच गहत द्रुपद-तनया जब सरन-सरन कहि भाषी। बढ़ै दुकूल-कोट अंबर लौं, सभा-भाँझ पति राखी-१-२७। (ख) सभा-भाँझ द्रौपदि पति राख, पति पानिप कुल ताकौ-१-११३। (ग) हमहिं खिझाइ आपु पति खोवत यामैं कहा तुम पावहु-३२६६। (घ) ज्यों क्योंहूँ पति जात बड़े की मुख न देखावत लाजन-३९९।
उ.-जो पतिआँ हो तुम पठवत लिखि बीच समुझि सब पाउ-३४७२।
उ.-सूरदास संपदा-आपदा जिनि कोऊ पतिआइ-१-२६५।
[सं. प्रत्यय, प्रा. पत्तय + आना]
उ.-कहा परदेसी को पतिआरो-२७३२।
समाज से वहिष्कृत, जातिच्युत।
उ.-जज्ञ-भाग नहिं लियौ हेत सौं रिषिपति पतित बिचारे-१-२५।
उ.-(क) नंद-बरुन-बंधन-भय-मोचन सूर पतित सरनाई-१-२७। (ख) सूर पतित तुम पतित-उधारन, गहौ बिरद की लाज- १-१०२।
उ.-सूरदास बलि सरबस दीन्हौ, पायौ राज पतारी-८-१४।
उ.-कहौ तौ सैना चारु रचौं कपि, धरनी-ब्योम पतारौ-९-१०८।
पृथ्वी के नीचे के सात लोकों में से अंतिम जहाँ बलि को विष्णु ने भेजा था।
उ.-सो छलि बाँधि पताल पठायौ, कौन कृपाविधि, धर्मा-१-१०४।
किसी वस्तु का मालिक, स्वामी, अधिपति।
किसी स्त्री का विवाहित पुरुष, भर्ता, कांत।
उ.-देखहु हरि जसे पति आगम सजति सिंगार धनी। ३४६१।
पतितों का उद्धार करनेवाला।
बड़ा पतित, पतितों में सबसे बढ़कर।
उ.-हरिहौं सब पतितनि-पतितेस-१-१४०।
पापी ही रहकर, पातकी ही रहकर।
उ.-हौं तौ पतित सात पीढ़िनि कौ, पतितै ह्वै निस्तरिहौं -१-१३४।
उ.-(क) गौतम की पतिनी तुम तारी, देव, दवानल कौं अँचयौ-१-२६। (ख) चरन-कमल परसत रिषि पतिनी, तजि पषान, पद पायौ- १-१८८।
पति में स्त्री की पूर्ण प्रीति और भक्ति।
उ.-सूर स्याम सों साँच पारिहौं यह पतिबरत सुनहु नँदनंदन-१२२०।
उ.-इतनी बिनती सुनहु हमारी बारक हूँ पतिया लिखि दीजै-२७२७।
उ.-यह बानी बृषभानु-घरनि कही तब जसुमति पतियाई-७५६।
उ.-सूर मिली ढरि नंदनँदन को अनत नहीं पतियाति- पृ ३३७ (६५)।
उ.- कौन भाँति हरि को पतियानी-१० उ.-३७।
उ.-(क) कहा परदेसी को पतियारो-२७३१। (ख) कुँवरि पतियारो तब कियो जब रथ देख्यो नैन-१०उ.-८।
पति में अनन्य प्रीति रखनेवाली।
उ.-ओढ़ियत है की डसिअत है कीधौं कहिअत कीधौं जु पतीजत-३३४१
उ.-(क) आवत देखि बान रघुपति के, तेरौ मन न पतीजै-९-१२६। (ख) तब देवकी दीन ह्वै भाष्यौ, नृप कौ नाहिं पतीजै। (ग) मनसा, बाचा, कहत कर्मना नृप कबहूँ न पतीजै-१०-९। (घ) तिनहिं न पतीजै री जे कृतहिं न मानैं-२६८९।
उ.-जसुमति कह्यौ अकेली हौं मैं तुमहुँ संग मोहिं दीजौ। सूर हँसतिं ब्रजनारि महरि सौं, ऐहैं साँच पतीजौ-८१३।
उ.- सप्तम दिन मरिवौ निरधार-१-२९०।
उ.- कह्यौ, आइहैं हरि निरधार-१० उ.-३७।
मन में समझना या धारण करना।
जिस वर्ण में अनुस्वार न हो।
पत्ता खड़कना- (१) खटका या आहट होना। (२) आशंका होना।
पत्ता तोड़कर भागना- तेजी से भागना।
पत्ता न हिलना- जरा भी हवा न चलना।
पत्ता हो जाना- तेजी से दौड़कर अदृश्य हो जाना।
[सं. प्रस्तर, प्रा. पत्थर]
पत्थर का कलेजा (दिल, हृदय)- जिसमें दया-ममता न हो।
पत्थर की छाती- हिम्मती और मजबूत दिल वाला।
पत्थर की लकीर- सदा बनी रहने बाजी चीज।
पत्थर को (में) जोंक लगना- असंभव बात होना।
पत्थर चटाना- पत्थर पर रगड़ कर तेज करना।
पत्थर निचोड़ना- कंजूस से दान ले लेना।
पत्थर पर दूब जमना- असंभव और अनहोनी बात होना।
पत्थर पसीजना (पिघलना)- कठोर दिल वाले में दया-ममता आना।
पत्थर सा खींच (फेंक) मारना- बहुत कड़ी बात कहना।
पत्थर से सिर फोड़ना (मारना)- असंभव बात की सफलता का प्रयत्न करना।
उ.-देवकी-गर्भ भई है कन्या, राइ न बात पतीनी-१०-४
उ.-दरसन ते धीरज जब रैहै तब हम तोहिं पतैहैं-१२७७।
उ.-(क) बारक वह मुख आनि देखावहु दुहि पै पिवत पतूखी-३०२९। (ख) एक बेर बहुरौ ब्रज आवहु दूध पतूखी खाहु-३४३७।
[सं. पुत्रवधू, प्रा. पुत्रवहू]
पत्तों की दुनिया, छोटा दोना।
उ.-छीर समुद्र सयन संतत जिहिं, माँगत दूध पतौषी दै भरि-३९२।
उ.-अब हम लिखि पठयो चाहति हैं, उहाँ पत्र नहिं पैहैं-३४६०।
पत्तों का बना पात्र जिसमें भोजन परसा जाता है।
एक पत्तल के खानेवाले- (१) संबंधी। (२) धनिष्ठ मित्र।
जिस पत्तल में खाना उसी में छेद करना- जिससे लाभ उठाना या जिसका अन्न खाना उसी को हानि पहुँचाना।
उ.-धरनि पत्ता गिरि परे तैं फिरि न लागै डार-१-८८।
[सं. प्रस्तर, प्रा. पत्थर]
पत्थर पड़ना- चौपट हो जाना।
पत्थर पड़ जाय (पड़े)- चौपट हो जाय।
पत्थर-पानी का समय- आंधी पानी का समय।
[सं. प्रस्तर, प्रा. पत्थर]
कुछ भी नहीं, व्यर्थ की चीज।
[सं. प्रस्तर, प्रा. पत्थर]
पत्नी के प्रति पूर्ण प्रीति।
उ.-चारि भुज जिहिं चारि आयुध निरखि कै न पत्याउ-१०-५।
उ.-मोहिं अपनैं बाबा की सौहैं, कान्हहिं, अब न पत्याऊँ-३४५।
उ.-(क) अब तुमको पिय मैं पत्याति हौं-१८७०। (ख) कहा कहत री मैं पत्याति नहिं-३००७।
वृक्ष या बेल का पत्ता, पत्ती, दल, पर्ण।
उ.-(क) लाखागृह पांडवनि उबारे, साकपत्र मुख नाए-१-३१। (ख) साकपत्र लै सबै अघाए न्हात भजे कुस डारी-१-१२२। (ग) हरि कह्यौ, साग पत्र मोहिं अति प्रिय, अम्रित ता सम नाहीं-१-२४१।
वह वस्तु जिस पर कुछ लिखा जाय।
उ.-पुहुमि पत्र करि सिंधु मसानी गिरि मसि कौं लै डारैं-१-१८३।
वह कागज जिस पर दान प्रतिज्ञा आदि की बात लिखी हो।
वह लेख जिस पर किसी व्यवहार, घटना आदि का प्रामाणिक विवारण दिया हो
उ.-सूरस्याम संगति की महिमा काहू को नैंकहु न पत्यानी-१२८४।
पत्याने, पत्यान्यो, पत्यान्यौ
उ.-(क) तुम देखत भोजन सब कीनो अब तुम मोहिं पत्याने-९१९। (ख) सूरदास प्रभु इनहिं पत्याने आखिर बड़े निकामी री -पृ. ३२३ (१९)। (ग) सूरदास तहाँ नैन बसाए और न कहूँ पत्यान्यो-१८५७।
उ.-जौन पत्याहि पूछि बलदाउहिं-५१०।
उ.-जौ न पत्याहु चलौ सँग जसुमति, देखौ नैन निहारि-१०-२९२।
उ.-राँचेहु विरचे सुख नाहीं भूलि न कबहुँ पत्यैए-२२७५।
उ.-सूरस्याम को कौन पत्यैहै कुटिल गात तनु कारे-३१६७।
उ.-सुनि राधा, अब तोहिं न पत्यैहौं-१५५०।
उ.-मिलि बेंठे सब जेंवन लागे, बहुत बने कहि पाक। अपनी पत्रावलि सब देखत, जहँ तहँ फेनि पिराक-४६४।
वे बेल-बूटें या रेखाएँ जो सजावट या शोभा-वृद्धि के लिए स्त्रियाँ माथे पर बना लेती हैं।
उ.-स्याम कर पत्री लिखी बनाइ-२९२९।
पत्थर पर रगड़कर तेज या पैना करना।
पत्थर की तरह नीरस और कठीर होना।
उ.-ध्रवहिं अभै पद दियौ मुरारी-१-२८।
उ.-नाभि सरोज पगट पदमासन उतरि नाल पछितावै-१०-६५।
उ.- पद-रिपु पद अटक्यौ न सम्हारति, उलट न पलट खरी-६५९।
उ.- (क) अंबरीष, प्रहलाद, नृपति बलि, महा ऊँच पदवी तिन पाई-१-२४। (ख) कहा भयो जु भए नँद-नंदन अब इह पदवी पाई-३२०८।
लगाव या संबंध न रखनेवाला।
जिसके आगे वंश चलानेवाला कोई न हो।
उ.- मरौ वह कंस, निरबंस वाकौ होइ, कर्यौ यह गंस तोकौं पठायो- ५५१।
उ.-सूरदास सोई कहे पद भाषा करि गाइ-१-२२५।
किसी धातु का गोल टुकड़ा डो विशेष कार्य करने पर पुरस्कार स्वरूप दिया जाता है।
पैरों की रक्षा करनेवाला, जूता।
उ.-जहँ जहँ जात तहीं तहिं त्रासत, अस्म, लकुट, पदत्रान-१-१०३।
उ.-मृदु पदन्यास मंद मलयानिल बिगलत सीस निचोल।
गले में पहननें का एक गहना जिस पर प्रायः किसी देवता का चरण अंकित रहता है।
उ.- (क) पहुँची करनि, पदिक उर हरिनख, कठुला कंठ मंजु गजमनियाँ-१०-१०६। (ख) उर पर पदिक कुसुम बनमाला, अंगद खरे बिराजैं-४५१।
उ.- उरग-इन्द्र उनमान सुभग भुज, पानि पदुम आयुध राजैं-१-६९।
उ.- अर्थ, धर्म अरू काम, मोक्ष फल, चारि पदारथ देत गनी-१-३९।
उ.- जनम तौ ऐसेहिं बीति गयौ। जैसे रंक पदारथ पाए, लोभ बिसाहि लियौ-१-७८।
जल जो पूज्य या अतिथि के चरण धोने को दिया जाय।
धर्म,अर्थ, काम, और मोक्ष।
वह सिद्धांत जिसमें भौतिक पदार्थों का ही विशेष मान हो, आत्मा या ईश्वर का अस्तित्व तक न माना जाय।
सौ नील की संख्या जो १ के बाद पंद्रह शून्य देकर लिखी जाती है।
उ.- राजपाट सिंहासन बैठो, नील पदुम हूँ सौं कहै थोरी-१-३०३।
उ.- सिव-पूजा जिहिं भाँति करी है, सोइ पद्धति पर- तच्छ दिखैहौं-९-१५७।
कार्यप्रणाली, विधि-विधान।
उ.- यकटक रहैं पलक नाहिं लागैं पद्धति नई चलाऊँ-१४८५।
पुस्तक जिसमें कोई विधि लिखी हो।
सौ नील की संख्या जो१ के साथ १५ शून्य देकर लिखी जाती है।
उ.- किहिं गयंद बाँध्यो, सुन मधुकर, पद्मनाल के काँचे सूते-३३०५।
हिन्दी के रीतिकालीन एक प्रसिद्ध कवि।
चित्तौर की एक रानी जो अपने जौहर के कारण अमर है।
सम्मान से ले जाना या बैठाना।
प्रतिष्ठा या स्थापित करना।
सम्मान से बैठाना, प्रतिष्ठित करना।
उ.- गो कह्यौ, हरि बैकुंठ सिधारे। सम-दम उनहीं संग पधारे-१-२९०।
उ.- महर गोप सबही मिलि बैठे, पनवारे परसाए-१०-८९।
परसी या भोजन से सजी पत्तल।
उ.- (क) ग्वारनि के पनवारे चुनि चुनि उदर भरीजै सीथिनि-४९०। (ख) कर कौ कौर डारि पनवारे नागर सूर आपु चले अति चाँड़े-१५५७।
उ.- पहिले पनवारौ परसायौ-२३२१।
उ.- तब तमोल रचि तुमहिं खवाबौं। सूरदास पनवारौं पावौं-१०-२११।
जिसे किसी बात की इच्छा न हो।
प्रतिज्ञा, संकल्प, निश्चय।
उ.- (क) धर्मपुत्र जब जज्ञ उपायौ द्विज मुख ह्वै पन लीन्हौं-२-२९। (ख) गाए सूर कौन नहिं उबरयौ, हरि परिपालन पन रे-१-६६।
आयु के चार भागों (बाल्यावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था) में से एक।
उ.- (क) तीनौ पन ऐसैं हीं खाए, समय गए पर जाग्यौ। (ख) तीन्यौ पन मैं ओर निबाहे इहै स्वाँग कौं काछे-१-१३६। (ग) तीनौं पन ऐसैं ही खोए, केस भए सिर सेत-१-२८६। (घ) तीनौंपन ऐसै ही जाइ-७-२।
[सं. पर्वन्=विशेष अवस्था]
वह घाट जहाँ पानी भरा जाता हो।
उ.- उतरी पनच अब काम के कमान की-पृ. ३०० (९)।
पानी पाकर फिर हरा भरा हो जाना।
पुनः स्वस्थ और हृष्ठ-पुष्ट होना।
हमेल आदि में लगी पान के आकार की चौकी, टिकड़ा।
ऐसे व्यक्ति को दिया जानेवाला पुरस्कार।
उ.- खेलत फिरत कनकमय आँगन, पहिरे लाल पनहिंयाँ-९-१९।
गंदे जल का प्रवाह, परनाला।
उ.- (क) जैसे अंधौ अंध कूप मैं गनत न खाला-पनार। तैसेहिं सूर बहुत उपदेसैं सुनि-सुनि गे कै बार-१-८४। (ख) तेरौ नीर सुची जो अब लौ, खार पनार कहावै-५६१।
उ.- (क) रुदन जल नदी सभ बहि चल्यो उरज बीच मनोगिरी फोरि सरिता पनारी-पृ. ३४१ (५)। (ख) मानो दामिनि धरनि परी की सुधर पनारो-१८२३। (ग) तट बारू उपचार चूर जल परी प्रस्वेद पनारी-२७२८।
उ.- (क) कंचुकि पट सूखत नहिं कबहूँ उर बिच बहत पनारे-२७६३। (ख) चहुँ दिसि कान्ह कान्ह करि टेरत अँसुवनि बहत पनारे-३४४६
पनाह माँगना- बचने की इच्छा करना।
रक्षा का स्थान, शरण, आड़।
घाट जहाँ पानी भरा जाता हो।
उ.- जब ते पनिघट जाऊँ सखी री वा यमुना के तीर-२७९८।
पानी बहना, पसीजना, प्रवाहित होना।
उ.- हौं गोधन लै गयौ जमुन-तट, तहाँ हुती पनिहारी-६९३।
इमली आदि के पने में भीगे हुए।
उ.- मूंग पकौरा पनौ पतबरा। इक कोरे इक भिजे गुरबरा-३९६।
रेंग या सरककर चलने की क्रिया।
पन्ने की तरह हलके हके रंग का।
उ.-पन्नग-रूप गिले सिसु गो-सुत, इहिं सब साथ उबारयौ-४३३।
उ.-(क) मनहुँ पन्नगिनि उतरि गगन ते दल पर फल परसावत- १३४५। (ख) मनो पन्नगी निकसि ता बिच रही हाटक गिरि लपटाई-पृ. ३१८ (७१)। (ग) खंजरीट मनो ग्रसित पन्नगी यह उपमा कछु आवै-२०९७।
उ.-पन्ना पिरोजा लागो बिच-बिच १० उ.-२४।
आम, इमली आदि का पानी मिला पतला रस।
घाव की खुरंड, छोटा पापड़।
चातक नामक पक्षी जो वसंत और वर्षा में बहुत सुरीली ध्वनि से बोलता है।
सितार के छः तारों में एक जो लोहे का होता है।
(बल के गर्व से ) बाहें ऐंठना।
रुपहला, सुनहरा, रंगीन या चमकदार कागज।
लकड़ी, चूने-आदि का पतला छिलका, चिप्पड़।
इतना सूखना कि पपड़ी पड़ जाय।
सूखी और सिकुड़ी हुई या परत।
उ.-जिनि पहले पलना पौढ़े पय पीवत पूतना घाली-२५६७।
उ.-मनौ धेनु तृन छाँड़ि बच्छ हित, प्रेम-द्रवित चित स्रवत पयोधर-१०-१२४।
उ.-पीन पयोधर सघन अति तापर रोमावली लसी री-२३८४।
उ.-(क) मनु पयनिधि सुर मथत फेन फटि, दयौ दिखाई चंद-१०-२०३। (ख) मानहुँ पयनिधि मथत, फेन फटि चंद उजारयौ-४३१।
सिर्फ दूध पीकर ही रहनेवाला।
गमन, प्रस्थान, जाना, यात्रा।
उ.-(क) बिछुरत प्रान पयान करैगे, रहौ आजु पुनि पंथ गहौ (हो)-९-३३। (ख) आजु रघुनाथ पयानो देत। बिह्वल भए स्रवन सुनि पुरजन, पुत्र-पिता कौ हेतु-९-३९।
धान कोदों आदि के सूखे डंठल।
उ.-(क) धान को गाँव पयार ते जानौ ज्ञान बिषय रस भोरे। (ख) उनके गुन कैसे कहि आवै सूर पयारहिं झारत-पृ. ३२७ (६८)।
पयार गहाना- व्यर्थ का श्रम करना। (क) फिरि-फिरि कहा पयारहिं गाह्वे। (ख) झारि झूरि मन तो तू लै गयो, बहुरि पयारहिं गाहत-३०६५।
निर्वाह कीजिए, निभाइए, बचाइए।
उ.- ऐसैं कहौं कहाँ लगि गुन-गन लिखत अंत नहिं लहिऐ। कृपासिंधु उनहीं के लेखैं मम लज्जा निरबहिऐ - १-११२।
निबाह करते हैं, निभा लेते हैं, रक्षा कर लेते हैं।
उ.- सूरदास हरि बोलि भक्त कौं, निरबाहत गहि बहियाँ - ९-१९।
[सं. निर्बहना, हिं निबाहना]
उ.- (क) हौं पुनि मानि कर्म कृत रेखा, करिहौं तात-बचन निरबाहु - ९-३४। (ख) सूर सब दिन चोर को कहुँ होत है निरबाहु - १२८०।
एक व्रत जिसमें केवल जल पीकर रहा जाता है।
श्रीकृष्ण का एक व्रत जिसमें बारह दिल तक केवल दूध पीकर उनका ध्यान किया जाता है।
उ.-पसु-पंछी तृन-कन त्याग्यौ, अरु बालक पियौ न पयौ-९-४६।
स्त्री के पिता का घर, मायका, पीहर, नैहर।
उ.-परत पिराइ पयोनिधि भीतर, सरिता उलटि बहाइ। मनु रघुपति भयभीत सिंधु पत्नी प्यौसार पठाईं-९-१२४।
शत्रु को चैन न लेने देनेवाला।
उ.-यह तो परंपरा चलि आई सुख लाभ अरु हानि-२६५८।
उ.- (क) कर-नख पर गोबर्धन धारी-१-२२। (ख) ऐकै चीर हुतौ मेरे पर-१-२४७।
पर कट जाना- बल या शक्ति का आधार न रह जाना।
पर काट देना- बल या शक्ति का आधार नष्ट कर देना।
पर जमाना- सीधे-सादे व्यक्ति में भी चालाकी या धूर्तता आना।
पर न मारना (मार सकना)- पास न फटक सकना।
पड़ता है, पतित होता है, गिरता है।
उ.- डोलै गगन सहित सुरपति अरू पुहुमि पलटि जग परई-९-७८।
उ.- बिधु बैरी सिर पर बसै निसि नींद न परई-२८६१।
उ.- मक्ष के उदर ते बाल परकट भयो-१० उ.-२५।
प्रकट करता है, उच्चरित करता है।
उ.- गदगद मुख बानी परकासत देह दसा बिसरी-१४७८।
चमकता हुआ, प्रकाशयुक्त, कांतियुक्त।
उ.- कोटि किरनि-मनि मुख प्रकासित, उड़पति कोटि लजावत-४७९।
उ.- सिंधु भव्य बाणी परकाशी-२४५९।
उ.- (क) भयौ भागवत जा परकार। कहौं, सुनौ सो अब चित धार-१-२३०। (ख) चारिहूँ जुग करी कृपा परकार जेहि सूरहू पर करौ तेहि सुभाई-८-९।
उ.- बूझत हैं पूजा परकारी-१०२१।
आफत का परकाला- बहुत उपद्रवी।
परखने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
परखकर, जाँच करके, गुण-दोष की परीक्षा करके।
उ.- ताहि कैं हाथ निरमोल नग दीजिए, जोइ नीकैं परखि ताहि जानै-१-२२३।
उ.- परखि लिए पाछेन को तेऊ सब आए-२५७५।
उ.- बामन रूप धरयौ बलि छलि कै, तीनि परग बसुधाऊ-१०-२२१।
उ.- अंकुस-कुलिस-बज्र ध्वज परगट तरुनी-मन भरमाए-६३१।
उ.- परकृत एक नाम हैं दोऊ किधौं पुरुष, किधौं नारि-२२२०।
पानी आदि को रोकने का धुस या बाँध।
[सं. परीक्षा, प्रा. परिक्ख]
[सं. परीक्षा, प्रा. परिक्ख]
[सं. परीक्षण, प्रा. परीक्खण]
[सं. परीक्षण, प्रा. परीक्खण]
प्रतीक्षा या इन्तजार करना।
उ.- हम सौं लीजै दान के दाम सबै परखाइ-१०१७।
कियौ परगट-प्रकट किया, बताया।
उ.- सुपनौ परगट कियौ कन्हाई-५४४।
भू-भाग जिसमें कई ग्राम हों।
उ.- ब्रज-परगन-सिकदार महर, तू ताकी करत नन्हाई-१०-३२९।
उ.- अबिनाशी बिनसै नहीं सहज ज्योति परगास-३४४३।
उ.- उदधि मथि नग प्रगट कीन्हो श्री सुधा परगास-१३५६।
उ.- काहू लियो प्रेम परचो, वह चतुर नारि है सोई-२२७५।
उ.- चंदन अंग सखनि कै चरच्यौ। जसुमति के सुख कौं नहिं परच्यौ-३९६।
उ.- बड़ौ भयौ अब दुहत रहौंगो, अपनीं धेनु निबेरि - ४००।
मिली हुई वस्तुओं को अलग करना, छाँटना, चुनना।
सकै निबेरी-छाँट या अलग कर सकता है।
उ.-ग्वालिनि घर गए जानि साँझ की अँधेरी। मंदिर मैं गए समाइ, स्यामल तनु लखि न जाइ, देह गेह रूप, कहौ को सकै निबेरी - १०-२७५।
मिली-जुली वस्तुओं को अलग करने या छाँटने से।
उ.- नैना भए पराये चेरे।¨¨¨। तउ मिलि गए दूध पानी ज्यों निबरत नाहिं निबेरे।
छाँट कर अलग करो, चुन लो, बिलगा लो।
उ.- न्यारौ जूथ हाँकि लै अपनौ न्यारी गाई निबेरौ - १०-२१६।
छुटकारा, मुक्ति, उद्धार, बचाव।
उ.- ब्याकुल अति भवजाल बीच परि प्रभु के हाथ निबेरो।
उ.- जैसे बरत भवन तजि भजिए तैसहि गए फेरि नहिं हेरथौ। सूर स्याम रस रसे रसीले अब को करै निबेरो ?
निबाह करेगा, छाँटेगा, चुनेगा।
उ.- गुननिधान तजि सूर साँवरे को गुनहीन निबैहै - ३१०५।
उ.- दाख दाड़िम छाँड़ि कै कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै - ३१०५।
उ.- बिविध आयुध धरे, सुभट सेवत खरे, छत्र की छाहँ निरभय जनायौ - ९-१२९।
उ.- होउँ बेगि मैं सबल सबनि मैं, सदा रहौं निरभैंरी- १७६।
उ.- पूँगीफल-जतु जल निरमल धरि, आनी भरि कुंडी जो कनक की-९-२५।
उ.- बिनु पर-पानि करै परगाँसा-१०-३।
उ.- सूरज चंद्र धरनि परगासा-२६४३।
उ.- सुरति-सरित भ्रम भँवर तन मन परचत न लह्यौ।
विवाह में वर के आने पर आरती आदि करना।
उ.- मंदिर की परछाया बैठयौ, कर मीजै पछिताइ-९-७५।
उ.- (क) निरखि अपनो रूप आपुही बिबस भई सूर परछाँह को नैन जोरै-पृ. ३१६ (५८)। (ख) मनो मोर नाचत सँग डोलत मुकुट की परिछहिआँ-३४५।
उ.- सुनि अरे अंध दसकंध, लै सीय मिलि, सेतु करि बंध रघुवीर आयौ। यह सुनत परजरयौ, बचन नहिं मन धरयौ, कहाँ तैं राम सौं मोहिं डरायौ-९-१२८।
उ.- (क) परजा सकल धर्म-रत देखी-१-२९०। (ख) रिषभराज परजा सुख पायौ-५-२।
उ.- ताको पिता परण यह कीन्हो-१० उ.- २८।
उ.- तब परिणाम कियौ अति रूचि सों अरू सबही क जोरे-२९७१।
पड़ता है, गिरता है, जाता है।
उ.- पग-पग परत कर्म-तम-कूपहिं, को करि कृपा बचावै-१-४८।
स्थित है, उपस्थित होता है, स्थान पाता है।
उ.- सूरदास कौं यहै बड़ौ दुख, परत सबनि के पाछे-१-१३६।
(युद्ध क्षेत्र) में मरकर गिरता हैं।
उ.- इत भगदत्त, द्रोन, भूरिश्रव, तुम सेनापति धीर। जे जे जात, परत ते भूतल, ज्यौं ज्वाला-गत चीर-१-२६९।
उ.- (क) सिव-पूजा जिहिं भाँति करी है, सोइ पद्धति परतच्छ दिखैहौं-९-१५७। (ख) कनक तुम परतक्ष देखहु सजे नवसत अंग-११३२।
उ.- यह अपनो परताप नंद जसुमतिहिं सुनैहौ-११४०।
उ.- भजन कौ परताप ऐसौ जल तरै पाषान-१-२३५।
उ.- बहुरि बलभद्र परनाम करि रिषिन्ह को पृथ्वी परदक्षिणा को सिधाये-१० उ. ५८।
परदा खोलना- छिपी बात प्रकट करना।
परदा डालना- बात छिपाना।
आँख पर परदा पड़ना- दिखायी न देना।
बुद्धि पर परदा पड़ा - समझ में न आना।
परदा रखना- प्रतिष्ठा बनी रहने देना।
राखत परदा तेरो- तेरी प्रतिष्ठा बनाये रखना चाहती हैं। उ.- मधुकर, जाहि कहौ सुनि मेरौ। पीत बसन तन स्याम जानि कै राखत परदा तेरौ-३२७१।
परदा रखना- (१) सामने न आना। (२) छिपाव रखना।
परदा होना- दुराव-छिपाव होना। उ.- सुनहु सूर हमसौं कहा परदा हम कर दीन्हीं साट सई-१२६७।
स्त्रियों को ओट में रखना।
मिलता है, प्राप्त होता है।
उ.- पलित केस, कफ कंठ बिरूंध्यौ, कल न परति दिन-राती-१-११८।
उ.- मैं मेरी करि जन्म गँवावत, जब लगि नाहिं परति जम डोरी-१-३०३।
उ.- ऐसे जन परतिज्ञा राखत जुद्ध प्रगट करि जोरे-१-३१।
उ.- सुत सनेह समुझति सु सूर प्रभु फिरि फिरि जसुमति परती धरनी-३३३०।
उ.- (क) कत अपनी परतीति नसावत, मैं पायौ हरि हीरा-१-१३४। (ख) बिछुरे श्रीब्रजराज आजु तौ नैननि ते परतीति गई-२५३७।
उ.- जैसे उन मोकों परतेजी कबहुँ फिरि न निहारत हैं।
प्रसिद्ध होता, ख्यात, होता, (नाम) पड़ता या होता।
उ.- जौ तू राम-नाम-धन धरतौ¨¨¨¨¨। जम कौ त्रास सबै मिटि जातौ, भक्त नाम तेरौ परतौ-१-२९७।
उ.-तिनको कठिन करेजो सखी री, जिनको पिय परदेश-२७५३।
विदेश की रहनेवाली, अन्य देशवासिनी।
उ.-मैं परदेसिनि नारि अकेली-९-९४।
विदेश में रहनेवाला व्यक्ति।
उ.-कहा परदेशी को पतियारो-२७३१।
त्रयोदशी को शिवजी का व्रत।
उ.-दान-मान-परधान पूरन काम किए।
प्रधान समझा, सबसे आवश्यक माना।
उ.-यहै मंत्र सबहीं परधान्यौ, सेतु बंध प्रभु कीजै। सब दल उतरि होई पारंगत, ज्यौं न कोउ इक छीजै-९१२१।
उ.-राखौ हटकि उतै को धावै उनकी वैसिय परन परी री-१६६४।
परन न दीनौ-पड़ने नहीं दिया।
उ.-सभा माँझ द्रौपदि-पति राखी, पति पानिप कुल ताकौ। बसन ओट करि कोट बिसंभर, परन न दीन्हौ झाँकौ-१-११३।
पत्तों से बनी कुटी, पर्णकुटी, पर्णशाला।
उ.-तीनि पैंड़ बसुधा हौं चाहौं, परकुटी कौं छावन-८-१३।
बान, आदत, देव, टेक, दूढ़ता।
उ.-(क) परनि परेवा प्रेम की, (रे) चित लै चढ़त अकास। तहँ चढ़ि तीय जो देखई, (रे) भू पर परत निसास-१-३२५। (ख) सूरदास तैसहि ये लोचन का धौं परनि परी। (ग) ऐसी परनि परी, री ! जाको लाज कहा ह्वैहै तिनको। (घ) राखौ हटकि उतै को धावै उनकी वैसिय परनि परी री-१६६४। (ङ) मनहुँ प्रेम की परनि परेवा याही से पढ़ि लीनी-२९०६।
उ.-ताते तुमको करैं दँडौत। अरु सब नरहूँ को परनौत-५-४।
उ.-सोई परपंच करै सखि, अबला ज्यों बरई-२८६१।
उ.- नख, अँगुरी, पग, जानु, जंघ, कटि, रचि कीन्हौ निरमान-६४३।
देवार्पित वस्तु जो विसर्जन के पूर्व ‘नैवेद्य’ और पश्चात ‘निर्माल्य’ कहलाती है। शिव जी के अतिरिक्त सब देवताओं के निर्माल्य- पुष्प और मिष्ठान्न--ग्रहण किये जाते हैं।
उ.- (क) अब तौ सूर यहै बनि आई, हर कौ निज पद पाऊँ। ये दससीस ईस निरमायल, कैंसैं चरन छुवाऊँ-९-१३२। (ख) हरि के चलत भईं हम ऐसी मनहु कुसुम निरमायल दाम-२५३०।
[सं. उप. निस्, निर + हिं. मोल]
उ.- ताहि कैं हाथ निरमोल नग दीजियै, जोइ नीकैं परखि ताहि जानै-१-२२३।
[सं. उप. निस्, निर + हिं. मोल]]
उ.- तुम्हरैं भजन सबहि सिंगार। जो कोउ प्रीति करै पद-अंबुज, उर मंडत निरमोलक हार-१-४१।
जिसमें मोह-ममता न हो, निर्दय, कठोर-हृदय।
उ.- ऐसी निरमोही माई महरि जसोदा भई बाँध्यौ है गोपाल लाल बाँहनि पसारि-३६२।
उ.-सब दल होहु हुस्यार चलहु अब घेरहिं जाई। परपंची है कान्ह कछू मति करै ढिढाई-१० उ.-८।
मिर्च आदि का तीक्ष्ण लगना।
दूसरे के कष्ट को समझने और उससे मुक्त करानेवाला।
उ.-मागध हति राजा सब छोरे ऐसे प्रभु पर-पीरक।
[सं. परिपुष्ट, प्रा. परिपुट्ठ]
उ.-धन्य पिता जापर परफुल्लित राघव-भूजा-अनूप। वा प्रतापि की मधुर बिलोकनि पर वारौं सब भूप-९-१३४।
[सं. प्रफुल्ल, हिं. प्रफुल्लित]
उ.-आजु परब हँसि खेलो हो मिलि सँग नंदकुमार-२४०२।
उ.-अति आनंद नंद रस भीने। परबत सात रतन के दीने-१०-३२।
जो स्वतंत्र न हो, पराधीन।
उ.-परबस भयौ प्रभू ज्यौं रजु-बस, भज्यौ न श्रीपति रानौ-१-४७।
उ.-उर-कलिंद तैं धँसि जल-धारा उदर-धरनि परबाइ-६३७।
उ.-बिबिध बिलास-कला-रस की बिधि उभै अंग परबीनो-२२७५।
उ.-धरत नलिनी बूँद ज्यों जल बचन नहिं परबेश-३४७९।
उ.-जामें बीती सोई जानै कठिन सुप्रेम पाश को परबो-२८६०।
उ.-होइ ज्यों परबोध उनको मेरी पति जिन जाइ-१६१४।
उ.-पुनि यह कहा मोहिं परबोधत धरनि गिरी मुरझैया।
समझाने या दिलासा देने की क्रिया, भाव या उद्देश्य।
उ.-(क) गोपिनि को परबोधन कारन जैहै सुनत तुरंत-२९१३। (ख) हमको परबोधन हरि तौ नहिं पठए- ३२६७।
सांत्वना देना, दिलासा देना।
समुझा-बुझाकर, दिलासा देकर।
उ.-(क) रानिनि परबोधि स्याम महल द्वारे आए-२६१९। (ख) सूर नन्द परबोधि पठावत निठुर ठगोरी लाई-२६५४।
उ.-जो तुम कोटि भाँति परबोधौ जोग-ज्ञान की रीति-३२११।
उ.-यह सब कलयुग कौ परभाउ। जो नृप कैं मन भयउ कुभाउ-१-२९०।
प्रातःकाल, प्रभात, सबेरा।
उ.-(क) सुनि सीता, सपने की बात। रामचन्द्र लछिमन मैं देखे, ऐसी बिधि परभात-९-८२। (ख) रथ आरूढ़ होत परभात-९-८२। (ग) रथ-आरूढ़ होत बलि गई होइ आयो परभात-२५३१।
उत्कृष्ट, श्रेष्ठ, महान्।
उ.-परम गंग कौं छाँड़ि महातम और देव कौं ध्यावैं-१-१५८।
मूल तत्व या सत्ता जिससे सारी सृष्टि का विकास माना जाता है।
परमाणुओं से सृष्टि की उत्पत्ति का सिद्धांत।
उ.-तन स्थूल अरु दूबर होइ। परमातम कौं ये नहि दोइ-५-४।
उ.-ता नृप कौ परमातम मित्र। इक छिन रहत न सो अन्यत्र-४-१२।
ब्रह्म के साक्षात् का सुख, ब्रह्मानंद।
ज्ञान की चरमावस्था को पहुँचा हुआ संन्यासी।
उ.-परमहंस तब बचन उचारे-१०उ.-१०६।
उ.-तुम अनादि, अविगत, अनंतगुन पूरन परमानंद-१-१६३।
उ.-द्वादश कोश रास परमान-१८१६।
उ.-ऊधौ, बेद बचन परमान-३३९९।
उ.-(क) रिषि कह्यौ ताहि दान-रति देहि। मैं बर देहुँ तोहिं सो लेहि। सत्यवती सराप भय मान। रिषि कौ बचन कियौ परमान-१-२२९। (ख) सिव कौ बचन कियौ परमान-४-५।
उ.-कह्यौ, जो कहौ सो हमैं परमान है-८-८।
उ.-अब तुम प्रगट भए बसुदेव सुन गर्ग बचन परमाने-२६५०।
उ.-(क) पाँचै परमिति परिहरै हरि होरी है-२४५५। (ख) जुरयौ सनेह नँदनंदन सों तजि परमिति कुलकानि-३२१४। (ग) परमिति गए लाज तुम्हीं को हंसिनि ब्याहि काग लै जाहि-१० उ.-१०।
परिधि घेरा सीमा, विस्तार।
उ.-(क) कोश द्वादश राज परमिति रच्यो नंदकुमार-१८३७। (ख) उमँग्यौ प्रेम समुद्र दशहूँ दिशि परमिति कही न जाय-१० उ.- ११२।
परमेश, परमेश्वर, परमेसर, परमेसुर, परमेस्वर
धीरज देता है, प्रबोधता है, ढाढ़स बँधाता है।
उ.-धीरज धरहु, नैंकु तुम देखहु, यह सुनि लेति बलैया। पुनि यह कहति मोहिं परमोधति, धरनि गिरी मुरझैया-५६०।
उ.-माता कौं परमोधि दुहुँनि धीरज धरवायौ-५८९।
सारवस्तु, वास्तव सत्ता, यथार्थ तत्व।
उ.-हरि, हौ महापतित अभिमानी। परमारथ सौं बिरत, बिषय रत, भाव-भगति नहिं नैकहुँ जानी-१-१४९।
यथार्थ तत्व का अन्वेषक या जिज्ञासु।
मुक्ति चाहनेवाला, मुमुक्ष।
उ.-सुनि परमिति पिय प्रेम की (रे) चातक चितवन पारि। घन-आसा सब दुख सहै, (पै) अनत न जाँचै बारि-१-३२५।
पड़ा हुआ हूँ, ठहरा हूँ, स्थित हूँ।
उ.-किए प्रन हौं परयौं द्वारैं, लाज प्रन की तोहिं-१-१०६।
पड़ा, गया, पहुँचा, डाला गया।
उ.-नरक कूपन जाइ जमपुर परयौ बार अनेक- १-१०६।
इच्छा हुई, (हठ) ठाना, धुन लगी।
उ.-माधौ जू, मन हठ कठिन परयौ। जद्यपि बिद्यमान सब निरखत, दुःख सरीर भरयौ-१-१००।
मूर्छित होकर या मरकर गिरा, पतित हुआ।
उ.-भीषम सर-सज्या पर परयौ-१-२७६।
उ.-(क) रात होइ तब परलय होइ।
उ.-तुव प्रताप परली दिसि पहुँच्यौं रौन बढ़ावै बात-९-१०४।
उ.-चतुरमुख कहयौ, सँख असुर स्रुति लै गयौ, सत्यब्रत कहयौ, परलै दिखायौ- ८-१६।
दूसरा लोक जैसे स्वर्ग, बैकुंठ।
उ.-राजा कौ परलोक सँवारौ, जुग-जुग यह चलि आयौ-९-५०।
उ.- कंस कौं मारिहौं, धरनि निरवारिहौं, अमर उद्धारिहौं, उरग-धरनी-५५१।
गाँठ आदि छुड़ाते है, सुलझाते हैं।
उ.- चोली छोरैं हार उतारैं। कर सौं सिथिल केस निरवारैं-७९९।
उ.- कै हौं पतित रहौं पावन हैं, कै तुम बिरद छुड़ाऊँ। द्वै मैं एक करौं निरवारौ, पतितनिराव कहाऊँ-१-१७९।
जिसने खाया न हो, जिसमें खाया न जाय।
मृत आत्मा की अन्य स्थिति-प्राप्ति।
उ.-पोई परवल फाँग फरी चुनि-२३२१।
उ.-विष्नु की भक्ति परवर्त जग मैं करी, प्रजा कौं सुख सकल भाँति दीन्हौ-४-११।
मिटटी का कटोरे की तरह का एक पात्र।
प्रत्येक पक्ष की पहली तिथि, पड़वा, पड़िवा।
[सं. प्रतिपदा, प्रा. पडिवा]
उ.- ऐसे होहु जु रावरे हम जानति परवान-१०१६।
परवान चढ़ना- सब सुख भोगना।
उ.- नहिं परवाह नंद के ढोंटहिं पूरत बेनु धरे-९६८। (ख) प्रिया मन परवाह नाहीं कोटि आवै जाहिं-२०२१।
उ.- (क) तुम परवीन सबै जानत हौ ताते इह कहि आईं-३०१९। (ख) हम जानी जु बिचार पठाए सखा अंग परवीन-३२१७।
वर्षा में चंद्रमा के चारी ओर दिखायी पड़नेवाला घेरा, चंद्रमंडल।
उ.- सूर करत परशंसा अपनी हारेउ जीति कहावत-३००८।
अस्त्र जिसके सिरे पर लोहे का अर्द्धचंद्राकार मूल लगता है।
जमदग्नि के पुत्र जो ईश्वर के छठे अवतार माने जाते हैं। परशु इनका अस्त्र था।
उ.-तहाँ हुतौ इक सुक कौ अंग। तिहिं यह सुन्यौ सकल परसंग-१-२२६।
छूना, छूने की क्रिया या भाव, स्पर्श।
उ.- (क) झूठौ सुख अपनौ करि जान्यौ परस प्रिया कै भीनौ-१-६५। (ख) जे पद-पदुम-परस-जल-पावन-सुरसरि-दरस कटत अघ भारे-१-९४।
स्पर्श करना, छूते ही, परसकर।
उ.- परसत चोंच तूल उघरत मुख, परत दुःख कैं कूप-१-१०२।
उ.-जसुमति हरष भरी लै परसति। जेंवत हैं अपनी रुचि सौं अति-३९६।
मुँह परसन आना- लल्लो-चप्पो की बातें करने आना। उ.- (क) काहे को मुँह परसन आए जानति हौं चतुराई-१९५७। (ख) ह्याँ आए मुख परसन मेरो हृदय रहति नहि प्यारी-१९६८।
उ.-(क) गुरु प्रसन्न, हरि परसन होई-६-५। (ख) तबहिं अशीश दई परसन ह्वै सफल होउ तुम कामा-१० उ.- ६६।
उ.- मार परसपर करत आपु मैं, अति आनन्द भए मन माहिं-५३३।
उ.- परसहु वेगि, वेर कत लावति, भूखे सारँगपानी-३९५।
स्पर्श करके, स्पर्श करने से।
उ.- जो मम भक्त मग मैं जाइ। होइ पवित्र ताहि परसाइ-७-२।
उ.- तुव मिलिबे की साध भुजा भरि उर सों कुच परसाऊँ गो-१९४४।
उ.- बामन रूप धरयौ बलि छलि कै, तीनि परग बसुधाऊ। स्रमजल ब्रह्म-कमंडल राख्यौ दरसि चरन परसाऊ-१०-२२१।
(भोजन) परसवाया, (भोजन) सामने रखवाया।
उ.- (क) महर गोप सब ही मिलि बैठे, पनवारे परसाए-१०-८९। (ख) भाँति-भाँति ब्यंजन परसाए-९-२४।
उ.- दियो तब परसाद सबको भयो सबन हुलास-पृ. ३४८ (५७)।
उ.- पहिले पनवारौ परसायौ-२३२१।
आपस में, एक दूसरे के साथ।
उ.- मोहिं देखि सब हँसत परस्पर, दै दै तारी-१-१७५।
उ.- दूरि देखि सुदामा आवत, धाइ परस्यौ चरन-१-२०२।
उ.- नाना बिधि जेंवन करि परस्यौ-पृ. ३३९ (८५)।
उ.- दुर्धर परहस्त-संग आइ सैन भारी। पवन-दूत दानव-दल ताड़े दिसिचारी-९-९६।
उ.-(क) हिरनकसिपु-परहार थक्यौ, प्रहलाद न न नैंकु डरै-१-३७। (ख) अस्त्र-सस्त्र-परहार न डरौं-७-२।
मारने के लिए चलाओ, फेंको।
उ.- कह्यौ असुर, सुरपति संभारि। लै करि बज्र मोहिं परहारि-५-६।
चार प्रकार की वाणियों में पहली।
उ.- नासा सों नासा लै जोरत नैन नैन परसावत-१८६३।
उ.- (क) मनहु पन्नगिनि उतरि गगन ते दल पर फन परसावति-१३४५।
उ.- सुरसरि जब भुव ऊपर आवै। उनकौं अपनौं जल परसावै-९-९।
उ.- जे पद-पदुम परसि ब्रजभामिनि सरबस दै, सुतदसदन बिसारे-१-९४।
(शरीर में) मलकर या चुपड़कर।
उ.- धूरि झारि तातौ जल ल्याई, तेल परसि अन्हवाइ-१०-२२६।
(भोजन) परोसकर या सामने रखकर।
उ.- अरु खुरमा सरस सवारे। ते परसि धरे हैं न्यारे-१०-१८३।
जमदग्नि ऋषि के पुत्र जो ईश्वर के छठे अवतार माने जाते हैं। 'परशु' इनका मुख्य शस्त्र था।
छूते है, स्पर्श करते हैं।
उ.- कपट-हेत परसैं बकी जननी-गति पावै-१-४।
उ.- करत फन-घात बिष जात उतरात अति, नीर जरि जात, नहिं गात परसै-५५२।
बीते हुए 'कल' से एक दिन पहले।
आनेवाले 'कल' से एक दिन बाद।
श्रेष्ठ या उत्तम व्यक्ति।
उ.- सहस बार जौ बेनी परसौ, चंद्रायन कीजै सौ बार। सूरदास भगवंत भजन बिनु, जम के दूत खरे हैं द्वार-२-३।
फूलों के बीच लंबे केसरों पर जमी रज जिसके फूलों के बीच के गर्भ-कोशों में पड़ने से गर्भाधान होता है ; पुष्परज।
फूलों के पतले सूत्र जिनकी नोक पर पराग लगा रहता है।
उ.- प्रीति नदी महँ पाँव न बोरयौ द्दष्टि न रूप परागी-३३३५।
उ.- यही सोच सब पगि रहे कहूँ नहीं निरवार।
अलग करने, छुड़ाने या सुलझाने का काम।
उ.- ए दोउ नीर खीर निरवारत इनहिं बधायौ कंस-३०४९।
उ.- कबहूँ कान्ह आपने कर सों केस-पास निरवारत।
बंधन खोलना, छुड़ाना, मुक्त करना।
उ.- कोउ कहति मैं बाँधि राखौं, को सकैं निरवारि-१०-२७३।
उ.- कोउ कहति मोहिं देखि द्वारै, उतहिं गए पराइ-१०-२७३।
दूसरे की, अन्य व्यक्ति की।
उ.- (क) तुम बिनु और न कोउ कृपानिधि पावै पीर पराई-१-१९५। (ख) सोवत मुदित भयौ सपने मैं, पाई निधि जो पराई-१-१४७।
उ.- (क) सुरनि की जीत, असुर मारे बहुत, जहाँ तहँ गए सबहीं पराई-८-८। (ख) सकुच न आवत धोष बसत की तजि ब्रज गए पराई-३२०८।
उ.- अंबरीष-हित साप निवारे, व्याकुल चले पराए- १-३१।
उ.-सूरदास प्रभु होहु पराकृत अस कहि भुज के चिह्न दुरावति-१०-७।
ऊँचे किनारे या कंडल की काफी बड़ी थाली।
उ.- बेग-बिरुद्ध होत कुंदनपुर हंस को अंश काग लै परात-१० उ.- ११।
उ.- पराधीन पर-बदन निहारत मानत मूढ़ बड़ाई-१-१९५।
उ.-(क) भीषम धरि हरि कौ उर ध्यानं। हरि के देखत तजे परान-१-२८०। (ख) कै वह भाजि सिंधु मैं डूबी, कै उहिं तज्यौ परान-९-७५।
उ.-चिरई चुह-चुहानी चंद की ज्यौति परानी रजनी बिहानी प्राची पियरी प्रवान की -१६०९।
जाति परानी-भागी जाती हूँ।
उ.-करत कहा पिय अति उताइली मैं कहुँ जात परानी-१६०१।
उ.-(क) हरि सब भाजन फोरि पराने-१०-३२८। (ख) कोउ डर डर दिसि-बिदिसि पराने-१० उ.-३१।
उ.-अरु जो परालब्ध सौं आवै। ताही कौ सुख सौं बरतावै-३-१३।
उ.-ग्वाल गए जे धेनु चरावन। तिन्हैं परयौ बन माँझ परावन-१०५०।
मुनिवर वशिष्ठ और शक्ति के पुत्र। सत्यवती पर मुग्ध होकर इन्होंने उसका कुमारीत्व भंग किया जिससे व्यास कृष्ण द्वैपायन का जन्म हुआ।
दूसरे का सहारा, भरोसा या अवलंब।
दूसरे के सहारे या भरोसे पर।
निरत, प्रवृत्त, लीन, तत्पर।
उ.-बहुतक जन्म पुरीष-परायन, सूकर स्वान भयौ-१-७८।
उ.-सूरदास धृग धृग तिनको है जिनके नहिं पीर परारी- पृ. ३३२ (१०)।
उ.-कागासुर आवत नहिं जान्यौ। सुनि कहत ज्यौ लेइ परान्यौ-३९१।
उ.-नाम सुनत त्यौं पाप पराहिं। पापी हू बैकुंठ सिधाहिं-६-४।
उ.-अति बिपरीत तृनावर्त आयौ। बात-चक्र मिस ब्रज ऊपर परि, नंद पौरि कै भीतर धायौ-१०-७७।
उ.-(क) मारग रोकि रह्यौ द्वारैं परि पतित-सिरोमनि सूर-४८७।
उ.-सूर अधम की कहौ कौन गति, उदर भरे, परि सोए-१-५२।
परि आई- पड़ गई है, आदत हो गई है।
उ.-ज्यौ दिनकरहिं उलूक न मानत, परि आई यह टेव-१-१००।
चारो-ओर', 'अतिशय', म', 'पूर्णता' आदि अर्थों की वृद्धि करनेवाला एक उपसर्ग।
व्यक्ति सम्बन्धी जानकारी।
परिचरजा, परिचर्जा, परिचर्या
परिचरजा, परिचर्जा, परिचर्या
उ.- तृष्ना बहिनि, दीनता सहचरि, अधिक प्रीतिबिस्तारी। अति निसंक, निरलज्ज, अभागिनि, घर घर फिरत न हारी-१-१७३।
जिसको जानकारी हो, अभिज्ञ।
खोल, गिलाफ आदि ढकनेवाली वस्तु।
ग्रंथ का एक स्वतंत्र भाग।
विवाह की एक रीति जिसमें वर के द्वार पर आते ही आरती करते हैं।
परिवार, भरण-पोषण के लिए आश्रित व्यक्ति।
जिसको स्पष्ट देखा जा सके।
उ.-सूरदास अब क्यों बिसरत है, मधु-रिपु को परितोष-पृ. ३३२ (१८)।
उ.-मानापमान परम परितोषन सुस्थल थिति मन राख्यो-३०१४।
उ.-तातैँ तुमकौं करत दँडौत। अरु सब नरहूँ कौ परिनौत-५-४।
धोती आदि नीचे पहनने का वस्त्र।
उ.-(क) खान पान परिधान राज सुख जो कोउ कोटि लड़ावै-२७१०। (ख) खान-पान-परिधान मैं (रे) जोबन गयौ सब बीति-१-३२५।
प्रणाली, रीति, चाल, ढंग, नियम।
उ.-(क) बदन उधारि दिखायौ अपनौ नाटक की परिपाटी-१०-२५४। (ख) पहिली परिपाटी चलौ-१०१९। (ग) वै सुफलकसुत ए सखी ऊधौ मिली एक परिपाटी-३०५६।
उ.-गाए सूर कौन लहिं उबरयौ, हरि परिपालन पन रं-१-६६।
धन-धान्य से पूर्ण करनेवाला।
आहार रहित, जिसने भोजन न किया हो।
उ.- एकादसी करैं निरहार-९-४।
[सं. निरालय, पू. हिं. निराल]
[सं. निरालय, पू. हिं. निराल]
[सं. निरालय, पू. हिं. निराल]
वस्तु या पदार्थ की व्याख्या-विशेषता-युक्त कथन।
निर्दिष्ट अर्थ सूचक विशिष्ट शब्द।
कथन जो पारिभाषिफ शब्दों में हो।
उ.-(क) बीना झाँझ पखाउज-आउज, और राजसी भोग। पुहुप-प्रजंक परी नवजोबनि, सुख-परिमल-संजोग-९-७५। (ख) चोदा चंदन अगर कुमकुमा परिमल अंग चढ़ायो-१० उ.-६५।
परिपूरण, परिपूरन, परिपूर्ण
परिपूर्ण, खूब भरा हुआ, लबालब।
उ.-(क) ऐसे प्रभु अनाथ के स्वामी। दीन-दयाल, प्रेम-परिपूरन, सब घट अंतरजामी-१-१९०। (ख) अहि के गुन इनमें परिपूरण यामें कछू न पावत-३००९।
परिपूरण, परिपूरन, परिपूर्ण
परिपूरण, परिपूरन, परिपूर्ण
समाप्त या संपूर्ण किया हुआ।
उचित मात्रा या परिमाण में।
उ.-परिमिति गए लाज तुमही को हंसिनि ब्याहि काग लै जाइ-१० उ.-६५।
गले या छाती से लगाना, आलिंगन।
उ.-(क) फूले फिरत अजोध्यावासी, गनत न त्यागत चीर। परिरंभन हँसि देत परस्पर, आनन्द-नैननि नीर-९-१६। (ख) अनुनय करत बिबस बोलत हैं दै परिरंभण दान-२०३१।
समझना, मानना, ख्याल करना।
घूमने-फिरने के स्वभाव वाला।
उ.-परिवा सिमिटि सकल ब्रजवासी चले जमुन जलन्हान-२४४५।
[सं. प्रतिपदा, प्रा. पड़िवआ]
उ.-और बहुत ताकौ परिवारा। हरि-हलघर मिलि सबकौं मारा-४९९।
वर्षा में चंद्र या सूर्य के चारों ओर बननेवाला मंडल।
पुस्तक का वह भाग जो विषय से संबद्ध होता हुआ भी, मुख्य भाग में न दिया जाकर, अंत में दिया जाय।
सुन्दर स्त्रियों का समाज या जमघटा।
उ.-सूर पतित-पावन पद-अंबुज, सो क्यों परिहरि जाउँ-१-१२८।
उ.-(क) भक्ति-पंथ कौं जो अनुसरै। सुत-कलत्र सौं हित परिहरै-२-२०। (ख) काम-क्रोध-लोभहिं परिहरै-३-१३।
उ.-तब हरि कह्यौ, टेक परिहरौ ¨¨¨¨¨¨।अहंकार चित तैं परिहरौ-१-२६१।
उ.-(क) परिहस सूल प्रबल निसि-बासर, तातैं यह कहि आवत। सूरदास गोपाल सरनगत भऐं न को गति पावत-१-१८१। (ख) कंठ बचन न बोलि आवै, हृदय परिहस भीन-३४५१।
उ.-रावन से गहि कोटिक मारौं। जो तुम आज्ञा देहु कृपानिधि तौ यह परिहस सारौं-९-१०८।
दोष, अनिष्ट आदि का निवारण।
अनुचित कर्म का प्रायश्चित (नाटक)।
उ.-चक्र परिहार हरि कियौ-१० उ.-३५।
ब्रह्म या ईश्वर जो आकार-रहित है।
उ.-आदि निरंजन, निराकार, कोउ हुतौ दूसर- २-३६।
जो आकुल या घबराया हुआ न हो।
उ.-याकी कोख औतैरे जो सुत करै प्रान-परिहारा-१०-४।
फँग परिहै- मेरे हाथ आयेगा, मेरे चंगुल या फंदे में फँसेगा। उ.-दूरि करौं लँगराई वाकी मेरे फँग जो परिहै-१२६४।
शिर परिहै- सिर पर पड़ेगी या बीतेगी। उ.- सूर क्रोध भयो नृपति काके शिर परिहै-२४७४।
उ.-(क) रोवति धरनि परीं अकुलाइ-५४७। (ख) पाइ परीं जुवती सब-७९८।
उ.-संग की सखी स्याम सन्मुख भईं, मोहि परीं पसु-पाल सों-८०४।
कल्पित सुन्दर स्त्री जो पंखों के सहारे उड़ती मानी गयी है।
उपस्थित हुई, (दुखद घटना या अवस्था) घटित हुई, पड़ी।
उ.-(क) जो जन सरन भजे बनवारी। ते ते राखि लिए जग-जीवन, जहँ जहँ बिपति परी तहँ टारी-१-२२। (ख) सूर परी जहँ बिपति दीन पर, तहाँ बिदन तुम टारे-१-२५।
समुझी न परी-समझ में नहीं आई।
उ.-अपनैं जान मैं बहुत करी। कौन भाँति हरि-कृपा तुम्हारी, सो स्वामी, समुझी न परी-१-११५।
गरे परी अनचाही, अनिच्छित।
उ.-सूरदास गाहक नहिं कोऊ दिखियत गरे परी-३१०४।
परीक्षा करने या लेनेवाला।
जिसकी जाँच या परीक्षा हुई हो।
अर्जुन का पौत्र ओर अभिमन्यु का पुत्र। इन्हीं के राज्य काल में द्वापर का अंत और कलियुग का आरंभ माना जाता है। तक्षक के डसने से परीक्षित की मृत्यु हुई थी। जनमेजय सी का पुत्र था।
अभिमन्यु का पुत्र जिसकी रक्षा श्रीकृष्ण ने गर्भ में ही की थी।
उ.-सूरदास प्रभु हमरे कोते नँदनंदन के पॉँइ परीजो-१० उ.-९५।
पहनकर (कपड़ा, गहना आदि) शरीर पर धारण करके।
उ.-अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल। काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल-१-१५३।
उ.-पहिरे राती चूनरी, सेत उपरना सोहै (हो)-१-४४।
उ.-कच खुबि आँधरि काजर कानी नकटी पहिरै बेसरि-३०२६।
उ.-मेरे कहैं, आइ पहिरौ पट-७८७।
आरंभ में, सर्व प्रथम, शुरू में।
उ.-मन ममता रुचि सौं रखवारी, पहिलैं लेहु निबेरि-१-५१।
अप्रियता, कर्कशता, कटुता।
उ.-(ख) देन उरहनो तुमकौं आई। नीकी पहिरिवनि हम पाई-७९९। (ग) रंग रंग पहिरावनि दई, अति बने कन्हाई-२४४१। (घ) पहिरावन जो पाइहैं सो तुमहूँ दैहैं-२५७५।
उ.-मेरे कहै बिप्रनि बुलाइ, एक सुभ घरी धराइ, बागे चीरे बनाइ, भूषन पहिरावौ-९-९५।
किसी स्थान तक जा पाने की शक्ति या क्रिया।
[हिं. प्रभूत, प्रा. पहूच]
[हिं. प्रभूत, प्रा. पहूच]
[हिं. प्रभूत, प्रा. पहूच]
[हिं. प्रभूत, प्रा. पहूच]
समझने की शक्ति या योग्यता।
[हिं. प्रभूत, प्रा. पहूच]
[हिं. प्रभूत, प्रा. पहूच]
किसी स्थान में जाना या जा पाना।
गयौ पहुँचाइ-पहुँचा गया हैं।
उ.-काली आपु गयौ पहुँचाइ-५८२।
एक स्थान से दूसरे को ले जाना।
विशेष स्थिति या अवस्था तक ले जाना।
उ.-कर गहि खड़ग कह्यौ देवकि सौं बालक कहँ पहुँचायौ-सारा.३७९।
पहुँचा हुआ- (१) सिद्ध। (२) बड़ा जानकार। (३) बहुत चतुर और काँइयाँ।
परिवर्तित स्थिति या दशा को प्राप्त होना।
कुहनी से नीचे की बाहु, कलाई।
उ.-पहुँचा कर सों गहि रहे जिय संकट मेल्यो-२५७७।
[हिं. पहुँचना अथवा सं. प्रकोष्ठ]
दूसरे स्थान को ले जाय या पहुँचा दे।
उ.-(क) सूरदास की बीनती कोउ लै पहुँचावै-१-४। (ख) सूर आप गुजरान मुसाहिब, लै जवाब पहुँचावै -१-१४२।
कलाई में पहनने का एक गहना जिसमें दाने गुँथे रहते हैं।
उ.-(क) पंकज पानि पहुँचिया राजै-१०-११७। (ख) पहुँची करनि, पदिक उर हरि-नख, कठुला कंठ मंजु गजमनियाँ-१०-१०६।
[हिं. पुं. पहुँचा, स्त्री. पहुँची]
उ.-चित्रित बाँह पहुँचिया पहुँचै, हाथ मुरलिया छाजै-४५१।
पहुँचा, उपस्थित हुआ, गया।
उ.-उड़त उड़त सुक पहुँच्यौ तहाँ। नारि ब्यास की बैठी जहाँ-१-२२६।
उ.-चारिहु दिवस आनि सुख दीजै सूर पहुनई सूतर-२७०८।
आगत व्यक्ति का भोजन-पान से सत्कार, अतिथि-सत्कार।
उ.-(क) हम करिहैं उनकी पहुनाई-१०४७। (ख) बहुतै आदर करति सबै मिलि पहुने की करिये पहिसाई-१२८६।
करौं पहुनाई- खबर लूँगी, अच्छी तरह पीटूँगी। उ.-साँटिनि मारि करौं पहुनाई, चितवत कान्ह डरायौ-१०-३३०।
उ.-करत सबै रुचि की पहुनाय-२४०९।
उ.-बहुतै आदर करत सबै मिलि पहुने की करिये पहुनाई-१२८५।
(आ) पहुँचे, (आ) जाय, (आकर) उपास्थित हो।
उ.-तौ लगि बेगि हरौ किन पीर ? जौ लगि आन न आनि पहुँचे, फेरि परैगी भीर-१-१९१।
उ.-दनुज एक तहँ आइ पहूँच्यौ-४१०।
स.- ऊधौ प्रेमरहित जोग निरस काहे को गायो-३०५७।
उ.- संकित नंद निरस बानी सुनि बिलम करत कहा क्यों न चलैं-२६४७।
रूखा-सूखा, जिसमें जल या तरी न हो।
फेंका या छोड़ा हुआ (तीर आदि)।
कठिन परिश्रम से काम पूरा करना।
[सं. प्रहेलिकी, हिं. पहेली]
वह बात जिसका अर्थ न खुलता हो।
[सं. प्रहेलिकी, हिं. पहेली]
उ.-अपनी गरज को तुम एक पाँइ नाचे-१४०३।
पाइनी परि- पैर पर गिरकर, बड़ी नम्रता और विलय से। उ.-जेइ जेइ पथिक जात मधुबन तन तिनहूँ सों ब्यथा कहति पाँइनि परि-२८००।
पाँव पसार सोना- बिलकुल निश्चिंत होकर सोना।
उ.-कीड़ी तनु ज्यों पाँख उपाई-१०४१।
उ.-जिन पाँखनि कै मुकुट बनायौ, सिर धरि नंदकिसोर-४७७।
उ.-सूरदास सोने के पानी, मढ़ौं चौंच अरु पाँखि-९-१६४।
उ.-मुरली अधर मोर के पाँखे जिन इह मूरति देखि-३२१७।
उ.-सूर सो मनसा भई पाँगुरी निरखि डगमगे गोड़-१३५७।
पाँच-सात न आना- बहुत सीधे और सरल स्वभाव का होना। उ.-चकृत भए नारि-नर ठाढ़े पाँच न आवै सात-२४९४।
पाँच-सात भूलना- चालाकी भूल जाना। उ.-सूरदास प्रभु के वै बचन सुनहु मधुर मधुर अब मोहिं भूली पाँच और सात-पृ ३१५ (४५)।
पाँच की सात लगाना- अनेक बातें गढ़कर दोषी बताना। उ.-पाँच की सात लगायो झूँठी-झूँठी कै बनायौ साँची चो तनक होइ तौलौ सब सहिए-१२७२।
उ.-दीपमालिका के दिन पाँचक गोपनि कहौ बुलाइ-८१२।
पाँच नक्षत्र जिनमें नया कार्य करना मना है।
श्रीकृष्ण का शंख जो पंचजन नामक दैत्य से उन्हें मिला था।
वाक्य-रचना की वह रीति जिसमें बड़े बड़े समासों में कोमल कांत पदावली हो।
द्रोपदी जो पंचाल देश की राजकुमारी थी।
किसी पक्ष की पाँचवीं तिथि।
उ.-पाँचै परिमति परिहरै हरि होरी है-२४५५।
उ.-करि हरि सौं स्नेह साँचौ। निपट कपट की छाँड़ि अटपटी, इन्द्रिय बस राखहि किन पाँचौ-१-८३।
धातु के टुकड़ों या टूटे पात्रों में टाँका लगाना।
[सं. प्रणद्ध, प्रा. पणज्झ, पँज्झ]
नदी के पानी का इतना सूख जाना कि पैदल ही उसे पार किया जा सके।
कुन्ती और माद्री के गर्भ से उत्पन्न राजा पांडु के पाँच पुत्र-युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव।
पांडव वंश के आदि पुरुष। ये विचित्रवीर्य की विधवा स्त्री अंबालिका के, व्यासदेव से उत्पन्न पुत्र थे। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव इन्हीं के पुत्र थे।
एक रोग जिसमें शरीर पीला पड़ जाता है।
उ.- कोपि कौरव गहे केस जब सभा मैं, पांडु की बधू जस नैंकु गायौ-१-५।
उ.- जब पाँड़े इत-उत कहुँ गए। बालक सब इकठौरे भए-७-२।
वह ब्राह्मण जो श्रीकृष्ण का जन्म सुनकर महराने में आया था।
उ.- महराने तैं पाँड़े आयो। ब्रज घर घर बूझत नँद-राउर पुत्र भयौ, सुनि कै उठि धायौ-१०-२४८।
उ.- अब वै लाज मरति मोहिं देखत बैठी मिलि हरि पाँति -पृ. ३३७ (६५)।
उ.- मानो निकसि बगपौति दाँत उर अवधि सरोवर फोरे-२८१३।
उ.- जाति-पाँति कोउ पूछत नाहीं, श्रीपति कैं दरबार-१-२३१।
उ.- कुसुमित धर्म-कर्म कौ मारग जउ कोउ करत बनाई। तदपि बिमुख पाँती सो गनियत, भक्ति हृदय नहिं आई-१-९३।
उ.- सुनत सुवन घटियार घोर ध्वनि पाँयन नूपुर बाजत-२५६१।
वस्त्र जो मार्ग में आदर के लिए बिछाया जाता है, पायंदाज।
उ.- (क) बरन बरन पट परत पाँवड़े, बीथिनि सकल सुगन्ध सिंचाई-९-१६९। (ख) पाटंबर पाँवड़े डसाये-२६४३।
[हिं. पाँव + ड़ा (प्रत्य.)]
उ.- थोरी कृपा बहुत करि मानी पाँवर बुधि ब्रजबाल-१८३०।
उ.- सूर स्वामि की पाँवरि सिर धरि, भरत चले बिलखाई-९-५३। (ख) सूरदास प्रभु पाँवरि मम सिर इहिं बल भरत कहाऊँ-९-१५५।
पलँग का पैर की ओर का भाग, पैताना।
उ.- कमलनैन पौढ़े सुख-सज्या, बैठे पारथ पाइतरी-१-२६८।
उ.- प्रानन के बदले न पाइयत सेंति बिकाय सुजस की ढेरी-२८५२।
प्राप्त की, उपलब्ध की, लाभ करना।
उ.- (क) यह गति काहू देव न पाई-१-५। (ख) अंबरीष, प्रहलाद, नृपति बलि, महाँ ऊँच पदवी तिन पाई-१-२४।
उ.- कौरव पाँसा कपट बनाये।
पाँसा उलटना (पलटना)- प्रयत्न या योजना का फल आशा के प्रतिकूल होना।
चोसर खेलने के छोटे टुकड़े जो संख्या में ३ होते हैं। ये प्रायः हाथी दाँत या किसी हड्डी के बनते हैं।
उ.- चौपरि जगत मड़े जुग बीते। गुन पाँसे, क्रम अंक, चारि गति सारि, न कबहूँ जीते-१-६०।
उ.- (क) हा हा हो पिय पा लागति हौं जाइ सुनौ बन बेनु रसालहिं-८९८।
बिना किसी आधार के निराधार।
बिना ठौर-ठिकाने के, निराश्रय।
उ.-उनकी महिमा है नहिं पाई-४-५।
उ.- भवन जाहु आपनै अपनैं सब, लागति हौं मैं पाउँ-३४५।
उ.- मात-पिता जिय त्रास धरत हौं तऊ आइ सुख पाऊँ गो-१९४४।
पाने से, पाने पर भी, पाकर भी।
उ.- अति प्रचंड पौरूष बल पाऐं केहरि भूख मरै-१-२०५।
पकाने की क्रिया, रसोई बनाना।
उ.- पाक पावक करै, बारि सुरपति भरे, पौन पावन करै द्वार मेरे-९-१२९।
उ.- देखौ आइ जसोदा सुत-कृति। सिद्ध पाक इहिं आइ जुठायौ-१०-२४८।
उ.- मिलि बैठे सब जेंवन लागे, बहुत बने कहि पाक-४६४।
उ.- दूर कियौ पाखंड वाद, हरि भक्तिनि को अनुकूल-। सारा. ३१९।
पाखंड करनेवाला, ढोंगी, पाखंडी।
वैदिक आचार का खंडन या निदा करनेवाला।
पक्ष, पखवाड़ा, पंद्रह दिन।
उ.- एक पाख त्रय मास कौ, मेरो भयौ कन्हाई-१०-६८।
उ.- तब लौं तुरत एक तौ बाँधौ, द्रुम-पाखाननि छाई-९-११०।
उ.- फूल करील कली पाकर नम-२३२१।
[सं. पर्कटी, प्रा. पक्कड़ी]
उ.- तब उन कह्यौ पाकसाला में अबहीं यह पहुँचाओ- सारा. ६९४।
हाथी-घोड़े पर, युद्ध के अवसर पर, डाली जानेवाली लोहे की झूल।
उ.- (क) टेढ़ी चाल, पाग सिर टेढ़ी, टेढ़ैं-टेढ़ैं धायौ-१-३०१। (ख) रोकि रहत गहि गली साँकरी टेढ़ी बाँधत पाग-१०-३२८। (ग) दधि-ओदन दोना भरि दैहौं अरू अंचल की पाग-२९४८।
क्रोध, शोक आदि के कारण आपे से बाहर।
उ.- (क) भव-चिंता हिरदै नहिं एकौ स्याम रंग-रस पागी-१४८६। (ख) सूरदास अबला हम भोरी गुर चैंटी ज्यौं पागी-३३३५।
अनुरक्त हुए, मग्न हुए, प्रेम में डूब गये।
उ.- नवल गुपाल, नवेली राघा नये प्रेम-रस पागे-६८६।
ओतप्रोत हुए, मग्न हुए, भरे गये।
उ.- (क) तब बसुदेव देवकी निरखत परम प्रेम रस पागे-१०-४। (ख) सोभित सिथिल बसन मन मोहन, सुखवत स्रम के पागे¨¨। नहिं छूटति रति रूचिर भामिनी, वा रस मैं दोउ पागे-६८६।
बहुत अधिक लिप्त हुआ, ओतप्रोत हो गया।
उ.-जनम सिरानौई सौ लाग्यौ। रोम रोम, नख-सिख लौं मेरै, महा अघनि बपु पाग्यौ-१-८३।
पचाने या पकाने की क्रिया।
उ.-निसि दिन स्याम सुमिरि जस गावै कलपन मेटि प्रेम रस पाचै।
[सं. पश्चात, प्रा. पच्छा]
उ.-धन्य सुकृत पाछिलो-११८१।
उ.-उन तौ करी पाछिले की गति, गुन तोरयौ बिच धार-१-१७५।
भूतकाल में, पूर्व समय में, पहले।
उ.-तीनौं पन भरि ओर निबाहयौ, तऊ न आयौ बाज। पाछै भयौ न आगैं ह्वैहै, सब पतितनि सिरताज-१-९६।
उ.-पुनि पाछैं अघ-सिंधु बढ़त है सूर खाल किन पाटत-१-१०७।
उ.-पदखि लिए पाछेन को तेऊ सब आए-२५७५।
उ.-निरखि छबि फूलत हैं ब्रजराज। उत जसुदा इत आपु परस्पर आड़े रहे कर पाज।
छाती और पेट की बगल का भाग, पाशर्व, पाँजर।
पैर का गहना, नूपुर, मंजीर।
उ.-हय गय हेम धेनु पाटंबर दीन्है दान उदार- सारा. ३०७।
उ.-किंकिनि नूपुर पाट पाटंबर, मानौं लिये फिरै घरबार-१-४१।
उ.-मोदी लोभ, खवास मोह के, द्वारपाल अहँकार। पाट बिरध ममता है मेरैं माया कौ अधिकार-१-१४१।
किसी गहरी जगह को भर देना, गढ़ा-जैसी जगह पाट देना।
उ.-पुनि पाछैं अध-सिंधु बढ़त है, सूर खाल किन पाटत-१-१०७।
साँप का विष उतारने का एक मंत्र।
निचले स्थान को भरकर समतल करना।
प्रधान रानी जो राजा के साथ सिंहासन पर बैठे।
उ.-अब कहावत पाटरानी बड़े राजा स्याम-२६८१।
उ.-मिलत सम्मुख पाटल पटल भरत मान जुही-२३८१।
पटिया, पटटी, माँग के दोनों ओर के बैठे हुए बाल।
उ.-मुँड़ली पाटी पारन चाहै, नकटी पहिरे बेसरि।
उ.-नव ग्रह परे पाटी-तर, कूपहिं काल उसारौ-९-१५९।
जो रक्षा या सहायता न करे।
उ.-यहै कहत ब्रज कौन उबारै सुरपति किए निरादर-९४९।
उ.-घुनो बॉस बुन्यौ खटोला काहू को पलँग कनक पाटी-१० उ.-७१।
उ.-कहौ तौ मृत्युहिं मारि डारि कै, खोदि पता, लहिं पाटौं-९-१४८।
उ.-छिन में बरषि प्रलय जल पाटौं खोजु रहै नहिं चीनो-९४५।
पट्टा, अधिकार- पत्र, सनद।
उ.-जौ प्रभु अजामील कौं दीन्हौ, सो पाटौ लिखि पाऊँ। तौ बिस्वास होइ मन मेरैं, औरौ पतित बुलाऊँ-१-१४६।
उ.-संदीपन सुत तुम प्रभु दीने, विद्या-पाठ करयौ-१-१३३।
नियम से पढ़ने की क्रिया या भाव।
वाक्य का शब्द-क्रम या शब्द-वर्तनी।
उ.-जहाँ निवारी सेवती मिलि झूमक हो। बहु पाड़इ बिपुल गँभीर मिलि झूमक हो-२४४५।
संस्कृत भाषा के 'अष्टाध्यायी' नामक प्रसिद्ध व्याकरण के रचयिता।
प्रसिद्ध प्रचीन विद्वान पतंजलि।
उ.-पातंजलि से मुनि पद सेवत करत सदा अज ध्यान सारा. ६२।
उ.-जा दिन मन पंछी उड़ि जैहै। ता दिन तेरे तन-तरुवर के सबैं पात झरि जैहैं-१-८६।
उ.-मूरी के पातन के बदले को मुक्ताहल दैहै-३१०५।
उ.-मचला, अकलै-मूल, पातर खाउँ खाउँ करै भूखा-१-१८६।
उ.-सरबस प्रभु रीझि देत तुलसी कैं पाता-१-१२३
पृथ्वी के नीचे के सात लोकों में से सातवाँ।
उ.-ग्रस्यौ गज ग्राह कौं लै चल्यौ पाताल कौं काल कैं त्रास मुख नाम आयौ-१-५।
पत्र-अक्षत, पूजा या भेंट की सामान्य वस्तु।
उ.-पातिब्रतहिं धर्म जब जान्यौ बहुरौ रुद्र बिहाई-सारा-५०।
उ.-(क) पाती बाँचत नंद डराने-५२६। (ख) लोचन जल कागद मसि मिलि करि ह्वै गइ स्याम स्याम जू की पाती-२९७७।
उ.-सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिनु सब पाती उधरी-३३४६।
उ.-(क) मलिन बसन हरि हित अंतर्गति तनु पीरो जनु पाते-३४६१। (ख) मारे कंस सुरन सुख दीनो असुर जरे पिर पाते-३३३८।
वह व्यक्ति जो किसी वस्तु अथवा विषय का अधिकारी हो।
उ.-हरि जू हौं यातैं दुख-पात्र-१-२१६।
उ.-(क) हृदय कुचील काम-भू-तृष्ना-जल कलम है पात्र-१-२१६। (ख) पात्र-स्थान हाथ हरि दीन्हें-२-२०।
उ.-स्रमितभयौ जैसैं मृग चितवत, देखि देखि भ्रम-पाथ-१-२०८।
[हिं. थापना का आद्यन्त विपर्यय]
[हिं. थापना का आद्यन्त विपर्यय]
[हिं. थापना का आद्यन्त विपर्यय]
उ.-उकठे तरु भये पात, पाथर पर कमल जात, आरज पथ तज्यै। नात, व्याकुल नर-नारी।
यात्री के लिए मार्ग का भोजन।
क्रम, संबंध या परंपरा का पालन होना।
जिसकी मर्यादा या लज्जा न रह गयी हो, अविश्वस्त।
खेत से घास-फूस खोदकर दूर करना या निकालना।
हानि या आपदा से सुरक्षित।
जहाँ हानि या विपत्ति का भय न हो, सुरक्षित।
जिसे कोई रोग न हो, नीरोग।
पादत्र, पादत्राण, पादत्रान
जो नर-नारी के पैर की रक्षा करे।
पादत्र, पादत्राण, पादत्रान
पादत्र, पादत्राण, पादत्रान
कविता में पद पूर्ति के लिए प्रयुक्त होनेवाला शब्द।
कविता में अधूरे पर को पूरा करना।
पद- पूर्ति के लिए भरती के शब्द रखना।
वह जल जिसमें पैर धोया गया हो।
उ.-गंग तरंग बिलोकत नैन। अतिहि पुनीत बिष्नु-पादोदक महिमा निगम पढ़त गुनि चैन-९-१२।
उ.-चमर अंचल, कुच कलश मनो पाद्य पानि चढ़ाइ-३४८३।
उ.-पान अपान ब्याेन उदान और कहियत प्राण समान।
एक प्रसिद्ध लता जिसके पत्तों का बीड़ा बनाकर खाया जाता है, ताम्बूली।
उ.-दिन राती पोषच रह्यौ जैसे चोली पान-१-३२५।
उ.- (क) आदर सहित पान कर दीन्हों-१०४७। (ख) पान लै चल्यौ नृप-आन कीन्हौ-१०-६२।
पान उठाना- किसी काम के करने का जिम्मा लेना।
पान खिलानो - सगाई-संबंध पक्का कराना।
पान चीरना- व्यर्थ का काम करना।
पान देना- कोई काम करने का जिम्मा देना।
दै पान- काम करने का जिम्मा देकर। उ.- असुर कंस दै पान पठाई-१०-५०। पान-पत्ता या पान-फूल- साधारण या तुच्छ भेंट।
पान लेना -किसी काम को करने का जिम्मा लेना।
लै पान - काम करने का जिम्मा लेकर। उ.- नृपति के लै पान मन कियौ अभिमान करत अनुमान चँद्र पास धाऊँ।
उ.-गिरिधरलाल छबीले को यह कहा पठायौ पाधे-३२८४।
(किसी द्रव पदार्थ को) धूँटना पीना।
उ.-रुधिर करि, आतमाल धरि, जयजय शब्द उचारी।
उ.-रास रसिक गुपाल मिलि मधु अधर करती पान-३०३२।
उ.-चरनोदक कौं छाँड़ि सुधा-रस, सुरापान अँचयौ-१-६४।
उ.- (क) सक्र कौ दान-बलि-मान ग्वारनि लियौ, गह्यौ गिरि पानि, जस जगत छायौ-१-५। (ख) -उरग-इंद्र उनमान सुभग भुज, पानि पदुम आयुध राजैं-१-६९।
उ.- पवन पानि घनसारि सुमन दै दधिसुत किरनि भानु भै भुंजैं-२७२१।
[हिं. पानी + प (प्रत्य.)]
[हिं. पानी + प [प्रत्य.]]
मर्यादायुक्त, इज्जतदार, सम्मानित, प्रतिष्ठित।
उ.- सभा माँझ द्रौपति-पति राखी, पति पानिप कुल ताकौ। बसन-ओट करि कोट बिसंभर, परन न दीन्हो झाँकौ-१-११३।
उ.- जिनकैं क्रोध पुहुमि-नभ पलटै, सूखै कल सिंधु कर पानो-९-११५।
पानी उतरना- पानी घटना।
(काम) पानी करना- सरल या सहज कर डालना।
पानी का बतासा (बुलबुला)- क्षणभंगुर चीज।
पानी की तरह बहाना- खूब लुटाना या अँधाधुंध खर्च करना।
पानी के मोल- बहुत सस्ता।
पानी चढ़ना- (१) पानी का ऊँचाई की ओर जाना। (२) पानी बढ़ना।
पानी चलाना- नष्ट या चौपट करना।
पानी टूटना- बहुत ही कम पानी रह जाना।
पानी दिखाना- (पशु को) पानी पिलाना।
पानी देना- (१) सींचना, तर करना। (२) पितरों के नाम तर्पण करना।
पितर दै पानी- पितरों के नाम तर्पण कर। उ.- ढोटा एक भयौ कैसैहुँ करि कौन कौन करबर बिधि भानी। क्रम क्रम अब लौं उबर्यौ है, ताकौं मारि पितर दै पानी -३६८।
पानी भी न माँगना- चटपट दम निकल जाना।
पानी पर नींव डालना (देना)- ऐसा काम करना जो टिकाऊ न हो।
पानी पढ़ना- मंत्र पढ़ कर पानी फूँकना।
पानी पानी करना- बहुत लज्जित करना।
पानी पानी होना- बहुत लज्जित होना।
पानी पी पीकर- हर समय, लगातार।
पानी फिर जाना (फेरना)- नष्ट हो जाना।
पानी फूँकना- मंत्र पढ़कर पानी फूँकना।
(किसी के सामने) पानी भरना- तुलना में अत्यंत तुच्छ होना।
पानी भरी खाल- क्षणभंगुर शरीर।
पानी मरना- किसी स्थान पर पानी जमा होकर सूखना।
(किसी के सिर) पानी मारना- किसी का दोषी साबित होना।
पानी मै आग लगाना- (१) असंभव को संभव कर देना। (२) शांतिप्रिय लोगों में झगड़ा करा देना।
पानी में फेंकना- (बहाना) नष्ट करना।
पानी लगना- वातावरण और संगति के प्रभाव से बुरी बातें सीख जाना।
सूखे में पानी में डूबना- धोखा खा जाना।
भारी पानी- पानी जिसमें खनिज पदार्थ अधिक मिले हों।
हलका पानी- पानी जिसमें खनिज पदार्थ कम हों।
(मुँह में) पानी भरना (भर जाना)- सुन्दर या स्वादिष्ट वस्तु को देखकर उसे पाने या उसका स्वाद लेने का लोभ होना।
दूध का दूध, पानी का पानी उघरना- सच्चाई और वास्तविकता प्रकट हो जाना। उ.-हम जातहिं वह उधरि परैगी दूध दूध पानी को पानी-१८६२।
शरीर के अंगों से निकलने वाला पसीना आदि (पानी-सा पदार्थ)।
पानी आना- वर्षा होना।
पानी उठना- घटा घिरना।
पानी टूटना- मेंह बंद होना।
पानी निकलना- वर्षा बंद होना।
पानी पड़ना- मेह बरसना।
पानी जैसा पतला द्रव पदार्थ जो चिकना न हो।
निचोड़ने से निकलनेवाला रस, अर्क आदि।
चमक, आब, कांति, छबि, सुन्दरता।
धारदार हथियारों की आब, जौहर।
पानी उतारना- अपमानित करना।
पानी जाना- अपमान होना।
पानी बचाना (रखना)- मान की रक्षा करना।
पानी (हर) लेना- प्रतिष्ठा नष्ट करना। उ.- सुंदर नैननि हरि लियो कमलनि कौ पानी-४७५।
बे पानी करना- प्रतिष्ठा नष्ट करना।
पानी करना (कर देना)- गुस्सा ठंढा कर देना।
(किसी का) पानी होना (हो जाना)- (१) गुस्सा ठंढा हो जाना। (२) तेजी न रह जाना।
तर्पण या पिंडदान करनेवाला।
उ.- अजहूँ सिय सौंपि नतरु बीस भुजा भानै रघुपति यह पैज करी, भूतल धरि पानैं-९-९७।
उ.- चातक सदा स्वाति को सेवक दुखित होत बिन पानै-३४०४।
जिसे ठौर-ठिकाना न हो, अशरण।
पानी लगना- किसी स्थान की जलवायु स्वास्थ्य के अनुकूल न होने से रोगी हो जाना।
चाल-ढाल, रंग-ढंग, वातावरण।
उ.- सोइ दसरथ कुलचंद अमित बल आए सारँग पानी-९-११५।
उ.- मथुरापति कै जिय कछु तुम पर उपज्यौ पाप-५८९।
पाप कटना- बाधा दूर होना।
पाप काटना- बाधा दूर करना, झंझट मिटाना।
पाप मोल लेना- जान-बूझकर झंझट में पड़ना।
पाप गले (पीछे) लगना- झंझट में फँस जाना।
उ.- छींक सुनत कुसगुन कह्यौ, कहा भयौ यह पाप-५८९।
पाप पड़ना- कठिन या सामर्थ्य से बाहर होना।
उ.- सूर आसा पुजै या मन की तब भावै भोजन पानो -८९२।
पान के पत्ते की पकौड़ी, पतौड़, पतौर।
उ.- पानौरा रायता पकौरी -१-२३२१।
उ.- (क) अब क्यों जाति निबेरि सखी री मिलो एक पय पान्यौ-१२०२। (ख) सूर सु ऊधो मिलत भए सुख ज्यों खग पायो पान्यौ-२९७१।
उ.-मानो दव द्रुम जरत अस भयो उनयो अंबर पान्यौ-२२७५।
पाप उदय होना- पिछले पापों का बुरा फल भुगतना।
पाप कटना- पिछले पापों का बुरा फल-भोग चुकना और सुख की आशा होना।
पाप कमाना (बटोरना)- बराबर पाप करना।
पाप काटना- पाप का कुफल भुगता देना।
पाप की गठरी (मोट)- अनेक पापों का संग्रह।
पाप पड़ना (लगना)- दोष होना।
पाप लगाना- दोष लगाना, दोषी ठहराना। लावत पाप-दोष लगाता है। उ.- हारिजीति कछु नेंकु न समझत, लरिकनि लावत पाप-१०-२१४।
तीर्थ जहाँ पाप नष्ट हो जायँ।
जिसके चित्त में पाप रहता हो।
उर्द, मूँग या आलू की बहुत पतली चपाती जो प्रायः सूखने पर तली जाती है।
[सं. पर्पट, प्रा. पप्पड़]
पापड़ बेलना- (१) कठिन परिश्रम करना। (२) कठिनाई से दिन काटना। (३) बहुत भटकना।
उ.- जगत के प्रभु बिनु कल न परै छिनु ऐसे पापी पिय तोहिं पीर न पराई है-२८२७।
पाप करनेवाली, जिस स्त्री ने पाप किया हो।
उ.- यह आसा पापिनी दहै-१-५३।
अनरीति करनेवाला, जो अनुचित व्यवहार करे।
उ.- पिता-बचन खंडै सो पापी, सोई प्रहलादहिं कीन्हौ-१-१०४।
अशुभ या अमंगलकारिणी दृष्टि।
जिसकी मति सदा पाप में रहे।
उ.- पापर बरी मिथैरि फुलौरी। कूर बरी काचरी पिठौरी-३९६।
नीच कुल वाला, नीच कुल में उत्पन्न।
उ.- ओढ़े पीरी पामरी पहिरे लाल निचोल-१४६३।
पलँग, कुर्सी आदि का पावा।
उ.- होड़ाहोड़ी मनहिं भावते किए पाप भरि पेट। ते सब पतित पाय तर डारौं, यहै हमारी भेंट-१-१४६।
उ.- अंजनि-कुँवर राम कौ पायक ताकैं बल गर्जत-९-८३।
उ.- उमड़त चले इंद्र के पायक सूर गगन रहे छाइ-९४५।
उ.- पायक मन, बानैत अधीरज, सदा दुष्ट मति दूत-१-१४१।
उ.- (क) ताकत नहीं तरनिजा के तट तरुवर महा निरास-सा.२६। (ख) तिपीपी पल माँझ कीनो निपट जीव निरास-सा.३८। (ग) सात दिवस जल बरषि सिराने ताते भए निरास-९७४।
उ.-आप काज कौन हमको तजि तब ते भए निरासी-पृ. ३२५ (४२)।
जहाँ या जिसमे चित्त को आनंद न मिले, वेरौनक।
उ.-सूर स्याम बिनु यह बन सूने ससि बिनु रौनि निरासी-३४२२।
जिस (व्रत आदि) में भोजन किया ही न जाय।
नदी अथवा जलाशय के पार पहुँचा हुआ, जो पार जा चुका हो।
उ.- यहै मंत्र सबहीं परधान्यौ सेतु बंध प्रभु कीजै। सब दल उतरि होइ पारंगत, ज्यौं न कोउ इक छीजै-९-१२१।
पूरा जानकार, पूर्ण पंडित।
नदी, झील आदि के दूसरी ओर का किनारा।
उ.- भव-समुद्र हरि-पद नौका बिनु कोउ न उतारै पार-१-६८।
पार उतरना- (१) पाट या फैलाव पार करके दूसरे किनारे पहुँचना। (२) काम से छट्टी पा जाना। (३) सफलता प्राप्त करना।
पार उतारना- (१) दूसरे किनारे पर पहुँचाना। (२) समाप्त कर देना। (३) सफलता प्राप्त करना। (४) उद्धार करना।
पार तरना- (१) नदी, समूद्र आदि पार करना। (२) दुख, कष्ट आदि से, छुटकारा पाना।
पार तरै- उद्धार हो जाता है, दुख-कष्ट से मुक्ति या छुटकारा मिल जाता है। उ.- सूरजदास स्याम सेए तैं दुस्तर पार तरै-१-८२।
(किसी का ) पार लगाना- निर्वाह करना।
लड़की पार होना- कन्या का विवाह होना।
आरपार-इस किनारे से उस किनारे तक। वार पार-यह और वह किनारा।
उ.- सूर स्याम द्वै अँखियन देखति, जाको वार न पार-१३११।
आर पार- एक ओर से होकर दूसरी ओर निकलना।
व्रत के दूसरे दिन का प्रथम भोजन तथा तत्संबंधी कृत्य।
तृप्त करने की क्रिया या भाव।
झपकाता, मिलाता या गिराता है।
उ.- निदरे बिरह समूह स्याम अँग पेखि पलक नहिं पारत-पृ ३३५ (४७)।
उ.- प्रभु-पारथ द्वै नाहीं।
पृथ्वी या मिट्टी से बना हुआ।
पार करना- (१) एक ओर से करके दूसरी ओर पहुँचा देना। (२) उद्धार करना।
पार होना- एक ओर से जाकर दूसरी ओर निकलना।
उ.- प्रभु तव माया अगम अमोघ है लहि न सकत कोउ पार-३४९४।
पार पाना- (१) अंत तक पहुँचना। (२) सफलता पाना।
उ.- सूरदास गथ खोटो काहे पारखि दोष धरे- पृ. ३३१ (५)।
दूर तक देखनेवाला, दूरदर्शी।
उ.- हौं अनाथ बैठयौ द्रुमडरिया, पारधि साधि साधे बान।¨¨¨¨¨¨। सुमिरत ही अहि डस्यौ पारधी, कर छूटयौ संधान-१-९७।
[सं. परिधान=आच्छादन, हिं. पारधी]
[सं. परिधान=आच्छादन, हिं. पारधी]
[सं. परिधान=आच्छादन, हिं. पारधी]
व्रत के दूसरे दिन का प्रथम भोजन तथा तत्संबंधी कृत्य।
उ.- पारन की विधि करौ सबारै-१००१।
एक वस्तु को दूसरी में डालना या रखना।
साँचे में डालकर तैयार करना।
हिमालय की कन्या, शिवजी की अर्द्धागिनी।
उ.- जय अरु बिजय पारषद दोई। बिप्र-सराप असुर भए सोई-९-१५।
एक पत्थर जिससे छुते ही लोहा सोना हो जाता है।
उ.- (क) भृकुटी कुटिल निकट नैनन के चपल होत यहि भाँति। मनहुँ तामरस पारस खेलत बाल भृंग की पाँति-१३५७। (ख) उत स्यामा इत सखा मंडली, इत हरि उत ब्रज नारि। मनो तामरस पारस खेलत मिलि मधुकर गुंजारि।
उ.- गयौ कूदि हनुमंत जब सिंधु पारा-९-७६।
छोर, अंत। पावहिं नहिं पारा- अंत या छोर नहीं पाते।
उ.- सुर-सारद से करत बिचारा। नारद-से नहिं पावहिं पारा-१०-३।
नियत समय तक ग्रंथ का आद्योपांत पाठ।
बन उपवन फल-फूल सुभग सर सुख सारिका हंस पारावत-१०उ.- ५।
उ.- तिन कीन्ह्यौ सब जग विस्तार। जाकौ नाहीं पारावार-४-९।
उ.- मानो बंदि इंदु मंडल में रूप सुधा की पारि-१६८४।
उ.- सोर पारि हरि सुबलहिं धाए, गह्यौ श्रीदामा जाहि-१०-२४०।
उ.- (क) माँग पारि बेनी जु सँवारति गूँथी सुँदर भाति-७०४। (ख) मुँडली पटिया पारि सँवारै कोढ़ी लावै केसरि-३०२६।
उ.- तिनकी यह करि गए पलक में पारि बिरह दुख बेरी-२७१९।
देव-वृक्ष जो समुद्र-मंथन से निकला था और अब नंदनकानन में है।
जो परीक्षा में उत्तीर्ण हो चुका हो।
विशिष्ट अर्थ में प्रयुक्त।
परिश्रम के बदले (लेखक या कार्यकर्ता को) दिया जानेवाला धन।
देखने की मुद्रा या रीति, चितवन।
(शब्द) निकाला, (शोर) किया।
उ.- मरत असुर चिकार पारयौ-४२७।
पृथ्वी या मिट्टी से उत्पन्न।
हिमालय-पुत्री जो शिव की अर्द्धगिनी देवी है, गौरी, शिवा, भवानी।
पालन की, पूरी की, निभा दी।
उ.- जन प्रहलाद प्रतिज्ञा पारी। हिरनकसिपु की देह बिंदारी-१-२८।
(माँग) सँवारी या निकाली, (बाल काढ़कर माँग) बनाई।
उ.- बूझति जननि कहाँ हुती प्यारी। किन तेरे भाल तिलक रचि कीनौ, किहिं कच गूँदि माँग सिर पारी-७०८।
उ.- वे मोरे सिर पटिया पारैं कंथा काहि उढ़ाऊँ-३४६६।
उ.- मानहु रति रस भए रँगमगे करत केलि पिय पलक न पारे-३१३२।
उ.- बिकल मान खोयौ कौरव पति, पारेउ सिर कौ ताज-१-२५५।
गिराऊँ, गिरने को प्रवृत करूँ, डालूँ।
उ.- कहौ तौ ताकौं तृन गहाइ कैं, जीवित पाइनि पारौं-९-१०८।
पूरी करूँ, पालन करूँ, निभाऊँ।
उ.- रघुपति, जौ न इंद्रजित मारौं। तौ न होउँ चरननि कौ चेरौ, जौ न प्रतिज्ञा पारौं-९-१३७।
उ.- द्रुपद-सुता की राखी लाज। कौरवपति कौ पारयौ ताज-१-२४५।
जैनियों के तेइसवें तीर्थकर।
उ.- अजामिल द्विज सौं अपराधी, अंतकाल बिडरै। सुतसुमिरत नारायन-बानी, पार्षद धाइ परैं-१-८२।
उ.- मन बिहँसत गोपाल, भक्त-पाल, दुष्ट-साल, जानै को सूरदास चरित कान्ह केरौ-१०-२७६।
फलों को पकाने के लिए भूसे-पत्ते आदि में रखना।
मस्तूल से लगा लंबा चौड़ा परदा जिसमें हवा भरने से नाव चलती है।
गाड़ी, पालकी आदि का ओहार।
उ.- तुम हो बड़े योग के पालक संग लिए कुबिजा सी-३१३३।
उ.- सरसों, मेथी, सोवा, पालक-३९६।
पालता है, पालन-पोषण करता है।
उ.- पालत, सृजत, सँहारत, सैतत, अंड अनेक अवधि पल आधे-९-५८।
उ.- सूर स्याम के पालनहारैं, आवतिं हौं नित गारि-१-१५०।
[सं. पालन + हारैं (प्रत्य.)]
पशु पक्षी को खिलाना-पिलाना और हिलाना।
उ.- जसोदा हरि पालनै झुलावै-१०-४२।
जिन्हें पाला हो, पाली हुईं।
उ.- आई बेगि सूर के प्रभु पै, ते क्यौं भजैं जे पालीं-६१३।
पालन की, निर्वाह की निभायी।
उ.- जन प्रहलाद प्रतिज्ञा पाली, कियौ बिभीषन राजा भारी-१-३४।
एक प्रसिद्ध प्राचीन भाषा।
उ.- दया धर्म पालै जो कोइ- पृ ६०० (२)।
[सं. पाद, प्रा, पाय, पाव हिं.. पाँव]
पावँ अड़ाना- व्यर्थ ही बीच में पड़ना या दखल देना।
पावँ उखड़ (उठ) जाना- सामने रुकने, ठहरने या लड़ने का साहस न रहना।
पावँ काँपना- (१) भय, निर्बलता आदि से पैर काँपना। (२) ठहरने या आगे बढ़ने का साहस न रहना।
पावँ की जूती- अत्यंत तुच्छ।
पावँ की जूती सिर को लगाना- छोटे आदमी को बहुत महत्व दे देना।
पावँ की बेड़ी- झंझट, जंजाल।
पावँ की मेंहदी न बिसना (छूटना)- कहीं जाने में ज्यादा कष्ट या परेशानी नहीं होगी।
पावँ खींचना- घूमना फिरना छोड़ देना।
पावँ गाड़ना- (१) डटकर खड़े रहना या सामना करना। (२) दृढ़ रहना। (३) रहने-बसने का मजबूत प्रबंध कर लेना।
पावँ टिकाना- (१) खड़ा होना। (२) विश्राम करना।
पावँ ठहरना- (१) पैर जमना। (२) स्थिरता होना।
पावँ डगमगाना- (१) पैर स्थिर न रहना। (२) विचलित हो जाना।
पावँ डालना- काम करने को तैयार होना।
पावँ तले की चीटी- अत्यंत दीन-हीन प्राणी।
पावँ तले की धरती सरकना- ऐसा दुख होना कि पृथ्वी भी काँप जाय।
पाँव तले की मिट्टी निकल जाना- ऐसी अनहोनी या भयंकर बात की सुनकर सन्नाटे में आ जाना।
पावँ तोड़ना- बहुत चलकर पैर थकाना।
पावँ तोड़कर बैठना- (१) अचल या स्थिर होना। (२) थक-हारकर बैठ जाना।
पावँ थरथराना- (१) भय, आशंका आदि से पैर काँपना। (२) आगे बढ़ने का साहस न होना।
पावँ दबाना (दाबना) - (१) थकावट दूर करने को पैर दबाना। (२) सेवा करना।
पावँ धरना - कहीं जाना।
काम में पावँ धरना - काम में लगना।
(किसी का) पावँ धरना - (१) पैर छूकर प्रणाम करना। (२) दीनता दिखाना। (३) तेजी दिखाना, तर्क से निरूत्तर करना।
बुरे पथ पर पाँव धरना - बुरे कामों में रूचि लेना।
पावँ धोकर पीना- बड़ा आदर-भाव दिखाना।
पाँव निकलना - (१) आजादी से घूमना-फिरना। (२) दुराचार के कारण बदनामी होना।
पावँ निकालना - (१) इतराकर चलना, हैसियत से बाहर काम करना। (२) स्वेच्छाचारी होना। (३) दुराचरण करना। (४) चालाकी दिखाना।
(काम से) पावँ निकाला- काम के झगड़े से अलग हो जाना।
पावँ पकड़ना- (१) जाने से रूकने की प्रार्थना करना। (२) बड़ी दीनता दिखाना। (३) बड़े भक्ति-भाव से नमस्कार करना।
पावँ पकरना- विनयपूर्वक यात्रा से रोकना।
पावँ पकरि- बड़ी विनय या नम्रता दिखाकर। उ.- जानति जो न स्याम ऐहैं पुनि पावँ पकरि घर राखती।
पावँ पकरति- बड़ी दीनता या विनयपूर्वक प्रार्थना करती हूँ। उ,- अब यह बात कहौ जनि ऊधो, पकरति पावँ तिहारे।
पावँ पखारना- पैर धोना।
पावँ पड़ना - (पैर पर गिरना) (१) भक्ति-भाव से प्रणाम करना। (२) दीनता दिखाना। (३) जाने से रूकने को नम्रतापूर्वक कहना।
पाँव पर पावँ रखकर बैठना (सेना) - (१) काम-धंधा छोड़ बैठना। (२) बेफिक्र या गाफिल रहना।
(किसी के) पावँ पर पावँ रखना- किसी का अनुकरण करना।
(किसी के) पावँ पर सिर रखना - (१) भक्ति-भाव से प्रणाम करना। (२) दीनता दिखाना (३) जाने से रूकने को नम्रतापूर्वक कहना।
पावँ पलोटना- सेवा करना।
पाँव पसारना- (१) आराम से सोना। (२) मरना। (३) ठाट-बाट करना।
पावँ-पावँ (चलना)- पैदल चलना।
पावँ पीटना- (१) तड़पना, छटपटाना। (२) रोग या मृत्यु का कष्ट भोगना। (३) परेशान या हैरान होना।
पावँ पूजना- (१) बड़ा आदर-सत्कार करना। (२) कन्यादान में योग देना। (३) खुशामद से पनाह माँगना।
पावँ फिसलना- कुसंगत में पड़ना।
पावँ फूँक-फूँककर रखना- बहुत बचा-बचाकर या सावधानी से चलना।
पावँ फूलना- (१) पैर आगे न उठना। (२) थकावट से पैर दुखना।
पावँ फेरने जाना- (१) विवाह के पश्चात् वधू का पहले पहल ससुराल जाना। (२) बच्चा होने के पश्चात् वधू का अपने माता-पिता या बड़े संबंधियों के यहाँ जाना।
पावँ फैलाना- (१) अधिक की प्राप्ति के लिए लोभ दिखाना। (२) बच्चों की तरह मचलना।
पावँ बढ़ाना- (१) जल्दी जल्दी चलना। (२) अधिकार बढ़ाना।
पावँ बाहर निकलना- बदनामी फैलना।
पावँ बाह निकालना- (१) इतराकर चलना। (२) स्वेच्छाचारी होना।
पावँ विचलना- (१) पैर रपट जाना। (२) स्थिर या दृढ़ न रहना। (३) नीयत डोल जाना। (४) कुसंगति में पड़ जाना।
पावँ भर जाना- चलने की बहुत थकावट होना।
पावँ भारी होना- गर्भ रहना।
(किसी से) पावँ भी न धुलवाना (दबवाना)- (किसी को) बहुत ही तुच्छ समझना।
पावँ में क्या मेंहदी लगी है- कहीं आने-जाने का आलस्य दिखाना (व्यंग्य)।
पावँ में बेड़ी पड़ना- (गृहस्थी के) बंधन या जंजाल में पड़ना।
पावँ में सिर देना- (१) प्रणाम करना। (२) दीनता दिखाना। (३) पनाह माँगना।
पावँ रगड़ना- (१) छटपटाना। (२) दौड़-धूप करना।
पावँ रह जाना - (१) चलने या दौड़ने-धूपने से पैरों में बहुत ही थकावट होना। (२) पैर अशक्त हो जाना।
पावँ रोपना- प्रतिज्ञा करना।
पावँ लगना- (१) पैर छूकर प्रणाम करना। (२) आदर करना। (३) विनती करना।
पावँ लगा होना - खूब घूमा-फिरा और परिचित (स्थान) होना।
पावँ समेटना सिकोड़ना, सुकेड़ना- (१) पैर ज्यादा न फैलाना। (२) लगाव या संबंध न रखना। (३) इधर-उधर न घूमना।
पावँ से पावँ बाँधकर रखना- (१) बराबर अपने पास रखना। (२) पूरी चौकसी या निगरानी रखना।
पावँ न होना- दृढ़ता या साहस न होना।
धरती पर पावँ न रखना (रहना)- (१) बहुत घमंड होना। (२) अत्यानंद से फूले अंग न समाना।
उ.- पाखण्ड धर्म करत हैं पावँर।
उ.- जाकौ सिवबिरंचि सनकादिक मुनिजन ध्यान न पाव-१०-७५।
उ.- जन्मथान जिय जानि कै ताते सुख पावत -२५६०।
उ.- ढ़ँढ़त फिरति ग्वारिनी हरि कौं, कितहूँ भेद न पावति-४-५९।
उ.-स्यामा छबीली भावती, गौर स्याम छबि पावती-२०६५।
उ.-जौ हौं कैसेहु जान पावती तौं कत आवत छोड़ी-२७०१।
शुद्ध या पवित्र करनेवाला।
उ.-जौ तुम पतितनि के पावन हौ, हौं हूँ पतित न छोटौ-१-१७९।
वर्षकाल, बरसात, सावन-भादों के महीने।
उ.-चतुरानन बल सँझार मेघनाद आयौ। मानौ घन पावस मैं नगपति है छायौ-९-९६।
वह सिद्धांत जिसमें ईश्वर का अस्तित्व न माना जाय।
ईश्वर का अस्तित्व न माननेवाला, नास्तिक।
जो इच्छा या चेष्टा न करे,
उ.-साँच-झूठ होइ है निरुवार-१० उ.-४४।
उ.-निरखि-निरखि वह मदन मनोहर नेन बहुत सुख पावहिंगे-२८८९।
उ.-मन बानी कौं अगम अगोचर सो जानै जो पावै-१-२।
उ.-तुम बिनु और न कोउ कृपा निधि पावै पीर पराई-१-१९५।
पशु-पक्षी को फँसाने का जाल।
वेद-विरुद्ध आचरण करने वाला।
ढोंगी, धूर्त, ठग, आडम्बरी।
तराजू के पलड़े बराबर करने के लिए रखी जानेवाली बस्तु, पसंघा।
पासंग (बराबर) भी न होना- तुलना या मुकाबले में जरा भी न ठहरना, बहुत ही कम होना।
वरुण जिनका अस्त्र पाश है।
जाल में फँसा हुआ, पाशबद्ध।
शिव का शूलास्त्र जिससे अर्जुन ने जयद्रथ को मारा था।
तराजू की डंडी का किसी ओर झुकना।
पसंघा भी, पसंघे के बराबर भी।
[फ़ा. पासंग + हिं. हु (प्रत्य.)]
पासंगहु नाहीं- बहुत ही तुच्छ हैं, कुछ भी नहीं हैं, नगण्य हैं। उ.-पतितनि मै बिख्यात पतित हौं पावन नाम तुम्हारौ। बड़े पतित पासंगहु नाही, अजमिल कौन बिचारौ-१-१३१।
पास-परोसनैं-पास-पड़ोस में रहनेवाली स्त्रियाँ।
उ.-हरषीं पास-परोसिनैं (हो), हरष नगर के लोग-१०-४०।
उ.-हम अज न कत डरत हैं, कान्ह हमारैं पास-४३१।
निकट जाकर, संबोधन करके, किसी के प्रति।
उ.-माँगत है प्रभु पास दास यह बार बार कर जोरी।
अधिकार में, रक्षा में, पल्ले।
उ.-ज्यों मृगा कस्तूरि बूलै, सुतौ ताके पास-१-७०।
उ.-बरुन-पास तैं ब्रजपतिहिं छन माहिं छुड़ावै-१-४।
अन्नप्राशन, बच्चे को पहले पहल अनाज चटाने की रीति।
उ.-कान्ह कुँवर की करहु पासनी कछु दिन घटि षट मास गए-१०-८८।
पास ही में बना रहनेवाला, निकट रहनेवाला।
चौसर खेलने के टुकड़े जिन्हें खिलाड़ी बारी-बारी फेंकते हैं।
उ.-छल कियौ पांडवने कौख कपट पासा ढरन-१-२०२।
पासा पड़ना- (१) जीत का दाँव पड़ना। (२) भाग्य अनुकूल होना।
पासा पलटना- (१) खेल में हारना। (२) भाग्य प्रतिकूल होना। (३) प्रयत्न करने पर भी उलटा फल होना।
पासा फेंकना- भाग्य की परीक्षा करना।
उ.-महल-महल लागे मनि पासा-२६४३।
उ.-(क) अतिहिं ए बाल हैं, भोजन नवनीति के जानि तिन्हें लीन्हें जात दनुज पासा-२५५२। (ख) आतुर गयो कुबलिया पासा-२६४३।
उ.-कोटि दनुज मो सरि मो पासा-२४५९।
उ.-(क) मोहन के मन बाँधिबे को मनो पूरी पासि मनोज-२०६४।
उ.-सूरदास प्रङु द्दढ़ करि बाँधे प्रेम-पुंजिका पासी-३०८९।
[सं. पार्श्व, प्रा. पास, पाह]
किसी के प्रति, किसी को संबोधन करके।
[सं. पार्श्व, प्रा. पास, पाह]
उ.-पाहन बीच कमल बिकसावै, जल मैं अगिनि जरै-१-१०५।
[सं. पार्श्व, प्रा. पास, पाह]
किसी के प्रति, किसी को संबोधन करके।
[सं. पार्श्व, प्रा. पास, पाह]
उ.-हमहिं छाप देखावहु दान चहत केहि पाहिं-११०९।
[सं. पार्श्व, प्रा. पास, पाह]
स्त्री अतिथि, अभ्यागत स्त्री।
उ.-पाहुनी, करि दै तनक मह्यौ। हौं लागी गृह-काज-रसोई, जसुमति बिनय कह्यौ-१०-१८२।
उ.-(क) जा दिन संत पाहुने आवत-२-१७। (ख) सुदंर स्याप पाहुने के मिसि मिल न जाहु दिनचार-२७६९।
[सं. प्राभृत, प्रा. पाहुड़=भेंट]
उ.-सूरदास प्रभू दूरि सिधारे दुख कहिए केहि पाहैं-२८०१।
एक प्राचीन आचार्य जिन्होंने छंद-शास्त्र रचा था।
उक्त आचार्य का बनाया छंदशास्त्र।
हठ्योग की तीन प्रधान नाड़ियों में एक।
उ.-इंगला, पिंगलास सुषमना नारी-३३०८।
एक वेश्या जिसे वियोग में तड़पते तड़पते ज्ञान हुआ कि निकट के कांत को छोड़कर दूर के कांत के लिए भटकना अज्ञान है।
उ.-सुरदास बरु भली पिंगला आशा तजि परतीति-२७३०।
लोहे, बाँस आदि की तीलियों से बना झाबा जिसमें पक्षियों को रखा जाता है।
उ.-कंस के प्रान भयभीत पिंजरा जैसे नव बिहंगम तैसे मरत फरफराने-२५९६।
उ.-ज्यों उड़ि मैलि बधिक खग छिन में पलक पिंजरन तोरि- पृ ३३३ (२०)।
उ.-बज्र पिंजरी रूँधि मानों राखे निकसन को अकुलात-२७०३।
उ.-कीर पिंजरैं गहत अँगुरी, ललन लेत भँजाइ-४९८।
गोल-मटोल टुकड़ा, पिंडा, ढेर।
उ.-दुहूँ करनि असुर हयौ, भयो मांस पिंड-९-९६।
उ.-माखन पिंड बिभागि दुहूँकर, मेलत मुख मुसुकाइ-१०-१८९।
खीर का लोंदा जो श्राद्ध में पितरों की अर्पित किय जाता है।
उ.-अपनौ पिंड पोषिबे कारन, कोटि सहस जिय मारे-१-३३४।
पिंड छोड़ना- तंग न करना।
पिंड पड़ना- तंग करना।
नियुक्त, स्थापित, प्रतिष्ठित।
छह वेदांगों में चौथा अंग।
उ.-यह निरुक्त की अवध बाम तू भइ ‘सूर’ हत सखी नवीन-सा. ९६।
जिसका कुछ उत्तर न दिया जा सके, लाजवाब।
वह जीव जो गर्भ से बने-बनाये शरीर के रूप में जन्मे।
घुटने के कुछ नीचे का पिछला मांसल भाग।
खीर का लोंदा जो श्राद्ध में पितरों की अर्पित किय जाता है।
एक प्रकार का मीठा सकरकंद।
उ.-बनकौरा पिंडीक चिचिंडी। सीप पिंडारू कोमल भिंडी-३९६।
हल्दीके रंग में रँगी पीली धोती
उ.-आपुन पीवत सुधा रस सजनी बिरहिनि बोलि पिआवत -२८४५।
उ.-जेहि मुख अमृत पिउ रसना भरि तेहि क्यों बिषहिं पिआवै-३०९८।
पिंडुरी, पिंडुरिया, पिंडुली
उ.-पीन पिंडुरिया साँवल सीरी चरणांबुज नख लाल री-पृ. ४२०।
जिसे पीने की इच्छा हो, प्यासा।
उ.-आई छाक अबार भई है, नैंसुक घैया पिएउ सबेरे-४६३।
घन पदार्थ का गर्मी से द्रवित होना।
घन पदार्थ को गर्मी से द्रवित करना।
होली जैसे अवसरों पर पानी य रंग चलाने का यंत्र।
उ.-रबावा साखि जवाए कुमकुमा छिरकत भरि केसरि पिचकारी-२३९१।
पिचकारी छूटना (निकलना)- तरल पदार्थ का वेग से निकलना।
पिचकारी छोड़ना- तरल पदार्थ को वेग से निकालना।
पीछे रह जाना, साथ या बराबर न रह पाना।
मंद हीन अति भयो नंद अति होत कहा पिछताने छिन छिन -२६७०।
जो स्वतंत्र विचार न रखता हो।
[हिं. पीछा + वाड़ा [प्रत्य.]
पीछे की ओर, मकान आदि के पीछे की दिशा में।
उ.- देखि फिरे हरि ग्वाल दुवारैं। तब इक बुद्धि रची अपनैं मन, गए नाँघि पिछवारैं-१०-२७७।
पहचान। लै पिछानि- पहचान ले, जाँच ले, चीन्ह ले।
उ.- जसुमति धौं देखि आनि आगैं ह्वै लै पिछानि, बहियाँ गहि ल्याई, कुँवर और कौ कि तेरौ-१०-२७६।
उ.- मनमथ कोटि-कोटि गाहि वारौं ओढ़े पीत पिछोरी-८८३।
फटकि पछोर्यो- फटक छानकर खो दी। उ.- नाच कछयौ अब घूँघट छोरयौ, लोक-लाज सब फटकि पछोरयौ-१२०१।
उ.- परतिय-रति अभिलाष निसादिन, मन पटरी लै भरतौ-१-२०३।
पीटने या बजवाने का काम कराना।
पीटने का काम, भाव या वेतन।
पुरूषों की चादर या दुपट्टा।
[सं. पक्षपट, प्रा. पच्छवड़, हिं. पछेवड़ा]
स्त्रियों के ओढ़ने की चादर, ओढ़नी।
बच्चों के ओढ़ने की छोटी चादर या छोटा दुपटटा।
उ.- कटि-तट पीत पिछौरी बाँधे, काकपच्छ धरे सीस-९-२०।
उ.- भवन भुजंग पिटारे पाल्यौ ज्यों जननी जिय तात-३१७१।
पिट्टस पड़ना (मचना)- छाती पीट कर रोना।
पीठी की बनी हुई खाने की चीज, जैसे बरी, मुँगौरी।
उ.- पापर बरी मिथौरि फुलौरी। कूर बरी काचरी पिठैरी-३९६।
[हिं. पिट्ठी + औरी (प्रत्य.)]
उ.- कटि पितंबर बेष नटवर, नूतत फन प्रति डोल-५६३।
पित्त बिगड़ने से होनेवाला ज्वर।
उ.- सूर सो औषध हमहिं बतावत ज्यों पितज्वर पर गुर सी-३१९८।
पितृ, पुरखे, मृत पूर्व पुरुष।
उ.- तिहिं घर देव पितर काहे कौं जा घर कान्हर आयौ-१०-३४६।
योग की पाँच मनोवृत्तियों क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध-में एक जिसमें चित्त अपनी प्रकृति में ही स्थिर हो जाता है।
तीन ऋणों में एक मुक्ति, जो पुत्र उत्पन्न करने पर ही होती है।
चंद्रमा के ऊपर का एक लोक जहाँ पितरगण रहते हैं।
शरीर के भीतर यकृत में बननेवाला एक तरल पदार्थ।
पित्ता उबलना (खौलना)- बहुत क्रोध आना।
पित्ता (पानी) मारना- बहुत परिश्रम करना।
पित्ता मरना- गुस्सा न रहना।
पित्ता मारना- (१) बिना ऊबे कठिन काम करना। (२) क्रोध दबाना।
पित्तामार (पित्तोमारी का) काम- अरुचिकर और कठिन काम।
शिवजी का धनुष जिसे श्रीरामचन्द्र जी ने तोड़ा था।
पिनाक होना- काम का बहुत कठिन होना।
उ.- सावन मास पपीहा बोलत पिय पिय करि जो पुकारै-२८१०।
उ.- काहे कौं जसोदा मैया, त्रात्यौ तैं बारौ कन्हेया, मोहन हमारौ भैया केतो दधि पियतौ-३७३।
उ.- पियरी पिछौरी झीनी-१०-१५१।
उ.- पियरी, मौरी, गोरी, गैनी, खेरी, कजरी, जेती-४४५।
उ.- सेत, हरौ, रातौ अरु पियरौ रंग लेत है धोई-१-६३।
उ.- असुर-दिसि चितै, मुसुक्याइ मोहे सकल, सुरनि कौं अमृत दीन्ह्यौ पियाई-८-८।
उ.- गरुड़ छाँड़ि प्रभु पायँ पियादे गज-कारन पग धारे-१-२५।
उ.- नृपति-कुँवर कौं जहर पियायौ-६-५।
प्रिय, प्रीतिपात्र, प्रेमपात्र।
उ.- (क) बिदुर हमारौ प्रान-पियारौ, तू बिषया अधिकारी-१-२४४। (ख) असुर होइ, भावै सुर होइ। जो हरि भजै पियारौ सोइ-७-२।
उ.- आपुन पियत पियावत दुहि दुहि इन धेनुन के क्षीर-२६८६।
उ.- अचरा तर लै ढाँकि, सूर प्रभु कौं दूध पियावति -१०-११०।
पिलावै, पीने को प्रेरित करे।
उ.- अति सुकुमार डोलत रस-भीनौ, सो रस जाहि पियावै (हो)-२-१०।
जिसे प्यास लगी हो, तृषित, पिपासा युक्त।
उ.- परम गंग कौं छाँड़ि पियासौ दुरमति कूप खनावै-१-१६८।
उ.- सूरदास प्रभु तृषां बढ़ी अति दरसन सुधा पियैए-३२००।
उ.- मृतक भए सब सखा जिवाए, बिष-जल जलइ पियौ-१-३८।
बिना जूता पहने, नंगे पैर।
उ.- (क) गरुड़ छाँड़ि प्रभु पाय पियादे गज-कारन पग धारे-१-२५। (ख) वह घर-द्वार छाँड़ि कै सुन्दरि चली पियादे पाउँ-९-४४।
उ.- लुचुई, लपसी, सद्य जलेबी, सोइ जेवहु जो लमै पियारी-१०-२२७।
प्रिय, प्यारा, प्रेमपात्र।
उ.- बंदौं चरन-सरोज तिहारे। सुंदर-स्याम कमल-दल लोचन, ललित त्रिभंगी प्रान पियारे-१-९४।
उ.- मारत मारत सात के दोऊ हाथ पिराने- पृ ४६५।
उ.- तुमहीं मिलि रसबाद बढ़ायौ। उरहन दै दै मूँड़ पिरायौ-३९१।
उ.- नील पाट पिरोइ मनिगन फनिग धाखे जाँइ-१०-१७०।
हरापन लिए हुए एक नीला पत्थर।
उ.- रेसम बनाइ नव रतन पालनौ, लटकन बहुत पिरोजा-लाल-१०-८४।
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोंअ + ना, हिं. पिरोना]
उ.- सिगरे ग्वाल धिरावत मेसौं, मेरे पाइ पिराइँ-५१०।
पीड़ित होती हे, दुखती है।
उ.- धरयौ गिरिवर, दोहनी कर धरत बाहँ पिराइ-४९८।
उ.- रचि पिराक लाड़ू दधि आनौं-१०-२११।
[सं. पिष्टक, प्रा. पिट्टक, पिड़क]
दुखती हे, पीड़ित होती हैं।
उ.- अधिक पिराति सिराति न कबहूँ अनेक जतन करि हारी-३०३९।
(दूसरे का) दुख-दर्द समझना।
उ.- स्याम कह्यौ नहि भुजा पिरानी ग्वालनी कियौ सहैया-१०७१।
दुखने लगे, दर्द करने लगे।
उ.- धरनी धरत बनै नाहीं पग अतिहिं पिराने- पृ ३५३ (८९)।
सूत-आदि छेद के आर पार निकालना।
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोंअ + ना, हिं. पिरोना]
उ.- सूरदास कंचन अरुँ काँचहि, एकहिं धगा पिरोयौ-१-४३।
तेल निकालने के लिए पेरा जाना।
बहुत मुलायम या नरम हो जाना।
उ.- देवकि उर-अवतार लेन कहयौ, दूध पिवन तुम माँगि लियौ-१०-८५।
उ.- बकी पिवावन इनहीं आई-२३६५।
उ.- सूरदास प्रभु बेगि मिलह अब पिशुन करत अब हाँसी-३४८६।
कही बात को फिर कहना या लिखना।
पीसने की क्रिया, भाव, धंधा या मजदूरी।
वह व्यक्ति जो क्रूर और नीच प्रकृति का हो।
उ.- दुष्ट सभा पिसाच दुरजोधन, चाहत नगन करी-१-२५४।
क्रूर प्रकृति की दुष्टा स्त्री।
लोहे या बाँस की तिलियों का झाबा जिसमें पक्षी पाले जाते हैं।
उ.- मन सुवा तन पींजरा, तिहिं माँहिं राखै चेत-१-३११।
सिर या बालों का एक आभूषण।
उ.- (क) शिखा की भाँति सिर पींड डोलत सुभग, चाप ते अधिक नव माल सोभा। (ख) पींड श्रीखंड सिर भेष नटवर कसे अंग इक छटा मैं ही भुलाई।
उ.- पींड बदाम लेत बनवारी।
उ- मनौ कमल कौ पी पराग, अलि-सावक सोइ न जाग्यौ री-१०-१३९।
उ.- सूरदास ए जाइ लुभाने मृदु मुसकनि हरि पी की- पृ. ३३२ (९)
एक छोटा फल जिसकी गिनती अच्छे मेवों में है।
उ.- पिस्ता दाख बदाम छुहारा खुरमा खाझा गूँझा मठरी-८१०।
चबाये हुए पान के बीड़े का रस।
उ.- कबहुँक बेठि अंस भुज धरिकै, पीक कपोलनि पागे-६८६।
पपीहे या कोयल का मधुर कंठ से बोलना, पिहिकना।
पीका फुटना- कोंपल निकलना, पनपना।
किसी व्यक्ति या वस्तु का पिछला या पीठ की ओर का भाग।
[सं. पश्चात्, प्रा. पच्छा]
पीछा दिखाना- (१) हारकर या डर कर भागना। (२) भरोसा देकर फिर हट जाना।
[सं. पश्चात्, प्रा. पच्छा]
[सं. पश्चात्, प्रा. पच्छा]
पीछा करना- (१) चुपचाप पीछे पीछे जाना। (२) तंग करना।
पीछा छुड़ाना- तंग करनेवाले व्यक्ति, वस्तु या कार्य से बचना।
पीछा छुटना- अप्रिय व्यक्ति, वस्तु या कार्य से छुटकारा मिलना।
पीछा छोड़ना- (१) सहारा छोड़ना। (२) तंग करना बंद करना।
पीछा पकड़ना- सहारा या आश्रय बनाना।
पीछे चलना- अनुकरण या नकल करना।
पीछे छूटना- चुपचाप किसी के साथ लगाया जाना।
(धन आदि) पीछे डालना- भविष्य के लिए धन संचय करना।
(काम के) पीछे पड़ना- काम कर डालने को जुटना।
(व्यक्ति के पीछे पड़ना)- (१) बार-बार घेर का तंग करना। (२) हानि पहुँचाने की अवसर ताकना।
(वस्तु के) पीछे पीछे पड़ना- (१) हर समय उसी की प्राप्ति की चिंता में लगे रहना।
पीछे लगना- (१) साथ साथ घूमना। (२) रोगादि का घेर लेना।
पीछे लगाना - (१) आश्रय या आसरा देना। (२) अप्रिय वस्तु से सम्बन्ध कर लेना।
पीठ की ओर की दिशा में कुछ दूर पर। पीछे छूटना (पड़ना, होना) - गुण, योग्यता आदि में कम हो जाना, पिछड़ जाना। (किसी को) पीछे छोड़ना - किसी से गुण, योग्यता आदि में बढ़ जाना।
किसी प्राणी के पीछे चलने का भाव।
पीछौ लियौ- कोई काम निकलने की आशा से हर समय साथ लगे रहना। उ.- प्रभु, मैं पीछौ लियौ तुम्हारौ। तुम तौ दीनदयाल कहावत, सकल प्रापदा टारौ-१-२१८।
उ.- लीला-गुन अमृत-रस स्रवननि पुट पीजै -१-७२।
चोट मारकर चौड़ा-चिपटा करना।
किसी न किसी तरह समाप्त कर देना।
किसी न किसी तरह प्राप्त कर लेना।
किसी वस्तु आदि के होने-बसने का स्थान।
उ.- टहल करती महल महलनि, अब संग बैठी पीठ -२६८०।
वह पवित्र स्थान जहाँ शिव-पत्नी सती का कोई गिरा अंग अथवा आभूषण विष्णु के चक्र से कटकर था।
पीठ का- सहोदर के जन्म के बाद का।
पीठ का कच्चा (घोड़ा)- अच्छी चाल न चल सकनेवाला।
पीठ का सच्चा (घोड़ा)- बढ़िया चाल वाला।
पीठ की- सहोदरा के जन्म के बाद की।
पीठ चारपाई से लग जाना- बीमारी में बहुत दुबला हो जाना।
पीठ खाली होना- की सहायक न होना।
पीठ ठोंकना- (१) शाबाशी देना। (२) उत्साहित करना।
पीठ तोड़ना- (१) मारना-पीटना। (२) हताश करना।
पीठ दिखाना- लड़ाई से डरकर या हारकर भागना।
पीठ दिखाकर जाना- स्नेह या ममता तोड़ना।
देति न पीठ- सामने ही डटी रहती है। उ.- तदपि निदरि पट जात पलक छिदि जूझत देति पीठ - पृ. ३३४।
पीठ देना- (१) विदा होना (२) विमुख होना। (३) भाग जाना। (४) साथ न देना (५) लेटकर आराम करना।
(किसी की ओर) पीठ देना- (१) मुँह फेर लेना। (२) उपेक्षा दिखाना।
पीठ पर- जन्म के अनंतर।
पीठ पर का- सहोदरा या सहोदर के बाद जन्मा पुत्र।
पीठ पर की- सहोदर या सहोदरा के बाद जन्मी पुत्री।
पीठ पर हाथ फेरना- (१) शाबाशी देना। (२) उत्साह बढ़ाना।
पीठ पर होना- (१) सहायक होना। (२) जन्म ग्रहण करना।
पीठ पीछे- अनुपस्थिति में।
पीठ फेरना- (१) बिदा होना। (२) भाग जाना। (३) मुँह फेर लेना। (४) उपेक्षा दिखाना।
नायक के चार सखाओं में एक जो नायिका के मान-मोचन में समर्थ हो।
ख्याति, प्रसिद्ध, कीर्ति।
उ.- मोहन माँग्यो अपनो रूप। यहि ब्रज बसत अँचै तुम बैठी ता बिन उहाँ निरूप-३१८२।
विषय की विवेचना करनेवाला।
उ.- आवत पीठा बैठन दीन्हौ कुशल बूझि अति निकट बुलाई।
पीठि-ओढ़िए- पीठ किजिए या दिजिए, (स्थिति के अनुकूल) व्यवहार कीजिए। उ.- सूरदास के पिय प्यारी आपुहीं जाइ मनाय लीजै। जैसी बयारि बहै तेसी ओढ़िए जू पीठि -२०५।
पीठि दई- भाग गया, पीठ दिखा दी। उ.- पाछैं भयौ न आगैं ह्वैहै, सब पतितनि सिरताज। नरकौ भज्यौ नाम सुनि मेरौ, पीठि दई जमराज -१-९९।
पीठि दिखाऊँ- (१) पीठ फेरूँ, रण से हार कर या डरकर विमुख हो जाऊँ। (२) मुँह मोड़ूँ, विरत होऊँ। उ.- सूरदास रनभूमि बिजय बिनु, जियत न पीठि दिखाऊँ -१-२७०।
पीठि दीजै- मुँह सामने न कीजिए, मुँह मोड़ लीजिए, सामने तक न देखिए। उ.- राखहु बैर हिए गहि मोसौं बैरिहिं पीठि न दीजै -२२७५।
पीठि दीन्ही- (१) मुँह मोड़ लिया, विमुख हो गये। उ.- सीतल भई चक्र की ज्वाला, हरि हँसि दीन्ही पीटि -१-२७४।(२) विरत हो बैठे, त्याग दिया। उ.- जे तप-ब्रत किए तरनि-सुता-तट, पन गहि पीठि न दीन्हीं -६५६।
पीठि दै - (१) सहारा या टिकासरा देकर। उ.- ऊखल ऊपर-आनि, पीठि दै, तापर सखा चढ़ायौ -१०-२९२। (२) मुँह मोड़ कर। उ.- (क) चली पीठि दै दृष्टि फिरावति, अंग-अंग-आनंद रली -७३९। (ख) काँपति रिसनि, पीठि दैं बैठी, मनि-माला तन हेरयो -२२७५।
सिर या बालों का एक आभूषण।
उ.- कर धर कै धरमैर सखी री। कै सृक सीपज की बगपंगति, कै मयूर की पीड़ पखी री-१६२७।
उ.- पीतै पीत बसन भूषन सजि पीतधातु अँग लावै-२०३२।
उ.-निसि दिन निरखि जसोदा-नंदन अरु जमुनाजल पीतनि-४९०।
उ.- प्रगट भई तहँ आइ पूतना, प्रेरित काल-अवधि नियराई। आवत पीढ़ा बैठन दीनौं, कुसल बूझि अति निकट बुलाई-१०-५०।
उ.- हौं तौ पतित सात पीढ़िनि कौ, पतितै ह्वै निस्तरिहौं-१-१३४।
उ.- कोटि बार पीतरि ज्यौं डाहौ कोटि बार जो कहा कसै-२६७८।
पीतांबर धारण करने वाले या पीतांबर प्रिय है जिनको वे श्रीकृष्ण।
समुद्र पीनेवाला, अगस्त्य।
उ.- पीतै पीत बसन भूषन सजि पीतधातु अँग लावै-२०३२।
मनोविकार का अनुभव ही न करना।
एक लता जिसकी कलियाँ प्रसिद्ध औषधि हैं।
उ.- हींग, मिरच पीपरि अजवाइनि ये सब बनिज कहावै-११०८।
खबे-पीबे को-खाने-पीने को।
उ.- बृद्ध बयस, पूरे पुन्यनि तैं, तैं बहुतैं निधि पाई। ताहू के खैबे-पीबे कौं, कहा करति चतुराई-१०-३२५।
उ.- ऐसे पापी पीय तोहिं पीर न पराई है-२८२७।
उ.- पीन उरोज मुख नैन चखावति इह बिष मोदक जा तन झारि-११६४।
(किसी बात या रहस्य को) दबा देना।
(गाली, अपमान आदि) सह जाना।
उ.- भोजन बीच नीर लै पीयौ-३९६।
उ.- (क) मेटी पीर परम पुरूषोत्तम, दुख मेटयौ दुहु-घाँ कौ-१-११३। (ख) काज सरे दुख कहा कहौ धौं, का बायस की पीर-३१००।
दुख दूर करनेवाले, दुख मिटानेवाले, दुखी के प्रति सहानुभूति रखनेवाले।
उ.- राजरवनि गाईं व्याकुल ह्वै, दै दै तिनकौ धीरक। मागध हति राजा सब छोरे, ऐसे प्रभु पर-पीरक -१-११२।
[सं. पीड़ा, हिं. पीर + क (प्रत्य.)]
उ.- ओढ़ी पीरी पामरी पहिरे लाल निचोल-१४३६।
पीरी-काली होना- तेज होना, नाराज होना। उ,- बहियाँ गहत सतराति कौन पर मग धरी उँगरी कौन पै होत पीरी-कारी-२०४७।
उ.- (क) पीरे पान-बिरी मुख नावति -५१४। (ख) लै गागरि सिर मारग डगरी इन पहिरे पीरे पट-८९०।
उ.- मलिन बसन हरि हित अंतर्गति तनु पीरो जनु पाते-३४६१।
पीला पड़ना (होना)- (१) रक्त के अभाव से तेज न रह जाना। (२) भय से चेहरा फीका पड़ जाना।
पीले मुख - निस्तेज, कांतिहीन। उ.- लाली लै लालन गए आए मुख पीले -१९६४।
उ.- रसना तारू सों नहिं लावत, पीवै पीव पुकारत-पृ. ३३० (९८)।
उ.-गर्भवती हिरनी तहँ आई। पानी सो पीवन नहिं पाई-५-३।
सुलझाकर अलग करना या हटाना।
उ.- दीरघ लता अपने कर निरूवारत-२०६८।
फँसी या उलझी वस्तुओं को सुलझाना।
सुलझाती है, (फँसी या उलझी लटों को) अलग करती है।
उ.- जसुमति राधा कुंवर सँवारति। बड़े बार सीमंत सीस के, प्रेम सहित निरूवारति-७०४।
(स्त्री के) माता-पिता का घर, मायका, नैहर।
उ.- (क) तड़ित-बसन घन-स्याम सद्दस तन, तेज-पुंज तम कौं त्रासै-१-६९। (ख) अजिर पद-प्रतिबिंब राजत, चलत उपमा-पुंज-१०-२१८। (ग) सूर-स्याम मुख देखि अलप हँसि आनँद-पुंज बढ़ावो-१२२६।
उ.- जे वैं लता लगत तनु सीतल अब भईं बिषम अनल की पुंजैं-२७२१।
उ.- रसना तारू सों नहिं लावत पीवै पीव पुकारत-पृ ३३० (९८)।
उ.- पीवौ छाँछ अघाइ कै, कब के रयवारे-१-२३८।
किसी को पीसना- बहुत हानि पहुँचाना।
कड़ी मेहनत करना, खूब जान लड़ाना।
दाँत-पीसि - दाँत किटकिटाकर, बहुत क्रोध करके। उ.- सूर केस नहिं टारि सकै कोउ, दाँत पीसि जौ जग मरै-१-२३४।
उ.- पुंडरीक काशी को राइ - उ.-४४।
(२) (व्याकरण में) पुरूषवाचक शब्द।
एक संस्कार जो गर्भाधान से तीसरे महीने पुत्र-जन्म की कामना से किया जाता है।
उ.- पतिब्रता जालंधर-जुवती, सो पति-ब्रत तैं टारी। दुष्ट पुंस्चली अधम सो गनिक सुबा पढ़ावत तारी-१-१०४।
रक्षा या सहायता के लिए की गयी चिल्लाहट, दुहाई।
उ.- (क) तुम हरि साँकरे के साथी। सुनत पुकार, परम आतुर ह्वै, दौरि छुड़ायौ हाथी-१-११२। (ख) असुर महा उत्पात कियौ तब देवन करी पुकार।
किसी को पुकारने की क्रिया या भाव, हाँक, टेर
उ.- तुम्हरौ नहीं तहाँ अधिकार। मैं तुमसौं यह कहौं पुकार-६-४।
हाँक देता हूँ, टेरता हूँ, आवाज लगाता हूँ।
रक्षा के लिए चिल्लाता हूँ, गोहार लगाता हूँ, छटकारे के लिए चिल्लाता हूँ।
उ.-बालापन खेलत ही खोयौ, जुवा विशय-रस मात। वृद्ध भए सुधि प्रगटी मोकौं, दुखित पुकारत तातैं-१-११८।
घोषणा करते हैं, बताते हैं।
उ.-दीनदयाल देवकी नंदन बेद पुकारत चारो-१०उ.-७७।
जोर देकर, घोषित करके, चिल्लाकर।
उ.-सुनि मन, कहौं पुकारि तोसौं हौं, भजि गोपालहिं मेरें-१-८५।
झूठी प्रशंसा करके चंग पर चढ़ाना।
उ.-स्वान, कुब्ज, कुपंगु, कानौ, स्रवन-पुच्छ-बिहीन-१-३२१।
पुकारा, हाँक दी, टेरा, संबोधित किया।
उ.-(क) द्रुपद-सुता जब प्रगट पुकारी। गहत चीर हरि-नाम उबारी-१-२८। (ख) राखी लाज समाज माहिं जब, नाथ नाथ द्रौपदी पुकारी- १-३०।
रक्षा के लिए चिल्लाया, किया, गोहार लगाता पहा, छुटकारे के लिए आवाज देता रहा।
उ.-हाय-हाय मैं परयौ पुकारौं, राम-नाम न कहौं- १-१५१।
हाँक लगाई, टेरा पुकारा, आवाज दी।
उ.-जब गज-चरन ग्राह गहि राख्यौ, तबहीं नाथ पुकारयौ-१-१०९।
रक्षा के लेए चिल्लाया या गोहार मचायी।
उ.-पाँव पयादे धाय गए गज जबै पुकारयौ।
पूँछ की तरह जुड़ी लंबी चीज।
पूछता है, जिज्ञासा करता है।
न बात पुछातौ- बात तक नहीं पूछता है, जरा भी ध्यान नहीं देता है। उ.-जग मैं जीवत ही कौ नातौ। मन बिछुरैं तन छार होइगौ, कोउ न बात पुछातौ-१-३०२।
अपनी पूजा-सेवा या आदर-सत्कार कराना।
चढ़ावा या पूजन-सामग्री रखने का पात्र।
उ.-(क) दीन्हौ दान बहुत नाना बिधि, इहि बिधि कर्म पुजायौ-९०-५०। (ख) तासु मनोरथ सकल पुजायौ-१०उ.-२८।
परिपूर्ण करो, सफल करो, पूरा करो।
उ.-तुम काहूँ धन दै लै आवहु, मेरे मन की आस पुजावहु-५-३।
उ.- काकैं द्वार जाइ होउँ ठाढ़ौ, देखत काहि सुहाउँ। असरन-सरन नाम तुम्हरौ, हौं कामी, कुटिल,निभाउँ - १-१२८।
संबंध,परंपरा या क्रम बनाये रखना।
(काम या प्रयत्न) करते चलना।
निर्णय करके, ठहराकर, विचार करके, निश्चित करके।
उ.- गर्ग निरूपि कहयौ सब लच्छन, अबिगत हैं अबिनासी-१०-८७।
जिसकी विवेचना हो चुकी हो।
उ.- औरौ सकल सुकृत श्रीपति हित, प्रति-फल-हित सुप्रीति। नाक निरै, सुख-दुख, सूर नहिं, जेहि की भजन प्रतीति-२-१२।
पूजने का भाव, क्रिया या वेतन।
उ.-गोबर्धन की करी पुजाई मोहिं डार्यौ बिसराई- ९७५।
पूरा या सफल करने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
पूरा किया, पूर्ति की, कमी दूर की।
उ.-पांडु-बधू पटहीन सभा मै, कोटिन बसन पुजाए-१-१५८।
पुजापा रखने की थैली या पात्र।
उ.-समुझि सगुन लै चले न ऊधो यह तुमपै सब पुजी अकेली-३१४४।
उ.-आपुहिं देव आपुहीं पुजेरी-१०२९।
[अनु. पुट-पुट छींटा गिरंन का शब्द]
(२) रंग या हलका मेल देने के लिए किसी पतली चीज का रंग में डुबोना।
उ.-ज्यौं बिन पुट गहत न रँग कौ, रंग न रसै परै-३३५८।
[अनु. पुट-पुट छींटा गिरंन का शब्द]
[अनु. पुट-पुट छींटा गिरंन का शब्द]
दोना, कटोरा, गोल गहरा पात्र।
उ.-जलपुट आनि धरी आँगन मैं मोहन नेक तौ लीजै।
दोने या कटोरे के आकार की कोई वस्तु या पात्र।
उ.-(क) लीला-गुन अमृत-रस स्रवननि-पुट पीजै-१-७२। (ख) नाहिंन इतनौ भाग जो यह रस नित लोचन-पुट पीजै-१०-९।
उ.-नील पुट बिच मनौ मोती धरे बंदन बोरि-१०-२२५।
मुँहबंद बरतन में रख कर औषध पकाने का विधान।
इस प्रकार पकायी गयी औषध का सिद्ध रस।
खाली स्थान जिसमें कोई चीज रक्खी जा सके।
उ.-मुक्ता मनौ चुगत खग खंजन, चोंच पुटी न समात-३६६।
[सं. पुटिका, प्रा. पुड़िया]
[सं. पुटिका, प्रा. पुड़िया]
व्रत, अनुष्ठान, धर्म-कार्य।
अनुष्ठान के पूर्व कल्याण के लिए 'पुण्याह' शब्द की तीन बार आवृत्ति।
लकड़ी, मिट्टी, कपड़े की पुरुष-मूर्ति, बड़ा गुड्डा।
[सं. पुत्रक, प्रा. पुत्तल, हिं. पुतला]
(किसी का ) पुतला बाँधना- निंदा करना।
पुत्र के स्थान पर मानी गयी कन्या।
एक यज्ञ जो पुत्रेच्छा से होता है।
पुतरिका, पुतरिया, पुतरी, पुतली
लकड़ी, मिट्टी, कपड़े की स्त्री-मूर्ति, बड़ी गुड़ियाँ।
उ.- हमैं तुम्हैं पुतरी कैं भाइ। देखत कौतुक बिबिध नचाइ-६-५।
पुतरिका, पुतरिया, पुतरी, पुतली
पुतरिका, पुतरिया, पुतरी, पुतली
पुतरिका, पुतरिया, पुतरी, पुतली
पुतली फिरना- (१) आँखें पथराना, मृत्यु होना। (२) घमंड होना।
पोतने की क्रिया या मजदूरी।
मृत्यु के बात फिर जन्मना।
विधवा जिसका पुनः विवाह हो।
सत्ताइस नक्षत्रों में सातवाँ।
फिर, पुनः, पश्चात, बार-बार, दोबारा, अनंतर।
उ.-(क) पांडव कौ , दूतत्व कियौ पुनि, उग्रसेन कौं राज दियौ- १-२६। (ख) गुरुबांधव-हित मिले सुदामहिं, तंदुल पुनि-पुनि जाँचत- १-३१।
पुनि-पुनि- बार-बार। उ.-सूरदास प्रभु कहत हैं पुनि-पुनि तब अति ही सुख पैहैं-२५५३।
उ.-परम पुनीत जानकी सँग लै, कुल-कलंक किन टारौ- ९-११५।
उ.-सेज सँवारि पंथ निसि जोवत अस्त आनि भयो चंद पुन्यो-१९३१।
जीवात्मा। (भागवत के आधार पर शरीर रूपी पुर, उसके नवद्वार और पुरंजन नाम से जीवात्मा के निवास का सूरदास ने वर्णन किया है )
उ.-तन पुर जीव पुरंजन राव, कुमति तासु रानी कौ नाँव- ४-१२।
पुर, घर आदि को तोड़नेवाला।
उ.- लटकि निर्खन लग्यो, मटक सब भूलि गयो-२६०९।
उ.-उपवन बन्यो चहूंघा पुर के अति ही मोकों भावत-२५५९।
उ.-मन मैं यह बिचार करि सुंदरि, चली आरने पुर को-७३८।
उ.-पुरइन कपिश निचोल बिबिध रँग बिहँसत सचु उपजायै।
[सं. पुटकिनी, प्र. पुडइनी, हिं. पुरइनि]
उ.-(क) नँदनंदन तो ऐसे लागे ज्यों जल पुरइन पात-२५१९। (ख) पुइनपात रहत जल भीतर ता रस देह न दागी-३३३५।
[सं. पुटकिनी, प्र. पुडइनी, हिं. पुरइनि]
(मनोरथ, प्रतिज्ञा आदि) पूर्ण या सिद्ध की।
उ.-जन प्रहलाद-प्रतिज्ञा पुरई, सखा बिप्र-दारिद्र हयौ-१-२६।
घर या परिवार का बड़ा-बूढ़ा।
चलता-पुरजा- तेज या चालाक आदमी।
उ.-पर उपकाज हेतु तनु धारयौ पुरवत सब मन साध-१९९०।
(मनोरथ आदि) पूरा या पूर्ण करना।
ग्रामवधू, ग्राम की स्त्रियाँ।
उ.-लज्जित होहिं पुरबधू पूछैं, अंग-अंग मुसकात-९-४३।
पूर्व जन्म का, पूर्वजन्म-संबंधी।
उ.-नहिं अस जनम बारंबार। पुरबलौ धौं पुन्य-प्रगट्यौ लहयौ नर-अवतार-१८८।
उ.-उल्हरि आयो सीतल बूँद पवन पुरवाई-१५६५।
उ.-या रथ बैठि बंधु की गर्जहिं पुरवै को कुरुखेत-१-२९।
उ.-हरि बिनु को पुरवै मो स्वारथ-१-२८७।
जिसे पारितोषिक या उपहार मिला हो।
उ.-(क) यह. बृषभानु-पुरा, ये ब्रज मैं, कहाँ दुहावन आई-७२९। (ख) ब्रज बृषभानु-पुरा जुवतिन को इक इक करि मैं जानौं पृ. ३१३ (२७)।
उ.-चंदन आँगन लिपाइ, मुतियनि चौकैं पुराइ-१०-९५।
उ.-अखिल भुवन जन कामना पुराइ कै-२६२८।
उ.-ताके मन की आस पुराईं-१० उ.-२८।
खाली स्थान भर लै, पुर्ति करूँ।
उ.-माँगत बारंबार सेष ग्वालनि कौ पाऊँ। आपु लियौ कछु जानि, भज्छ करि उदर पुराऊँ-४९२।
उ.-(क) सरदरास तुम आस पुराऊँ। अंकम भरि सबकौं उर लाऊँ-७९७। (ख) अपनी साध पुराऊँ-१४२५।
उ.-अति. अल-सात जम्हात पियारी स्याम के काम पुराए-२११०।
हिंदुओं के प्राचीन धर्माख्यान ग्रंथ जिनकी संख्या १८ है विष्णु, पद्म, ब्रह्म, शिव, भागवत, नारद, मार्कंडेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त्त, लिंग, वाराह, स्कंद, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़, ब्रह्मांड, और भविष्य।
प्राचीन काल संबंधी विद्या।
उ.-बिप्र सुदामा कियौ अजाँची, प्रीति पुरातन जानि-१-१३५।
पूर्व जन्म का, विगत जन्म का।
उ.-अजामील तौ बिप्र तिहारौ हुतौ पुरातन दास। नैंकु चूक तैं यह गति कीनी, पुनि बैकुंठ निवास-१-१३२।
उ.-पुरुष पुरान आनि कियो चतुरानन-४८४।
जिसका अनुभव बहुत दिनों का हो।
पुराना खुर्राट या घाघ- बहुत काइयाँ।
बहुत पहले का, पर अब न हो।
बहुत वर्षा की, बड़ी आयुवाली।
उ.-डसि मानौं नागिनी पुरानी-२६४९।
मंगल अवसरों पर देव-पूजन के लिए आटे, अबीर आदि से चौखूँटे बनाकर।
उ.-गजमोतिनि के चौक पुराय बिच बिच लाल प्रबालिका-१०-८०८।
उ.-चौक मुक्त हल पुरायो आइ हरि बेठे तहाँ- १० उ.-२४।
पुराना इतिहास या वृत्तांत।
उ.-ललिता बिसाखा अँगना लिपावो, चौक पुरावो तुम रोरी-२३९५।
उ.-सकल मनोरथ तेरौ पुरिहै-४-९।
सत्व, रज, तम- इन तीनों गुणों से परे, परमेश्वर।
जो सत्व, रज और तम नामक गुणों से परे हो।
निर्गुण होने की क्रिया या भाव।
वह जो निर्गुण ब्रह्म का उपासक हो।
[सं. निर्गुण + ईया (प्रत्य.)]
उ.-बहुतक जन्म पुरीष-परायन, सूकर-स्वान भयौ-१-७८।
ययाति का पुत्र जिसने पिता को यौवन दिया था।
उ.-ज्यों दूती पर-बधू भोरि कै लै पर-पुरुष दिखावै-१-४२।
सर्वनाम और क्रिया-रूप जिससे सूचित हो कि वह कहने, सुनने अथवा अन्य व्यक्ति में से किसके लिए प्रयुक्त हुआ है (व्याकरण)।
उ.-जा कुल माहिं भक्त मम होई। सप्त पुरुष लैं उधरै सोई।
पुरुष के उद्योग का लक्ष्य या विषय।
उ.-(क) करी गोपाल की सब होइ। जो अपनो पुरुषारथ मानत, अति जूठौ है सोई-१-२६२। (ख) अतिहि पुरुषारथ कियौ उन, कमल दह के ल्याइ-५८६।
एक प्राचीन राजा जिसकी प्रतिष्ठानपुर नामक राजधानी प्रयाग में गंगा के किनारे थी। पुरुरवा इला के गर्भ से उत्पन्न बुध का पुत्र था। उर्वशी एक बार शपवश भूलोक में आ पड़ी थी। तब पुरुरवा ने उससे विवाह किया था। शाप से मुक्त होकर जब वह स्वर्ग चली गयी तब राजा ने बहुत विलाप किया। पश्चात, एकबार पुनः उर्वशी से उनकी भैंट हुई। उर्वशी से उत्पन्न उनके सात पुत्र थे- आयु, अमावसु, विश्वायु, श्रुतायु, दृढ़ायु, वनायु, और शतायु।
पुरेन, पुरेनि, पुरैन, पुरैनि
पुरेन, पुरेनि, पुरैन, पुरैनि
उ.-कह्यौ पुरोहित होत न भलौ। बिनसि जात तेज-तप सकलौ-६-५।
(किसी बात का) पुल बँधना- ढेर लगना।
(किसी बात का) पुल बाँधना- ढेर लगाना।
रोमांच, प्रेम, हर्ष आदि के उद्वेग से पुलकित होना।
उ.-गदगद् सुर, पुलक रोम, अंग प्रेम भीजै-१-७२।
पुलकालि, पुलकावलि, पुलकावली
हर्ष , रोमों का खड़ा होना।
उ.-सूरदास प्रभु बोल न आयो प्रेम पुलकि सब गात-२५३१।
रोमांचयुक्त, गदगद, प्रेम या हर्ष से जिसके रोएँ उभर आये हों।
उ.-लोचन सजल, प्रेम-पुलकित तन, डगर अंचल, कर-माल-१-१८९।
एक ऋषि जिनकी गणना ब्रह्मा के मानस पुत्रों, प्रजापतियों और सप्तर्षियों में हैश। ये कुबेर और रावण के पितामह थे।
एक ऋषि जिनकी गणना ब्रह्मा के मानस पुत्रों, प्रजापतियों और सप्तर्षियों में है।
उ.-जैसोइ पुलिन पवित्र जमुन को तैसोइ मंद सुगंध- पृ. ३१५ (४५)।
जो कई पुश्तों से चला आता हो।
उ.-पुष्कर माल उतार हृदय ते दीनी स्याम-सारा. ५५४।
उ.- जंबु, प्लच्छ क्रौंच, साक, साल्मलि, कुस, पुष्कर भरपुर-सारा. ३४।
वल्लभाचार्य का वैष्णव भक्तिमार्ग।
कामदेव जिसके बाण फूलों के हैं।
पीछे लगा रहनेवाला, पिछलग्गा।
उ.- दोनो मेलि धरे हैं खूआ। हौंस होइ तौ ल्याऊँ पूआ-३९६।
जिसे गंदी वस्तुओं और बुरे कामों से घुणा न हो।
उ.- निर्घिन, नीचे, कुलज, दुर्बुद्धी, भोंदू, नित कौ रोऊ-१-१२६।
उ.-पुहुकर पुंडरीक पूरन मानो खंजन केलि खगे- पृ. ३५०(६४)।
उ.- देखि यह सुरनि वर्षा करी पुहुप की-७-६।
उ.- बीच माली मिल्यौ, दौरि चरननि पर्यौ, पुहुपमाला स्याम कंठ धारयौ-२५८८।
उ.- छाल सुगंध सेज पुहुपावलि हारू छुए ते हिय हारू जरैगौ-२८७०।
उ.- (क) तब न कंस निग्रह्यौ पुहुमि को भार उतारयौ-११३९। (ख) चोंच एक पुहुमी लगाई, इक अकास समाई-४२७।
पूछता है, जाँच-पड़नाल करता हूँ।
उ.- जाति-पाँत कोइ पूछत नाहीं श्रीपति कैं दरबार-१-२३१।
उ.- बानी सुनि बलि पूछन लागे, इहाँ बिप्र कत आवन-८-१३।
शुभ कर्म के पूर्व गणेश का पूजन।
पूजा करता है, देवी देवता के प्रति श्रद्धा प्रकट करता है।
उ.- फल माँगत फिरि जात मुकर ह्वौ, यह देवन की रीति। एकनि कौं जिय-बलि दै पूजे, पूजत नैंकु न तूटे-१-१७७।
उ.- ये सब पतित न पूजत मों सम, जिते पतित तुम हारे-१-१७९।
उ.- गौरी-पति पूजतिं ब्रजनारी-७६६।
देवी-देवता की सेवा, वंदना या अर्चना।
देवी-देवात की सेवा, वंदना या अर्चना करना।
[सं. पूर्यते, प्रा. पूज्जति]
गहरे स्थान का भरकर समतल हो जाना।
[सं. पूर्यते, प्रा. पूज्जति]
[सं. पूर्यते, प्रा. पूज्जति]
[सं. पूर्यते, प्रा. पूज्जति]
उ.- अब तुम भवन जाहु पति पूजहु परमेश्वर की नाई-पृ. ३४१ (७०)।
देवी-देवता की वंदना अर्चना।
उ.- जोग न जुक्ति, ध्यान नहिं पूजा बिरध भएँ पछितात -२-२२।
देवी-देवता पर जल, फल-फूल आदि चढ़ाना।
प्रसन्न करने का प्रयत्न करना।
उ.- (क) करन देहु इनकी मोहिं पूजा, चोरी प्रगटत नाम-३७६। (ख) सूर सबै जुबतिन के देखत पूजा करौं बनाइ-११२५।
पूरा करके, बहुत अधिक भरकर, बराबर करके।
उ.- करत बिबस्त्र द्रुपद-तनया कौं सरन सब्द कहि आयौ। पूजि अनंत कोटि बसननि हरि, अरि कौ गर्ब गँवायौ-१-१९०।
किसी देवी-देवात की वंदना के लिए कोई कार्य किया, अर्चना की।
उ.- एकनि कौं जिय-बलि दै पूजे, पूजत नैंकु न तूटे-१-१७७।
उ.- (क) जो ऊजर खेरे के देवन को पूजै को मानै-३४०६। (ख) नँदनंदन ब्रत छाँड़ि कै को लखि पूजै भीति-३४४३।
बराबरी, समता या तुलना कर सके, बराबर, समान या तुल्य हो सके।
उ.- (क) राम-नाम-सरि तऊ न पूजै जौ तनु गारौ जाइ हिबार-२-३। (ख) नान्हीं एड़ियनि अरूनता, फल-बिंब न पूजै-१०-१३४।
समान, तुल्य या बराबर हो सका।
उ.- हिरन्याच्छ इक भयौ, हिरनकस्यप भयौ दूजौ। तिन के बल कौं इंद्र, अरून, कोऊ नाहिं पूजौ-३-११।
पूज्य या मान्य होने का भाव।
उ.- कालिहिं पूज्यौ फल्यौ बिहाने-१०५१।
एक दानवी जो कंस की आज्ञा से, स्तनों पर विष मलकर, बालकृष्ण को मारने आयी थी। श्रीकृष्ण ने इसका रक्त चूसकर इसी को मार डाला था।
पवित्र या शुद्ध चित्तवाला।
उ.- (क) ऐपन की सी पूतरी (सब) सखियनि कियौ सिंगार-१०-४०। (ख) इक टक भईं चित्र पूतरि ज्यों जीवनि की नहिं आश-२०५२। (ग) ए सब भई चित्र की पुतरी सून सरीरहिं डाहत-३०६५।
उ.- मै हूँ अपनैं औरस पूतैं बहुत दिननि मैं पायौ-१०-३३९।
धुनकी हुई रूई की मोटी बत्ती।
उ.- (क) चैत्र मास पूनो को सुभ दिन सुभ नक्षत्र सुभ बार-सारा. ६४१। (ख) पून्यौ प्रगटी प्रानपति हरि होरी है-२४२२।
उ.- बिषयी भजे, बिरक्त न सेए, मन धन-धाम धरे। ज्यों माखी, मृग मद-मंडित तन परिहरि पूय परै-१-१९८।
प्राणायाम विधि के तीन भागों में पहला।
उ.- सब आसन रेचक अरू पूरक कुंभक सीखे पाइ-३१३४।
मृतक के दसवें को दिये जानेवाले दस पिंड।
भरने या पूर्ण करने की क्रिया।
उ.- सूर पूरण ब्रह्म निगम नाहीं गम्य तिनहिं अक्रूर मन यह बिचारै-२५५१।
जिसकी सब इच्छाएँ पूरी हो गयी हों।
उ.- पूरणता तो तबहीं बूड़ी संग गए लै चित को-३३३९।
उ.- सूर स्याम बंशी ध्वनि पूरत श्रीराधा राधा लै नाम-१३२७।
जिसमें शब्द या आवाज न हो।
(इच्छा, मनोरथ, आदि) पूर्ण करनेवाले, पूरा करनेवाले।
उ.- कहा कमी जाके राम धनी। मनसा नाथ, मनोरथ पूरन, सुखनिधान जाकी मौज घनी-१-३९।
उ.- गायौ स्वपच परम अब पूरन, सुत पायौ बाम्हन रे-१-६६।
पूर्ण, जिसमें कोई कमी न हो।
उ.- तुम सर्वज्ञ सबै बिधि पूरन अखिल भुवन निज नाथ-१-१०३।
एक प्रकार का मीठा या नमकीन चूर्ण जो गुझिया समोसे आदि में भरा जाता है।
उ.- गूझा बहु पूरन पूरे-१०-१८३।
मंगल अवसर पर देव-पूजन के लिए चौक आदि बनाना।
यज्ञ की अंतिम आहुति, जिसे देकर होम समाप्त करते हैं।
उ.- नृप कह्यौ, इन्द्रपुर की न इच्छा हमैं, रिषिनि तब पूरनाहुता दीयौ-४-११।
उ.- जज्ञ कराइ प्रयाग न्हवायौ तौहूँ पूरब तन नहिं पायौ-६-८।
उ.- लंका दई बिभीषन जन कौं पूरबली पहिचानि-१-१३५।
उ.- सारंग नट पूरबी मिलौ कै राग अनूपम गाऊँ-पृ. ३११ (११)।
जिसमें कोई कमी या कसर न हो।
पूरा पड़ना- (१) काम पूरा हो जाना। (२) सामग्री आदि न घटना, अँट जाना। (३) जीवन निर्वाह होना।
तली या घी में उतारी हुई रोटी।
उ.- सद परसि धरी घृत-पूरी।
ढोल आदि पर मढ़ा हुआ चमड़ा।
पूरा किया, भर दिया, बहुत अधिक एकत्र किया।
उ.- (क) दुखित द्रौपदी जानि जगतपति, आए खगति त्याज। पूरे चीर भीरू तन कृष्ना, ताके भरे जंहाज-१-२५५। (ख) पूरे चीर, अंत नहिं पायौ, दुरमति हारि लही-१-२५८।
उ.- गूझा बहु पूरन परे-१०-१८३।
उ.- कोउ मुरली कोउ बेनु सब्द सृंगी कोउ पूरैं-४३१।
उ.- बाँधि पची डोरी नहिं पूरै-३९१।
पूरा, संपूर्ण, जिसमें कमी या कसर न हो।
उ.- जौ रीझत नहिं नाथ गुसाईं, तौ कत जात जँच्यौ। इतनी कहौ, सूर पूरौ दै, काहैं मरत पच्यौ-१-१७४।
पूरौ पायौ- पूरी सफलता मिली, अच्छी तरह काम हुआ। उ.- सूर अनेक देह धरि भूतल, नाना भाव दिखायौ। नाच्यौ नाच लच्छ चौरासी, कबहूँ न पूरौ पायौ-१-२०५।
जिसकी कोई इच्छा या कमी न हो।
शुक्ल पक्ष का अंतिम दिन जब पूर्ण चंद्रोदय होता है।
वह उपमा जिसमें उसके चारो अंग - उपमेय, उपमान, वाचक और धर्म- हों।
कमी या अभाव को पूरा करने की क्रिया।
उ.- सेसनाग के ऊपर पौढ़त तेतिक नाहिं बड़ाई। जातुधानि-कुच-गर मर्षत तब, तहाँ पूर्नता पाई-१-२१५।
पूर्वकाल का, पूर्वकाल-संबंधी।
वह अपूर्ण क्रिया जिसका काल, दूसरी पूर्ण क्रिया के पहले पड़ता हो।
सबेरे से दोपहर तक का काल।
नायक-नायिका में संयोग के पूर्व ही प्रेम होने की स्थिति।
२७ नक्षत्रों में से ग्यारहवाँ।
नायक-नायिका के मिलने के पूर्व प्रेम होना।
(व्रत आदि) जिसमें जल भी न ग्रहण किया जाय।
उ.- मानहु काम अग्नि निर्ज्वाला भई-२३०८।
वेणु के पुत्र जिनकी उत्पत्ति पिता के मृत शरीर को हिलाने से हुई थी।
उ.- पृथु नितंब कर भीर कमलपद नखमनि चंद्र अनूप-पृ. ३५० (६४)।
उ.- हिरन्याच्छ तब पृथी कौं लें राख्यौ पाताल।¨¨¨¨। तब हरि धरि बाराह बपु, ल्याए पृथी उठाइ-३-११।
पंच भूतों या तत्वों में एक जिसका प्रधान गुण गन्ध है।
उ.- उतानपाद पृथ्वीपति भयौ-४-९।
एक राजा की रानी का नाम जिसके गर्भ से श्रीकृष्ण जन्मे थे।
उ.- पृश्नी गर्भ देव-ब्राह्मन जो कृष्ण रूप रंग भीन्हों-सारा. ३६७।
उ.- पृष्ठभाग चढ़ि जनक-नंदिनी, पौरूष देखि हमार-९-८९।
झूले को बढ़ाने के लिए दिया गया तेज झोंका।
झूले का एक ओर से दूसरी को तेजी से जाना।
उ.- लटपट पेंच सँवारति प्यारी अलक सँवारत नंदकुमार-१६०६।
[सं. प्रेक्षक, प्रा. प्रेक्खक]
उ.- मनौकमल-दलसावक पेखत, उड़त मधुप छबि न्यारी-१०-९१।
उ.- छूटे बंदन अरू पाग की बाँधनि छुटी लटपटे पेच अटपटे दिए-२००९।
कुश्ती में पछाड़ने की युक्ति।
एक आभूषण जो पगड़ी में खोंसा जाता है, सिरपेच।
बहुत घुमाव-फिराव या पेच वाला।
उ.- मल्लजुद्ध नाना बिधि क्रीड़ा राजद्वार को पेखन-सारा. ५०८।
[सं. प्रेक्षण, प्रा. पेक्खण]
उ.- बैठी सकुच, निकट पति बोल्यौ, दुहुँनि पुत्र-मुख पेखा-१०-४।
उ.- प्राची दिखा पेखि पूरण ससि ह्वै आयौ तातो-१० उ.-१००।
उ.- दधि बेचन जब जात मधुपुरी मैं नीके करि पेखी-२८७८।
उ.- बलमोहन को तहाँ न पेखे-२६६०।
उ.- कहुँ कछु लीला करत कहूँ कछु लीला पेखे-१० उ.-४७।
उ.- कहति रही तब राधिका जब हरि संग पेखो-१५२८।
उ.- ज्ञानियनि मैं न आचार पेखौं-८-८।
उ.- जैसोई स्याम बलराम श्री स्यंदन नढ़े वहै छबि कुँवर सर माँझ पेख्यौ-२५५४।
पेट का कुत्ता- भोजन के लिए सब कुछ करनेवाला।
पेट काटना- बचत के लिए कम खाना या खिलाना।
पेट का पानी न पचना- रह न पाना, कल न पड़ना।
पेट का पानी न हिलना- जरा भी मेहनत न पड़ना।
पेट का हलका- जिसमें गंभीरता न हो।
पेट की आग- भूख।
पेट की आग बुझाना- भूख दूर करना।
पेट की बात- गुप्त भेद।
पेट की मार देना (मारना)- (१) भोजन न देना। (२) जीविका ले लेना।
पेट के लिए दौड़ना- जिविका के लिये ही परिश्रम करना।
पेट को धोखा देना- बचत के लिए कम खाना या खिलाना।
पेट दिखलाना- (१) दीनता दिखाना। (२) भूखे होने का संकेत करना।
पेट को लगना- भूख लगना।
पेट जलना- (१) बहुत भूख लगना। (२) बहुत-असंतुष्ट होना।
पेट दिखाना- भूखे होने का संकेत करना।
पेट देना- मन की बात बताना।
पेट दियो- मन का भेद बता दिया। उ. अपनो पेट दियौ तैं उनको नाक बुद्धि तिय सबै कहैं री-१६६०।
पेट पाटना- अच्छा-बुरा खाकर पेट भर लेना।
पेट पालना- जीवन निर्वाह करना।
पेट पीठ एक हो (से लगना) जाना- (१) बहुत दुबला होना। (२) बहुत भूखा होना।
पेट फूलना- भेद बताने के लिए बहुत व्याकुल होना।
पेट मारना- बचत के लिए कम खाना।
पेट मारकर मरना- आत्म-घात करना।
पेट में आँत न मुँह में दाँत- बहुत बूढ़ा।
पेट में खलबली पड़ना- बहुत चिंता या घबराहट होना।
पेट में चूहे कूदना (दौड़ना) या (चूहों का कलाबाजी खाना)- बहुत भूख लगना।
पेट में दाढ़ी होना- बचपन में ही बहुत चालाक होना।
पेट में डालना- खा लेना।
पेट में दाँत या पाँव होना- बहुत चालबाज होना।
पेट में होना- गुप्त रूप से होना।
पेट मोटा हो जाना- बहुत रिश्वत लेना।
पेट लगना (लग जाना)- बहुत भूखा होना।
पेट से पाँव निकालना- (१) कुमार्ग में लगना। (२) बहुत इतराना।
एक ही पेट के होना- समान प्रकृति या स्वभाव के होना। उ.- ए सब दुष्ट हने हरि जेते भए एक ही पेट -२७०३।
भरि पेट- जी भर कर। उ.- होड़ा-होड़ी मनहिं भावते किए पाप भरि पेट-१-१४६।
पेट की आग - संतान की ममता।
पेट ठंढा होना- संतान का जीवित और सुखी रहना।
पेट में घुसना- भेद लेने के लिए मेल-जोल बढ़ाना।
पेट में डालना- बात मन में रखना।
पेट में पैठना (बैठना)- भेद लेने को मेल-जोल बढ़ाना।
पेट में होना- मन में होना।
पेट का वह स्थान जहाँ त्रिबली होती है।
सफेद रंग का कुम्हड़ा जिसका प्रायः मुरब्बा बनता है।
उ.- पेठापाक, जलेबी, कौरी,। गोंदपाक, तिनगरी, गिंदौरी -१०-३९६।
वृक्ष की पींड़, पेड़ का तना।
उ.- कहौ तौ सैल उपारि पेड़ि तैं, दै सुमेरू सौं मारौं-९-१०७।
नाभि के कुछ नीचे का स्थान।
[सं. पयःस्रधन, प्रा. पह्णवन]
पीने योग्य, जो पिया जा सके।
गाय के ब्याने के सात दिन बाद तक का दूध।
उ.- सखा जीतत स्याम जाने तक करी कछु पेल-१०-२४४।
दोष या दोषी न होने का भाव।
[सं. निर्दोष + ता (प्रत्य.)]
जिसकी रोक-टोक करनेवाला न हो।
उ.- पेला करति देत नहिं नीके तुम हो बड़ी बँजारिनि।
उ.- घात मन करत लै डारिहौं दुहुँनि पर दियो गज पेलि आपुन हँकारयों-२५९२।
उ.- एक दिवस हरि खेलत मो सँग झगरौ कीन्हौं पेलि-२९२७।
उ.- इंद्रहि पेलि करी गिरि पूजा सलिल बरषि ब्रज नाऊँ मिटावहिं-९४७।
उ.- रावन भेष धरयौ तपसी कौ, कत मैं भिच्छा मेली। अति अज्ञान मूढ़-मति मेरी, राम-रेख पग पेली-९-९४।
टालो, अवज्ञा करो, अस्वीकार करो।
उ.- बोलि लेहु सब सखा संग के मेरौ कह्यौ कबहुँ जिनि पेलौ-३९९।
करणसूचक विभक्ति, से, द्वारा।
उ.- जाँचक पैं जाँचक कह जाँचै ? जो जाँचै तौ रसना हारी-१-३४।
पैर में पहनने का झाँझ की तरह का एक गहना जों झुनझुन बोलता है।
उ.- कटि किंकिनि, पग पैंजनि बाजै-१०-११७।
[सं. पण्यस्थान, प्रा. पणठठा, अप पइँट्टा]
उ.- होतौ नफा साधु की संगति, मूल गाँठि नहिं टरतौ। सूरदास बैकुंठ-पैंठ मैं, कोउ न फैंट पकरतौ-१-२९७।
[सं. पण्यस्थान, प्रा. पणठठा, अप पइँट्टा]
उ.- ऊधौ तुम ब्रज मैं पैंठ करी। लै आए हो नफा जानिकै सबै बस्तु अकरी-३२०४।
[सं. पण्यस्थान, प्रा. पणठ्ठा, अप पइँट्टा]
[सं. पण्यस्थान, प्रा. पणठठा, अप पइँट्टा]
किसी वस्तु का ऊपरी और आगे का भाग।
उ.- (क) तीनि पैंड़ बसुधा हौ चाहौं, परनकुटी कौं छावन-८-१३। (ख) जै-जैकार भयौ भुव मापत, तीनि पैंड़ भई सारी। आध पैंड़ बसुधा दै राजा, ना तरू चलि सत हारी-८-१४।
[हिं. पायँ + ड़ [प्रत्य.] अथवा सं. पाददंड, प्रा. प्रायडंड]
[हिं. पायँ + ड़ [प्रत्य.] अथवा सं. पाददंड, प्रा. प्रायडंड]
उ.- पैंड़े चलत न पावै कोऊ रोकि रहत लरकन लै डगरी-८५४।
पैंड़े पड़ना (परना)- बार बार तंग करना।
पैड़े परे- पीछे पड़े हैं, तंग करते हैं। उ.- मानत नाहिं हटकि हारीं हम पैंड़े परे कन्हाई।
दियौ उन पैंड़ौ- उन्होंने जाने दिया, आगे बढ़ने का मार्ग दिया। उ. - तब मैं डरपि कियौ छोटौ तनु पैठ्यौ उदर-मँझारि। खरभर परी, दियौ उन पैंड़ौ, जीती पहिली रारि-९-१०४।
[सं. पवित्र, प्रा. पवित्त, पइत्त]
[सं. पवित्र, प्रा. पवित्त, पइत्त]
उ.- बरजत बार-बार हैं तुमकौ पै तुम नेक न मानौ।
उ.- ऊधौ, स्याम कहा पावैंगे प्रान गए पै आए।
उ.- निस्चय करि सो तरै पै तरै-६-४।
जो पै - यदि, अगर। तो पै - तो फिर, उस दशा में।
उ.- (क) परतिज्ञा राखी मनमोहन फिर तापै पठ्यौ। (ख) वा पै कही बहुत बिधि सौं हम नेकु न दीनों कान।
[सं. प्रति, प्रा. पडी, पइ; हिं. पास, पहँ]
[सं. प्रति, प्रा. पडी, पइ; हिं. पास, पहँ]
पर, ऊपर, अधिकरण-सूचक बिभक्ति।
उ.- (क) षोड़स अंगनि मिलि प्रजंक पै छ-दस अंक फिरि डारै-१-६०। (ख) निहचै एक असल पै राखै, टरै न कबहूँ टारै-१-१४२।
करण-सूचक विभक्ति, से, द्वारा।
उ.- दीन दयालु कृपालु कृपानिधि कापै कह्यौं परै।
उ.- (क) तीन पैग बसुधा दै मोकों। तहाँ रचौं ध्रमसारी। (ख) कबहुँक तीनि पैग भुव मापत, कबहुँक देहरि उलँघि न जानी-१०-१४४।
प्रतिज्ञा, प्रण, टेक, हठ।
उ.- (क) राखी पैज भक्त भीषम की, पारथ कौ सारथी भयौ-१-२६। (ख) पैज करो हनुमान निसाचर मारि सीय सुधि ल्याऊँ। (ग) पैज करि कही हरि तोहि उबारौं।
[सं. प्रतिज्ञा, प्रा. प्रतिज्ज, अप. पइज्जँ]
प्रतिद्वंद्विता, होड़, लागडाट।
उ.- सहस बरस गज जुद्ध करत भए, छिन इक ध्यान धरै। चक्र धरे बैकुंठ तैं धाए, वाकी पैज सरै-१-८२।
[सं. प्रतिज्ञा, प्रा. प्रतिज्जा, अप. पइज्जाँ]
उ.- अरून चरन नख-जोति, जगमगति, रून-झुन करति पाइँ पैजनियाँ-१०-१०६।
[सं. प्रविष्ठ, प्रा. पइट्ठ]
[सं. प्रविष्ठ, प्रा. पइट्ठ]
उ.- सूर प्रभु सहर पठार पहुँचे आइ धनुष के पास जोधा रखाए-२५६३।
घुसकर, प्रविष्ट होकर, प्रवेश करके।
उ.- (क) सकल सभा मैं पैठि दुसासन अंबर आनि गह्यौ-१-२४७। (ख) अपने मरबे ते न डरत है पावक पैठि जरै-२८००।
घुसे, प्रविष्ट हुए, प्रवेश किया।
उ.- सुंन्दर गऊ रूप हरि कीन्हौ। बछरा करि ब्रह्मा सँग लीन्हौ। अमृत-कुंड मैं पैठे जाइ। कह्यौ असुरनि, मारो इहिं गाइ-७-७।
घुसा, प्रविष्ट हुआ, प्रवेश किया।
उ.- (क) धर-अंबर लौं रूप निसाचरि, गरजी बदन पसारि। तब मैं डरपि कियौ छोटौ तनु, पैठ्यो उदर-मँझारि-९-१०४। (ख) अंचल गाँठि दई, दुख भाज्यो, सुख जु आनि उर पैठ्यो-९-१६४।
उ.- सूर स्याम पाए पैड़े में, ज्यौं पावै निधि रंक परी-१०-८०।
पैड़ै परे- पीछे पड़े हैं, बहुत तंग करते हैं। उ.- मानत नाहिं हटकि हारी हम पैंड़े परे कन्हाई।
बार करने या बचाने की मुद्रा।
[सं. पदांतर, प्रा. पयांतर]
[सं. पदांतर, प्रा. पयांतर]
उ.- रैता, पैता, मना, मनसुखा, हलधर संगहिं रैहौं-४१२।
बिना सवारी के, पैर-पैर ही चलनेवाला।
सिद्धांत से परिणाम निकालना।
उ.- चलित कुंडल गंड-मंडल, मनहुँ निर्तत मैन-१-३०७।
उ.- सोभित अंग तरंग त्रिसंगम, धरी धार अति पैनी-९-११।
(कर) पाना, (कर) सकना, संपादित करना।
उ.- चोली चीर हाट लै भाजत, सों कैसैं करि पैबौं-७७९।
उ.- गोबर्धन कहुँ गोप बृंद सचु कहा गोरस सचु पैबौ-३३७२।
पाता है, प्राप्त करता है, लाभ करता है।
उ.- अब कैसैं पैयत सुख माँगे-१-६१।
उ.- मन-मंत्री सो रथ हँकवैया। रथ तन, पुन्य-पाप दोउ पैया-४-५२।
उ.- अरबराइ कर पानि गहावत डगमगाइ धरनी धरै पैया-१०-११५।
उ.- सूर स्याम अतिहीं बिरूझाने, सुर-मुनि अंत न पैया री-१०-१८६।
[सं. पद + दड, प्रा.पयदंड, अप. पयँड़]
[सं. पद + दड, प्रा.पयदंड, अप. पयँड़]
उ,- कहा जानै दादुर जल पैरत सागर औ सम कूप-३३७९।
पक्ष के समर्थन की दौड़-धूप।
नाँद की बनावट का बड़ा ढक्कन।
उ.- स्याम सब भाजन फोरि पराने। हाँकि देत पैठत है पैला नेकु न मनहिं डराने।
मिट्टि का नाँद की तरह का बड़ा पात्र जो ढकने के काम आता है।
[सं. पातिली, प्रा. पाइली]
पैवंद लगाना- अधूरी या अपूर्ण वस्तु या बात को वैसा ही मेल मिलाकर पूरा करना।
आठ प्रकार के विवाहों में एक जो सोती कन्या का हरण करके या छल से किया जाय।
[सं. प्रविश, प्रा. पइस + ना]
बल्लियों का सीढ़ीदार जीना।
तैरकर, पानी में हाथ-पैर चलाकर।
उ.- भवसागर मैं पैरि न लीन्हौ-१७५।
तैरता रहा, पानी में हाथ-पैर लगाकर चलता रहा।
उ.- जल औंड़े मैं चहुँ दिसि पैरयौ, पाँउ कुल्हारौ मारौ-१-१५२।
ताँबे का सिक्का जो पहले रूपए का चौसठवाँ भाग था और अब सौवाँ है।
पैसा उठना- धन खर्च होना।
पैसा उठाना- फिजूल खर्ची करना।
पैसा कमाना- रूपया पैदा करना।
पैसा डूबना- घाटा होना।
पैसा ढो ले जाना- दूसरे देश का धन अपने देश ले जाना।
पैसा धोकर रखना- मनौती मानकर पैसा रख देना।
उ.- करि बरिआइ तहाँऊँ पैसी-२४३८।
उ.- पँचरँग सारी मँगाइ, बधू जननि पैहराइ, नाचैं सब उमँगि अंग, आनंद बढ़ावो-१०-९५।
लगी या सनी चीज को हाथ, कपड़े आदि से हटाना।
[सं. प्रोञ्छन, प्रा. पोंछन]
गर्द आदि को हाथ, कपड़े आदि से रगड़कर सुखाना। गीली चीज को सुखी से रगड़कर सुखाना।
[सं. प्रोञ्छन, प्रा. पोंछन]
उ.- आँसू पोंछि निकट बैठारी-१०-३२।
गीली चीज को सूखी से रगड़कर सुखाना।
उ.- बदन पोंछियौ जल-जमुन सौं धाइकै-४४०।
पड़ी हुई गर्द आदि को झाड़ती है, या दूर करती है।
उ.- लै उठाइ अंचल गहि पोंछै, धूरि भरी सब देह-१०-१११।
उ.- ईषद हास, दंत-दुति बिकसित, मानिक मोती धरे जनु पोइ-१०-२१०।
रह्यौ पोइ- पिरोया हुआ है।
उ.- कंचन कौ कठुला मनि-मोतिनि, बिच बधनहँ रह्यौ पोइ-१०-१४८।
उ.- सुख सौं बसत राज उनकैं सब। दुख पै हैं सो सकल प्रजा अब-१-२९०।
पायेगा, लाभ करेगा, प्राप्त करेगा।
उ.- अजहूँ मृढ़ करौ सतसंगति, संतनि मैं कछु पैहै-१-८६।
उ.- बंसी बट तट ग्वालनि कैं सँग खेलत अति सुख पैहौं-४१२।
उ.- कैसेहुँ आज जसोदा छाँड़यो, काल्हि न आवन पैहौं-४१५।
उ.- (क) हरि-संतनि कौ कह्यौ न मानत, क्यौ आपुनो पैहौ-१-३३५। (ख) मुख माँगो पैहौ सूरज प्रभु साहुहि आनि दिखावहु-३३४०।
काछती है, (गीला बदन) पोंछती है।
उ.- तनक बदन, दोउ तनक-तनक कर, तनक चरन, पोंछति पट झोल-१०-९४।
[सं. पुष्कर, प्रा. पुक्खर.]
पाँच से दस वर्ष की अवस्था का बालक।
छोटा, बड़ा या अधिक अंगवाला व्यक्ति।
तुच्छ, बुरा, क्षुद्र, निकृष्ट।
उ.- (क) माधौ जू, मन सबही बिधि पोच। अति उन्मत्त, निरंकुस, मैगल, चिंता-रहित, असोच-१-१०२। (ख) कौन निडर कर आपको को उत्तम को पोच। (ग) जाहि बिन तन प्रान छाँड़े कौन बुधि यह पोच-८८९।
उ.- सूर-दास स्वामी करूनामय, स्याम-चरन, मन पोइ-१-२६२।
उ.- काल जमनि सौं आनि बनी है, देखि देखि मुख रोइसि। सूर स्याम बिनु कौन छुड़ावै, चले जाव भाई पोइसि-१-३३३।
उ.- (क) पोई परवर फाँग फरी चुनि-२३२१। (ख) चौराई लाल्हा अरू पोई-३९६।
उ.- सरस कनिक बेसन मिलै रूचि रोटी पोई-१५५५।
उ.- कंचन को कँठुला मन मोहत तिन बघनहा बिच पोई।
पोटा तर होना- धन से बेफिक्र होना।
जो नियत या ठहराया जा चुका हो।
जी पोढ़ा करना- दुख आदि से विचलित न होना।
[सं. प्रवृत्ति, प्रा. पउत्ति]
[सं. प्रवृत्ति, प्रा. पउत्ति]
काँच की गुरिया का दाना जो कई रंगों का होता है।
उ.- (क) झीनी कामरि काज कान्ह ऐसी नहिं कीजै। काँच पोत गिर जाइ नंद घर गथौ न पूजौ-१११७। (ख) यह मत जाइ तिन्हें तुम सिखवौ जिनहीं यह मत सोहत। सूर आज लौं सुनी न देखी पोत सूतरी पोहत-३१२२।
गीली तह चढ़ाना, चुपड़ना, मिट्टी, गोबर आदि का घोल चढ़ाना।
[सं. प्लुत, प्रा. पुत + ना]
उ.- मन महतो करि कैद अपने मैं, ज्ञान-जहतिया। लावै। माँड़ि- माँड़ि खरिहान क्रोध कौ, पोता भजन भरावै-१-१४२।
उ.- कंचन काँच कपूर कपर खरी, हीरा सम कैसे पोति बिकात री-२५०९।
(शरीर पर) मले हुए, लगाए हुए, लेसकर।
उ.- तब तू गयौ सून भवन, भस्म अंग पोते। करते बिन प्रान तोहिं, लछिमन जौ होते-९-९७।
[सं. पुस्तिका, प्रा. पोत्थिआ]
[सं. पूप, हिं. पूवा + ना]]
[सं. पूप, हिं. पूवा + ना]]
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोय + ना]
उ.- सूर आँखि मजीठ कीनी निपट काँची पोय।
उँगली की गाँठों के बीच की जगह।
ईख आदि की गाँठों के बीच का भाग।
उ.- (सं.) निकसे सबै कुँअर असवारी उच्चैः- स्रवा के पोर-१० उ.-६।
उ.- बोलि लिए सब सखा संग के, खेलत कान्ह नंद की पोरि-६९९।
उ.- रोटी, बाटी, पोरी, झोरी। इक कोरी, इक घीव चभोरी-३९६।
पोल खुलना- दोष या बुराई प्रकट होना। दोष या बुराई प्रकट करना
[सं. प्रतोली, प्रा. पओली]
[सं. प्रतोली, प्रा. पओली]
उ.- प्रभु तेरौ बचन भरोसौ साँचौ। पोषन भरन बिसंभर साहब, जो कलपै सो काँचौ-१-३२।
उ.- ऐसे मिल्यो जाइ मोको तजि मानहुँ इनहीं पोषि जयौ री-१४६६।
पालने (के लिए) पालन-पोषण (के हेतु)
उ.- अपनौ पिंड पोषिबैं कारन, कोटि सहस जिय मारे-१-३३४।
उ.- राजकाज तुमते न सरैगौ काया अपनी पोषु-३०२६।
उ.- पोषे नाहिं तुव दास प्रेम सौं, पोष्यौ अपनौ गात्र-१-२१६।
उ.- अधर सुधा मुरली की पोषे योग-जहर कत प्यावे रे -३०७०।
उ.- पोषैं ताहि पुत्र की नाई-५-३।
पालन करती है, पालती-पोषती है।
उ.- जैसैं जननि जठर अंतरगत सुत अपराध करै। तौऊ जतन करै अरू पोषै, निकसैं अंक भरै-१-११७।
पालन किया, पाला, पाला-पोषा।
उ.- वैसी आपदा तैं राख्यौ, तोष्यौ, पोष्यौ, जिय दयौ, मुख-नासिका नयन-सौन-पद पानि-१-७७।
उ.- यह अचरज है अति मेरे जिय, यह छाँड़न वह पोसन।
(पशु को) दाना-पानी देकर रखना।
उ.- सूर आजु लौं सुनी न देखी पोत सूतरी पोहत-३१२२।
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोय + ना]
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोय + ना]
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोय + ना]
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोय + ना]
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोय + ना]
[सं. प्रोत, प्रा. पोइअ, पोय + ना]
जो पलक न गिराये, जिसमें पलक न गिरे।
क्रम निभना या उसका पालन होना।
उ.- सोई तुम उपदेशहू जो लहैं पद निर्बान-२९२४।
उ.- (क) सूर प्रभु उर लाइ लीन्हों प्रेम-गुन करि पोहि-पृ. ३५२ (८०)। (ख) अपने हाथ पोहि पहिरावत कान्ह कनक के मनियाँ-२८७९।
उ.- पहिले पूतना कपट करि आई स्तननि विष पोहि-२५१५।
उ.- सूरस्याम यह प्रान पियारी उर मैं राखी पोहि।
उ.- लटकन लटकि रहे भ्रू-ऊपर, रँग-रँग मनि-गन पोहे री। मानहुँ गुरू-सनि-सुक्र एक ह्वै, लाल भाल पर सोहै री-१०-१३९।
पुँड्र देश का राजा जो जरासंध का संबंधी था।
उ.- तछक धनंजय देवदत्त अरू पौंड्रक शंख द्युमान-सारा. ९।
उ.- मुरली तऊ गुपालहिं भावति।¨¨¨। आपुन पौढ़ि अधर सज्जा पर, कर-पल्लव पलुटावति-६५५।
उ.- निदरि पोरिया जाय नृप पैं पुकारे-२६११।
[सं. प्रभा, प्रा. पव, पउ]
पौ फटना- सबेरा या तड़का होना।
पाँसे की एक चाल या दाँव। पाँसा फेकने पर जब ताक या दस, पचीस, तीस आते हैं तब पौ होती है।
उ.- बाल, किसोर, तरून, जर, जुग सो सुपक सारि ढिग ढारी। सूर एक पौ नाम बिना नर पिरि फिरि बाजी हारी-१-६०।
[सं. पट, प्रा. पव=कदम, डग]
पौ बारह पड़ना- जीत का दाँव आना।
पौ बारह होना- जीत का दाँव पड़ना, जीत होना।
[सं. पाद, प्रा. पाय, पाव]
उ.- सेसनाग के ऊपर पौढ़त, तेतिक नाहिं बढ़ाई-२१५।
[सं. प्लवन, प्रा. पव्वलन]
उ.- सूर स्याम कछु करौ बियारी, पुनि राखौं पौढ़ाइ-१०-२२६।
उ.- उठहु लाल कहि मुख पखरायौ, तुमकौं लै पौढ़ाऊँ-१०-२३०।
उ.- पौढ़ाए हरि सुभग पालनैं-१०-५०।
उ.- चंदन अगर सुगंध और घृत, बिधि करि चिता बनायौ। चले बिमान संग गुरू-पुरजन, तापर नृप पौढ़ायौ-९-५०।
उ.- मैं घर पौढ़ी आइ-१०-३२२।
उ.- (क) तुरत जाइ पौढ़े दोउ भैया-१०-२३०। (ख) पौढ़े हुते प्रयंक परम रूचि रूक्मिणि चमर डुलावति तीर-।
मूर्छित हुए, मरकर गिर पड़े।
उ.- पौढ़ै कहा समर सेज्या सुत, उठि किन उत्तर देत-१-२९।
उ.- (क) द्वार सिला पर पटकि तृना कौं ह्वै आयौ जो पैना-६०१। (ख) रूकत न पौन महावत हू पै मुरत न अंकुस मोरे-२८१८।
उ.- सोइ कीजो जैसे ब्रजबाला साधन सीखे पौन-२९२५।
[सं. पाद + ऊन, प्रा. पाओन]
गाँव के जिन्हें फसल पर अनाज मिलता है।
नाई, बारौ, धोबी आदि जो उत्सवों या शुभ कार्यो में नेग पाते हैं।
उ.- काढौ कोरे कापर हो अरू काढ़ौ घी के मौन। जाति पाँति पहिराइ कै सब समदि छतीसौ पौनि।
पौने सोलह आना- अधिकांश में।
उ.- कनक कलस प्रति पौर बिराजत मंगलचार बधाई-सारा. २५।
उ.- (क) राजा, इक पंडित पौरि तुम्हारी-८-१३। (ख) पैठत पौरि छींक भइ बाएँ-५४१।
[सं. प्रतोली, प्रा. पओली, हिं. पौरी]
द्वारपाल, ड्योढ़ी- दार, दरबान।
उ.- अर्थ-काम दोउ रहैं दुवारै, धर्म मोक्ष सिर नावैं। बुद्धि विवेक, बिचित्र पौरिया, समय न कबहूँ पावैं-१-४०।
[सं. प्रतोली, प्रा. पओली]
पुरूष का कर्म, पुरूषार्थ।
उ.- अति प्रचंड पौरूषबल पाएँ, केहरि भूख मरै-१-१०५।
खड़ाऊँ जिसमें खूँटी के स्थान पर अँगूठा फंदे मे फँसाया जाता है।
पैर का उतना भाग जिसमें जूता या खड़ाऊँ पहनते हैं।
बल-वीर्य-वर्द्धक, पुष्टिकारक।
उ.- असुर कौं सुरा, तुम्हैं अमृत प्याऊँ-८-८।
पिलाने से, पिला देने के कारण।
उ.- ऐरावत अमृत कैं प्याए, भयौ सचेत, इन्द्र तब धाए-६-५।
प्याज के हलके गुलाबी रंग का।
उ.- नृप ऐसौ है पर-तिय प्यार। मूरख करे सो बिना बिचार-६-७।
जो छोड़ा या त्यागा न जाय।
उ.- मैं बरजी कहँ जाति री प्यारी, तब खीझी रिस-झरतैं -७४४।
जो भली लगे, जो अच्छी जान पड़े।
उ.- बिधु-मुख मृदु मुसक्यानि अमृत-सम, सकल लोक लोचन प्यारी-१-९९।
उ.- फेनी सेव अँदरसे प्यारे-३९६।
उ.- ब्राह्मन हरि हरि-भक्तिन प्यारौ-९-५।
जिसे छोड़ा न जा सके, अत्यन्त प्रिय।
उ.- ठाढ़े बदत बात सब हलधर, माखन प्यारौ तोहि-१०-३७५।
उ.- मधुपनि प्यावत परम चैन-१९७७।
उ.- (क) चारू चखौड़ा पर कुंचित कच, छबि मुक्ता ताहू मैं। मनु मकरंद-बिंदु लै मधुकर, सुत-प्यावन-हित झूमै-१०-१७४। (ख) बकी कपट करि प्यावन आई-५३८।
निश्चय के अनुसार किसी बात का पालन।
उ.- भक्ति-भाव की जो तोहिं चाह। तोसौं नहिं ह्वैहै निर्बाह-४-९।
उ.-अति बल करि करि काली हार्यौ। लपाटि गयौ सब अंग-अंग प्रति, निर्बिष कियौ सकल बल झार्यौ-५७४।
उ.-जे जे जात, परत ते भूतल, ज्यौं ज्वाला-गत चीर। कौन सहाइ, जानियत नाहीं, होत बीर निर्बीर-१-२६९।
विरक्ति या वैराग्य नामक एक संचारी भाव।
उ.-सूरज प्रभु ते कियो चाहियत है निर्बेद बिसेषी-सा. ४६।
जल पीने की इच्छा, तृष्णा, पिपासा।
उ.- कहै सूरदास, देखि नैनन की मिटी प्यास-८-५।
जिसे प्यास लगी हो, तृषित।
हाल की ब्याही गाय का दूध।
उ.- अति प्यौसर रसर बनाई। तिहिं सोंठ मिरिच रूचि नाई-१०-१८३।
प्योसार, प्यौसारो, प्योसार, प्यौसारौ
पिता-गृह, मायका, पीहर, नैहर।
उ.- (क) परत फिराय पयोनिधि भीतर सरिता उलटि बहाई। मनु रघुपति भयभीत सिंधु पत्नी प्योसार पठाई-९-१२४। (ख) तजी लाज कुल-कानि लोक की, पति गुरूजन प्यौसारी री। जिनकी सकुच देहरी दुर्लभ, तिनमैं मूड़ उघारौ री-१०-१३५।
[सं. पितृशाला, हिं. प्योसार]
जो सामन आया या प्रत्यक्ष हुआ हो।
कार्य-सिद्धि के पाँच साधनों में एक (नाटक)।
उ.- विस्वा-मित्र सिखाई बहु बिधि विद्या धनुष प्रकार- सारा. २०३।
उ.-जान्यौ नहीं निसाचर कौ छल, नाध्यौ धनुष-प्रकार-९-८३।
उ.-पेठा बहुत प्रकारन कीने-२३२१।
रोति से, भाँति से, तरह से।
उ.-यह भव-जल कलि-मलहिं गहे है, बोरत सहस प्रकारौ-१-२०९।
स्पष्ट होना, समझ में आना।
प्रसिद्ध या प्रकट करनेवाला।
प्रकट रूप से, जो स्वगत न हो।
उ.-अबहीं हैं यह हाल करत है, दिन-दिन होत प्रकास-१०-६०।
उ.-तेल-तुल-पावक-पुट भरि धरि, बनै न बिना प्रकासत। कहत बनाइ दीप की बतियाँ, कैसें धौं तम नासत-२-२५।
प्रकाश करता है, चमकता है।
उ.-घन भीतर दामिनी प्रकासत, दामिनि घन चंहुँ पास-१६३७।
उ.-अंधकर अज्ञान हरन कौं, रबि- ससि जुगल-प्रकास। बासर-निसि दोउ करैं प्रकासित महा कुमग अनायास -१-९०।
जिसमें से प्रकाश निकल रहा हो।
जिस पर प्रकाश पड़ रहा हो।
उ.-हृदय कमल में ज्योति प्रकासी-३४०८।
उ.-जब हरि मुरली नाद प्रकास्यौ-पृ ३४७ (५२)।
उ.-कोटि करौ तनु प्रकृति न जाइ-२६७९।
उ.- कहा गति प्रकृति परी हो कान्ह तुम्हारी धरत कहा कत राखत घेरे-१०३९।
जगत का उपादान कारण, कुदरत।
जो स्वाभाविक स्थिति में हो।
पीछे या ऊपर से बढ़ाया या जोड़ा गया।
जो सामने आया हो, जो प्रत्यक्ष हुआ हो।
गुण कर्म आदि के विचार से छाँटना या अलग करना।
स्थिर या निश्चित किया हुआ।
उ.- (क) नई दोहनी पोंछि पखारी धरि निर्धूम खीरनि पर तायो-११७९। (ख) मनहुँ धुईं निर्धूम अग्नि पर तप बैठे त्रिपुरारी-१६८९।
उ.- भीर के परे तैं धीर सबहिनि तजी, खंभ तैं प्रगट ह्वै जन छुड़ायौ-१-५।
स्पष्ट या प्रत्यक्ष रूप से।
उ.- (क) हा जगदीस, राखि इहिं अवसर, प्रगट पुकारि कह्यौ-१-२४७। (ख) मोसौं कहिं तू प्रगट बखान-१-२८६।
उ.- सुनहु सूर लोचन बटमारी गुन जोइ सोइ प्रगटाने -पृ. ३२६ (५६)।
उ.- प्रथम सनेह दुहुँनि मन जान्यौ। नैन-नैन कीन्हीं सब बातैं, गुप्त प्रीति प्रगटान्यौ।
उ.- प्रेम प्रवाह प्रगट प्रगटायो होरी खेलन लागे-सारा. ३०९।
उ.- बदन कमल उपमा यह साँची ता गुन को प्रगटावत-१९७६।
उ.- माया प्रगटि सकल जग मोहै-१०-३।
उ.- ब्रज घर घर प्रगटी यह बात-१०-२७२।
उ.- सूरदास कुंजनि तैं प्रगटी, चेरि सौत भई आइ-६५६।
उ.- संकट हरन-चरन हरि प्रगटे, बेद बिदित जस गावै-१-३१।
उ.- बिनु देखें तू कहा करैगी, सो कैसैं प्रगटै है री-७११।
प्रकट हुआ, सामने आया, प्रत्यक्ष हुआ।
उ.- नहिं असजनम बारंबार। पुरबलौ धौं पुन्य प्रगटयौ, लह्यौ नर अवतार-१८८।
उ.- सूरदास प्रभु कौ जस प्रगट्यौ, देवनि बंदि छुड़ाई-९-१४०।
प्रकट या प्रकाशित करनेवाला।
ललकार कर, सामने बुला कर, चुनौती देकर।
उ.- (क) मार्यौ ताहि प्रचारि हरि, सुर मन भयौ हुलास-१-११। (ख) एक समय सुर असुर प्रचारि। लरे, भई असुरनि की हारि -७-७।
उ.- प्रद्युम्न सकल विद्या समुझि नारि सों, असुर सों जुद्ध माँग्यौ प्रचारी-१० उ.- २५।
उ.- बृक्ष पाषाण को जब वहाँ नाश भयो, मुष्टिका-युद्ध दोऊ प्रचारी-१० उ.- ४५।
ललकारा, सामना करने के लिए बुलाया।
उ.- इंद्र आइ तब असुर प्रचार्यौ। कियौ जुद्ध पै असुर न हार्यौ।
प्रक्षालित करके, अच्छी तरह स्वच्छ करके।
उ.- त्रियाचरित मतिमंत न समुझत, उठि प्रछालि मुख धोवत-९-३१।
उ.- षोड़स जुक्ति, जुवति चित षोड़स, षोढ़स बरस निहारै। षोड़स अंगनि मिलि प्रजंक पै छ-दस अंक फिरि डारै-१-६०।
उ.- (क) प्राचीन-बर्हि भूप इक भए। आयु प्रजंत जज्ञ तिन ठए-४-१२। (ख) नाभि प्रजंत नीर मै ठाढ़ी, थऱ-थर अँग काँपति सुकुमारि-७८५।
छोटी जातियों के लोग जो वेतन न लेकर शुभ कार्यों में उपहार पाकर सेवा करते हैं।
सृष्टि का उत्पादक, सृष्टिकर्त्ता। पुराणों में इनकी संख्या कहीं दस और कहीं इक्कीस लिखी हुई है।
अच्छी तरह जलाना, सुलगाना।
प्रजारन लागे - जलाने लगे।
उ.- सोभित सिथिल बसन मनमोहन, सुखवत स्त्रम के पागे। मानहुँ बुझी मदन की ज्वाला, बहुरि प्रजारन लागे-६८६।
उ.- बूड़ि न मुई नीर नैनन के, प्रेम न प्रजरि पची री-१० उ.-८६।
उ.- बसन ए नृपति के जासु के प्रजा तुम-२५८४।
उ.-स्यामा स्याम सुभग जमुना-जल निर्भ्रम करत बिहार।
उ.- प्रणतपाल केशव करूणापति-९८२।
उ.- कौसिल्या सुनि परम दीन ह्वै, नेन-नीर ढरकाए। विह्हल तन-मन, चकृत भई सो, यह प्रतच्छ सुपनाए-९-३१।
उ.- जाकौं हरि अंगीकार कियौ। ताके कोटि बिघन हरि हरि कै, अभै प्रताप दियौ-१-३८।
उ.- (क) सूरदास यह सकल समग्री प्रभु प्रताप पहिचानै-१-४०। (ख) सब हितकारन देव, अभय-पद नाम प्रताप बढ़ायौ-१-१८८। (ग) छिनक भजन, संगति-प्रताप तैं, गज अरू ग्राह छुड़ायौ-१-१९०।
उ.- तुम प्रताप-बल बदत न काहूँ, निडर भएघर-चेरे-१-१७०।
उ.- दिनकर महाप्रताप पुंज बर सबको तेज हरै-३३११।
उ.- धन्य पिता जापर परुफुल्लित राघव भुजा अनूप। वा प्रतापि की मधुर बिलोकनि पर वारौं सब भूप-९-१३४।
उ.-अंग-अंग-प्रति छबि-तरंग-गति सूरदास क्यौं कहि आवै-१-६९।
उ.- जैसे केहरि उझकि कूप-जल, देखत अपनी प्रति-१-३००।
एक क्रिया के परिणाम या प्रत्युत्तर में होनेवाली क्रिया।
वह दान लेना जो विधिपूर्वक दिया जाय।
उ.- बहुत प्रतिग्रह लेत बिप्र जो जाय परत भव कूप-सारा. ३३८।
आघात के बदले या उत्तर में किया गया आघात।
प्रतिच्छाया, प्रतिछाँई, प्रतिछाया, प्रतिछाँही
प्रतिच्छाया, प्रतिछाँई, प्रतिछाया, प्रतिछाँही
उ.- जिन हरि शकट प्रलंब तृणावृत इन्द्र प्रतिज्ञा टाली-२५६७।
उस बात का कथन जिसे सिद्ध करना हो।
उ.- मानहु पाहन की प्रतिदासी नेक न इत उत डोलै-२२७५।
दूसरों के भावों या विचारों की आवृत्ति।
नायक का प्रतिद्वंद्वी पात्र।
पक्ष की पहली तिथि, परिवा।
उ.- तुम्हरैं चरन-कमल सुख-सागर, यह ब्रत हौं प्रतिपलिहौं-९-३५।
कहने, समझाने या प्रति-पादन करनेवाला।
उ.-भत्कनि-हाट बैठि अस्थिर ह्वै हरि नग निर्मल लेहि-१-३१०।
उ.-संकर प्रगट भए भृकुटी ते करी सृष्टि निर्मान-सारा. ६५।
जिसे कहा-समझाया या प्रति-पादन किया गया हो।
कहने, समझाने, या प्रतिपादन करते योग्य।
पालनकर्त्ता, रक्षक, पोषक।
उ.- यहै विचार करत निसि-बासर, येई हैं जन के प्रतिपार-४९७।
पालन की, पूर्ण की, (ठानी हुई बात या इच्छा) निभायी।
उ.- सदा सहाइ करी दासनि की, जो उर धरी सोइ प्रतिपारी-१-१६०।
रक्षा करके, सुरक्षित रखकर।
उ.- बंधू करियौ राज सँभारे। राजनीति अरू गुरू की सेवा, गाइ-बिप्र प्रतिपारे-९-५४।
उ.- नृप-कन्या कौ ब्रत प्रतिपार्यौ, कपट बेष इक धार्यौ-१-३१।
उ.- गुरू बसिष्ठ अरू मिलि सुमंत्र सौं, अतिहीं प्रेम बढ़ायौ। बालक प्रतिपालक तुम दोऊ, दसरथ लाड़ लड़ायौ-९-५५।
पालने की क्रिया या भाव, पालन-पोषण।
पालन-पोषण किया, रक्षा की।
उ.- तब ए बेली सींचि स्यामघन, अपनी करि प्रतिपाली-३२२८।
उ.- धन्य सु गोकुल नारि सूर प्रभु प्रगट प्रीति प्रति-पाली-३५६७।
पालन करें, पालन-पोषण करें।
उ.- ताकी सक्ति पाइ हम करैं। प्रति पालै बहुरौ संहरैं-४-३।
उ.- जिन पुत्रनिहिं बहुत प्रतिपाल्यौ, देवी-देव मनै हैं। तेई लै खोपरी बाँस दै, सीस फोरि बिखरै हैं-१-८६।
उ.- औरौ सकल सुकृत श्रीपति-हित प्रतिफल-रहित सुप्रीति-२-२-१२।
उ.- तुम्हैं हमैं प्रतिबाद भए तैं गौरव काकौ गरतौ-१-२०३।
उ.- किधौं यह प्रतिबिंब जल में देखत निज रूप दोउ हैं सुहाए-२५७०।
उ.- यह सुनि धावत धरनि, चरन की प्रतिमा पथ मैं पाई। नैन-नीर रघुनाथ सानि सो, सिव ज्यौं गात चढ़ाई-९-६४।
प्रतिमा, मूर्ति, अनुकृति।
जो छाया पड़ने से दिखायी देता हो।
असाधारण बुद्धि-बल या योग्यता।
कांति, दीप्ति, चमक या आभा भी।
उ.- सबनि सनेहौ छाँड़ि दयौ। हा जदुनाथ ! जरा तन ग्रास्यौ, प्रतिभौ उतरि गयौ-१-२९८।
मिट्टी, धातु आदि की देवमूर्ति।
स्थापना, या प्रतिमा स्थापना।
विवाह जिसमें पुरूष नीच और स्त्री उच्च वर्ण की हो।
देवता पर चढ़ायी गयी वस्तु देवार्पित वस्तु; अर्पण के पूर्व 'नैवेद्य' और पश्चात् 'निर्माल्य' कही जाती है। शिव के अतिरिक्त सभी देवताओं का 'निर्मल्य' प्रसाद-रूप में ग्रहण किया जाता है।
रचा, बनाया, उत्पन्न किया।
उ.-ब्रहम रिषि मरीचि निर्मायौ। रिषि मरीचि कस्यप उपजायौ-३-९।
जिसकी जड़ तक न रह गयी हो।
व्रत आदि की समाप्ति पर किया गया कृत्य।
जिसकी प्रतिष्ठा या स्थापना की गयी हो।
होड़, लागडाँट, चढ़ा-ऊपरी।
वस्तु जिसमें दूसरी वस्तु का आरोप किया जाय।
उ.- (क) परम चतुर सुंदर सुजान सखि या तनु को प्रतिहार-२८८८। (ख) जुग जुग बिरद इहै चलि आयो भए बलि के द्वारे प्रतिहार-२६२०।
एक राज कर्मचारी जो हर समय राजाओं के साथ रहकर उन्हें विभिन्न समाचार सुनाता था।
उ.- नाम प्रतीति भई जा जन कौं, लै आनँद, दुख दह्यौ-२-८।
आशा के विरूद्ध फल या घटना।
जिसका ज्ञान इंद्रियों से हो सके।
विशेष पादर्थ, जैसे सूर्य, देवमूर्ति आदि में ब्रह्म का आरोप करके उसकी उपासना करना।
उ.- प्राची और प्रतीचि उदोची और अवाची मान- सारा. ७७५।
जो लौट आया हो, वापस आया हुआ।
योग के आठ अंगों में से एक जिसमें इंद्रियों को अन्य विषयों से हटाकर चित्त का अनुसरण किया जाता है।
उ.- जम और नियम प्रान प्रत्याहार धारन घ्यान समाधि- सारा. ६०।
वरन्, इसके विरूद्ध, बल्कि।
जो फिर से उत्पन्न हुआ हो।
जो तुरंत उपयुक्त बात या काम करे।
तुरंत उपयुक्त कार्य करने की बुद्धि।
पहला, जिसका स्थान पहले हो।
उ.- जन के उपजत दुख किन काटत ? जैसे प्रथम अषाढ़-आँजु-तृन, खेतिहर निरखि उपाटत-१-१०७।
उ.- मनसा करि सुमिर्यौ गज बपुरैं, ग्राह प्रथम गति पावै-१-१२२।
उ.- जिहिं सुत कैं हित बिमुख गोविंद तैं, प्रथम तिहीं मुख जार्यौ-१-३३६।
उ.- प्रथमैं-चरन-कमल कौं ध्याव। तासु महातम मन मैं ल्यावै-१०-१८।
उ.- कनक-वलय मुद्रिका मोदप्रद, सदा सुभग संतनि काजैं-१-६९।
देवमूर्ति को दाहिनी ओर करके उसके चारों ओर घुमना, परिक्रमा, प्रदक्षिणा।
उ.- हरि कह्यौ, राजहेत तप कियौ। ध्रुव, प्रसन्न ह्यै मैं तोंहिं दियौ। अरू तेरे हित कियौ अस्थान। देहिं प्रदच्छिन जहाँ ससि-भान-४-९।
प्रदक्षिणा करनेवाले, परिक्रमा करनेवाले।
उ.- जिहिं गोविंद अचल ध्रुव राख्यौ, रबि-ससि किए प्रदच्छिनकारी-१-३४।
[सं. प्रदक्षिणा + हिं. कारी=करनेवाला]
देखने या दर्शन करने वाला, दर्शक।
उ.- जानु सुजधन करभ-कर आकृति, कटि प्रदेस किंकिनि राजै-१-६९।
त्रयोदशी का व्रत जिसमें दिनभर व्रत करके शाम को शिवपूजन के पश्चात् भोजन किया जाता है।
उ.- तहाँ अवज्ञा नारि प्रधान-४-१२।
उ.- सिब प्रनाम करि ढिग बैठाए-४-५।
पाँच तत्वों का विस्तार, भवजाल।
उ.- अति प्रपंच की मोट बाँधिकै अपनैं सीस धरी-१-१८४।
उ.- बहुत प्रपंच किये माया के, तऊ न अधम अघानौ-१-३२९।
उ.- बिकसत कमलावली, चले प्रपुंज-चंचरीक, गुंजत कल कोमल धुनि त्यागि कंज प्यारे-१०-२०५।
उ.- तुम्हारी भक्ति हमार प्रान ¨¨¨। जैसें कमल होत अति प्रफुलित, देखत दरसन भान-१-१६९।
उ.- गदगद बचन कहत मन प्रफुलित बार-बार समुझैहौं-२९२३।
उ.- गजमोतिन के चौक पुराए बिच-बिच लाल प्रबालिका-८०९।
उ.- राखी लाज द्रुपद-तनया की, कुरुपति चीर हरै। दुरजोधन कौ मान भंग करि बसन-प्रबाह भरै-१-३७।
उ.- चित दै सुनौ स्याम प्रबीन-३४५१।
उ.- (क) कह करौं तेरी प्रबल माया देति मन भरमाइ-१-४५। (ख) जीवन-आस प्रबल श्रुति देखी-१-२८४।
उ.- परिहस सूल प्रबल निसि-बासर, तातैं यह कहि आवत। सूरदास गोपाल सरनगत भऐं न को गति पावत-१-१८१।
जो किसी से संबंध न रखता हो।
संबंध न रखनेवाला, निर्लिप्त।
उ.- (क) करत है गंग निर्वंश जाहीं- २५५६। (ख) इनको कपट करै मथुरापति तौ ह्वै है निर्वंस-२५९७।
शब्द की रचना या व्युत्पत्ति-विवेचन।
ढाढ़स बँधाते हैं, धीरज देते हैं।
उ.- जननी ब्याकुल देखि प्रबोधत, धीरज करि नीकैं जदुराई। सूर स्याम कौं नैंकु नहीं डर, जनि तू रोवै जसुमति माई-५४८।
उ.- ठानी कथा प्रबोधि तबहिं फिरि गोप समोधे-३४४३।
उ.- कै वह स्याम सिखाय प्रबोधे, कै वह बीच मरे-२९८२।
उ.- जुद्ध न करौं, शस्त्र नहिं पकरौं, एक ओर सेना सिगरी। हरि-प्रभाउ राजा नहिं जान्यौ, कह्यौ सैन मोहिं देहु हरी-१-२६८।
उ.- आय प्रभासु बिचु बहु जन को बहुतहिं दान देवाये- सारा. ८३६।
उ.- बिनु दीन्हैं ही देत सूर-प्रभु ऐसे हैं जदुनाथ गुसाईं-१-३।
उ.- दूरि गयौ दरसन के ताईं, व्यापक प्रभुता सब बिसरी-१-११५।
साहिबी, मालिकपन, प्रभुत्व।
उ.- प्रभु की प्रभुता यहै जु दीन सरन पावै-१-१२४।
उ.- भक्ति-प्रभाव सूर लखि पायौ, भजन-छाप नहिं पाई-१-९३।
मन को किसी ओर प्रेरित कर देने का गुण।
उ.- अंग-अंग भूषन बिराजत कनक मुकुट प्रभास-१३५६।
उन्मत्त, प्रमत्त, मतवाला, मस्त।
उ.- तू कहाँ ढीठ, जोबन-प्रमत्त सुंदरी, फिरति इठलाति गोपाल आगैं-१०-३०७।
उ.- तौ क्यों तजै नाथ अपनौ प्रन ? है प्रभु की प्रभुताई-१-२०७।
उ.- सोवत मुदित भयौ सपने मैं, पाई निधि जो पराई। जागि परैं कछु हाथ न आयौ, यौं जग की प्रभुताई-१-१४७।
उ.- जग-प्रभुत्व प्रभु ! देख्यौ जोइ। सपन-तुल्य छन-भंगुर सोइ-७-२।
परिमाण आदि में समान या बराबर।
उ.- करो उपाय, बचो जो चाहो, मेरो बचन प्रमानो-सारा. ४८७।
स्थिर या निश्चित किया, ठहराया।
उ.- जोगेस्वर बपु धारि हरि प्रगटे जोग समाधि प्रमान्यो-सारा. ३५१।
और-और, इनके अतिरिक्त और, इत्यादि।
उ.- बंधुक सुमन अरून पद पंकज, अंकुस प्रमुख चिन्ह बनि आए-१०-१०४।
उ.- (क) स्यामा कामा चतुरा नवला प्रमुदा सुमना नारि-१५८०। (ख) सूर प्रभु स्याम सकुचि गए प्रमुदा धाम-२१५३।
वर्णोच्चारण में होने वाली क्रिया।
जो सर्वथा नष्ट हो गया हो।
उ.-मरै वह कंस निर्बेस बिधना करै, सूर क्योहूँ, होइ निर्मूल्यो-२६२५।
उ.-नैना लोभहिं लोभ भरे ¨¨¨¨। जोइ देखैं सोइ निर्मोलैं कर लै तहीं धरै।
निर्मोह, निर्मोहिया, निर्मोही
जिसके मन में मोह-ममता न हो।
उ.-हरि निर्मोहिया सों प्रीति कीनी काहे न दुख होइ-२४०९।
जिस (स्त्री) में मोह-ममता न हो, निर्दय।
[हिं. निर्मोही + इनी [प्रत्य.]]
देश से माल के बाहर जाने की क्रिया।
उ.- हरि जू, मोसौ पतित न आन। मन-क्रम-वचन पाप जे कीन्हे, तिनकौ नाहिं प्रमान-१-१९७।
उ.- अतल, वितल अरु सुतल तलातल और महातल जान। पाताल और रसातल मिलि कै सातौ भुवन प्रमान-सारा. ३१।
मानने योग्य, मान्य, स्वीकृत।
उ.- युग प्रमान कीन्हौ व्यवहार- १० उ.-१२९।
जिसका खूब प्रयोग किया गया हो।
प्रयोग या व्यवहार करनेवाला।
प्रलंबासुर जो बलराम के हाथ से मारा गया था। गोवेश में यह उनके साथ खेलने आया था। हारने पर बलराम को कंधे पर चढ़ा कर यह भागा। तभी उन्होंने इसे मार डाला।
उ.- धेनुक और प्रलंब सँहारे संख-चूड बध कीन्हों- सारा. ४७९।
एक प्रसिद्ध तीर्थ जो गंगा-यमुना के संगम पर है।
उ.- बिना प्रयास मारिहौं तोकैं आजु रैनिकै प्रात-९-७९।
उ.- विह्वल बिकल दीन दारिदबस करि प्रलाप रूक्मिनि समुझाये- १० उ.-६२।
लय को प्राप्त होना, विलीन होना।
उ.- सूरजदास अकाल प्रलय प्रभु मेटौ दास दिखाइ-९-११०।
संसार का तिरोभाव या नाशा।
उ.- अनिल वर्त, बज्रवर्त, प्रवर्त-१०-४४।
उ.- सिखि-सिखंड, बन-धातु बिराजत, सुमन सुगंध प्रवाल-४७८।
उ.- (क) सुमिरत ही ततकाल कृपानिधि बसन-प्रवाह बढ़ायौ-१-१०९। (ख) ऐसौ और कौन करूनामय बसन-प्रवाह बढ़ावै-१-१२२।
उ.- अति है चतुर चातुरी जानत सकल कला जु प्रवीने-पृ. ३३५ (४२)।
वह (ब्रह्म) जो वेदों से भी परे है।
जिसमें हेतु या कारण न हो।
सांसारिक कार्यो या विषयों में लीनता।
उ.- सैसवता में हे सखी जोबन कियो प्रवेश-२०६५।
उ.- किधौं उहि देशन गवन मग छाँड़े, धरनि न बूँद प्रवेशनि-२८२४।
उ.- वृंदाबन प्रवेसि अघ मारयौ, बालक जसुमति, तेरैं-४३२।
वह पत्र, धन आदि जिसे दिखाकर या देकर प्रवेश किया जा सके।
उ.- एक मराल पीठि आरोहण विधि भयो प्रबल प्रशंस-२३४०।
उ.- उपजत छबि कर अधर शंख मिलि सुनियत शब्द प्रशंसा-२५६६।
उ.- चहुँ दिसि चाँदनी चमू चली मनहु प्रशंसित पिक बर बानी-२३८३।
उ.- (क) सूरदास प्रभु सब सुखदाता लै भुज बीच प्रशंसी-१६८५।
ताम्रपत्रादि जिन पर राजाओं की कीर्ति लिखी हो।
प्राचीन ग्रंथ के अंत का परिचायक विवरण।
नथने से बाहर आनेवाली साँस।
उ.- तब तैं मैं सुधि कछू न पाई। बिनु प्रसंग तहँ गयौ न जाई-९-३१।
उ.- जौ अपनौ मन हरि सौं राँचै। आन उपाय-प्रसंग छाँड़ि कै, मन-बच-क्रम अनुसाँचै-१-८१।
उ.- आपहुँ खात प्रसंसत आपुहिं, माखन रोटी बहुत पयौ-१०-१६८।
उ.- (क) मुक्ति मनोरथ मन मैं ल्यावै। मम प्रसाद तैं सो वह पावै-३-१३। (ख) करहु मोहिं ब्रज रेनु देहु बृंदाबन बासा। माँगैं यहै प्रसाद और मेरैं नहिं आसा-४९२।
वह वस्तु जो देवता पर चढ़ाई जाय।
वह पदार्थ जो आचार्य या गुरू जन, पूजन, यज्ञ आदि करके या प्रसन्न होकर भक्तों या सेवकों को दें।
उ.- रिषि ता नृप सों जज्ञ करायो। दै प्रसाद यह बचन सुनायौ-६-५।
देवता की जूठन जो भक्तों या सेवकों में बाँटी जाय।
उ.- जूठन माँगि सूर जन लीन्हौ। बाँटि प्रसाद सबनि कौं दीन्हौ-३९६।
काव्य का एक गुण जिसमें भाषा प्रचलित, सरल और स्वच्छ रहती है।
देवी-देवता पर चढ़ाया गया पदार्थ।
वह पदार्थ जो बड़े लोग छोटों को दें।
उ.- (क) यह सुनि कै तिहिं उपज्यौ ज्ञान। पायौ पुनि तिहिं पद-निर्वान-४-१२। (ख) सूर प्रभु परस लहि लह्यौ निर्वान तेहि सुरन आकास जै जैत यह धुनि सुनाई - २६०८।
उ.- सुनि सठनीति प्रसून-रस लंपट अबलनि को घाँचहि-३१४५।
उ.- तट बारू उपचार चूर जल पूर प्रसेद पनारी-२७२८।
सत्राजित् का भाई जिसकी मणि के कारण श्रीकृष्ण को झूठा कलंक लगा था।
नाटक के विषय आदि का परिचायक प्रसंग।
जिसके लिए प्रस्ताव हुआ हो।
ठीक मुहूर्त पर यात्रा न कर सकने पर वस्त्रादि यात्रा की दिशा में रखवा देने की क्रिया।
उ.- नख छत सोनित प्रस्वेद गात तें चंदन गयो कछु छूटि-१९१२।
पहर-पहर पर घंटा बजानेवाला।
उ.- जानि लई मेरे जिय की उन गर्व-प्रहारन उनको नाऊँ-१६५४।
मारने को अस्त्रादि चलाना।
उ.- दैत्य प्रहारि पाप-फल प्रेरित, सिर-माला सिव-सीस चढ़ौहौं-९-१५७।
नष्ट करनेवाला, दूर करनेवाला, भंजन करनेवाला।
उ.- (क) जाकौ बिरद है गर्ब प्रहारी, सों केसैं बिसरै-१-३७। (ख) सूरदास प्रभु गोकुल प्रगटे, मथुरा-गर्व-प्रहारी-१०-४।
उ.- डारि-अग्नि में शस्त्रनि मारो नाना भाँति प्रहारो-सारा. १२०।
प्रान प्रहारौं-प्राण दे दूँ।
उ.- तब देवकी भई अति ब्याकुल कैसैं प्रान प्रहारौं-१०-४।
उ.- गोपाल सबनि प्यारौ, ताकौं तैं कीन्हौ प्रहारौ-३७३।
नष्ट किया, (गर्व, मान आदि) तोड़ दिया।
उ.- नृप-कन्या कौ ब्रत प्रतिपारयौ, कपट वेष इक धारयौ। तामैं प्रगट भए श्रीपति जू, अरिगन-गर्ब प्रहारयौ-१-३१।
उ.- डारि अगिनि मैं सस्त्रनि मारयौ, नाना भाँति प्रहारयौ।
मारने के लिए चलाया, फेंका।
उ.- ऐरावत अमृत कैं प्याए। भयो सचेत इंद्र तब धाए। बृत्रासुर कौं बज्र प्रहारयौ। तिन त्रिसूल सुरपति कौं मारयौ-६-५।
हिरण्यकशिपु दैत्य का पुत्र जो विष्णु का भक्त था। पिता की विष्णु से शत्रुता थी; इसलिए पुत्र को उसने बहुत ताड़ना दी और उसके प्राण हरने के अनेक उपाय किये। अंत में विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु को मारडाला और अपने भक्त की रक्षा की।
स्वाभाविक, नैसर्गिक, सहज।
उ.- प्राकृत रूप धरयौ हरि छिन में सिसु ह्यै रोवन लागे- सारा. ३७०।
राजा इक्ष्वाकु के एक पुत्र जिनसे मिथिला का विदेह वंश चला माना गया है। इनका स्थान मनुष्य की पलकों पर माना गया है।
उ.- मैं बिधना सों कहौं कछू नहिं नितप्रति निम को कोसौं - १४०७।
गोता लगाकर या डुबकी मार कर किया जानेवाला स्नान, अवगाहन।
निर्वाह करने या निभानेवाला।
जिसमें दोष या परिवर्तन न हो।
बिना किसी विघ्न या बाधा के।
सहज, स्वाभाविक, नैसर्गिक।
उ.- सुभ कुरूछेत्र, अजोध्या मिथिला प्राग त्रिबेनी न्हाये -सारा. ८२८।
उ.- प्राची दिसा पेखि पूरन ससि ह्वै आयौ तन तातो- १० उ-१००।
उ.- ढूँढत फिरै न पूँछन पावै आपुन ग्रह प्राचीन- १० उ. ६९।
एक प्राचीन राजा जो अग्निगोत्रीय थे और प्रजापति कहलाते थे।
पूर्व का, पूर्व-संबंधी, पूर्वीय।
पुराना, प्राचीन, पूर्वकालीन।
वायु जिससे मनुष्य जीवित रहता है।
उ.- प्रीति पतंग करी दीपक सों आपै प्राण दह्यौ-२८०९।
प्राण उड़ जाना- (१) होश-हवास न रहना। (२) डर जाना।
प्राण आना या प्राणों में प्राण आना- चित्त कुछ ठिकाने होना, धीरज आना।
प्राण (प्राणों) का अधर या गले तक आना- मरने पर होना। उ.- प्रीतम प्यारे प्राण हमारे रहे अधर पर आइ-३०५९।
प्राण (प्राणों का) मुँह को आना- (१) बहुत दुख होना। (२) मरने पर होना।
प्राण खाना- बहुत तंग करना।
प्राण जाना (छूटना, निकलना)- मरना।
प्राण डालना- जीवन का संचार करना।
प्राण छोड़ना (तजना, त्याग.,,, देना)- मरना।
किसी के ऊपर प्राण देना- (१) किसी के काम या व्यवहार से बहुत दुखी होकर मरना।(२) प्राणों से भी अधिक चाहना।
प्राण निकलना- (१) मरना। (२) घबरा जाना।
प्राण पयान होना- मरना।
प्राण पर आ पड़ना- जीवन का संकट में पड़ जाना।
प्राण पर खेलना- ऐसा काम करना जिस में जान जाने का डर हो, पर इसकी परवाह न करना। उ.- हमसों मिले बरस द्वादस दिन चारिकतुम सो तूठे। सूर आपने प्राणन खेलैं ऊधौ खेलैं रूठे।
प्राण पर बीतना- (१) जीवन संकट में पड़ना। (२) मर जाना।
प्राण बचाना- (१) जान बचाना। (२) पीछा छड़ाना।
प्राण मुट्ठी में (हथेली पर) लिये फिरना (रहना)- जान की जरा भी परवाह न करना।
प्राण रखना- (१) जिला देना। (२) जान बचाना।
प्राण हरना- (१) मर जाना। (२) साहस न रहना।
प्राण हारति- मर जाती है। उ.- समुझत मीन नीर की बातैं, तऊ प्राण हठि हारति।
उ.- (क) अब ही और की और होति कछु ¨¨¨¨¨। ताते मैं पाती लिखी तुम प्राण अधारा। (ख) अपने ही गेह मधुपुरी आवन देवकी प्राण-अधारा हो।
मरने या मारे जाने से बचाना।
उ.- नेक रहौ माखन देउँ मेरे प्राणधनियाँ।
उ.- प्राणपति की निरखि सोभा पलक परन न देहिं।
बहुत प्रिय व्यक्ति, प्रियतम।
मंदिर में मंत्रोच्चार के साथ नयी मूर्ति की प्रतिष्ठा।
उ.- प्राणवायु पुनि आइ समावै। ताकौ इत उत पवन चलावै।
योग के आठ अंगों में चौथा। इसमें श्वास-प्रश्वास की गतियों को धीरे-धीरे कम किया जाता है।
उ.- प्रात जो न्हात, अघ जात ताके सकल; ताहि जमदूत रहत हाथ जोरे-१-२२२।
प्रातःस्मरण, प्रातःस्मरणीय
प्रातःकाल स्मरण करने योग्य, पूज्य।
उ.- कहत आधे बचन भयौ प्राता-४४०।
प्रकट होना, अस्तित्व में आना।
जो प्रकट हुआ हो, प्रकटित।
उ.- इनहीं मैं मेरे प्रान बसत हैं, तेरैं भाएँ नैंकु न माइ-७१०।
त्यागति प्रान- प्राण देने को तैयार है। उ.- त्यागति प्रान निरखि सायक धनु-१-२९।
जीवन का आधार, जीने का सहारा।
उ.- तुम्हारी भक्ति हमारे प्रान-१-१६९।
उ.-हौं तौ जाति गँवार, पतित हौं, निपट निलज, खिसिआनौ-१-१९६।
निर्लज्जता, बेशर्मी, बेहयाई।
[सं. निर्लज्ज + ई [प्रत्य.]]
बेशर्मी, बेहयाई, निर्लज्जता।
उ.-इनकैं गृह रहि तुम सुख मानत। अति निलज्ज, कछु लाजन आनत-१-२८४।
उ.- नील निलै मिलि घंटा बिबिधि दामिन मनो षोडस सृंगार सोभित हरि हीन-सा. उ. ३८।
(ऐसा समय) जब बहुत काम-काज न हो, फुर्सत का या खाली (समय)।
उ.-अबहिं निवछरौ समय, सुचित ह्वै, हम तौ निधरक कीजै-१-१९१।
उ.- (क) कहु री ! सुमति कहा तोहिं पलटी, प्रानजिवन कैसै बन जात-९-३८। (ख) आतुर ह्वै अब छाँड़ि कौसलपुर प्रान जीवन कित चलन चहत हैं।
प्रिय व्यक्ति, प्यारा, प्राणप्रिय।
उ.- (क) मम कुटुँब की कहा गति होइ। पुनि पुनि मूरख सोचै सोइ। काल तहीं तिहिं पकरि निकारयौ। सखा प्रानपति तउ न सँभारयौ-४-१२। (ख) सूर श्रीगोपाल की छबि दृष्टि भरि भरि लोहिं। प्रानपति की निरखि सोभा पलक परन न देहिं।
उ.- सूरदास धनि धनि वह प्रानी, जो हरि कौ ब्रत लै निबह्यौ-२-८।
उपलब्धि, प्राप्ति, मिलना।
उ.- (क) ताकों हरि-पद-प्रापति होइ-१-२३०। (ख) त्रिबिधि भक्ति कहौं सुनि अब सोइ। जातै हरि-पद प्रापति होइ-३-१३।
कंस की पत्नी का नाम जो जरासंध की पुत्री थी।
उ.- अस्ती अरू प्राप्ती दोउ पत्नी कंसराय की कहियत। जरासंध पै जाय पुकारी महाक्रोध मन दहियत-सारा. ५९६।
प्राण से भी प्रिय, सबसे प्यारा।
देखने में सुन्दर, शुभदर्शन।
स्थल का वह भाग जो तीन ओर पानी से घिरा हो।
वह कृत्य जिसके करने से पाप या दोष से मुक्ति मिल जाती है।
उ.- आपुहिं खात प्रशंसत आपुहिं, माखन-रोटी बहुत प्रियौ-१०-१६८।
उ.- तुम्हारी प्रीति हमारी सेवा गनियत नाहिंन कातें-२५२८।
वह भोज जिसमें इष्टमित्र सप्रेम आमंत्रित हों।
सबको प्रिय देखने-समझने वाला।
स्वायंभुव मनु का एक पुत्र।
उ.- प्रियव्रत बंस धरेउ हरि निज बपु ऋषभदेव यह नाम-सारा. ८५।
उ.-सूरदास स्वामी सो छल सों, कही सकल ब्रजप्रीती-२९४२।
उ.- सुफलकसुत लै गए दगा दे प्राणन ही प्रीते-२४९३।
उ.- बहुरि न जीवन-मरन सो साझो करी मधुप की प्रीत्यो-२८८४।
एक कल्पित देवयोनि जिसका रंग काला और आकृति बिकराल मानी जाती है।
वह कल्पित शरीरजो मनुष्य को मरने के बाद मिलता है।
उ.- घर की नारि बहुत हित जासौं रहति सदा सँग लागी। जा छन हंस तजी यह काया, प्रेत-प्रेत कहि भागी-१-७९।
बहुत चालाक और कंजूस आदमी।
उ.-पुनि लक्ष्मी यों विनय सुनाई। डरौं रूप यह देखि निवाई।
अनुप्रह करनेवाला, कृपालु।
उ.-खंभ फारि हरनाकुस मारथौ, जन प्रहलाद निवाज-१-२५५।
वह प्रकाश जो जंगलों-वनों में सहसा दिखायी देता और प्रेत-लीला समझा जाता है।
उ.- मेरे लाल के प्रेम खिलौना ऐसौ को ले जैहै री-७११।
उ.- सूरदास प्रभु बोलि न आयो प्रेम पुलकि सब गात-२५३१।
उ.- प्रेमा, दामा रूपा हंसा रंगा हरषा जाउ-१५८०।
प्रेम के कारण व्याकुल, प्रेम-पीड़ित।
उ.- गोपीजन प्रेमातुर तिनकौं सुख दीन्हौं-८-३९४।
जिसकी युवावस्था समाप्ति पर हो।
स्त्री जिसकी युवावस्था समाप्ति पर हो।
प्रवृत्त या नियुक्त करने की क्रिया।
जो कोई कार्य करने को उत्साहित या प्रवृत्त किया गया हो।
प्रेरित करता है, प्रवृत्त करता है, कार्य-विशेष में लगाता है, उत्तेजना या उत्साह प्रदान करता है।
उ.- मन बस होत नाहिंनै मेरैं। जिन बातनि तैं बह्यौ फिरत हौं, सोई लै लै प्रेरै-१-२०६।
प्रवृत्त किया, लगाया, बढ़ाया।
उ.- भीषम ताहि देखि मुख फेरयौ। पारथ जुद्ध रथ फेर्यौ-१-२७६।
अच्छी तरह मिला या छिपा हुआ।
उत्साह या उमंग बढ़ानेवाला।
जो उत्साह या उमंग से पूर्ण हो।
वह नायिका जो पति के विदेश जाने से उसके विरह में दुखी हो।
वह नायक जो नायिका के विदेशा जाने से उसके विरह में दुखी हो।
सात कल्पित द्वीपों में एक।
उ.- जम्बू, प्लच्छ, क्रौंच, सराक साल्मलि, कुस, पुष्कर भरपूर-सारा. ३४।
देवनागरी वर्णमाला का बाईसवाँ व्यंजन और प वर्ग का दूसरा वर्ण जिसका उच्चारण-स्थान ओष्ठ है।
कोई सूखा महीन चूर्ण लेकर फाँकने की क्रिया।
चूर्ण की एक बार में फाँकी जानेवाली मात्रा।
चूर्ण की मात्रा जो एक बार में फाँकी जाय।
उ.- (क) सदा जाहु चोरटी भई, आजु परी फँग मोर-१०२३। (ख) दूरि करौं लँगराई वाकी, मेरे फंग जो परिहै-१२६४। (ग) अब तो स्याम परे फँग मेरे सूधे काहे न बोलत-१५१०। (घ) चतुर काम फँग परे कन्हाई अबधौं इनहिं बुझावै को री-१५९३। (ङ) मति कोई प्रीति के फंग परै-२८०८।
प्रीति या अनुराग का बंधन।
उ.- (क) रैनि कहूँ फँग परे कन्हाई कहति सबै करि दौर-२०९०। (ख) कीधौं कतहूँ लमि रहे, फँग परे पराए-२१५९।
उ.- (क) हमैं नन्दनन्दन मोल लिये। जम के फंद काटि मुकराये, अभय अजाद किये-१-१७१। (ख) काटौ न फंद मों अन्ध के अब विलंब कारन कवन-१-१५०। (ग) त्यागे भ्रम-फंद द्वंद निरखि के मुखारबिंद सूरदास अति अनंद मेटे दुख भारे।
सस्सी या बाल का फंदा, जाल, फाँस।
उ.- (क) माधौ जी, मन सबही बिधि पोच।¨¨¨¨¨¨ लुबध्यौ स्वाद मीन-आमिष ज्यौं, अवलोक्यौ नहिं फंद-१-१०२। (ख) हरि-पद-कमल को मकरन्द। मलिन मति मन मधुप परिहरि बिषय नीर-रस फंद। (ग) मनहुँ काम रचि फंद बनाए कारन नन्दकुमार-१०७९।
नथ, बाली आदि की गूँज जिसमें काँटी फँसायी जाती है।
उ.- चारौ कपट पांछ ज्यों फंदत-१०४२।
उ.- (क) आरतिवंत सुनत गजक्रंदन, फंदन काटि छुड़ायौ-१-१८८। (ख) कमल मध्य मनु द्वै खग खंजन बँधे आइ उड़ि फंदन-४७६।
सस्सी, डोरी आदि का घेरा जो किसी को फँसाने के लिए बनाया गया हो, फनी, फाँद।
उ.- फंदा फाँसि कमान बान सों काहू देख्यो डारत मारी।
फंदा लगना- धोखे में फँस जाना।
फंदा लगाना- (१) फँसाने के लिए जाल पैलाना। (२) अपनी चाल में फँसाने का प्रयत्न करना।
फंदे में पड़ना- (१) जाल में फँसना। (२) किसी के वश में होना।
उ.- मोह्यौ जाइ कनक-कामिनि-रस, ममता, मोह बढ़ाई। जिह्वा -स्वाद मीन ज्यों उरझ्यौ सूझी नहीं फँदाई-१-१४७।
किसी से फँसना- किसी से वासनायुक्त प्रेम होना।
बुरा फँसना- विपत्ति या झंझट में पड़ना।
सूरदास तैं कछू सरी नहिं, परी काल-फँसरी-१-७१।
[सं. पाश, हिं. फंसना या फंदा]
बंधन या फंदे में अटका लेना।
उ.- फँसिहारिनि बटपारिनि हम भईं आपुन भये सुधर्मा भारी-११६०।
चेहरा फक हो (पड़) जाना- घबरा जाना।
ऐसा निर्धन जिसके पास कुछ न हो।
अनुग्रह करें, कृपा करके अपना लें।
उ.-जाकौं दीनानाथ निवाजैं। भवसागर मैं कबहूं न झूकै, अभय निसाने बाजैं-१-३६।
उ.-सकटा तृना इनहीं संहारथौ काली इनहिं निवाज्यो-२५८१।
झझकि उठथौ सोवत हरि अबहीं, (जसुमति) कछु पढ़ि तन-दोष निवारति -१०-२००।
फागुन का आमोद- प्रमोद, रंग छिड़कना, गाली गाना आदि।
फगुआ खेलने के उपलक्ष में दिया जानेवाला उपहार।
उ.-(क) अब काहे दुरि रहे साँवरे ढोटा फगुआ देहु हमार-२४०४। (ख) सूरदास प्रभु फगुआ दीजै चिरजीवौ राधा बर जोरी-२८९४।
फागुन में रंग छिड़कना और अश्लील गीत गाकर आनंद मनाना।
फागुन का उत्सव मनाने, रंग खेलने और गीत गानेवाला।
फैली और पतली चीज के हिलने, झटकने या गिरने का शब्द।
सूप जिसमें रखकर अनाज साफ किया जाय।
मूँग-मसूर उरद चनदारी। कनक-फटक धरि फटकि पछारी-३९६।
फटकना-पछोरना- (१) सूप से फटककर साफ करना। (२) जाँचना-परखना।
रुई आदि को फटके से धुनना।
उ.-मोको जुरि मारन जब धाईं तबहिं दीन्हीं गेंडुरि फटकाई।
फटफटाता है, 'फटफट' शब्द करता है
उ.-फटकत स्रवन स्वान द्वारे पर, गररी करत लराई। माथे पर ह्वै काग उड़ान्यौ, कुसगुन बहुतक पाई -५४१।
सूप से फटक कर अनाज साफ करता है।
उ.-झूठी बात तुसी सी बिन कन फटकत हाथ न अवै-३२८७।
महीन या मिला हुआ अनाज और कूड़ा जो फटकने से बच जाय।
उ.-बहुरि तरु लेहि पाषान फटकन लग्यौ हल मुसल करन परहार बाँके-१० उ.-४५।
उ.-(क) घींच मरोरि दियौ कागासुर मेरैं ढिंग फटकारी-१०-६०। (ख) जमुना दह गेंडुरि फटकारी फोरी सिर की गगरी।
चिरना, खंडित होना, टूटना।
छाती फटना- बहुत दुख होना।
चित्त या मन फटना- संबंध रखने को जी न चाहना।
पानी और सार भाग अलग होना।
बहुत अधिक प्राप्त हो जाना।
सूप पर फटक कर साफ करके, कूड़ा-कर्कट निकालकर।
फटकि पछोरी- सूप पर फटक कर साफ की है। उ.-मूँग, मसूर, उरद, चनदारी। कनक-फटक धरि फटकि पछारी-३९६।
फटकि पछोरे- जाँच या परख कर। उ.-तुम मधुकर निर्गुन निज नीके देखे फटकि पछोरे-३२७६।
फटकि पिछोर्यौ- छान छूनकर या खोज-खाजकर गवाँ दी। उ.-नाच कछयौ, अब घूँघट छोर्यौ, लोक-लाज सब फटकि पिछोर्यौ-१२०१।
उ.-बिषधर झटकी पूँछ, फटकि सहसौ फन काढ़ौ-५९।
असुर गजरूढ़ ह्वै गदा मारे फटकि स्याम अंग लागि सो गिरे ऐसे-१० उ.-३२।
उ.-मिले जाइ हरदी चूना त्यों फिरि न सूर फटके- पृ. ३३६ (५२)।
उ.-ललित त्रिभंगी छबि पर अटके फटके मोसों तोरि- पृ. ३२२ (१४)।
भुस फटकै-निरर्थक या मूर्खता का प्रयास करता है।
उ.-सूर स्याम तजि को भुस फटकै मधुप तुम्हारैं हेति-३२५६।
(क) कंठ चाँपि बहु बार फिरायौ, उ.-गहि फटक्थौ, नृप पास परयौ-१०-५९। (ख) नेक फटक्यौ लात, सब्द भयौ आघात, गिरथौ भहरात, सकटा सँहारयौ।
फटता है, चिरता है, टूटता है।
उ.-चटचटात अँग फटत हैं, राखु राखु प्रभु मोहिं-५८९।
उ.- मोक जुरि मारन जब आईं तब दीनी गेंडुरि फटिकाई-८५६।
उ.- यह सब दोष हमहिं-लागत है बिछुरत फटयौ न हियो-२६९२।
माल खरीदने-बेचने का स्थान।
विवाह में वह अवसर जब लेन-देन चुकता हो।
फड़क उठना- उमंग में आना।
फड़क उठना (जाना)- मुग्ध हो जाना।
फाड़कर, छिन्न-भिन्न, करके।
उ.- मनहुँ मथत सुर सिंधु, फेन फटि, दयौ दिखाई पूरन चंद-१०-२०४।
उ.- फटि तब खंभ भयौ द्वै फारि-८-२१।
एक प्रकार का पारदर्शक सफेद पत्थर, बिल्लौर।
उ.- (क) ज्यौं गज फटिक सिला मैं देखत, दसननि डारत हति-१-३००। (ख) ऐसे कहत गए आने पुर सबहिं बिलक्षण देख्यौ। मणिमय महल फटिक गोपुर लखिओं कनक भूमि अवरेख्यौ-।
अंग या शरीर में गति या स्फुरण होना।
बोटी बोटी फड़कना- (१) बहुत चंचलता होना। (२) बड़ी उमंग होना।
उ.-रावन हरन सिया कौ कीन्हो, लुनि नँदनंदन नींद निवारी-१०-१९८।
सकै निवारी-हटा सकता है, रोक सकता है।
उ.-कबहूँ जुवाँ देहिं दुख भारी। तिनकौं सो नहिं सकै निवारी-३-१३।
जूही की जाति का एक पौधा या उसका फूल जो सफेद होता है।
दूर किये, नष्ट किये, हटाये।
उ.-सूरदास प्रभु अपने जन के नाना त्रास निवारे-१-१०।
उ.-रुक्मिनी भय कियो स्याम धीरज दियो, बान से बान तिनके निवारे-१० उ.-२१।
उ.-पुनि जब षष्ट बरष कौ होइ। इत-उत खेल्यौ चाहै सोइ। माता-पिता निवारैं जबहीं। मन मैं दुख पावै सो तबहीं-३-१३।
उ.-जब तैं गंग परी हरि-पग ते बहिबो नहीं निवारै-३१८९।
दूर करूँ, हटाऊँ, नाश करूँ।
उ.-करौं तपस्या, पाप निवारौं-१-२६१।
उ.-प्रभु मेरे गुन- अवगुन न बिचारौ। कीजै लाज सरन आए की, रवि-सुत आस निवारौ-१-१११।
उ.-कियौ न कबहूँ बिलंब कृपानिधि, सादर सोच निवारौ-१-१५७। (ख) अंबरीष कौ साप निवारौ-१-१७२।
उमंग में होना, उत्सुक होना।
उ.- भूमि अति डगमगी, जोगिनी सुनि जगी, सहस फन सेस कौ सीस काँप्यौ-९-१०६।
फन पीटना- बहुत हाथ-पैर मारना।
उ.- कोकिल कीर कपोल किसलता हाटक हंस फनिंगन की।
उ.- सहसौ फन फनि फुंकरै, नैंकु न तिन्हैं बिकार-५८९।
उ.- नील पाट पिरोइ मनि-गन, फनिग धोखैं जाइ-१०-१७०।
अँकुर निकरना कल्ला फूटना।
चंवलता से इधर-उधर हिलना-डोलना।
उ.- जे नख-चन्द्र फनींद्र हृदय ते एकौ निमिष न टारत-१३४२।
उ.- कच्छप अध आसन अनूप अति, डाँड़ी सहसफनी-२-२८।
उ.- बातन न धरति कान, तानति हैं भौंह-बान, तऊ न चलति बाम, आँखियाँ फरकि रही-२२३६।
फरक फरक होना- ' हटो-बचो' होना।
उ.- कुच भुच अधर नयन फरकत हैं, बिनहिं बात अंचल ध्वज डोली।
ऐसी जगह स्थापित करना या रखना कि सुंदर या भला जान पड़े।
उ.- कहाँ साँच मैं खोवत करते झूठे कहाँ फबावत।
उ.- फबि रही मोर चन्द्रिका माथे छवि की उठत तरंग-१३५७।
उ.- तब उलटी-पलटी फबी जब सिसु रहे कन्हाई-९१०।
उ.- उचटत अति अंगार, फुटत फर, झटपट लपट कराल-६१५।
उ.- उड़ियै उड़ी फिरति नैननि सँग, फर फूटें ज्यों आक रुई-१४३३।
दिल कै फफ़ोला (के फफोले) फूटना- जलन या क्रोध प्रकट होना।
दिल का फफोला (के फफोले) फोड़ना- जलन या क्रोध प्रकट करना।
उ.- फागुन में तो लखत न कोऊ फबति अचगरी भारी-२४२०।
सारपूर्ण और समयानुकूल कथन।
फबती उड़ाना- हँसी उड़ाना।
फबती कसना (कहना)- हँसी उड़ाते हुए चुटकी लेना या व्यंग्य करना।
उ.- सदा चतुरई फबती नाहीं अति ही निझरि रही हौ-१५२७।
सुंदर या भला जान पड़ना, शोभा देना, सोहना।
बार-बार हिलाना, फड़फड़ाना।
फड़काते हैं, हिलाते हैं, संचालित करते हैं।
उ.- कबहुँ पलक हरि मूँदि लेतहैं, कबहुँ अधर फरकावैं-१०-४३।
बाँस की तीली जिसमें लासा लगा कर पक्षी फँसाया जाता है।
(शरीर के अवयव का सहसा) फड़कने लगे, उड़ने या फड़फड़ाने लगे।
उ.- इतनौ कहत नैन उर फरके, सगुन जनायौ अंग-९-८३।
उ.- घर घर केरी फरके खोलै-२४३८।
उ.- नव लख धेनु दुहत हैं नित प्रति, बढ़ा नाम है नन्द महर कौ। ताके पूत कहावत हौ तुम, चोरी करत उघारत फरकौ-१०-३३३।
[सं. स्प्रश्य, प्रा. फरस्स]
[सं. स्प्रश्य, प्रा. फरस्स]
मिटाने, हटाने या दूर करने की क्रिया।
निवृत्ति या छुटकारा दिलानेवाला।
उ.-तीनि लोक के ताप-निवारन, सूर स्याम सेवक सुखकारी-१-३०।
हटाने, दूर करने या मिटाने के उद्देश्य से।
उ.-अजिर चली पछिताति छींक कौ दोष निवारन-५८९।
रोको, दूर करो, हटाओ, छोड़ो।
उ.-लेहु मातु, सहिदानि मुद्रिका, दई प्रीति करि नाथ। सावधान ह्वै सोक निवारहु, ओड़हु दच्छिन हाथ-९-८३।
उ.-अपनी रिस निवारि प्रभु, पितु मम अपराधी, सो परम गति पाई-७-४।
उ.- (क) लाखा-गृह तैं, सत्रु-सैन तैं, पांडव-बिपति निवारी-१-१७। (ख) सरनागत की ताप निवारी-१-२८।
फड़कने की क्रिया या भाव, फड़क।
छप्पर जो अलग छाकर बँडेर पर चढ़ाया जाय।
टट्टर जो द्वार पर लगाया जाता है।
उ.- अंग फरकाइ अलप मुसुकाने-१०-४६।
अंग या शरीर हिलाना-डुलाना या संचालित करना।
नकली, बनावटी, जो असली न हो।
उ.- माँड़ि माँड़ि खरिहान क्रोध कौ, पोता-भजन भरावै। वट्टा काटि कसूर भरम कौ, फरद तले लै डारै-१-१४२।
उ.- जिनि जायौ ऐसौ पूत, सब सुख-फरनि फरी-१०-२४।
उ.- कंस के प्रान भयभीत पिंजरा जैसे नव बिहंगम तैसे मरत फरफराने-२५९६।
बिछाने का वस्त्र, बिछावन।
फलाये, फल उत्पन्न किये, फल लगाये।
उ.- सूर. स्याम जुवतिनि ब्रत पूरन, कौ फल डारनि कदम फराए-७८४।
उ.- जिनि जायौ ऐसौ पूत, सब सुख-फरनि फरी-१०-२४।
उ.- पोई परवर फाँग फरी चुनि-२३२१।
उ.- लरत निकसी सबै तोरि फरिकै-पृ. ३३९ (९०)।
एक प्रकार का लहँगा-नुमा कपड़ा जो सामने सिला नहीं रहता और जिसे स्त्रियाँ और लड़कियाँ कमर में बाँधती हैं।
उ.- (क) सारी चीरि नी फरिया लै, अपने हाथ बनाइ। अंच्ल सौं मुख पोंछि अंग सब, आपुहि लै पहिराइ-७०४। (ख) नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनी पीठ रूचिर झकझोरी।
उ.- फूले फरे तरुवर आनँद लहर के-१०-३४।
उ.- (क) तरुवर फूलै, फरै, पतझरै, अपने कालहिं पाइ-१-२६५। (ख) जंबू बृक्ष क्हो क्यों लंपट फल बर अंबु फरै-३३११।
उ.- नैन भर ब्रत फलहिं देखौ, फर्यौ है द्रुम डार-७८६।
फर्राटा भरना (मारना)- तेजी से दौड़ना।
उ.-भयौ प्रसाद जु अंबरीष कौं, दुरबासा कौ क्रोध निबार्यौ-१-१४।
उ.-सतगुरु कौ उपदेस हृदय धरि, जिन भ्रम सकल निवार्यौ-१-३३६।
उ.-मेघ बारि तैं हमैं निवारथौ-३४०९।
उ.-सूरदास के प्रभु बहुरि, गए बैकुंठ-निवास-३-११।
फर्राशी पंखा- हाथ का बहुत बड़ा पंखा।
लताओं और पेड़- पौधों में लगनेवाला वह पोषक द्रव्य जिसमें गूदा, रस और बीज आदि रहते हैं और जो फूलों के बाद उत्पन्न होता है
उ.- भिल्लिनि के फल खाए भाव सौं खाटे-मीठे खारे-१-२५।
प्रयत्न या क्रिया का परिणाम, नतीजा।
फल चखाना- मजा चखाना, दंड देना।
फल चखैहौं- दंड दूँगा, मजा चखाऊँगा। उ.- यह हित मनै कहत सूरज-प्रभु इहिं कृतिकौ फल तुरत चखेहौं-७-५।
फल देना-मजा चखाना, दंड देना।
फल देहिंगी- मजी चखाएँगी, दंड देंगी। उ.- लालन हमहिं करे जो हाल उहै फल देहिंगी हो-२४१६।
फल पाना- दंड पाना, मजा चखना।
फल पैहैं- दंड पायैगे। उ.- कितक ब्रज के लोग, रिस करत बिहिं जोग, गिरि लियो भोग, फल तुरत पैहैं-९४४।
शुभ अशुभ कमों के सुखद-दुखद परिणाम।
उ.- (क) बालक ध्रुव वन करन गहन तप ताहि तुरत फल दैहौं। (ख) जा दिन संत पाहुने आवत। तीरथ कोटि सनान करैं फल जैसौ दरसन पावत-२-१७। (ग) सिव-संकर हमकौं फल दीन्हों-७९८। (घ) मुँह माँगे फल जो तुम पावहु तौ तुम मानहु मोहिं-९१५।
शुभ कमों के चार परिणाम-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
उ.- होइ अटल डगदीस भजन में सेवा तासु चारि फल पावै।
बाण, छुरी आदि का अगला भाग।
गणित की क्रिया का परिणाम।
विवाह की रीति जिसमें धन, मिठाई आदि भेजकर वर को कन्या के लिए निश्चित किया जाता है।
फलना-फूलना- (१) मनोरथ पूर्ण होना। (२) सुखी होना। (३) धन-संतान से पूर्ण होना।
नाटक में नायक के उद्देश्य की सिद्धि या फल की प्राप्ति का स्थल।
उ.- गर्भवती हिरनी तहँ आई। पानी सो पीवन नहिं पाई। सुनि कै सिंहभयान अवाज। मारि फनाँग चली सो भाग-५-३।
वह दूरी जो फलाँग से तै की जाय।
जो (भोजन) फलों का हो, अनाज का न हो।
उ.- फल फलित होत फल-रूप जानैं-१-१०४२।
उ.- विष के बक्ष विषहिं बिष फलिहै-१०४२।
पौधों के वे लंबे चिपटे फल जिनमें गूदा-रस न होकर दीज बोने हैं।
उ.- फली अगस्त्य करी अमृत सम-२३२१।
उ.- वह रितु अमृत लता सुनि सूरज अब विष फलनि फली-२७३४।
उ.- यहै कहत सब जात परस्पर, सुकृत हमारे प्रगट फले-९८३।
फल्यो बिहाने (प्रातःकाल)-कल ही पूजा की यी, प्रातः होते ही उसका फल मिल गया (व्यंग्य)।
उ.- कालिहि पूज्यो फल्यो बिहाने-१०५१।
नस काट कर, दूषित रक्त निकालने की क्रिया।
उ.- न्यौछावर अचल की फहरनि अर्ध नैन जलधार घनी-१४५६।
फहराता है, उड़ता या हिलता है।
उ.- (क) स्वेत छत्र फहरात सीस पर, मनौ लच्छि कौ बंध-९-७५। (ख) कमलनैन काँधे पर न्यारो पीत बसन फहरात-२५३९।
(उ.- क) वा पट पीत की फहरानि। कर धरि चक्र चरन की धावनि, नहिं बिसरत वह बानि-१-२७९। (ख) पीत पट फहरानि मानो लहरि उठत अपार -१३५६।
एक फंके में आनेवाली वस्तु।
उ.- जरासिंधु कौ जोर उघारयौ फारि कियौ द्वौ फाँकौ-१-१३३।
उ.- (क) रुचिर लजालु लोनिका थीगी। कढ़ी कृपालु दूसरैं माँगी-३९६। (ख) पोई परवर फाँग फरी टुनि-२३२१।
वायु में फड़फड़ाता या उड़ता हे।
उ.- आजु हरि धेनु चराए आवत। मोर मुकुट बनमाल बिराजत, पीतांबर फहरावत-४९३।
उ.- मोर मुकुट कुंडल बनमाला पीतांबर फहरावै-८४०।
उ.-सूरदास प्रभु नवल कान्ह वर पीतांबर फहरैहैं-१२७७।
फहरेगी, हवा में उड़े या हिलेगी।
उ.- जा दिन कंचनपुर प्रभु ऐहैं, बिमल ध्वजा रथ पर फहरैहै-९-८१।
टुकड़े में बाँटनेवाली लकीर।
धूल फाँकना- मारे-मारे घूमना।
उ.- मनो मन्मथ फाँदि फंदनि मीन बिवि तट ल्याइ-१४०५।
उ.- (क) मेरी बेर क्यौं रहे सोचि ? काटिकै अव-फाँस पठवहू, ज्यौं दियौ गज मोचि-१-१९९। (ख) सूरद्वास भगवंत-भजन बिनु, करम-फाँस न कटै-१-२६३। (ग) ए सब त्रय गुन फाँस समान।
किसी को बाँधने या फँसाने का फंदा या जाल।
उ.- (क) ब्रह्म-फाँस उन लई हाथ करि-९-१०४। (ख) हँसि-हँसि नाग- फाँस सर साँधत, बंधन बंधु-समेत बँधायौ-९-१४१। (ग) बरुन फाँस ब्रज-पतिहिं छिन माँहि छुड़ावै।
बाँस या काठ का कड़ा महीन रेशा जो काँटे की तरह चुभ जाता है।
फाँस चुभना- चित को खटकने या चुभनेवाली बात होना।
फाँस निकलना- कष्ट देने वाली चीज का न रह जाना।
फाँस निकालना- कष्ट देनेवाली चीज को दूर करना।
बाँस आदि की पतली तीली या कमानी।
फागुन मास में मनाया जानेवला उत्सव जिसमें लोग एक-दूसरे पर रंग छिड़कते हैं।
उ.- (१) सकुच न करत, फाग सी खेलत, तारी देत, हँसत मुख मोरि-१०-३२७। (२) कुबिजा कमल नैन मिलि खेलत बारहमासी फाग-३०९५।
फाल्गुन, माध के बाद का महीना जिसकी पूर्णिमा को होली जलती है।
भूसी या किनकी जो अनाज फटकने से बच जाय, फटकन, पछोड़न।
उ.- फाटक दै कै हाटक माँगत मोरो निपट सुधारी-३३४०।
फटता, टूटता या विदीर्ण होता है, भग्न होता है।
उ.- (क) टूटत फन, फाटत तन दुहुँ दिसि, स्याम निहोरौ कीजै-५७६। (ख) निकसि न जात प्रान ए पापी फाटत नहीं बज्र की छाती-२८८२।
बंधन में डालना, जाल में फँसाना।
उ.- (क) भजन-प्रताप नाहिं मैं जान्यौ, परयौ मोह की फाँसि-१-१११। (ख) माया मोह लोभ अरु मान। ए सब त्रयगुण फाँसि समान।
रस्सी जिससे शिकारी फंदा डालते हैं।
उ.- (क) चंचल, चपल, चबाइ, चौपटा लिए मोह की फाँसी-१-१८६। (ख) ताकौं देह-मोह बड़ फाँसी-४-५। (ग) आए ऊधौ फिरि गए आँगन डारि गए गर फाँसी-३०३०। (घ) कीनी प्रीति हमारे ब्रज सों दई प्रेम की फाँसी-३१३३।
फंदा जो दम घोटकर मारने के लिए डाला जाता है।
प्राणदण्ड देने के लिए डाला जानेवाला फंदा।
उ.- दूध फाटि जैसे भयो काँजी कौन स्वाद करि खाइ-३३३४।
उ.- (क) बड़ी बार भई, लोचन उघरे, भरम-जवनिका फाटी-१०-२५४। (ख) सरिता संयम स्वच्छ सलिल जनु फाटी काम कई-२८५३।
उ.- फूटी चुरी गोद भरि ल्यावैं, फाटे चीर दिखावैं गात-१०-३३२।
फटा, छिन्न-भिन्न हुआ, एकत्र न रहा।
उ.- (क) ज्यौं रवि-तेज पाइ दसहूँ दिसि, दोष-कुहर कौ फाटयौ-९-८७। (ख) हरि बिछुरत फाटयो न हियो-२५४५।
द्रव का पानी और सार अलग करना।
शीशे का कमल या गिलास जिसमें बत्ती जले।
फाड़कर, चीरकर, विदीर्ण करके।
उ.- (क) खंभ फारि नरसिंह प्रगट ह्वै, असुर के प्रान हरे-१-८२। (ख) चीरि फारि करिहौं भगौहौं सिखनि सिखि लवलेस-३४१३।
उ.- उड़ाकर। फोरि-फारि, तोरि-तारि, गगन होत गाजैं-९-१३९।
उ.- फटि तब खंभ भयौ ह्वै फारि-७-२।
उ.- (क) संकट तैं प्रहलाद उधार्यौ, हिरनाकसिपु-उदर नख फारी-१-२। (ख) कबहिं गुपाल कंचुकी फारी-७७४।
उ.- कहत प्रहलाद के धारि नरसिंह बपु निकसि आए तुरत खंभ फारी-७-६।
उ.- हिरनकसिपु उर फारे हो-१०-१२८।
उ.- हार तोरै चीर फारै, नैन चलै चुराइ-७८०।
फाड़ दिया, चौरा, विदीर्ण किया।
उ.- जिहिं बल हिरनकसिपु उर फार्यौ, भए भगत कौं कृपानिधान-१०-१२७।
फाल भरना- डग भरना।
फाल बाँधना- फलाँग या छलाँग मारना।
उ.- तीन फाल बसुधा सब कीनी सोइ बामन भगवान।
मूर्च्छा या बेहोशी में मुँह से निकलनेवाला फेन।
मुँह पर फिटकार बरसना- चेहरा बहुत फीका या उदास होना।
आवश्यकता या जरूरत से ज्यादा।
फालसे के रंग का, ललाई लिये हल्के ऊदे रंग का।
एक छोटा पेड़ जिसमें मोती के दाने जैसे फल लगते हैं।
माघ के बाद का महीना जिसकी पूर्णिमा को होली जलायी जाती है।
मिट्टी खोदने का एक औजार जो फरसे की तरह का होता है।
विरक्ति, 'प्रवृत्ति' का विपरीतार्थक।
निवेदन करनेवाला, प्रार्थी।
समर्पण करना, नैवेद्य चढ़ाना।
चढ़ाया या अर्पित किया हुआ।
वसूल करना, लेना, संग्रह करना।
उ.-सूर मूर अक्रूर गयौ लै ब्याज निवेरत ऊधौ-३२७८।
फिर-फिर-बार बार, पुनः पुनः।
फिर क्या है- तब क्या पूछना है ?
वह गोल चीज जो कीली पर घूमती हो।
लड़कों की फिरहरी नामक खिलौना जो नचाया जाता है।
उ.- काल फिरत बिलार तनु धरि, अब घरी तिहिं लेत-१-३११।
प्रचारित या घोषित होता हे।
उ.- बोलत बग निवेत गरजै अति मानो फिरत दोहाई-२८३६।
उ.- कहा कृपिन की माया गनियै, करत फिरत अपनी-अपनी-१-३९।
उ.- माधौ जू, यह मेरी इक गाइ।¨¨¨¨¨¨ फिरति बेद-बन-ऊख उखारति, सब दिन अरु सब राति-१-५१।
उ.- अपने दीन दास कैं हित लोग, फिरते सँग-सँगही-१-२८३।
दिखावत फिरतौ-दिखाता फिरता।
उ.- धर्म-धुजा अन्तर कछु नाहीं, लोक दिखावत फिरतौ-१-२०३।
मुख या सामना दूसरी ओर घूम जाना, मुड़ना, रुख बदलना।
फिराकर, लौटाकर, अपने वचन को वापस लेकर।
उ.- भक्तबछल श्री जादवराइ। भीषम की परतिज्ञा राखी, अपनों बचन फिराइ-१-२६७।
उ.- बृषभ-गंजन मथन-केसी हने पूँछ फिराइ-४९८।
उ.- (क) भुकृटी कुटिल, अरून अति लोचन, अगिनि-सिखा-मुख कहयौ फिराई-९-५६। (ख) नगन त्रिय देखिबे जगत नाहिन कहयो, जानि इह हरि रहे मुख फिराई-१०उ.-३५
दूसरी दिशा में चलने की प्रेरणा दी।
उ.- उतही जातहि सखी सहेली मैं ही सबको इतहि फिराई-१०४९।
फिराक में रहना- खोज में रहना।
किसी ओर फिरना- झुकना, प्रवृत्त होना।
जी फिरना- जी हट जाना, उदास या विरक्त होना।
विरुद्ध या विपक्ष में हो जाना।
बदल जाना, परिवर्तित हो जाना।
बात या वचन पर दृढ़ न रहना।
चारो ओर प्रचारित या घोषित होना।
मुख या सामना दूसरी ओर करना।
एक ओर जाते हुए को दूसरी ओर चलाना।
बात या बचन पर दृढ़ न रहने देना।
उ.- बहुत जतन करि हौं पचि हारी इतको नहीं फिरानो-पृ. ३२० (९०)।
उ.- उन नहिं मारयौ सम्मुख आयो पकरयो पूँछ फिराय।
उ.- (क) कंठ चाँपि बहु बार फिरायो, गहि पटक्यौ, नृप पास परयौ-१०-५९। (ख) यह ऐसो तुम अतिहि तनक से कैसे भुजन फिरायो-२३६९।
लौटाता है, वापस करता है, विमुख करता है।
उ.- तुम नारायन भक्त कहावत। काहे को तुम मोहि फिरावत।
उ.- लंका फिरि गई राम दुहाई-९-१४०।
उ.- खेलन जाहु बाल सब टेरत। यह सुनि कान्ह भए अति आतुर, द्वारैं तन फिरि हेरत-१०-२४३।
आवागमन, बार-बार जन्म लेना और मरना।
उ.- जिय करि कर्म, जन्म बहु पावै। फिरत-फिरत बहुतै स्रम आवै। अरू अजहूँ न कर्म परिहरै। जातैं याकौ फिरिबौ टरै-५-४।
उ.- बेगि ब्रज को फिरिए नँदराइ-२६५१।
फिरता रहूँगा, घूमता रहूँगा।
उ.- कब लग फिरिहौं दीन बह्यौ-१-१६२।
चारों ओर प्रचारित हुई. घोषित हुई।
उ.- गहि सारँग; रन रावन जीत्यौ, लंक बिभीषन फिरी दुहाई-१-२४।
उ.- चली पीठि दै दृष्टि फिरावति, अंग-अंग आनन्द रली-७३९।
फिराने या लौटाने की क्रिया।
उ.- मंत्री गयौ फिरावन रथ लै, रघुबर फेरि दियौ-९-४६।
उ.- (क) दुरबासा अँबरीष सतायौ, सो हरि-सरन गयौ। परतिज्ञा राखी मन-मोहन, फिरि तापैं पठयौ-१-३८। (ख) यह औसर कब ह्रैहै फिरिकै पायौ देव मनाई-१०-१८।
फिरि फिरि-पुनः पुनः, बार-बार।
उ.- (क) सूरदास भगवंत-भजन बिनु फिरि फिरि जठर जरै-१-३५। (ख) फिरि फिरि ऐसोई है करत। जैसैं प्रेम पतंग दीप सौं पावक हू न डरत-१-५५। (ग) दीन-दयाल सूर हरि भजि लै, यह औसर फिरि नाहीं-१-३१९।
इसके अंनतर, बाद में, पश्चात, उपरांत।
उ.- सूर पाइ यह समै लाहु लहि, दुर्लभ, फिरि संसार-१-६८।
उ.- फल माँगत फिरि जात मुकर ह्वै यह देवन की रीति-१-१७।
घूमकर, मुँह, फेरकर, पलटकर।
उ.- फिरि देखैं तो कुँवर कन्हाई मीजत रूचि सौं पीठ-७३८।
उ.- (क) कौन कौन तीरथ फिरि आए-१-१८४। (ख) नृप चौरासी लछ फिरि आनौ-४-१२।
उ.- इहिं अंतर अर्जुन फिरि आयौ-२८६।
उ.- बहुत फिरी तुम काज कन्हाई-४६२।
उ.- (क) देखि फिरे हरि ग्वाल दुवारैं-१०-२७७। (ख) अपने धाम फिरै तब दोऊ जानि भई कछु साँझ। (ग) नैन निरखि अजहूँ न फिरे री-पृ. ३२७ (६०)।
उ.- किंकिन नूपुर पाट-पटंबर, मानौं लिये फिरैं घर-बार-१-४१।
उ.- कौन बिरत्क अधिक नारद तैं,निसि दिन भ्रमत फिरै-१-३५।
सैर करती है, विचरती है, टहलती है।
उ.- अंकथ कथा याकी कछू, कहत नहीं कहि आई (हो)। छैलनि के सँग यौं फिरै, जैसैं तनु सँग छाई (हो)-१-४४।
फिरेगा, इधर-उधर डोलेगा, घूमेगा।
उ.- चौरासी लख जोनि जन्मि जग, जल-थल भ्रमत फिरैगौ-१-७५।
उ.- बहुतक दिवस भए या जग मैं, भ्रमत फिरयौ मतिहीन-१-४६।
व्यर्थ, निष्फल, सारहीन, प्रभावरहित।
उ.- जन यह कैसे कहे गुसाईं। तुम बिनु दीनबंधु, जादवपति, सब फीकी ठकुराई-१-१९५।
उ.- बिनु रघुनाथ माहिं सब फीके, आज्ञा मेटि न जाइ-९-१६१।
उ.- महा कठोर, सुत्र हिरदै कौ, दोष देन कौ नीकौ- बड़ौ कुतध्नी और निकम्मा,बेधत, राँकौ-फीकौ-१-१८६।
स्वादहीन, नीरस, अरीचिकर, जो चखने में अच्छा न लगे।
उ.- (क) देह गेह सनेह अर्पन कमल लोचन ध्यान। सूर उनको भजन देखत फीकौ लागतज्ञान। (ख) जो रस खाइ स्वद करि छाँड़े सो रस लागत फीको-२९३८।
उ.-सूरदास सब नातो ब्रज को आए नंद निवेरि-२८७५।
उ.-आजु भई कैसी गति तेरी ब्रज में चतुर निवेरी।
जी फिसलना- (१) मन ललचाना। (२) मोहित होना।
[सं. अपक्क, प्रा. अपिक्क]
[सं. अपक्क, प्रा. अपिक्क]
[सं. अपक्क, प्रा. अपिक्क]
[सं. अपक्क, प्रा. अपिक्क]
उ.- सहसौ फत फनि फुंकरे, नैंकु न तिन्हैं बिकार-५८९।
फुँकार मारी, फूत्कार छोड़ी, फूँ फूँ शब्द किया।
उ.- पूंछ लीन्हीं झटकि धरनि सौं गाहे पटकि फुंकरयौ लटाकि करि क्रोध फूले-५५२।
मुख से हवा का झोंका निकलने का शब्द, फूत्कार।
उ.- (क) कंस कोट जरि जाहिंगे, बिष की एक फुंकार-५८९। (ख) सहस फन फुंकार छाँड़ जाइ काली नाथियाँ।
उ.- उचटत अति अंगार, फुटत फर, झटपट लपट कराल-६१५।
हर्ष या उमंग से फूल जाना।
उ.- सहस फन फुफुकार छाँड़े, जाइ काली नाथियाँ-५७७।
किसी वस्तु को हिलाना-डुलाना।
प्रभाव करता है, असर डालता है, लगता है।
उ.- पौढ़े कहा समर-सेज्या सुत, उठि किन उत्तर देत। थकित भए कछु मंत्र न फुरई, कीने मोह अचेत-१-२९।
उ.- जंत्र न फुरत मंत्र नहिं लागत प्रीति सिरानी जाति।
स्फुटित हुआ, उच्चरित हुआ, मुँह से निकला।
उ.- (क) कोउ निरखति अधरन की सोभा फुरति नहीं मुख बानी-६४४। (ख) फुरत न बचन कछू कहिवे को रहे बैन सो हारी-३३१३।
उ.-द्विविद लै साल को बृक्ष सम्मुख भयो फरति करि राम तनु फेंकि मारयौ-१० उ.-४५।
उ.- सिथिल गात मुख बचन फुरति नहिं ह्वै जो गई मति भोरी।
पंख, कपड़े आदि की फड़फड़ाहट।
सत्य या ठीक हुई, पूरी उतरी।
उ.- फुरी तुम्हारी बात कही जो मोसों रही कन्हाई।
उ.- उठि के मिले तंदुल हरि लीन्हें मोहन बचन फुरे।
फुरे न जंत्र मंत्र नहिं लागे, चले गुनी गुन हारे-७४७।
सींक जिसके सिरे पर दवा, इत्र आदि लगाने को रुई लिपटी हो।
फुरेरी आना- कँपकँपी होना।
फुरेरी लेना- (१) काँपना। (२) फड़कना, फड़फड़ाना।
उ.- फुरै न बचन बरजिबै कारन, रहीं बिचारि बिचारि-१०-२८३।
उ.- फुरै न मंत्र, जंत्र नहिं लागे, चले गुनी गुन हारे-७४७।
ऐसी आतिशबाजी जिसमें फूल-सी चिनगारियाँ निकलें।
ऐसी बात जिससे परस्पर झगड़ा या विवाद हो जाय।
फुलवाई, फुलवाड़ी, फुलवारी
उ.- (क) इक दिन सुक्रसुता मन आई। देखौ जाइ फूल फुलवाई-९-१७४। (ख) रितु बसंत फूली फुलवाइ-११७-५।
[हिं. फूल + वारी, फुलवाड़ी]
उ.- पियरी, भौरी, गोरी, गैनी, खेरी, कजरी, जेती। दुलही, पुलहीं, भौंरी, भूरी, हाँकि ठिकाई तेती-१०-४४५।
वस्तु के विस्तार या फैलाव के बाहर की ओर बढ़ाना।
गाल (मुँह) फुलाना- रूठना, रिसाना।
दत्तात्रेय के पुत्र, एक ऋषि।
उ.-मैं कह आजु निवेरी आई ? बहुतै आदर करति सबै मिलि पहुने की कीजै पहुनाई।
परम निशंक समर सरिता तट क्रीड़त यादववीर-१० उ.-१०२।
मेष, वृष, मिथुन आदि छह राशियाँ।
फूल की तरह का कोई आभूषण या उसका भाग।
मीठी बातों से अपने अनुकूल करना।
बाल गूँथने की डोरी या चोटी जिसमें फूल या फुँदना लगा हो।
[सं. स्फुलिंग, प्रा. फुलिंग]
कील, काँटे आदि का चिपटा सिरा।
कान या नाक की ‘लौंग’ नामक गहना।
उ.- उर धारी लटैं छूटी आनन पै, भीजी फुलेलन सों आली हरि संग केलि-१५८२।
सूत, रेशम आदि के फूलों से बना बंदनवार।
उ.- पापर, बरी, मिथौरि फुलौरी। कूर बरी काचरी पिठौरो-३९६।
बहुत महीन बूँदों की वर्षा जो उड़ती जान पड़े।
महीन-महीन बूँदों की झड़ी, फुहार।
उ.- सिर बरसत सुमन सुटेस, मानौ मेघ फुही-१०-२४।
ओठों सी छोड़ी हुई सवेग वायु।
उ.- (क) कहा कंस दिखरावत इनकौं, एक फूँक ही मैं जरि जाई-५५०। (ख) एक फूँक कौ नाहिं तू बिष-ज्वाला अति तात-५८९।
फूँक निकल जाना (निकलना)- मरना।
मंत्र पढ़ कर मुँह स छोड़ी गयी वायु।
झाड़-फूँक - तंत्र-मंत्र का उपचार।
फूँक मारती है, फूँकती है।
उ.- बरा कौर मेलत मुख भीतर, मिरिच दसन टकटौरे। तीछन लगी नैन भरि आए, रोवत बाहर दौरे। फूँकति बदन रोहिनी ठाढ़ी, लिए लगाइ अँकोरे-१०-२२४।
फूँक फूँक कर चलना (पैर रखना)- बहुत सावधानी से काम करना।
मंत्र आदि पढ़कर फूँक मारना।
शंख आदि को फूँक मारकर बजाना।
उ.- फूँकि फूँकि जननी पय प्यावति, सुख पावति जो उर न समैया-१०-२२९।
फूँफिँ फूँकि पग धारौ- बहुत बचाकर चलो, होशियारी से काम करो। उ.- फूँकि फूँकि धरनी पग धारौ, अब लागीं तुम करन अयोग-१४९७।
उ.- (क) फूँकि फूँकि हियरौ सुलगावत उठि किन इहाँ ते जात-३०२३। (ख) सुलगि सुलगि हम जरत हो तुम आनि फूँकि दई।३१३१।
उ.- रत्न जटित गजरा बाजूबँद सोभा भुजन अपार। फूँदा सुभग फूल फूले मनो मदन बिटप की डार-२०६२।
फूट डालना- वैर या झगड़ा कराना।
एक तरह की बड़ी ककड़ी, एक फल।
फूट-सा खिलना- पककर दरक जाना।
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
फूटी आँख का तारा- कई बेटों के मरने पर बच जानेवाला बेटा।
फूटी आँखों न भाना- बहुत ही बुरा लगना।
फूटी आँखों न देख सकना- बहुत जलना, कुढ़ना।
फूटे मुँह से भी न बोलना- (१) मुँह से एक शब्द भी न निकालना। (२) उपेक्षा करना।
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
फोड़े फुंसी की तरह निकलना।
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
अंकुर-शाखा आदि निकलना, अंकुरित होना।
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
मार्ग आदि का अलग होकर जाना।
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
शब्द का मुँह से निकलना, बोलना।
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
फूट फूट कर रोना- बहुत विलाप करना।
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
रोक, परदा, बाँध आदि का टूटना।
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
उ.- ज्यों सुक सेमर-फूल बिलोकत, जात नहीं बिनु खाए -१-१००।
फूल आना- फूल लगना।
फूल उतारना (चुनना) - फूल तोड़ना।
फूल झड़ना- प्रिय और मधुर शब्द कहना।
फूल-सा- बहुत कोमल, हलका या सुन्दर।
फूल सूँघकर रहना- बहुत कम खाना (व्यंग्य)।
पान-फूल-सा- बहुत कोमल और सुकुमार।
दीपक की बत्ती का गुल या उससे निकलने वाली चिनगारी।
उ.- हरि जू की आरती बनी।¨¨¨। उढ़त फूल उड़गन नभ अंतर, अंजन घटा घनी -२-८८।
द्रव का किसी चीज पर फैल जाना।
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
शरीर के जोड़ों में दर्द होना।
[हिं. स्फुटन, प्रा. फूटन]
उ.- निसि दिन बिषय- बिलासनि बिलसत, फूटि गईं तब चारयौ-१-१०१।
उ.- (क) टूटे कंध अरू फूटी नाकनि, कौलौं धौं भुस खेहो-१-३३१। (ख) फूटी चूरी गोद भरि ल्यावै-१०-३३२।
उ.- एक अँधेरौ, हिए की फूटी, दौरत पहिरि खराऊँ -३४६६।
भेदकर निकले, झोंके से बाहर आए, छटे, उदित हो।
उ.- सूरदास तबहीं तम नासे, ज्ञान-आंगनि-झर फूटें -२-१९।
शव के जलने से बची हड्डियाँ।
चैत्र शुक्ल एकादशी को मनाया जानेवाला उत्सव जिसमें श्रीकृष्ण का झूला फूलों से सजाया जाता है।
उ.- माई फूले फूले ही फूलत श्री राधेकृष्णा झूलत सरस रस ही फूलडोल -२४०१।
उ.- ज्यों जल-रूह ससि-रस्मि पाइ कै फूलत नाहिंन सर तैं -३५४।
उ.- हरि-बिधु मुख नहिं नाहिंनै फूलति मनसा कुमुद कली -२७३४।
विगत घटना या वस्तु सूचक चिह्न।
उ.-तीर चलावत शिष्य सिखावत धर निशान देखरावत-सारा. १९०।
फूलना-फूलना- (१) धन-संतान से सुखी रहना। (२) सभी तरह से प्रसन्न और सुखी रहना।
हवा आदि से किसी चीज की गोलाई, या मोटाई बढ़ना।
गर्व में भरकर, घमंड में होकर, इतराकर।
उ.-कबहुँक फूलि सभा मैं बैठ्यौ, मूँछनि ताव दिवायौ-१-३०१।
उ.-(क) मनु भोर भऐं रवि देखि, फूलीं कमल-कली-१०-२४। (ख) पूरन मुख-चंद देखि नैन-कोइ फलीं-६४२।
उ.-रितु बसंत फूली फुलवाई-१० उ.-२०५।
उ.-फूली फिरै धेनु धाम, फूली गोपी अँग अँग-१०-३४।
फूले अंग न समाई- बहुत आनंदित हुई। उ.-भले ही मेरे लालन आये री आजु मैं फूली अंग न समाई- पृ ३१९(८१)।
बहुत प्रसन्न या आनंदित होकर।
उ.-(क) आजु दसरथ कैं आँगन भीर।¨¨¨¨¨ फूले फिरत अजोध्यावासी, गनत न त्यागत चीर-९-१६। (ख) फूले फिरैं गोपी-ग्वाल टहर-टहर के-१०-३४। (ग) गावत गुन गोपाल फिरत कुंजन में फूले-३४४३।
ऐसा झोंका देना कि दूर जाकर गिरे।
एक स्थान से हटाकर दूसरे में डालना।
अपना पीछा छड़ाकर दूसरे पर बोझ डालना।
फूले अंग न मात (समात)- बहुत अधिक प्रसन्न हुए। उ.-जानि चीन्हि पहिचानि कुँवर मन फूल अंग न मात-१० उ.-८।
उ.-(क) मन के मनोज फूले हलधर बर के-१०-३४। (ख) व जो देखत राते राते फूलन फूले डार-२७९८।
फूले-फरे- फल और पुष्प से युक्त हो गयै। उ.-फूले-फरे तरुवर आनंद लहर के-१०-३४।
उ.-पूँछ लीन्ही झटकि, धरनि सौं गहि पटकि, फुंकरयौ लटकि करि क्रोध फूले-५५२।
फूल लगते हैं, पुष्पित होता है।
उ.-तरुवर फूलै, फरै, पतझरै, अपने कालहिं पाइ-१-२६५।
फूल्यौ न समाई- फूला न समाया, अत्यंत आनंदित हुआ। उ.-हनुमत बल प्रगट भयौ, आज्ञा जब पाई। जनक-सुतृचरन बंदि, फूल्यौ न समाई-९-९६।
उ.-फेंट पीतपट, साँवरे कर पलास के पात। परस्पर ग्वाल सब बिमल-बिमल दधि खात।
कमर में बेंधा कपड़ा, कमरबंद, पटुका।
उ.-(क) खायबे को कछु भाभी दीनी श्रीपति मुख तैं बोले। फेंट उपरि तैं अंजुलि तंदुल बल करि हरि जू खोले। (ख) स्याम सखा कौं गेंद चलाई। श्रीदामा हरि अंग बचायौ, गेंद परयौ कालीदह जाई। धाय गह्यौ तब फेंट स्याम की, देहु न मेरी गेंद मँगाई।
फेंट कसना (बाँधना)- कमर कसकर हर बात के लिए तैयार होना।
कसि फेंट- कटिबद्ध होकर, सन्नद्ध होकर, कमर कसकर सब कठिनाइयों को झेलने के लिए तैयार होकर। उ.-अब लोग प्रभु तुम बिरद बुलाए, भई न मोसों भेंट। तजौ बिरद कै मोहिं उधारौ, सूर कहै कसि फेंट-१-१४५।
फेंट गद्दता, धरता (पकड़ता)- रोक लेता, जाने न देता।
फेंट पकरतौ- रोकता, थामता, जाने न देता। उ.-सूरदास बैकुंठ पैठ मैं कोउ न फेंट पकरतौ-फेट गही- जाने से रोका। उ.-हम अबला कछु मर्म न जान्यौ चलत न फेंट गही-२७९७।
गाढ़े लेप को खूब हिलाना या मथना।
[सं. पृप्ठ, प्रा. पिटठ + ना]
[सं. पृप्ठ, प्रा. पिटठ + ना]
कपड़ा जो कर में लपेटा हो, कमरबंद, पटुका।
उ.-माया को कटि फेटा बाँध्यौ, लोभ तिलक दियौ भाल-१-१५३।
धोती का घेरा जो कमर पर लिपटा हो।
उ.-मनहुँ मथत सुर सिंधु, फेन फटि, दयौ दिख ई पूरनचंद-१०-२०४।
किसी द्रव को इतना मथना कि झाग उठने लगे।
मैदा के महीन लच्छे की एक मिठाई जो चाशनी में पागकर या दूध में भिगोकर खाई जाती है।
उ.-(क) घेवर-फेनी और सुहारी। खोवा-सहित खाहु बलिहारी-१०-११४। (ख) अपनी पत्रावलि सब देखत, जहँ तहँ फेनि पिराक-४६४।
उ.-आनंद मगन धेनु स्रवैं थन पय फेनु, उमँग्यौ, जमुन-जल उछलि लहर के -१०-३०।
उ.-पीरो भयो फेफरी अधरन हिरदय अतिहिं डर्यौ-२५६४।
फेर की बात- घुमाववाली बात।
दिनों का फेर- दुर्दश का समय।
फेर में पड़ना- उलझन में पड़ना।
फेर डालना- अनिश्चिय की स्थिति में डालना।
फेर में आना (पड़ना)- धोखा खाना।
फेर की बात- छल-कपट या चालबाजी की बात।
निन्नानबे का फेर- रुपया जमा करने का चक्कर।
हेर-फेर- लेन-देल, अदला-बदली।
स्पर्श करते हैं, छुआते या रखते हैं।
कर फेरत- स्पर्श करते हैं, छूते हैं। उ.-कृपाकटाच्छ कमल-कर-फेरत, सूर जननि सुख देत-१०-१५४।
उ.-फेरत पलटत भोर भए कछु लई न छाँड़ि दई-१३२०।
भूली या दबी बात पुनः उठाते हैं या उसका बदला लेते हैं।
उ.-सूनो जानि नंदनंदन बिनु बैर आपनो फेरत-३१६५।
फेरने या फहराने की क्रिया या भाव।
उ.-बरनि न जाइ सुभग उर सोभा पीतांबर की फेरन-३२७७।
पानी फेरना- धो देना, नष्ट कर देना।
रुख या मुख दूसरी ओर करना।
पानी फेरना- धो देना, नष्ट कर देना।
बारी बारी से सबके सामने उपस्थित करना।
जो रात में चले या विचरण करे।
किसी पदार्थ से अंकित चिह्न।
उ.-जे जे आए हुते जज्ञ में परिहै तिनकौ फेरन।
आते हुए को लौटाना या वापस करना।
ली हुई वस्तु लौटाना या वापस करना।
दी हुई वस्तु वापस कर लेना।
चक्कर खिलाना, घुमाव देना।
माला फेरना- (१) माला जपना। (२) नाम लेना।
हाथ फेरना- (१) प्यार से सहलाना। (२) ले लेना।
उ.-(क) झैसो कियौ सो तेसौ पायौ। अब उहिं चहियै फेरि जिवायौ-४-५। (ख) हय गय खोलि भंडार दिए सब फेरि भरे ता भाँति-१०-३६।
फेरि फेरि- बार-बार, पुनः पुनः।
उ.-तौ लगि बेगि हरौ किन पीर। जौ लगि आन न आनि पहूँचै, फेरि परैगी भीर-१-१९१।
फेरि दयौ-लौटा दिया, वापस कर दिया।
उ.-मंत्री गयौ फिरावन रथ लै, रघुबर फेरि दयौ-९-४६।
उ.-जिहिं भुज परसुराम बल करष्यौ, ते भुज क्यों न सँभारत फेरी-९-९३।
फिरि फेरी- बार बार, पुनः पुनः। उ.-मैं जिनको सपनेहु न देखे, तिनकी बात कहत फिरि फेरी-१२७०।
मेट दी, हटा दी, मिटायी, दूर की।
उ.-हा जदुनाथ, द्वारकावासी, जुग-जुग भक्त-आपदा फेरी-१-२५१।
पलट दी, बदल दी, विपरीत की।
उ.-बसन प्रवाह बढ़्यौ जब जान्यौ, साधु-साधु सबहिनि मति फेरी-१-२५२।
उ.-जहाँ बसत जदुनाथ जगतमनि बारक तहाँ आउ दै फेरी-२८५१।
उ.-बाट-घाट बीथी ब्रज घर बन संग लगाए फरी-२७१९।
परिक्रमा, प्रदक्षिणा, भाँवर। फेरी पड़ना-भाँवर होना, विवाह होना।
योगी का भिक्षा माँगने का चक्कर।
वस्तु को बेचने के लिए इधर-उधर घूमना।
उ.-सूरदास प्रभु बैठि सिला पर भोजन करैं ग्वाल चहुँ फेर-४६३।
उ.-तेरी सो बृषभानु नंदिनी एक गाँठि सौ फेरे-२२२०।
उ.-कहा करौं सखि दोष न काहू हरि हित लोचन फेरे-२७२०।
उ.-भौंह मोरनि नेन फेरनि तहाँ ते नहिँ टरे- पृ. ३५१ (७७)।
उ.-तब मधुमंगल कहि ग्वाल सों गैया हो भैया फेलनो -२२८०।
उ.-सूरदास प्रभु लंका तोरैं फेरैं राम दोहाई-९-११७।
उ.-सूरदास प्रभु सकल लोकपति पीतांबर कर फेरैं हो-४५२।
उ.-(क) गयौ जु संग नंदनंदन के बहुरि न कीन्हौ फेरौ-३१४३। (ख) आपु नहीं या ब्रज के कारन करिहौ फिरि फिरि फेरो-१० उ.-१२४।
उ.-सात दिवस जल वर्षि सिराने हारि मानि मुख फेरो-९५९।
मुख घुमाते हो, सामना नहीं करते।
उ.-मेरी सौं हाहा करि पुनि-पुनि उत काहे मुख फेरो जू-१९३४।
चक्कर दूँ, घुमाऊँ, चारों ओर चलाऊँ।
उ.-कहौ तौ लंक लकुट ज्यौं फेरौं, फेरि कहूँ लै डारौं-९-१०७।
लौटाऊँ, विमुख करूँ, पराजित करूँ।
उ.-अब हौं कौन कौ मुख हेरौं। रिपु- सैना-समूह-जल उमड़्यौ, काहि संग लै फेरौं-९-१४६।
उ.-सूर हँलति ग्वालिनि दै तारी, चोर नाम कैसैहुँ सुत फेरौ-३९९।
फेरा, मोड़ लिया, दूसरी ओर किया।
उ.-पारथ भीषम सौं मति पाइ। कियौ सारथी सिखंडी आइ। भीषम ताहि देखि मुख फेर्यौ-१-२७६।
उ.-सब दिन सुख-साथिनि आजु कैसे मुख फेरयौ-१०-८।
फैंट पकरतौ- रोकता, जाने न देता, थाम लेता, घर रखता। उ.-होतौ नफा साधु की संगति, मूल गाँठि नहिं टरतौ। सूरदास बैकुंठ-पैठ मैं, कोउ न फैंट पकरतौ-१-२९७।
कसि फेंट- ललकार कर, चुनौती देकर। उ.-तजौ विरद कै मोहिं उधारौ, सूर कहै कसि फैंट-१-१४५।
उ.-तुम हमकौं कहँ-कहँ न उबारयौ, पियौ काली मुँह फैनु-५०२।
विस्तार या फैलाव से स्थान घेरना।
विस्तार या फैलाव से स्थान घिरवाना।
लपेटा या तहाया हुआ न रखना।
तीर की पिछली नोक जिसके पास पर होते हैं और जिस पर डोरी बैठने की खड्डी बनी होती है।
उ.-परिमल लुब्ध मधुप जहँ बैठत उड़ि न सकत तेहि ठाँते। मनहुँ मदन के है सर पाए पोंक बाहरी घाते-३१३४।
उ.-पचरँग बरन-बरन पाटहि पवित्रा बिच बिच फोंदा गोहनो-२२८०।
निःसार, व्यर्थ, सारहीन, नीर, मूल्यहीन।
उ.-अलि चलि औरै ठौर देखावहु अपनो फोकट ज्ञान-३१२५।
ऐसी चीज तोड़ना जो भीतर से पोली, मुलायम या रसभरी हो।
दबाव से, भेदकर निकल जाना।
शरीर में दोष हो जाना जिससे घाव या फोड़े हो जायँ।
शाखा के समान अलग होकर जाना।
वह जिसे लक्ष्य करके कोई व्यंग्य या आक्षेप किया जाय।
उ.-आपुहिं हार तोरि चोली बँद उर नख घात बनाइ निशानी-१०५७।
शरीर पर उभार आनेवाला बड़ा दाना, बड़ी फुंसी।
उ.-माँड़ि माँड़ि खलिहान क्रोध को फोता भजन भरावै।
उ.-काहू की छीनत हौ गेंडुरि काहू की फोरत हौ गगरी-८५३।
फोड़ता है, खंड-खंड करता हे, भग्न करता है।
उ.-अँग-आभूषन सब तोरै। लवनी-दधि-भाजन फोरै-१०-१८३।
ऐसी चीज भग्न की जो भीतर से पोली, कोमल या रसभरी हो।
फोरयौ नयन- आँख फोड़ दी, अंधा कर दिया। उ.-फोर्यौ नयन, काग नहिं छाँड़्यौ, सुरपति के बिद्मान-९-८३।
उ.-(क) गज-अहँकार चढ़्यौ दिगबिजयी, लोभ-छत्र करि सीस। उ.- फौज असत-संगति की मेरैं, ऐसौ हौं मैं ईस-१-१४४। (ख) मागध मगध देस तैं आयौ साजे फौज अपार। (ग) हो जानति हौं फौज मदन की लूटि लई सारी-२१०६।
उ.-निधरक भयो चल्यो ब्रज आवत आउ फौजपति मैन-२८१९।
सिर फोरतिं- सिर पटक-पटक कर विलाप करती हैं। उ.-सिर फोरति, गिरि जाति, अभूषन तोरतिं अँग को-५८९।
फोड़ डालता, चूर-चूर कर देता, खंड-खंड कर डालता।
उ.-हौ तो न भयौ री घर, देखत्यौ तेरी यौ अर, फोरतौ बासन सब, जानति बलैया-३७२।
ऐसी वस्तुओं को तोड़कर जिनके भीतर मुलायम या पतली चीज भरी हो।
उ.-जिन पुत्रनिहिं बहुत प्रतिपाल्यौ, देवी-देव मनैहैं। तेई लै खोपरी बाँस दै, सीस फोरि बिखरै हैं-१-८६।
तोड़-फोड़कर, तोड़-ताड़कर। खंड-खंड करके, नष्ट करके।
उ.-फोरि फारि, तोरि तारि, गगन होत गाजैं-९-१३९।
उ.-गुदी चाँपि लै जीभ मरोरी। दधि ढर-कायौ भाजन फोरी-१०-५७।
उ.-कब दधि मटुकी फोरी-१०-२९३।
उ.-पय पीवत जिन हती पूतना, स्रुति मर्यादा फोरी-२८६३।
हिन्दी का तेईसवाँ व्यंजन और पवर्ग का तीसरा वर्ण। यह अल्पप्राण ओष्ठय वर्ण है।
उ.-(क) कुंतल कुटिल, मकर कुंडल, भ्रुव नैन-बिलोकनि बंक-१०-१५४। (ख) लोचन बंक बिसाल चितै कै रहत तब हो सबके मन-२५७३। (ग) बं बिलोकनि लगी लोभ सम सकति न पँख पसारि-२७१७।
उ.-(क) ठठकति चलै मटकि मुँह मोरै बंकट भौंह मरोरै। (ख) भृकुटि बंकट चारु लोचन रही जुवती देखी। (ग) गज उरोज बर बाजि बिलोचन बंकट बिसद बिसाल मनोहर-१९०६।
उ.-मनो कियो फिंरि मान मवासों मन्मथ बंकट कोट-२२१८।
उ.-बंकति भौंह चपल अति लोचन बेसरि रस मुकताहल छायो-२०६३।
उ.-मुरली माहिं बजावत गावत बंगाली अधर चुवत अमृत बनवारी-२३९७।
जिसे प्राप्त करने की इच्छा हो। जो प्रिय हो।
ऐसी भूमि जहाँ कुछ उत्पन्न न हो, ऊसर।
उ.-पेला करति देति नहिं नीकै तुम हो बड़ी बं जारिनि-१०४०।
वैल पर अनाज लादकर बेचने वाला, बनजारा।
उ.-ब्यावर बिथा न बंझा जानै-३४४१।
कई प्राणियों में बाँटा जाना।
बँटाइ लीने-दलों में विभाजित कर लिये।
उ.-कान्ह, हलधर बीर दोऊ, भुजा बल अति जोर। सुबल, श्रीदामा, सुदामा वै भए इक ओर। और सखा बँटाइ लीन्हैं, गोपबालक-बृन्द-१०-१४४।
बाँटने का काम, भाव या मजदूरी।
बँटानेवाला, भाग लेनेवाला।
उ.-बारह बरष नींद है साधी, तातैं बिकल सरीर। बोलत नहीं मौन कहा साध्यौ, बिपति-बँटावन-बीर-९-१४५।
[हिं. बाँटना + ऐया (प्रप्य)]
[हिं. बाँटना + ऐया (प्रप्य)]
उ.-निशि दिन रहत सूर के प्रभु बिनु मरिबो तऊ न जात जियो -२५४५।
पानी रोकने का पुश्ता, मेड़।
उ.- (क) सूर सुतहिं बरजौ नँदरानी, अब तोरत चोली-बँद डोर। (ख) चीर फटे कंचुकि-बंद छूटे-७९९। (ग) गए कंचुकि बँद टूटि-१० उ.-८।
जो किसी तरफ से खुला न हो।
जिसका मुँह या मार्ग न खुला हो।
जो ढकना, दरवाजा आदि खुला न हो।
जिसका कार्य रूका या स्थगित हो।
जिसका प्रचार-प्रकाशन आदि न हो।
उ.- जदुकुल-नभ तिथि द्वितीय देवकी प्रगटे त्रिभुवन बंद-१३३१।
प्रणाम करते हैं, नमस्कार करते हैं।
उ.- दसरथ चले अवध आनन्दत। जनकराइ बहु दाइज दै करि, बार-बार पद बंदत-९-२७।
उ.- सकुचासन कुल सील करषि करि जगत बंद्य कर बंदन-३०१४।
उ.- (क) नील पुट बिच मनौ मोती धरे बंदन बोरि-१०-२२५। (ख) मुत्का मनौ नील-मनि-मय-पुट, धरे भुरकि बर बंदन-४७६।
स्तुति, आदर या वंदना की जाने की योग्यता।
फूल-पत्तों की झालर जो मंगल कार्यों के शुभावसर पर खंभो-दीवारों पर बाँधी जाती है, तोरण।
उ.-लछिमी. सी जहँ मालिनि बोले बंदनमाला बाँधत डोलै-१०-३२।
फूल-पत्तों की बनी हुई माला या झालर जो मंगल कार्यों के अवसर पर खंभों- दीवारों पर बाँधी जाती है।
उ.-अच्छत दूब लिये रिषि ठाढ़े, बारिनि बंदनवार बँधाई-१०-१९।
उ.-सुर-नर-देव बंदना आए, सोवत तैं उठि जागी-१०-४।
एक भूषण जो माथे से ऊपर सिर पर रहता है, बंदी, सिरबंदी।
बंदर घुड़की या भबकी- डराने, धमकाने या धौंस जमाने के लिए की जानेवाली डाँट, फटकार या धमकी।
स्तुति, प्रार्थना या बंदना करनेवाले याचक आदि।
उ.-फूले बंदीजन द्वारे, फूले-फूले वँदवारे, फूले जहाँ जोइ लोइ गोकुल सहर के-१०-३४।
उ.-गूँगी बातनि यौं अनुरागति, भँवर गुंजरत कमल मों बंदहिं-१०-१०७।
[फा. बंद + हिं, हिं. (प्रत्य.)]
वक्ता' का अपने लिए शिष्टता य़ा नम्रतासूचक प्रयोग।
उ.-राज रवनि सुमिरे पति-कारन असुर-बंदि तैं दिए छुड़ाई-१-२४।
उ.-यह कह्यौ नंद, नृप बंदि, अहिं इन्द्र पै गयौ मेरौ नंद, तुव नाम लीन्हौ-५८४।
उ.-जाको निदि बंदियै, सो पुनि वह ताकौ निदरै-११५५।
उ.-मोह पया बंदी गुन गावत, मागध दोष-अपार- १-१४४
उ.-जरासंध बन्दी कटैं नृप-कुल जस गावै-१-४।
वक्ता नारी का अपने लिए शिष्टता अथवा नम्रता सूचक प्रयोग।
राजा की गुणावली गाने वाले लोग, एक प्राचीन जाति के लोग, जो राजा-महा राजाओं का यश वर्णन करते थे।
उ.-(क) निंदा जग उपहास करत, मग बंदीजन जस गावत-१-१४१। (ख) बिप्र-सुजन-चारन-बंदीजन सकल नन्द-गृह आए-१०-८७।
बंदना या स्तुति के योग्य।
उ.-सकुचासन कुल सील करुषि करि जगत बंद्य करि बंदन-३०१४।
उ.-कोटि छ्यानवै नृप सेना सब जरासंध बँध छोरे-१-३१।
पानी रोकने का धुस्स, बाँध।
उ.-जाकै संग सेत-बंध कीन्हौं, अरु जीत्यौ महभारथ। गोपी हरी सूर के प्रभु बिनु, रहत प्रान किहिं स्वारथ-१-२८७।
रति के सोलह आसनों में से एक।
उ.-परिरंभन सुख रास हास मृदु सुरति केलि सुख साजे। नाना बंध बिबिध रस क्रीड़ा खेलत स्याम अपार।
उ.-हा करुनामय कुञ्जर टेर्यौ, रह्यौ नहीं बल थाकौ। लागि पुकार तुरत छुटकायौ, काट्यौ बंधन ताकौ-१-११३।
रस्सी आदि से फँसाया जाना।
बँधवायी या वंधन में करायी।
उ.-इनहीं के हित भुजा बँधाई, अब बिलंब नहिं लाऊँ-१०-३८२।।
एक असूर जो कश्यप की स्त्री दनु के गर्भ से जन्मा था। इसने इंद्र तक को जीत लिया था; पर दुर्गा के हाथ से मारा गया था।
उ.-मो समेत दोउ बंधु तुम, काल्हिहिं लेहि बँधाइ -५८९।
बाँधने के लिए प्रेरित करूँ, बँधवाऊँ।
उ.-कंचन-मनि खोलि डारि, काँच गर बंधाऊँ-१-१६६।
उ.-बाँधन गए बंधाएँ आपुन, कौन सयानप कीन्यौ-८-१५।
निश्चित क्रम, नियत परिपाटी।
धन जो निश्चित क्रम के अनुसर दिया जाय।
उ.-(क) सूर स्त्रुति तान बंधान अमित अति, सप्त अतीत अनागत आवत-६४८। (ख) औधर तान बँधान सरस सुर अरु रस उभंगि भरी-२३३८।
बँध रहा है, बाँधा गया है।
उ.-कदली कंटक, साधु असाधुहिं, केहरि के संग धेनु बँधाने-१-२१७।
उ.-मोतिनि बँधायौ बार महल में जाइकै-१०-३१।
उ.-सूरदास ग्वालिनि अति झूठी बरबस कान्ह बँधायौ-१०-३३०।
(तालाब, कुआँ, पुल आदि) बनवाते या तैयार कराते हैं।
उ.-दस अरु आठ पदुम बनचर लै, लीला सिंधु बँधावत-९-१३३।
बाँधने को प्रेरित करते हैं, बंधन में डलवाते हैं।
उ.-इहाँ हरि प्रगट प्रेम जसुमति के ऊखल आप बँधावत -३१३५।
अपने को बाँधने के लिए दूसरे को प्रेरित करे
उ.-दुखित जानि कै सुत कुबेर के तिन्ह लगि आपु बँधावै-१-१२२।
उ.-भौंरा भोगी बन भ्रमै (रे) मोद न मानै ताप। सब कुसुमनि मिलि रस करै (पै) कमल बँमल बँधावै आप-१०-३२४।
उ.-सिला तरी, जल माँहिँ सेत बैधि-१-३४।
उ.-पति अति रोष मारि मन ही मन, भीषम दई बचन बँधि बेरी-१-२५२।
उ.-अधर दसन-छत बंदन राजत बंधुक पर अलि मानो-१९९१।
उ.-(क) ऊखल बँध्यो जु हेतु भगत के-३९१। (ख) सूरदास प्रभु को मन सजनी बँध्यौ राग की डोर-६५७।
बं बं शब्द जो शैवगण करते हैं।
उ.-ये तुम्हरे कुल-बंस हैं-१-२३८।
बोया, बीज जमाया या लगाया।
उ.-(क) गोकुलनाथ बए जसुमति के आँगन भीतर, भवन मँझार।साखा- पत्र भए जल मेलत, फूलत-फरत न लागी बार-१०-१७३। (ख) सुरदास प्रभु दूत धर्म ढिग दुख के बीज बए-२९९३। (ग) जनु तनुजा में सद्य अरुन दल काम के बीज बए-२०८४।
उ.-अघ बक बच्छ अरिष्ट केसी मथि जल तें कार्ढेयो काली -२५६७।
एक राक्षस जिसे भीम ने मारा था।
बकझक या बकबक, व्यर्थ की बकवाद।
उ.-ग्वाल परम सुख पाइ, कोटि मुख करत प्रसंसा। कहा बहुत जो भए, सपूतौ एकैबंसा-४३१।
वृंदावन में एक बरगद का पेड़ जिसके नीचे श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते थे।
उ.-(क) इंद्रिय मूल किसान, महातृन- अग्रज-बीज बई-१-१८५। (ख) मनहुँ पीक दल सींचि स्वेद जल आल बाल रति-बेलि बई री-२११५। (ग) मेरे नयना बिरह की बेलि बई-२७७३।
बली, जली, सुलगी, छितरी, बिखरी।
उ.-जोग की गति सुनत मेरे अंग-आगि बई-३१३१।
उ.-जसोदा ऊखल बाँधे स्याम।¨¨। दहयौ मथति मुख तैं कछु बकरति गारी दै लै नाम। घर-घर डोलत माखन चोरत, षटरस मेरैं धाम-३७९।
अपना दोष ,स्वीकार करना या स्वगत-रूप से कहना।
उ.-(क) कहि कहि करट सँदेसन मधुकर कृत बकवाद बढ़ावत। (ख) सूर बृथा बकवाद करत हो, इहिं ब्रज नंदकुमार-३२५३।
बकती-झकती हूँ, बकते-बकते।
उ.-कहाँ लगि सहौं रिस, बकत भई हौं कृस, इहिं मिस सूर स्याम-बदन चहूँ-१०-२९५।
उ.-बकत-बकत तोसों पचिहारी, नैंकहुँ लाज न आई-१०-३२९।
प्रलापती है, बड़बड़ाती है, बुरा-भला कहती है।
उ.-करति कछू न कानि, बकति हैं कटु बानि, निपट निलज बैन बिलखि सहूँ-१०-२९५।
बनावटी भल-मनसाहत, भले बनने का आडंबर।
जो दिखावटी भला हो, पर हृदय से कपटी और कुटिल हो।
बकवाद करने की तलब या इचछा।
उ.-चूक परी मोतैं मैं जानी, मिलैं स्याम बकसाऊँ री-१६७३।
उ.-पालागौं यह दोष बकसियो सन्मुख करत ढिठाई-३३४३।
कष्ट अथवा दुख का पूर्ण आभाव।
उ.-नूतन कदम तमाल बकुल बट परसत जनम गए।
उ.-कायर बकै, लोभ तैं भागै लरै सो सूर बखानैं-३३३७।
पंजे की स्थिति जो नोचते समय होती है।
बकोटने या नोचने की क्रिया।
उ.-चंचल अधर, चरन-कर चंचल, मंचल अंचल गहत बकोटनि-१०-१८७।
उ.-बार बार बकि स्याम सों कछु बोल बकावत।
वक दैत्य जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
बक- झककर मना करेगा, डाँट-फटकार करेगा।
सूर आइ तू करति अचगरी, को बकिहै निसि जामहिं-७२२।
बकासुर की बहिन पूतना जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
पोटली में बाँधकर कंधे या पीठ पर लटकाना।
(क) नाचै फूल्यौ अँगनाइ, सूर बकसीस पाइ, माथे कै चढ़ाइ लीनौ लाल कौ बगा-१०-३९। (ख) कमल जब ते उरग पीठि ल्याए सुने वैहैं बकसीस अब उनहिं दैहैं-२४६७।
उ.-(क) ढीठो बहुत कियो हम तुमसों बकसो हरि चूक हमारी-११९१। (ख) यह अपराध मोहिं बकसौ री इहै कहति हौ मेरी माई-८६३।
उ.-पूत सपूत भयौ कुल मेरैं, अब मैं जानी बात। सूर स्याम अब लौं तुहिं बकस्यौ, तेरी जानी घात-१०-३२९।
उ.-(क) सिव कौ धन, संतनि को सरबस, महिमा बेद-पुरान बखानत-१-११४। (ख) सुर-नर-मुनि सब सुजस बखानत-९-१३९। (ग) तुम्हैं बेद ब्रह्मण्य बखानत। ताते तुम्हरी अस्तुति ठानत-१० उ.-११५।
उ.-गुन-रूप कछु अनुहारि नाहीं, का बखान बखानिए-१० उ.-११५।
वर्णन किया, कहा, चर्चा की।
उ.-(क) तिहिं बिनु रहत नहीं निसि बासर, जिहिं सब दिन रस-बिषय बखानी-१-१४९। (ख) उमा कही, मैं तौ नहिं जानी। अरु सिवहूँ मासौं न बखानी-१-१२६।
वर्णन करते हैं, कहते हैं।
उ.-पूरन ब्रह्म पुरान बखानै-१०-३।
उ.-सूर सूजस कहि कहा बखानै-१०-३।
उ.-सो अब तुमसौं सकल बखानौं-१०-२।
उ.-नाचै फूल्यौ अँगनाई सूर बखसीस (बकसीस) पाई माथे कै चढ़ाइ लीनो लाल को बगा-१०-३९।
वर्णन करके, व्याख्या करके।
उ.-ये ब्रह्मा सौं कह्ने भगवान। ब्रह्म मोसौं कहे बखान-१-२३०।
[सं. व्याऱ्यान, पा. बक्खान]
उ.-गुन-रूप कछु अनुहार नाहीं, कर बखान बखानिए-१० उ.-२४।
[हिं. बाग + छूटना, टूटना]
उ.-(गैया) घेरे फिरत न तुम बिनु माधौ जू मिलत नहीं बगदई।
[सं. विकृत, हिं. बिगड़ना]
[सं. विकृत, हिं. बिगड़ना]
[सं. विकृत, हिं. बिगड़ना]
दूसरा के घोड़े के साथ या पाँति बाँधकर चलना।
उ.-गोरे बरन चूनरी सारी अलकैं मुख बगराइ-८८४।
उ.-अति सुदेस मृदु हरत चिकुर मन मोहन-मुख बगरई-१०-१०८।
फैलाये हुये, छिटकाए हुए, छितराये।
उ.-ते दिन बिसरि गए इहाँ आए। अति उन्मत्त, मोह-मद छाकयौ, फिरत केस बगराए-१-३२०।
उ.-बेनी छूटि, लटैं बगरानी, मुकुट लटकि लटकानो- पृ ३४६ (४७)।
उ.-बगरि गईं गैयाँ बन-बीथिन, देखीं अति अकुलाइ-५००।
उ.-तैसीयै लट बगरीं ऊपर स्रवत नीर अनूप-१८४९।
उ.-(क) बड़े बाप के पूत कहावत, हम वै बास बसत इक बगरी। नंदहु तैं ये बड़े कहैहैं, फेरि बसैहैं यह व्रज नगरी-१०-३१९। (ख) घाट-बाट सब देखत आवत, युवती डरनि मरत हैं सिगरी। सूर स्याम तेहि गारी दीनो जो कोई आवै तुमरी बगंरी-८५३।
उ.-ग्वाल बास सँग लिये सब घेरि रहे बगरो-।
उ.-और कहूँ जाइ रहे, छाँड़ि ब्रज बगरो-१०५६।
निश्चित होने का भाव, बेफिक्री।
बाहुमूल के नीचे का गड़ढा, काँख।
छाती के दोनों किनारे के भाग, पार्श्व।
बगल में दबाना (धरना)- छल से अधिकार में करना।
बगल बजाना- खूब खुशी मनाना।
किनारे या पार्श्व का भाग।
छाती के दोनों किनारों के भाग।
उ.-बगलन दाबे पिचकारी-२४४४।
बगला भगत- छली, कपटी, ढोंगी।
राह काटकर या अलग हटकर जाना।
उ.-नाचै फूल्यौ अँगनाइ, सूर बकसीस पाइ, माथै कै चढ़ाइ लीनौ लाल कौ बगा-१०-३९।
बाघ का चर्म जो आसन का काम देता है।
एक आभूषण जिसमें सोने-चाँदी से मढ़ बाघ के नाखून रहते हैं।
उ.-(क) कठुला कंठ बघनहाँ नीके। नैन-सरोज मैन सरसी के -१०-११७। (ख) सूरदास प्रभु ब्रज-बधु निरखतिं, रुचिर हार हिय सोहत बघना-१०-११३। (ग) सीप जयमाल स्याम उर सोहै बिच बघना छबि पावै री।
एक आभूषण जिसमें बाघ के नाखून चाँदी या सोने से मढ़े रहते हैं। यह गले में तागे में गूँथ कर पहना जाता है।
उ.-घर-घर हाथ दिवावति डोलति, बाँधति गरैं बघनियाँ-१०-८३।
[हिं. बाघ + नहँ=नाखून ; पुं. बघनहाँ]
मौके-बेमौके योग्यता दिखाना।
उ.-बग-बगुली अरु गीध-गीधनी, आइ जनम लियौ तैसौ-२-१४।
शेखी बघारना- बढ़-बढ़कर बात करना।
उ.-अपनौ मन हरि सौं राँचै। आन उपाय प्रसंग छाँड़ि कै मन-बच-क्रम अनुसाँचै-१-८१।
व्यय होने से बचा भाग या अंश।
शेखी बधारना- बढ़-बढ़कर बात करना।
उ.-अबल प्रहलाद बल देत मुख ही बचत दास ध्रुव चरन चित सीस नायो।
उ.-भृगु को चरन राखि उर ऊपर बोले बचन सदा सुखदाई-१-३।
बचन खंडना- बात न मानना, आज्ञा का पालन न करना।
बचन खंडै- बात न मानें, आज्ञा का पालन न करे। उ.-पिता-बचन खंडै सो पापी-१-१०४।
बचन डालना- याचना करना।
बचन छोड़ना (तोड़ना)- कहकर हट जाना, बात का निर्वाह न करना।
बचन देना- प्रतिज्ञा करना।
वचन निभाना (पालना)- जो कहना, सो करना; कही हुई बात का निर्वाह करना।
बचन बाँधना- प्रतिज्ञाबद्ध करना।
बचन बँधायो- प्रतिज्ञा या बचनबद्ध किया। उ.-नंद जसोदा बचन बँधायो। ता कारन देही धरि आयो-११६१।
बचन बनाना- बात बनाना, कुछ अर्थ या उद्देश्य समझाते हैं। उ.-सूरदास प्रभु बचन बनावत अब चोरत मन मोर-१९६५।
बचन लेना- प्रतिज्ञा कराना।
बचन हारना- प्रतिज्ञा या बचन बद्ध होना।
कष्ट आदि से सुराक्षित रहना।
बुरी बात या आदत से दूर रहना।
खरचने या काम में न आ पाना, बाकी रहना।
बालक होने का भाव, अबोधता और सरलता।
बचने का भाव, रक्षा, त्राण।
उ.-महरि सबै ब्रजनारि सौं, पूछति कौन उपाउ। जनमहिं त करब टरी, अबकैं नाहिं बचाउ-५८९।
रक्षा की, कष्ट या विपत्ति में न पड़ने दिया।
उ.-बिकट रूप अवतार धरयौ जब, सो प्रहलाद बचाऊ-२२१।
उ.-जे पद कमल-भजन महिमा तैं, जन प्रहलाद बचाए-५३८।
खर्चने के बाद भी रख छोड़ना।
रोग आदि से अलग या मुक्त रखना।
उ.-ऐसो कैसे होय सखी री घर पुनि मेरो हे बचाव री-१२३७।
रक्षा करता है, आपत्ति या कष्ट से बचाता है।
उ.-तोकौं कौन बचावत आइ-७-१।
उ.-आउ हम नृपति, तुमकौं बचावैं -८-१६।
बचावे, रक्षा करे, कष्ट में न पड़ने दे।
उ.-पग पग परत कर्म-तम-कूपहिं, को करि कृपा बचावै-१-४८।
कष्ट-विपत्ति में न पड़े, रक्षित रहे।
उ.-मन सबकैं आनन्द, कान्ह जल तैं बचि आए-५८९।
उ.-रे मन, छाँड़ि बिषय कौ रचिबौ। कत तू सुवा होत सेमर कौ, अंतहिं कपट न बचिबौ-१-५९।
उ.-(क) जैसैं गैया बच्छ कैं सुमिरत उठि धावै। (ख) बच्छ पुच्छ लै दियो हाथ पर मंगल गीत गवायो। जसुमति रानी कोख सिरानी मोहन गोद खेलयो।
उ.-अघ बक बच्छ अरिष्ट केसी मथि जल तें काढ़थो काली-२५६७।
बचा, शेष भाग, बाकी रहा, बच सका।
उ.-(क) पाप मारग जिते, सबै कीन्हें तिते, बच्यौ नहिं कोउ जहँ सुरति मेरी-१-११०। (ख) कीन्हें स्वाँग जिते जाने मैं, एकौ तौ न बच्यौ-१-१७४।
कष्ट या विपत्ति से बचा, रक्षित रहा।
उ.-कैसैं बच्यौ, जाउँ बलि तेरी, तृनावर्त कैं घात-१०-८१।
माता पिता के समान स्नेह या प्यार करनेवाला।
उ.-भक्तबच्छल कृपाकरन, असरनसरन, पतित-उद्धरन कहैं बेद गाई-८-९।
उ.-(क) आगैं बछ, पाछें ब्रज-बालक, करत चले मधुरैं सुर गान-४३८। (ख) बाल-बिलख मुख गौ न चरति तृन बछ पय पियन न धावैं- (ग) ब्रह्मलोक ब्रह्मा गए लै बालक बछ संग-४९२।
पुत्र' के लिए स्नेहपुर्ण या दुलार-भरा संबोधन।
उ.-दुहूँ बृच्छ-बिच बचे कन्हाई-३९१।
कष्ट या विपत्ति में न पड़े, रक्षित रहें
उ.-(क) बरु हमकौं लै जाइ, स्याम बलराम बचैं घर-५८९। (ख) सूर कर जोरि अंचल छोरि बिनवैं, बचैं ए आजु बिधि इहै मागैं-२६०३।
उ.-अब बालक क्यों बचै कन्हाई-१०-५१।
बच सकोगे, पकड़ में न आओगे।
उ.-भागैं कहाँ बचौगे मोहन, पाछैं आइ गईं तुव गोहन-७९९।
नाक या मुँह से बाहर निकलने वाली श्वास या इसके बाहर निकलने का व्यापार।
एक बाजा जो मुँह से बजाया जाता था।
बछड़ा, बछरा, बछरु, बछरुवा, बछरू
उ.-(क) ब्रह्मा बाल बछरुवा हरि गयौ, सो ततछन सारिखे सँवारी-१-३०। (ख) ब्यानी गाय बछरुवा चाटति, हौं पय पियत पतूखिनि लैया-१०-३१५। (ग) -भोजन करत सखा इक बोल्यौ, बछरू कतहूँ दूरि गए-४३८। (घ) राँभति गो खरिकनि मैं, बछरा हित धाई-१०-२०२। (ङ) कोउ गए ग्वाल गाउ वन घेरन, कोउ गए बछरु लिवाइ-५००।
छोटों के प्रति स्नेह का भाव।
उ.-भक्तबछलता प्रगट करी-१-२६८।
उ.-धेनु बिकल सो चरत नहीं तृन बछा न पीवन धावैं-३४२३।
बछिया का ताऊ (बाबा)- मुर्ख।
उ.-ता पर सूर बछुरुवनि ढीलत, बन-बन फिरतिं बही-१०-२९१।
उ.-जो कह्यौ करै दी हठ याही मारग आवै बजमारी।
बज्र के समान दृढ़ शरीर वाला।
किले के ऊपरी भाग के कंगूरे जिनकी बगल में गोलियाँ चलाने के लिए कुछ अवकाश रहता है।
बाजे में शब्द उत्पन्न होना।
प्रसिद्ध या विख्यात होना।
जो बजता हो, जिसमें से ध्वनि निकले।
बज्र का मारा हुआ, खोटे भाग्यवाला, जिससे दैव रूठा हो।
बजा कर, घोषित करके, डंके की चोट पर।
उ.-नैना भए बजाइ गुलाभ-पृ. ३२१ (६)।
लीजै ठौंकि बजाइ- अच्छी तरह देख भालकर, खूब समझ-बूझकर। उ.-नन्द ब्रज लीजै ठोंकि बजाइ-२७००।
बाजे से ध्वनि निकाली, बजायी।
उ.-सुरनि मिलि देव-दुंदुभि बजाई-८-८।
कींने बजाई- खुल्लमखुल्ला या डंके की चोट पर किया। उ.-सूरदास प्रभु हम पर ताको कीने सवति बजाई -२३२९।
उ.-गाऊँ बजाऊँ रस प्रेम भरि नाचौं-पृ. ३१९ (८१)।
बाजे से शब्द निकाला, बजाया।
उ.-(क) ताल, मृदंग, झाँझ, इन्द्रिन मिलि, बीना, बेनु बजायौ-१-२०५। (द्द) जागी महरि पुत्र मुख देख्यौ, आनन्द-तूर बजायौ-१०-४।
बजाता है, बाजे से स्वर निकालता है।
उ.-हठ, अन्याय, अधर्म सूर नित नौबत द्वार बजावत-१-१४१।
उ.-दूरहिं ते वह बैन अधर धरि बारंबार बजावते-२०३५।
उ.-तैसीए दमकति दामिनि अरु मुरली मलार बजावहिंगे-२८८९।
उ.-दिबि दुंदुभी बजावहीं, फन-प्रति निरतत स्याम-५८९।
उ.-मदन मोहन बेनु मृदु मृदुल बजावै री-६२९।
बजने लगी, (बाँसुरी आदि) से शब्द निकाला गया।
उ.-(क) राजा के घर बजी बधाइ-५-२। (ख) तैसे सूर सुने जदुनंदन बजी एक रस ताँति-३१६८।
गाल बजैंहै- बढ़-बढ़कर बात करेगी, डींग हाँकेगी। उ.-देखहु जाइ चरित तुम वाके जैसे गाल बजैहै-१२६३।
उ.-बजाजिनि है जाउँ निरखि नैनन सुख देऊँ-पृ. ३४९ (६१)।
बाजे आदि से शब्द उत्पन्न करना।
आघात से शब्द उत्पन्न करना।
ठोकना-बजाना- देखना-भालना, जाँच-कर परखना।
बज्र परै- नाश हो जाय। उ.-परै बज्र या नृपति-सभा पै, कहति प्रजा अकुलानी-१-२५०।
उ.-बंदि बेरी सबै छुटी, खुले बज्र कपाट-१०-५।
अनिरुद्ध का पुत्र जिसे युधिष्ठिर ने मथुरापति बनाया था।
उ.-राज परीच्छत कौं नृप दीन्हौ। बज्रनाभ मथुरापति कीन्हौ-१-२८८।
उ.-जलवर्त, बारिवर्त, पवनबर्त, बज्रवर्त, अग्निवर्तक-९४४।
बंधन में पड़ना, बँध जाना।
[सं. वद्ध, प्रा. बज्झ + ना]
[सं. वद्ध, प्रा. बज्झ + ना]
[सं. वद्ध, प्रा. बज्झ + ना]
उ.-(क) स्याम हृदय अति बिसाल, माखन दधि बिदु-जाल, मोह्यौ मन नंदलाल, बाल हीं बझे री-१०-२७५। (ख) चली प्रात ही गोपिका मटुकिन लै गोरस।¨¨¨¨¨¨। जीव परयौ या ख्याल में अरु गए दसादस। बझे जाय खगवृंद ज्यौं प्रिय छबि लटकनि बस-१३७७।
पुराणानुसार वह वट-वृक्ष जो प्रलयकाल में सुरक्षित रहा था और जिस पर भगवान ने बालरूप में शयन किया था।
उ.-कर पग गहि, अँगुठा मुख मेलत।¨¨¨¨¨¨। बट बाढ्यौ सागर-जल झेलत-१०-६३।
[सं. उद्वर्त्तन, प्रा. उब्बट्टन]
संगीत का सातवाँ स्वर जिसका संक्षिप्त रूप ‘नि’ है।
जिसके लिए निषेघ या मना किया जाय।
उ.- (क) लै चौगान-बटा अपनैं कर, प्रभु आए घर बाहर-१०-२४३। (ख) बटा धरती डारि दीनौ, लै चले ढरकाइ-१०-२४४। (ग) देखत ही उढ़ि गए हाथ ते भए बटा नट के- पृ.- २३६ (५२)।
देहु बटाइ- बाट दो, विभाग कर दो।
उ.- बिदुर कह्यौ मति करौ अन्याइ। देहु पांडवनि राज बटाइ-१-२८४।
उ.- किहिं घाँ के तुम बीर बटाऊ, कौन तुम्हारौ गाउँ-९-४४। (ख) कहि धौं सखी बटाऊ को हैं-९-४५। (ग) बीर बटाऊ पंथी हो तुम कौन देस तें आए-२८८३।
[हिं. बाट = रास्ता + आऊ (प्रत्य.)]
उ.- चोर ढुंठ बटपार अन्याई अपमारगी कहावैं- पृ. ३२६ (५२)।
[हिं. बाट + पड़ना, बटपार]
उ.- (क) बटपारी, ठग, चोर, उच्कका, गाँठिकटा, लठबासी-१-१८६। (ख) सुनहु सूर प्रभु नीके जान्यो ब्रज जुवती तुम सन बटपारी-११६०।
उ.- राधे तेरे नैन किधौं बटपारे-२१९२।
[सं. वर्तुल, प्रा. बट्टुल]
उ.- सात दिवस जल बरषि बटान्यो आवत चल्यो ब्रजहि अत्रावत।
उ.- धरि बटु रूप चले बामन जू अंबुज नयन बिसाला-सारा. ३३३।
उ.- बटुआ झोरी दंड अधारा इतनेन को आराधै-३२८४।
[सं. वर्त्तक, प्रा. बट्टा]
समेटता है, बटोरकर उठाता है।
उ.- कबहूँ मग-मग धूरि बटोरत, भोजन कौं बिलखात-२-२२।
बिखरी वस्तुओं को समेट कर लगाया, गया ढेर।
खेतों में बिखरा हुआ दाना जो बटोरा जाय।
बिखरी चीज को एक स्थान पर एकत्र करना।
इधर-उधर पड़ी चीजों को चुनना।
[हिं. बाट + वाह (प्रत्य.)]
उ.- बट्टा काटि कसूर भरम कौ, पोता-भजन भरावै-१-१४२।
[सं. वार्त्त, प्रा. वाट्ट=बनियाई]
बट्टा कटना- दस्तूरी ले लेना।
सिक्के आभूषण आदि के बदलने, बेचने या तुड़ाने से कटने वाली कमी।
[सं. वार्त्त, प्रा. वाट्ट=बनियाई]
खोटे सिक्के के बदलने में बेचने से होनेवाली कमी।
[सं. वार्त्त, प्रा. वाट्ट=बनियाई]
बट्टा लगना- दाग या कलंक लगना।
बट्टा लगाना- दाग या कलंक लगाना।
[सं. वार्त्त, प्रा. वाट्ट=बनियाई]
ईंट, पत्थर का गोल टुकड़ा।
वह बही या खाता जिसमें डूबी हुई रकम लिखी जाय।
उ.- फंसिहारिनि बठपारिनि हम भईं, आपुन भए सुधर्मा-११६०।
बढ़-बढ़ कर बोलनेवाला, शेखीखोर।
उ.- (क) भुजा छौरि उठाई लीन्हें, महर हैं बड़भागि-३८७। (ख) बड़भागी कै सब ब्रजबासी। जिनकैं संग खेलैं अबिनासी-१०-३। (ग) ऊधो, हम आजु भईं बड़भागी-३०१५।
बड़बा, बड़वागि, बड़वाग्नि
विवाह के पश्चात् वर और बरातियों का भोज।
बड़ा घर- बंदीगृह, कारागार।
अवस्था, परिमाण या विस्तार का।
बड़ा घर- धनी और प्रतिष्ठित घराना।
गुण, प्रभाव आदि में अधिक।
उ.- (क) हौं बड़ हौं बड़ बहुत कहावत, सूधैं करत न बात-२-२२। (ख) दानव-सुर बढ़ सूर-९-२६। (ग) जाति-पाँति हमहैं बड़ नाहीं-१०-२४५। (घ) खेलत मैं कह छोट-बड़-५८९।
पद, शक्ति, अधिकार, मान-मर्यादा में अधिक, श्रेष्ठ।
उ.- हरि के जन सब तैं अधिकारी। ब्रह्मा महादेव तैं को बड़, तिनकी सेवा कछु न सुधारी-१-३४।
बड़ाई, श्रेष्ठता, महत्व, गौरव।
उ.- ताके झुगिया मैं तुम बैठे कौन बड़प्पन पायौ-१-२४४।
झुंझलाहट की स्थिति में धीर-धीरे बकना।
बड़ा आदमी- (१) धनी। (२) ऊँचे पदवाला।
परिमाण या विस्तार में अधिक।
पद, मान, गौरव में अधिक, बड़प्पन।
उ.-(क) बासुदेव की बड़ी बड़ाई। जगतपति, जगदीस, जगतगुरु, निज भक्तन की सहत ढिठाई-१-३। (ख) राजा छोरि बंदि तैं ल्याए, तिहूँ लोक मैं बिदित बड़ाइ -४९७।
उ.-(क) जहँ-तहँ सुनियत यहै बड़ाई मो समान नहिं आन-१-१४५। (ख) दिन दिन इनकी करौं बड़ाई अहिर गए इतराइ-२५७८।
बड़ाई देना- आदर करना।
बड़ाई मारना- शेखी हाँकना, डींग मारना।
परिमाण, विस्तार या फैलाव।
राजा इक्ष्वाकु के एक पुत्र जिनसे मिथिला का राजवंश चला माना गया है। इनका स्थान मनुष्य की पलकों पर कहा जाता है।
उ.- पलक वोट निमि पर अनखाती यह दुख कहा समाइ - ३४४४।
उ.- अस्व-निमित उत्तर दिसि कैं पथ गमन धनंजय कीन्हौं - १-२९।
उ.- (क) मेरौ बचन मानि तुम लेहु। सिव-निमित्त आहुति जनि देहु - ४-५। (ख) वाहि निमित्त सकल तीर्थ स्नान करि पाप जो भयो सो सब नसाई - १० उ. ५८।
आँख मिचना या झपकना, निमेष।
क्षण भर का समय, पलक मारने भर का समय।
उ.- (क) सूरदास प्रभु आपु बाहुबल कियौ निमिष मैं कीर - ९-१५८। (ख) सूर हरि की निरखि सोभा, निमिख तजत न मात - १०-१००।
पल भर भी, क्षण मात्र को भी।
उ.- बिमुख भए अकृपा न निमिषहूँ, फिर चितयौं तौ तैंसैं - १-८।
[सं. निमिष + हूँ (प्रत्य.)]
उ.-बड़ो दूत तू बड़ी उमर को बड़िए बुद्धि बड़ोई-३०२२।
उ.-प्रभु आज्ञा तैं घर कौं आईं। पुरुष करत तिनकी बड़ियाई-८००।
बड़ी बात- बहुत संतोषजनक बात, गनीमत। उ.-बड़ी बात भई कमल पठाए, मानहुँ आपुन जल तैं ल्याए-५८८।
उ.-(क) बड़े बाप के पूत कहावत ¨¨¨¨¨¨ नंदहु तैं ये बड़े कहैहैं-१०-३१९। (ख) वहाँ जादव पति प्रभु कहियत हमैं न लगत बड़े-३१५१।
बड़े घर की- प्रतिष्ठित और धनी घराने की। उ.-बड़े घर की बहू-बेटी करति बृथा झवारि- ११३५।
छाजन के बीच की लकड़ी जो लंबाई के बल होती है।
उ.-जे द्रुम सींचि सींचि अपने कर कियो बढ़ाय बड़ेरे-२७२०।
उ.-बनि बनि आवत हैं लाल भाग बड़ेरो मेरे- पृ ३१९ (८९)।
उ.-मेरो सुत सरदार सबनि कौ बहुतै कान्ह बड़ेरौ-१०-२१५।
उ.-इतने बड़े और नहिं कोऊ इहिं सब देत बड़ैया-२३७४।
खूब लंबा-चौड़ा अधिक विस्तार का।
उ.- सुनि देवता बड़े, जग-पावन, तू पति या कुल कोइ। पद पूजिहौं, बेगि यह बालक करि दै मोहिं बड़ोइ-१०-५६।
बढ़कर, श्रेष्ठ, अधिक, बढ़ा-चढ़ा।
उ.- व्याध, गीध अरू पतित पूतना, तिनतैं बड़ौ जु और-१-१४५।
बड़े डील-डौल का, मोटा-ताजा।
उ.- मैया मोहिं बड़ौ करि लै री-१०-१७६।
उ.- सूरदास प्रभु भक्तनि कैं बस, भक्तनि प्रेम बढ़इयै-१-२३९।
लकड़ी को छील और गढ़कर अनेक सामान बनानेवाला।
[सं. वर्द्धाकि, प्रा. बढ्ढइ]
उ.- पुनि पाछैं-अघ-सिंधु बढ़त है, सूर खाल किन पाटत-१-१०७।
डील-डौल या लंबाई-चौड़ाई में वृद्धि को प्राप्त होना।
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]
बात बढ़ना- विवाद या झगड़ा होना।
गिनती या नाप-तौल में ज्यादा होना।
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]
बल, प्रभाव या गुण में अधिक होना।
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]
पद, मर्यादा, अधिकार आदि में अधिक होना।
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]
चलने-दौड़ने में आगे हो जाना।
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]
किसी बात में आगे हो जाना।
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]
[सं. वर्द्धान, प्रा. बड्ढन]
[सं. वर्द्धनी, प्रा. बड्ढनी]
बढ़ा, विस्तार में अधिक हुआ।
उ.- द्रौपदी कौ चीर बढ़यौ, दुस्सासन गारी-१-१७६।
उ.- मोह्यौ जाइ कनक कामिनि-रस, ममता-मोह बढ़ाई-१-१४७।
विस्तृत करूँ, आकार में बढ़ाऊँ।
उ.- मोहन-मुर्छन-बसीकरन पढ़ि, अगमिति देह बढ़ाऊँ-१०-४९।
उ.- हरष नँदराइ कैं मन बढ़ाए-५८७।
उ.- गुरू बसिष्ठ अरू मिलि सुमंत सौं अति हीं प्रेम बढ़ायौ-९-५५।।
लम्बाई-चौड़ाई या डील-डौल में अधिक करना।
बात बढ़ाना- (१) अत्युक्तिपूर्वक कुछ कहना। (२) झगड़ा या विवाद करना।
गिनती या नाप-तौल में अधिक करना।
बल, प्रभाव या गुण में अधिक करना।
पद, मर्यादा, अधिकार आदि में अधिक करना।
स्थान-विशेष से आगे कर देना।
चलने, दौड़ने में आगे कर देना।
किसी बात में आगे कर देना।
उ.-मेघ सबै जल बरषि बढ़ाने, बिवि गुन गए सिराई-९६७।
उ.-जाकौ सिव-बिरंचि सनकादिक मुनिजन ध्यान न पाव। सूरदास जसुमति ता सुत हित, मन अभिलाष बढ़ाव-१०-७५।
उ.-छज्जे महलन देखि कै मन हरष बढ़ावत -२५६०।
बढ़ावति रारि- झगड़ा बढ़ाती है, विवाद करती है। उ.-बादति है बिन काज हीं बृथा बढ़ावति रारि-५८९।
परिमाण या मात्रा में अधिक किया।
उ.-ऐसौ और कौन करुनामय, बसन-प्रवाह बढ़ावै-१-१२२।
बढ़ि गयौ-डील-डौल में अधिक हो गया।
उ.-पुनि कमंडल धरयौ, तहाँ सो बढ़ि गयौ -८-१६।
कहन लगीं बढ़ि बात- घमण्डभरी या इतरानेवाली बात कहने लगीं, छोटे मुँह बड़ी बात कहने लगीं। उ.-कहन लगीं अब बढ़ि बढ़ि बात। ढोटा मेरौ तुमहिं बँधायौ, तनकहिं माखन खात-३५५।
परिमाण, विस्तार या फैलाव में अधिक हो गयी।
उ.-बीच बढ़ी जमुना जलकारी-१०-११।
बढ़ जाय, वृद्धि को प्राप्त हो।
उ.-(क) अज्ञानी-सँग बढ़ै अज्ञान-४-२। (ख) कजरी कौ पय पियहु लाल, जासौं तेरी बेनि बढ़ै-१०-१७४।
लकड़ी का काम करनेवाला, बढ़ई।
उ.-पालनौ अति सुंदर गढ़ि ल्याउ रे बढ़ैया-१०-४१।
उ.-पचऐं बुध कन्या कौ जौ है, पुत्रनि बहुन बढ़ै हैं-१०-८६।
उ.-गुप्त प्रीति काहै न करी हरि सों प्रगट किंए कछु नफा बढ़ै है-११९२।
अधिक प्रबल हो गया, बल और प्रभाव में अधिक हो गया।
उ.-हिरनकस्यप बढ़्यौ उदय अरु अस्त लौं-१-५।
कहा-सुनी, तर्क-कुतर्क, विवाद।
उ.-जानी जात सूर हम इनकी, बतचल चंचल लोल-३२६५।
उ.-हम जानी अब बात तुम्हारी सुधे नहिं बतराति-१०८७।
निष्कलंक, निष्कलंकित, निष्कलंकी
कामनारहित, आसक्तरहित, निस्वार्थ।
उ.- यम, नियमासन, प्रानायाम। करि अभ्यास होइ निष्काम-२-२१।
(काम) जो निस्वार्थ भाव से किया जाय।
बात करने की चाह रखनेवाला।
देहु बताई- बता दो, सूचित करो।
उ.-तुम बिनु साँकरैं को काकौ। तुम हीं देहु बताइ देवमनि, नाम लेउँ धौं ताकौ-१-११३।
सूचित किया, जताया, निर्देश दिया।
उ.-मन-बच-क्रम हरि-नाम हृदय धरि, ज्यौं गुरु बेद बताई-१-३१८।
उ.-को करि सकै बराबरि मेरी, सो धौं मोहिं बताउ-१-१४५।
कहूँ, जानकारी कराऊँ सूचित करूँ।
उ.-अंबर जहाँ बताऊँ तुमकौं, तौ तुम कहा देहुगी हमकौं-७९९।
उ.-टेढ़ै कहा बतात, कंस कौं देहु कमल अब। काल्हिहिं पठए माँगि पुहुप अब ल्याइ देहु जब-३८९।
नाचने-गाने में भाव प्रकट करना।
उ.-नंद महर घर के पिछवारे राधा आइ बतानी हो-१५५६।
दिखाया, प्रर्दशित या निर्देशित किया।
उ.-मंद धरनि तब मथि दह्यौ, इहि भाँति बतायौ-७१६।
संकेत करता है, संकेत से बात करता है।
उ.-चितै रहै तब आपुन ससि-तन, अपने कर लै लै जु बतावत -१०-१८८।
सूचित करती हे, निर्देश देती है, जताती है, दिखाती है।
उ.-प्रात समय रवि-किरनि-कोंवरी, सो कहि, सुतहिं बतावति है-१०-७३।
उ.-कबहुँ कहति बन गए, कंबहुँ कहि घरहिं बतावति-५८९।
बताता है, सूचित करता है, जताता है।
उ.-अहंकार पटवारी कपटी, झूठी लिखत बही। लागै धरम, बतावै अधरम, बाकी सबै रही-१-१८५।
संगीत या नृत्य के भाव बताता है।
उ.-कबहुँक आगे कबहुँक पाछे नाना भाव बतावै-८७७।
उ.-कत ब्रीड़त कोउ और बतावौ, ताही के ह्वै रहिये-१-१३६।
उ.-जबतैं जनम भयौ है तेरौ, तबहिं तैं यह भाँति लला रे। कोउ आवति जुवती मिस करिकै, कोउ लै जात बतास-कला रे-६०८।
बतासा सा घुलना- (१) शीघ्र नष्ट होना (कोसना, घाली)। (२) क्षीण होते जाना।
उ.-तिल चाँवरी बतासे, मेवा दियौ कुँवरि की गोद -७०४।
केवल बातों से, कोरा उपदेश देकर।
उ.-बतिअन सब कोऊ समुझावै-३३८१।
उ.-वै बतियाँ छतियाँ लिखि राखीं जे नँदलाल कहीं-२८९९।
कहत बनाइ बतियाँ- सिर्फ बात करने से, कोरी चर्चा से। उ.-कहत बनाइ दीप की बतियाँ, कैसैं धौ तम नासत-२-२५।
झूँठी बतियाँ जोरि- मनमानी बातें गढ़कर। उ.-उरहन लै जुवती सब आवतिं झूँठी बतियाँ जोरि-८६८।
[सं. वर्त्तिका, प्रा. बत्तिआ]
रेशम पर बटा हुआ सोने-चाँदीका तार।
उ.-द्वै पिक बिंब बतीस बज्र कन एक जलज पर थात-१६८२।
उ.-जेहि उपदेश मिलैं हरि हमको सो ब्रत-नेम बतैए-३१२४।
बत्तीसी झड़ जाना (पड़ना)- सब दाँत गिर जाना।
बत्तीसी दिखान- हँसना।
बत्तीसी बजना- दाँत किटकिटाना।
बातचीत करती है, बतियाती है।
उ.-जसुमति भाग-सुहा-गिनी, हरि कौं सुत जानै। मुख-मुख जोरि बत्यावई, सिसुताई ठानै-१०-७२।
अत्यन्त स्नेहवान् या कृपालु।
उ.-भक्त-बत्सल कृपानाथ, असरन-सरन, भार-भूतंल हरन जस सुहायौ-१-११९।
उ.-सूर भक्त-बत्सलता बरनौं, सर्व कथा कौ सार-१-२६७।
कंस का अनुचर एक राक्षस जो श्रीकृष्ण द्वारा मारा गया था।
उ.-बथुआ भली भाँति रचि राँध्यौ-२३२१।
[सं. वांस्तुक, पा. बात्थुअ]
कहा बतैहैं- क्या उत्तर देंगे, कैसे अस्वीकार करेंगे। उ.-खायो खेले संग हमारे याको कहा बतैहैं-३४३६।
सूत, रुई, कपड़े आदि का बटा हुआ टुकड़ा जो दीपक में जलाया जाता है।
[सं. वर्त्ति, प्रा. बत्ति]
[सं. वर्त्ति, प्रा. बत्ति]
[सं. वर्त्ति, प्रा. बत्ति]
[सं. वर्त्ति, प्रा. बत्ति]
मनुष्य के दाँत जो बत्तीस होते हैं।
बद में- बदले में, स्थान पर। उ.-गुरुगृह जब हम बन को जात। तुरत हमारे बद में लकरी लावत सहि दुख गात।
बद कर (काम करना)- (१) दृढ़ता या हठ के साथ। (२) ललकारकर, चुनौती देकर।
बदकर कहना- पूरी दॄढ़ता से कहना।
गिनती में लाता है, समझता है, मानता है, बड़ा या महत्व का ख्याल करता है।
उ.-(क) सब तजि तुम सरनागत आयौ, द्दढ़ करि चरन गहे रे। तुम प्रताप बल बदत न काहूँ, निडर भए घर-चेरे-१-१७०। (ख) सब आनंद-मगन गुवाल, काहूँ बदत नहीं-१०-२४। (ग) बदत काहू नहीं निधरक निदरि मोहिं न गनत।
कहते हैं, वर्णन करते हैं, गाते हैं।
उ.-मनौ बेद-बंदीजन सूत-बृंद मागध-गन, बिरद बदत जै जै जै जैति कैटभारे-१०-२०५।
उ.-जोबनदान लेउँ गो तुमसों। जाके बल तुम बदति न काहुहि कहा दुरावति मोसों।
उ.- देखौ माई, बदरनि की बरियाई-९८५।
उ.-गोपिनि के सों बदन निहारै-१०-३।
भाग्य में बदना- भाग्य में लिखा होना।
काम करने को बदना- दृढ़ता के साथ काम करने को कहना।
कुछ समझना, महत्व का मानना।
उ.-निरखति ब्रज-जुवती सब ठाढ़ी, नंद-सुवन-छबि चंद-बदनियाँ-१०-१०६।
हिमालय पर स्थित वैष्णवों का एक श्रेष्ठ तीर्थ। यहाँ नर-नारायण और व्यास का आश्रम है। एक श्रृंग पर बदरी (बेर) वृक्ष होने के कारण इसका यह नाम पड़ा कहा जाता है।
उ.- (क) बदरिआ बधन बिरहिनी आई-२८२१। (ख) जोबन-धन है दिवस चारि को ज्यों बदरी की छाहीं-२१९४।
नारायण जिनकी मूर्ति बदरिकाश्रम में है।
उ.- नारि बदरौला रही बृषभानु घर रखवारि-९७९।
श्रद्धा-भाव, पूज्य बुद्धि।
ज्ञान की अंतिम अवस्था जब ब्रह्म और आत्मा की एकता हो जाती है।
उ.- (क) ताहि सूल पर सूली दयौ। ताकौ बदलौ तुमसौ लयौ-३-५। (ख) जेते मान सेवा तुम कीन्ही, बदलो दयो न जात-२६५७। (ग) हमसों बदलो लेन उठि धाए मनो धारि कर सूप-३१८२।
उ.- ते अब कहत जटा माथे पर बदलो नाम कन्हाई-३१०६।
उ.- खारिक, दाख, चिरौंजी, किसमिस, उज्वल गरी बदाम-८१०।
एक के स्थान पर दूसरा होना।
एक के स्थान पर दूसरा नियुक्त होना।
एक के स्थान पर दूसरा करना, कहना या रखना।
परस्पर लेना-देना, विनिमय।
हानि की पूर्ति-रूप में उपस्थित की गयी वस्तु।
एक वस्तु देकर दूसरी वस्तु लेकर, विनिमय करके, परवर्तन करके।
उ.- इते मान यह सूर महा सठ, हरि-नग बदलि, विषय विष आनत-१-११४।
बदल गयी, भिन्न हो गयी परिवर्तित हो गयी।
उ.- मदनगोपाल बिना या तन की सबै बात बदली-२७३४।
एक के स्थान पर दूसरे को रखना।
उ.- चढ़ि सुख-आसन नृपति सिधायौ। तहाँ कहार एक दुख पायौ। भरत पंथ पर देख्यौ खरौ। वाकैं बदले ताकौं धरौ-५-४।
उ.- मूरा के पातन के बदले को मुक्ताहल दैहै-३१०५।
बदले में, स्थान पर, स्थान की पूर्ति में।
उ.- (क) दच्छ-सीस जो कुंड मैं जरयौ। ताके बदलैं अज-सिर धरयौ-४-५। (ख) मम कृत इनके बदलैं लेहु। इनके कर्म सकल मोहिं देहु-७-२।
उ.- मेरो प्रगट कह्यौ बदिहै ब्रज ही देउँ पठाइ-२९१३।
मानूँगा, स्वीकार करूँगा, सकारूँगा।
उ.- जानिहौं अब बाने की बात। मोसौं पतित उधारौ प्रभु जौ, तौ बदिहौं निज तात-१-१७९।
निश्चित की, ठहराई, स्थिर करके।
उ.- (क) स्याम गए बदि अवधि सखी री। (ख) नैननि होड़ बदी बरसा सों-३४५७।
मार डालता है, बधता है, हत्या करता है।
उ.- जैसैं मगन नाद-रस सारँग, बधत बधिक बिन बान-१-१६९।
उ.-बालक करि इनकौं जनि जान्यौ, कंस बधन येई करिहैं-१०-८५।
जन्म या मंगल अवसर का आनन्द या गाना बजाना।
उ.-(क) रिषभदेव तब जनमें आइ। राजा कैं गृह बजी बधाइ-५-२। (ख) महरि जसोदा ढोटा जायौ, घर घर होति बधाई-१०-२१। (ग) आजु गृह नंद महर कैं बधाइ-१०३३।
पुत्र-जन्म पर माता-पुता को आनन्द-सूचक संदेश, मुबारकबाद।
उ.-सुत के भऐं बधाई पाई-१०-३२३।
शुभ अवसर पर इष्ट-मित्र को दिया जानेवाला संदेश।
एक परस्पर देत बधाई एक उठत हँसि गाइ-१०-२०।
शुभ या मंगल अवसर पर दिया जानावाला उपहार।
जिस पर रोक या प्रतिबंध हो।
नव विवाहिता स्त्री, दुलहन।
उ.-जितनी लाज गुपालहिं मेरी। तितनी नाहिं बधू हौं जिनकी, अंबर हरत सबनि तन हेरी-१-२५२।
उ.-(क) ज्यौं दूती पर-बधू भोरि कै, लै पर-पुरुष दिखावै-१-४२। (ख) भोर होत उरहन लै आवतिं, ब्रज की ब अधूकने-३७७।
अवस्था और पद में छोटे पुरुष की पत्नी।
पुत्र-जन्म के शुभ अवसर पर हर्ष-सूचक वचन या संदेश।
उ.-सूरदास प्रभु की माइ जसुमति, पितु नँदराइ, जोइ जोइ माँगत सोइ देत हैं बधैया-१०-४१।
उ.-गोपी-ग्वाल करत कौतूहल, घर-घर बजति बधैया-१०-१५५।
होत जो बन को रोयो- ऐसी बात या प्रकार जिस पर कोई ध्यान न दे। उ.-कत श्रम करत सुनत को इहाँ है, होत जो बन को रोयो-३०२१।
उ.-मनौ। बिवि मरकत बीच महानग चतुर नारि बनए-९८४।
उ.-घर घर होत अनंद बधाए, जहँ तहँ मगध-सूत-१०-३६।
उ.-ए दोउ नीर खीर निरवारत इनहिं बधायो कंस-३०४९।
उ.-(क) बनि ब्रजसुंदरि चलीं, सु गाई बधावन रे-१०-२८। (ख) हरषि बधावा मन भयौ (हो) रानी जायौ पूत-१०-४०।
उ.-बनकौरा पिंडीक चिचिंडी-३९६।
उ.-तात बचन लगि राज तज्यौ तिन अनुज घरनि सँग भए बनचारी-१०-१९८।
व्यक्ति जो कामना या आसक्तिरहित हो।
उ.- निष्कामी बैकुंठ सिधावै। जनम-मरन तिहिं बहुरि न आवै-३-१३।
बाहर निकाला हुआ, बहिष्कृत।
हिंदू-बच्चे का वह संस्कार जिसमें चार महीने का होने पर उसे घर से बाहर लाकर सूर्य-दर्शन कराया जाता है।
सुरागाय जिसकी पूँछ का चँदर बनता है।
जल में उत्पन्न होनेवाले पदार्थ।
उ.-लीन्हें फिरति रूप त्रिभुवन को ऐ नोखी बवजारनि-१०४१।
बैलों पर अनाज लादकर बेचनेवाला, टाँड़ा लादनेवाला।
[हिं. बन + ताई (प्रत्य.)]
गेरू या वैसी ही रंगीन मिट्टी।
उ.-सखा संग आनंद करत सब अंग अंग बनधातु चित्र करि।
जान (प्राण) पर आ बनना- प्राण संकट में पड़ जाना।
सुन्दर लगना, स्वादिष्ट होना।
स्वरूप धारना, स्वाँग बनाना।
उच्च या बड़ा सिद्ध करने का प्रयत्न करना।
ठीक रूप या स्थिति में आना।
एक पदार्थ से दूसरा तैयार होना।
पद, अधिकार आदि प्राप्त करना।
उ.-किनहु सृंग कोउ बेनु किनहु बनपत्र बजाये-११०७।
तुलसी, कुंद, मंदार, परजाता और कमल- इन पाँच पौधों की पत्तियों और फूलों की बनी हुई ऐसी माला जो प्रायः गले से पैर तक लम्बी होती थी।
उ.-मुकुट सिर धरैं, बनमाल कौस्तुभ गरैं-४-१०।
विष्णु और उनके राम-कृष्ण अवतर।
उ.-कंबु कंठधर, कौतुभ-मनिधर, बनमालाधर, भुत्क मालधर-५७२।
[सं. वनमाला, + हिं. धरना]
बना रहना - (१) जीवित रहना। (२) उपस्थित रहना।
उ.- व्यास कहे सुकदेव सौं द्वादस स्कंध बनाइ-१-२२५।
तैयार करके, व्यवहार-योग्य रूप देकर।
उ.- षटरस सौंज बनाइ जसोदा, रचिकै कंचन-थार-३९७।
उ.- तिलक बनाइ चले स्वामी ह्वै-१-५२।
उ.- कहत बनाइ दीप की बतियाँ, कैसैं धौं तम नासत-२-२५।
उ.- यह बालक धौं कौन कौ, कीन्हौ जुद्ध बनाइ-५८९।
उ.- आपु अपनौ घात निरखत खेल जम्यौ बनाइ-१०-२४४।
उ.-अब ए बेली सूखत हरि बिनु छाँड़ि गए बनमाली-३२२८।
उ.- सजल लोचन चारू नासा, णरभ रूचर बनाइ। जुगल खंजन करत अबिनति, बीच कियौ बनराइ-१०-२२५।
बनराज, बनराजा, बनराय, बनराया
बनराज, बनराजा, बनराय, बनराया
अपने आप उगनेवाले जंगली पेड़।
दूसरे को बनाने के काम में प्रवृत्त करना।
उ.- छूटे चिहुर बदन कुँभिलानौ सुहथ सँवारि बनाइए-१६८८।
उ.- नाना भाँति पाँति सुंदर मनौ कंचन की है लता बनाई-९-५९।
उ.- अति प्यौसर सरस बनाई-१०-१८२।
उ.- लोचन ललित, ललाट भुकुटि बिच तकि मृगमद की रेख बनाई-६१६।
रचकर, गढ़कर, गढ़ी, कल्पित की।
उ.- (क) हम जानी यह बात बनाई-७९९। (ख) देखे तब बोल्यौ कान्ह, उतर यौं बनाई-१०-२८४।
उ.- हरि तासौं कियौ युद्ध बनाई-७-२।
किसी पदार्थ को काट-छाँटकर और गढ़कर, सँवारकर, सुंदर रूप देकर।
उ.- सीतल चंदन कटाउ, धरि खराद रंग लाउ, बिबिध चौकरी बनाउ, धाउ रे बनैया-१०-४१।
उ.- रिषि दधीचि हाड़ लै दान। ताकौ तू निज बज्र बनाउ-६-५।
उ.- तुमरे भूषन मोकों दीजै अपने तुमहिं बनाऊँ- पृ. ३११ (११)।
उ.- बालक बच्छ हरे चतुरानन, ब्रह्म-लोक पहुँचाए। सूरदास-प्रभु गर्व बिनासन, नव कृत फेरि बनाए-४३६।
गढ़कर, सँवारकर या पकाकर तैयार करना।
एक पदार्थ से दूसरा तैयार करना।
नया भाव या संबंध प्रदान करना।
जिसमें कंप या धड़कन न हो।
जो किसी के पक्ष में न हो।
हठ योग में नाद की अंतिम अवस्था।
पद, मान, अधिकार-विशेष प्रदान करना।
विवाह के लिए लड़के-लड़की की जन्मपत्री का मिलान।
उ.- मधु-मेवा पकवान मिठाई ब्यंजन बहुत बनाय-९१८।
उ.- नर-तन, सिंह-बदन बपु कीन्हौ, जन-लगि भेष बनायौ-१-१९०।
उ.- चंदन अगर सुगंध और घृत, बिधि करि चिता बनायौ-९-५०।
बनाता है, रचता है, तैयार करता है।
रूप धारण करता है, रूप धरता है।
उ.- दर-दर लोभ लागि लिये डोलति, नाना स्वाँग बनावै-१-४२।
सुधारता है, पूर्णतः संपादन करता है, पूरा करता है।
उ.- मूकू निंद, नोढ़ा, भोंड़ा, कायर, काम बनावै-१-१८६।
बनि जाइ - काम बन जाय, इच्छा पूरी हो, दशा सुधर जाय।
उ.- उचित अपनी कृपा करिहौ, तबै तो बनि जाइ। बनि आइहै -१-१२६।
करते-धरते बन पड़ेगा, कर सकोगे, सम्हाल सकोगे।
उ.- तब न कछु बनि आइहै, जब बिरूझैं सब नारि-११२५।
उ.- (क) बनि ब्रज सुंदरि चलीं-१०-२८। (ख) बन तैं बनि ब्रज आवत-४७९। (ग) जुवति बनि भईं ठाढ़ी और पहिरे चीर-१८५२।
(किसी पदार्थ का रूप परिवर्तित करके ) नई वस्तु तैयार करता है, रूप परिवर्तित करता है।
उ.- मातु उदर मैं रस पहुँचावत। बहुरि रूधिर तैं छीर बनावत-२-२०।
मनगढ़ंत करता है, उपहास करता है।
उ.- सूर सीस तृन दै बूझति हौ, साँच कहत की बनावत री-१५८५।
(रूप) धरते हैं, (स्वाँग) बनाते हैं।
उ.- मनहीं मन बलबीर कहत हैं, ऐसे रंग बनावत। सूरदास-प्रभु-अगनित महिमा, भगतनि कैं मन भावत-१०-१२५।
बुद्धि बनावति- उपाय सोचती है, युक्ति निकालती है। उ.- यह सुनिकै मन हर्ष बढ़ायौ, तब इक बुद्धि बनावति-११७४।
बात बनावन - बात गढ़ने में। उ.- बात बनावन कौं है नीकौ, बचन-रचन समुझावै-१-१८६।
उ.- पँचरँग पाट कनक मिलि डोरी अतिही सुधर बनावनो-२२८०।
उ.-चढ़ि जदुनन्दन बनित बनाय कै। साजि बरात चले जादव जाय कै।
उ.-सूर स्याम बनिता ज्यों चंचल पग-नूपुर झनकार।
गावत नहिं बनियाँ-गाते नहीं बन पड़ता है, गा नहीं पाता है।
उ.-सेस सहस आनन गुन गावत वहिं बनियाँ-१०-१४४।
कहति न बनियाँ-कही नहीं जाती, वर्णन नहीं की जा सकती।
उ.-आपुन खात, नंद-मुख नावत, सो छबि कहत न बनियाँ-१०-२३८।
उ.-गेंद खेलत बहुत बनिहै, आनौ कोऊ जाइ-५३२।
व्यापार, वस्तुओं का क्रय-विक्रय।
उ.- (क) प्रेम-बनिज कीन्हों हुतो नेह नफा जिय जानि-३२४९। (ख) सूरदास तेहि बनिज कवन गुन भूलहु माँझ गवाँए-३२०१। (ग) और बनिज मैं नाहीं लाहा, होति मूल मैं हानि-१-३१०।
उ.-यह बनिजति बृषभानु सुता तुम हम सों बैर बढ़ावति।
उ.-लीन्हें फिरति रूप त्रिभुवन को ए नोखी बनिजारिनि।
खूब पटती है, अच्छी तरह निभती है।
उ.-सूर कहत जे भजत राम कौं तिनसौं हरि सौं सदा बनी-१-३९।
उ.-कंठ मुक्तामाल, मलयज, उर बनी बनमाल-१-३०७।
योग्य या उचित थी, फबी, भली लगी।
उ.-ते दीनी बधुनि बुलाइ, जैसी जाहि बनी -१०-२४।
मुकुट कुण्डल जड़ित हीरा लाल सोभा अति बनी-१० उ.-२४।
उ.- नन्द सुत बृषभानु-तनया रास में जोरी बनी- पृ. ३४५ (३)।
प्रस्तुत हुई, तैयार हुई, निर्मित हुई।
उ.- हरि जू की आरती बनी-२-२८।
जिय आनि बनी- जी में दृढ़ विश्वास हो गया है, धारणा बन गयी है। उ.- मेरैं जिय ऐसी आन बनी-८९४।
कठिन बनी है- बड़ी विपत्ति आ पड़ी है। उ.- निबाहौ बाँह गहे की लाज। द्रुपद-सुता भाषति नँदनंदन, कठिन बनी है आज-१-२५५।
बहुत बने हैं- बहुत स्वादिष्ट हैं। उ.- मिलि बैठे सब जेंवन लागे। बहुत बने कहि पाक-४६४।
उ.- तेल-तूल-पावक्र-पुट भरि धरि, बनै न बिना प्रकासत
उ.-(क) पहुप देहु तौ बनै तुम्हारी, ना तरु गये बिलाइ-५२६। (ख) गेंद दियैं ही पै बनै, छाँड़ि देहु मतिधूत-५८९।
खेलत बनै- खलते बनता है, ठीक तरह से खेला जाता है। उ.-खेलत बनै घोष निकास- १०-२४४।
उ.-व्यंजन सहस प्रकार जसोदा बनै पठाए- ४३७
बनानेवाला, गढ़नेवाला, निर्माण करनेवाला।
उ.- सीतल चंदन कटाउ, धरि खराद रंग लाउ, बिबिध चौकरी बनाउ, धाउ रे बनैया-१०-४१।
[सं. बनाना + ऐया (प्रत्य.)]
उ.- तात-मरन, सिय-हरन, राम बन-बपु धरि बिपति भरै-१-२६४।
उ.- बपुरा मोकौं कहति, तोहिं बपुरी करि डारौं-५८९।
उ.- हमतें भली जलचरी बपुरी अपनौ नेम निबाह्यौ-३१४९।
तुच्छ, नगण्य, जिसकी कोई गिनती न हो।
उ.- इंद्र समान हैं जाके सेवक, नर बपुरे की कहा गनी-१-३९।
कपास के फूल जैसा, कपास का, कपासी।
उ.- कटी लहँगा नीलौ बन्यौ, को जो देखि न मोहै (हो) ?-१-४५।
बनता है, होता है, (काम) चला करता है।
उ.- या बिधि कौ ब्योपार बन्यौ जग, तासौ नेह लगायौ-१-७९।
भलौ बन्यौ है संग- अच्छा साथ हुआ है, खूब साथ बना है। उ.- प्रथम आजु मैं चोरी आयौ, भलौ बन्यौ है संग। आपु खात, प्रतिबिंब खवावत, गिरत कहत, का रंग-१०-२६५।
बेचारे ने, गरीब ने, अनाथ ने।
उ.- मनसाकरि सुमिरयौ गज बपुरैं, ग्राह प्रथम गति पावै-१-१२२।
उ.- (क) केतिक जीव कृपिन मम बपुरौ, तजै कालहू प्रान। सूर एकहीं बान बिदारैं, श्री गोपालकी आन-१-२७५।
उ.- कहा बपुरो कंस मिट्यौ तब मन संस करत है जी को-२५५६।
पिता से प्राप्त धन-संपति और जायदाद।
उ.- (क) मन मैं माष करत, कछु बोलत, नंद बाबा पै आयौ-१०-१५६। (ख) सिर कुलही, पग पहिरि पैजनी, तहाँ जाहु जहँ नंद बबा रे -१०-१६०।
उ.- बरु ए प्रान जाहिं ऐसे ही बयन होय क्यों हीनों-३०३४।
युवावस्था को प्राप्त, युवक या युवती।
उ.- (क) पारवती बय-प्रापत भई-४-७। (ख) मम पुत्री बय-प्रापत आहि-४-९।
उ.- मैं तौ बृद्ध भयौ, वह तरुनी, सदा बयस इकसारी-१-१७३।
अवस्थाओं में श्रेष्ठ, युवावस्था।
उ.- बोवत बबुर दाख फल चाहत, जोवत है फल लागे-१-६१।
उ.- निरतत पद पटकट फन-फन प्रति, बमत रुधिर नहिं जात सम्हारयौ-५७४।
उ.- बमनहिं खाइ, खाइ सो डारै, भाषा कहि कहि टेरा-१-१८६।
उ.- (क) बिषय-बिकार-दवानल उपजी , मोह-बयारि लई-१-२९९। (ख) बेगिहिं नारि छोरि बालक कौं, जाति बयारि भराई-१०-३६। (ग) (तरु) गिरे कैसैं, बड़ौ अचरज, नैंकु नहीं बयार-३८७।
बयर करना- पंखा हाँकना।
बयारि न लागी ताती- गरम हवा नहीं लगी, जरा भी कष्ट नहीं हुआ। उ.- गोकुल बसत नंदनंदन के कबहुँ बयारि न लागी ताती-२९७७।
जैसी बयारि बहै तैसी ओढ़िए जू पीठि- जैसी हवा चले वैसी ही पीठि दीजिए, जैसी स्थिति हो, वैसा ही काम कीजिए। उ.- सूरदास के पिय, प्यारी आपुही जाइ मनाय लीजै, जैसी बयारि बहै तैसी ओढ़िए जू पीठि-२०२५।
उ.- असुर के तनहि को लग्यो कलपन तुरंग गज उड़ि चले लागी बयारी-१० उ.-३१।
उ.- सप्त पताल अध ऊर्ध्व पृथ्वी तल जल नभ बरुन बयारी-३२६१।
दीवाल से तोप का गोला निकालने का छेद।
उ.- (क) अब मेरी-मेरी करि बौरे, बहुरौ बीज बयौ-१-७८। (ख) सूर सुरपति सुन्यौ, बयौ जैसो लुन्यौ प्रभु कह गुन्यौ गिरि सहित वेहै-९४४।
आशीर्वादात्मक वचन बरदान, वर।
उ.- (क) ब्यास पुत्र-हित बहु तप कियौ तब नारायन यह बर दियौ-१-२२५। (ख) हम तीनौं हैं जग करतार। माँगि लेहु हमसौं बर सार-४-३।
उ.- बर अरु बधू आवत जब जाने रुकमिनि करत बधाई।
उ.-अतिहिं हठीली, कह्यौ न मनति, करति आपने बर तैं-७४४।
सभा आदि जो समाप्त हो गयी हो।
जो नौकरी से हटा दिया गया हो।
उ.- लोक-वेद बरजत सबैं (रे) देखत नैननि त्रास। चोर न चित चोरी तजै, (रे) सरबस सहै बिनास -१-३२५।
मना करके, रोककर, निवारण करके।
उ.- इहिं लाजनि मरिऐ सदा, सब कोउ कहत तुम्हारी (हो)। सूर स्याम इहिं बरजि कै, मेटौ अब कुल-गारी (हो)-१-४४।
रोकने या मना करने के लिए।
उ.- फुरैं न बचन बरजिबैं कारन, रहीं बिचारि-बिचरि-१०-२८३।
उ.- हम बरजी, बरज्यौ नहिं मानत-३६९।
उ.- मैं बरजे तुम करत अचगरी। उरहन कैं ठाढ़ी रहैं सिगरी-३९१।
उ.- हाथ तारी देत भाजत, सबै करि करि होड़। बरजै हलधर, स्याम, तुम जनि चोट लागै गोड़-२१३।
उ.- कोऊ खीझो कोऊ कितने बरजो जुवतिन के मन ध्यान-८७०।
बल का अनुचित प्रयोग करनेवाला।
उ.- नंद बाबा की गऊ चरावो हमसो करो बरजोरी-२४०९।
उ.- करत अन्याय न बरजौं कबहूं अरु माखन की चोरी-२७०८।
उ.- सूर सुताहिं बरजौ नँदरानी अब तोरत चोलीबँद-डोरि-१०-३२७।
मना किया, रोका निषेध किया, निवारण किया।
उ.- (क) ब्रह्म-पुत्र सनकादि गए बैकुराठ एक दिन। द्वारपाल जय-विजय हुते, बरज्यौ तिनकौं तिन-३-११। (ख) बार-बार बरज्यौ, नहिं मान्यौ, जनक-सुता तैं कत घर आनी-९-१६०।
उ.- दृढ़ बिस्वास बरत कौ कीन्हौ। गौरीपति-पूजन मन दीन्हौं-७९९।
निष्ठापूर्ण और अनन्य प्रीति।
उ.- सूर प्रभु पति बरत राखै, मेटि कै कुलकानि-८९५।
जो पूरा या समाप्त हो चुका हो।
उ.- (क) अति निसंक, निरलज्ज, अभागिनि घर-घर फिरति बही-१-१७३। (ख) निपट निसंक बिवादति सम्मुख, सुनि सुनि नंद रिसात-१०-३२६।
(छड़ी आदि से) मारे जाने का उभरा या सूजा हुआ चिह्न।
उ.- दसहुँ दिसा तैं बरत दवानल आवत है ब्रज जन पर धायौ-५९१।
संबंध रखते हैं, व्यवहार करते हैं, साथ निभाते हैं।
उ.- प्रभु तैं जन, जन तैं प्रभु बरतत, जाकी जैसी प्रीति हिऐं-१-८९।
भोग करे, व्यवहार में लाये।
उ.- अरु जो परालब्ध सौं आवै। ताहीं कौं सुख सौं बरतावै-३-१३।
आँखि बरति है- आँख जलती है, दुख और क्रोध होता है। उ.- काहे को अब रोष दिवावत, देखति आँखि बरति है मेरी-३०१२।
उ.- मरे से अपसरा आइ ताकौ बरति भजिहैं देखि अब गेह नारी।
रोम या बाल उखड़ने से होनेवाला फोड़ा।
उ.- ग्वाल-बाल सब बरन बरन के, कोटि मदन की छबि किए पाछे-५०७।
उ.- बरन बरन मंदिर बने लोचन नहिं ठहरात-२५६०।
उ.- (क) काहूँ कहयौ मंत्र-जप करना। काहूँ कछु, काहूँ कछु बरना-१,३४१। (ख) जड़ तन कौं है जनमऽरु मरना। चेतन पुरुष अमर-अज बरना-३-१३।
उ.- मुण्ड माल सिव-ग्रोवा कैसी ? मोसौं बरनि सुनावौ तैसी-१-२२६।
वर्णन कर सकूँ, बखान सकूँ।
उ.- ता रिस मैं मोहिं बहुतक मार्यौ, कहुँ लगि बरनि सकौं-१-१५१।
वर्णन कीजिए, बखानिए, कहिए।
उ.- सुनि याके उतपात कौं, सुक सनका-दिक भागे (हो)। बहुत कहाँ लौं बरनिऐ, पुरुष न उबरन पावै (हो) -१-४४।
उ.- (क) तुम हनुमंत पवित्र पवनसुत, कहियौ जाइ जोइ मैं बरनी-९-१०१। (ख) सुता लई उर लाइ, तनु निरखि पछिताइ, डरनि गई कुम्हिलाइ, सूर बरनी-६९८।
बरनी जाइ- वर्णन की जाय, कही जाय।
उ.- हृदय हरि-नख अति राजत, छबि न बरनी जाइ-१०-२३४।
बरने जाइ-वर्णन किये (जाते हैं), वरने (जाते ङैं) कहते (हैं)।
उ.- बाबर बरने नहि जाई। जिहिं देखत अति सुख पाई-१०-१८३।
उ.- कहा गुन बरनौं स्याम, तिहारे-१-२५।
बरन्यौ जाइ (जाई)-वर्णन किया जा सकता है।
उ.- (क) मुख देखत मोहिनि सी लागी, रूप न बरन्यौ जाई री-१०-१३९। (ख) बृन्दाबन ब्रज कौ महत कापै बरन्यौ जाइ-४९२।
उ.- खेलत मैं को काकौ गुसैयाँ। हरि हारे, जीते श्रीदामा, बरबस हीं कत करत रिसैयाँ-१०-२४५।
(ब्राह्मण का) आशीर्वाद देना।
उ.- सहस बरस गज जुद्ध करत भए, दिन इक ध्यान धरे-१-८२।
बरष-बरषनि-प्रति वर्ष, बहुत वर्षों तक।
उ.- कान्ह बरष-गाँठि उमँग, चहति बरष बरषनि-१०-९६।
उ.- सूर स्याम ब्रज-जन-मन-मोहन-बरष-गाँठि कौ डोरा खोल-१०-९४।
बरसाती हुई, गिराती या बहाती है।
उ.- इतनी सुनत कुंति उठिधाई, बरषत लोचन नीर-१-२९।
उ.- स्रवत स्रोनकन, तन सोभा, छबिधन बरसत मनु लाल-१-२७३।
वर्षा-जल के समान ऊपर से गिरना।
पानी बरसने की क्रिया, वृष्टि, वर्षा।
उ.- कीजै कृपा-द्दष्टि की बरषा, जन की जाति लुनाई-१-१८५।
उ.- जय जय धुनि नभ करत हैं बरषि पुहुप बरषाइ-४३१।
ऊपर से मेह की तरह गिराना।
वर्षा के जल के समान (कोई वस्तु) गिराती है।
उ.- आनँद उर अंचल सम्हारति, सीस सुमन बरषावति -१०-२३।
एक मनुष्य या एक परिवार के लिए पर्याप्त एक वर्ष की भोजन-सामग्री।
वर्षा के जल की तरह ऊपर से गिराते हैं।
उ.- ब्योम-जान फूल अति गति बरसावै री-६९।
उ.- निसि अँधेरी, बीजु चमकै सधन बरसै मेह-१०-५।
बरसा, जल गिरा (गिराया), मेह पड़ा।
उ.- देवराज मष-भंग जानि कै बरष्यौ ब्रज पर आई-१-१२२।
उ.- बरह मुकुट कैं निकट लसति लट, मधुप मनौ रुचि पाए-१०-४१७।
[हिं. बरह + हि (प्रत्य.)]
वृक्ष की पतली सींक या डाल को, तिनकेको।
उ.- सोवत काग छुयौ तन मेरौ, बरहहिं कीनौ बान। फोरयौ नयन, काग नहिं छाँड़यौ सुरपति के बिदमान-९-८३।
[हिं. बरह + हि (प्रत्य.)]
उ.- बरहा पिक चातक जै जै निसान बाजै-२८१६।
उ.- बरही मुकुट इंद्रधनु मानहुँ तड़ित दसन-छबि लाजति-६३८।
उ.- बरहीपीड़ दाम गुंजामनि अद्भुत बेष बनावत सारा. -४७५।
एक पकवान जो उर्द की मसालेदार पीठी की टिकियों को घी या तेल में तल कर बनता है, (दही) बड़ा।
उ.- दधि दूध बरा दहिरौरी। सो खात अमृत पक्कौरी-१०-१८३।
उ.-गहि गहि बाँह सबनि करि ठाढ़ी कैसेहूँ घर ते निसरौगी-१२८९।
जिसके होशहवास ठिकाने न हों, विकल।
उ.- बरा कौर मेलत मुख भीतर, मिरिच दसन टकटोरै-१०-२२५।
बर का संबंधियों और इष्टमित्रों-सहित सजधजकर कन्या के यहाँ जाना, जनेव।
उ.- (क) जनकराज तब बिप्र पठाये बेग बरात बुलाई-सारा. २२९। (ख) सो बरात जोरि तहँ आयो-१० उ.-७।
बहुत से लोगों का सजधज कर साथ जाना।
शव ले जाने वालों का समूह।
विवाह के अवसर पर वर-पक्ष की ओर से सम्मिलित होनेवाले।
उ.- (क) तेरी सौं, मेरी सुनि मैया, अबहिं बियाहन जैहौं। सूरदास ह्वै कुटल बराती, गीत सुमंगल गैहौं-१०-१९३। (ख) भए जो मन्मथ सैन्य बराती-पृ ३४५ (५)।
[हिं. बरात + ई [प्रत्य.]]
[हिं. बरात + ई (प्रत्य.)]
बहुत सी बातों या विचारों में कुछ को बचा जाना।
बराबर करना- समाप्त कर देना।
बराबर होने की क्रिया या भाव, समानता।
उ.- हरि, हौं सब पतितनि कौ राउ। को करि सकै बराबरि मेरी, सोधौं मोहिं बताउ-१-१४५।
उ.- ज्वाला देखि अकास बराबरि, दसहुँ दिसा कहुँ पार न पाइ-५९४।
समान रूप, गुण, मूल्यवाला।
उ.- सूरदास प्रभु पारस परसै लोहौ कनक बराबरी-३३३१।
उ.- बढ़ौ तुम्हार बरामंद हूँ कौ लिखि कीनौ है साफ-१-१४३।
दूल्हे का लोहे का छल्ला जिसमें गुंजा लगे रहते हैं।
उ.- देती अबहिं जगाइ कै, जरि बरि होत्यौ छार-५८९।
उ.- कृषि आइहैं सब लैहैं बरिआई-१२-३।
उ.- (क) अपनी ओर देखि धौं लीजै ता पाछे करियै बरिआई-११३४। (ख) सूरस्याम जो देखिहैं करिहैं बरियाई- पृ. ३१७ (६१)।
उ.- हरि हौं महा अधम संसारी। आन समुझ मैं बरिया ब्याही आसा कुमति कुनारी-१-१७३।
उ.- देखौ माई बदरनि की बरियाई-९८५।
उ.- आगर इक लोह जटित लीन्ही बरिबंड। दुहूँ करनि असुर हयौ, भयौ मांस पिंड-९-९६।
उर्द या मूँग की पीठी की सुखायी हुई छोटी पकौड़ियाँ।
उ.- (क) पापर बरी अचार परम सुचि। (२) कूटबरी काचरी पिठौरी-३९६।
वह मेवा, मिठाई, आदि जो वर के यहाँ से कन्या के यहाँ जाय।
उ.- (क) बहुरि हिमाचल कैं अवतरी। समय पाइ सिव बहुरौ बरी-४-५। (ख) जद्यपि रानी बरी अनेक-६-५।
जिसे मुक्त किया गया हो, मुक्त।
उ.- नंदराइ कौ लाड़िलौ, जीवै कोटि बरीस-१०-२७।
भले ही, चाहे, कुछ हर्ज नहीं, ऐसा भले ही हो जाय।
उ.- (क) बरू मेरी परतिज्ञा जाय-१-२७३। (ख) सूरदास बरू उपहास सहोई, सुर मेरे नंद-सुवन मिलैं तो पै कहा चाहियै। (ग) बरू मरि जाइ चरै नहिं तिनका सिंह को है सुभाइ रे-३०७०।
उ.- तब कत कंस रोकि राख्यौ पिय, बरू वाही दिन काहैं न मारी-१०-११।
उ.- बरू ऐ बदरौ बरषन आए-३९२६।
उ.- इतनी बिपति भरत सुनि पावैं आवैं साजि बरूथ-९-१४७।
खपरैल या छाजन की आधार गोल लकड़ी।
खपरैल या छाजन का बिचला ऊँचा भाग।
उ.- कै वह स्याम सिखाय प्रबोधे कै वह बीच बरे-२९८२।
विवाह के लिए वर या कन्या को देखना, ठहरौनी।
जरैं-बरैं वै आँखि- आँखे नष्ट हो जाये या फूट जायें। उ.- डीठि लगावति कान्ह को जरैं-बरैं वै आँखि-१०६९।
उ.- बरै जेंवरी जिहिं तुम बाँधे, परै हाथ भहराइ-३८९।
उ.- अंतःपुर भीतर तुम जाहु। बरै तुम्हैं, तिहिं करौं बिबाहु-९-८।।
वह धन जो कन्या पक्ष वाले विवाह-संबंध को पक्का करने के लिए वर को उसी कन्या के लिए रोक रखने को देते हैं; बरच्छा, फलदान।
वरण करूँ, वर या वधू के रूप में स्वीकार करूँ।
उ.- देखि सुर असुर सब दौरि लागे गहन, कह्यौ मैं बर बरौं आपु-भायौ-८-८। (ख) कन्या एक नृपति की बरौं-९-८।
वरण करो, वर या वधू-रूप में स्वीकार करो।
उ.- या कन्या कौं प्रभु तुम बरौ-९-३।
बेदम, मृतकप्राय, मरण-तुल्य।
काम, उपयोग या व्यवहार में लाना।
वर या वधू के रूप में स्वीकार किया, बरा, ब्याहा।
उ.- (क) पारबती सिव-हित तप करयौ। तब सिव आइ तहाँ तिहिं बरथौ-४-७। (ख) हरि करि कृपा ताहि तब बरयौ-१० उ.-७।
स्वप्न या अति ज्वर की अवस्था में बकना।
उ.- अति बल करि करि काली हारयौ-५७४।
उ.- मुनि- मन- हंस -पच्छ- जुग, जाकैं बल उड़ि ऊरध जात-१-९०।
उ.- जबहि मोहिं देखत लरिकनि सँग तबहिं खिझत बलभैया-१०-२१७।
उमंग, आवेश या जोश में आता है।
उ.- पिये प्रेम बर बारूनी बलकति बल न सँभार। पग डगमग जित तित धरति मुकुलित अलक लिलार-११८२।
उमंग, आवेश या जोश में आना।
आवेश में आकर, जोश में आकर।
उ.- सखा कहत हैं स्याम खिसाने। आपुहिं आपु बलकि भए ठाढ़े, अब तुम कहा रिसाने-१०-२१४।
बलदेव, बलराम, जो रोहिणी के पुत्र थे।
उ.- कछु बलदाऊ कौं दीजै। अरू दूध अधावट पीजै-१-१८३।
[सं. बल + हिं. दाऊ=दादा=बड़ा भैया]
उ.- इंद्रजीत बलनिधि जब आयौ, ब्रह्मअस्त्र उन डारे- सारा. २८४।
उ.- (क) है करयौ सिरावन सीरा। कछु हठ न करौ बलबीरा-१०-१८३। (ख) छहौ रागिनी गाय रिझावत अति नागर बलबीर।
[सं. बल=बलराम + हिं. बीर=भाई]
उ.- जनि पूछौ तुम कुसल नाथ की, सुनौ भरत बलबीर-९-१५१।
उ.- (क) कनक- वलय, मुद्रिका मोदप्रद, सदा सुभग संतनि काजैं-१-६९। (ख) छूटी लट भुज फूटी बलया टूटी लर फटी कंचुकी झीनी-३४४९।
उ.- आगर इक लोह जटित लीन्ही बरिबंड। दुहूँ करनि असुर हयो, भयो मांस पिंड-९-९६।
उ.- भरम ही बलवंत सबमैं, ईसहू कैं भाइ-१-७०।
उ.- जो ऐसे बलवंत हौ मथुरा काहे न जात-११३९।
उ.- कुंभकरन पुनि इंद्रजित यह महाबली बलसार- सारा. २९२।
बला का- गजब का।
बला से- कुछ चिंता नहीं।
उ. बालगोपाल लगौ इन नैननि रोग बलाइ तुम्हारी-१०-९१।
लेत बलाइ- दूसरे के दुख को अपने ऊपर लेती है, मंगल-कामना करते हुए प्यार करती है। उ.- निकट बुलाइ बिठाइ निरखि मुख, अंचर लेत बलाइ। चिरजीवौ सुकुमार पवन-सुत, गहति दीन ह्वै पाइ-९-८३।
उ.- स्याम सौं वै कहन लागे, आगैं एक बालाइ-४२७।
उ.-(क) मुक्तादाम बिलोकि, बिलखि करि, अँवलि बलाक बनावत -६६५। (ख) मनहु बलाक पाँति नव घन पर यह उपमा कछु भाजै री-१३४३।
स्त्री से बलपूर्वक संभोग।
उ.-बाल गोपाल लगौ इन नैननि रोग-बलाय (बलाइ) तुम्हारी-१०-९१।
बलाय करे- स्वयं नहीं कर सकता।
बलाय लेना- किसी का रोग-दुख अपने ऊपर लेने को प्रस्तुत होकर उसकी मंगल-कामना करते हुए प्यार करना।
लेति बलाय- मंगल कामना करके प्यार करती है। उ.- (क) निकट बुलाय बिठाय निरखि मुख आँचर लेति बलाय। (ख) लेति बलाय रोहिनी नारि के सुंदर रूप निहारी-सारा. ४५७।
उ.-रखवारी कौं बहुत निसाचरि, दीन्हीं तुरत पटाइ-९-६१।
उ.-(क) हरि, हौ सब पतितनि कौ राजा। निंदा पर-मुख पूरि रह्यौ जग, यह निसान नित बाजा-१-१४४। (ख) धुरवा धुंधि बढ़ी दसहूँ दिसि गर्जि निसान बजायो-२८१९।
उ.-जाकौ दीनानाथ निवाजैं। भव-सागर मैं कबहुँ न झूकै, अभय निसाने बाजैं-१-३६।
उ.-कहा कहौं वर्षा रबि-तमचुर-कमल-बलाहक कारे-२८६२।
देवता को उत्सर्ग किया गया खाद्य पदार्थ।
उ.- हम सेवक वै त्रिभुवनपति, कत स्वान सिंह-बलि खाइ-९-४७।
उ.-(क) सक्र कौ दान-बलि-मान ग्वारनि लियौ, गह्यौ गिरि पानि, जस जगत छायौ-१-५। (ख) पर्वत सहित धोइ ब्रज डारौं देउँ समुद्र बहाई। मेरी बलि औरहिं लै अर्पत इनकी करौं सजाई।
वह पशु जो किसी देवी-देवता पर भेंट चढ़ाने के लिए मारा जाय।
बलि चढ़ना- मारा जाना।
बलि चढ़ाना- (१) मारना। (२) देवता के लिए मारना।
बलि-बलि जाना- निछावर होना।
बलि जाइ- निछावर होता है। उ.-यह सुख निराखि मुदित सुर-नर-मुनि, सुरदास बलि जाइ-९-२९।
प्रहलाद का पौत्र और विरोचन का पुत्र जिसे छलकर वामन भगवान ने पाताल भेजा था।
उ.-जुग जुग बिंरद इहै चलि आयो भए बलि के द्वारे प्रतिहार-२६२०।
देवी-देवता को नैवेद्य चढ़ाना।
पशु को देवी-देवता के नाम पर मारना।
वह पशु जो देवी-देवता पर भेंट चढ़ाने के लिए मारा जाय।
निछावर, अपने को उत्सर्ग कर देना।
उ.-बेर मेरी क्यौं ढील दीन्ही, सूर बलिहारी-१-१७६।
बलिहारी जाना- निछावर होना, बलैया लेना।
बलिहारी लेना- प्रेम दिखाना।
लेन लगीं बलिहारी- बलैया लेने लगीं। उ.-दरसन करि जसु-मति-सुत को सब लेन लगीं बलिहारी।
बलिहारी है- (१) इतना सुंदर है कि मैं अपने को निछावर करने को प्रस्तुत हूँ (प्रशंसा)। (२) इतना बुरा या बेढंगा है कि धन्य है (व्यंग्य)।
भोजन से निकाला हुआ ग्रास।
उ.-पिक चातक बन धसन न पावहिं बाइस बलिहिं न खात-३४६०।
उ.-काल बली तैं सब जग काँप्यौ-१-५२।
उ.-(क) फोरतौ बासन सब, जानति बलैया-३७२। (ख) यह सुनिकै हरि हँसे, काल्हि मेरी जाय बलैया-४३७।
बलैया लेना- मंगल कामना करते हुए प्यार करना।
लेति बलैया- मंगल-कामना करते हुए प्यार करती है। उ.-(क) सिखवति चलन जसोदा मैया। ¨¨¨¨¨¨। कबहुँक सुंदर बदन बिलोकति पर आनंद भरि लेति बलैया-१०-११५। (ख) सूर निंरखि जननी हँसी, तब लेति बलैया-६६६।
वृक्ष की छाल के वस्त्र जिन्हें तपस्वी पहनते थे।।
उ.-पात्र स्थान हाथ हारे दीन्हे। बसन-काज बल्कल प्रभु कीन्हे-२-२०।
उ.-इत उत है तुम बवँडत डोलत करत आपने जी की।
[सं. व्यावर्त्तन, प्रा. व्यावट्टन]
उ.-पुहुप गए बहुरौ बल्लिन के नेक निकट नहिं जात-३३५४।
उ.-ब्रज-बनिता के नयन प्रान बिच तुमही स्याम बसंत।
सरसों के रंग का, खुलते पीले रंग का।
उ.-(क) परम कुबुद्धि, अजान ज्ञान तैं, हिय जु बसति जड़ताई-१-१८७। (ख) नाहिंन बसति लाल कछु तुम्हरै-७३५।
बसतै रहियै-निवास कर सकूँ, बसूँ, बसा रहूँ।
उ.-सोइ करौ जु बसतै रहियै, अपनौ धरियै नाउँ-१-१८५।
उ.-कमलनैन काँधे पर न्यारो पोत बसन फहरात-२५३९।
आबाद होना। घर बसना-विवाह करके गृहस्थ बनना। घर में बसना-घर बनाकर सुख से रहना।
टिकना, ठहरना, डेरा डालना।
मन में बसना- हर समय ध्यान रहना।
उ.-(क) जिहिं जिहिं जोनि फिर्यौ संकट-बस तिहिं-तिहिं यहै कमायौ-१-१११। (ख) सदा सुभाव सुलभ सुमिरन बस, भक्तनि अभै दियौ-१-१२१।
किसी बात को अपने अनुकूल घटित करने की सामर्थ्य, शक्ति, काबू।
उ.-गर्भ परिच्छित रच्छा कीनी, हुतौ नहीं बस माँ कौ-१-११३।
बस या बस करो- इतना पर्याप्त है।
उ.-कालिंदी कैं कूल बसत इक मधुपुरि नगर रसाला-१०-४।
उ.-जाति-पाँति हमतैं बहु नाहीं, नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ-१०-२४५।
प्रान बसत हैं- इन्हीं को देखकर जीवित हूँ। उ.-इनहीं में मेरे प्रान बसत हैं, तेरे भाएँ नैकु न माई-७१०।
उ.-(क) मथुरा में बसवास तुम्हारौ। (ख) जौ तुम पुहुप पराग छाँड़ि कै करौ ग्राम बसवास।
उ.-अब बसवास नहीं लखौं यहि तुव ब्रज नगारी।
उ.-अमरा सिव रषि ससि चतुरानन हय गय बसह हंस मृग जावत।
वश, जोर या अधिकार चलता है।
उ.-(क) तौ कछु न बसाइ पार्थ जौ श्रीपति तोहिं जितावै-१-२७५। (ख) जहाँ तहाँ सोइ करत सहाइ। तासौं तेरौ कछु न बसाइ-७-२। (ग) यासौं हमरौं कछु न बसाइ-७-७।
बसने या रहने को प्रवृत्त किया।
उ.-पृथी सम करि प्रजा सब बसाई-४-११।
हृदय बसायौ- चित्त में इस प्रकार जमाया कि सदैव ध्यान बना रहे, हृदय में (सदा के लिए) अंकित किया, हृदयंगम किया। उ.-ब्यासदेव जब सुकहिं पढ़ायौ। सुनि कै सुक सो हृदय बसायौ-१-२२७।
उ.-हरि जी कियौ बिचार, सिंधु-तट नगर बसायौ-१० उ.-३।
वश, जोर या अधिकार चल सका।
उ.-उनसौं हमरौ कछु न बसायौ। तातैं तुम कौं आनि सुनायौ-६-४।
बस, जोर या अधिकार चलता (हे)।
उ.-कह्यौ, इंद्रानी मोपै आवै। नृप सौं ताकौं कहा बसावै-६-७।
उ.- सूरदास प्रभु टरत न टारे नैननि सदा बसाहीं-१४३९।
उ.- गोकुल होत उपद्रव दिन प्रति, बसिऐ बृन्दावन में जाई-४०२।